बहुत डरावना और उन्मादी है भारत का बहुसंख्यकवाद : यूसुफ किरमानी

 भारत में अभिव्यक्ति की आजादी बहुत जल्द बीते हुए दिनों की बातें हो जाएंगी। भारत में दो चीजों के मायने बदल गए हैं। अभिव्यक्ति की आजादी कट्टरपंथियों की आजादी से तय हो रही है और प्रेस यानी मीडिया की आजादी सरकारी मीडिया की हदों से तय की जा रही है। लेकिन दोनों की आजादी को नियंत्रित करने वाली ताकत एक है, जिस पर हमारा ध्यान जाता ही नहीं है। भारत बहुसंख्यकवाद के दंभ की गिरफ्त में है। सरकारी संरक्षण में पला-बढ़ा बहुसंख्यकवाद भारत को उस दौर में ले जा रहा है, जहां से बहुत जल्द वापसी की उम्मीद क्षीण है। मान लीजिए कल को सत्ता परिवर्तन या व्यवस्था परिवर्तन हो जाए तो भी बहुसंख्यकवाद ने जो फर्जी गौरव हासिल कर लिया है, उसका मिट पाना जरा मुश्किल है। क्योंकि सत्ता परिवर्तन के बाद जो राजनीतिक दल सत्ता संभालेगा, वह भी कमोबेश उसी बहुसंख्यकवाद को संरक्षित करने वाली पार्टी का प्रतिरूप है।

 


 

 

देश में 'तांडव' के नाम पर बहुसंख्यकवाद कृत्रिम तांडव कर रहा है और उसने मध्य प्रदेश में एक कॉमेडियन को बेवजह जेल में बंद करा दिया है। तांडव के नाम पर तांडव करने वाले और कॉमेडियन मुनव्वर फारुकी को जेल में बंद कराने वाली वो बहुसंख्यक जमात है जो अभी कल तक फ्रांस की पत्रिका चार्ली हेब्डो पर हमले को लेकर इस्लाम और मुसलमानों को कट्टर साबित करने में जुटी थी और उस समय यही बहुसंख्यक जमात अभिव्यक्ति की दुहाई दे रही थी। यहां आशय यह बताना नहीं है कि चार्ली हेब्डो पर हमला सही था। यहां बताने का आशय यही है कि जब चार्ली हेब्डो को अभिव्यक्ति की आजादी की छूट मिलनी ही चाहिए तो तांडव वेब सीरिज बनाने वाले को फिल्म या सीरिज में अपनी बात कहने का अधिकार मिलना ही चाहिए। मुनव्वर फारुकी को भी अपनी बात कहने का उतना ही अधिकार है जितना चार्ली हेब्डो को बार-बार किसी का कॉर्टून बनाकर बार-बार मजाक उड़ाने का अधिकार है।

 

 

तांडव एक वेब सीरिज है, जिसमें किसी देवी-देवता का मजाक उड़ाने की बात कही गई है। हालांकि जिस सीन में किसी भगवान का संदर्भ या संकेत आता है, अगर उसके आगे-पीछे के हिस्से को देखा जाए तो वेब सीरिज बनाने वाले की नीयत पर शक करने की कोई वजह नहीं है। तांडव की पटकथा बहुत लचर है, लेकिन बहुसंख्यकों के तांडव ने इस वेब सीरिज को हिट करा दिया। इसके निर्माता – निर्देशक ने आपत्तिजनक दृश्यों और संवादों को हटा लिया है लेकिन तांडव करने वाले तत्व शांत नहीं हो रहे हैं।

 




 

कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी को पुलिस की क्लीन चिट मिल चुकी है लेकिन बंदा अभी भी जेल में है। अदालत उसे छोड़ नहीं पा रही या ये कहिए कि अदालत इंसाफ के इस उच्च स्तर पर पहुंच चुकी है कि उसे मुनव्वर फारूकी की गैरजरूरी गिरफ्तारी एक सामान्य घटना लगती है। अभिव्यक्ति की आजादी को कुचला जाना भारत में रोजमर्रा की जिन्दगी में दाल चावल खाने जैसा हो गया है। अंग्रेजी वाले इसे न्यू नॉर्मल (New Normal) कहते हैं। देवता और पैगम्बर ऐसे हो गए हैं कि मानो किसी तांडव या चार्ली हेब्डो में उनका मजाक उड़ाने पर उनका अस्तित्व मिट जाएगा। मुनव्वर फारुकी अगर किसी नेता या राजनीतिक दल का मजाक उड़ाएंगे तो उनका खात्मा हो जाएगा। अगर किसी कॉमेडियन के मजाक उड़ाने से मोदी के अस्तित्व को खतरा है तो उल्टा उस कॉमेडियन को पुरस्कृत किया जाना चाहिए। कम से कम एक कॉमेडियन की ऐसी हैसियत तो है कि वो सत्ता प्रतिष्ठान को चुनौती दे सकता है। यही मुनव्वर फारुकी अगर अमेरिका या इंग्लैंड में होते तो अब तक दुनिया के पावरफुल लोगों में शुमार हो जाते कि ऐसा कॉमेडियन भी है जिससे सरकार हिलती है। लेकिन अंधे बहुसंख्यकवाद ने मुनव्वर फारूकी को जेल में डाल रखा है।

 

 

यह सवाल मैं कट्टरपंथियों पर छोड़ता हूं कि किसी धार्मिक या राजनीतिक आस्था पर चोट लगे तो वह विरोध असहमत होने तक होना चाहिए या फिर हिंसा और जेल में डालने जैसी कार्रवाई होनी चाहिए?

 

 

भारत का बहुसंख्यकवाद बहुत उन्मादी और डरावना है। उसके इरादे नेक नहीं है। वह धरने पर बैठे किसानों को भी देशद्रोही मानता है। वह शाहीनबाग में बैठी महिलाओं को आतंकवादी मानता है। वह भिन्न-भिन्न मत रखने वाले शारजील इमाम, उमर खालिद, सुधा भारद्वाज, वरवरा राव, गौतम नवलखा, आनंद तेलतुम्बड़े को सिर्फ इसलिए जेल में रखना चाहता है कि इनके विचारों से उसे खतरा महसूस होता है।

 

 

प्रेस की आजादी और अभिव्यक्ति की आजादी एक दूसरे से जुड़े हैं लेकिन प्रेस या मीडिया की आजादी को भी जब बहुसंख्यकवाद को संरक्षण देने वाली सरकार नियंत्रित करने लगे तो इस पर अलग से बात करने की जरूरत तो पड़ती है।

 

 

ताजा उदाहरण से इस बात को समझिए।

 

 

इंडिया टुडे चैनल ने एक सर्वे करके बताया कि देश में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को सबसे अच्छा और बढ़िया मुख्यमंत्री बताया गया है। लेकिन एबीपी चैनल ने बताया कि उड़ीसा के सीएम नवीन पटनायक देश के सबसे अच्छे और बढ़िया मुख्यमंत्री हैं। एबीपी के सर्वे में योगी आदित्यनाथ का नाम टॉप 10 मुख्यमंत्रियों की सूची में नहीं है। यह कैसे संभव है कि एक देश है और लोग अलग-अलग सर्वे में अलग-अलग सीएम को सबसे बढ़िया करार दे दें। लेकिन यह संभव है क्योंकि इन्हें कोई एक शख्स ही नियंत्रित कर रहा है। चैनल अच्छा किसान नेता या किसानों के आंदोलन को सर्वे नहीं करते, वे तांडव पर और गुंडों की छवि रखने वाले नेताओं पर सर्वे करते हैं। ऐसे नेताओं पर सर्वे करते हैं जो सत्ता संभालते ही अपने खिलाफ दर्ज मुकदमो को खुद ही वापस ले लेते हैं। दरअसल, भारतीय मीडिया भी बहुसंख्यकवाद के कब्जे में है और वह भी उन्हीं की बातों को पल्लवित पुष्पित कर रहा है।



Comments

Anonymous said…
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