सिख फिर टारगेट पर

धर्म के नाम पर या धार्मिक पुस्तक के नाम पर किसी की हत्या हमेशा निन्दनीय ही होती है। 


ऐसी हत्याओं को जायज़ ठहराना ठीक उसी तरह है जिस तरह गांधी की हत्या के लिए आज गोडसे और सावरकर को उसके मानस पुत्र जायज़ ठहरा रहे हैं। 





गांधी की हत्या का आधार भी धर्म था। हत्यारे ने इसे स्वीकार भी किया है। हत्यारे के अनुयायी आज भी इस बात को खुलेआम कहते घूम रहे हैं। वे हत्यारे गोडसे की प्रतिमाएँ स्थापित कर रहे हैं।

लिंचिंग में भी हत्याएं भी धर्म के आधार पर हुईं। 

भारत में लिंचिंग के ज़िम्मेदार हत्यारों को नैशनल हीरो तक बनाया गया। तमाम धार्मिक दंगों के आयोजकों को सत्ता के नज़दीक पहुँचाया गया। अदालतों और आयोगों ने ऐसे दागी लोगों को क्लीन चिट तक दे दी।

लेकिन क्लीन चिट मिलने के बावजूद क्या वे उन नज़रों में बेदाग़ साबित हो पाए? 

जब लिंचिंग हो और लोगों के मुँह सिले रहें, तब कैसा लगता है? तब आपका धर्म, आपका फ़्रॉड दागी राष्ट्रवाद और आपकी आकाशवाणी आड़े नहीं आती है। 

धर्म निजी और आस्था का मामला होने के बावजूद कुछ धर्मों को राष्ट्र धर्म के रूप में पेश किया जा रहा है। 

भारत में धर्म संवैधानिक संस्थाओं से ऊपर हो गए हैं। 

संवैधानिक संस्थाएं धर्म के सामने नतमस्तक हो चुकी हैं।

साज़िशों को समझिए।

सिंघु बॉर्डर पर किसान एक साल से बैठे है। बारिश, तूफ़ान भी उन्हें वहाँ से नहीं हटा सके।

अचानक एक युवक का लटकता हुआ शव किसानों के धरनास्थल के पास पाया जाता है। सूत्रों के हवाले से पुलिस फ़ौरन मीडिया में घोषित कर देती है कि गुरू ग्रंथ साहब की बेअदबी करने पर यह हत्या हुई है। एक निहंग को गिरफ़्तार कर लिया जाता है। आरोप साबित होने से पहले वो निहंग आतंकवादी बना दिया जाता हा

अब इसके बाद सिखों और ख़ासतौर पर निहंगों की धार्मिक कट्टरता के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया पर अभियान छिड़ जाता है। खालिस्तान से जोड़ दिया जाता है। ये सब बताने का मतलब यह क़तई नहीं है कि सिंघु बॉर्डर की हत्या घृणित नहीं है।

लेकिन किसी गरीब की लिंचिंग होने पर मुँह सिल लेना और सिखों को टारगेट करना कहाँ का राष्ट्रवाद है? 1984 के दंगों में मात्र कांग्रेसियों का नहीं बल्कि सिखों से नफ़रत करने वाले एक ही धर्म के कुछ लोगों का हाथ था। सिख इस बात को बखूबी जानते हैं। आज वो ही लोग सत्तारूढ़ पार्टी में अपनी पैठ बनाकर सिखों को टारगेट कर रहे हैं।

ज़्यादा दिन नहीं बीते हैं जब किसान आंदोलन को कभी खालिस्तानी, कभी पाकिस्तानी तो कभी कांग्रेसी आंदोलन बताया गया। अब सिंघु बॉर्डर की निन्दनीय घटना की आड़ में सिखों को टारगेट किया जा रहा है। 

सिखों की धार्मिक कट्टरता को ठीक मुसलमानों की धार्मिक कट्टरता के समकक्ष रखकर सिखों को टारगेट किया जा रहा है।

और टारगेट कौन कर रहा है? 

आरएसएस ने सिखों को हिन्दू साबित करने के लिए बहुत मेहनत की। इस काम के लिए उन्होंने “राष्ट्रीय सिख संगत” संगत खड़ी कर दी। लेकिन सिखों ने कभी भी खुद को हिन्दू साबित करने की कोशिश नहीं की। स्पष्ट है कि सिख अपनी धार्मिक पहचान नहीं खोना चाहते। आप बेशक डीएनए तलाशते रहें। 

बहरहाल, सिखों को टारगेट किया जाने से किसान आंदोलन ख़त्म नहीं होगा।

राजनीतिक बंदियों को यूएपीए के फ़र्ज़ी आरोपों में साल दर साल रखने से आज़ाद आवाज़ों को दबाया नहीं जा सकता। 

सिखों को टारगेट करना बंद करो।

मज़हबी कट्टरता का विरोध सेलेक्टिव नहीं होना चाहिए। 



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