कोरोनाई पत्रकार और जाहिल मुसलमान


तबलीगी जमात की आड़ में मुसलमानों को विलेन बनाने की खबरों में अब धीरे-धीरे कमी आ रही है। ...लेकिन आप जानना नहीं चाहते कि अचानक यह कमी कैसे आ गई। दरअसल, #अयोध्या में हिंदू श्रद्धालुओं का मंदिरों में बड़ी तादाद में पहुंचना और उस वीडियो का वायरल होना। एक और वीडियो वायरल है जिसमें #भाजपा सांसद मनोज तिवारी अपने चमचों की भीड़ के साथ मास्क बांटते घूम रहे हैं। वीडियो तो और भी हैं लेकिन अयोध्या पर आए वीडियो से मुख्यधारा का #मीडिया डर गया है। इसके अलावा मीडिया का वो चेहरा भी बेनकाब हुआ, जिसमें उसने एक कैदी के थूकने की घटना का वीडियो तबलीगी जमात का बताकर प्रचारित कर दिया था। इसके अलावा एक दूसरे मौलाना सज्जाद नोमानी का फोटो मौलाना साद बनाकर जारी कर दिया था।...लेकिन मजाल है कि मीडिया के जिन भक्तों ने यह काम किया है, उन्होंने माफी मांगी हो।

वाकई पत्रकार जिसे कहते हैं, वो अब कमजर्फ जमात बनते जा रहे हैं। वे खुद एक #कोरोना में तब्दील हो गए हैं। #तबलीगीजमात ने जो जाहिलपना दिखाया, उसमें उसका पक्ष नहीं लेते हुए, बात कमजर्फ पत्रकार जमात और कमजर्फ मीडिया पर करना जरूरी है।


क्योंकि सीजफायर कंपनी मुसलमान नहीं है
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#नोएडा की सीजफायर कंपनी में अभी तक 80 कर्मचारियों को कोरोना पॉजिटिव हो चुका है। इन कर्मचारियों का दायरा #गाजियाबाद, #नोएडा, #फरीदाबाद और #गुड़गांव तक फैला है। जिन 80 कर्मचारियों से बाकी लोगों में कोरोना का विस्तार हुआ है, उस पर कोई मीडिया बात नहीं कर रहा है। अगर एक कर्मचारी से जुड़े चार लोगों का परिवार माना जाए तो अंदाजा लगाइए कि सिर्फ #सीजफायर_कंपनी के कर्मचारियों के जरिए कितने लोगों तक कोरोना फैला होगा। सीजफायर कंपनी का कोई कर्मचारी किसी तबलीगी जमात में नहीं गया है। सीजफायर के किसी कर्मचारी के संपर्क में तबलीगी जमात का कोई शख्स संपर्क में नहीं आया है।...लेकिन सीजफायर कंपनी का मामला मीडिया के लिए बड़ा मामला नहीं है। क्योंकि ये कर्मचारी किसी ऐसे समुदाय से नहीं हैं जो विशेष प्रकार का कपड़ा पहनते हैं या उनकी पहचान कपड़ों से होती हो। वे बस सीजफायर के कर्मचारी हैं, उनका कोई धर्म नहीं है। ...टीवी चैनलों के लिए सीजफायर की घटना में कोई रस नहीं है। कोई टीआरपी नहीं है।




क्योंकि गंगाराम अस्पताल मुसलमान नहीं है
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#गंगाराम_अस्पताल_दिल्ली के 108 लोगों को आइसोलेशन में भेजा गया है। इनमें डॉक्टर, नर्स और पैरामेडिकल स्टाफ शामिल है। करीब 85 लोगों को घर में आइसोलेट किया गया है और 23 को अस्पताल में ही आइसोलेट किया गया है। ये सारे लोग दो कोरोना पीड़ित मरीजों के संपर्क में आए थे। ....क्या यह सूचना मीडिया के लिए बड़ी खबर नहीं है। क्या इसे टीवी चैनलों की हेडलाइन नहीं बनना चाहिए। लेकिन यहां भी किसी जमात या किसी समुदाय विशेष का कनेक्शन नहीं मिला है तो कोई हेडलाइन नहीं बनती है।

लेकिन जब अक्ल पर ताला पड़ा हो, आंखें किसी धर्म विशेष के क्रिया कलापों को उछालने और देश को विवेकहीनता की तरफ ले जाने की साजिश की जा रही हो तो ऐसे मौके पर मीडिया जनसरोकार का ठेका क्यों लेगा...

इसी तरह मुरैना में तेरहवीं का भोज खाकर जो लोग कोरोना में चले गए, उसके लिए मीडिया किन मुसलमानों को लपेटेगा। इन बेचारों को तो भोज में #कोरमा भी नहीं मिला था, जिससे मुसलमानों को घेरा जा सके।

क्योंकि हर मौलाना मुसलमान होता है
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#निजामुद्दीन_में_तबलीगी_जमात_का_कार्यक्रम आयोजित करने में जैसे ही उससे जुड़े #मौलाना_साद का नाम सामने आया और एफआईआर दर्ज हो गई तो सवाल उठा कि मौलाना साद की फोटो कैसे मिले। मुख्यधारा का तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया कैसे काम करता है, यह घटना उसकी मिसाल है। जितने भी चैनल थे, जितनी भी न्यूज वेबसाइटें थीं, जितने भी अखबार थे, उन्होंने #मौलाना_सज्जाद_नोमानी की फोटो #इंटरनेट से उठाई और उन्हें मौलाना साद बताते हुए चेप दिया। यह हरकत अगर किसी एक मीडिया वाले ने की होती तो गनीमत थी लेकिन सारे चैनल, #अखबार और वेबसाइटें इस हमाम में नंगे हो गए। सिर्फ उर्दू अखबारों ने मौलाना साद का सही फोटो छापा था।

अगले दिन मौलाना सज्जाद ने भारत में अपने लाखों अनुयायियों को वीडियो संदेश जारी किया कि किस तरह देश के मीडिया ने उनकी फोटो मौलाना साद की जगह छापकर उनकी छवि को खराब करने की कोशिश की है। उन्होंने इसकी कड़ी निंदा करते हुए कहा कि उनके सारे अऩुयायी ऐसे टीवी चैनलों, राष्ट्रीय समाचारपत्रों और न्यूज वेबसाइटों का बहिष्कार करें।
यह वीडियो सामने आने के बावजूद किसी भी मीडिया हाउस ने मौलाना सज्जाद नोमानी से माफी नहीं मांगी।

मजेदार बात यह है कि मौलाना सज्जाद #प्रधानमंत्री_मोदी समर्थक मौलाना माने जाते हैं। क्योंकि #मोदी ने जैसे ही देश में 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा की थी, मौलाना सज्जाद ने इसका स्वागत करते हुए कहा था कि अगर भारत की जनता को कोरोना से बचाना है तो हमें #लॉकडाउन का समर्थन करना चाहिए। लेकिन मौलाना को अब मोदी समर्थक #गोदी_मीडिया ने जो झटका दिया है, मौलाना उसे जिंदगीभर नहीं भूल पाएंगे।
इन्हीं मौलाना सज्जाद नोमानी के खिलाफ काफी दिन पहले मोदी के पिट्ठू पत्रकार रजत शर्मा के टीवी चैनल इंडिया टीवी ने बाकायदा एक ऐसी घटना को लेकर मौलाना नोमानी को फसादी मौलाना बता दिया था, जिस घटना से उनका दूर दूर तक कोई संबंध नहीं था।


अब इसमें शर्मा जी का क्या दोष
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यह एक घटना हो तो बताई जाए। घटनाएं भरी पड़ी हैं और हमारे जेहन को बदलने में मीडिया जो घिनौना खेल खेल रहा है, आने वाले दिनों में उसकी भरपाई मुश्किल होगी। नीचे एक ही शख्स के ट्वीट का मैं दो स्क्रीन शॉट दे रहा हूं। अमरीश शर्मा जी ने 2019 में मोदी के हिंदुत्व को रिजेक्ट कर दिया था। तब वो कह रहे थे कि भाजपा को प्रेम करने के लिए मुसलमान से नफरत करना जरूरी है। इसलिए वो ऐसी पार्टी और उसके नेताओं से प्रेम नहीं कर सकते। तब वो अपने मुस्लिम दोस्तों के साथ दीवाली मनाने की बात कह रहे थे। उन्हीं अमरेश शर्मा जी ने 4 अप्रैल 2020 को ट्वीट किया कि #हिंदुस्तान को जब तक #हिंदू_राष्ट्र घोषित नहीं किया जाएगा, तब तक यह #धर्म_युद्ध चलता रहेगा और #मुस्लिम इस देश को इसी तरह तोड़ता-मरोड़ता रहेगा।...अमरेश शर्मा जी में एक साल के अंदर आए इस बदलाव के लिए मैं इसमें उनका दोष नहीं मानता। वह उस मीडिया से प्रभावित हैं जो रोजाना समुदाय विशेष, जाति विशेष के लोगों के खिलाफ नफरत फैलाता है। अमरेश शर्मा जी अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे भारतीय मीडिया के जहर पर आसानी से यकीन कर रहे हैं।


डॉक्टर के. के. अग्रवाल का कारनामा
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प्रधानमंत्री मोदी ने कल देश के नाम संबोधन में इस रविवार को रात 9 बजे बिजली बंद करके दीया या मोमबत्ती या फिर मोबाइल की लाइट जलाने का आह्वान किया। इसका अपने-अपने ढंग से लोगों ने स्वागत किया, समर्थन किया, मजाक उड़ाया और बुनियादी सवाल उठाए। लेकिन इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (#आईएमए) के पूर्व अध्यक्ष डॉ. के. के. अग्रवाल कुछ और आगे चले गए। शाम को उनका एक वीडियो जारी किया गया, जिसमें साइंस की पढ़ाई करके डॉक्टर बना शख्स के.के. अग्रवाल यह कहता नजर आया कि रविवार की रात दीया या मोमबत्ती जलाना क्यों जरूरी है। उन्होंने साइंस से इसका उदाहरण नहीं दिया, उन्होंने धर्मग्रंथों से और न जाने कहां-कहां से उदाहरण देकर बताया कि दीया जलाना क्यों जरूरी है। बल्कि उन्होंने कहा कि 9 दिये जलाएं। ...जो लोग नहीं जानते, उन्हें बताना जरूरी है कि डॉ. के.के. अग्रवाल को भाजपा सरकार ने पिछले साल पद्मश्री से नवाजा था।...ये वो डॉ. केके हैं जिन्होंने दिल्ली में सबसे पहले हेल्थ मेले की शुरुआत की। हेल्थ मेला इतना सफल हुआ कि पूरे देश में तमाम राज्यों में डॉ. के.के. अग्रवाल की तर्ज पर हेल्थ मेला लगाया जाने लगा। यह अलग बात है कि बाद में उसे दवा कंपनियां स्पान्सर करने लगीं और पूरा सेहत मेला व्यावसायिक हो गया, वो अलग कहानी है। यहां मैं डॉक्टर साहब की खूबियों की बात कर रहा हूं। किसी भी पत्रकार को सेहत संबंधी खबरों में कोई भी जानकारी चाहिए होती है तो डॉ. के.के. अग्रवाल एक फोन कॉल पर उपलब्ध हैं। जो उन्हें एक सरल इंसान बनाती हैं लेकिन एक वैज्ञानिक सोच रखने वाला इतना बड़ा डॉक्टर जिस फूहड़ तरीके से मोदी जी के दीये जलाने का बचाव करते नजर आया, वह सचमुच भारतीय मेडिकल #साइंस के दुर्दिन की तरफ इशारा है। लेकिन मजाल किसी मीडिया ने पलटकर डॉक्टर साहब से सवाल किया हो कि आप तो साइंस की पढ़ाई करके काबिल डॉक्टर बने हैं, फिर अचानक यह धार्मिक नजरिया दीया जलाने में कहां से घुस आया।...

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कितनी घटनाएं आपको बताऊं जो रोजाना घट रही हैं और भारतीय मीडिया उनको जहर की चाशनी में डुबोकर पेश करता है। या उसका हुलिया इतना बिगाड़ देता है कि वो कुछ आपकी समझ में न आए। जो लोग समझदार हैं, वे फौरन भांप लेते हैं कि इसके पीछे इस #पत्रकार की मंशा क्या है...


मुसलमान सुधरने को तैयार नहीं
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जब मीडिया आपके खिलाफ हो...जब हुकूमत का रवैया एकतरफा हो...जब विपक्ष की मौत हो चुकी हो...तब ऐसे में मुसलमानों से समझदारी की उम्मीद की जाती है। लेकिन अभी भी उनका एक तबका ऐसा है जो कहीं न कहीं जाहिलपना दिखा देता है। अरे भाई, छतों पर #नमाज पढ़ना या दो परिवार आपस में मिलकर जमात बनाकर नमाज पढ़ना कहां की अक्लमंदी है। आपसे जब बार-बार एक दूसरे से दूर रहने की अपील की जा रही है तो आप जबरन अपनी #मुल्लागीरी क्यों दिखा रहे हैं। आप छतों पर नमाज पढ़कर क्या साबित कर देंगे।...क्या नमाज पढ़ना आपका स्टेटस सिंबल है। आपकी #इबादत दिखावे का सबब बनती जा रही है।



 #अल्लाह ने इबादत के मामले में खुद ताकीद की हुई है कि उसे किसी तरह का दिखावा या आडंबर पसंद नहीं है। खामोशी से दिल से इबादत कीजिए। उसके लिए फिलहाल किसी मजमे या छत की जरूरत नहीं है। अगर आप इन चीजों को नहीं जानते तो अपने आसपास के पढ़े लिखे लोगों से ही मालूमात हासिल कर लें। निजामुद्दीन के मरकज में जब तबलीगी जमात बुलाई गई थी तो उस समय तक कोरोना तमाम देशों में फैल गया था। आपको फौरन उसे रद्द कर देना चाहिए था या आगे की तारीख में बढ़ा देना चाहिए था। अल्लाह मियां आपका इंतजार कर लेते। आप खुद नमाज में कहते हैं कि वो बहुत ही रहीम और करीम है।...दयालु है। वो इस बात पर नाराज नहीं होता कि आपकी जमात फौरन क्यों नहीं लगी।....आप लोग अपने ही उन फिरकों से कुछ सीख सकते हैं जो ऐसे तमाम मामलों में बड़ी समझदारी और सलाहियत से पेश आते हैं। वे किसी भी तूफान का मुकाबला करते हुए आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन आप लोग जमात को लेकर अटके रहते हैं। बरहाल, बातें बहुत सी हैं।...वो किसी और मौके पर...

अंत में आप लोगों से निवेदन...
क्यों आप लोगों को लगता है कि मैं अपनी बातें आप लोगों तक वीडियो के जरिए भी पहुंचाऊं...अगर आप इस संबंध में कुछ बताएंगे तो मुझे इस बारे में समझने में मदद मिलेगी...क्या वीडियो संदेश वाकई ज्यादा अच्छी तरह से संदेश पहुंचाने में सक्षम हैं। एक बड़े लेख के मुकाबले क्या वीडियो संदेश ज्यादा सही माध्यम है...जरूर बताएं...







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