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Showing posts from May, 2020

हमारे बाद अंधेरा नहीं, उजाला होगा...

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- ज़ुलेखा जबीन

आजका दौर भारतीय नारीवाद के गुज़रे स्वर्णिम इतिहास पे चिंतन-मनन किए जाने का है... यक़ीनन ये वक़्त ठहर कर ये सवाल पूछने का भी है कि भारत के नारीवादी आंदोलन का वर्ग चरित्र हक़ीक़त में क्या और कैसा रहा है....!

हालांकि इन बेहद ज़रूरी सवालों को कई तरह के "प्रतिप्रश्नों" के ज़रिए "उड़ा" दिए जाने की भरसक कोशिशें की जाएंगी लेकिन फ़िर भी असहज कर दिए जाने वाले सवाल उठाना जम्हूरियत की असली ख़ूबसूरती तो है ही, लोकतंत्र में जी रहे तमाम आम नागरिकों के नागरिक होने का इम्तिहान भी है।... पिछले कुछ दिनों से जामिया यूनिवर्सिटी की स्कालर और ग़ैर संवैधानिक #CAA, #NRC #NPR  पर एक नौजवान नागरिक #सफ़ूरा जरगर की गिरफ़्तारी, उस पर राजद्रोह से लेकर हत्या करने, हथियार रखने, दंगे भड़काने जैसी गतिविधियों सहित 18 धाराएं लगाई गई हैं।  इसके साथ ही जेल में की गई मेडिकल जांच में उसके प्रेग्नेंट होने की ख़बर सामने आने के बाद भारत के बहुसंख्यक समाज के लुंपन एलिमेंट्स की तरफ़ से सोशल मीडिया में जो शाब्दिक बवाल मचाया गया वो तो अपेक्षित था। जो अनापेक्षित रहा वो इनकी औरतों का …

एक माँ की क़ब्र पर ....

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यह एक माँ की क़ब्र है...
मेरी सगी माँ नहीं लेकिन ऐसी माँ जो किसी की भी माँ हो सकती है।...दरअसल, ये एक दिहाड़ी पर काम करने वाले बेटे की माँ थी।
इस मदर्स डे पर इनकी कहानी बताना ज़रूरी है।
इनका नाम रहती बेगम था, 26 अप्रैल 2018 में इंतक़ाल हुआ था।
1990 में इनकी दुनिया बदल गई।
इनके मज़दूर बेटे मोहम्मद रमज़ान शेख़ का श्रीनगर (कश्मीर) से ख़ाकी वर्दी पहने कुछ लोगों ने अपहरण कर लिया।
रहती बेगम ने हर कोना छान मारा, तलाशने की हर कोशिश की। 
वह हर ज़ाहिर जगह और घाटी में बदनाम गुमनाम सेंटरों तक गईं जहाँ युवक बंद हैं। जहाँ से उनके कराहने की आवाज़ फ़िज़ाओं में गूँजतीं हैं।
बादामी बाग़ कैंट इलाक़े से लेकर कार्गो सेंटर, पापा 2 के अलावा जहाँ- जहां ऐसे सेंटर बने हुए हैं, वो पहुँचीं।




देखते देखते बेटे की तलाश में रहती बेगम ने 28 साल गुज़ार दिए। 
2018 में इंतक़ाल के आख़िरी लम्हों तक उनकी आँखें दरवाज़े की तरफ रहीं जैसे बेटा अभी चलकर आ जाएगा।...
नजीब और रोहित वेमुला की मां के आंसू आज भी नहीं सूखे हैं। कश्मीर ही नहीं देश में ऐसी न जाने कितनी रहती बेगम होंगी जो अपने मज़दूर बेटों का इंतज़ार करते करते चल बसी होंगी। लेकिन...

वे वहां गए ही क्यों थे

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जितनी मुंह उतनी बातें वे वहां सोए ही क्यों थे
क्या वे सामूहिक आत्महत्या करने गए थे वे वहां गए ही क्यों थे
क्या वे वहां रेलगाड़ियां ही रोकने गए थे आखिर उन मजदूरो का इरादा क्या था
इसमें सरकार का क्या आखिर वे उसी शहर में रुक क्यों नहीं गए
शहर दर शहर 24 मार्च से ही लौट रहे हैं वे लोग सबसे पहले दिल्ली-यूपी सीमा पर दिखी थी भीड़
तब भी हुआ था कुछ बसों का इंतजाम अब भी हुआ है कुछ बसों का इंतजाम
लेकिन वे तो 8 मई तक भी चले ही जा रहे हैं क्यों नहीं खत्म हो रही उनकी अनवरत यात्रा
जहां वो हैं वहां वो आम ट्रेन भी नहीं है जहां वो नहीं है वहां विशेष ट्रेन खड़ी है
शोक संदेश आ गया है, व्यवस्था को कह दिया है वीडियो कॉन्फ्रेंस हो गई है, जांच को बोल दिया है
तानाशाह के चमचे कान में फुसफुसाते हैं रेल लाइन पर पड़ी रोटियां न दिखाएं प्लीज
वे वहां सोए ही क्यों वाला नैरेटिव बेहतर है वे वहां गए ही क्यों तो उससे बेहतर हेडिंग है
प्राइम टाइम जोरदार है, विपक्ष से सवाल लगातार है घटना विपक्षी दलों के इलाके में हुई, वही जिम्मेदार है