Monday, January 27, 2020

मैं भी शारजील इमाम को जानता हूं...

यह मौक़ा है सच, झूठ, मक्कारी को पहचानने का...

अगर आप आस्तिक हैं और आपके अपने अपने भगवान या अल्लाह या गुरू हैं तो आपको इसे समझने में मुश्किल नहीं होनी चाहिए...अगर आप नास्तिक या जस के तस वादी हैं तो इतनी अक़्ल होगी ही कि सही और ग़लत में किसका पलड़ा भारी है...

शाहीन बाग़ से लेकर दुनिया के कोने कोने में कल गणतंत्र दिवस मनाया गया। केरल में 621 किलोमीटर और कलकत्ता में 11 किलोमीटर की मानव श्रृंखला बनाई गई। अमेरिका में कल सारे भारतीय और पाकिस्तानी तिरंगा झंडा लेकर सड़कों पर निकल आए। अमेरिकी इतिहास में विदेशियों का इतना बड़ा जमावड़ा पहली बार देखा गया। कल आधी रात में दिल्ली की निजामुद्दीन बस्ती और मुंबई के मदनपुरा इलाके में लोग अचानक तिरंगा लेकर धरने पर बैठ गए। निजामुद्दीन में पुलिस को उन्हें उठाने की सारी कोशिशें नाकाम हो गईं। क्या मीडिया ने  इन सारी घटनाओं के बारे में आपको बताया...

मीडिया पर कहीं भी विस्तार से ये ख़बरें आपको दिखाई दीं? नहीं, कहीं नहीं। आप बता सकते हैं कि अगर मीडिया इसको उसी रूप में दिखाता या छापता जैसी वो हुईं तो क्या होता? आपकी धारणा या राय किसी समुदाय विशेष के बारे में बदलती। आप सोचने पर मजबूर होते कि जैसा मीडिया इनके बारे में प्रचारित करता है वैसे ये लोग नहीं हैं। क्या आपको किसी चैनल ने यह दिखाया कि कल शाहीन बाग़ में देश की एकता अखंडता को समर्पित कुछ झांकियाँ भी थीं जो राजपथ और लाल क़िले से निकलने वाली झाँकियों से कम नहीं थीं लेकिन मीडिया के लिए सिर्फ सरकारी झांकियां महत्वपूर्ण थीं, अवाम की बनाई झांकियों से उन्होंने किनारा कर लिया था।...अगर वो शाहीन बाग की झांकियां दिखाते...केरल में खास कपड़े पहनने वाले लोगों को संविधान की प्रस्तावना पढ़ते दिखाते तो आपकी धारणा और राय उन खास कपड़े वालों के लिए बदलती...लेकिन मीडिया या उसे चलाने वाला तंत्र ऐसा नहीं होने देना चाहता। 

इस छोटी सी दलील का नतीजा यह निकलकर आ रहा है कि हम जिन विषयों या चीजों या मुद्दों को लेकर अपनी कोई धारणा या राय बनाते हैं वो मीडिया और उसको संचालित कर रहे तंत्र की देन होते हैं। यानी हमारी राय या धारणा कोई और ही नियंत्रित कर रहा है। चाहे वह भारत का मीडिया हो या पाकिस्तान का या फिर अमेरिका का...सभी जगह आपको-हमको मीडिया के जरिए नियंत्रित करने का खेल चल रहा है। विदेशों में बस मीडिया इसलिए बेहतर है कि वे किसी भी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के आगे रेंगते नहीं हैं लेकिन वे पूंजीपति लोगों की नीतियों को ही संचालित कर रहे होते हैं।

...तो शाहीनबाग की झांकियों, केरल और कलकत्ता के अनोखे गणतंत्र दिवस को न दिखाने वाला मीडिया दरअसल कल क्या कर रहा था...वो शारजील इमाम की पड़ताल में जुटा था, जिसे केंद्र सरकार और उसकी हिमायती कुछ राज्य सरकारों की पुलिस ने शाहीन बाग में महिला आंदोलन शुरू कराने का मास्टरमाइंड घोषित कर दिया है। लेकिन जरा ठहरिए...शारजील इमाम को सबसे पहले सरकार समर्थक टीवी चैनल रिपब्लिक ने शाहीन बाग का मास्टरमाइंड घोषित किया था। रिपब्लिक टीवी किसका है, यह चैनल बीजेपी के सांसद वी. चंद्रशेखर का है। उनके और भी कई चैनल है, जिनमें एशियानेट प्रमुख है। कई मीडिया आउटलेट में चंद्रशेखर की हिस्सेदारी ठीक रिलायंस के मुकेश अंबानी की तरह ही है। 

शारजील इमाम को मैं भी जानता हूं। ...कैसे...जब शाहीन बाग आंदोलन शुरू हुआ और मैं वहां पहुंचा तो वहां कई पढ़े लिखे लड़के-लड़कियां मौजूद थे। जिनमें शारजील इमाम भी था। मैंने जब बताया कि मैं मीडिया से हूं तो सभी लोग एक-एक करके आंदोलन के बारे में बताने लगे। कुछ देर बाद शारजील इमाम का भाषण शाहीन बाग के मंच से शुरू हुआ। उसके भाषण का सार यह था कि हमें देश के तमाम हिस्सों में शाहीन बाग जैसा आंदोलन शुरू करना होगा...एक आदमी अपने साथ कम से कम दस लोगों को जोड़े तो आंदोलन बड़ा होता जाएगा। शाहीन बाग शुरुआत है, हमें यहां से अगर उठाया गया तो हम दिल्ली में कहीं और भी जाकर बैठ सकते हैं। हम इंडिया गेट पर बैठ सकते हैं, हम मथुरा रोड पर बैठ सकते हैं, हम कनॉट प्लेस में बैठ सकते हैं। मुद्दा ये है कि हमें अपनी आवाज सरकार को सुनानी है।... हमें असम की तरह आंदोलन शुरू करना होगा...उसने कहा असम का चक्काजाम शेष भारत से उसको अलग कर देगा क्योंकि सारा आना-जाना रुक जाएगा...। शारजील इमाम ने जिस दिन ये बातें कहीं थीं उस दिन असम में एनआरसी के खिलाफ भयानक हिंसा हुई थी और देश में कहीं भी शाहीन बाग जैसे आंदोलन शुरू नहीं हुए थे। 

एक्टिविस्ट हिमांशु कुमार ने आज फेसबुक पर स्वाति मिश्रा की एक पोस्ट शेयर की है। जिसे पढ़ने की जरूरत है। उसमें शारजील इमाम के बारे में काफी कुछ बताया और समझाया गया है। इन दोनों नामों का जिक्र मैंने इसलिए किया कि ये लोग गैर मुस्लिम हैं और शारजील इमाम को इनके देखने का नजरिया वैसा है जैसा एक आम भारतीय का होना चाहिए। लेकिन मैं देख रहा हूं कि तमाम मुस्लिम बुद्धिजीवी, अपने आप को सेकुलर कहने वाले कुछ पत्रकार और फर्जी सेकुलरवादी अचानक शारजील इमाम को खलनायक बनाने पर तुल गए हैं। ऐसे जैसे वह कोई आतंकवादी हो। क्योंकि वे वही बातें कह रहे हैं जो पुलिस ने शारजील इमाम के खिलाफ राजद्रोह का केस दर्ज करते हुए कहीं हैं। वे लोग वही बातें कह रहे हैं जो केंद्र सरकार से लेकर कई राज्यों की भाजपा सरकारें शारजील इमाम के बारे में कह रही हैं। ...सबसे पहले शारजील इमाम के बारे में धारणा बनाने की शुरुआत रिपब्लिक टीवी ने की...और अब उस धारा में पूरा मीडिया बह गया है। किसी ने शारजील इमाम का पूरा भाषण सुनने की जहमत नहीं उठाई। लेकिन भाजपा का एक बेवकूफ प्रवक्ता शारजील के वीडियो को एडिट (संपादित) कर दिखाए तो उसे सही माना जाता है। यही कन्हैया कुमार, उमर ख़ालिद, अनिरबान और शहला राशिद के समय में भी हुआ था। कैसे जी न्यूज़ ने वीडियो में छेड़छाड़ करके इन्हें देशद्रोही और टुकड़े टुकड़े गैंग कहा था। लेकिन आज अगर कोई भी कन्हैया या उमर ख़ालिद समेत चारों को देशद्रोही कहता है तो उसे खुद भी शर्म आती है। ऐसा ही कुछ शारजील या एएमयू या जामिया के स्टूडेंट्स को देशद्रोही कहने पर भी होगा।

एक केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने सोमवार 27 जनवरी को दिल्ली के चुनाव प्रचार में और दिल्ली में भाजपा टिकट पर चुनाव लड़ रहे कपिल मिश्रा ने अभी कुछ दिन पहले एक जुलूस में नारे लगाए -मुसलमान गद्दारों को जूते मारो सालों को...इस नारे को किस श्रेणी में रखा जाए...क्या दिल्ली पुलिस ने कोई केस अनुराग ठाकुर या कपिल मिश्रा के खिलाफ दर्ज किया...कपिल मिश्रा ने जब ये नारे लगाए थे तब तक दिल्ली विधानसभा के चुनाव घोषित नहीं हुए थे, लेकिन चुनाव घोषित होने के बाद भाजपा ने कपिल मिश्रा को टिकट तक दे दिया...इसे क्या माना जाए...भाजपा के दिल्ली अध्यक्ष और सांसद मनोज तिवारी ने कल चुनाव प्रचार के दौरान दिल्ली में कहा कि शाहीन बाग में हिंदुओं के खिलाफ नारे लग रहे हैं...लेकिन मनोज तिवारी ऐसे नारों का कोई वीडियो सार्वजनिक नहीं कर सके।...जरा सोचिए मनोज तिवारी ने ऐसा क्यों कहा होगा...क्योंकि शाहीन बाग में हवन भी हुआ, बाइबल भी पढ़ी गई और सिखों ने गुरु का लंगर भी चलाया...इसी से भाजपा को चिढ़ है। ये लोग इन चीजों के खिलाफ हैं। यह चीज इनके डीएनए में है। दो राष्ट्र का सिद्धांत सबसे पहले इनके संस्थापक यानी हिंदू महासभा (गोलवलकर-सावरकर-गोडसे) लेकर आई, जिसे जिन्ना ने लपक लिया। इन लोगों ने अंग्रेजों के समय में बंगाल में जिन्ना की पार्टी के साथ मिलकर सरकार चलाई। जिसके मुखिया श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे।

इस देश के फर्जी सेकुलरवादी जब तक शारजील इमाम और किसी अनुराग ठाकुर, किसी कपिल मिश्रा या मनोज तिवारी में भेद करना नहीं सीखेंगे तब तक गलत धारणाओं को बनाने में योगदान देते रहेंगे। शारजील इमाम जितनी काबिलियत रखने वाला इनमें से एक भी नहीं है। मैं इस बात की चुनौती देता हूं कि शारजील इमाम देशद्रोही नहीं है, वो हमारे आप जैसा देशभक्त है। लेकिन अनुराग ठाकुर, कपिल मिश्रा या मनोज तिवारी जैसे लोग औऱ इनकी पार्टी सचमुच के देशद्रोही लोग हैं जो भारत को बांटने के काम में जुटे हैं। क्या 30-35 करोड़ की आबादी को अलग-थलग करके कोई देश तरक्की का सपना देख सकता है। क्या इतनी बड़ी आबादी को हाशिए पर रखकर आप देश को संचालित कर सकते हैं। क्या इतनी बड़ी आबादी को डिटेंशन सेंटरों में भेजने की तैयारी कर आप संविधान की रक्षा कर पाएंगे...ये सवाल हैं जो आज देश के तमाम हिस्सों में लोग सड़कों पर निकल कर पूछ रहे हैं। ...बेशक आप पुलिस या सेना के जरिए इन लोगों को कुचलने की ताकत रखते हैं, दलाल मीडिया आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है...लेकिन सड़कों पर उमड़े सैलाब की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। इस सैलाब का मास्टरमाइंड कोई शारजील इमाम नहीं है।....















 




























Sunday, January 26, 2020

शाहीनबाग का गणतंत्र...

गणतंत्र क्या है...

इसे बेहतर ढंग से दिल्ली के शाहीन बाग ने आज समझाया...

मजमा...कोई गणतंत्र नहीं है जो कभी राजपथ पर तो कभी लाल किले की प्राचीर के सामने लगाया जाता है...

मजमा...तमाम सुरक्षा घेरे में, तमाम सुरक्षाकर्मियों को सादे कपड़ों में बैठाकर नहीं लगाया जा सकता...

मजमा...जो शाहीन बाग में स्वतः स्फूर्त है...नेचुरल है...

मजमा...जो एक तानाशाह खास कपड़े वालों में देखता है...

मजमा ...जो कोई इवेंट मैनेजमेंट कंपनी नहीं लगा सकती...

मजमा...जो तानाशाह का न्यू यॉर्क में पैसे देकर कराया हाउडी इवेंट नहीं है...

मजमा...जो किसी सरकारी फिल्मी गीतकार का बयान नहीं है जो उसे किसी तानाशाह में फकीरी के रूप में दिखता है...

मजमा...जो किसी सरकारी फिल्मी हीरो का जुमला नहीं है जो तानाशाह के आम खाने के ढंग के रूप में देखता है...

मजमा...जो उस लंपट तड़ीपार सरगना का ख्वाब है जिसे वह अपने भक्तों में तलाशता है...
-यूसुफ़ किरमानी

#AntiUrbanNaziDay
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#अर्बननाज़ी
#संविधानबचाओदिवस

Wednesday, January 22, 2020

शाहीनबाग में कहानी के किरदारों की तलाश

कोई लेखक-लेखिका जब किसी जन आंदोलन में अपनी कहानियों और उपन्यासों के किरदारों को तलाशने पहुंच जाए तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि शाहीन बाग का आंदोलन कहां से कहां तक पहुंच गया है।

हिंदी की मशहूर उपन्यासकार औऱ कहानी लेखिका नासिरा शर्मा ऐसी ही एक रात शाहीन बाग में जा पहुंचीं और वहां बैठी महिलाओं और युवक-युवतियों में उन किरदारों को अलग-अलग रूप में पाया। वहां से लौटने के बाद उन्होंने कुछ किरदारों को कलमबंद भी किया। नासिरा शर्मा के उस रात शाहीन बाग पहुंचने के फोटो सोशल मीडिया पर भी वायरल हुए थे।

नासिरा वही लेखिका हैं जो ईरान में इस्लामिक क्रांति के दौरान वहां जा पहुंची थीं। वहां उस क्रांति के जनक आयतुल्लाह खुमैनी ने किसी महिला पत्रकार और लेखिका को पहला इंटरव्यू दिया था, जिसे उस समय (1982) भारत की नामी साहित्यिक पत्रिका सारिका ने प्रकाशित किया था। नासिरा शर्मा ने जेएनयू से पढ़ाई की है और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में पढ़ाया भी है। यहां पेश है उनका लेख जो एक महिला लेखक की नजर से इस आंदोलन को समझने की कोशिश भी है...

मेरी दुनिया मेरे लोग...

शाहीनबाग की वह रात मेरे लिए बोलने की नहीं, महसूस करने की रात साबित हुई। जामिया विश्वविद्यालय की बुनियाद, स्वतंत्रता संग्राम की तारीख़ और अपने अध्यापन काल के वह चंद साल जैसे अपने को दोहराने लगे थे । वह सारी बातें और यादें मेरे ज़हन की बंद सीपियों से खुल कर अचानक मोतियों की तरह जगमगानें लगीं थीं।

जो आँखों के सामने था वह वर्तमान था। उससे तालमेल बिठाती मैं काफ़ी देर तक खोई खोई सी रही। ज़बान से शब्द ग़ायब हो चुके थे और दिल और दिमाग़ जज़्बात के भवंर में फंस चुके थे।

अचानक मेरे अहसास की दुनिया मुझ से मुख़ातिब हुई, नहीं पहचाना ? यह अजनबी नहीं तुम्हारी कहानियों के किरदार हैं । तुम्हारे अपने जिनके लिए तुमने आज का सपना बुना था। देखो वह चुप्पी टूट गई।

मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट दौड़ गई। मैंने इत्मिनान की सांस ली जैसे यहां कोई अब मेरे लिए अजनबी न रहा। औरतों के बैठने के घेरे के पीछे खड़ी मर्दों की बाउंड्री वाल पर नज़र पड़ती है तो मुझे हर चेहरे में ‘सरहद के इस पार’ का रेहान नज़र आता है जिसे देश का बंटवारा लानत लगता था।

‘पत्थर गली ‘की फ़रीदा, ‘ताबूत ‘की हुमैरा, ’ठीकरे की मँगनी‘ की महरूख़ सचमुच वहां बूढ़ी होकर असमां खा़तून, बिलक़ीस बेगम और सरवरी के रूप में बैठी थीं। नजंरें घुमाईं तो पीछे की क़तार में ‘चार बहने शीश महल ‘की अधेड़ अवस्था में बैठी दिखीं जिन्होंने चूड़ी के झाबों में छुपी बन्दूक़ों को हाथो में उठा लिया था और यहां उसी तेवर और आत्मविश्वास से संविधान पर अड़ी बैठी हैं।

अपनों के पहलू से लगे कमसिन लड़के-लड़कियां जो चुपचाप बैठे ठीक अपने दादा, नाना के गुज़रे बचपन की तरह तारीख़ की दूसरी करवट के गवाह बने स्टेज से होती बातों को ग़ौर से सुन रहे थे। मुझे सबीना के चालीस चोर की कहानी की उस मासूम बच्ची की याद दिला गए जो मरदुम शुमारी के लगाए गए नम्बरों को सिर्फ़ इस लिए मिटाती है कि कहीं यह चालीस चोरों ने न लगाएं हों। वह तय करती है कि मुझे मरजीना बन इन चोरों से सबको बचाना है।

जवान माएं गोद में दूध पीते बच्चों को लिए बैठी थीं। कुछ दोशीज़ाएं सामने से गुज़रीं जिनमें खुदा की वापसी की फ़रज़ाना भी खड़ी नज़र आई जो उन से कह रही थी “मैं तो जाहिल मुल्ला की दाढ़ी ग़ुस्से में आकर कुतरना चाहती थी मगर तुम लोगों ने तो कमाल कर डाला उन्हें सिरे से ही नकार दिया? “

“करना पड़ा आपा वरना इन सब के चक्कर में तो हम एक सदी और पीछे चले जाते। “

“अपने क़ानून को दूसरों के मुंह से सुनने से अच्छा है ख़ुद से पढ़ना, समझना और अपने अधिकार के लिए लड़ना’

“वही तो किया आपा हमारी मां व नानी, दादी ने बिना किसी नेता के हम अब ख़ुद अपने रहबर बन बैठे हैं।” वह हंसी ।

मुझे याद आया मैंने कहीं लिखा था ‘इन्सान दो बार पैदा होता है। पहली बार अपनी मां की कोख से और दूसरी बार हालात की मार से।’

आज महसूस हुआ जब मौत और ज़िन्दगी सामने आन खड़ी हो तो इन्सान जीने की तमन्ना करता है।

 वह रात बीत गई।

सुबह नमूदार हुई तो समा ही बदल चुका था।

शाहीन परिन्दे को ऊंची उड़ान भरने से कौन रोक सका जो अब कोई रोकता? शाहीन मोहल्लों, शहरों के ऊपर से उड़ान भरता रहा। लोगो के दिलों में उड़ान की ललक भरता हुआ। यह जानते हुए भी कि हम ख़तरे की तरफ़ बढ़ रहे मगर सर पर सवार सौदा कहता है कि क्या फ़र्क़ पड़ता है कि हम ख़तरे की तरफ़ बढ़ रहे हैं या ख़तरा हमारी तरफ़ बढ़ रहा है।

साझी भारतीय सभ्यता में सांस लेने वाले मेरे सारे किरदार एक बार फिर सामने थे चाहे वह ‘आमोख़ता ‘के वीरजी हों या फिर ‘इनसानी नस्ल ‘की सविता हो या फिर ‘चांद तारे की शतरंज ‘का पतंग बनाने वाला या फिर ‘उसका लड़का ‘का मूंगफली बेचने वाला या फिर अफ़सर शाही की ‘शालमली ‘हो या फिर ‘अक्षयवट ‘का मुरली हो या फिर ‘कुइयांजान ‘का डा. कमाल हो या फिर ‘ज़ीरो रोड ‘का बेकारी झेलता एमए पास सिद्धार्थ हो या फिर ‘पारिजात’ के प्रो. प्रह्लाद दत्त या फिर ‘ज़िन्दा मुहावरा का ’इमामउददीन ’जिसने देश के बंटवारे के बाद नए बने देश में जाने की जगह अपने वतन में रहना पसन्द किया। वह सब के सब जमा हो रहे हैं आज़ादी की चाह में हम क़दम , हम आवाज़ हो उठे हैं।

यही तो हमारा भारतीय समाज का ताना - बाना है। जो कोशिशों के बाद भी नहीं टूट पाता है।

 क्योंकि हम जान चुके हैं कि हम एक दूसरे के बिना न रह सकते हैं न जी सकते हैं। यही हमारा सच है। यही हमारी पहचान है। यही हमारा ईमान है । यही हमारा संविधान है।
-नासिरा शर्मा  Nasera Sharma

फोटो - नासिरा शर्मा शाहीन बाग में आंदोलनकारी 'दादी' के साथ

Tuesday, January 7, 2020

गुंडों की पहचान


मुँह पर साफ़ा बाँधे गुंडों की पहचान कैसे होगी
वे सिर्फ जेएनयू में नहीं हैं
वे सिर्फ एएमयू में नहीं हैं
वे सिर्फ जामिया में नहीं हैं
वे कहाँ नहीं हैं
वे अब वहां भी है, जहां कोई नहीं है
वे तो बिजनौर,मेरठ से लेकर मंगलौर तक में है
वे चैनलों में हैं
वे अखबारों में हैं
वे मंत्रालयों में हैं
वे एनजीओ में हैं
वे कारखानों में हैं, वे रक्षा ठिकानों तक में हैं
वे फिल्मवालों में हैं, गोया हर गड़बड़झाले में हैं
वे नाजी राष्ट्रवाद के हर निवाले और प्याले में हैं

तो क्या कपड़ों से करोगे इनकी पहचान
इनके सिरों पर गोल टोपी भी नहीं
इनके चेहरे पर दाढ़ी तक नहीं
इनकी आंखों में सूरमा तक नहीं
इन्होंने ऊंचा पायजामा भी नहीं पहना
लड़कियों के चेहरे पर हिजाब भी नहीं
फिर कैसे होगी इनकी पहचान

सुना है आतंकी राइफल लेकर चलते हैं
पर इनके हाथों में सिर्फ कुल्हाड़ी है
कुछ के हाथों में लोहे के रॉड भी हैं
कुछ के जबान पर उत्तेजक नारे हैं
क्या कुल्हाड़ी से कोई विचार मरता है
जेएनयू एक विचार है
एएमयू एक विचार है
जामिया एक विचार है
शाहीन बाग एक विचार है
विचार कुल्हाड़ी से नहीं कटते
विचार लोहे की रॉड से नहीं टूटते
-यूसुफ किरमानी, 7 जनवरी 2020



Friday, January 3, 2020

कौन हैं क़ासिम सुलेमानी...एक किसान के बेटे का सैन्य सफ़र


क़ासिम सुलेमानी अमेरिका और इस्राइल के मोस्ट वॉन्टेड की सूची में शामिल थे। ईरान इस जांबाज की शहादत को कभी भुला नहीं सकेगा। ईरान की मुख्य आर्मी ईरानी रिवोल्यू़नरी गार्ड्स (आईआरजीसी) का चीफ़ होने के बावजूद वह ईरान के सबसे प्रभावशाली शख़्स थे। ईरान में हाल ही में कराए गए एक सर्वे में वह वहाँ के राष्ट्रपति से भी आगे थे। उन्हें ईरान के अगले राष्ट्रपति के रूप में लाने का फैसला भी हो गया था। ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामनेई  की रणनीतिक बैठकों में लिए गए फ़ैसले के  ज़्यादातर आदेश उन्हीं के ज़रिए जारी होते थे।

सुलेमानी पूर्वी ईरान के किरमान राज्य के कायमात-ए-मालिक गाँव में पैदा हुए थे। उन्हें 13 साल की उम्र में अपने किसान पिता के एग्रीकल्चर लोन को तत्कालीन शाह रजा पहलवी की सरकार को चुकाने के लिए मज़दूरी करनी पड़ी थी। 1979 में जब अमेरिका समर्थित शाह की हुकूमत का पतन हुआ और इस्लामिक क्रांति हुई तो वह इस क्रांति के जनक आयतुल्लाह खुमैनी के आंदोलन में शामिल हो गए। इसके बाद उन्होंने किरमान के युवकों को जमाकर एक लड़ाकू यूनिट बनाई और यह यूनिट खुमैनी के लिए काम करने लगी। फिर जब आईआरजीसी स्थापित हुई तो किरमान यूनिट का इसमें विलय कर दिया गया और यह कमांड सुलेमानी को सौंप दी गई। नेतृत्व क्षमता की बदौलत सर्वोच्च कमांडर पद तक पहुँचे। उन्होंने सद्दाम हुसैन के शासनकाल में ईरान-इराक़ युद्ध में ईरानी सेना को बड़ी जीत दिलाई थी।



62 साल के इस लड़ाकू कमांडर के बारे में दुनिया सिर्फ यह जानती है कि उन्होंने सीरिया, इराक़ के आसपास अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठन आईएसआईएस को खत्म कर दिया। इस आतंकी संगठन को खाड़ी देशों में दाइश के भी नाम से जाना जाता है। सीरिया, यमन, इराक़ में उन्होनें ऐसे गोरिल्ला संगठन खड़े कर दिए थे, जिन्होंने इस इलाक़े में अमेरिका, इस्राइल और सऊदी अरब की रणनीतियों को नाकाम कर दिया। उनकी ही रणनीति के हिसाब से एक तरफ़ लेबनान में हिज़्बुल्लाह इस्राइल से मोर्चा ले रहा है तो दूसरी तरफ़ यमन में हूती ज़ैदी ग्रुप ने यमन पर लगभग नियंत्रण कर रखा है। उन पर फलस्तीन में सक्रिय कथित आतंकी संगठन हमास की मदद का भी आरोप है। सबसे रोचक स्थिति सीरिया में है जहाँ गृहयुद्बध में फँसे देश के हुक्शमरान ब़शर अल असद की सरकार को ईरान का समर्थन प्राप्त है। हिज़्बुल्लाह को अमेरिका और इस्राइल आतंकी संगठन कहते हैं लेकिन सुलेमानी ने इस संगठन की मदद कर इसे इन लोगों के लिए सिरदर्द बना दिया। इसका अंदाज़ा इराक़ में हुई इस घटना से लगाया जा सकता है।



अभी जब बग़दाद में पांच दिन पहले अमेरिकी दूतावास पर जब वहाँ हज़ारों की भीड़ ने हश अल-शब्बी के नेतृत्व में दूतावास पर क़ब्ज़ा कर लिया और वहाँ इराक़ के साथ साथ हिज़्बुल्लाह का झंडा फहरा दिया। तेल उत्पादक देश में हुई इस घटना को मॉनीटर कर रही एजेंसियों का मानना है कि अमेरिकी दूतावास पर किए गए क़ब्ज़े ने ईरान में 1979 में हुई इस्लामिक क्रांति के दौरान हुई घटना की याद दिला दी। वह घटनाक्रम अहमदी नेजाद के नेतृत्व में तेहरान यूनिवर्सिटी के छात्र छात्राओं ने किया था तो बग़दाद में अमेरिकी दूतावास पर क़ब्ज़े के पीछे सुलेमानी का हाथ माना गया। सुलेमानी बग़दाद में थे, इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं थी।



अमेरिका को यह सूचना लगातार मिल रही थी कि इराक़ी सरकार पर ईरान का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। इराक़ में हुए चुनावों में भी ईरान का असर देखा गया, क्योंकि ज़्यादातर वही लोग चुने गए जो ईरान समर्थक थे। लेकिन बग़दाद की घटना ने अमेरिका को विचलित कर दिया। उसे लगा कि जब सुलेमानी की मौजूदगी की पक्की सूचना सीआईए के पास है तो क्यों न हमले की पहल की जाए। आमतौर पर सुलेमानी का मूवमेंट सार्वजनिक नहीं होता है लेकिन ज़रूर इराक़ी सरकार के किसी उच्च पदस्थ शख़्स की सूचना सीआईए तक पहुँची और अमेरिका ने एकदम से अटैक कर उनको एक और क़ीमती कमांडर के साथ मार दिया। वह इराक़ी वॉलंटियर्स फ़ोर्स हश अल-शब्बी के कमांडर अबू मेहंदी थे। सुलेमानी और अबू मेहंदी अलग अलग गाड़ियों थे। दोनों ही बग़दाद एयरपोर्ट जा रहे थे। सुलेमानी लेबनान से इराक़ आए हुए थे।

अभी हाल ही में उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को सीधे चेतावनी दी थी कि अगर अमेरिका ने ईरान पर युद्ध थोपा तो शुरूआत अमेरिका करेगा लेकिन उसे खत्म ईरान करेगा। उन्होंने अमेरिका पर आर्थिक आतंकवाद का आरोप लगाते हुए कहा था कि वह तेल के नाम पर इस क्षेत्र में दहशत फैलाना बंद करे। अब जब वह शहीद किए जा चुके हैं तो शुक्रवार को ट्विटर पर तीसरा विश्व युद्ध शुरू होने की बात टॉप ट्रेंड में रहा। अमेरिकी नागरिकों ने अपने ट्वीट्स में ईरान से युद्ध या बदले की कार्रवाई होने पर तमाम तरह की चिंताओं को ज़ाहिर किया गया। ईरान बिना डरे और देर किए बदला लेने का ऐलान कर दिया है।

सुलेमानी की शहादत पर अमेरिकी प्रोपेगेंडा और उसके पिछलग्गू देशों का प्रचार एक तरफ है और इस लेख में दिए गए फोटो उन सारे फर्जी प्रचारों पर भारी हैं। सुलेमानी की लोकप्रियता बता रही है कि कोई अमेरिकी दुष्प्रचार उनके व्यक्तित्व का मुकाबला नहीं कर सकता।