Wednesday, December 25, 2019

क्या एनपीआर ही एनआरसी है, क्या शक्तिमान ही गंगाधर है

एनपीआर जो है वो एनआरसी से ख़तरनाक कैसे है...

आज हमने काफ़ी वक्त एनपीआर को समझने में लगाया, जिसके बारे में सरकार ने कल विस्तार से जानकारी दी थी...

जब आप एनपीआर को पढ़ना शुरू करेंगे तो आपको सब कुछ अच्छा और आसान लगेगा लेकिन अगर आप उस लाइन को भी सरसरी तौर पर पढ़ कर आगे बढ़ गए तो समझिए आप सरकार के इरादे नहीं भाँप पाए...




केंद्र सरकार ने कहा कि आपकी सारी जानकारियों का सत्यापन एक रजिस्ट्रार स्तर का कोई अधिकारी करेगा। उसकी पुष्टि के बाद आप का नाम और नागरिकता एक रजिस्टर में दर्ज हो जाएगा। इस एनपीआर का यही नियम सबसे ख़तरनाक है।

हमने असम में देखा कि 19 लाख लोगों के नाम नागरिकता कानून से बाहर कर दिए गए। ये 19 लाख वो लोग हैं जिन्होंने दस्तावेज़ तो जमा कराये लेकिन उनमें कोई न कोई कमी निकालकर उनकी एंट्री को ख़ारिज करके उन्हें विदेशी बता दिया गया। इनमें 13 लाख हिंदू और 6 लाख मुसलमान हैं। इसी वजह से असम के लोग एनआरसी और एनपीआर का विरोध कर रहे हैं। 

केंद्र सरकार #एनपीआर में बॉयोमीट्रिक (आपकी ऊँगली और हथेली के नि़शान) लेगी या नहीं लेगी, इसे साफ़ नहीं कर रही है। कभी कहती है लेगी कभी कहती है नहीं लेगी। आप इस मामले में ज़रूर कोई गड़बड़झाला करना चाहते हैं। ...और सबसे बड़ी बात - अभी संदिग्ध नागरिक की परिभाषा तय होना है। और वह उस रजिस्ट्रार या उस अधिकारी के रहमोकरम पर होगा जि

जिस तरह से #एनआरसी को लेकर प्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री ने झूठ बोला उसे देखते हुए यह कैसे यक़ीन किया जाए कि भाजपा शासित राज्यों में वहाँ के अधिकारी सरकार के इशारे पर जिसकी चाहेंगे सिर्फ उसी की नागरिकता की पुष्टि करेंगे। अभी हमने यूपी में देखा वहाँ के #नाज़ी मुख्यमंत्री ने बदला लेने वाला बयान दिया। मोदी ने कपड़े से पहचान वाला बयान दिया, उसके कथित अनुशासित #यूपीपुलिस हिंसा पर उतर आई। एएमयू में पुलिस को साम्प्रदायिक नारे लगाते देखा गया। तमाम शहरों और क़स्बों में पुलिस और #आरएसएस के लोगों ने समुदाय विशेष को चुनकर निशाना बनाया। खुद बदमाशी की और इल्ज़ाम समुदाय विशेष पर लगाया। 

केंद्र सरकार ने एनपीआर को लेकर कहा कि एक ऐप के ज़रिए एनपीआर की सारी जानकारी भरनी होगी। ...जिस देश में अभी डिजिटल होने के लिए सरकार का अभियान जारी है, वहाँ आप ऐप के ज़रिए एनपीआर डिटेल माँग रहे हैं। मोदी और शाह को समझना होगा कि यह #भाजपा की सदस्यता लेने का अभियान नहीं है जहाँ मात्र मिस कॉल देने पर आप भाजपा के सदस्य बन जाते हैं। सरकार के मुताबिक़ 43 करोड़ 70 लाख लोग असंगठित क्षेत्र में लोग काम कर रहे हैं। 4 करोड़ 40 लाख लोग निर्माण क्षेत्र में लगे मज़दूर भी हैं। यह लोग डिजटली कितने निपुण लोग हैं, सरकार को यह अच्छी तरह मालूम है। इनके एनपीआर का क्या होगा? अभी फुटपाथ पर रात काटने वालों, भिखारियों की बात नहीं हो रही है। सेमी स्किल्ड लोगों की बात नहीं हो रही है।

केंद्र सरकार संसद को बता चुकी है कि एनपीआर पूरा होने के बाद जिन लोगों की पुष्टि हो जाएगी उनके नाम एक रजिस्टर में दर्ज हो जाएँगे। उनको एक राष्ट्रीय पहचानपत्र दिया जाएगा। ...यह एनआरसी नहीं है तो क्या है? 
2017 का आँकड़ा है, सरकार ने आधार बनाने और लोगों तक पहुँचाने पर 9055 करोड़ रूपये ख़र्च किए हैं। आप आधार को ही राष्ट्रीय पहचानपत्र क्यों नहीं मान लेते? 

अब सरकार जनता के पैसे को जो कई अरब रूपये होंगे, एनपीआर पर ख़र्च करेगी। आप जनता से 70 हज़ार करोड़ शिक्षा सेस के नाम पर वसूल चुके हैं। ...और जैसा कि रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन  ने बॉलिवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत को जवाब देते हुए कहा कि भारत की ग़रीब और अमीर जनता क़दम कदम पर किसी भी सामान की ख़रीदारी करते हुए टैक्स चुकाती है। कंगना ने जेएनयू और जामिया के छात्रों के संदर्भ में कहा था कि ये हम जैसे इनकम टैक्स देने वालों के पैसे से पढ़ रहे हैं। 

अभी बहुत सारी बातें हैं जो और भी लीगल एक्सपर्ट बता रहे हैं। वो सामने आएँगी। कुल मिलाकर एनपीआर भी एनआरसी का ही हिस्सा है। सरकार जो सूचनाएँ एनआरसी के ज़रिए चाहती थी वह अब एनपीआर के ज़रिए माँगी जाएगी। इसलिए एनपीआर और #सीएए का शांतिपूर्ण विरोध तब तक जारी रहना चाहिए जब तक यह  वापस नहीं हो जाता है। #अर्बननाज़ी से छुटकारा पाने का यह सुनहरा मौक़ा है। 

#RejectNPR #RejectCAA  #RejectUrbanNazi




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