अभी बैराग लेकर क्या करेंगे......पौराणिक पृष्ठभूमि पर हिन्दी ग़ज़ल



 पौराणिक पृष्ठभूमि पर ग़ज़ल 


पौराणिक पृष्ठभूमि पर कविता, ग़ज़ल, नज़्म लिखना आसान नहीं होता। और उर्दू पृष्ठभूमि का कोई रचनाकार अगर हिन्दू पौराणिक कहानियों को अपनी ग़ज़ल के साँचे में ढालता है तो ऐसी कविता या ग़ज़ल और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

हिन्दी कविता जगत तमाम खेमेबंदियों में उलझा हुआ है। उसे यह देखने, समेटने की फ़ुरसत ही नहीं है कि कवियों, ग़ज़लकारों की जो नई पीढ़ी आ रही है, उसके लेखन को कैसे तरतीब दी जाए या बढ़ाया जाए। हिन्दी की नामी गिरामी पत्रिकाएँ भी सही भूमिका नहीं निभा पा रही हैं। 

फहमीना अली अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) की शोध छात्रा हैं। उनकी ग़ज़ल और कविताओं का आधार अक्सर हिन्दू पौराणिक कहानियाँ होती हैं। यह ग़ज़ल - अभी बैराग लेकर क्या करेंगे - फहमीना अली की ताज़ा रचना है। हिन्दीवाणी पर इसका प्रकाशन इस मक़सद से किया जा रहा है कि हिन्दी वालों को मुस्लिम पौराणिक कहानियों पर कविता, ग़ज़ल लिखने की प्रेरणा मिलेगी। उर्दू स्कॉलर होने के बावजूद फहमीना अली ने हिन्दू पौराणिक कथाओं को अपने साहित्य का हिस्सा बनाने की जो कोशिश की है, उसे आगे बढ़ाया जाना चाहिए। इस ग़जल में रदीफ-काफिए का खास ख्याल रखा गया है। हिन्दी में लिखी जाने वाली ग़ज़लों में इसका अभाव रहता है लेकिन ग़ज़ल में रदीफ काफिए का अनुशासन उसे विशेष बनाता है।

क्या इसे एक बदलाव का संकेत भी माना जाए। यह पाठक के विवेक पर छोड़ा जा रहा है। 


#ایک_غزل


ترا انوراگ لے کر کیا کریں گے

کسی کا بھاگ لے کر کیا کریں گے

तेरा अनुराग ले कर क्या करेंगे।

किसी का भाग ले कर क्या करेंगे।।


ابھی ہم ہیں تمنّاؤں کے مارے

ابھی بيراگ لے کر کیا کریں گے۔

अभी हम हैं तमन्नाओं के मारे।

अभी बैराग लेकर क्या करेंगे।।


وہ جن کو راج محلوں کی ہے عادت

ودور کا ساگ لے کر کیا کریں گے۔

वो जिनको राजमहलों की है आदत।

विदुर का साग ले कर क्या करेंगे।।


گئے سب رنگ جب سے تم گئے ہو

بھلا اب پھاگ لے کر کیا کریں گے۔

गए सब रंग जब से तुम गए हो।

भला अब फाग ले कर क्या करेंगे।।


ابھی تو رات کا پچھلا پہر ہے

تو بھیرو راگ لے کر کیا کریں گے۔

अभी तो रात का पिछला पहर है।

तो भैरव राग ले कर क्या करेंगे।।


ہمارا بھاگ ہی اپنا نہیں ہی

تمہارا بھاگ لے کر کیا کریں گے۔

हमारा भाग भी अपना नही है।

तुम्हारा भाग ले कर क्या करेंगे।।


ابھی تو ہاتھ میں روٹی نہیں ہے

تو ماکھن کاگ لے کر کیا کریں گے۔

अभी तो हाथ में रोटी नहीं है।

तो माखन काग ले कर क्या करेंगे।।


ترے ناٹک کا ہم حصّہ نہیں ہیں

تو اس میں بھاگ لے کر کیا کریں گے۔

तेरे नाटक का हम हिस्सा नहीं हैं।

तो इसमें भाग लेकर क्या करेंगे।।


#Fahmina_Ali







Comments

Gazala said…
बहुत अच्छी ग़ज़ल,काबिले दाद

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