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Showing posts from February, 2020

कहानी ...इंसानी पाबंदियां

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-इस कहानी को कई पत्रिकाओं में छपवाने की कोशिश की गई। लेकिन किसी भी पत्रिका ने कश्मीर पर आधारित इस कहानी को छापने में दिलचस्पी नहीं ली। इसलिए यह कहानी हिंदीवाणी ब्ल़़ॉग पर पेश है...

सर्दियां बीत रही हैं। लेकिन  इस बार यह आम सर्दी का मौसम नहीं है। ज़हरीली आब-ओ-हवा फ़िज़ा में चारों तरफ़ है। नफ़रतों का तूफ़ान पूरी तरह सब कुछ रौंदने पर आमादा है। कुदरत के तूफान को कैटरीना, हरिकेन, बुलबुल जैसे नाम नसीब हैं लेकिन इंसानी नफरत के तूफान को कोई नाम देने को तैयार नहीं है। नफरत का तूफान जो कभी अपने हरे, नीले, पीले, भगवा, बसंती जैसे रंगों से पहचाना जाता था, अब वह ‘इंसाफ’ के साथ मिलकर इंद्रधनुष बना रहा है। कहना मुश्किल है कि नफरतों के तूफान का इंसाफ के इंद्रधनुष से क्या रिश्ता है लेकिन फिलहाल दोनों एक दूसरे के पूरक बने हुए हैं।

हर साल नवंबर का पहला हफ़्ता बीतते बीतते हमारे घर की डोर बेल ज़ोर से बजती थी और दरवाज़ा खोलने पर गेट पर कपड़ों का गठ्ठर लादे और हाथ में काग़ज़ की स्लिप लिए शफ़ीक़ #कश्मीरी नज़र आता था। लेकिन पूरा नवंबर खत्म हो गया। दिसंबर आकर चला गया लेकिन शफीक का दूर-दूर तक अता-पत…

महात्मा गांधी के संघीकरण की शुरूआत

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आरएसएस का गांधी प्रेम बढ़ता ही जा रहा है। आरएसएस के मौजूदा प्रमुख या सरसंघचालक मोहन भागवत 17 फ़रवरी को दिल्ली में गांधी स्मृति में जा पहुंचे। संघ के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब कोई सरसंघचालक गांधी स्मृति में पहुंचा है। गांधी स्मृति वह जगह है जहां 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या की गई। गांधी स्मृति गांधीवाद का प्रतीक है। वहां किसी सरसंघचालक का पहुंचना छोटी घटना नहीं है। लेकिन क्या है यह सब...अचानक इतना गांधी प्रेम...गांधी को इतना आत्मसात करने की ललक कांग्रेस जैसी पार्टी ने भी नहीं दिखाई, जो खुद को गांधी की विरासत का कस्टोडियन मानती है।
 #संघ की गांधी के प्रति यह ललक दरअसल 2 अक्टूबर 2019 से प्रत्यक्ष दिखाई पड़ रही है, जब इन्हीं मोहन भागवत ने ट्वीट कर कहा था कि गांधी को स्मरण करने की बजाय उनका अनुसरण करना चाहिए। मोहन भागवत की उस समय की प्रतिक्रिया पर किसी का ध्यान नहीं गया और न ही इसे किसी ने गंभीरता से लिया था। लेकिन जब 17 फरवरी को उन्होंने दोबारा से #गांधी का अनुसरण करने की बात कही और #गांधी_स्मृति जाने की पहल की तो लगा मामला अब गंभीर है। संघ की इस चालाक पहल पर चर्चा होनी …

60 दिन का आंदोलनबाग - शाहीनबाग

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शाहीनबाग आंदोलन 60 दिन पुराना हो गया है। जहरीले चुनाव से उबरी दिल्ली में किसी आंदोलन का दो महीने जिंदा रहना और फिलहाल पीछे न हटने के संकल्प ने इसे आंदोलनबाग बना दिया है। ऐसा आंदोलनबाग जिसे तौहीनबाग बताने की कोशिश की गई, लेकिन शाहीनबाग की हिजाबी महिलाओं ने तमाम शहरों में कई सौ शाहीनबाग खड़े कर दिए हैं। बिना किसी मार्केटिंग के सहारे चल रहे महिलाओं के इस आंदोलन को कभी धार्मिक तो कभी आयडेंटिटी पॉलिटिक्स (पहचनवाने की राजनीति) बताकर खारिज करने की कोशिश की गई। लेकिन आजाद भारत में मात्र किसी कानून के विरोध में हिजाबी महिलाओं का आंदोलन इतना लंबा कभी नहीं चला। 
#शाहीनबाग_में_महिलाओं_का_आंदोलन 15 दिसंबर 2019 से शुरु हुआ था। आंदोलन की शुरुआत शाहीनबाग के पास #जामिया_मिल्लिया_इस्लामिया में समान नागरिकता कानून (#सीएए) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (#एनआरसी) के खिलाफ छात्र-छात्राओं के आंदोलन पर पुलिस लाठी चार्ज के खिलाफ हुई थी। शाहीनबाग की महिलाओं के नक्श-ए-कदम पर #बिहार में गया, उत्तर प्रदेश में #लखनऊ, #इलाहाबाद और #कानपुर तो पश्चिम बंगाल में कोलकाता में इसी तर्ज पर महिलाएं इसी मुद्दे पर धरने पर बैठ…

अहमदाबाद की दीवारें

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हथियार बेचने आ रहे हिरोशिमा के क़ातिलों की संतान के स्वागत में वो कौन लाखों लोग अहमदाबाद की सड़कों पर होंगे ?
दीवार के इस पार या उस पार वाले नरोदा पाटिया वाले या गुलबर्गा वाले।
डिटेंशन कैंप सरीखी बस्तियों वाले या खास तरह के कपड़े पहनने वाले।।
वो जो भी होंगे पर किसान तो नहीं होंगे तो क्या वो फिर जियो के कामगार होंगे।
नरसंहारक होंगे या दुष्प्रचारक होंगे तड़ीपार होंगे या फिर चिड़ीमार होंगे।।
हो सकता है वो फ़क़ीरी सरदार हों दस लाख के सूट वाले असरदार हों।
लुटते पिटते दलितों के रिश्तेदार हों या वो नागपुर से आए चौकीदार हों।।
आओ ऐसी बाँटने वाली दीवारें गिरा दें हर कोने में शाहीनबाग आबाद करा दें।
सब मक्कार तानाशाहों को झुका दें नागरिकता के मायने इन्हें भी बता दें।। -यूसुफ़ किरमानी


Ahamadaabaad kee Deevaaren

hathiyaar bechane aa rahe hiroshima ke qaatilon kee santaan ke svaagat mein vo kaun laakhon log ahamadaabaad kee sadakon par honge ?

 deevaar ke is paar ya us paar vaale
naroda paatiya vaale ya gulabarga vaale.

 ditenshan kaimp sareekhee bastiyon vaale
ya khaas tarah ke kapade pahanane vaal…

शाहीनबाग : डॉक्टर - मरीज संवाद

दिल्ली एनसीआर का एक शहर...

मरीज़: डॉक्टर साहब, आपके नर्सिंग होम में भी कोरोना वायरस की दवा मिलने का पोस्टर लगा देखा अभी बाहर।

डॉक्टर: हाँ, वो एक डॉक्टर हमारे यहाँ बैठती हैं। हमने उनको चैंबर किराये पर दे रखा है। लेकिन पता नहीं क्यों कोरोना के मरीज़ आ ही नहीं रहे हैं।

मरीज: अरे, डॉक्टर साहब ऐसा न कहें। शुभ बोलिए। न आएँ तो अच्छा है।

डॉक्टर: आएँगे कहाँ से...सारे कोरोना वायरस तो शाहीनबाग में बैठे हैं।...शाहीनबाग कोरोना वायरस है।

मरीज़: डॉक्टर साहब, कोरोना वायरस तो मुझे नेता लगते हैं। यह पूरा देश नेताओं की शक्ल में कोरोना वायरस बनकर हमें खत्म कर रहा है। हमें बाँट रहा है। हमें तोड़ रहा है। हम टैक्स पेयर्स को जज़्बाती बनाकर नेता नाम का वायरस हमें ही मार रहा है।

डॉक्टर: आप नहीं समझोगे। शाहीनबाग में बैठे कोरोना वायरस ज्यादा ख़तरनाक हैं। ...लाओ, पर्चा दो। क्या नाम है आपका...?

एक अन्य मरीज़ का प्रवेश...

दूसरा मरीज़: डॉक्टर साहब, मेरे किनारे वाले दाँत में बहुत दर्द हो रहा है। निकलवाने में कितना पैसा लगेगा?

डॉक्टर: बिना देखे नहीं बता सकता। दाँत किस तरह का है। देखकर ही पैसे बताऊँगा। चलो बैठो, देखता…