Tuesday, February 26, 2019

देवताओं का वॉर रस प्रवचन

देवता आसमान से पुष्प वर्षा कर रहे हैं...आज वॉर रस पर प्रवचन का दिन है...

देवता वॉर वाणी (War Sermons) कर रहे हैं...बच्चा जीवन में टाइमिंग का ही महत्व है।...कुछ कार्य का समय चुन लो...वॉर रस से मंत्रमुग्ध जनता को अगर शांति पाठ करने को कहोगे तो तुम्हें कच्चा चबा जाएगी लेकिन वॉर रस में अगर उसे पबजी गेम में भी अटैक बोलोगे तो वह ख़ुश हो जाएगी। टाइमिंग की कला जिसको आती है, वही वीर है।

अच्छे टाइमिंग का ताजा उदाहरण देखो...कल वॉर मेमोरियल (War Memorial) का उद्घाटन हुआ, आज यानी 26 फ़रवरी को  भारतवर्ष की सेना ने अपने पड़ोस में जाकर कई किलो बम गिरा दिए...नोमैंस लैंड में क़रीब तीन सौ लोग मारे गए...कई आतंकी शिविर हमेशा के लिए तबाह हो गए। यही टाइमिंग है...वॉर रस में डूबी जनता को अपना टॉपिक और टॉनिक मिल गया है। सीआरपीएफ़ जवानों की तेरहवीं के दिन किए गए इस अटैक से संबंधित पक्षों ने कई हसरतें पूरी कर ली हैं। वॉर रस में डूबी जनता जश्न मोड में आ चुकी है। स्कूलों में पढ़ाई की जगह बच्चों में भी नारे लगवा कर वॉर रस का संचार किया जा रहा है।

जब तक इस वॉर रस का ख़ुमार उतरेगा तो धर्म का रस तैयार है। देवता कह रहे हैं कि अयोध्या को सजाया जा रहा है। तैयार किया जा रहा है। कतिपय लोग फिर से पंचायत को भी कह रहे हैं।...देवता कह रहे हैं कि टाइमिंग का चुनाव फिर मायने रखेगा। फिर चुनाव आ जाएगा। तीन महीने तक उसका उत्सव रहेगा।...फिर योजना रस पिलाया जाएगा।....ग़रीबी, भुखमरी, आतंकवाद से लड़ने के वादे और संकल्प लिए जाएँगे।...आपको फिर अगले वॉर रस का टॉनिक दिया जाएगा।...आपकी जिंदगी यूँ ही चलती रहेगी। उसमें आपको बदलाव खुद लाना होगा। वॉर रस का टॉनिक आपकी जिंदगी नहीं बदल सकता।

मेरे इन शब्दों को हमेशा के लिए संकलित कर लें...
थोपा गया युद्ध और ओढ़ा गया युद्ध एक ही सिक्के के दो पहलू हैं...

Monday, February 18, 2019

पुलवामा पर तमाम प्रयोगशालाओं की साजिशें नाकाम रहीं

पुलवामा ने हमें बहुत कुछ दिया। जहां देश के लोगों ने सीआरपीएफ के 40 जवानों की शहादत पर एकजुट होकर अपने गम-ओ-गुस्से का इजहार किया, वहां तमाम लोगों ने नफरत के सौदागरों के खिलाफ खुलकर मोर्चा संभाला।

पुलवामा की घटना के पीछे जब गुमराह कश्मीरी युवक का नाम आया तो कुछ शहरों में ऐसे असामाजिक तत्व सड़कों पर निकल आए जिन्होंने कश्मीरी छात्रों को, समुदाय विशेष के घरों, दुकानों को निशाना बनाने की कोशिश की लेकिन सभी जगह पुलिस ने हालात संभाले। लेकिन इस दौरान सोशल मीडिया के जरिए भारत की एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसकी कल्पना न तो किसी राजनीतिक दल के आईटी सेल ने की थी न किसी नेता ने की थी।

उन्हें लगा था कि नफरत की प्रयोगशाला में किए गए षड्यंत्रकारी प्रयोग इस बार भी काम कर जाएंगे। देश की जानी-मानी हस्तियों ने, लेखकों ने, इतिहासकारों ने, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने, पत्रकारों ने, कुछ फिल्म स्टारों ने और सबसे बढ़कर बहुत ही आम किस्म के लोगों ने अपील जारी कर दी कि अगर किसी जगह किसी कश्मीरी या समुदाय विशेष के लोगों को नफरत फैलाकर निशाना बनाया जा रहा है तो उनके दरवाजे ऐसे लोगों को शरण देने के लिए खुले हैं।

देश में जब 1947, 1984, 2002 जैसे भयानक दंगे और नरसंहार हुए तब टारगेट किए गए समुदाय के किसी परिवार को पनाह देने पर वह खबर बन जाया करती थी, कहानियां बन जाया करती थीं। लेकिन 2019 में सोशल मीडिया का दौर है और उसने अपनी ताकत की पहचान फिर से करा दी है। नफरतों का कारोबार करने वालों को इतनी बड़ी चुनौती 1947, 1984 और 2002 के नरसंहारों में नहीं मिली थी।

1984 में जब सिख विरोधी दंगे हुए तो जिस शहर में मैं पढ़ाई के साथ-साथ छोटी-मोटी पत्रकारिता कर रहा था, वहां अहसास हुआ कि दंगाई किस हद तक जा सकते हैं और ऐसे में अगर कोई सिर्फ किसी एक पीड़ित परिवार की मदद कर दे तो सामाजिक ताना-बाना बिखरने से बच जाता है। उस परिवार की सोच हमेशा के लिए बदल जाती है और वह अपनी पीढ़ी दर पीढ़ी इसी सामाजिक ताने-बाने को बचाने का संदेश देता चला जाता है।

मेरी फेसबुक लिस्ट बहुत लंबी नहीं है। लेकिन जितनी है, उतनी पर मुझे पहली बार गर्व का एहसास हुआ। इतने बड़े पैमाने पर लोगों ने अपील जारी की थी कि एक-एक का नाम लेकर बताने पर इस लेख के कई पेज भर जाएंगे। और ऐसी अपीलें सिर्फ दिल्ली एनसीआर से ही नहीं रक्सौल और औरंगाबाद तक से आ रही थीं। हालांकि एक राजनीतिक दल की आईटी सेल के दिहाड़ीदार ने टिप्पणी की कि फेसबुक पर अपील जारी करना आसान है और लोगों तक मदद पहुंचाना अलग बात है। मैंने उनको बताया कि जिन लोगों ने मदद पहुंचाई है, वह लोग यहां तो गा-गाकर बताने से रहे कि उन्होंने किसको मदद पहुंचाई है।

पुलवामा की घटना से राजनीतिक दलों ने इमोशनल अत्याचार की जो फसल काटने का प्लान तैयार किया था, उसे भी सोशल मीडिया ने नेस्तोनाबूद कर दिया। हुआ यह कि जब हमारे 40 जवानों के शव उनके गांव और शहरों में पहुंचने लगे तो नागपुरी प्रयोगशाला से निकले एक राजनीतिक दल के तमाम नेता उन शवों के साथ दांत चिंयारते और हंसते हुए जनता के बीच से निकले, कहीं किसी ने शव को अपने पीछे रखते हुए सेल्फी ले ली। लोगों को यह सब पसंद नहीं आया और ऐसे नेताओं को सोशल मीडिया पर लोगों ने सरेआम जलील किया। ऐसा गुस्सा मुझे पहली बार दिखा।

ऐसी घटनाएं पहली बार नहीं हुई हैं, इससे पहले भी लोग ऐतराज जताते रहे हैं, लेकिन उसका दायरा वहीं तक सीमित होता था। अब उसका दायरा बढ़ रहा है और उस गुस्से को अब व्यापक समर्थन मिलने लगा है। नेताओं से मोहभंग की शुरुआत ऐसी ही घटनाओं से होती है। पर नेता इसके बावजूद अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे।

यह नेताओं के आत्ममंथन का समय है। पुलवामा जैसी घटना को अगर वह अपने चुनाव जीतने का जरिया बनाएंगे तो जनता उन्हें किसी तरह और क्यों माफ करेगी। अगर आप वाकई गमजदा हैं तो उसके सार्वजनिक प्रदर्शन की क्या जरूरत है। आप शहीद के शव के साथ उस वाहन पर क्यों सवार होना चाहते हैं, जहां उस जवान के पिता, भाई, चाचा, बेटे को खड़ा होना है। क्योंकि आप उस स्थिति को भुनाना चाहते हैं। आप जानते हैं कि शातिर मीडिया सिर्फ आपको ही पहचानता है, वह शहीद के परिवार को नहीं पहचानता तो फोकस आप पर ही रहेगा। लेकिन असंख्य आंखे जो उन तस्वीरों को, विडियो को देख रही हैं वे आपको माफ नहीं करने वाले हैं।

अगर आप वाकई शहादत पर गमजदा हैं तो जाकर अपने मुहल्ले में शांति पाठ कराइए, मंदिर में प्रार्थना करिए कि पुलवामा फिर कहीं और न दोहराया जाए, अपनी पार्टी पर दबाव बनाइए कि वह इन शहीदों को जल्द से जल्द वन रैंक वन पेंशन के दायरे में लाए। उनकी शहादत सेना के किसी जवान की शहादत से कम तो नहीं। आप अगर वाकई गमजदा हैं तो उन हालात को देश में पैदा कीजिए, जहां ऐसी आतंकी घटना करने को कोई सोच भी न सके। अपनी पार्टी से कहिए नफरत का नहीं मोहब्बत के वातारण का निर्माण करे। अंध देशभक्ति नफरत को जन्म देती है और दिल से की गई देशभक्ति देश को और मजबूत करती है।

पुलवामा की घटना के विरोध में जिस तरह इस बार देशभर में मुसलमानों ने अपने गुस्से का विरोध जताया, उसे भी दर्ज करना जरूरी है। ऐसा नहीं है कि मुसलमानों को सेना या पैरामिलिट्री फोर्स के जवानों की शहादत पर गुस्सा नहीं आता था। लेकिन वह अपने सीमित दायरे में ही उस पर बात करके, गुस्सा जताकर चुप रह जाते थे। उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि अपने गुस्से के साथ सामने आना जरूरी है, शातिर टीवी मीडिया चाहे उसकी कवरेज करे न करे। शायद आपको किसी टीवी चैनल ने यह तथ्य न बताया हो कि पुलवामा में 40 जवानों की शहादत जुमेरात (गुरुवार) को हुई और अगले दिन जुमा था। देशभर में शायद ही कोई ऐसी मस्जिद बची होगी, जहां जमात के साथ हुई नमाज में मौलाना ने जवानों की शहादत पर अपने खुतबे में खिराज-ए-अकीदत न पेश की हो। मेरा वाट्सऐप, मेरा ईमेल ऐसी असंख्य फोटो से बजबजा रहा था।

आजमगढ़ के मुबारकपुर नामक कस्बे से एक साहब ने मुझे शनिवार को शिकायत भेजी की उनके इलाके की मीडिया ने हमारी मस्जिद के खुतबे को और हमारे प्रदर्शन को तवज्जो नहीं दी। एक लाइन न छापी और न कुछ दिखाया। मैंने उन्हें समझाया कि शायद जगह न रही हो, शायद बड़े शहरों के मुकाबले कस्बों पर ध्यान न गया हो। लेकिन वह शातिर मीडिया पर पूर्वाग्रह से ग्रसित होने का इलजाम लगाते रहे। लेकिन मैं मन ही मन खुश हो रहा था कि देश का आम मुसलमान भी अब दूसरों की तरह अपनी मार्केटिंग की कला सीख रहा है। हालांकि उसने दर कर दी है, लेकिन यह शुरुआत भी रंग लाएगी। मुझे नागपुर का एक फोटो देखने को मिला, नमाज के बाद बमुश्किल 50 दाउंदी बोहरा समुदाय के लोग शहीद जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है। दाऊदी बोहरा लोग आमतौर पर खुद में सिमटे रहने वाला समुदाय है। लेकिन वह लोग भी इस तरह पहली बार खुलकर सामने आए।

बहरहाल, सोशल मीडिया के जमाने में जब मार्केंटिंग के फंडे बदल रहे हैं तो एक पूरी कौम का जागना शुभ संकेत माना जाएगा।....इसके छिपे संकेत खद्दरधारी नेताओं को पढ़ने होंगे। नफरतों का कारोबार अब यह देश आगे नहीं बढ़ने देगा।







 








Friday, February 15, 2019

पुलवामा की बर्फीली सड़क और छद्म युद्ध

जब आप इस वक्त गहरी नींद में हैं, तब कश्मीर के पुलवामा में उन जवानों की लाशों के टुकड़े जमा किए जा रहे हैं, जिन्हें आतंकी हमले में मार दिया गया...
मेरी नींद भी गायब है...मैं उन 42 नामों की सूची को पढ़ रहा हूं, जो अब हमारे बीच नहीं हैं। शहीदों की सूची में दूसरा ही नाम निसार अहमद का है...

थोड़ा तसल्ली सी हुई कि चलो, भक्तों और भगवा ब्रिगेड को यह कहने का मौका नहीं मिलेगा...कि मरने वाले एक ही धर्म या बिरादरी के थे...या इस्लामिक आतंकवाद ने सिर्फ एक ही धर्म वालों को मार दिया...

जैश-ए-मोहम्मद या हिजबुल मुजाहिदीन सिर्फ एक ही धर्म या देश के दुश्मन नहीं है। दरअसल, वह मुसलमान और कश्मीरियत के दुश्मन हैं। ...जानते हैं इस हमले से कश्मीरी अवाम की आवाज कमजोर कर दी गई है। उनके साथ अब लिबरल लोग खड़े होने से छिटक जाएंगे।...

हर हिंसक हमला बड़े आंदोलन को कमजोर कर देता है।

खैर, ऐसे बहुत सारे निसार अहमद आज उन 42 लोगों में हो सकते थे, लेकिन बेचारे जब भर्ती किए जाएंगे, तभी तो ढेर सारे निसार अहमद ऐसी कुर्बानी देने को मिलेंगे।...यह एक शिकवा है, निसार अहमदों को जब भर्ती नहीं करोगे तो इस्लामिक आतंकवाद की झूठी कहानी को कैसे फैलाओगे, दोहराओगे।...हूरें और अप्सराएं मिलने की झूठी कहानियों को पंख कैसे लगेंगे।

अगर ऐसे हमलों में ज्यादा निसार अहमद मरने लगे तो ...इस्लामिक आतंकवाद फैलने का नारा कमजोर पड़ता जाएगा। अंग्रेजों की मुखबिरी करने वालों का, गांधी की हत्या करने वाली मानसिकता का धार्मिक ध्रुवीकरण का अनुष्ठान फीका पड़ जाएगा। 

चर्चिल जो कहकर गया था, निसार अहमदों की कुर्बानी उसे कमजोर कर देगी। गोडसे जो करके गया है, निसार अहमदों की कुर्बानी उस पर पानी फेर देगी।

रात का सन्नाटा है। पुलवामा की बर्फीली सड़कें सायं सायं कर रही हैं। कोई दो बूंद आंसू बहाने वाला नहीं।...लेकिन उन्नाव में मातम है। बहन, बीवी, बेटी, मां, मौसी, चाची सब पछाड़े खा रहे हैं। कोई कुछ भी नहीं जानता पर सवाल सबकी जबान पर हैं। 

ढाई हजार जवानों का काफिला गुजर रहा था। सड़क के दोनों तरफ चप्पे-चप्पे पर पुलिस की चौकियां, आर्मी की पोजिशन, इसके बावजूद एक कार आकर सीआरपीएफ के काफिले से टकरा जाती है। उस पर तुर्रा यह कि आतंकवादी फायरिंग भी कर देते हैं।...पुलवामा की उस बर्फीली सड़क पर क्या उस वक्त पुलिस की एक भी चौकी, एक भी आर्मी की पोजिशन ने आरडीएक्स से भरी गाड़ी को नहीं देखा। आखिर किन-किन को मालूम था कि सीआरपीएफ का एक बड़ा काफिला उस बर्फीली सड़क से गुजरने वाला है। 

...तीन दिन से वह सड़क बंद थी। ...इतनी सुरक्षा, इतनी पिछली सर्जिकल स्ट्राइक, एक के बदले 10 सिर लाने का जज्बा और फिर भी इतना बड़ा हमला...

बहरहाल, मेरी नींद गायब है...एंकरों की ललकार ने मेरी नींद उड़ा दी है। आईटी सेल के ट्विटर कर्मचारियों के ट्वीट ने मेरी धमनियों के खून को जमा दिया है। सुबह तक क्या पाकिस्तान पर अटैक हो जाएगा। टीवी एंकर और आईटी सेल के कर्मचारी तो यही चाहते हैं। ...हर टीवी एंकर पाकिस्तान को, इस्लामिक आतंकवाद को और उसकी आड़ में एएमयू को-जेएनयू को सबक सिखाना चाहता है। एक टीवी एंकर का ट्वीट पढ़ रहा हूं- हम जोशीली आवाज में इसलिए बोलते हैं ताकि हमारे दर्शक गर्व का अनुभव कर सकें। हम देश के साथ खड़े हैं। यही मौका है पाकिस्तान को सबक सिखाने का....

एक मोहतरमा टीवी एंकर कैसे पीछे रहतीं, उन्होंने फरमाया - कश्मीर में देखते ही गोली मारने का आदेश जारी होना चाहिए...यानी कोई भी कश्मीरी दिखे, उसे भून दो। ...ये लोग ऐसे नहीं मानेंगे।...सिर में दर्द होने लगता है। ...फिर से 42 जवानों के नामों की सूची पर नजर डालने लगता हूं।...

नामों की सूची पढ़ते-पढ़ते नजर गई... कि मरने वाले ज्यादातर सीआरपीएफ जवान कॉन्स्टेबल, हेड कॉन्स्टेबल, कुक, ड्राइवर, माली, लॉन्ड्रीमैन, खलासी आदि पदों पर थे। किसी अफसर की शहादत उस सूची में शामिल नहीं है। निसार अहमद भी हेड कॉन्स्टेबल थे।...अफसर भी मरते हैं, लेकिन उनकी शहादत जवानों के मुकाबले कम है लेकिन शौर्य चक्र या वीर चक्र या कोई भी मेडल सबसे ज्यादा अफसर ले जाते हैं। कोई सरकार जब फौजियों को पेट्रोल पंप देने को सोचती है तो अफसर रैंक वालों को पेट्रोल पंप ज्यादा मिलते हैं। पता नहीं ऐसा क्यों होता होगा।...बस इस लिस्ट को देखते हुए यह ख्याल आया।

भारत-पाकिस्तान युद्ध टीवी पर शुरू हो गया है। इतिहास टटोलता हूं।... पहला विश्वयुद्द जो भारत को आजादी मिलने से बहुत पहले 1914 से लेकर 1918 तक लड़ा गया। रूस, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन इस युद्ध के नायक थे। दूसरा विश्वयुद्ध जो 1939 से लेकर 1945 तक लड़ा गया, जिसके नायक जर्मनी, जापान, अमेरिका समेत 70 देश थे।

वे सारे के सारे देश दो बड़े विश्व युद्द में तबाह-बर्बाद होने के बावजूद जाने कहां से कहां पहुंच गए। यूरोप एक हो गया, जर्मनी एक हो गया। अमेरिका महाशक्ति बन गया। जापान ने तरक्की का हर रास्ता तय कर लिया। भारत-पाकिस्तान ने भी तीन युद्द लड़े। हम वहीं आज भी खड़े हैं। एक और युद्ध लड़ने को तैयार।...दोनों के पास परमाणु बम है। लेकिन दोनों एक दूसरे को गरीब समझते हैं।

...यह सच भी है कि दोनों तरफ के हर गरीब हिंदू-मुसलमान के पेट की रोटी छीनकर दोनों देशों ने युद्ध लड़े हैं। हर युद्ध ने दोनों तरफ के गरीबों को और गरीब किया है। युद्ध एक धंधा बन गया है। अमेरिका-रूस इस धंधे के बड़े साहूकार हैं। भारत-पाकिस्तान के युद्ध उन धंधेबाजों की छोटी सी रणनीति का सौवां हिस्सा होंगे।

कुछ महारथियों ने आज रात को ही ट्विटर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप को टैग करते हुए भारत की ओर से पाकिस्तान से लड़ने के लिए मदद मांग ली है।...कुछ ने फरमाया है कि चीन के रहते हुए भारत पड़ोसी पाकिस्तान का कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। सिर्फ अमरीका ही हमारा सच्चा मददगार है। ये वे लोग हैं जिन्होंने ट्रंप के जीतने पर जंतर मंतर पर हथियारों के साथ ट्रंप के फोटो की आरती उतारी थी। इन्हें शायद पता नहीं युद्ध क्या होता है और कैसे लड़ा जाता है। नागपुर औऱ इनकी भाषा में ज्यादा अंतर नहीं है। 

अब नींद का झोंका आने लगा है, लेकिन आंखों में पुलवामा की बर्फीली सड़क का मंजर रह-रह कर लौट आता है। ...एक छद्म युद्ध लड़ते-लड़ते हमने मौत को कितना क्रूर और भयावह बना दिया है। ... हमारी प्राथमिकता उन्माद है, शांति नहीं। अगले चुनाव में हमें उन्माद की खेती करनी है, राष्ट्रवाद की फसल काटनी है। ...मुर्दा कौमें ऐसे छद्म युद्दों में मोहरा ही बनती हैं। ...