अयोध्या को लेकर फिक्रमंद नहीं हैं मुसलमान...


मेरा यह लेख आज 6 दिसंबर 2019 को नवभारत टाइम्स के सभी संस्करणों में प्रकाशित हो चुका है। यहां 
हिंदीवाणी के पाठकों के लिए पेश है...इसे एनबीटी की आनलाइन साइट पर भी पढ़ सकते हैं। उसका लिंक इस लेख के अंत में मिलेगा...

अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बावजूद बिछी राजनीतिक बिसात सिमटने का नाम नहीं ले रही है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने कहा है कि 99 फीसदी मुसलमान चाहते हैं कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की जाए। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक केंद्र सरकार को एक ट्रस्ट बनाना था जो अयोध्या में राम मंदिर का काम संभालेगी। 25 दिन से ज्यादा हो चुका है लेकिन ट्रस्ट नहीं बना। इस ट्रस्ट में जगह पाने के लिए तमाम साधु संतों के अखाड़े और कई स्वयंभू बाबा अलग तरह की राजनीति में व्यस्त हैं। यह भी ठीक है कि अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस मामले में तटस्थ चल रहे लोगों के गले भी नहीं उतरा और उसके तमाम विरोधाभास को लेकर बहस अभी भी जारी है। लेकिन यहां जेरे बहस 99 फीसदी मुसलमानों के नाम पर दायर की गई याचिका है। इत्तेफाक से यह याचिका 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद की शहादत के 27 साल पूरे होने से ठीक पहले दायर की गई है। 




जमीयत खुद को मुसलमानों की सबसे बड़ी संस्था बताती है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के 101 संस्थापक सदस्य हैं। जिसमें तमाम फिरकों के मौलाना और आलिम लोग शामिल हैं। फैसला आने के बाद बोर्ड ने अपनी कुछ बैठकें कीं और इस नतीजे पर जा पहुंचे कि देश के 99 फीसदी मुसलमान पुनर्विचार याचिका दायर किए जाने पर सहमत हैं। इसलिए उसने पुनर्विचार याचिका दायर करने का फैसला लिया। बोर्ड के सदस्यों के पास पता नहीं कौन सा औजार है जिसके जरिए वह इस नतीजे पर जा पहुंचा कि जो बोर्ड चाहता है वही 99 फीसदी मुसलमान भी चाहते हैं। बोर्ड अगर अपने 101 सदस्यों के बीच वोटिंग कराए तो भी उसे उसमें भी 99 फीसदी सदस्यों की राय पुनर्विचार याचिका के पक्ष में नहीं मिलेगी। बोर्ड अगर इसे 99 फीसदी मुसलमानों की राय न बताकर खुद अपने संगठन की हैसियत से याचिका दायर करने की बात कहता तो उसकी फिक्र पर किसी को ऐतराज नहीं होता। जिस बोर्ड के गठन में दस फीसदी आम मुसलमान शामिल नहीं है, वह बोर्ड 99 फीसदी मुसलमानों की आड़ लेकर क्यों अपनी राजनीति बाकी मुसलमानों पर थोपना चाहता है ?  

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने अयोध्या पर फैसला आने से पहले आरएसएस चीफ मोहन भागवत से दिल्ली में आरएसएस मुख्यालय केशव कुंज में जाकर मुलाकात की। कहने को तो मदनी को वहां एक कार्यक्रम में बुलाया गया था लेकिन मदनी और भागवत डेढ़ घंटे तक बात करते रहे। यह मुलाकात रणनीतिक थी या शिष्टाचार कोई नहीं जानता। अयोध्या पर फैसला इसके बाद आया और जमीयत और मदनी के बयान इस मुद्दे पर तीखे से तीखे होते गए और बोर्ड से भी पहले उसने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी। मदनी साहब को अयोध्या मामले की तो चिंता थी लेकिन नागरिक संशोधन विधेयक और नागरिक पंजीकरण रजिस्टर (एनआरसी) पर उन्होंने भागवत से मुसलमानों की चिंता साझा नहीं की और न ही इस बात पर मना सके कि दोनों बिलों में मुसलमानों के साथ कोई शातिरपना नहीं होगा।
 
मेरे जैसे तमाम लोगों के पास ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि पुनर्विचार याचिका दायर करने से पहले जमीयत उलेमा-ए-हिंद या बोर्ड ने मुसलमानों की राय जानने के लिए उनके बीच खुद या किसी एजेंसी से कोई सर्वे कराया हो। अयोध्या पर फैसला आने से पहले देश की तमाम मस्जिदों में जुमे के खुतबे में मौलानाओं ने यह अपील जरूर की थी कि शांति बनाए रखें। लेकिन फैसला आने के बाद देश की किसी मस्जिद में किसी जुमे में किसी मौलाना को यह खुतबा पढ़ते नहीं सुना गया कि इस इलाके के मुसलमान बाबरी मस्जिद मामले में पुनर्विचार याचिका दायर करने की मांग करते हैं या इस सिलसिले में बोर्ड या जमीयत की मांग का समर्थन करते हैं। अगर इस तरह की अपील एक भी मस्जिद में हुई होती तो मुस्लिमों को लेकर जिस तरह से मीडिया के एक बड़े वर्ग में पूर्वाग्रह पाया जा रहा है, वह इसके प्रचार प्रसार में कोई कमी नहीं छोड़ता। खुद बोर्ड या जमीयत भी अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऐसे कदम की जानकारी जरूर देते। इसलिए बोर्ड या जमीयत का यह कहना कि 99 फीसदी मुसलमानों की राय पुनर्विचार याचिका दायर किए जाने के पक्ष में है, गुमराह करने वाली बात है।

मुसलमानों में अदालत के फैसले को लेकर रंज और गुस्सा जरूर है लेकिन असहमत होते हुए भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले को उन्होंने स्वीकार कर लिया है। इसका जो भी मतलब लगाया जाए। 6 दिसंबर की घटना को भी उन्होंने लगभग भुला ही दिया है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद देश के किसी भी शहर में एक भी जुलूस या जलसा इस फैसले के खिलाफ न होना, इसी का संकेत देता है। किसी भी मुस्लिम संगठन ने प्रतीक रूप में ही सही, फैसले के विरोध में किसी तरह का आयोजन नहीं किया। कुछ मुस्लिम सिलेब्रिटीज ने तो आगे आकर यह तक कहा कि इतिहास का एक अध्याय खत्म हुआ...आगे बढ़ते हैं। इस मामले में पुनर्विचार याचिका दायर करने की जरूरत नहीं है। अलबत्ता ये लोग पांच एकड़ जमीन सरकार से ली जाय या न ली जाय इस पर बंटे जरूर नजर आए। हैरानी की बात है कि अभी तक जमीयत, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड समेत तमाम मुस्लिम संगठनों ने जमीन लेने या न लेने के मुद्दे पर मुसलमानों की राय जानने के लिए कोई पहल नहीं की। अयोध्या पर फैसले के बाद देश के कई शहरों में बड़े-बड़े इज्तेमा (धार्मिक कार्यक्रम) और उर्स तो आयोजित किए गए लेकिन उनमें भी वहां आए लाखों मुसलमानों की राय नहीं पूछी गई।

बोर्ड की 1972 में जब स्थापना हुई थी तो उसके तमाम मकसदों में मुसलमानों में शिक्षा को बढ़ावा देने का भी मकसद शामिल था। लेकिन बोर्ड ने मुसलमानों में शिक्षा के लिए कोई बड़ा आंदोलन छेड़ा हो, याद नहीं आता। सरकार ने जब मदरसा तालीम के मामले में छेड़छाड़ की कोशिश की तो जरूर बोर्ड खड़ा हुआ। बोर्ड के कुछ संस्थापक सदस्यों के अपने कॉलेज चलते हैं लेकिन वो पूर्ण रूप से व्यावसायिक कॉलेज हैं जहां मोटी फीस देकर हर धर्म के छात्र-छात्राओं को प्रवेश मिलता है। उनमें मुसलमान बच्चों के लिए किसी तरह की कोई छूट नहीं है। यहां तक कि मुसलमान मालिकों वाले कुछ शिक्षण संस्थाओं की सारी कमान दूसरे धर्म या वर्ग के लोगों के पास है। तमाम तरह के सही-गलत धंधे में इन लोगों का सर्व धर्म संभाव देखते ही बनता है। मदरसा तालीम पर बोर्ड, जमीयत और दीगर मुस्लिम संगठनों के जोर की वजह से तमाम बेहतरीन मदरसे भी सरकार और कुछ राजनीतिक दलों की गैर जरूरी आलोचना के निशाने पर आ गए हैं। इसी तरह जमीयत की स्थापना आजादी से पहले 1919 में हुई। स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी भूमिका से भी इनकार नहीं। इसके बावजूद जमीयत देश में मुसलमानों के बीच कोई बड़ा सुधार आंदोलन नहीं खड़ा कर पाया। किसी मुद्दे पर हजारों लोगों के साथ प्रदर्शन अलग बात है और किसी मुद्दे पर सुधार आंदोलन चलाना मुख्तलिफ बात है।
 
सर सैयद अहमद अगर 1875 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) खड़ी करके न जाते तो आज बोर्ड या जमीयत के पास मुस्लिम गौरव के नाम पर यह भी बताने के लिए नहीं होता। इसी तरह दक्षिण भारत में हैदराबाद की उस्मानिया यूनिवर्सिटी मीर उस्मान अली खान (7वें निजाम हैदराबाद) ने 1918 में खड़ी की। एएमयू या उस्मानिया की स्थापना से किसी मुस्लिम संगठन या दल का दूर-दूर तक कोई मामूली सा भी वास्ता नहीं है। ये महान व्यक्तिगत प्रयास थे। अभी की जरूरत यह है कि मुसलमानों को संवेदनशील मुद्दों में न उलझाकर और सरकार से किसी उम्मीद की दरकार किए बिना उनकी तरक्की के लिए ठोस आंदोलन चलाए जाएं। आप राजनीति जरूर करें लेकिन मुसलमानों की राय बताकर राजनीति करने से बाज़ आएं। अयोध्या से भी बड़ा मुद्दा मुसलमानों के लिए फिलहाल नागरिकता संशोधन बिल और राष्ट्रीय नागरिकता पंजीकरण रजिस्टर है, जिसे लेकर इन संगठनों के पास कोई रणनीति नहीं है।


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https://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/nbteditpage/muslims-dont-care-about-ayodhya-verdict/ 

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