मुस्तजाब की कविता ः सब कुछ धुंधला नजर आ रहा है

मुस्तजाब की कविताएं हिंदीवाणी पर आप लोग पहले भी पढ़ चुके हैं...पेश है उनकी नवीनतम कविता





सब धुंधला नजर आ रहा है
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सब धुंधला नजर आ रहा है
सच, झूठ, तारीख, तथ्य
किसे मानें, रह गया है क्या सत्य

सलाखें बन गए हैं मस्तिष्क हमारे
अंदर ही घुट घुट कर सड़ रहे हैं लोग बेचारे

एक कतार में हम सब अटक गए हैं
समझ रहे हैं राह है सही, मगर भटक गए हैं

जो कहता है अंध बहुमत उसे मान लेते हैं
चाहे झूठ हो, संग चलने की ठान लेते हैं

क्या हुआ जो लोग मर रहे हैं
आजादी के पीर सलाखों में सड़ रहे हैं

कहने पर रोक है,
अंधा हो गया कोर्ट है

डरपोक सब ठंडी हवा में बैठे हैं
कातिल संसद में टिका बैठे हैं
सच्चे तो खैर आजादी ही गवां बैठे हैं

मगर हमें क्या हम तो धुंधलेपन के मुरीद हैं
धरम तक ही रह गई साली सारी भीड़ है

और इसी धुंधलेपन का फायदा मसनदखोर उठा रहा है
हम अंधे हो रहे हैं वो हमारा देश जला रहा है

-मुस्तजाब



मुस्तजाब की कुछ कविताओं के लिंक -

http://www.hindivani.in/2017/12/blog-post.html

http://www.hindivani.in/2019/02/blog-post_16.html

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