Wednesday, August 28, 2019

कश्मीर डायरी/ मुस्लिम पत्रकार

कांग्रेस और राहुल गांधी की हालत बेचारे मुसलमानों जैसी हो गई है।...जिन पर कभी तरस तो कभी ग़ुस्सा आता है।
राहुल का आज का ट्वीट ही लें...

वह फ़रमा रहे हैं कि भले ही तमाम मुद्दों पर मेरा सरकार के साथ मतभेद है लेकिन मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। पाकिस्तान आतंक को बढ़ावा देने वाला देश है और वह कश्मीर में भी यही कर रहा है।

राहुल के इस बयान की लाचारी समझी जा सकती है कि आरएसएस और भाजपा जिस तरह उनके पाकिस्तानी होने का दुष्प्रचार कर रहे हैं उससे आहत होकर उन्हें यह बयान देना पड़ा। हालाँकि राहुल चाहते तो बयान को संतुलित करने के लिए फिर से कश्मीर के हालात और वहाँ की जनता पर हो रहे अत्याचार पर चिंता जता देते।

अपने निजी जीवन में मैं भी मुसलमानों को इस पसोपेश से जूझते देख रहा हूँ। ...किसी दफ़्तर में अगर दो या तीन मुस्लिम कर्मचारी आपस में खड़े होकर बात कर लें तो पूरे दफ़्तर की नज़र उन्हीं पर होती है। अग़ल बग़ल से निकल रहे लोग टिप्पणी करते हुए निकलेंगे...क्या छन रहा है...क्या साज़िश हो रही है...यहाँ भी एकता कर रहे हो...लेकिन ऐसे लोगों को किन्हीं सुरेश-मुकेश की अकेले में बातचीत के दौरान यह सब नहीं दिखता। ख़ासकर किसी दफ़्तर में पाकिस्तान पर बातचीत यह बहस होने के दौरान मुस्लिम कर्मचारी को बार बार अपने भारतीय होने का सबूत देना पड़ता है। ऐसे सबूत तो अब तथाकथित सेकुलर और वामपंथी भी चाहने लगे हैं।

कल में प्रेस क्लब में था। मैंने देखा कि संयोग से एक ही टेबल तीन ऐसेपत्रकार बैठे थे जो एक ही समुदाय यानी मुसलमान थे। चौथी कुर्सी ख़ाली थी। इतने में वहाँ एक और पत्रकार पहुँचे और बोला कि क्या कश्मीर पर खिचड़ी पका रहे हो। मैं तो जाट हूँ, मुझे भी शामिल कर लो। ख़ैर कुछ मिनट के सांप्रदायिक हंसीमजाक के बाद वह साहब भी वहाँ बैठ गए।

प्रेस क्लब की कल की एक और घटना सुनिए। कश्मीर में अख़बारों पर रोक लगाने और मीडियाकर्मियों की आजादी छीने जाने के विरोध में कल तमाम पत्रकार वहाँ जमा हुए। एक पत्रकार ने अपने संबोधन में कहा कि वह साथी पत्रकारों के बीच जब कश्मीर में मीडिया की आजादी छीने जाने की बात करते हैं तो बाकी साथी पत्रकार उन्हें देशद्रोही औरपाकिस्तानी जैसी फब्तियों से नवाजते हैं।

कल एक अन्य दफ़्तर में गया तो वहाँ एक शख़्स जेटली के नाम पर फ़िरोज़शाह कोटला स्टेडियम का नाम रखे जाने पर ऐतराज़ कर रहा था तो बाकी सारे न सिर्फ जेटली के नाम का समर्थन कर रहे थे बल्कि उससे यह तक कह रहे थे कि तुम तो हो ही पाकिस्तानी, तुम्हें तो देशभक्तों के नाम पर रखे जाने पर ऐतराज़ होगा ही। वे सारे के सारे गिनी पिग यह नहीं बता पा रहे थे कि आख़िर जेटली का दिल्ली के विकास में क्या योगदान है जो उनके नाम पर स्टेडियम का नामकरण कर दिया जाए।...और फिर जेटली तो कोई क्रिकेट खिलाड़ी भी तो नहीं थे।

बहुत पहले लखनऊ के एक संस्थान में मेरे एक बड़े अधिकारी मुझसे मिलने में नज़रें चुराते थे क्योंकि वह मुसलमान थे। जबकि उसी दफ़्तर के मेरे बाकी साथी यह मानते थे कि वह मुझे फ़ेवर करते थे। हालाँकि उनके किसी एक्शन से यह ज़ाहिर नहीं हुआ। क्योंकि पैसे और तरक़्क़ी में मैं ग़ैर मुस्लिमों के मुक़ाबले अंतिम पायदान पर रहता था।

यह घटनाएँ बता रही हैं कि किस रसातल में हम जा रहे हैं। अपने आप को बुद्धिजीवी कहने वाले एक पत्रकार ने हाल ही में मुझसे कहा कि किरमानी जी जानते हैं यह सब क्यों हो रहा है....मेरे नहीं कहने पर उन्होंने कहा कि इस बहुसंख्यक देश में मुसलमानों का तुष्टिकरण बहुत किया गया है। हिंदू अब जाग उठा है इसलिए ये हालात बने हैं।

फ़ेसबुक पर हमारे तमाम साथी इन नाज़ीवादी स्थितियों पर धीरे धीरे चुप्पी साध रहे हैं। वे अर्बन नक्सली बनने के कथित पाप से बचना चाहते हैं लेकिन उन्हें नहीं पता कि वे एक अंधे कुएँ की और बढ़ रहे हैं।...

नोट: मेरी कश्मीर डायरी लगातार लिखी जा रही है। इसी शीर्षक से मेरी पिछली पोस्ट देखने के लिए मेरा फ़ेसबुक पेज देखें। मेरे हिंदीवाणी ब्लॉक पर भी कुछ लेख देखे जा सकते हैं।

#RahulGandhi
#Kashmir

Thursday, August 8, 2019

कश्मीर डायरी/ इतिहास से सीखो


कश्मीर डायरी/ 

बहुत पुरानी कहानी नहीं है
..............................
इराक़ में सद्दाम हुसैन की हुकूमत थी। सद्दाम इराक़ के जिस क़बीले या ग्रुप से था वह अल्पसंख्यक है। इसके बावजूद उसका बहुसंख्यक शिया मुसलमानों पर शासन था। वहाबी विचारधारा से प्रभावित होने की वजह से इराक़ की बहुसंख्यक शिया आबादी पर उसका ज़ुल्म-ओ-सितम सारी हदें पार कर गया था। बहुसंख्यक होने के बावजूद शिया सद्दाम का विरोध इसलिए नहीं कर पा रहे थे कि उन्हें अहिंसा के बारे में चूँकि जन्म से ही शिक्षा मिलती है तो वे सद्दाम का हर ज़ुल्म सह रहे थे।

इसी दौरान अमेरिका ने सद्दाम को पड़ोस के शिया मुल्क ईरान पर हमले के लिए इस्तेमाल किया और अमेरिका की मदद से हमला कर दिया। एक साल तक लड़ाई चली। सद्दाम हार गया और पीछे हट गया। लेकिन इस बहाने अमेरिका इराक़ में जा घुसा। अमेरिका को इराक़ में जाकर यह समझ आया कि सद्दाम तो अल्पसंख्यक है, क्यों न यहाँ बहुसंख्यक शियों में से किसी को खड़ा करके उनकी कठपुतली सरकार बनाई जाए। अमेरिका ने इस नीति को लागू करना शुरू कर दिया। सद्दाम क़ैद कर लिया गया और इराक़ में बहुसंख्यक शिया हुकूमत क़ायम हो गई। 

यहीं पर अमेरिका से एक चूक हो गई। उसकी सारी रणनीति का उस वक़्त पलीता लग गया जब शिया हुकूमत बनते ही उसने ईरान से मदद लेनी, सलाह लेनी शुरू कर दी। नजफ़ में बैठे शिया रहबर हुकूमत को गाइड करने लगे। अब इराक़ में हर काम ईरान के सलाह मशविरे से होता है।

हमारे सामने बांग्लादेश का उदाहरण सामने है। पाकिस्तान का एक हिस्सा जो पूर्वी पाकिस्तान कहलाता था, वहाँ के लोग पाकिस्तान के साथ रहने को तैयार नहीं थे। उनकी भाषा, संस्कृति पूरे पाकिस्तान से अलग थी। उन्होंने बग़ावत कर दी। इंदिरा गांधी की मदद से बांग्लादेश बन गया। इंदिरा को दुर्गा बना दिया गया लेकिन 1977 में जनता ने इंदिरा की कुछ ग़लतियों के लिए उखाड़ फेंका। आज इतिहास में इंदिरा गांधी का मूल्याँकन सिर्फ बांग्लादेश बनवाने के लिए नहीं करता।

इस छोटी सी ऐतिहासिक घटना का ज़िक्र मैंने दरअसल कश्मीर के संदर्भ में किया। कश्मीर में मेरा आना जाना रहा है। यह हक़ीक़त है कि वहाँ की बहुसंख्यक आबादी ने कभी भारत सरकार के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया। लेकिन वहाँ विधानसभा चुनाव होते रहने की वजह से सारी स्थितियाँ ढंकी छिपी थीं और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बना हुआ था। लेकिन संविधान के जिस धागे से कश्मीर बँधा हुआ था उसे अब तोड़ दिया गया है।

आख़िर भारत सरकार वहाँ संगीनों के साये में कितने दिन हुकूमत करेगी। वहाँ के अवाम को साथ लिए बिना मोदी शाह किनका राज वहाँ स्थापित करा पाएँगे। 

मुग़लों ने 600 साल और अंग्रेज़ों ने 200 साल जाहिल व बेवक़ूफ़ बहुसंख्यक भारतीयों पर हुकूमत की लेकिन एक दिन दोनों को बोरिया बिस्तर बाँध कर जाना पड़ा। उनका वजूद सिर्फ ऐतिहासिक इमारतों के रूप में मौजूद है। कश्मीरियों ने अगर कुछ ठान लिया है तो बेशक आप वहाँ एक हज़ार साल फ़ौज के बल पर शासन कर लें आपको कश्मीर वहाँ के लोगों के हवाले करके आना पड़ेगा। अभी तक वहाँ की गतिविधियों में मुट्ठीभर आतंकी पाकिस्तान के इशारे पर हरकतें करते थे लेकिन अब ? क्या वहाँ की जनता की हमदर्दी उन्हें हासिल नहीं हो जाएगी। हालात ये है कि वहाँ की कोई भी राजनीतिक पार्टी और क्षेत्रीय दल अब भाजपा व कांग्रेस के साथ मिलकर काम करने को तैयार नहीं होंगे।

देश में ऐसे दस राज्य हैं जिन्हें कश्मीर की तरह विशेष दर्जा मिला हुआ है। क्या उन राज्यों को अपने नियंत्रण में लेने की जुर्रत, हिमाक़त भारत सरकार कर सकती है ? लेकिन आपने कश्मीर में यह एक ही भूल और हिमाकत इसलिए की है कि वहाँ की बहुसंख्यक आबादी पर आपका़ शासन आपके चुनावी एजेंडे को मुकम्मल करता है।

भारत की जनता अभी जागी नहीं है, वरना उसमें किसी भी नागपुरी एजेंडे को उखाड़ने की ताक़त है। बेशक नागपुरी संतरों को यह ग़लतफ़हमी हो कि वह पूरे देश को नाज़ी विचारधारा में कंडीशन्ड कर चुके हैं लेकिन कही से कोई चिंगारी उड़ेगी और बेईमानी, छल से हासिल किए गए मक़सद को उड़ा देगी।


मोदी आज रात 8 बजे देश को संबंधित करने वाले हैं। इसे 8-8 के संयोग से भक्तों ने जोड़ दिया है। आप लोगों को याद होगा जब पीएम मोदी ने 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी यह कहकर की थी कि इससे आतंकवाद की कमर टूट जाएगी...देश की आर्थिक स्थिति अच्छी हो जाएगी...युवकों को रोज़गार मिलेगा यानी हर बीमारी का इलाज नोटबंदी को बताया गया था। अब वही बातें फिर कश्मीर के संदर्भ में कही जा रही हैं। आज रात देखते हैं कि मोदी जी नया सब्ज़बाग़ क्या दिखाते हैं ? बहरहाल, उन्होंने कश्मीर में अपनी गर्दन फँसा ही दी है।



Saturday, August 3, 2019

गोदी मीडिया पर रवीश का चला बुलडोजर

गोदी मीडिया पर चला रवीश कुमार का बुलडोजर
...................................................................

भारत आज रवीश कुमार Ravish Kumar बन गया है। भारतीय पत्रकारिता के सबसे बुरे दौर में रवीश को रेमन मैगसॉयसॉय पुरस्कार के लिए चुना जाना एक ऐसी ठंडी हवा की झोंके की तरह है जब आप डर, दबाव, आतंक के पसीने में तरबतर होते हैं। एक क्लोज ग्रुप में जिसमें रवीश भी हैं, उसमें एक मित्र ने टिप्पणी आज सुबह टिप्पणी की कि - गोदी पत्रकारों और गोदी पत्रकारिता पर बुलडोजर चल गया।...सचमुच यह टिप्पणी बताती है कि कुछ पत्रकार जिन मनःस्थितियों में गुजर रहे हैं, उनके लिए यह कितनी बड़ी खुशी का दिन है। ताज्जुब है कि प्रधानमंत्री समेत सत्तारूढ़ सरकार के किसी मंत्री संतरी को यह महसूस नहीं हुआ कि भारत का गौरव बढ़ाने के लिए वे भी रवीश को बधाई देते। हालाँकि वे हर चिंदी चोर को छोटा पुरस्कार या सम्मान पाने पर बधाई देना नहीं भूलते।
हिंदी पत्रकारिता को वह सम्मान इस देश में नहीं प्राप्त है, जो अंग्रेजी या दूसरी क्षेत्रीय भाषा की पत्रकारिता को प्राप्त है। लेकिन एक अकेले बंदे ने आज तमाम मान्यताओं को ध्वस्त कर बताया कि अगर आपको बात कहने का निडर तरीका आता है, बेशक किसी भी भाषा में, तो उसकी धमक दूर तक सुनाई देती है।

गोदी मीडिया के भी कुछ पत्रकार आज रवीश को बधाई देते नजर आए, जो उनकी अंधेरा, एसएससी और नौकरी सीरीज पर की गई रिपोर्टिंग का मजाक उड़ाते देखे और सुने गए थे। मुझे याद है कि जब मैंने टीवी स्क्रीन पर अंधेरा वाली रिपोर्ट की तारीफ पत्रकारों के एक समूह में की तो कैसे वहां बैठे मेरे ही पत्रकार साथियों ने उसका मजाक उड़ाया। ...चुनावों के दौरान गांवों की रिपोर्टिंग ने उन्हें बाकी पत्रकारों से हमेशा अलग खड़ा किया।

जिस तरह की पत्रकारिता में जोखिम है, रवीश ने हमेशा उस जोखिम को उठाया। लेकिन उनका जोखिम सलीके वाला होता है, अतिरेक वाला नहीं। जब टीवी मीडिया में चिल्लाना ही सफलता का सबसे बड़ा पैमाना हो, वहां सूकून और शीलनता से बात कहने का अंदाज रवीश का अपना यूनीक फॉर्म्युला है। वह यह भी कहने से नहीं चूकते कि अंग्रेजी में मेरा हाथ तंग है, इसलिए हिंदी में ही उस बात को कहने या बताने की कोशिश रवीश अपने ढंग से करते हैं।

सत्तारूढ़ पार्टी ने रवीश का रास्ता रोकने की हर चंद कोशिश की। आईटी सेल ने भाड़े के लोगों को रवीश को डराने की सुपारी तक दी। उनका मोबाइल नंबर सार्वजनिक कर उन्हें अंध भक्तों से आतंकित करने की कोशिश भी हुई। ...लोग रोजना इस खबर का इंतजार करते थे कि रवीश का प्राइम टाइम अब बंद होगा...बस, अब तो ये गया।...रवीश का पीछा किए जाने की घटना भला कैसे भुलाई जा सकती है। उनके मुंह पर आज तमाचा पड़ा है।

रवीश ने चूंकि खुद को खुद ही गढ़ा है तो इस मामले में एनडीटीवी को सीधे तो बधाई नहीं बनती है लेकिन हां, इतना तो मानना पड़ेगा कि एनडीटीवी ने भी तमाम जोखिम उठाकर रवीश को इतना बड़ा मंच दिया, जिसके जरिए वह अपनी बात लोगों के सामने रख सके। हालांकि तमाम लोगों ने इसके पीछे भी मकसद देखा लेकिन हमें जो सामने से दिखाई देता है कि एनडीटीवी हिंदी को पहचान रवीश ने ही दिलाई। प्रणव रॉय निश्चित रूप से बेहतरीन पत्रकार होने के अलावा चालाक अनुभवी कारोबारी भी हैं। उनकी पारखी नजरों ने रवीश को आंकने में भूल नहीं की। भले ही भारत के सभी टीवी न्यूज चैनल में एक से एक पद्मश्री वाले पत्रकार हों या तथाकथित बड़े नाम हों लेकिन रवीश के मुकाबले वे कहीं खड़े नहीं हो सकते। वे भी नहीं जो लुच्चे लंफगे नेताओं के साथ सेल्फी खिंचवाते चलते हैं।

मैं देख रहा हूं कि फेसबुक, इंस्टाग्राम, टि्वटर, वाट्सऐप, प्रिंटरेस्ट समेत तमाम सोशल मीडिया प्लैटफॉर्मों पर रवीश कुमार का नाम हलचल पैदा कर रहा है, ट्रेंड कर रहा है। ऐसे आम लोग तमाम जगहों पर बधाई का आदान-प्रदान कर रहे हैं जिन्हें पत्रकारिता के बारे में कोई जानकारी नहीं है, वे बस रवीश को टीवी के जरिए जानते हैं। मेरी फेसबुक पोस्ट और वाट्सऐप पर ऐसे बधाइयां आ रही हैं जैसे यह पुरस्कार मुझे ही मिला हो। खास यह है कि यह सब नेचुरल है यानी इसके पीछे कुछ भी प्रायोजित नहीं है। वरना आप सोशल मीडिया पर ट्रेंड और लाइक पैसे से खरीद सकते हैं।

...मेरे लोग जानते हैं कि गोदी मीडिया के खिलाफ जब मैं आवाज उठाता हूं तो आज मुझे भी रवीश को इस पुरस्कार के लिए चुने जाने की घोषणा से कितनी खुशी हो रही होगी। शायद कुछ लोगों को मेरी वह फेसबुक पोस्ट याद हो। जिसमें मैंने मेट्रो में यात्रा करते हुए एक शख्स की तस्वीर पोस्ट की थी। वह शख्स पूरे एक घंटे की यात्रा के दौरान रवीश कुमार की लिखी किताब पढ़ रहा था। मुझे यह अच्छा लगा था कि मेरे पसंदीदा टीवी पत्रकार को कोई पढ़ रहा है। लेकिन जैसे ही वह फोटो लोगों के सामने आई तो लोगों ने ही बताया कि वह कोई वीर सिंह हैं, जो वह किताब पढ़ रहे थे। खैर, बाद में वीर सिंह मेरे फेसबुक मित्र बने। लेकिन हिंदी के पत्रकार को मौजूदा दौर में पढ़ा जाना मुझे अच्छा लगा।

उम्मीद है कि मशहूर लेखक मंगलेश डबराल जी को अपनी हिंदी विरोधी टिप्पणी का जवाब आज मिल गया होगा। मंगलेश जी ने हिंदी लेखन और पत्रकारिता में बढ़ती सांप्रदायिकता पर क्षोभ जताते हुए पिछले हफ्ते हिंदी को ही कोस डाला था। उस पर हिंदी के लेखक बहस कर रहे हैं लेकिन रवीश को इस पुरस्कार के योग्य समझे जाने के बाद हिंदी का सम्मान भी कहीं न कहीं बढ़ा है। बेशक टीवी पर आपका लेखन सामने नहीं आता लेकिन जिस दौर में हिंदी पत्रकार बोलने से शरमा रहे हों, डर रहे हों, उस दौर में इस पुरस्कार से हिंदी का सम्मान तो बढ़ा ही है।

बहरहाल, रवीश पर लिखने के लिए बहुत कुछ है। वो फिर कभी। अभी तो इस पुरस्कार की खुमारी उतरने दीजिए। ...मयकदे का पैमाना भरने दीजिए।... आज उनकी महफिल में रतजगा होने दीजिए।