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Showing posts with the label हिंदी कविता

वे वहां गए ही क्यों थे

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जितनी मुंह उतनी बातें वे वहां सोए ही क्यों थे क्या वे सामूहिक आत्महत्या करने गए थे वे वहां गए ही क्यों थे क्या वे वहां रेलगाड़ियां ही रोकने गए थे आखिर उन मजदूरो का इरादा क्या था इसमें सरकार का क्या आखिर वे उसी शहर में रुक क्यों नहीं गए शहर दर शहर 24 मार्च से ही लौट रहे हैं वे लोग सबसे पहले दिल्ली-यूपी सीमा पर दिखी थी भीड़ तब भी हुआ था कुछ बसों का इंतजाम अब भी हुआ है कुछ बसों का इंतजाम लेकिन वे तो 8 मई तक भी चले ही जा रहे हैं क्यों नहीं खत्म हो रही उनकी अनवरत यात्रा जहां वो हैं वहां वो आम ट्रेन भी नहीं है जहां वो नहीं है वहां विशेष ट्रेन खड़ी है शोक संदेश आ गया है, व्यवस्था को कह दिया है वीडियो कॉन्फ्रेंस हो गई है, जांच को बोल दिया है तानाशाह के चमचे कान में फुसफुसाते हैं रेल लाइन पर पड़ी रोटियां न दिखाएं प्लीज वे वहां सोए ही क्यों वाला नैरेटिव बेहतर है वे वहां गए ही क्यों तो उससे बेहतर हेडिंग है प्राइम टाइम जोरदार है, विपक्ष से सवाल लगातार है घ

कविता : तुम अभी याद नहीं आओगे

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तुम अभी याद नहीं आओगे जब मुश्किल तुम पर आई है जब तुम्हारे जाने की बारी आई है तुम अभी याद नहीं आओगे तुम तब याद आओगे जब हम मुश्किल में आ जाएंगे जब जीने के लाले पड़ जाएंगे जब सेठ को याद आएगा घर बनवाना जब पानी लीक करेगा नल पुराना जब दीवारों पर सीलन आ जाएगी जब फर्नीचर बनवाने की बारी आएगी जब धूल मिट्टी बस जाएगी घर के कोने-कोने कपड़े और बर्तन पर गंदगी हो जाएगी जमा होने तुम तब याद आआगे तुम तब याद आओगे जब गाड़ी दौड़ते-दौड़ते ठहर जाएगी जब मोटे टायरों पर कील धंस जाएगी जब पैर थक जाएंगे चलते चलते जब आंखें थक जाएंगी रिक्शा तकते जब कोई बाइक से होम डिलिवरी नहीं करेगा जब दुकान से भार खुद उठाना पड़ेगा जब हरी सब्जी के लिए दिल तरस जाएगा जब घर का गार्डन जंगली घास से भर जाएगा तुम तब याद आओगे अभी तो हमने  अपनी आंखें, अपनी आत्मा क्वारंटाइन कर ली है अभी तो मास्क ने हमारी बोली बंद कर दी है अभी कैसे याद कर लें तुम्हें अभी तो अमीरों की जान एक बीमारी ने जकड़ ली है अभी तुम्हारे आंसू, तुम्हारा दर्द तुम्हारा झोला, तुम्हारी दूरियां

अहमदाबाद की दीवारें

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हथियार बेचने आ रहे हिरोशिमा के क़ातिलों की संतान के स्वागत में वो कौन लाखों लोग अहमदाबाद की सड़कों पर होंगे ? दीवार के इस पार या उस पार वाले नरोदा पाटिया वाले या गुलबर्गा वाले। डिटेंशन कैंप सरीखी बस्तियों वाले या खास तरह के कपड़े पहनने वाले।। वो जो भी होंगे पर किसान तो नहीं होंगे तो क्या वो फिर जियो के कामगार होंगे। नरसंहारक होंगे या दुष्प्रचारक होंगे तड़ीपार होंगे या फिर चिड़ीमार होंगे।। हो सकता है वो फ़क़ीरी सरदार हों दस लाख के सूट वाले असरदार हों। लुटते पिटते दलितों के रिश्तेदार हों या वो नागपुर से आए चौकीदार हों।। आओ ऐसी बाँटने वाली दीवारें गिरा दें हर कोने में शाहीनबाग आबाद करा दें। सब मक्कार तानाशाहों को झुका दें नागरिकता के मायने इन्हें भी बता दें।। -यूसुफ़ किरमानी Ahamadaabaad kee Deevaaren hathiyaar bechane aa rahe hiroshima ke qaatilon kee santaan ke svaagat mein vo kaun laakhon log ahamadaabaad kee sadakon par honge ?  deevaar ke is paar ya us paar vaale naroda paatiya vaale ya gulabarga vaale.  ditenshan kaimp sa

शाहीनबाग़ पर प्रसिद्ध लेखिका नासिरा शर्मा से बातचीत

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आलोक धन्वा की कविता - फर्क

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शाहीनबाग में कहानी के किरदारों की तलाश

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कोई लेखक-लेखिका जब किसी जन आंदोलन में अपनी कहानियों और उपन्यासों के किरदारों को तलाशने पहुंच जाए तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि शाहीन बाग का आंदोलन कहां से कहां तक पहुंच गया है। हिंदी की मशहूर उपन्यासकार औऱ कहानी लेखिका नासिरा शर्मा ऐसी ही एक रात शाहीन बाग में जा पहुंचीं और वहां बैठी महिलाओं और युवक-युवतियों में उन किरदारों को अलग-अलग रूप में पाया। वहां से लौटने के बाद उन्होंने कुछ किरदारों को कलमबंद भी किया। नासिरा शर्मा के उस रात शाहीन बाग पहुंचने के फोटो सोशल मीडिया पर भी वायरल हुए थे। नासिरा वही लेखिका हैं जो ईरान में इस्लामिक क्रांति के दौरान वहां जा पहुंची थीं। वहां उस क्रांति के जनक आयतुल्लाह खुमैनी ने किसी महिला पत्रकार और लेखिका को पहला इंटरव्यू दिया था, जिसे उस समय (1982) भारत की नामी साहित्यिक पत्रिका सारिका ने प्रकाशित किया था। नासिरा शर्मा ने जेएनयू से पढ़ाई की है और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में पढ़ाया भी है। यहां पेश है उनका लेख जो एक महिला लेखक की नजर से इस आंदोलन को समझने की कोशिश भी है... मेरी दुनिया मेरे लोग... शाहीनबाग की वह रात मेरे लिए बोलने की नहीं, महसूस

मुस्तजाब की कविता ः सब कुछ धुंधला नजर आ रहा है

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मुस्तजाब की कविताएं हिंदीवाणी पर आप लोग पहले भी पढ़ चुके हैं...पेश है उनकी नवीनतम कविता सब धुंधला नजर आ रहा है .............................. ............ सब धुंधला नजर आ रहा है सच, झूठ, तारीख, तथ्य किसे मानें, रह गया है क्या सत्य सलाखें बन गए हैं मस्तिष्क हमारे अंदर ही घुट घुट कर सड़ रहे हैं लोग बेचारे एक कतार में हम सब अटक गए हैं समझ रहे हैं राह है सही, मगर भटक गए हैं जो कहता है अंध बहुमत उसे मान लेते हैं चाहे झूठ हो, संग चलने की ठान लेते हैं क्या हुआ जो लोग मर रहे हैं आजादी के पीर सलाखों में सड़ रहे हैं कहने पर रोक है, अंधा हो गया कोर्ट है डरपोक सब ठंडी हवा में बैठे हैं कातिल संसद में टिका बैठे हैं सच्चे तो खैर आजादी ही गवां बैठे हैं मगर हमें क्या हम तो धुंधलेपन के मुरीद हैं धरम तक ही रह गई साली सारी भीड़ है और इसी धुंधलेपन का फायदा मसनदखोर उठा रहा है हम अंधे हो रहे हैं वो हमारा देश जला रहा है - मुस्तजाब मुस्तजाब की कुछ कविताओं के लिंक - http://www.hindivani.in/2017/12/blog-post.html http://www.hindivani.in/2019/02/blog-post_16.html

होली के बहाने...एक अधूरी ग़ज़ल

रंग कोई भी डाल दो, गुलाल कोई भी लगा दो ........................................................ दीवारों पर लिखी इबारत मिटाना आसान है, दिलों पर लिखी इबारत मिटाता नादान है... रंग कोई भी डाल दो, गुलाल कोई भी लगा दो, ज़ख़्मों पर फिर मरहम लगाता नहीं शैतान है...y राष्ट्रवाद को बेशक तिरंगे में लपेट दो, क़ातिल को यूँ भुलाना क्या आसान है... रहबर ही जब बन गये हों रहजन जिस मुल्क में, बचे रहने का क्या अब कुछ इमकान है ??.... (मेरी एक अधूरी ग़ज़ल की कुछ लाइनें होली और साहेब के ताज़ा बयान पर...बहरहाल, हर आम व ख़ास को, दूर के, नज़दीक को होली बहुत बहुत मुबारक)

जब आपको मिल जाए फुरसत

जब आपको मिल जाए हिंदू-मुसलमान से फुरसत ...और मिल जाए किसी महिला की हंसी का कोई बेहूदा जवाब तो फर्जी राष्ट्रवाद पर भी कुछ सोचना जरूर और सोचना कि शहादत के जख्म कभी जुमलों से नहीं भरते जब आपको मिल जाए गाय-गोबर से फुरसत ...और मिल जाए पहलू खान की हत्या का कोई नया पहलू तो गरीबों की भुखमरी पर भी कुछ कहना जरूर और कहना कि जीडीपी ग्रोथ से किसी के पेट नहीं भरा करते जब आपको मिल जाए तमाम साजिशों से फुरसत ...और मिल जाए गांधी की हत्या का कोई अफसोसनाक बहाना तो गोडसे की संतानों पर भी कुछ बोलना जरूर और बोलना कि नागपुर के एजेंडे से कभी देश नहीं चला करते जब आपको मिल जाए आवारा पूंजीवाद को बढ़ाने से फुरसत ...और मिल जाए आदिवासियों की जमीन छीनने का भोंडा तर्क तो उन मेहनतकशों को भी कहीं तौलना जरूर और तौलना मजदूरों के फावड़ों को, जो कभी रुका नहीं करते जब आपको मिल जाए इंसाफ को बंधक बनाने से फुरसत ...और मिल जाए कुछ लोगों को घरों में जिंदा जला देने का उत्तर तो उन पुराने नरसंहारों का जिक्र करना जरूर और जिक्र करन

बस फेंकते रहिए....

हमें लंबी फेंकने की आदत है... कल जब हम वहां लंबी लंबी फेंक रहे थे तो कहीं सीमा पर जवान शहीद हो रहे थे... और ड्रैगन ज़ोरदार नगाड़ा बजा रहा था, वह बार बार बजाता है  लेकिन उस नगाड़े की आवाज़ मेरे फेंकने में खो जाती है हम फेंकते हैं इसलिए कि फ़र्ज़ी राष्ट्रवाद में और इज़ाफ़ा हो और सिर्फ़ हमीं बेशर्मी से काट सकें चुनाव में इसकी फसल सच है, लोग नफ़रतों के संदेश तेज़ी से ग्रहण करते हैं यही है मेरी लंबी फेंकने की सफलता का राज भी अब तो छोटे छोटे प्यादे भी ख़ूब अच्छा फेंक लेते हैं आइए हम सब फेंकने को अपना जीवन दर्शन बनाएं   X               X                X                        X जब कभी हो रोज़गार की ज़रूरत तो बस फेंकने लगिए अस्पताल में न मिले दवा तो फेंकने की तावीज़ पहनिए एक छोटे प्यादे ने हवाई जहाज़ में हवाई चप्पल पर फेंका उससे छोटे ने ट्रेनों के फेलेक्सी किराये पर भी तो फेंका  झोले में गर न आ सकें गेहूं चावल तो धूल चाट लो  सब्ज़ी मंडी में महँगा लगे आलू तो धूल फांक लो