Wednesday, December 25, 2019

क्या एनपीआर ही एनआरसी है, क्या शक्तिमान ही गंगाधर है

एनपीआर जो है वो एनआरसी से ख़तरनाक कैसे है...

आज हमने काफ़ी वक्त एनपीआर को समझने में लगाया, जिसके बारे में सरकार ने कल विस्तार से जानकारी दी थी...

जब आप एनपीआर को पढ़ना शुरू करेंगे तो आपको सब कुछ अच्छा और आसान लगेगा लेकिन अगर आप उस लाइन को भी सरसरी तौर पर पढ़ कर आगे बढ़ गए तो समझिए आप सरकार के इरादे नहीं भाँप पाए...




केंद्र सरकार ने कहा कि आपकी सारी जानकारियों का सत्यापन एक रजिस्ट्रार स्तर का कोई अधिकारी करेगा। उसकी पुष्टि के बाद आप का नाम और नागरिकता एक रजिस्टर में दर्ज हो जाएगा। इस एनपीआर का यही नियम सबसे ख़तरनाक है।

हमने असम में देखा कि 19 लाख लोगों के नाम नागरिकता कानून से बाहर कर दिए गए। ये 19 लाख वो लोग हैं जिन्होंने दस्तावेज़ तो जमा कराये लेकिन उनमें कोई न कोई कमी निकालकर उनकी एंट्री को ख़ारिज करके उन्हें विदेशी बता दिया गया। इनमें 13 लाख हिंदू और 6 लाख मुसलमान हैं। इसी वजह से असम के लोग एनआरसी और एनपीआर का विरोध कर रहे हैं। 

केंद्र सरकार #एनपीआर में बॉयोमीट्रिक (आपकी ऊँगली और हथेली के नि़शान) लेगी या नहीं लेगी, इसे साफ़ नहीं कर रही है। कभी कहती है लेगी कभी कहती है नहीं लेगी। आप इस मामले में ज़रूर कोई गड़बड़झाला करना चाहते हैं। ...और सबसे बड़ी बात - अभी संदिग्ध नागरिक की परिभाषा तय होना है। और वह उस रजिस्ट्रार या उस अधिकारी के रहमोकरम पर होगा जि

जिस तरह से #एनआरसी को लेकर प्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री ने झूठ बोला उसे देखते हुए यह कैसे यक़ीन किया जाए कि भाजपा शासित राज्यों में वहाँ के अधिकारी सरकार के इशारे पर जिसकी चाहेंगे सिर्फ उसी की नागरिकता की पुष्टि करेंगे। अभी हमने यूपी में देखा वहाँ के #नाज़ी मुख्यमंत्री ने बदला लेने वाला बयान दिया। मोदी ने कपड़े से पहचान वाला बयान दिया, उसके कथित अनुशासित #यूपीपुलिस हिंसा पर उतर आई। एएमयू में पुलिस को साम्प्रदायिक नारे लगाते देखा गया। तमाम शहरों और क़स्बों में पुलिस और #आरएसएस के लोगों ने समुदाय विशेष को चुनकर निशाना बनाया। खुद बदमाशी की और इल्ज़ाम समुदाय विशेष पर लगाया। 

केंद्र सरकार ने एनपीआर को लेकर कहा कि एक ऐप के ज़रिए एनपीआर की सारी जानकारी भरनी होगी। ...जिस देश में अभी डिजिटल होने के लिए सरकार का अभियान जारी है, वहाँ आप ऐप के ज़रिए एनपीआर डिटेल माँग रहे हैं। मोदी और शाह को समझना होगा कि यह #भाजपा की सदस्यता लेने का अभियान नहीं है जहाँ मात्र मिस कॉल देने पर आप भाजपा के सदस्य बन जाते हैं। सरकार के मुताबिक़ 43 करोड़ 70 लाख लोग असंगठित क्षेत्र में लोग काम कर रहे हैं। 4 करोड़ 40 लाख लोग निर्माण क्षेत्र में लगे मज़दूर भी हैं। यह लोग डिजटली कितने निपुण लोग हैं, सरकार को यह अच्छी तरह मालूम है। इनके एनपीआर का क्या होगा? अभी फुटपाथ पर रात काटने वालों, भिखारियों की बात नहीं हो रही है। सेमी स्किल्ड लोगों की बात नहीं हो रही है।

केंद्र सरकार संसद को बता चुकी है कि एनपीआर पूरा होने के बाद जिन लोगों की पुष्टि हो जाएगी उनके नाम एक रजिस्टर में दर्ज हो जाएँगे। उनको एक राष्ट्रीय पहचानपत्र दिया जाएगा। ...यह एनआरसी नहीं है तो क्या है? 
2017 का आँकड़ा है, सरकार ने आधार बनाने और लोगों तक पहुँचाने पर 9055 करोड़ रूपये ख़र्च किए हैं। आप आधार को ही राष्ट्रीय पहचानपत्र क्यों नहीं मान लेते? 

अब सरकार जनता के पैसे को जो कई अरब रूपये होंगे, एनपीआर पर ख़र्च करेगी। आप जनता से 70 हज़ार करोड़ शिक्षा सेस के नाम पर वसूल चुके हैं। ...और जैसा कि रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन  ने बॉलिवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत को जवाब देते हुए कहा कि भारत की ग़रीब और अमीर जनता क़दम कदम पर किसी भी सामान की ख़रीदारी करते हुए टैक्स चुकाती है। कंगना ने जेएनयू और जामिया के छात्रों के संदर्भ में कहा था कि ये हम जैसे इनकम टैक्स देने वालों के पैसे से पढ़ रहे हैं। 

अभी बहुत सारी बातें हैं जो और भी लीगल एक्सपर्ट बता रहे हैं। वो सामने आएँगी। कुल मिलाकर एनपीआर भी एनआरसी का ही हिस्सा है। सरकार जो सूचनाएँ एनआरसी के ज़रिए चाहती थी वह अब एनपीआर के ज़रिए माँगी जाएगी। इसलिए एनपीआर और #सीएए का शांतिपूर्ण विरोध तब तक जारी रहना चाहिए जब तक यह  वापस नहीं हो जाता है। #अर्बननाज़ी से छुटकारा पाने का यह सुनहरा मौक़ा है। 

#RejectNPR #RejectCAA  #RejectUrbanNazi




Tuesday, December 17, 2019

सुन ऐ हुक्मरां, हमारे कपड़ों को न देख, हमारे जेहाद-ए-अकबर को देख

किनारे पर खड़े लोगों, बस इतना ध्यान में रखना
समंदर ज़िद पे आयेगा, तो सबके घर डुबो देगा।
-हुसैन हैदरी, शायर, फ़िल्म गीतकार

kinaare par khade logon, bas itna dhyaan mein rakhna
samandar zidd pe aayega, to sabke ghar dubo dega
-Hussain Haidry, Poet, Film Lyrist

वह लोग जो अभी भी स्टूडेंट्स के शांतिपूर्ण आंदोलन को दूर से नाप तौल रहे हैं, क्या उन्होंने थोड़ी देर इस पर विचार किया कि आंदोलन जेएनयू में भी हुआ और वहाँ के बच्चे भी सड़कों पर आये लेकिन सिर्फ़ जामिया मिल्लिया इस्लामिया और एएमयू में ही पुलिस क्यों हॉस्टल में घुसी और क्यों एक ही पैटर्न के तहत स्टूडेंट्स को पीटा गया?





जामिया और एएमयू के अंदर पुलिस के घुसने का समय शाम का था। एएमयू में तो स्टूडेंट्स न तो सड़कों पर आये और न ही कोई पत्थरबाज़ी की। दिल्ली और यूपी पुलिस में पढ़े लिखे युवक भरती होते हैं और वे जानते हैं कि यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ने वाले बच्चे संजीदा होते हैं। बाहर नारेबाज़ी चल रही थी लेकिन ये बच्चे लाइब्रेरी में पढ़ रहे थे। इसके बावजूद दिल्ली पुलिस और अलीगढ़ पुलिस अंदर घुसी और उन्हें ऐसे पीटा जैसे वह बदमाशों को पीटने का कथित दावा करती है। 

यह बहुत साफ़ है कि केंद्र सरकार के इशारे पर दोनों ही यूनिवर्सिटियों के बच्चों को सबक़ सिखाने के लिए उन पर हमला किया गया।...जेएनयू में पुलिस ऐसा कुछ कभी नहीं कर पाई थी...

....यह सब इसलिए हुआ कि जामिया और एएमयू के बच्चे अपने ख़ास लिबास के लिए जाने जाते हैं। उसने सुबह एक रैली में यह बात कही थी कि हिंसा करने वालों को उनके कपड़ों से पहचाना जा सकता है। इसके फ़ौरन बाद आला अफ़सरों की बैठक हुई और शाम को दोनों यूनिवर्सिटीज में पुलिस ने चढ़ाई कर दी।

...बहरहाल, जिन्हें वह शख़्स और उसकी पुलिस कपड़ों से पहचाने जाने की बात कर रहा है, उस कपड़े को लोगों ने अब कफ़न मान लिया है। वह शख़्स और उसकी पुलिस ने क़ुरान शरीफ़ के बारे में सुना है लेकिन पढ़ा नहीं है। उसमें जेहाद ए अकबर का ज़िक्र आया है। उसका अर्थ है - किसी अच्छे सामाजिक मक़सद के लिए अहिंसात्मक संघर्ष....।

हमारे बच्चे जो अब कर रहे हैं वह जेहाद ए अकबर है और उसका बाक़ायदा उन्हे ज्ञान है कि वो क्या कर रहे हैं। सरकार को समझना होगा कि बच्चों ने अपने कपड़ों को कफ़न समझ लिया है और वे अहिंसक तरीक़े से जेहाद ए अकबर के लिए उतर पड़े हैं। अगर एक बहुत बड़ी आबादी का मामूली हिस्सा अगर जेहाद ए अकबर की ठान लेता है तो शेष अस्सी फ़ीसदी आबादी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहती है। इस तरह यह स्थिति वर्ग संघर्ष में कई बार बदल जाती है। आप सात लाख फ़ौज लगाकर कश्मीर तो नियंत्रित कर सकते हैं लेकिन बीस फ़ीसदी या 35 करोड़ अहिंसक संघर्ष करने वालों को लाठी और बंदूक़ से नियंत्रित नहीं कर सकते। उसका नमूना देश के 45 सरकारी शिक्षण संस्थानों से आ रही आवाज़ों से आप देख ही रहे हैं। अभी प्राइवेट यूनिवर्सिटी और प्राइवेट कॉलेज के बच्चे तो इस जेहाद ए अकबर के लिए तैयार नहीं हुए हैं। 

यह हिटलर और गोएबल्स जैसा ही गेम है...दोनों की जोड़ी इतिहास में बेहद ख़तरनाक जोड़ी मानी गई है। दोनों अपने शासन की नाकामी छिपाने के लिए नाज़ी जर्मनी को गैस चैंबर तो बना देते हैं लेकिन उनका अंत भी उसी गैस चैंबर में होता है। हिटलर और गोएबल्स से भी पहले फिरौन और यज़ीद जैसे शासकों के नाम आए हैं उनका अंत भी इसी तरह हुआ। फिरौन को तो खुद को खुदा होने का भ्रम था। लेकिन क़ाबा में जब तमाम खुदाओं के बुतों को गिराया गया तो उन खुदाओं के भक्तों का भ्रम दूर हुआ कि दरअसल जिसे वे खुदा मानते या समझते थे वह अजेय नहीं था। मरहूम हबीब जालिब साहब ने ये अशार यूँ ही नहीं लिखे थे - 

तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था 
उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था।

कोई ठहरा हो जो लोगों के मुक़ाबिल तो बताओ 
वो कहाँ हैं कि जिन्हें नाज़ बहुत अपने तईं था।

इस आंदोलन या जेहाद ए अकबर के स्वत: स्फूर्त फूटने ने विपक्ष समेत सारे राजनीतिक दलों को बौना साबित कर दिया है। कमज़ोर  विपक्ष हालात का आकलन करने में नाकाम रहा है। असम में जब इस फासिस्ट सरकार ने एनआरसी लागू किया था तो उसी समय राष्ट्रीय आंदोलन खड़ा किए जाने की ज़रूरत थी। लेकिन विपक्ष बस तमाशबीन रहा। ज़रा सोचिए जिस राज्य में 19 लाख लोग एनआरसी लिस्ट से बाहर कर डिटेंशन सेंटरों में डाल दिए गए हों और जिस राज्य के लोगों ने कई महीने पहले इस कानून को रिजेक्ट कर दिया हो, इसके बावजूद विपक्ष चुप्पी साधे रहा। असम के लोग अकेले हालात का सामना करते रहे। जबकि असम में एनआरसी आने के समय ही केंद्र की फासिस्ट सरकार बार बार यह ऐलान कर रही थी कि पूरे देश में एनआरसी लागू करेंगे। क्या उसी समय से विपक्ष को एक्टिव मोड में नहीं आना चाहिए था? लेकिन जिस तरह उस शख़्स को विशेष कपड़ा पहनकर आंदोलन करने का इंतज़ार था, ठीक उसी तरह विपक्ष को भी वही इंतज़ार था कि लोग पहले खुद विरोध में खड़े हों तो वह भी अखाड़े में कूदेगा। ख़ैर, देर आयद दुरुस्त आयद, विपक्ष को इस अकबर ए जेहाद का नेतृत्व संभाल लेना चाहिए। आंदोलनकारी युवकों और जनता को भी चाहिए कि वह विपक्ष को ही इस आंदोलन का नेतृत्व सौंप कर विपक्ष के साथ खड़ी हो जाए।









Friday, December 6, 2019

अयोध्या को लेकर फिक्रमंद नहीं हैं मुसलमान...


मेरा यह लेख आज 6 दिसंबर 2019 को नवभारत टाइम्स के सभी संस्करणों में प्रकाशित हो चुका है। यहां 
हिंदीवाणी के पाठकों के लिए पेश है...इसे एनबीटी की आनलाइन साइट पर भी पढ़ सकते हैं। उसका लिंक इस लेख के अंत में मिलेगा...

अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बावजूद बिछी राजनीतिक बिसात सिमटने का नाम नहीं ले रही है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने कहा है कि 99 फीसदी मुसलमान चाहते हैं कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की जाए। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक केंद्र सरकार को एक ट्रस्ट बनाना था जो अयोध्या में राम मंदिर का काम संभालेगी। 25 दिन से ज्यादा हो चुका है लेकिन ट्रस्ट नहीं बना। इस ट्रस्ट में जगह पाने के लिए तमाम साधु संतों के अखाड़े और कई स्वयंभू बाबा अलग तरह की राजनीति में व्यस्त हैं। यह भी ठीक है कि अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस मामले में तटस्थ चल रहे लोगों के गले भी नहीं उतरा और उसके तमाम विरोधाभास को लेकर बहस अभी भी जारी है। लेकिन यहां जेरे बहस 99 फीसदी मुसलमानों के नाम पर दायर की गई याचिका है। इत्तेफाक से यह याचिका 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद की शहादत के 27 साल पूरे होने से ठीक पहले दायर की गई है। 




जमीयत खुद को मुसलमानों की सबसे बड़ी संस्था बताती है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के 101 संस्थापक सदस्य हैं। जिसमें तमाम फिरकों के मौलाना और आलिम लोग शामिल हैं। फैसला आने के बाद बोर्ड ने अपनी कुछ बैठकें कीं और इस नतीजे पर जा पहुंचे कि देश के 99 फीसदी मुसलमान पुनर्विचार याचिका दायर किए जाने पर सहमत हैं। इसलिए उसने पुनर्विचार याचिका दायर करने का फैसला लिया। बोर्ड के सदस्यों के पास पता नहीं कौन सा औजार है जिसके जरिए वह इस नतीजे पर जा पहुंचा कि जो बोर्ड चाहता है वही 99 फीसदी मुसलमान भी चाहते हैं। बोर्ड अगर अपने 101 सदस्यों के बीच वोटिंग कराए तो भी उसे उसमें भी 99 फीसदी सदस्यों की राय पुनर्विचार याचिका के पक्ष में नहीं मिलेगी। बोर्ड अगर इसे 99 फीसदी मुसलमानों की राय न बताकर खुद अपने संगठन की हैसियत से याचिका दायर करने की बात कहता तो उसकी फिक्र पर किसी को ऐतराज नहीं होता। जिस बोर्ड के गठन में दस फीसदी आम मुसलमान शामिल नहीं है, वह बोर्ड 99 फीसदी मुसलमानों की आड़ लेकर क्यों अपनी राजनीति बाकी मुसलमानों पर थोपना चाहता है ?  

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने अयोध्या पर फैसला आने से पहले आरएसएस चीफ मोहन भागवत से दिल्ली में आरएसएस मुख्यालय केशव कुंज में जाकर मुलाकात की। कहने को तो मदनी को वहां एक कार्यक्रम में बुलाया गया था लेकिन मदनी और भागवत डेढ़ घंटे तक बात करते रहे। यह मुलाकात रणनीतिक थी या शिष्टाचार कोई नहीं जानता। अयोध्या पर फैसला इसके बाद आया और जमीयत और मदनी के बयान इस मुद्दे पर तीखे से तीखे होते गए और बोर्ड से भी पहले उसने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी। मदनी साहब को अयोध्या मामले की तो चिंता थी लेकिन नागरिक संशोधन विधेयक और नागरिक पंजीकरण रजिस्टर (एनआरसी) पर उन्होंने भागवत से मुसलमानों की चिंता साझा नहीं की और न ही इस बात पर मना सके कि दोनों बिलों में मुसलमानों के साथ कोई शातिरपना नहीं होगा।
 
मेरे जैसे तमाम लोगों के पास ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि पुनर्विचार याचिका दायर करने से पहले जमीयत उलेमा-ए-हिंद या बोर्ड ने मुसलमानों की राय जानने के लिए उनके बीच खुद या किसी एजेंसी से कोई सर्वे कराया हो। अयोध्या पर फैसला आने से पहले देश की तमाम मस्जिदों में जुमे के खुतबे में मौलानाओं ने यह अपील जरूर की थी कि शांति बनाए रखें। लेकिन फैसला आने के बाद देश की किसी मस्जिद में किसी जुमे में किसी मौलाना को यह खुतबा पढ़ते नहीं सुना गया कि इस इलाके के मुसलमान बाबरी मस्जिद मामले में पुनर्विचार याचिका दायर करने की मांग करते हैं या इस सिलसिले में बोर्ड या जमीयत की मांग का समर्थन करते हैं। अगर इस तरह की अपील एक भी मस्जिद में हुई होती तो मुस्लिमों को लेकर जिस तरह से मीडिया के एक बड़े वर्ग में पूर्वाग्रह पाया जा रहा है, वह इसके प्रचार प्रसार में कोई कमी नहीं छोड़ता। खुद बोर्ड या जमीयत भी अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऐसे कदम की जानकारी जरूर देते। इसलिए बोर्ड या जमीयत का यह कहना कि 99 फीसदी मुसलमानों की राय पुनर्विचार याचिका दायर किए जाने के पक्ष में है, गुमराह करने वाली बात है।

मुसलमानों में अदालत के फैसले को लेकर रंज और गुस्सा जरूर है लेकिन असहमत होते हुए भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले को उन्होंने स्वीकार कर लिया है। इसका जो भी मतलब लगाया जाए। 6 दिसंबर की घटना को भी उन्होंने लगभग भुला ही दिया है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद देश के किसी भी शहर में एक भी जुलूस या जलसा इस फैसले के खिलाफ न होना, इसी का संकेत देता है। किसी भी मुस्लिम संगठन ने प्रतीक रूप में ही सही, फैसले के विरोध में किसी तरह का आयोजन नहीं किया। कुछ मुस्लिम सिलेब्रिटीज ने तो आगे आकर यह तक कहा कि इतिहास का एक अध्याय खत्म हुआ...आगे बढ़ते हैं। इस मामले में पुनर्विचार याचिका दायर करने की जरूरत नहीं है। अलबत्ता ये लोग पांच एकड़ जमीन सरकार से ली जाय या न ली जाय इस पर बंटे जरूर नजर आए। हैरानी की बात है कि अभी तक जमीयत, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड समेत तमाम मुस्लिम संगठनों ने जमीन लेने या न लेने के मुद्दे पर मुसलमानों की राय जानने के लिए कोई पहल नहीं की। अयोध्या पर फैसले के बाद देश के कई शहरों में बड़े-बड़े इज्तेमा (धार्मिक कार्यक्रम) और उर्स तो आयोजित किए गए लेकिन उनमें भी वहां आए लाखों मुसलमानों की राय नहीं पूछी गई।

बोर्ड की 1972 में जब स्थापना हुई थी तो उसके तमाम मकसदों में मुसलमानों में शिक्षा को बढ़ावा देने का भी मकसद शामिल था। लेकिन बोर्ड ने मुसलमानों में शिक्षा के लिए कोई बड़ा आंदोलन छेड़ा हो, याद नहीं आता। सरकार ने जब मदरसा तालीम के मामले में छेड़छाड़ की कोशिश की तो जरूर बोर्ड खड़ा हुआ। बोर्ड के कुछ संस्थापक सदस्यों के अपने कॉलेज चलते हैं लेकिन वो पूर्ण रूप से व्यावसायिक कॉलेज हैं जहां मोटी फीस देकर हर धर्म के छात्र-छात्राओं को प्रवेश मिलता है। उनमें मुसलमान बच्चों के लिए किसी तरह की कोई छूट नहीं है। यहां तक कि मुसलमान मालिकों वाले कुछ शिक्षण संस्थाओं की सारी कमान दूसरे धर्म या वर्ग के लोगों के पास है। तमाम तरह के सही-गलत धंधे में इन लोगों का सर्व धर्म संभाव देखते ही बनता है। मदरसा तालीम पर बोर्ड, जमीयत और दीगर मुस्लिम संगठनों के जोर की वजह से तमाम बेहतरीन मदरसे भी सरकार और कुछ राजनीतिक दलों की गैर जरूरी आलोचना के निशाने पर आ गए हैं। इसी तरह जमीयत की स्थापना आजादी से पहले 1919 में हुई। स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी भूमिका से भी इनकार नहीं। इसके बावजूद जमीयत देश में मुसलमानों के बीच कोई बड़ा सुधार आंदोलन नहीं खड़ा कर पाया। किसी मुद्दे पर हजारों लोगों के साथ प्रदर्शन अलग बात है और किसी मुद्दे पर सुधार आंदोलन चलाना मुख्तलिफ बात है।
 
सर सैयद अहमद अगर 1875 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) खड़ी करके न जाते तो आज बोर्ड या जमीयत के पास मुस्लिम गौरव के नाम पर यह भी बताने के लिए नहीं होता। इसी तरह दक्षिण भारत में हैदराबाद की उस्मानिया यूनिवर्सिटी मीर उस्मान अली खान (7वें निजाम हैदराबाद) ने 1918 में खड़ी की। एएमयू या उस्मानिया की स्थापना से किसी मुस्लिम संगठन या दल का दूर-दूर तक कोई मामूली सा भी वास्ता नहीं है। ये महान व्यक्तिगत प्रयास थे। अभी की जरूरत यह है कि मुसलमानों को संवेदनशील मुद्दों में न उलझाकर और सरकार से किसी उम्मीद की दरकार किए बिना उनकी तरक्की के लिए ठोस आंदोलन चलाए जाएं। आप राजनीति जरूर करें लेकिन मुसलमानों की राय बताकर राजनीति करने से बाज़ आएं। अयोध्या से भी बड़ा मुद्दा मुसलमानों के लिए फिलहाल नागरिकता संशोधन बिल और राष्ट्रीय नागरिकता पंजीकरण रजिस्टर है, जिसे लेकर इन संगठनों के पास कोई रणनीति नहीं है।


--एनबीटी की आनलाइन साइट पर पढ़ने के लिए इस लिंक से पहुंचे...

https://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/nbteditpage/muslims-dont-care-about-ayodhya-verdict/