लघु कथा - चाचा की दुकान

चाचा की दुकान
-मुस्तजाब किरमानी

वो चाचा की दुकान को जलते देख खुश हुआ था। 
चाचा और उसका धर्म अलग-अलग जो थे। उसने
 आग खुद नहीं लगाई थी। हाँ, दंगाइयों को राह 
जरूर दिखाई थी। मगर, आज जनता कर्फ़्यू के बीच
 जब उसे एक जरूरत का सामान याद आया तो उसने
 खिड़की से काली राख की चादर ओढ़े उस दुकान को 
हसरत से देखा। ...चाचा तो उसे उधार सामान भी दे दिया
करते थे।
-मुस्तजाब किरमानी

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#शाहीनबाग अपडेट

यह लघु कथा अप्रत्यक्ष रूप से शाहीनबाग से भी जुड़ी है। इसे पढ़ने से पहले यह अपडेट लीजिए कि #करोना की आड़ में #दिल्ली_में_शाहीनबाग को दिल्ली पुलिस ने आज पूरी तरह ख़ाली करा लिया है। सारा टेंट और सामान हटा लिया गया। इस तरह 101 वें दिन इस #महिला_आंदोलन को बलपूर्वक खत्म कर दिया गया। यह कहानी शाहीनबाग से अप्रत्यक्ष रूप से इसलिए जुड़ी हुई, क्योंकि #सीएए और #एनआरसी विरोधी प्रदर्शन के दौरान ही दिल्ली के चांदबाग, #मुस्तफाबाद, #जाफराबाद, #गोकुलपुरी, #खजुरीखास, #शिवविहार वग़ैरह में भयानक #सांप्रदायिक_दंगे हुए थे। मुसलमान- हिदू दोनों समुदायों के लोग मारे गए थे। करोड़ों की संपत्ति जला दी गई थी। देश में #लखनऊ, #इलाहाबाद, #मुंबई समेत कई जगह शाहीनबाग शुरू हुए लेकिन पुलिस ने सभी जगह से ख़ाली करा लिया।



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