Friday, January 3, 2020

कौन हैं क़ासिम सुलेमानी...एक किसान के बेटे का सैन्य सफ़र


क़ासिम सुलेमानी अमेरिका और इस्राइल के मोस्ट वॉन्टेड की सूची में शामिल थे। ईरान इस जांबाज की शहादत को कभी भुला नहीं सकेगा। ईरान की मुख्य आर्मी ईरानी रिवोल्यू़नरी गार्ड्स (आईआरजीसी) का चीफ़ होने के बावजूद वह ईरान के सबसे प्रभावशाली शख़्स थे। ईरान में हाल ही में कराए गए एक सर्वे में वह वहाँ के राष्ट्रपति से भी आगे थे। उन्हें ईरान के अगले राष्ट्रपति के रूप में लाने का फैसला भी हो गया था। ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामनेई  की रणनीतिक बैठकों में लिए गए फ़ैसले के  ज़्यादातर आदेश उन्हीं के ज़रिए जारी होते थे।

सुलेमानी पूर्वी ईरान के किरमान राज्य के कायमात-ए-मालिक गाँव में पैदा हुए थे। उन्हें 13 साल की उम्र में अपने किसान पिता के एग्रीकल्चर लोन को तत्कालीन शाह रजा पहलवी की सरकार को चुकाने के लिए मज़दूरी करनी पड़ी थी। 1979 में जब अमेरिका समर्थित शाह की हुकूमत का पतन हुआ और इस्लामिक क्रांति हुई तो वह इस क्रांति के जनक आयतुल्लाह खुमैनी के आंदोलन में शामिल हो गए। इसके बाद उन्होंने किरमान के युवकों को जमाकर एक लड़ाकू यूनिट बनाई और यह यूनिट खुमैनी के लिए काम करने लगी। फिर जब आईआरजीसी स्थापित हुई तो किरमान यूनिट का इसमें विलय कर दिया गया और यह कमांड सुलेमानी को सौंप दी गई। नेतृत्व क्षमता की बदौलत सर्वोच्च कमांडर पद तक पहुँचे। उन्होंने सद्दाम हुसैन के शासनकाल में ईरान-इराक़ युद्ध में ईरानी सेना को बड़ी जीत दिलाई थी।



62 साल के इस लड़ाकू कमांडर के बारे में दुनिया सिर्फ यह जानती है कि उन्होंने सीरिया, इराक़ के आसपास अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठन आईएसआईएस को खत्म कर दिया। इस आतंकी संगठन को खाड़ी देशों में दाइश के भी नाम से जाना जाता है। सीरिया, यमन, इराक़ में उन्होनें ऐसे गोरिल्ला संगठन खड़े कर दिए थे, जिन्होंने इस इलाक़े में अमेरिका, इस्राइल और सऊदी अरब की रणनीतियों को नाकाम कर दिया। उनकी ही रणनीति के हिसाब से एक तरफ़ लेबनान में हिज़्बुल्लाह इस्राइल से मोर्चा ले रहा है तो दूसरी तरफ़ यमन में हूती ज़ैदी ग्रुप ने यमन पर लगभग नियंत्रण कर रखा है। उन पर फलस्तीन में सक्रिय कथित आतंकी संगठन हमास की मदद का भी आरोप है। सबसे रोचक स्थिति सीरिया में है जहाँ गृहयुद्बध में फँसे देश के हुक्शमरान ब़शर अल असद की सरकार को ईरान का समर्थन प्राप्त है। हिज़्बुल्लाह को अमेरिका और इस्राइल आतंकी संगठन कहते हैं लेकिन सुलेमानी ने इस संगठन की मदद कर इसे इन लोगों के लिए सिरदर्द बना दिया। इसका अंदाज़ा इराक़ में हुई इस घटना से लगाया जा सकता है।



अभी जब बग़दाद में पांच दिन पहले अमेरिकी दूतावास पर जब वहाँ हज़ारों की भीड़ ने हश अल-शब्बी के नेतृत्व में दूतावास पर क़ब्ज़ा कर लिया और वहाँ इराक़ के साथ साथ हिज़्बुल्लाह का झंडा फहरा दिया। तेल उत्पादक देश में हुई इस घटना को मॉनीटर कर रही एजेंसियों का मानना है कि अमेरिकी दूतावास पर किए गए क़ब्ज़े ने ईरान में 1979 में हुई इस्लामिक क्रांति के दौरान हुई घटना की याद दिला दी। वह घटनाक्रम अहमदी नेजाद के नेतृत्व में तेहरान यूनिवर्सिटी के छात्र छात्राओं ने किया था तो बग़दाद में अमेरिकी दूतावास पर क़ब्ज़े के पीछे सुलेमानी का हाथ माना गया। सुलेमानी बग़दाद में थे, इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं थी।



अमेरिका को यह सूचना लगातार मिल रही थी कि इराक़ी सरकार पर ईरान का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। इराक़ में हुए चुनावों में भी ईरान का असर देखा गया, क्योंकि ज़्यादातर वही लोग चुने गए जो ईरान समर्थक थे। लेकिन बग़दाद की घटना ने अमेरिका को विचलित कर दिया। उसे लगा कि जब सुलेमानी की मौजूदगी की पक्की सूचना सीआईए के पास है तो क्यों न हमले की पहल की जाए। आमतौर पर सुलेमानी का मूवमेंट सार्वजनिक नहीं होता है लेकिन ज़रूर इराक़ी सरकार के किसी उच्च पदस्थ शख़्स की सूचना सीआईए तक पहुँची और अमेरिका ने एकदम से अटैक कर उनको एक और क़ीमती कमांडर के साथ मार दिया। वह इराक़ी वॉलंटियर्स फ़ोर्स हश अल-शब्बी के कमांडर अबू मेहंदी थे। सुलेमानी और अबू मेहंदी अलग अलग गाड़ियों थे। दोनों ही बग़दाद एयरपोर्ट जा रहे थे। सुलेमानी लेबनान से इराक़ आए हुए थे।

अभी हाल ही में उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को सीधे चेतावनी दी थी कि अगर अमेरिका ने ईरान पर युद्ध थोपा तो शुरूआत अमेरिका करेगा लेकिन उसे खत्म ईरान करेगा। उन्होंने अमेरिका पर आर्थिक आतंकवाद का आरोप लगाते हुए कहा था कि वह तेल के नाम पर इस क्षेत्र में दहशत फैलाना बंद करे। अब जब वह शहीद किए जा चुके हैं तो शुक्रवार को ट्विटर पर तीसरा विश्व युद्ध शुरू होने की बात टॉप ट्रेंड में रहा। अमेरिकी नागरिकों ने अपने ट्वीट्स में ईरान से युद्ध या बदले की कार्रवाई होने पर तमाम तरह की चिंताओं को ज़ाहिर किया गया। ईरान बिना डरे और देर किए बदला लेने का ऐलान कर दिया है।

सुलेमानी की शहादत पर अमेरिकी प्रोपेगेंडा और उसके पिछलग्गू देशों का प्रचार एक तरफ है और इस लेख में दिए गए फोटो उन सारे फर्जी प्रचारों पर भारी हैं। सुलेमानी की लोकप्रियता बता रही है कि कोई अमेरिकी दुष्प्रचार उनके व्यक्तित्व का मुकाबला नहीं कर सकता।

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