Wednesday, February 19, 2020

कहानी ...इंसानी पाबंदियां

-इस कहानी को कई पत्रिकाओं में छपवाने की कोशिश की गई। लेकिन किसी भी पत्रिका ने कश्मीर पर आधारित इस कहानी को छापने में दिलचस्पी नहीं ली। इसलिए यह कहानी हिंदीवाणी ब्ल़़ॉग पर पेश है...

सर्दियां बीत रही हैं। लेकिन  इस बार यह आम सर्दी का मौसम नहीं है। ज़हरीली आब-ओ-हवा फ़िज़ा में चारों तरफ़ है। नफ़रतों का तूफ़ान पूरी तरह सब कुछ रौंदने पर आमादा है। कुदरत के तूफान को कैटरीना, हरिकेन, बुलबुल जैसे नाम नसीब हैं लेकिन इंसानी नफरत के तूफान को कोई नाम देने को तैयार नहीं है। नफरत का तूफान जो कभी अपने हरे, नीले, पीले, भगवा, बसंती जैसे रंगों से पहचाना जाता था, अब वह ‘इंसाफ’ के साथ मिलकर इंद्रधनुष बना रहा है। कहना मुश्किल है कि नफरतों के तूफान का इंसाफ के इंद्रधनुष से क्या रिश्ता है लेकिन फिलहाल दोनों एक दूसरे के पूरक बने हुए हैं।

हर साल नवंबर का पहला हफ़्ता बीतते बीतते हमारे घर की डोर बेल ज़ोर से बजती थी और दरवाज़ा खोलने पर गेट पर कपड़ों का गठ्ठर लादे और हाथ में काग़ज़ की स्लिप लिए शफ़ीक़ #कश्मीरी नज़र आता था। लेकिन पूरा नवंबर खत्म हो गया। दिसंबर आकर चला गया लेकिन शफीक का दूर-दूर तक अता-पता नहीं था। शफीक का हर सर्दी में आने का सालों पुराना सिलसिला था। दिल्ली एनसीआर की तमाम सोसाइटियों में भले ही कुछ सफ़ेदपोश चोर, स्मगलर रहते हों या खादी की आड़ में चंद जरायमखोर रहते हों, लेकिन शफ़ीक़ जैसों की एंट्री इन सोसायटीज में तभी हो सकती है जब सोसायटी में कोई लिखकर देगा कि वो शफ़ीक़ को जानता है और उसके आने से किसी भी तरह के ‘आतंकवाद’ का ख़तरा नहीं है। शफ़ीक़ की पर्ची पर साइन करना मेरी ज़िम्मेदारी बन चुकी थी।

साल दर साल से यह सिलसिला चल रहा था। हालांकि सोसायटी के मुच्छड़ गार्ड को उसकी एंट्री सख्स नापसंद थी। वह कहता था... साहब, आप तो पढ़े-लिखे हो, क्या हम लोग इन #कश्मीरियों_पर_भरोसा_कर_सकते_हैं? आप जो कर रहे हो तो यह बहुत बड़ा खतरा है। हालांकि आरडब्ल्यूए वाले उस गार्ड को वेतन के नाम पर सात हजार रुपये देते थे। जब-तब वह पानी की बोतल भरने मेरे घर पर आता था तो कम सैलरी और लंबी ड्यूटी के बहाने अपने शोषण का जिक्र कर ही देता था। लेकिन सोसायटी में किसी #कश्मीरी_फेरीवाले की एंट्री को लेकर वह सब कुछ भूलकर रा#ष्ट्रवादी हो जाता था। आरडब्ल्यूए के शर्मा जी भी परेशान थे। वह अक्सर कह ही देते थे- अगर आप स्लिप पर साइन न करो तो मैं इन #देशद्रोहियों को घुसने नहीं दूं। यानि एक तरह से #आरडब्ल्यूए मुझ पर एहसान कर रही थी और उस कश्मीरी का अपना माल बेचने के लिए आना-जाना मेरे रहमोकरम पर था।

#कश्मीर से शाल, अन्य गर्म कपड़े और मेवे (ड्राई फ्रूट्स) बेचने वाले कश्मीरी नवंबर के पहले हफ़्ते में दिल्ली आते हैं और पूरे एनसीआर में फैल जाते हैं।...इस बार एक के भी दर्शन नहीं हुए हैं। ....हमारे घर के लोग चाहे कुछ ख़रीदें या ना ख़रीदें...रैनावारी का शफ़ीक़ बिना गेट खड़काये और चाय पीकर जाने की ज़िद के साथ लौटता नहीं था।...मेरे पास शफ़ीक़ का मोबाइल नंबर भी नहीं है जो उससे पूछ सकूं कि वो इस बार आया या नहीं। हर बार सोचता था कि शफीक का मोबाइल नंबर लेकर रखूंगा लेकिन यह सोचा ही नहीं था कि एक दिन ऐसा भी आयेगा, जब वह और उसके साथी आना बंद कर देंगे। मुझे याद आया कि शफीक अक्सर पुरानी दिल्ली के एक होटल का जिक्र करता, जहां कपड़ा बेचने वाले सारे कश्मीरी ठहरते थे और फिर वहां से आसपास के शहरों में सुबह ही कपड़ा बेचने चले जाते थे। वहां ये लोग देर रात लौटते थे और मिलकर खाना बनाते और खाते थे। मैंने सोचा कि क्यों न किसी दिन दफ्तर से थोड़ा पहले निकलकर उस होटल में जाकर पता तो करूं कि आखिर इस बार कपड़ा बेचने सारे कश्मीरी ही नहीं आये या सिर्फ शफीक ही नहीं आया।

बल्लीमारान की सर्पीली गलियों में किसी तरह तलाशते हुए उस होटल पर पहुंचा तो रिसेप्शन पर एक साहब उर्दू का अखबार बांचते नजर आए। मैंने पूछा - शफीक आया। उसका जवाब था - कौन शफीक। मैंने कहा- अरे वही शफीक जो #कश्मीर_से_कपड़े_बेचने_सर्दियों_में_आता_था। उसने कहा - शफीक तो क्या, उसके खानदान का भी कोई कश्मीरी इस बार नहीं आया। ...लगता है आप खबरों से वाबस्ता नहीं हैं, वहां के हालात आप नहीं जानते, किस दुनिया में रहते हैं। मैंने कहा, भाई हालात से तो वाकिफ हूं लेकिन काम धंधा तो चलता ही रहेगा ना। उसने बिफरते हुए कहा - जब हालात खराब हैं तो कैसा काम-कैसा धंधा। इस बार तो हमने पहले से ही सोच लिया था कि कोई कश्मीरी आयेगा तो उसको कमरा भी नहीं देंगे। ...कौन #दिल्ली_पुलिस की मुसीबत झेले।...अब बिफरने की बारी मेरी थी। मैंने कहा- अरे, इस तरह सोचोगे तो तुम्हारे #होटल में आयेगा कौन। तुम्हारा भी #बिजनेस उनके आने से जुड़ा है। फिर वो लोग कपड़ा बेचने आते हैं। उन्हें बाकी बातों से क्या मतलब। मैं उसे अपनी तरह से अब समझाने की कोशिश करने लगा।





शायद उसे मेरी अक्ल पर या बात पर तरस आया। उसने कहा - पुलिस के एक भी उलझाने और बदतमीजी वाले सवाल का सामना आप नहीं कर पायेंगे। आप क्या समझते हैं कि यह बात मुझे मालूम न होगी कि जब ग्राहक आएगा नहीं तो हम कमायेंगे कैसे। लेकिन साहब, दो रोटी कम खा लेंगे, लेकिन पुलिस की बदमाशियां झेल नहीं सकते। और अब तो अयोध्या पर फैसला भी आ चुका है। आप जरा सोचिए कि इतनी दूर से ऐसे माहौल में कौन खुद की जान फंसाने आएगा। कब दंगा हो जाए, कहां से शुरू हो जाए, कोई नहीं जानता। जब कुछ लोग दंगे पर आमादा हों तो ऐसे में हमारा आपका खामोश रहना ही ज्यादा बेहतर है। जान बची तो #अयोध्या_भी_हमारी_और_कश्मीर_भी_हमारा। अब तक चार बार पुलिस आ चुकी है सिर्फ यह पूछने की कि कोई कश्मीरी तुम्हारे होटल में ठहरा तो नहीं है। पुलिस वाले खुद बता रहे थे कि इस बार कश्मीरी शायद ही आएं। पुलिस वालों को सब पता होता है। आज ही मैं पढ़ रहा था कि वहां के सारे नेता एक महीने से नजरबंद हैं। अब सोचिए कि जब वहां के बड़े-बड़े नेता नजरबंद हैं तो बेचारे शफीक #कश्मीरी_की_क्या_बिसात।

मैं उसकी बात समझ गया। मेरे दिमाग में उस #उजड़े_हुए_कश्मीर_की_तस्वीर घूमने लगी, जहां अब #चिनार_के_दरख्त भी कराह रहे हैं। #भारतीय_मीडिया तो नहीं लेकिन #विदेशी_मीडिया बता रहा है कि 5 अगस्त के बाद से कश्मीर में हर घर से कोई न कोई जेल में है या गायब है, ऐसे में उस होटल वाले की बात वाजिब है कि किसे काम धंधे की पड़ी है। मुझे लगा कि उससे बात करना अब फिजूल है। जब वह इतनी बातें कर रहा है तो भला मुझे शफीक का #मोबाइल नंबर ही क्यों देगा। लेकिन शफीक को लेकर मेरी बेचैनी बढ़ गई।
मैं लौट तो पड़ा, लेकिन शफीक का चेहरा नजरों में घूमने लगा। कुछ चेहरे आप लाख भूलना चाहें, वो बार-बार आपके जेहन में मंडराएंगे। अगर बहुत भावुक और #संवेदनशील_इंसान हैं तो ऐसे चेहरे आपका चैन तक छीन सकते हैं।

शफीक अपनी #जिंदगी_की_कहानी_टुकड़ों_में सुनाता था।...इंजीनियरिंग करने के बाद उसके वालिद ने सोचा था कि शफीक को कहीं न कहीं कोई सरकारी नौकरी कश्मीर में मिल ही जायेगी। शफीक बताता था... सरकारी नौकरी की कोशिश करते-करते मैं कब 30 साल का हो गया, पता ही नहीं चला। वालिद की शिकारे से बहुत ज्यादा कमाई नहीं थी। लगातार हालात खराब होने पर शिकारे पर लोग पहले के मुकाबले कम आने लगे थे। वालिद मुंह से कुछ कहते नहीं थे लेकिन वह चाहते थे कि अब मैं भी घर की जिम्मेदारी संभालूं। फिर मेरे एक दोस्त ने एक दिन कपड़े का गठ्ठर संभाला और ट्रक में बैठकर #दिल्ली चला गया। सर्दियां खत्म होने पर वह लौटा और उसने बताया कि यह धंधा खूब चल रहा है। लोग वहां असली #कश्मीरी_कपड़ों_के_दीवाने हैं। अब तू #नौकरी-वौकरी क्या करेगा, यहां उधारी पर कपड़ा मिलेगा, अगली सर्दियों में चलकर मेरे साथ वहां बेच। अच्छी कमाई हो जाएगी। लगे हाथ उसने मुझे #मार्केटिंग टिप भी दे दी - हर बार कुछ ग्राहकों की पहचान कर उनके घर जाओ, जो ग्राहक बार-बार तुमसे खरीदने लगे, उसके लिए अगली बार जाते हुए मेवे का तोहफा ले जाओ। इस तरह ग्राहकों का एक बड़ा बेस #दिल्ली_एनसीआर में खड़ा हो जाएगा...और तू आराम से कमाना। नौकरी-चाकरी में क्या रखा है। उससे ज्यादा की कमाई एक सीजन में हो जाती है। फिर यहां भी दिल्ली से सामान लाकर बेचना।

शरीफ के मेवे के तोहफों ने हमें उसका पक्का ग्राहक बना लिया। शफीक अपने दोस्त की मार्केंटिंग टिप्स को कामयाब में जीजान से जुटा था। घर में चाहे जितने का कपड़ा खरीदा जाये या न खरीदा जाये, सर्दी आते ही शफीक का मेवे का तोहफा जरूर आ जाता था। बादाम और अखरोट बाजार में या आनलाइन बहुत ऊंचे दामों पर मिलता था। शफीक इन मेवों को हमें इतनी खुशी से देता था कि मानों हम लोग उसके बहुत खास ग्राहक हों। पिछले कुछ साल से यह भी हो चला था कि हम लोग शफीक को पेशगी रकम अलग से देकर कहते कि अगली बार ज्यादा मेवे चाहिए तो वह सुखाई गई खुबानी भी लेकर आता था।

वह कभी-कभी बहुत कुरेदने पर #लहूलुहान_कश्मीर पर भी बात करता था। उसके पास तर्कों की कमी नहीं थी। वह कहता था...कश्मीर एक बनाई गई समस्या है। लोग अपने घरों में अपने अपने लड़के-लड़की पर हुक्म चला नहीं पाते। लड़के-लड़की अपनी आजादी मांगते हैं, वे अपने मनपसंद दोस्त बनाना चाहते हैं, वे मनपसंद जगह शादी करना चाहते हैं, वे अपनी जिंदगी जीना चाहते हैं। आपको कश्मीर को उन्हीं बच्चों जैसा समझना होगा। आप यकीन मानिये हर कश्मीरी जानता है कि भारत के साथ रहने में उन्हें ज्यादा फायदा है लेकिन आपको उन्हें आजादी तो देनी ही पड़ेगी। जब वो आपसे अलग होकर जीना सीखेंगे तब उन्हें पता चलेगा कि मां-बाप जो समझाते थे, उसमें कितना फायदा-नुकसान है। लेकिन अगर आप जोर-जबरदस्ती करेंगे तो कोई भी बच्चा आपकी बात नहीं सुनेगा। समझदार मां-बाप को होना पड़ेगा, बच्चों को नहीं।...फिर ये बताइये कि इतनी भारी तादाद में फौज लगाकर आपने कश्मीर को काबू किया हुआ है। उधर, #पाकिस्तान ने भी अपने कश्मीर में ऐसा ही किया हुआ है। आप ही बताइये कि दोनों तरफ #फौज पर जो पैसा खर्च होता है, आखिर वो किसका पैसा है। साहब, हकीकत ये है कि दोनों तरफ की फौज और उसके अफसर जनता के पैसे से, टैक्स के पैसे से मलाई काट रहे हैं। अगर कोई समस्या खत्म हो जायेगी तो फिर फौज और पुलिस की जरूरत कहां पड़ेगी।...मैं देखता था कि शफीक के तर्कों को मैं जितना ही काटने की कोशिश करता, वह उतना ही जोरदार तर्क पेश कर देता।...लेकिन उसके खुलूस में कोई कमी नहीं आई। मेरे #भारत_समर्थक तर्कों के बावजूद हमारे घर उसका आना-जाना बना रहा और मेवों की आमद भी उसी मोहब्बत के साथ होती रही।





मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था कि आखिर शफीक का पता लगे तो कैसे लगे। तभी मुझे वाहिद का ख्याल आया। वाहिद कश्मीर के थे और मेरी ही कंपनी के दूसरे विभाग में काम करते थे। अक्सर कैंटीन में या #मेट्रो_में_मुलाकात हो जाती थी। मैंने सोचा कि क्यों न वाहिद की मदद लेकर शफीक का पता लगाया जाए। अगले दिन दफ्तर पहुंचते ही मैं वाहिद को उनके विभाग से कॉफी पिलाने के बहाने कैंटीन तक ले आया। वाहिद ने शफीक को लेकर मेरे सवाल सुने तो वह एक मिनट तक मुझे देखते रहे। वाहिद ने कहा - आपका दर्द समझ सकता हूं लेकिन आप बताइए कि जहां #फोन-#इंटरनेट सब कुछ बंद है, वहां आप शफीक को कैसे तलाश कर पाएंगे। मेरी बीवी अपने बूढ़े वालदैन (माता-पिता) से बात नहीं कर पाने की वजह से डिप्रेशन में है। सर्दियां शुरू हो चुकी हैं। उनकी कोई खबर नहीं है। वैसे भी वो लोग गांव में रहते हैं, जहां से किसी भी खबर का आना-जाना नामुमकिन है। #श्रीनगर के लिए फ्लाइट की टिकटें इतनी महंगी हैं कि सोचना पड़ता है। #श्रीनगर_एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही अनगिनत आंखें आपको या तो घूरने लगती हैं या सवाल करने लगती हैं। आप रैनावारी के जिस शफीक की बात कर रहे हैं, वो तो फिर भी ठीक ही होगा, क्योंकि वह श्रीनगर में ही आता है लेकिन जो व्यापारी गांवों और कस्बों से माल लेकर आते हैं, उनका सोचिए। वो ज्यादा दिक्कत में हैं। आप कितने शफीक को याद रखेंगे।...मुझे भी शफीक ही समझिए। मैं बस एक कंफर्ट जोन (सुविधाजनक क्षेत्र) में बैठा शफीक हूं। ...कोई और शफीक आएगा, वो भी आपके लिए मेवे लाएगा।...अगले शफीक का इंतजार कीजिए, इस शफीक को भूल जाइए। वाहिद ने एक झटके में कॉफी खत्म की और उठकर चला गया। मैं समझ गया कि शफीक को तलाशना एक नामुमकिन सा काम है।

वाहिद की बातों ने मुझे झिंझोड़ दिया था। लेकिन शफीक नजरों से ओझल नहीं हो पा रहा था। एक हफ्ता इसी तरह गुजर गया। मुझे किसी काम की वजह से गुड़गांव जाना पड़ा। अभी मैं केंद्रीय विहार से सड़क पार कर ही रहा था तो देखा एक चाय की दुकान पर शफीक मियां चाय की चुस्की ले रहे थे और बगल में उनका कपड़ों का गट्ठर रखा था। मैंने जोर से शफीक की आवाज लगाई तो वह भी चौंक कर खड़ा हो गया। मैंने उसे गले लगाया, उसकी खुशी उसके चेहरे पर दिखाई दी। मैंने उलहना दिया- यार, अब हम लोग भी पराये हो गए। तुम आए हुए हो और मैं तुम्हारी तलाश में कहां-कहां नहीं भटका, तमाम लोगों से तुम्हारे बारे में दरियाफ्त किया।

शफीक ने नजरें नीचे करते हुए जवाब दिया - साहब जब सारा #माहौल_आपके_खिलाफ हो जाए तो आप क्या करेंगे। मैं आपकी सोसायटी के गेट तक पहुंचा, लेकिन गार्ड ने सख्ती से मना कर दिया। उसने कहा कि आरडब्ल्यूए ने #कश्मीरियों_के_अंदर_जाने_पर_पाबंदी लगा दी है। साहब, हम #कश्मीर_में_पाबंदी छोड़कर आए थे और यहां #आजाद_भारत में हम पर उस गार्ड ने नई #पाबंदी_का_हुक्मनामा जारी कर दिया। मैं उससे मिन्नतें करता रहा कि आपसे बात करा दे, लेकिन वो माना ही नहीं। उसने आपका मोबाइल नंबर तक नहीं दिया। मैं क्या करता लौट पड़ा। फिर दूसरी सोसायटियों में गया तो वहां भी इसी पाबंदी का सामना करना पड़ा। वहां भी हमें अंदर घुसने नहीं दिया गया। ...और बल्लीमारान के उस होटल में क्यों नहीं आए...मैंने पूछा। ...अरे, साहब उनकी नजरें भी बदल गईं। वो तो हमारी बिरादरी से हैं लेकिन उन्होंने इस बार किसी भी #कश्मीरी_को_होटल_नहीं_दिया। वो लोग कहने लगे कि इस बार रिस्क है। कमरा नहीं दे सकते। थकहार कर हम लोग फिर घिटोरनी गांव आ गए। वहां गांव में हमें एक बुजुर्ग ने अपनी जिम्मेदारी पर कमरा दिलाया। हम 14 लोग वहीं ठहरे हुए हैं। लेकिन इस बार मामला ठंडा है। कई सोसायटी में घुसने को मिल जाता है लेकिन बहुत सारी जगह पाबंदी का सामना करना पड़ता है। ऐसा लगता है कि #भारत_सरकार ने दिल्ली एनसीआर की सोसायटियों में भी हम #कश्मीरियों_पर_पाबंदी लगा दी है। ...शफीक चुप नहीं हो रहा था, जैसे उसे बहुत सारे गिले शिकवे हों और वो उन्हें बयान किए जा रहा था। मैंने उसे पेशकश की चलो मेरे साथ, मेरी सोसायटी के गेट पर, देखते हैं कौन तुमको वहां घुसने नहीं देता है। ...




उसने मुझे देखे बिना अपना गठ्ठर खोलते हुए जवाब दिया- छोड़ों साहब, क्यों किसी के लिए दुश्मनी मोल लेते हो। जब हालात सुधरेंगे तो शायद इंसान भी हम पर से पाबंदिया हटा ले। अभी तो #इंसान_और_इंसानियत दोनों मर चुके हैं। फिर उसने मुझे एक पैकेट थमाया, उसमें अखरोट थे। ...यह तोहफा रह ही जाता, अगर आप आज नहीं मिले होते।...मैं स्तब्ध होकर उसके चेहरे को देखे जा रहा था, उसकी आंखें भीगी हुई थीं...फिर उसने गट्ठर अपने पीठ पर लादा और केंद्रीय विहार की मुख्य सड़क की तरफ मुड़ गया, मैं उसे जाता हुआ देखता रहा।...

You can listen this #story here on this #Youtube link इस कहानी को यूट्यूब लिंक पर सुन भी सकते हैं...


Tuesday, February 18, 2020

महात्मा गांधी के संघीकरण की शुरूआत



 आरएसएस का गांधी प्रेम बढ़ता ही जा रहा है। आरएसएस के मौजूदा प्रमुख या सरसंघचालक मोहन भागवत 17 फ़रवरी को दिल्ली में गांधी स्मृति में जा पहुंचे। संघ के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब कोई सरसंघचालक गांधी स्मृति में पहुंचा है। गांधी स्मृति वह जगह है जहां 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या की गई। गांधी स्मृति गांधीवाद का प्रतीक है। वहां किसी सरसंघचालक का पहुंचना छोटी घटना नहीं है। लेकिन क्या है यह सब...अचानक इतना गांधी प्रेम...गांधी को इतना आत्मसात करने की ललक कांग्रेस जैसी पार्टी ने भी नहीं दिखाई, जो खुद को गांधी की विरासत का कस्टोडियन मानती है।

 #संघ की गांधी के प्रति यह ललक दरअसल 2 अक्टूबर 2019 से प्रत्यक्ष दिखाई पड़ रही है, जब इन्हीं मोहन भागवत ने ट्वीट कर कहा था कि गांधी को स्मरण करने की बजाय उनका अनुसरण करना चाहिए। मोहन भागवत की उस समय की प्रतिक्रिया पर किसी का ध्यान नहीं गया और न ही इसे किसी ने गंभीरता से लिया था। लेकिन जब 17 फरवरी को उन्होंने दोबारा से #गांधी का अनुसरण करने की बात कही और #गांधी_स्मृति जाने की पहल की तो लगा मामला अब गंभीर है। संघ की इस चालाक पहल पर चर्चा होनी चाहिए और इसका विश्लेषण भी किया जाना चाहिए। 



एक सीधा सा जवाब या विश्लेषण यह है कि संघ के पास अपना कोई इतना बड़ा प्रतीक नहीं है जो नई पीढ़ी या हमारे दौर की पीढ़ी उन्हें गंभीरता से ले सके। संघ के संस्थापक डॉ केशव #हेडगेवार के बाद #हिंदुत्ववादी_विचारधारा को आगे बढ़ाने वाले #गोलवरकर, सावरकर, पंडित दीन दयाल उपाध्याय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी इतनी बड़ी शख्सियत नहीं रहे कि उन पर भारतीय घरों के ड्राइंगरूम में गांव की चौपाल पर चर्चा हो। 

#सावरकर और उनके चेले नाथूराम #गोडसे, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और #अटल बिहारी वाजपेयी तो तमाम तरह के विवादों में घिरे रहे। वो भारतीय घरों में महात्मा गांधी, #भगत_सिंह, #आंबेडकर, नेताजी सुभाष चंद्र #बोस जैसी चर्चा या बहस के केंद्र में कभी नहीं आए। गांधी, भगत सिंह और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की विचारधाराओं में कोई तालमेल नहीं था लेकिन इसके बावजूद भारतीय घरों में इन सभी की लोकप्रियता एकजैसी है और गांधी तो खैर अंतरराष्ट्रीय शख्सियत हैं। 

1925 में संघ की स्थापना हुई थी। वह इस मायने में तो सफल रहा कि उसने अपने राजनीतिक मुखौटों और असंख्य अनुषांगिक संगठनों के ज़रिए देश को हिंदू-मुसलमान के आधार पर बांट दिया लेकिन वह अपने प्रतीकों को भारत के आम लोगों में, घरों में स्थापित नहीं कर पाया। गांधी के खिलाफ जब भी संघ ने मोर्चेबंदी कर गोलवरकर या सावरकर को स्थापित करना चाहा, तब-तब उसे मुंह की खानी पड़ी। संघ के कई अनुयायियों ने गांधी जी के चरित्र पर चोट करने वाली फिल्में और मनघड़ंत कहानियां तक प्रचारित कीं लेकिन इसके बावजूद गांधी भारतीयों के दिलोदिमाग से उतर नहीं सके।

 संघ की इस बात के लिए तारीफ करनी होगी कि वह वक्त की नब्ज पर हाथ रखकर अभी से नहीं, अपनी स्थापना के समय से ही चल रहा है। जब उसने देखा कि वैचारिक रूप से गांधी को पराजित करना नामुमकिन है तो उसने गांधी को ही गले लगाने का फैसला कर लिया। 2 अक्टूबर 2019 को #मोहन_भागवत का गांधी जी को लेकर किया गया ट्वीट इसी कड़ी की पहली पेशकश थी। आने वाले समय में आप देखेंगे कि संघ का गांधी राग बढ़ता ही जाएगा। यह एक तरह से गांधी के #संघीकरण अभियान की शुरूआत है। जो समूह और उसकी विचारधारा के मानने वाले गांधी जी की शहादत को गांधी वध कहते रहे हों। जो समूह या उसकी विचारधारा को मानने वाले लोग गांधी की हत्या से सीधे जुड़े रहे हों, उनके अनुयायियों का उस हत्या के लिए बिना माफ़ी माँगे गांधी प्रेम दिखाना बहुत ही दिलचस्प मंज़र है।

मोहन भागवत ने 17 फरवरी को जिस कार्यक्रम में गांधी जी को लेकर बड़ी-बड़ी बातें कहीं, वह एक पुस्तक विमोचन का कार्यक्रम था। आमतौर पर तमाम पुस्तकों के विमोचन चुपचाप हो जाते हैं और उनका पता भी नहीं चलता। मोहन भागवत ने संघ के विचारों को गांधी से जोड़कर बनाई गई (लिखी गई) पुस्तक विमोचन में कई नई बातें भी कह डालीं। जिस पुस्तक का उन्होंने विमोचन किया, उसका नाम है - गांधी को समझने का यही उचित समय। इस किताब को राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान परिषद (एनसीईआरटी) के पूर्व निदेशक जगमोहन सिंह राजपूत ने लिखा है। राजपूत पुराने संघी हैं और एनसीईआरटी में रहते हुए उन्होंने संघ की नीतियों को ही आगे बढ़ाया था। 

खैर, राजपूत साहब की पुस्तक का विमोचन करते हुए मोहन भागवत ने जो बातें कहीं, उनमें से कुछ लाइनों को मैं दोहराता हूं। उन्होंने कहा - गांधी जी बैरिस्टर बनकर आये, पैसा कमा सकते थे। उनको अपने #सनातनी_हिन्दू होने पर कभी शर्म महसूस नहीं हुई थी। गांधी ने कहा था कि वो सनातनी हिन्दू हैं, लेकिन दूसरे #धर्म का भी सम्मान किया। उनके भाषण में आगे जो बातें कहीं गईं, उस पर जरा ज्यादा तवज्जो देने की जरूरत है। 

भागवत ने कहा #हेडगेवार जी ने कहा था गांधीजी के जीवन का अनुसरण करना चाहिये, सिर्फ स्मरण नहीं। ...शिक्षा के जरिए हमारा दिमाग बिगाड़ दिया गया। एक समय था जब हमारी चीजों को गलत मानकर चला जाता था, लेकिन अब स्थिति बदल रही है। शिक्षा में ये नहीं बताया जाना चाहिये कि ये हमारे पक्ष का है और ये विपक्ष का। शिक्षा में सत्यपरकता होनी चाहिए। उन्होंने कहा आज नहीं तो 20 साल बाद हम बापू को कैसे कह सकते हैं कि बापू आप चले गये थे लेकिन अब आप आकर रह सकते हैं। परिस्थितियां बदलेंगी, मुझे उम्मीद है की सारा रंग एक होगा। उन्होंने कहा कि गांधीजी के आन्दोलन में गड़बड़ी होती थी तो वह प्रायश्चित करते थे। आज के आन्दोलन में कोई प्रायश्चित करने वाला नहीं है। लेकिन आज के आन्दोलन में जो पीटता है या जो जेल जाता है वही प्रायश्चित करता है। जो कराता है वो हारता है या जीतता है।

मोहन भागवत की इस लाइन पर गौर कीजिए - परिस्थितियां बदलेंगी, मुझे उम्मीद है कि सारा रंग एक होगा। ....भागवत इस लाइन को बोलकर क्या कहना चाहते थे, इसे उन्होंने विस्तार से नहीं समझाया लेकिन उन्होंने इसे गांधी से इस संदर्भ के साथ जोड़ा कि गांधी के साथ सारा भारत एक था, उसका एक रंग था। लेकिन अब जिन परिस्थितियों को वह बदलने की उम्मीद कर रहे हैं और उसके एक रंग की बात वह कह रहे हैं, उसका अंदाजा लगाया जा सकता है। भागवत शायद यह कहना चाहते हैं कि जिस एक रंग की भगवा ध्वजा को वो लोग अपनी शाखा में और नागपुर में प्रणाम करते हैं, शायद उस एक रंग से पूरे भारत को यानी गांधी के भारत को रंगने का सपना संघ प्रमुख देख रहे हैं। अब उनकी अंतिम लाइन पढ़िए। भागवत कहना चाह रहे हैं कि जो लोग आंदोलन कराते हैं, वे या तो हारते हैं या जीतते हैं। जो पीटता है या जो जेल जाता है वह प्रायश्चित यानी पश्चताप यानी अफसोस करता है। 

यह बहुत बड़ी बात है। वह साफ-साफ कह रहे हैं कि जो आंदोलन कराता है वह या तो जीतता है या हारता है। यानी संघ अपने समेत हर आंदोलन को हार-जीत के रूप में देखता है। ...और कोई क्यों हारना चाहेगा, वो भी तब जब सरकार अपनी हो। मतलब स्पष्ट है कि देश में चलने वाले किसी भी तरह के आंदोलन को संघ इसी नजर से देखता है। जो उसके अनुकूल है या उसकी विचारधारा से प्रस्फुटित है, उनमें वह जीत तलाशता है। #शाहीनबाग सरीखे या आरक्षण बचाओ सरीखे #दलितों_के_आंदोलन को वह हार के रूप में देखता है।

...तो मोहन भागवत की बात का एक विश्लेषण यह भी बनता है कि 1925 में बने इस संगठन ने गांधी के आंदोलन को हमेशा उसी नजर से देखा, जिसकी टीस अब भी संघ के #साहित्य में, उनके #सरसंघचालकों के आचरण से सामने आती है। यानी #गांधीवाद के सामने या गांधी के आंदोलन के सामने संघ ने अपनी हार स्वीकार कर ली है। इसीलिए अब वो #गांधी_का_संघीकरण चाहते हैं, जिसकी शुरुआत मोहन भागवत ने की है और #संघ_की_विचारधारा का शिक्षा के क्षेत्र में प्रचार करने वाले जगमोहन सिंह राजपूत ने उस शुरुआत का पहला चरण शुरू किया है। 

गांधी के संघीकरण के लिए #आरएसएस की योजनाओं का मुझे अंदाजा नहीं है लेकिन इतना तो अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि आने वाले समय में इससे जुड़े संघ के तमाम प्रचार साहित्य आप लोगों के सामने जरूर आ जाएंगे। सीधा सा देसी फ़र्म्युला है, जिसे पा नहीं सकते, उसके साथ या उससे इनता घुल-मिल जाओ की बाकी जनता उसे या तुम्हें उसी का हिस्सा समझने लगे या मानने लगे। गांधी के संघीकरण का फायदा नई पीढ़ी के बाद उसकी अगली पीढ़ी से संघ को होगा, जब वह मानने लगेगी कि गांधी जी ही संघ थे या संघ ही गांधीमय था।

#इतिहास की एक छोटी सी घटना बताकर अपने उस तर्क को साबित करना चाहता हूं। मुझे कई बार शिक्षण संस्थाओं में जाने और वहां के शिक्षकों और छात्र-छात्राओं से बातचीत का मौका मिलता है। जब मैं उन्हें बताता हूं कि अपने समय में भारत की आजादी के आंदोलन में शामिल रहे और बाद में पाकिस्तान के संस्थापक बने मोहम्मद अली #जिन्ना ने #हिंदू_महासभा के साथ मिलकर सरकार चलाई थी तो उन्हें यकीन नहीं होता। वह जिन्ना और हिंदू महासभा के गठजोड़ को पचा नहीं पाते। 

इसी तरह जब मैं उन्हें बताता हूं कि 1942 के #गांधी_जी_के_असहयोग_आंदोलन में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अंग्रेजों का साथ दिया तो इस पीढ़ी के युवा चौंककर मेरा चेहरा पढ़ने की कोशिश करते हैं। लेकिन जब मैं उन्हें सावरकर की किताब का उल्लेख कर उनमें से ही इस सत्य को तलाशने के लिए कहता हूं तो ऐसा प्रयास करने का आश्वासन वे लोग नहीं दे पाते हैं। #इंटरनेट ने हिंदू महासभा और जिन्ना के गठजोड़ को तलाशने का काम तो और भी आसान कर दिया है। इसे तलाश कर कोई भी देख सकता है- ( वीडी सावरकर, समग्र सावरकर वांग्मयः हिंदू राष्ट्र दर्शन, अंक-6, महाराष्ट्र प्रांतिकहिंदूसभा, पूना, 1963, पेजः 479-480) सावरकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की हिंदू महासभा एक साल तक जिन्ना की पार्टी के साथ गठबंधन सरकार चलाते रहे, इस तथ्य को संघ ने आजतक खारिज नहीं किया है। जिन्ना और हिंदू महासभा ही सबसे पहले दो राष्ट्र यानी हिंदुस्तान-पाकिस्तान की अवधारणा लेकर आए और उस पर अंग्रेजों के साथ चर्चा की।

गांधी के संघीकरण की इन कोशिशों को कैसे रोका जाएगा, यह सोचना #गांधीवादी_सिद्धांतों में विश्वास करने वाले सभी राजनीतिक दलों और अन्य सामाजिक संगठनों की जिम्मेदारी है। लेकिन सिर्फ गांधी ही नहीं संघ ने गांधी की तर्ज पर शहीद-ए-आजम भगत सिंह और आंबेडकर को भी आत्मसात करना चाहा लेकिन वो कोशिश नाकाम रही। क्योंकि ज्यों ही कोई भगत सिंह के विचारो को पढ़ने लगता है तो फिर उसके सामने संघ की बेइमानियां सामने नजर आने लगती हैं। इसी तरह की कोशिश सुभाष चंद्र बोस के साथ भी संघ ने की। संघ का यह पूरा प्रयास इन ऐतिहासिक छवियों को अपने संगठन या #हिंदुत्ववाद से जोड़ने की वजह वही है कि उसके पास अपने बिना कोई प्रश्नचिह्न वाले प्रतीक नहीं हैं। अगर वो गांधी का संघीकरण कर ले गया तो वह फिर से भगत सिंह, बोस और आंबेडकर पर जुटेंगे। पिछले कई वर्षों में उन्होंने इन ऐतिहासिक महापुरूषों की जयंती पर कार्यक्रम आयोजित कर अपनी मंशा बता भी दी है लेकिन गांधी के संघीकरण पर ज्यादा ज़ोर है।




































Monday, February 17, 2020

60 दिन का आंदोलनबाग - शाहीनबाग

शाहीनबाग आंदोलन 60 दिन पुराना हो गया है। जहरीले चुनाव से उबरी दिल्ली में किसी आंदोलन का दो महीने जिंदा रहना और फिलहाल पीछे न हटने के संकल्प ने इसे आंदोलनबाग बना दिया है। ऐसा आंदोलनबाग जिसे तौहीनबाग बताने की कोशिश की गई, लेकिन शाहीनबाग की हिजाबी महिलाओं ने तमाम शहरों में कई सौ शाहीनबाग खड़े कर दिए हैं। बिना किसी मार्केटिंग के सहारे चल रहे महिलाओं के इस आंदोलन को कभी धार्मिक तो कभी आयडेंटिटी पॉलिटिक्स (पहचनवाने की राजनीति) बताकर खारिज करने की कोशिश की गई। लेकिन आजाद भारत में मात्र किसी कानून के विरोध में हिजाबी महिलाओं का आंदोलन इतना लंबा कभी नहीं चला। 

#शाहीनबाग_में_महिलाओं_का_आंदोलन 15 दिसंबर 2019 से शुरु हुआ था। आंदोलन की शुरुआत शाहीनबाग के पास #जामिया_मिल्लिया_इस्लामिया में समान नागरिकता कानून (#सीएए) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (#एनआरसी) के खिलाफ छात्र-छात्राओं के आंदोलन पर पुलिस लाठी चार्ज के खिलाफ हुई थी। शाहीनबाग की महिलाओं के नक्श-ए-कदम पर #बिहार में गया, उत्तर प्रदेश में #लखनऊ, #इलाहाबाद और #कानपुर तो पश्चिम बंगाल में कोलकाता में इसी तर्ज पर महिलाएं इसी मुद्दे पर धरने पर बैठी हुई हैं। गया की महिलाएं 25 दिसंबर से बैठी हैं और बाकी शहरों में कुछ दिनों पहले बैठीं।


भारत में #मुस्लिम_महिलाओं की शक्ल कभी इस आंदोलनकारी रूप में नहीं आई थीं। केंद्र सरकार ने तीन तलाक कानून बनाया तो इसके पक्ष और विपक्ष में मुस्लिम महिलाओं के प्रदर्शन दिल्ली, मुंबई, #पटना, लखनऊ वगैरह में नजर आए लेकिन उन्हें राजनीतिक आंदोलन बताकर खारिज कर दिया गया था। जिन मुस्लिम महिला संगठनों ने तीन तलाक कानून के पक्ष में प्रदर्शन किया, उन्हें सरकारी बताकर खारिज कर दिया। जिन महिलाओं ने तीन तलाक कानून के विरोध में प्रदर्शन किया, उसे मौलवियों की साजिश बताकर खारिज कर दिया गया। हालांकि दोनों तरह के आंदोलनों में महिलाओं की उपस्थिति में जमीन आसमान का अंतर था लेकिन #मीडिया की नजर में मामला कुल मिलाकर खारिज ही रहा।

टीवी चैनलों पर मुद्दों की दुकान चलाने वाले पेशेवर ऐंकरों ने पहले बीस दिन तो शाहीनबाग में #हिजाबी_महिलाओं_के_आंदोलन को भी धार्मिक बताकर खारिज कर दिया। लेकिन इसके बावजूद महिलाएं जब वहां जमी रहीं तो मुद्दों की मार्केंटिंग करने वाले इसे देशविरोधी बताकर थक गए। फिर कहना शुरू किया गया कि यह सब आयडेंटिटी पॉलिटिक्स के लिए किया जा रहा है। मुसलमानों को हर कुछ दिन बाद अपनी आयडेंटिटी पॉलिटिक्स के लिए करना पड़ता है तो इस बार वे अपनी महिलाओं को आगे करके यह राजनीति कर रहे हैं। पेशेवर ऐंकरों के इस प्रचार को सोशल मीडिया ने ध्वस्त किया। जब #सोशल_मीडिया_शाहीनबाग को लेकर आक्रामक हुआ तो ऐंकरों को साख बचाने के लिए वहां लहराते तिरंगे झंडे को दिखाना पड़ा और #गंगा_जमुनी_तहजीब भी दिखानी पड़ी। लेकिन पेशेवर ऐंकरों के गले से अभी भी यह बात नीचे नहीं उतर रही है कि आखिर कैसे तीन तलाक से पीड़ित और  हर वक्त पर्दे में कैद कर रखी जाने वाली अनपढ़ मुस्लिम महिलाएं इतनी बड़ी तादाद में डेढ़ महीने से धऱने पर बैठी हैं। 

दिल्ली के शाहीनबाग से लेकर लखनऊ के घंटाघर और बाकी जगहों पर धरने पर बैठी महिलाओं ने इस आंदोलन ने अपनी उस दकियानूसी, पर्देवाली और जाहिल वाली छवि को ध्वस्त कर दिया है, जिसके पहचान के दायरे में उन्हें बांध दिया गया था। चाहे सिनेमा हो, साहित्य हो, कला हो, पत्रकारिता हो, राजनीति हो, हर जगह मुस्लिम महिलाओं को दीन-हीन दशा में पेश किया जाता रहा है। 

महिला आंदोलनों पर नजर रखने वाले जामिया मिल्लिया इस्लामिया में इंटरनैशनल स्टडीज के प्रोफेसर डॉ मोहम्मद सोहराब का कहना है कि मुस्लिम महिलाओं की दकियानूसी छवि एक प्रबुद्ध तबके ने जानबूझकर बनाई थी, हकीकत में वो वैसी कभी नहीं थीं या हैं। इस्लाम के शुरू होने से लेकर आज तक मुस्लिम महिलाओं की भूमिका बाकी समुदायों के मुकाबले किसी भी मोर्चे पर कमतर नहीं रही। तमाम मुद्दों पर उसकी चुप्पी का मतलब यह नहीं था कि वह दकियानूसी थीं या उनमें आधुनिकता की कमी थी। उसके पास एक से एक हुनर हैं लेकिन उनकी मार्केंटिंग करने वाला कभी कोई नहीं रहा।

कई किताबों के लेखक और दिल्ली यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर डॉ. #शम्सुल_इस्लाम इसे अप्रत्याशित घटना के रूप में देखते हैं। वह कहते हैं कि #आंदोलनकारी_मुस्लिम_महिला की ऐसी छवि एक खास विचारधारा की मार्केटिंग करने वालों की नजर में कभी थी ही नहीं। वे तो मुस्लिम महिलाओं को ही नहीं पूरे #मुस्लिम_समाज को घर की मुर्गी दाल बराबर (टेकन फॉर ग्रांटेड) समझ रहे थे। उन्होंने देखा कि #अयोध्या पर इतना बड़ा फैसला आया, मुस्लिम चुप रहा, कहीं से कोई आंदोलन नहीं चला। कश्मीर में #धारा_370 हटाई गई, कश्मीरियों पर जुल्म-ओ-सितम हुए शेष #भारत_का_मुसलमान चुप रहा, तीन तलाक कानून पास हो गया, मुसलमान चुप रहा। तो उन पैरोकारों ने सोचा कि क्यों न एक रद्दा और रखकर देख लिया जाए कि सीएए और एनआरसी का वजन सह पाएंगे या नहीं। उन्हें विरोध की आशंका थी लेकिन बेचारी की छवि बनाकर जमींदोज कर दी गई मुस्लिम महिलाओं के शाहीनबाग से उभरने की उम्मीद कतई नहीं थी। 

शाहीनबाग अब मुस्लिम महिलाओं के संघर्ष का एक प्रतीक बन गया है। लेकिन यह हकीकत है कि छवि गढ़ने वाले बाजार में कभी किसी समुदाय की महिलाओं के जुझारूपन को गहराई से समझने की कोशिश नहीं की जाती है। 2011 में पिछली जनगणना हुई थी। 2016 में उस जनगणना के शिक्षा संबंधी आंकड़े सरकार ने जारी किए। उस सरकारी आंकड़े के मुताबिक भारत में 48.11 फीसदी मुस्लिम महिलाएं अनपढ़ हैं यानी उन्हें अपना लिखना-पढ़ना भी नहीं आता है। दूसरी तरफ 44.03 फीसदी हिंदू महिलाओं को भी अपना नाम लिखना-पढ़ना नहीं आता। यह आंकड़ा बहुत कुछ बताता है। लेकिन देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा और खास तौर से प्रबुद्ध वर्ग मुसलमानों के बारे में फैली तमाम धारणाओं से पीछा छुड़ाने को तैयार नहीं है। पिछली जनगणना के समय ही यह तथ्य सामने आए थे कि मुस्लिम महिलाओं का साक्षरता अनुपात बहुत मामूली सुधरा है। इस मामूली सुधार को भी धारणा पालने औऱ बनाने वालों ने स्वीकार नहीं किया। नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) ने अपनी 2015-16 की रिपोर्ट में बताया कि मुस्लिम महिलाओं ने शिशु प्रजनन दर में 50 फीसदी की कमी कर ली है। पहले मुस्लिम दंपति 4-5 बच्चे पैदा करने के लिए बदनाम थे लेकिन अब वो 2 बच्चे ही चाहते हैं। एनएफएचएस के सर्वे में 2001 के मुकाबले 2015-16 में 50 फीसदी का आंकड़ा इसी का प्रमाण है।

उच्च शिक्षा पर 2018 में आए एक सरकारी सर्वे रिपोर्ट में कहा गया कि 2013-14 से अब तक सरकारी कोशिशों की वजह से महिला एनरोलमेंट (पढ़ाई के लिए एडमिशन) में 24 फीसदी का इजाफा हुआ है। लेकिन मुस्लिम महिलाओं के उच्च शिक्षा में एनरोलमेंट में 47 फीसदी का इजाफा हुआ है। यानी राष्ट्रीय एनरोलमेंट दर के मुकाबले मुस्लिम लड़कियों की एनरोलमेंट दर दोगुना बढ़ गई। उच्च शिक्षा में लड़कियों की पढ़ाई को लेकर मुसलमानों में आए इस बदलाव को कभी रेखांकित करने की कोशिश सरकारी या गैर सरकारी स्तर पर नहीं हुई। सही मायने में सरकार के बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ मुहिम का फायदा मुस्लिम दंपतियों ने ही उठाया है, अन्यथा एनरोलमेंट दोगुना नहीं होता। यहां यह ध्यान देना चाहिए कि हम स्कूल ड्रॉप आउट में मुस्लिम बच्चों के पढ़ाई छोड़ने का जिक्र तो करते हैं लेकिन उच्च शिक्षा में बढ़ रहे उनके एनरोलमेंट पर गौर नहीं कर रहे हैं।

शहर-शहर खड़े हो रहे शाहीनबाग न सिर्फ मुस्लिम महिलाओं के संदर्भ में बल्कि सभी महिलाओं को समझने के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण अवसर है। इस अवसर को महिलाओं के सामने पेश अन्य गंभीर चुनौतियों के लिए भुनाया जाना चाहिए। इस आंदोलन से उनकी परिवपक्वता सामने आई है। उनकी इस परिपक्वता को सार्थक बनाए रखने का काम जारी रहना चाहिए।



Saturday, February 15, 2020

अहमदाबाद की दीवारें

हथियार बेचने आ रहे हिरोशिमा के क़ातिलों की संतान के स्वागत में वो कौन लाखों लोग अहमदाबाद की सड़कों पर होंगे ?

दीवार के इस पार या उस पार वाले
नरोदा पाटिया वाले या गुलबर्गा वाले।

डिटेंशन कैंप सरीखी बस्तियों वाले
या खास तरह के कपड़े पहनने वाले।।

वो जो भी होंगे पर किसान तो नहीं होंगे
तो क्या वो फिर जियो के कामगार होंगे।

नरसंहारक होंगे या दुष्प्रचारक होंगे
तड़ीपार होंगे या फिर चिड़ीमार होंगे।।

हो सकता है वो फ़क़ीरी सरदार हों
दस लाख के सूट वाले असरदार हों।

लुटते पिटते दलितों के रिश्तेदार हों
या वो नागपुर से आए चौकीदार हों।।

आओ ऐसी बाँटने वाली दीवारें गिरा दें
हर कोने में शाहीनबाग आबाद करा दें।

सब मक्कार तानाशाहों को झुका दें
नागरिकता के मायने इन्हें भी बता दें।।
-यूसुफ़ किरमानी


Ahamadaabaad kee Deevaaren

hathiyaar bechane aa rahe hiroshima ke qaatilon kee santaan ke svaagat mein vo kaun laakhon log ahamadaabaad kee sadakon par honge ?

 deevaar ke is paar ya us paar vaale
naroda paatiya vaale ya gulabarga vaale.

 ditenshan kaimp sareekhee bastiyon vaale
ya khaas tarah ke kapade pahanane vaale..

 vo jo bhee honge par kisaan to nahin honge
 to kya vo phir jiyo ke kaamagaar honge.

 narasanhaarak honge ya dushprachaarak honge
tadeepaar honge ya phir chideemaar honge..

ho sakata hai vo faqeeree saradaar hon
das laakh ke soot vaale asaradaar hon

lutate pitate daliton ke rishtedaar hon
ya vo naagapur se aae chaukeedaar hon..

 aao aisee baantane vaalee deevaaren gira den
har kone mein shaaheenabaag aabaad kara den.

 sab makkaar taanaashaahon ko jhuka den
naagarikata ke maayane inhen bhee bata den.

 -Yusuf kirmani













Sunday, February 9, 2020

शाहीनबाग : डॉक्टर - मरीज संवाद


दिल्ली एनसीआर का एक शहर...

मरीज़: डॉक्टर साहब, आपके नर्सिंग होम में भी कोरोना वायरस की दवा मिलने का पोस्टर लगा देखा अभी बाहर।

डॉक्टर: हाँ, वो एक डॉक्टर हमारे यहाँ बैठती हैं। हमने उनको चैंबर किराये पर दे रखा है। लेकिन पता नहीं क्यों कोरोना के मरीज़ आ ही नहीं रहे हैं।

मरीज: अरे, डॉक्टर साहब ऐसा न कहें। शुभ बोलिए। न आएँ तो अच्छा है।

डॉक्टर: आएँगे कहाँ से...सारे कोरोना वायरस तो शाहीनबाग में बैठे हैं।...शाहीनबाग कोरोना वायरस है।

मरीज़: डॉक्टर साहब, कोरोना वायरस तो मुझे नेता लगते हैं। यह पूरा देश नेताओं की शक्ल में कोरोना वायरस बनकर हमें खत्म कर रहा है। हमें बाँट रहा है। हमें तोड़ रहा है। हम टैक्स पेयर्स को जज़्बाती बनाकर नेता नाम का वायरस हमें ही मार रहा है।

डॉक्टर: आप नहीं समझोगे। शाहीनबाग में बैठे कोरोना वायरस ज्यादा ख़तरनाक हैं। ...लाओ, पर्चा दो। क्या नाम है आपका...?

एक अन्य मरीज़ का प्रवेश...

दूसरा मरीज़: डॉक्टर साहब, मेरे किनारे वाले दाँत में बहुत दर्द हो रहा है। निकलवाने में कितना पैसा लगेगा?

डॉक्टर: बिना देखे नहीं बता सकता। दाँत किस तरह का है। देखकर ही पैसे बताऊँगा। चलो बैठो, देखता हूँ।

दूसरा मरीज: पर, डॉक्टर साहब बिना पैसा पता किए मैं नहीं दिखा सकता। उतने पैसे हों या न हों, मेरे पास।

डॉक्टर: अरे मलयाली हो क्या, इतनी सी बात समझ में नहीं आती।

दूसरा मरीज: डॉक्टर साहब, बिहार का हूँ। सब समझ में आता है। शाम तक आता हूँ।

डॉक्टर: क्या शाहीनबाग जा रहे हो?

दूसरा मरीज: ये कहाँ है डॉक्टर साहब, क्या वहाँ भी इसका इलाज होता है?

डॉक्टर: हाँ, वहाँ मुफ़्त इलाज हो रहा है।

दूसरा मरीज चला जाता है।

पहला मरीज: डॉक्टर साहब, आज आपको क्या हो गया है? शाहीनबाग क्यों हावी है?

डॉक्टर : अरे जीना हराम कर दिया है। देश आगे बढ़ नहीं रहा। जहाँ देखो शाहीनबाग...कब तक बर्दाश्त करें।

पहला मरीज: डॉक्टर साहब, लेकिन दिक़्क़त क्या है शाहीनबाग से?

डॉक्टर: ये आप नहीं समझेंगे। दिक़्क़त यही है। जिस दिन आप जैसे समझ जाएँगे, सारे शाहीनबागों का खेल
खत्म हो जाएगा।

पहला मरीज: और नेताओं का खेल?

डॉक्टर: नेताओं से शाहीनबाग ज्यादा ख़तरनाक हैं।...अच्छा लाओ, पर्ची नहीं दी आपने...

पहला मरीज: (पर्ची मेज़ पर रखते हुए)...पर डॉक्टर साहब, आपको ऐसे नहीं बोलना चाहिए। आप डॉक्टर हैं। हर
कोई आपके यहाँ आता है।

डॉक्टर: अरे भाई बोलना पड़ता है।...आप नहीं समझ पाओगे इसे...

Shaheenbagh: doktar - mareej baat-cheet
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dillee enaseeaar ka ek shahar...

mareez: doktar saahab, aapake narsing hom mein bhee korona vaayaras kee dava milane ka postar laga dekha abhee baahar.

doktar: haan, vo ek doktar hamaare yahaan baithatee hain. hamane unako chaimbar kiraaye par de rakha hai. lekin pata nahin kyon korona ke mareez aa hee nahin rahe hain.

mareej: are, doktar saahab aisa na kahen. shubh bolie. na aaen to achchha hai.

doktar: aaenge kahaan se...saare korona vaayaras to shaaheenabaag mein baithe hain....shaaheenabaag #korona vaayaras hai.


mareez: doktar saahab, korona vaayaras to mujhe neta lagate hain. yah poora desh netaon kee shakl mein #koronaavaayaras banakar
hamen khatm kar raha hai. hamen baant raha hai. hamen tod raha hai. ham taiks peyars ko jazbaatee banaakar neta naam ka #vaayaras hamen hee maar raha hai.

doktar: aap nahin samajhoge. #shaaheenabaag mein baithe korona vaayaras jyaada khataranaak hain. ...lao, parcha do. kya naam hai aapaka...?

ek any mareez ka pravesh...


doosara mareez: #doktar saahab, mere kinaare vaale daant mein bahut dard ho raha hai. nikalavaane mein kitana paisa lagega?

doktar: bina dekhe nahin bata sakata. #daant kis tarah ka hai. dekhakar hee paise bataoonga. chalo baitho, dekhata hoon.

doosara mareej: par, #doktar saahab bina paisa pata kie main nahin dikha sakata. utane paise hon ya na hon, mere paas.

doktar: are #malayaalee ho kya, itanee see baat samajh mein nahin aatee.

doosara mareej: doktar saahab, #bihaar ka hoon. sab samajh mein aata hai. shaam tak aata hoon.

doktar: kya shaaheenabaag ja rahe ho?


doosara mareej: ye kahaan hai doktar saahab, kya vahaan bhee isaka ilaaj hota hai?

doktar: haan, vahaan muft ilaaj ho raha hai.

doosara mareej chala jaata hai.

pahala mareej: doktar saahab, aaj aapako kya ho gaya hai? shaaheenabaag kyon haavee hai?

doktar : are jeena haraam kar diya hai. desh aage badh nahin raha. jahaan dekho shaaheenabaag...kab tak bardaasht karen.

pahala mareej: doktar saahab, lekin diqqat kya hai shaaheenabaag se?

doktar: ye aap nahin samajhenge. diqqat yahee hai. jis din aap jaise samajh jaenge, saare shaaheenabaagon ka khel khatm ho jaega.

pahala mareej: aur #netaon ka khel?

doktar: netaon se shaaheenabaag jyaada khataranaak hain....achchha lao, parchee nahin dee aapane...

pahala mareej: (parchee mez par rakhate hue)...par doktar saahab, aapako aise nahin bolana chaahie. aap doktar hain. har koee aapake yahaan aata hai.

doktar: are bhaee bolana padata hai....aap nahin samajh paoge ise...

-Yusuf kirmani



Shaheenbagh : Doctor - Patient Dialogue
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A city in Delhi NCR ...

Patient: Doctor, saw the poster of Corona virus medicine being found in your nursing home as well.

Doctor: Yes, that one doctor sits here with us. We have rented her to the Chamber. But do not know why Corona patients are not coming.

Patient: Hey, doctor, don't say that. Say good luck It is good if they are not coming.

Doctor: yes...how will they come ... all the #corona viruses are sitting in #Shaheenbagh ... Shaheenbagh is #CoronaVirus .

Patient: Doctor, our political leaders are Corona virus. This whole country has become Coronavirus in the shape of leaders. 
They are dividing us, breaking us. The #virus leader is killing us. We the #taxpayers facing all this nonsenses.

Doctor: You will not understand. Corona virus sitting in Shaheenbagh is more dangerous. ... Ok, give me your slip...what’s your name...?

Another patient enters...

Second patient: #Doc sir, my side tooth is hurting a lot. How much money will it take to get out?

Doctor: Can't tell without looking. What kind of tooth is it? I will tell you the #money after seeing it...sit down, I will see.

Second patient: But, #Doctor sir I can't show without knowing the money. Whether I have that much money or not. Tell me first.

Doctor: Are you #Malayali ? I can’t explain you so much.

Second patient: #Doctor sir, you are judging me. I am from #Bihar. I know better, what are saying. I will come in evening.

Doctor: Are you going to Shaheen Bagh?

Second patient: Where is this, doctor, is it also treated there?

Doctor: Yes, there is free treatment.

The other patient goes away.

First patient: Doctor, what has happened to you today? Why does Shaheenbagh dominate?

Doctor: They are hell. The #country is not moving forward. Wherever you look, Shaheen Bagh… how long this Shaheenbagh prevail.

First patient: Doctor, but what is the problem with Shaheen Bagh?

Doctor: You will not understand this. This is the problem On the day you understand, the game of all Shaheen Bagas will be over.

First Patient: And the Leaders' Game?

Doctor: Shaheen Bagh is more dangerous than the #leaders… Well, you did not give the slip…

First patient: (keeping the slip on the table) ... But doctor, you should not speak like that. You are a doctor. Everyone comes to you.

Doctor: Hey brother, sometimes we have to speak… you will not understand this. 

-Yusuf Kirmani