Friday, February 15, 2019

पुलवामा की बर्फीली सड़क और छद्म युद्ध

जब आप इस वक्त गहरी नींद में हैं, तब कश्मीर के पुलवामा में उन जवानों की लाशों के टुकड़े जमा किए जा रहे हैं, जिन्हें आतंकी हमले में मार दिया गया...
मेरी नींद भी गायब है...मैं उन 42 नामों की सूची को पढ़ रहा हूं, जो अब हमारे बीच नहीं हैं। शहीदों की सूची में दूसरा ही नाम निसार अहमद का है...

थोड़ा तसल्ली सी हुई कि चलो, भक्तों और भगवा ब्रिगेड को यह कहने का मौका नहीं मिलेगा...कि मरने वाले एक ही धर्म या बिरादरी के थे...या इस्लामिक आतंकवाद ने सिर्फ एक ही धर्म वालों को मार दिया...

जैश-ए-मोहम्मद या हिजबुल मुजाहिदीन सिर्फ एक ही धर्म या देश के दुश्मन नहीं है। दरअसल, वह मुसलमान और कश्मीरियत के दुश्मन हैं। ...जानते हैं इस हमले से कश्मीरी अवाम की आवाज कमजोर कर दी गई है। उनके साथ अब लिबरल लोग खड़े होने से छिटक जाएंगे।...

हर हिंसक हमला बड़े आंदोलन को कमजोर कर देता है।

खैर, ऐसे बहुत सारे निसार अहमद आज उन 42 लोगों में हो सकते थे, लेकिन बेचारे जब भर्ती किए जाएंगे, तभी तो ढेर सारे निसार अहमद ऐसी कुर्बानी देने को मिलेंगे।...यह एक शिकवा है, निसार अहमदों को जब भर्ती नहीं करोगे तो इस्लामिक आतंकवाद की झूठी कहानी को कैसे फैलाओगे, दोहराओगे।...हूरें और अप्सराएं मिलने की झूठी कहानियों को पंख कैसे लगेंगे।

अगर ऐसे हमलों में ज्यादा निसार अहमद मरने लगे तो ...इस्लामिक आतंकवाद फैलने का नारा कमजोर पड़ता जाएगा। अंग्रेजों की मुखबिरी करने वालों का, गांधी की हत्या करने वाली मानसिकता का धार्मिक ध्रुवीकरण का अनुष्ठान फीका पड़ जाएगा। 

चर्चिल जो कहकर गया था, निसार अहमदों की कुर्बानी उसे कमजोर कर देगी। गोडसे जो करके गया है, निसार अहमदों की कुर्बानी उस पर पानी फेर देगी।

रात का सन्नाटा है। पुलवामा की बर्फीली सड़कें सायं सायं कर रही हैं। कोई दो बूंद आंसू बहाने वाला नहीं।...लेकिन उन्नाव में मातम है। बहन, बीवी, बेटी, मां, मौसी, चाची सब पछाड़े खा रहे हैं। कोई कुछ भी नहीं जानता पर सवाल सबकी जबान पर हैं। 

ढाई हजार जवानों का काफिला गुजर रहा था। सड़क के दोनों तरफ चप्पे-चप्पे पर पुलिस की चौकियां, आर्मी की पोजिशन, इसके बावजूद एक कार आकर सीआरपीएफ के काफिले से टकरा जाती है। उस पर तुर्रा यह कि आतंकवादी फायरिंग भी कर देते हैं।...पुलवामा की उस बर्फीली सड़क पर क्या उस वक्त पुलिस की एक भी चौकी, एक भी आर्मी की पोजिशन ने आरडीएक्स से भरी गाड़ी को नहीं देखा। आखिर किन-किन को मालूम था कि सीआरपीएफ का एक बड़ा काफिला उस बर्फीली सड़क से गुजरने वाला है। 

...तीन दिन से वह सड़क बंद थी। ...इतनी सुरक्षा, इतनी पिछली सर्जिकल स्ट्राइक, एक के बदले 10 सिर लाने का जज्बा और फिर भी इतना बड़ा हमला...

बहरहाल, मेरी नींद गायब है...एंकरों की ललकार ने मेरी नींद उड़ा दी है। आईटी सेल के ट्विटर कर्मचारियों के ट्वीट ने मेरी धमनियों के खून को जमा दिया है। सुबह तक क्या पाकिस्तान पर अटैक हो जाएगा। टीवी एंकर और आईटी सेल के कर्मचारी तो यही चाहते हैं। ...हर टीवी एंकर पाकिस्तान को, इस्लामिक आतंकवाद को और उसकी आड़ में एएमयू को-जेएनयू को सबक सिखाना चाहता है। एक टीवी एंकर का ट्वीट पढ़ रहा हूं- हम जोशीली आवाज में इसलिए बोलते हैं ताकि हमारे दर्शक गर्व का अनुभव कर सकें। हम देश के साथ खड़े हैं। यही मौका है पाकिस्तान को सबक सिखाने का....

एक मोहतरमा टीवी एंकर कैसे पीछे रहतीं, उन्होंने फरमाया - कश्मीर में देखते ही गोली मारने का आदेश जारी होना चाहिए...यानी कोई भी कश्मीरी दिखे, उसे भून दो। ...ये लोग ऐसे नहीं मानेंगे।...सिर में दर्द होने लगता है। ...फिर से 42 जवानों के नामों की सूची पर नजर डालने लगता हूं।...

नामों की सूची पढ़ते-पढ़ते नजर गई... कि मरने वाले ज्यादातर सीआरपीएफ जवान कॉन्स्टेबल, हेड कॉन्स्टेबल, कुक, ड्राइवर, माली, लॉन्ड्रीमैन, खलासी आदि पदों पर थे। किसी अफसर की शहादत उस सूची में शामिल नहीं है। निसार अहमद भी हेड कॉन्स्टेबल थे।...अफसर भी मरते हैं, लेकिन उनकी शहादत जवानों के मुकाबले कम है लेकिन शौर्य चक्र या वीर चक्र या कोई भी मेडल सबसे ज्यादा अफसर ले जाते हैं। कोई सरकार जब फौजियों को पेट्रोल पंप देने को सोचती है तो अफसर रैंक वालों को पेट्रोल पंप ज्यादा मिलते हैं। पता नहीं ऐसा क्यों होता होगा।...बस इस लिस्ट को देखते हुए यह ख्याल आया।

भारत-पाकिस्तान युद्ध टीवी पर शुरू हो गया है। इतिहास टटोलता हूं।... पहला विश्वयुद्द जो भारत को आजादी मिलने से बहुत पहले 1914 से लेकर 1918 तक लड़ा गया। रूस, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन इस युद्ध के नायक थे। दूसरा विश्वयुद्ध जो 1939 से लेकर 1945 तक लड़ा गया, जिसके नायक जर्मनी, जापान, अमेरिका समेत 70 देश थे।

वे सारे के सारे देश दो बड़े विश्व युद्द में तबाह-बर्बाद होने के बावजूद जाने कहां से कहां पहुंच गए। यूरोप एक हो गया, जर्मनी एक हो गया। अमेरिका महाशक्ति बन गया। जापान ने तरक्की का हर रास्ता तय कर लिया। भारत-पाकिस्तान ने भी तीन युद्द लड़े। हम वहीं आज भी खड़े हैं। एक और युद्ध लड़ने को तैयार।...दोनों के पास परमाणु बम है। लेकिन दोनों एक दूसरे को गरीब समझते हैं।

...यह सच भी है कि दोनों तरफ के हर गरीब हिंदू-मुसलमान के पेट की रोटी छीनकर दोनों देशों ने युद्ध लड़े हैं। हर युद्ध ने दोनों तरफ के गरीबों को और गरीब किया है। युद्ध एक धंधा बन गया है। अमेरिका-रूस इस धंधे के बड़े साहूकार हैं। भारत-पाकिस्तान के युद्ध उन धंधेबाजों की छोटी सी रणनीति का सौवां हिस्सा होंगे।

कुछ महारथियों ने आज रात को ही ट्विटर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप को टैग करते हुए भारत की ओर से पाकिस्तान से लड़ने के लिए मदद मांग ली है।...कुछ ने फरमाया है कि चीन के रहते हुए भारत पड़ोसी पाकिस्तान का कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। सिर्फ अमरीका ही हमारा सच्चा मददगार है। ये वे लोग हैं जिन्होंने ट्रंप के जीतने पर जंतर मंतर पर हथियारों के साथ ट्रंप के फोटो की आरती उतारी थी। इन्हें शायद पता नहीं युद्ध क्या होता है और कैसे लड़ा जाता है। नागपुर औऱ इनकी भाषा में ज्यादा अंतर नहीं है। 

अब नींद का झोंका आने लगा है, लेकिन आंखों में पुलवामा की बर्फीली सड़क का मंजर रह-रह कर लौट आता है। ...एक छद्म युद्ध लड़ते-लड़ते हमने मौत को कितना क्रूर और भयावह बना दिया है। ... हमारी प्राथमिकता उन्माद है, शांति नहीं। अगले चुनाव में हमें उन्माद की खेती करनी है, राष्ट्रवाद की फसल काटनी है। ...मुर्दा कौमें ऐसे छद्म युद्दों में मोहरा ही बनती हैं। ...




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