Wednesday, September 18, 2019

कश्मीर डायरी ः सियासी मसले बुलेट और फौज से नहीं सुलझते....

जम्मू कश्मीर में 5 अगस्त को जब भारत सरकार ने धारा 370 खत्म कर दी और सभी प्रमुख दलों के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया तो उन नेताओं में सीपीएम के राज्य सचिव और कुलगाम से विधायक यूसुफ तारिगामी भी थे। उनकी नजरबंदी को जब  एक महीना हो गया तो सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की कि उनके कश्मीरी नेता यूसुफ तारिगामी की सेहत बहुत खराब है। उन्हें फौरन रिहा किया जाए ताकि उनका इलाज कराया जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ यूसुफ तारिगामी की रिहाई का आदेश दिया बल्कि उन्हें दिल्ली के एम्स में लाकर इलाज कराने का निर्देश भी दिया। यूसुफ तारिगामी एम्स में इलाज के बाद ठीक हो गए और वहां से दिल्ली में ही जम्मू कश्मीर हाउस में चले गए, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में केस अभी लंबित है। मैंने उनसे जाकर वहां कश्मीर के तमाम मसलों पर बात की। जिसे आज नवभारत टाइम्स ने प्रकाशित किया। पूरी बातचीत का मूल पाठ मैं यहां दे रहा हूं लेकिन नीचे एनबीटी में छपी हुई खबर की फोटो ताकि सनद रहे के लिए भी लगाई गई है।....




सियासी मसले बुलेट और फौज से नहीं सुलझते

Yusuf.Kirmani@timesgroup.com
दिल्ली के जम्मू कश्मीर हाउस के कमरा नंबर 103 में कश्मीर के एक नेता से मिलने वालों का तांता लगा हुआ है। वह हर किसी का ‘सलाम-नमस्कार’ ले रहे हैं और यह कहना नहीं भूलते कि आप कश्मीर के एक ‘आजाद नागरिक’ से मिल रहे हैं। ...कल क्या होगा, मैं नहीं जानता हूं। मुझे सुप्रीम कोर्ट ने वहां जाने की इजाजत दे दी है लेकिन मेरी आपसे फिर मुलाकात होगी, मुझे इस बारे में कुछ नहीं पता। हम कैसे और किस पर भरोसा करें। 

यह कमरा 72 साल के सीपीएम नेता और कुलगाम से विधायक यूसुफ तारिगामी का है। उन्हें सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर एम्स लाया गया था, जहां उनका इलाज हुआ और अब वह ठीक होकर जम्मू कश्मीर हाउस में जमे हुए हैं, साथ ही साथ कश्मीर वापस लौटने की तैयारी भी जारी है। लेकिन वह संशकित भी हैं। कश्मीर में एक महीने की नजरबंदी और एम्स में इलाज के बाद किसी पत्रकार को किसी कश्मीरी नेता द्वारा दिया गया यह पहला इंटरव्यू है।
उनसे सीधा सवाल किया गया कि मैं एक कश्मीरी से या फिर एक भारतीय से बात कर रहा हूं, तारिगामी ने जवाब दिया कि आप खास भारतीय हैं जो एक ऐसे भारतीय से बात कर रहे हैं जिसके नागरिक अधिकार छीने जा चुके हैं। कश्मीरी अवाम अब किस हक से खुद को ‘भारतीय’ कहे ?

क्या धारा 370 खत्म करने से कश्मीर की बेहतरी का रास्ता नहीं निकलेगा, उन्होंने कहा कि कोई भी रास्ता बातचीत से निकलता है। वहां आप किससे बात करेंगे? आपने सारे राजनीतिक दलों के नेताओं को नजरबंद कर दिया है। अगर सुप्रीम कोर्ट न होता तो मैं भी वहां पड़ा सड़ रहा होता। पूरा कश्मीर एक बड़ी जेल में तब्दील हो चुका है। भारत सरकार बेहतरी का रास्ता निकालने के लिए किससे बात करेगी। सरकार ने तो उन नेताओं को भी नहीं छोड़ा जो पाकिस्तान के स्टैंड का विरोध करते थे या पाकिस्तान जिन कश्मीरी नेताओं को सख्त नापसंद करता था। कश्मीर से जुड़ा कोई मसला बातचीत किए बिना नहीं सुलझ सकता। सरकार को बातचीत की टेबल पर आना ही होगा। आपको सबसे बातचीत करनी होगी, चाहे वह कोई भी हो। 

यह पूछे जाने पर कि वहां अब उद्योग लगेंगे, कारोबार फैलेगा, कश्मीरियों को फायदा होगा, उन्होंने उल्टा सवाल किया, क्या आप जानते हैं कि श्रीनगर और कश्मीर में अन्य जगहों पर खुले फाइव स्टार और अन्य होटल किनके हैं। इनमें से एक भी होटल का मालिक लोकल कश्मीरी नहीं है। इन होटलों के मालिक दिल्ली और मुंबई में बैठे हैं। पिछले 30 साल से कश्मीर में कोई उद्योग लगाने से सरकार को कौन रोक रहा था। कश्मीर में जब उग्रवाद की समस्या बढ़ी तो वहां के तमाम कारोबारी अपना छोटा बड़ा कारोबार समेट कर जम्मू चले गए, वहां उन्होंने मकान बना लिये लेकिन जम्मू से एक भी कारोबारी श्रीनगर या कहीं और अपना कारोबार फैलाने या मकान बनाने नहीं आया। किसने रोका था। जहां तक कश्मीरी युवकों को नौकरियां देने की बात है, बीजेपी ने चुनाव से पहले वादा किया था कि वह हर साल देश के दो करोड़ युवकों को नौकरियां देगी, सरकार पहले उन दो करोड़ को नौकरी दे दे, फिर कश्मीरी युवकों के बारे में सोचे। जहां इंटरनेट बंद हो, वहां के युवक क्या चांद पर जाकर नौकरी के लिए अप्लाई करेंगे। 

...तो आखिर कश्मीर नामक मर्ज का इलाज क्या है, सीपीएम नेता ने कहा कि जब समस्या पेट दर्द की हो और दवा कान के दर्द की दी जाएगी तो मर्ज बढ़ेगा। जब तक आपको रोग का सही पहचान करना नहीं आएगा, आपसे गलतियां होती रहेंगी। सियासी मसले बुलेट और फौज के दम पर नहीं सुलझ सकते। फौज पर बोझ बढ़ाकर आप कश्मीर समस्या का समाधान नहीं कर सकते। आप कश्मीरी अवाम को अपना तो अपना मानें लेकिन आप तो उन्हें अपनों से दूर कर रहे हैं। इसी लालकिले से कभी मोदी साहब ने कहा था कि हम कश्मीरी लोगों को गले लगायेंगे, क्या इसी तरह गले लगाया जाता है कि आज कोई मां, कोई बाप, कोई बहन नहीं जानती कि उसका बेटा, भाई कहां है? यह बताने में क्या हर्ज है कि अगर किसी युवक को पकड़ा गया है तो उसे कहां रखा गया है, उसका जुर्म क्या है?

पाकिस्तान की लगातार बयानबाजी और मामले को उलझाने के सवाल पर यूसुफ तारिगामी ने कहा, यह मौका उसे किसने दिया। पाकिस्तान की किसी भी सरकार ने कश्मीर मामले में कभी कोई सम्माजनक पहल नहीं की। उसने कश्मीर समस्या को एक टूल की तरह इस्तेमाल किया। इमरान खान को बढ़चढ़ कर बयान देने का मौका भारत सरकार ने दिया। आपको बता दूं कि जो ताकतें कश्मीर से भारत के शांतिपूर्ण रिश्ते की विरोधी रही हैं, जिन्होंने कभी इस रिश्ते को पसंद नहीं किया, उन्हें अचानक मौका ही मौका नजर आने लगा। कुछ ताकते हैं जो इस रिश्ते को कमजोर करना चाहती हैं, वो अपने मकसद में कामयाब होती दिख रही हैं।

क्या चुनाव कराने से शांति बहाली में मदद मिलेगी, इस पर सीपीएम नेता ने कहा कि जब वहां लोकसभा चुनाव कराये जा सकते हैं, जब वहां पंचायत और स्थानीय निकाय (लोकल बॉडीज) चुनाव कराये जा सकते हैं तो विधानसभा चुनाव क्यों नहीं कराये जा सकते। लेकिन सरकार ने विधानसभा तो किसी और मकसद और नीयत से भंग की है। अगर वहां विधानसभा होती तो केंद्र सरकार धारा 370 नहीं खत्म कर पाती।    

यह पूछे जाने पर कि दिल्ली में बैठकर लगता है कि कश्मीर में अमन-चैन लौट आया है, तारिगामी ने कहा कि कश्मीर जैसी बंद जेल से सही खबर बाहर कहां आ पा रही है। कश्मीरियों को जुल्म सहने की आदत पड़ चुकी है। उनके लिए हर दिन पिछले दिन की तरह होता है।  


Saturday, September 14, 2019

एक भाषा के विरोध में


ये अमित शाह को क्या हो गया है...क्या उन्हें देश के भूगोल का ज्ञान नहीं है...

आज सुबह-सुबह बोल पड़े हैं कि एक देश एक #भाषा होनी चाहिए। जो देश एक भाषा नहीं अपनाते वो मिट जाते हैं...

अगर वो - एक देश - तक अपनी बात कहकर चुप रहते तो ठीक था लेकिन जिस देश में हर पांच कोस पर भाषा (बोली) बदल जाती है, वहां एक भाषा लागू करना या थोपने के बारे में सोचना कितना अन्यायपूर्ण है।
हालांकि मैं खुद जबरदस्त हिंदीभाषी हूं और #हिंदी का खाता-बजाता हूं लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि जबरन कोई भाषा किसी पर थोपी जाए।

दक्षिण भारत के तमाम राज्यों के लिए भाषा अस्मिता का प्रश्न है। क्या कोई मलियाली अपनी भाषा की पहचान खोना चाहेगा...

क्या कोई #बंगाली अपनी भाषा पर किसी और भाषा को लादे जाते हुए देखना चाहेगा...
क्या कोई #मराठी, क्या कोई #उड़िया, क्या कोई गारो-खासी, क्या कोई तमिल, क्या कोई गुरमुखी बोलने वाला पंजाबी अपनी भाषा की बजाय हिंदी को प्राथमिकता देना चाहेगा...

दरअसल, यह सब - एक ड्रामा प्रतिदिन - के हिसाब से दिया जाने वाला बयान है। #अमितशाह का कोई बयान बेरोजगारी, गरीबी, किसानों की हालत, गिरती अर्थव्यवस्था पर नहीं आता लेकिन एक भाषा लागू करने के नाम पर जरूर आ जाता है। ...कुछ दिन इस पर बयानबाजी होगी, टीवी एंकर गला फाड़कर राष्ट्रवाद के नाम पर एक भाषा की हिमायत में उतरेंगे। जब लोगों का ध्यान इस मुद्दे से ऊब जाएगा तो फिर किसी और संतरी का नया बयान आ जाएगा।...नया ड्रामा।

कोई अमित शाह से पूछेगा कि उन्होंने अपने बेटे जय शाह को इंग्लिश मीडियम वाले स्कूलों में क्यों पढ़ाया...कोई पूछेगा कि #जयशाह ने बीटेक की डिग्री इंग्लिश मीडियम में क्यों हासिल की...

कोई ताज्जुब नहीं कल को कोई #भाजपाई या #संघी नेता अमित शाह से भी आगे जाकर बयान दे दे कि - एक भाषा, एक देश, एक धर्म...

देश के चिंतन को जब कुछ नेता पशु, धर्म, भाषा पर ही केंद्रित रखना चाहते हैं तो ऐसे में गलती उनकी नहीं है। दरअसल, हमारे आप जैसे अंध भक्त इन हालात के लिए जिम्मेदार हैं। जो बोया है वो काटना तो पड़ेगा ही।


राजनीतिक क्षेत्र में नाकाम हिंदी के कुछ मंचीय #कवि भी आज हिंदी के समर्थन में बयान देते नजर आ रहे हैं। अच्छी बात है लेकिन ये मक्कार मंचीय कवि किसी प्रोग्राम में आने के नाम पर जब पैसे का मुंह खोलते हैं तो इनका भाषा प्रेम और देशप्रेम सब हवा हो जाता है।

Wednesday, September 4, 2019

इस साज़िश को समझो मेरी जान



आप लोगों का यह शक सही लग रहा है कि हो न हो भारत की अर्थव्यवस्था के खिलाफ कांग्रेसी नेता, कश्मीरी अवाम और पाकिस्तान मिलकर कोई साज़िश कर रहे हैं।...लेकिन मोदी सरकार ने गिरती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए जिस तरह कांग्रेस नेताओं को गिरफ़्तार किया है, जिस तरह कश्मीर में 370 हटाया है, जिस तरह पाकिस्तान के मंसूबों को धूल चटाया है, वह क़ाबिले तारीफ़ है।

जिस दिन भारतीय अर्थव्यवस्था में पाँच फ़ीसदी गिरावट का संकेत देने वाली जीडीपी की खबर आनी थी, ठीक उससे पहले चिदंबरम को गिरफ़्तार कर लिए गए। अगर चिदंबरम बाहर रहते तो हम लोगों को जीडीपी के गिरने पर गुमराह कर सकते थे। चिदंबरम को गिरफ़्तार करके मोदी शाह ने गिरती अर्थव्यवस्था को क़ाबू में कर लिया।

आज शेयर बाज़ार और भारतीय रूपया जब शाम को औंधे मुँह गिरा तो उसके तुरंत बाद ईडी ने कर्नाटक के बड़े कांग्रेसी नेता डीके शिवकुमार के गिरफ़्तार कर लिया। अब ये शिवकुमार जब तक जेल में रहेगा तब तक न रूपया गिरेगा और न शेयर बाज़ार। मंदी के कंट्रोल के लिए शिव कुमार का जेल जाना ज़रूरी था। 

मैं तो कहता हूँ कि धारा 370 नहीं हटती तो हमारी जीडीपी पाँच फीसदी से भी नीचे जा सकती थी। कश्मीरी अवाम लगातार भारतीय अर्थव्यवस्था के खिलाफ कुचक्र कर  रहा है। उसे सबक़ सिखाना ज़रूरी थी। फिर बात ये है कि हमें कश्मीर चाहिए कश्मीरी अवाम नहीं चाहिए। सारे कश्मीरी मोदीमय भारत की अर्थव्यवस्था को नीचे लाने के खेल में वे पाकिस्तान से मिल गए हैं।...

बक़ौल हमारे टीवी चैनलों के कटोरा लेकर भीख माँगने वाला....थर थर काँपता ....घुटने टेकने वाला...पूरी दुनिया में इज़्ज़त को मिट्टी में मिलवाने वाला पाकिस्तान रोज़ाना हमारी अर्थव्यवस्था को नीचे ले जाने के काम में इन्हीं कश्मीरी लोगों के साथ लगा हुआ है। सूत्रों का कहना है कि फिर से घने बादल छाने का इंतज़ार किया जा रहा है ताकि बालाकोट जैसी चढ़ाई पाकिस्तान पर फिर की जा सके और उसके रडार हमारे लड़ाकू विमान को देख न सकें। वैसे भी रफाल लड़ाकू विमान भी आने वाले हैं। अगला 15 अगस्त हम लोग इस्लामाबाद में मनाने की तैयारी अभी से कर सकते हैं। नागपुर में भी इस पर गुप्त बैठक हो चुकी है कि पाकिस्तान के किन किन शहरों में शाखा सबसे पहले लगाई जाएगी। जिन्ना की जहाँ क़ब्र है, उस इलाक़े में शाखा लगाने का काम पुराने जिन्ना प्रेमी आडवाणी को दिया जा सकता है। मुरली मनोहर जोशी को लाहौर में शाखा लगाने का काम सौंपा जा सकता है। ब्लूचिस्तान की तरफ़ इंद्रेश कुमार को भेजा जा सकता है।

 नागपुर से जुड़े सूत्रों का कहना है कि चीफ़ मोहन भागवत जल्द ही मोदी शाह मंडली को संबोधित करने वाले हैं कि संसद में संविधान संशोधन का प्रस्ताव लाकर पूरे देश में हर जगह शाखा अनिवार्य कर दी जाए क्योंकि देश की गिरती अर्थव्यवस्था को शाखा में लाठी भाँजने वाले स्वयंसेवक अपनी लाठी के दम पर संभाल लेंगे। नागपुरी टोटके के ज़रिए गिरती अर्थव्यवस्था को संभालने के बारे में जब मैंने देश के सबसे बड़े अर्थशास्त्री डॉ मनमोहन सिंह की प्रतिक्रिया  माँगी तो वह हतप्रभ रह गए। उन्होंने कहा कि मोहन भागवत के चरण छूने का मन कर रहा है। ऐसे अचूक नुस्ख़े अगर सोनिया जी हमें बतातीं तो हम तो देश की जीडीपी बीस फ़ीसदी तक पहुँचा देते। डॉक्टर साहब ने कहा कि भागवत ज़ी का नाम वह नोबेल पुरस्कार कमेटी को भेजेंगे।


Wednesday, August 28, 2019

कश्मीर डायरी/ मुस्लिम पत्रकार

कांग्रेस और राहुल गांधी की हालत बेचारे मुसलमानों जैसी हो गई है।...जिन पर कभी तरस तो कभी ग़ुस्सा आता है।
राहुल का आज का ट्वीट ही लें...

वह फ़रमा रहे हैं कि भले ही तमाम मुद्दों पर मेरा सरकार के साथ मतभेद है लेकिन मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। पाकिस्तान आतंक को बढ़ावा देने वाला देश है और वह कश्मीर में भी यही कर रहा है।

राहुल के इस बयान की लाचारी समझी जा सकती है कि आरएसएस और भाजपा जिस तरह उनके पाकिस्तानी होने का दुष्प्रचार कर रहे हैं उससे आहत होकर उन्हें यह बयान देना पड़ा। हालाँकि राहुल चाहते तो बयान को संतुलित करने के लिए फिर से कश्मीर के हालात और वहाँ की जनता पर हो रहे अत्याचार पर चिंता जता देते।

अपने निजी जीवन में मैं भी मुसलमानों को इस पसोपेश से जूझते देख रहा हूँ। ...किसी दफ़्तर में अगर दो या तीन मुस्लिम कर्मचारी आपस में खड़े होकर बात कर लें तो पूरे दफ़्तर की नज़र उन्हीं पर होती है। अग़ल बग़ल से निकल रहे लोग टिप्पणी करते हुए निकलेंगे...क्या छन रहा है...क्या साज़िश हो रही है...यहाँ भी एकता कर रहे हो...लेकिन ऐसे लोगों को किन्हीं सुरेश-मुकेश की अकेले में बातचीत के दौरान यह सब नहीं दिखता। ख़ासकर किसी दफ़्तर में पाकिस्तान पर बातचीत यह बहस होने के दौरान मुस्लिम कर्मचारी को बार बार अपने भारतीय होने का सबूत देना पड़ता है। ऐसे सबूत तो अब तथाकथित सेकुलर और वामपंथी भी चाहने लगे हैं।

कल में प्रेस क्लब में था। मैंने देखा कि संयोग से एक ही टेबल तीन ऐसेपत्रकार बैठे थे जो एक ही समुदाय यानी मुसलमान थे। चौथी कुर्सी ख़ाली थी। इतने में वहाँ एक और पत्रकार पहुँचे और बोला कि क्या कश्मीर पर खिचड़ी पका रहे हो। मैं तो जाट हूँ, मुझे भी शामिल कर लो। ख़ैर कुछ मिनट के सांप्रदायिक हंसीमजाक के बाद वह साहब भी वहाँ बैठ गए।

प्रेस क्लब की कल की एक और घटना सुनिए। कश्मीर में अख़बारों पर रोक लगाने और मीडियाकर्मियों की आजादी छीने जाने के विरोध में कल तमाम पत्रकार वहाँ जमा हुए। एक पत्रकार ने अपने संबोधन में कहा कि वह साथी पत्रकारों के बीच जब कश्मीर में मीडिया की आजादी छीने जाने की बात करते हैं तो बाकी साथी पत्रकार उन्हें देशद्रोही औरपाकिस्तानी जैसी फब्तियों से नवाजते हैं।

कल एक अन्य दफ़्तर में गया तो वहाँ एक शख़्स जेटली के नाम पर फ़िरोज़शाह कोटला स्टेडियम का नाम रखे जाने पर ऐतराज़ कर रहा था तो बाकी सारे न सिर्फ जेटली के नाम का समर्थन कर रहे थे बल्कि उससे यह तक कह रहे थे कि तुम तो हो ही पाकिस्तानी, तुम्हें तो देशभक्तों के नाम पर रखे जाने पर ऐतराज़ होगा ही। वे सारे के सारे गिनी पिग यह नहीं बता पा रहे थे कि आख़िर जेटली का दिल्ली के विकास में क्या योगदान है जो उनके नाम पर स्टेडियम का नामकरण कर दिया जाए।...और फिर जेटली तो कोई क्रिकेट खिलाड़ी भी तो नहीं थे।

बहुत पहले लखनऊ के एक संस्थान में मेरे एक बड़े अधिकारी मुझसे मिलने में नज़रें चुराते थे क्योंकि वह मुसलमान थे। जबकि उसी दफ़्तर के मेरे बाकी साथी यह मानते थे कि वह मुझे फ़ेवर करते थे। हालाँकि उनके किसी एक्शन से यह ज़ाहिर नहीं हुआ। क्योंकि पैसे और तरक़्क़ी में मैं ग़ैर मुस्लिमों के मुक़ाबले अंतिम पायदान पर रहता था।

यह घटनाएँ बता रही हैं कि किस रसातल में हम जा रहे हैं। अपने आप को बुद्धिजीवी कहने वाले एक पत्रकार ने हाल ही में मुझसे कहा कि किरमानी जी जानते हैं यह सब क्यों हो रहा है....मेरे नहीं कहने पर उन्होंने कहा कि इस बहुसंख्यक देश में मुसलमानों का तुष्टिकरण बहुत किया गया है। हिंदू अब जाग उठा है इसलिए ये हालात बने हैं।

फ़ेसबुक पर हमारे तमाम साथी इन नाज़ीवादी स्थितियों पर धीरे धीरे चुप्पी साध रहे हैं। वे अर्बन नक्सली बनने के कथित पाप से बचना चाहते हैं लेकिन उन्हें नहीं पता कि वे एक अंधे कुएँ की और बढ़ रहे हैं।...

नोट: मेरी कश्मीर डायरी लगातार लिखी जा रही है। इसी शीर्षक से मेरी पिछली पोस्ट देखने के लिए मेरा फ़ेसबुक पेज देखें। मेरे हिंदीवाणी ब्लॉक पर भी कुछ लेख देखे जा सकते हैं।

#RahulGandhi
#Kashmir

Thursday, August 8, 2019

कश्मीर डायरी/ इतिहास से सीखो


कश्मीर डायरी/ 

बहुत पुरानी कहानी नहीं है
..............................
इराक़ में सद्दाम हुसैन की हुकूमत थी। सद्दाम इराक़ के जिस क़बीले या ग्रुप से था वह अल्पसंख्यक है। इसके बावजूद उसका बहुसंख्यक शिया मुसलमानों पर शासन था। वहाबी विचारधारा से प्रभावित होने की वजह से इराक़ की बहुसंख्यक शिया आबादी पर उसका ज़ुल्म-ओ-सितम सारी हदें पार कर गया था। बहुसंख्यक होने के बावजूद शिया सद्दाम का विरोध इसलिए नहीं कर पा रहे थे कि उन्हें अहिंसा के बारे में चूँकि जन्म से ही शिक्षा मिलती है तो वे सद्दाम का हर ज़ुल्म सह रहे थे।

इसी दौरान अमेरिका ने सद्दाम को पड़ोस के शिया मुल्क ईरान पर हमले के लिए इस्तेमाल किया और अमेरिका की मदद से हमला कर दिया। एक साल तक लड़ाई चली। सद्दाम हार गया और पीछे हट गया। लेकिन इस बहाने अमेरिका इराक़ में जा घुसा। अमेरिका को इराक़ में जाकर यह समझ आया कि सद्दाम तो अल्पसंख्यक है, क्यों न यहाँ बहुसंख्यक शियों में से किसी को खड़ा करके उनकी कठपुतली सरकार बनाई जाए। अमेरिका ने इस नीति को लागू करना शुरू कर दिया। सद्दाम क़ैद कर लिया गया और इराक़ में बहुसंख्यक शिया हुकूमत क़ायम हो गई। 

यहीं पर अमेरिका से एक चूक हो गई। उसकी सारी रणनीति का उस वक़्त पलीता लग गया जब शिया हुकूमत बनते ही उसने ईरान से मदद लेनी, सलाह लेनी शुरू कर दी। नजफ़ में बैठे शिया रहबर हुकूमत को गाइड करने लगे। अब इराक़ में हर काम ईरान के सलाह मशविरे से होता है।

हमारे सामने बांग्लादेश का उदाहरण सामने है। पाकिस्तान का एक हिस्सा जो पूर्वी पाकिस्तान कहलाता था, वहाँ के लोग पाकिस्तान के साथ रहने को तैयार नहीं थे। उनकी भाषा, संस्कृति पूरे पाकिस्तान से अलग थी। उन्होंने बग़ावत कर दी। इंदिरा गांधी की मदद से बांग्लादेश बन गया। इंदिरा को दुर्गा बना दिया गया लेकिन 1977 में जनता ने इंदिरा की कुछ ग़लतियों के लिए उखाड़ फेंका। आज इतिहास में इंदिरा गांधी का मूल्याँकन सिर्फ बांग्लादेश बनवाने के लिए नहीं करता।

इस छोटी सी ऐतिहासिक घटना का ज़िक्र मैंने दरअसल कश्मीर के संदर्भ में किया। कश्मीर में मेरा आना जाना रहा है। यह हक़ीक़त है कि वहाँ की बहुसंख्यक आबादी ने कभी भारत सरकार के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया। लेकिन वहाँ विधानसभा चुनाव होते रहने की वजह से सारी स्थितियाँ ढंकी छिपी थीं और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बना हुआ था। लेकिन संविधान के जिस धागे से कश्मीर बँधा हुआ था उसे अब तोड़ दिया गया है।

आख़िर भारत सरकार वहाँ संगीनों के साये में कितने दिन हुकूमत करेगी। वहाँ के अवाम को साथ लिए बिना मोदी शाह किनका राज वहाँ स्थापित करा पाएँगे। 

मुग़लों ने 600 साल और अंग्रेज़ों ने 200 साल जाहिल व बेवक़ूफ़ बहुसंख्यक भारतीयों पर हुकूमत की लेकिन एक दिन दोनों को बोरिया बिस्तर बाँध कर जाना पड़ा। उनका वजूद सिर्फ ऐतिहासिक इमारतों के रूप में मौजूद है। कश्मीरियों ने अगर कुछ ठान लिया है तो बेशक आप वहाँ एक हज़ार साल फ़ौज के बल पर शासन कर लें आपको कश्मीर वहाँ के लोगों के हवाले करके आना पड़ेगा। अभी तक वहाँ की गतिविधियों में मुट्ठीभर आतंकी पाकिस्तान के इशारे पर हरकतें करते थे लेकिन अब ? क्या वहाँ की जनता की हमदर्दी उन्हें हासिल नहीं हो जाएगी। हालात ये है कि वहाँ की कोई भी राजनीतिक पार्टी और क्षेत्रीय दल अब भाजपा व कांग्रेस के साथ मिलकर काम करने को तैयार नहीं होंगे।

देश में ऐसे दस राज्य हैं जिन्हें कश्मीर की तरह विशेष दर्जा मिला हुआ है। क्या उन राज्यों को अपने नियंत्रण में लेने की जुर्रत, हिमाक़त भारत सरकार कर सकती है ? लेकिन आपने कश्मीर में यह एक ही भूल और हिमाकत इसलिए की है कि वहाँ की बहुसंख्यक आबादी पर आपका़ शासन आपके चुनावी एजेंडे को मुकम्मल करता है।

भारत की जनता अभी जागी नहीं है, वरना उसमें किसी भी नागपुरी एजेंडे को उखाड़ने की ताक़त है। बेशक नागपुरी संतरों को यह ग़लतफ़हमी हो कि वह पूरे देश को नाज़ी विचारधारा में कंडीशन्ड कर चुके हैं लेकिन कही से कोई चिंगारी उड़ेगी और बेईमानी, छल से हासिल किए गए मक़सद को उड़ा देगी।


मोदी आज रात 8 बजे देश को संबंधित करने वाले हैं। इसे 8-8 के संयोग से भक्तों ने जोड़ दिया है। आप लोगों को याद होगा जब पीएम मोदी ने 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी यह कहकर की थी कि इससे आतंकवाद की कमर टूट जाएगी...देश की आर्थिक स्थिति अच्छी हो जाएगी...युवकों को रोज़गार मिलेगा यानी हर बीमारी का इलाज नोटबंदी को बताया गया था। अब वही बातें फिर कश्मीर के संदर्भ में कही जा रही हैं। आज रात देखते हैं कि मोदी जी नया सब्ज़बाग़ क्या दिखाते हैं ? बहरहाल, उन्होंने कश्मीर में अपनी गर्दन फँसा ही दी है।



Saturday, August 3, 2019

गोदी मीडिया पर रवीश का चला बुलडोजर

गोदी मीडिया पर चला रवीश कुमार का बुलडोजर
...................................................................

भारत आज रवीश कुमार Ravish Kumar बन गया है। भारतीय पत्रकारिता के सबसे बुरे दौर में रवीश को रेमन मैगसॉयसॉय पुरस्कार के लिए चुना जाना एक ऐसी ठंडी हवा की झोंके की तरह है जब आप डर, दबाव, आतंक के पसीने में तरबतर होते हैं। एक क्लोज ग्रुप में जिसमें रवीश भी हैं, उसमें एक मित्र ने टिप्पणी आज सुबह टिप्पणी की कि - गोदी पत्रकारों और गोदी पत्रकारिता पर बुलडोजर चल गया।...सचमुच यह टिप्पणी बताती है कि कुछ पत्रकार जिन मनःस्थितियों में गुजर रहे हैं, उनके लिए यह कितनी बड़ी खुशी का दिन है। ताज्जुब है कि प्रधानमंत्री समेत सत्तारूढ़ सरकार के किसी मंत्री संतरी को यह महसूस नहीं हुआ कि भारत का गौरव बढ़ाने के लिए वे भी रवीश को बधाई देते। हालाँकि वे हर चिंदी चोर को छोटा पुरस्कार या सम्मान पाने पर बधाई देना नहीं भूलते।
हिंदी पत्रकारिता को वह सम्मान इस देश में नहीं प्राप्त है, जो अंग्रेजी या दूसरी क्षेत्रीय भाषा की पत्रकारिता को प्राप्त है। लेकिन एक अकेले बंदे ने आज तमाम मान्यताओं को ध्वस्त कर बताया कि अगर आपको बात कहने का निडर तरीका आता है, बेशक किसी भी भाषा में, तो उसकी धमक दूर तक सुनाई देती है।

गोदी मीडिया के भी कुछ पत्रकार आज रवीश को बधाई देते नजर आए, जो उनकी अंधेरा, एसएससी और नौकरी सीरीज पर की गई रिपोर्टिंग का मजाक उड़ाते देखे और सुने गए थे। मुझे याद है कि जब मैंने टीवी स्क्रीन पर अंधेरा वाली रिपोर्ट की तारीफ पत्रकारों के एक समूह में की तो कैसे वहां बैठे मेरे ही पत्रकार साथियों ने उसका मजाक उड़ाया। ...चुनावों के दौरान गांवों की रिपोर्टिंग ने उन्हें बाकी पत्रकारों से हमेशा अलग खड़ा किया।

जिस तरह की पत्रकारिता में जोखिम है, रवीश ने हमेशा उस जोखिम को उठाया। लेकिन उनका जोखिम सलीके वाला होता है, अतिरेक वाला नहीं। जब टीवी मीडिया में चिल्लाना ही सफलता का सबसे बड़ा पैमाना हो, वहां सूकून और शीलनता से बात कहने का अंदाज रवीश का अपना यूनीक फॉर्म्युला है। वह यह भी कहने से नहीं चूकते कि अंग्रेजी में मेरा हाथ तंग है, इसलिए हिंदी में ही उस बात को कहने या बताने की कोशिश रवीश अपने ढंग से करते हैं।

सत्तारूढ़ पार्टी ने रवीश का रास्ता रोकने की हर चंद कोशिश की। आईटी सेल ने भाड़े के लोगों को रवीश को डराने की सुपारी तक दी। उनका मोबाइल नंबर सार्वजनिक कर उन्हें अंध भक्तों से आतंकित करने की कोशिश भी हुई। ...लोग रोजना इस खबर का इंतजार करते थे कि रवीश का प्राइम टाइम अब बंद होगा...बस, अब तो ये गया।...रवीश का पीछा किए जाने की घटना भला कैसे भुलाई जा सकती है। उनके मुंह पर आज तमाचा पड़ा है।

रवीश ने चूंकि खुद को खुद ही गढ़ा है तो इस मामले में एनडीटीवी को सीधे तो बधाई नहीं बनती है लेकिन हां, इतना तो मानना पड़ेगा कि एनडीटीवी ने भी तमाम जोखिम उठाकर रवीश को इतना बड़ा मंच दिया, जिसके जरिए वह अपनी बात लोगों के सामने रख सके। हालांकि तमाम लोगों ने इसके पीछे भी मकसद देखा लेकिन हमें जो सामने से दिखाई देता है कि एनडीटीवी हिंदी को पहचान रवीश ने ही दिलाई। प्रणव रॉय निश्चित रूप से बेहतरीन पत्रकार होने के अलावा चालाक अनुभवी कारोबारी भी हैं। उनकी पारखी नजरों ने रवीश को आंकने में भूल नहीं की। भले ही भारत के सभी टीवी न्यूज चैनल में एक से एक पद्मश्री वाले पत्रकार हों या तथाकथित बड़े नाम हों लेकिन रवीश के मुकाबले वे कहीं खड़े नहीं हो सकते। वे भी नहीं जो लुच्चे लंफगे नेताओं के साथ सेल्फी खिंचवाते चलते हैं।

मैं देख रहा हूं कि फेसबुक, इंस्टाग्राम, टि्वटर, वाट्सऐप, प्रिंटरेस्ट समेत तमाम सोशल मीडिया प्लैटफॉर्मों पर रवीश कुमार का नाम हलचल पैदा कर रहा है, ट्रेंड कर रहा है। ऐसे आम लोग तमाम जगहों पर बधाई का आदान-प्रदान कर रहे हैं जिन्हें पत्रकारिता के बारे में कोई जानकारी नहीं है, वे बस रवीश को टीवी के जरिए जानते हैं। मेरी फेसबुक पोस्ट और वाट्सऐप पर ऐसे बधाइयां आ रही हैं जैसे यह पुरस्कार मुझे ही मिला हो। खास यह है कि यह सब नेचुरल है यानी इसके पीछे कुछ भी प्रायोजित नहीं है। वरना आप सोशल मीडिया पर ट्रेंड और लाइक पैसे से खरीद सकते हैं।

...मेरे लोग जानते हैं कि गोदी मीडिया के खिलाफ जब मैं आवाज उठाता हूं तो आज मुझे भी रवीश को इस पुरस्कार के लिए चुने जाने की घोषणा से कितनी खुशी हो रही होगी। शायद कुछ लोगों को मेरी वह फेसबुक पोस्ट याद हो। जिसमें मैंने मेट्रो में यात्रा करते हुए एक शख्स की तस्वीर पोस्ट की थी। वह शख्स पूरे एक घंटे की यात्रा के दौरान रवीश कुमार की लिखी किताब पढ़ रहा था। मुझे यह अच्छा लगा था कि मेरे पसंदीदा टीवी पत्रकार को कोई पढ़ रहा है। लेकिन जैसे ही वह फोटो लोगों के सामने आई तो लोगों ने ही बताया कि वह कोई वीर सिंह हैं, जो वह किताब पढ़ रहे थे। खैर, बाद में वीर सिंह मेरे फेसबुक मित्र बने। लेकिन हिंदी के पत्रकार को मौजूदा दौर में पढ़ा जाना मुझे अच्छा लगा।

उम्मीद है कि मशहूर लेखक मंगलेश डबराल जी को अपनी हिंदी विरोधी टिप्पणी का जवाब आज मिल गया होगा। मंगलेश जी ने हिंदी लेखन और पत्रकारिता में बढ़ती सांप्रदायिकता पर क्षोभ जताते हुए पिछले हफ्ते हिंदी को ही कोस डाला था। उस पर हिंदी के लेखक बहस कर रहे हैं लेकिन रवीश को इस पुरस्कार के योग्य समझे जाने के बाद हिंदी का सम्मान भी कहीं न कहीं बढ़ा है। बेशक टीवी पर आपका लेखन सामने नहीं आता लेकिन जिस दौर में हिंदी पत्रकार बोलने से शरमा रहे हों, डर रहे हों, उस दौर में इस पुरस्कार से हिंदी का सम्मान तो बढ़ा ही है।

बहरहाल, रवीश पर लिखने के लिए बहुत कुछ है। वो फिर कभी। अभी तो इस पुरस्कार की खुमारी उतरने दीजिए। ...मयकदे का पैमाना भरने दीजिए।... आज उनकी महफिल में रतजगा होने दीजिए।

Thursday, July 25, 2019

बात ज़रा सिक्का उछाल कर...

मुग़ल काल के दौरान अकबर ने भारत में 50 साल तक शासन किया। उसने उस समय चाँदी के जो सिक्के जारी किए उन पर राम सीता की तस्वीर है। (फोटो नीचे देखें) ...

इतिहास टटोल डालिए उस वक़्त किसी मौलवी या मुफ़्ती ने अकबर के खिलाफ फ़तवा जारी नहीं किया। 

अकबर से पहले बाबर और हुमायूँ ने जो सिक्के जारी किए थे, उन पर इस्लाम के चार ख़लीफ़ाओं के नाम होते थे। 

ज़ाहिर है कि अल्पसंख्यक अकबर ने बहुसंख्यक लोगों की भावनाओं की क़द्र करते हुए राम सीता वाले सिक्के जारी किए होंगे।  



सत्ता मिलने पर किसी शासक को जैसा बौराया हुआ अब देख रहे हैं वैसा कभी नहीं हुआ। 

औरंगज़ेब काल में ज़ुल्म किए जाने की बात जहाँ तहाँ लिखी गई है लेकिन इतिहासकारों ने उसके द्वारा मंदिर बनवाने और मंदिरों को चंदा देने की बात भी दर्ज की गई है।  

लेकिन जो अब हो रहा है, वैसा कभी नहीं हुआ। सांप्रदायिक सल्तनत में बदलते इस देश में अलग विचार रखना, बोलना, लिखना गुनाह होता जा रहा है। 

फ़िल्म डायरेक्टर अनुराग कश्यप, अदाकारा अपर्णा सेन, इतिहासकार रामचंद्र गुहा समेत कई जानी मानी हस्तियों ने कल प्रधानमंत्री को बढ़ती मॉब लिंचिंग, ज़बरन सांप्रदायिक नारे लगवाने के बारे में एक पत्र लिखा जिसमें उनसे इन मसलों पर क़दम उठाने का आग्रह किया गया था। 

दलाल पत्रकार (अरबन) गोस्वामी समेत तमाम टीवी चैनलों के तनबदन में आग लग गई। उन्होंने उन जानी मानी हस्तियों को असहिष्णुता गैंग नाम दिया। गोस्वामी टीवी पर चीख़ने चिल्लाने की सीमा को भी पार कर गया। दो हज़ार रूपये के नोट में चिप लगाने वाले पत्रकार तो ऐसे बौखलाए कि वो इडियट बॉक्स (टीवी) से निकलकर असहमत लोगों को अभी पीटने लगेंगे। 

तमिलनाडु में एक शख़्स ने किसी वाट्सऐप ग्रुप में मोदी सरकार में बढ़ती सांप्रदायिकता के खिलाफ कुछ टिप्पणी कर दी। पुलिस ने उसे गिरफ़्तार कर लिया गया।...लेकिन दूसरी तरफ़ सांप्रदायिक हत्यारों, नफ़रत फैलाने वालों पर कोई कार्रवाई नहीं। है। ...और अब तो सरकार कानून बनाने जा रही है। लोकसभा से पास हो चुका है। राज्यसभा की मंज़ूरी के बाद राष्ट्रपति की मंज़ूरी और उसके बाद किसी भी सरकार विरोधी विचारों के लिए जेल जाने को तैयार रहिए...

पिछले शनिवार की फ़ेसबुक पोस्ट में मैंने उस सांप्रदायिक विडियो गाने का ज़िक्र किया था। जिसमें धर्म विशेष का नारा नहीं लगाने वालों को क़ब्रिस्तान भेजने की बात कही गई थी। उस गाने में खुलकर हिंसा की बात कही गई है। लेकिन दिल्ली पुलिस ने अभी तक गाने वालों पर, उस कंपनी पर और यूट्यूब के खिलाफ कोई केस दर्ज नहीं किया। 

आपको अगर किसी धर्म और समुदाय  से नफ़रत का अधिकार है तो तमाम लोगों को उससे असहमत होने का अधिकार देना ही पड़ेगा।


बहरहाल, सरकार के विरोध में हॉगकॉग में चल रहे सफल नागरिक प्रदर्शनों के लिए वहाँ की जनता को बधाई। ...जब जागो तभी सवेरा...

Monday, July 15, 2019

राष्ट्रवाद जब लानत बन जाए

इंग्लैंड और न्यूज़ीलैंड के बीच कल खेले गए वर्ल्ड कप फ़ाइनल से भारत के लोग बहुत कुछ सीख सकते हैं। ...

क्या आपको दोनों देशों के क्रिकेट प्रेमियों की कोई उन्मादी तस्वीर दिखाई दी कि कोई जीत के लिए हवन करा रहा हो या मस्जिद में दुआ कर रहा है? क्या इंग्लैंड की जीत के बाद न्यूज़ीलैंड में किसी ने टीवी सेट तोड़ा, किसी ने खिलाड़ियों के फोटो जलाए?


इंग्लैंड के किसी शहर में वर्ल्ड की जीत के बाद किसी ने पटाखे छोड़े जाते हुए कोई तस्वीर देखी? न्यूज़ीलैंड में किसी ने क्रिकेट खिलाड़ियों की फोटो पर जूते मारते देखा? दोनों टीमों ने बेहतरीन खेल का मुज़ाहिरा किया- बस इतनी प्रतिक्रिया जताकर लोग रह गए।

दरअसल, एशिया के सिर्फ दो देशों भारत और पाकिस्तान की मीडिया और वहाँ के राजनीतिक दलों ने क्रिकेट को राष्ट्रवाद से जोड़ दिया है। दोनों देशों की जाहिल जनता धर्म की अफ़ीम चाट चाट कर उन्माद की हद तक क्रिकेट से प्यार करने लगी है। देश में मैरी कॉम, पीटा उषा या हिमा दास का वह रूतबा नहीं है जो विराट कोहली या धोनी का है। इन तीनों महिला खिलाड़ियों की हैसियत पैसे के हिसाब से क्रिकेट के किसी मामूली खिलाड़ी से करिए। क्रिकेट वाला भारी पड़ेगा। 

दोनों ही देशों के लोग सट्टेबाज़ों द्वारा, अंडरवर्ल्ड डॉन द्वारा, नेताओं द्वारा इस खेल में लगाए जा रहे पैसे से पैसा कमाने की हक़ीक़त नहीं समझ पा रहे हैं।...क्योंकि धार्मिक और राष्ट्रीय उन्माद उन्हें कुछ और सोचने और समझने नहीं दे रहा है।

देश क्रिकेट के नाम पर एकजुट नज़र आता है...लेकिन बॉम्बे के पास बुलेट ट्रेन के लिए हज़ारों पेड़ काटे जा रहे हैं, उसे रोकने के नाम पर एकजुट नज़र नहीं आ रहा है। ...देश दसवीं क्लास तक सभी बच्चों को प्राइवेट या सरकारी स्कूलों में मुफ़्त शिक्षा की माँग के लिए कभी एकजुट होता नज़र नहीं आता...देश सभी पाँच सितारा अस्पतालों का अधिग्रहण कर उन्हें जनता के मुफ़्त इलाज के लिए खोल देने के नाम पर एकजुट होता नज़र नही आता...दिल्ली-हरियाणा-राजस्थान के अरावली पहाड़ में एक ठग योग गुरू द्वारा ज़मीन हथियाए जाने के खिलाफ एकजुट होता नज़र नहीं आता...

जब क्रिकेट नहीं हो रहा होता है तब हम दंगों में, मॉब लिंचिंग में, मामूली झगड़ों में अपने अपने धर्म और जाति के साथ एकजुट नज़र आते हैं।....

राष्ट्रवाद एक लानत बनता जा रहा है। ...एक धब्बा...



Tuesday, June 25, 2019

मुस्तजाब की कविता ः सब कुछ धुंधला नजर आ रहा है

मुस्तजाब की कविताएं हिंदीवाणी पर आप लोग पहले भी पढ़ चुके हैं...पेश है उनकी नवीनतम कविता





सब धुंधला नजर आ रहा है
..........................................


सब धुंधला नजर आ रहा है
सच, झूठ, तारीख, तथ्य
किसे मानें, रह गया है क्या सत्य

सलाखें बन गए हैं मस्तिष्क हमारे
अंदर ही घुट घुट कर सड़ रहे हैं लोग बेचारे

एक कतार में हम सब अटक गए हैं
समझ रहे हैं राह है सही, मगर भटक गए हैं

जो कहता है अंध बहुमत उसे मान लेते हैं
चाहे झूठ हो, संग चलने की ठान लेते हैं

क्या हुआ जो लोग मर रहे हैं
आजादी के पीर सलाखों में सड़ रहे हैं

कहने पर रोक है,
अंधा हो गया कोर्ट है

डरपोक सब ठंडी हवा में बैठे हैं
कातिल संसद में टिका बैठे हैं
सच्चे तो खैर आजादी ही गवां बैठे हैं

मगर हमें क्या हम तो धुंधलेपन के मुरीद हैं
धरम तक ही रह गई साली सारी भीड़ है

और इसी धुंधलेपन का फायदा मसनदखोर उठा रहा है
हम अंधे हो रहे हैं वो हमारा देश जला रहा है

-मुस्तजाब



मुस्तजाब की कुछ कविताओं के लिंक -

http://www.hindivani.in/2017/12/blog-post.html

http://www.hindivani.in/2019/02/blog-post_16.html

Tuesday, May 28, 2019

सावरकर की अंदरूनी कहानियां

सावरकर पर बेहतरीन लेख...ज़रूर पढ़ें...           


अक्तूबर, 1906 में लंदन में एक ठंडी शाम चितपावन ब्राह्मण विनायक दामोदर सावरकर इंडिया हाउज़ के अपने कमरे में झींगे यानी 'प्रॉन' तल रहे थे.

सावरकर ने उस दिन एक गुजराती वैश्य को अपने यहाँ खाने पर बुला रखा था जो दक्षिण अफ़्रीका में रह रहे भारतीयों के साथ हो रहे अन्याय के प्रति दुनिया का ध्यान आकृष्ट कराने लंदन आए हुए थे.

उनका नाम था मोहनदास करमचंद गांधी. गाँधी सावरकर से कह रहे थे कि अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ उनकी रणनीति ज़रूरत से ज़्यादा आक्रामक है. सावरकर ने उन्हें बीच में टोकते हुए कहा था, "चलिए पहले खाना खाइए."

बहुचर्चित किताब 'द आरएसएस-आइकॉन्स ऑफ़ द इंडियन राइट' लिखने वाले नीलांजन मुखोपाध्याय बताते हैं, "उस समय गांधी महात्मा नहीं थे. सिर्फ़ मोहनदास करमचंद गाँधी थे. तब तक भारत उनकी कर्म भूमि भी नहीं बनी थी."

"जब सावरकर ने गांधी को खाने की दावत दी तो गांधी ने ये कहते हुए माफ़ी माँग ली कि वो न तो गोश्त खाते हैं और न मछली. बल्कि सावरकर ने उनका मज़ाक भी उड़ाया कि कोई कैसे बिना गोश्त खाए अंग्रेज़ो की ताक़त को चुनौती दे सकता है? उस रात गाँधी सावरकर के कमरे से अपने सत्याग्रह आंदोलन के लिए उनका समर्थन लिए बिना ख़ाली पेट बाहर निकले थे."

साल 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के छठवें दिन विनायक दामोदर सावरकर को गाँधी की हत्या के षड्यंत्र में शामिल होने के लिए मुंबई से गिरफ़्तार कर लिया गया था. हाँलाकि उन्हें फ़रवरी 1949 में बरी कर दिया गया था.

आरएसएस का न होते हुए भी संघ परिवार में इज़्ज़त
इसे एक विडंबना ही कहा जाएगा कि कभी भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनसंघ के सदस्य न रहे वीर सावरकर का नाम संघ परिवार में बहुत इज़्ज़त और सम्मान के साथ लिया जाता है.

वर्ष 2000 में वाजपेयी सरकार ने तत्कालीन राष्ट्पति केआर नारायणन के पास सावरकर को भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' देने का प्रस्ताव भेजा था, लेकिन उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया था.

नीलांजन मुखोपाध्याय बताते हैं, "26 मई, 2014 को नरेंद्र मोदी शपथ लेते हैं. उसके दो दिन बाद ही वीर सावरकर की 131वीं जन्म तिथि पड़ती है. वो संसद भवन जा कर सावरकर के चित्र के सामने सिर झुका कर उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं. हमें मानना पड़ेगा कि सावरकर बहुत ही विवादास्पद शख़्सियत थे."

"हम नहीं भूल सकते कि गाँधी हत्याकांड में उनके ख़िलाफ़ केस चला था. वो छूट ज़रूर गए थे, लेकिन उनके जीवन काल में ही उसकी जाँच के लिए कपूर आयोग बैठा था और उसकी रिपोर्ट में शक की सुई सावरकर से हटी नहीं थी. उस नेता को सार्वजनिक रूप से इतना सम्मान देना मोदी की तरफ़ से एक बहुत बड़ा प्रतीकात्मक कदम था."

नासिक के कलेक्टर की हत्या के सिलसिले में गिरफ़्तारी

अपने राजनीतिक विचारों के लिए सावरकर को पुणे के फरग्यूसन कालेज से निष्कासित कर दिया गया था. साल 1910 में उन्हें नासिक के कलेक्टर की हत्या में संलिप्त होने के आरोप में लंदन में गिरफ़्तार कर लिया गया था.

सावरकर पर ख़ासा शोध करने वाले निरंजन तकले बताते हैं, "1910 में नासिक के जिला कलेक्टर जैकसन की हत्या के आरोप में पहले सावरकर के भाई को गिरफ़्तार किया गया था."

"सावरकर पर आरोप था कि उन्होंने लंदन से अपने भाई को एक पिस्टल भेजी थी, जिसका हत्या में इस्तेमाल किया गया था. 'एसएस मौर्य' नाम के पानी के जहाज़ से उन्हें भारत लाया जा रहा था. जब वो जहाज़ फ़ाँस के मार्से बंदरगाह पर 'एंकर' हुआ तो सावरकर जहाज़ के शौचालय के 'पोर्ट होल' से बीच समुद्र में कूद गए."

आगे की कहानी उनकी जीवनी 'ब्रेवहार्ट सावरकर' लिखने वाले आशुतोष देशमुख बताते हैं, "सावरकर ने जानबूझ कर अपना नाइट गाउन पहन रखा था. शौचालय में शीशे लगे हुए थे ताकि अंदर गए क़ैदी पर नज़र रखी जा सके. सावरकर ने अपना गाउन उतार कर उससे शीशे को ढ़क दिया."

"उन्होंने पहले से ही शौचालय के 'पोर्ट होल' को नाँप लिया था और उन्हें अंदाज़ा था कि वो उसके ज़रिए बाहर निकल सकते हैं. उन्होंने अपने दुबले-पतले शरीर को पोर्ट-होल से नीचे उतारा और बीच समुद्र में कूद गए."

"उनकी नासिक की तैरने की ट्रेनिंग काम आई और वो तट की तरफ़ तैरते हुए बढ़ने लगे. सुरक्षाकर्मियों ने उन पर गोलियाँ चलाईं, लेकिन वो बच निकले."


सुरक्षाकर्मियों की गिरफ़्त में
देशमुख आगे लिखते हैं, "तैरने के दौरान सावरकर को चोट लगी और उससे ख़ून बहने लगा. सुरक्षाकर्मी भी समुद्र में कूद गए और तैर कर उनका पीछा करने लगे."

"सावरकर करीब 15 मिनट तैर कर तट पर पहुंच गए. तट रपटीला था. पहली बार तो वो फिसले लेकिन दूसरे प्रयास में वो ज़मीन पर पहुंच गए. वो तेज़ी से दौड़ने लगे और एक मिनट में उन्होंने करीब 450 मीटर का फ़ासला तय किया."

"उनके दोनों तरफ़ ट्रामें और कारें दौड़ रही थीं. सावरकर क़रीब क़रीब नंगे थे. तभी उन्हें एक पुलिसवाला दिखाई दिया. वो उसके पास जा कर अंग्रेज़ी में बोले, 'मुझे राजनीतिक शरण के लिए मैजिस्ट्रेट के पास ले चलो.' तभी उनके पीछे दौड़ रहे सुरक्षाकर्मी चिल्लाए, 'चोर! चोर! पकड़ो उसे.' सावरकर ने बहुत प्रतिरोध किया, लेकिन कई लोगों ने मिल कर उन्हें पकड़ ही लिया."

अंडमान की सेल्युलर जेल की कोठरी नंबर 52 में

इस तरह सावरकर की कुछ मिनटों की आज़ादी ख़त्म हो गई और अगले 25 सालों तक वो किसी न किसी रूप में अंग्रेज़ों के क़ैदी रहे.

उन्हें 25-25 साल की दो अलग-अलग सजाएं सुनाई गईं और सज़ा काटने के लिए भारत से दूर अंडमान यानी 'काला पानी' भेज दिया गया.

उन्हें 698 कमरों की सेल्युलर जेल में 13.5 गुणा 7.5 फ़ीट की कोठरी नंबर 52 में रखा गया.

वहाँ के जेल जीवन का ज़िक्र करते हुए आशुतोष देशमुख, वीर सावरकर की जीवनी में लिखते हैं, "अंडमान में सरकारी अफ़सर बग्घी में चलते थे और राजनीतिक कैदी इन बग्घियों को खींचा करते थे."

"वहाँ ढंग की सड़कें नहीं होती थीं और इलाक़ा भी पहाड़ी होता था. जब क़ैदी बग्घियों को नहीं खींच पाते थे तो उनको गालियाँ दी जाती थीं और उनकी पिटाई होती थी. परेशान करने वाले कैदियों को कई दिनों तक पनियल सूप दिया जाता था."

"उनके अलावा उन्हें कुनैन पीने के लिए भी मजबूर किया जाता था. इससे उन्हें चक्कर आते थे. कुछ लोग उल्टियाँ कर देते थे और कुछ को बहुत दर्द रहता था."

अंग्रेज़ों को माफ़ीनामा
लेकिन यहाँ से सावरकर की दूसरी ज़िदगी शुरू होती है. सेल्युलर जेल में उनके काटे 9 साल 10 महीनों ने अंग्रेज़ों के प्रति सावरकर के विरोध को बढ़ाने के बजाय समाप्त कर दिया.

निरंजन तकले बताते हैं, "मैं सावरकर की ज़िंदगी को कई भागों में देखता हूँ. उनकी ज़िदगी का पहला हिस्सा रोमांटिक क्रांतिकारी का था, जिसमें उन्होंने 1857 की लड़ाई पर किताब लिखी थी. इसमें उन्होंने बहुत अच्छे शब्दों में धर्मनिरपेक्षता की वकालत की थी."

"गिरफ़्तार होने के बाद असलियत से उनका सामना हुआ. 11 जुलाई 1911 को सावरकर अंडमान पहुंचे और 29 अगस्त को उन्होंने अपना पहला माफ़ीनामा लिखा, वहाँ पहुंचने के डेढ़ महीने के अंदर. इसके बाद 9 सालों में उन्होंने 6 बार अंग्रेज़ों को माफ़ी पत्र दिए."

"जेल के रिकॉर्ड बताते हैं कि वहाँ हर महीने तीन या चार कैदियों को फाँसी दी जाती थी. फाँसी देने का स्थान उनके कमरे के बिल्कुल नीचे था. हो सकता है इसका सावरकर पर असर पड़ा हो. कुछ हलकों में कहा गया कि जेलर बैरी ने सावरकर को कई रियायतें दीं."

"एक और कैदी बरिंद्र घोष ने बाद में लिखा कि सावरकर बंधु हम लोगों को जेलर के ख़िलाफ़ आंदोलन करने के लिए गुपचुप तौर से भड़काते थे. लेकिन जब हम उनसे कहते कि खुल कर हमारे साथ आइए, तो वो पीछे हो जाते थे. उनको कोई भी मुश्किल काम करने के लिए नहीं दिया गया था."

"सावरकर ने ये भी कहा था कि अंग्रेज़ों द्वारा उठाए गए गए कदमों से उनकी संवैधानिक व्यवस्था में आस्था पैदा हुई है और उन्होंने अब हिंसा का रास्ता छोड़ दिया है. शायद इसी का परिणाम था कि काला पानी की सज़ा काटते हुए सावरकर को 30 और 31 मई, 1919 को अपनी पत्नी और छोटे भाई से मिलने की इजाज़त दी गई थी."

जेल से बाहर रहने के लिए बनाई थी ये रणनीति
बाद में सावरकर ने खुद और उनके समर्थकों ने अंग्रेज़ों से माफ़ी माँगने को इस आधार पर सही ठहराया था कि ये उनकी रणनीति का हिस्सा था, जिसकी वजह से उन्हें कुछ रियायतें मिल सकती थीं.

सावरकर ने अपनी आत्मकथा में लिखा था, "अगर मैंने जेल में हड़ताल की होती तो मुझसे भारत पत्र भेजने का अधिकार छीन लिया जाता."

मैंने वरिष्ठ पत्रकार और इंदिरा गांधी सेंटर ऑफ़ आर्ट्स के प्रमुख राम बहादुर राय से पूछा कि आख़िर भगत सिंह के पास भी माफ़ी माँगने का विकल्प था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. तब सावरकर के पास ऐसा करने की क्या मजबूरी थी?

राम बहादुर राय का जवाब था, "भगत सिंह और सावरकर में बहुत मौलिक अंतर है. भगत सिंह ने जब बम फेंकने का फ़ैसला किया, उसी दिन उन्होंने तय कर लिया था कि उन्हें फाँसी का फंदा चाहिए. दूसरी तरफ़ वीर सावरकर एक चतुर क्रांतिकारी थे."

"उनकी कोशिश रहती थी कि भूमिगत रह करके उन्हें काम करने का जितना मौका मिले, उतना अच्छा है. मेरा मानना ये है कि सावरकर इस पचड़े में नहीं पड़े की उनके माफ़ी मांगने पर लोग क्या कहेंगे. उनकी सोच ये थी कि अगर वो जेल के बाहर रहेंगे तो वो जो करना चाहेंगे, वो कर सकेंगे."

सावरकर की हिंदुत्व की अवधारणा
अंडमान से वापस आने के बाद सावरकर ने एक पुस्तक लिखी 'हिंदुत्व - हू इज़ हिंदू?' जिसमें उन्होंने पहली बार हिंदुत्व को एक राजनीतिक विचारधारा के तौर पर इस्तेमाल किया.

निलंजन मुखोपाध्याय बताते हैं, "हिंदुत्व को वो एक राजनीतिक घोषणापत्र के तौर पर इस्तेमाल करते थे. हिंदुत्व की परिभाषा देते हुए वो कहते हैं कि इस देश का इंसान मूलत: हिंदू है. इस देश का नागरिक वही हो सकता है जिसकी पितृ भूमि, मातृ भूमि और पुण्य भूमि यही हो."

"पितृ और मातृ भूमि तो किसी की हो सकती है, लेकिन पुण्य भूमि तो सिर्फ़ हिंदुओं, सिखों, बौद्ध और जैनियों की हो हो सकती है, मुसलमानों और ईसाइयों की तो ये पुण्यभूमि नहीं है. इस परिभाषा के अनुसार मुसलमान और ईसाई तो इस देश के नागरिक कभी हो ही नहीं सकते."

"एक सूरत में वो हो सकते हैं अगर वो हिंदू बन जाएं. वो इस विरोधाभास को कभी नही समझा पाए कि आप हिंदू रहते हुए भी अपने विश्वास या धर्म को मानते रहें."

अंग्रेज़ों के साथ समझौता
साल 1924 में सावरकर को पुणे की यरवदा जेल से दो शर्तों के आधार पर छोड़ा गया.

एक तो वो किसी राजनैतिक गतिविधि में हिस्सा नहीं लेंगे और दूसरे वो रत्नागिरि के ज़िला कलेक्टर की अनुमति लिए बिना ज़िले से बाहर नहीं जाएंगे.

निरंजन तकले बताते हैं, "सावरकर ने वायसराय लिनलिथगो के साथ लिखित समझौता किया था कि उन दोनों का समान उद्देश्य है गाँधी, कांग्रेस और मुसलमानों का विरोध करना है."

"अंग्रेज़ उनको पेंशन दिया करते थे, साठ रुपए महीना. वो अंग्रेज़ों की कौन सी ऐसी सेवा करते थे, जिसके लिए उनको पेंशन मिलती थी ? वो इस तरह की पेंशन पाने वाले अकेले शख़्स थे."

काली टोपी और इत्र की बोतल
अतिवादी विचारों के बावजूद निजी ज़िदगी में वो अच्छी चीज़ों के शौकीन थे. वो चॉकलेट्स और 'जिन्टान' ब्रैंड की विहस्की पसंद करते थे.

उनके जीवनीकार आशुतोष देशमुख लिखते हैं, "सावरकर 5 फ़ीट 2 इंच लंबे थे. अंडमान की जेल में रहने के बाद वो गंजे हो गए थे. उन्हें तंबाकू सूँघने की आदत पड़ गई थी. अंडमान की जेल कोठरी में वो तंबाकू की जगह जेल की दीवारों पर लिखा चूना खुरच कर सूँघा करते थे, जिससे उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा."

"लेकिन इससे उनकी नाक खुल जाती थी. उन्होंने सिगरेट और सिगार पीने की भी कोशिश की, लेकिन वो उन्हें रास नहीं आया. वो कभी-कभी शराब भी पीते थे. नाश्ते में वो दो उबले अंडे खाते थे और दिन में कई प्याले चाय पीते थे. उनको मसालेदार खाना पसंद था, ख़ासतौर से मछली."

"वो अलफ़ांसो आम, आइसक्रीम और चॉकलेट के भी बहुत शौकीन थे. वो हमेशा एक जैसी पोशाक पहनते थे... गोल काली टोपी, धोती या पैंट, कोट, कोट की जेब में एक छोटा हथियार, इत्र की एक शीशी, एक हाथ में छाता और दूसरे हाथ में मुड़ा हुआ अख़बार!"

महात्मा गांधी हत्याकांड में गिरफ़्तारी

सावरकर की छवि को उस समय बहुत धक्का लगा जब 1949 में गांधी हत्याकांड में शामिल होने के लिए आठ लोगों के साथ उन्हें भी गिरफ़्तार कर लिया गया.

लेकिन ठोस सबूतों के अभाव में वो बरी हो गए.

नीलांजन मुखोपाध्याय बताते हैं, "पूरे संघ परिवार को बहुत समय लग गया गाँधी हत्याकाँड के दाग़ को हटाने में. सावरकर इस मामले में जेल गए, फिर छूटे और 1966 तक ज़िदा रहे लेकिन उन्हें उसके बाद स्वीकार्यता नहीं मिली."

"यहाँ तक कि आरएसएस ने भी उनसे पल्ला झाड़ लिया. वो हमेशा हाशिए पर ही पड़े रहे, क्यों कि उनसे गांधी हत्या की शक की सुई कभी नहीं हटी ही नहीं. कपूर कमिशन की रिपोर्ट में भी साफ़ कहा गया कि उन्हें इस बात का यकीन नहीं है कि सावरकर की जानकारी के बिना गांधी हत्याकाँड हो सकता था."

सावरकर की राजनीतिक विचारधारा
सावरकर के जीवन के आख़िरी दो दशक राजनीतिक एकाकीपन और अपयश में बीते.

उनके एक और जीवनीकार धनंजय कीर उनकी जीवनी 'सावरकर एंड हिज़ टाइम्स' में लिखते हैं कि लाल किले में चल रहे मुक़दमें में जज ने जैसे ही उन्हें बरी किया और नथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को फाँसी की सज़ा सुनाई, कुछ अभियुक्त सावरकर के पैर पर गिर पड़े और उन्होंने मिल कर नारा लगाया,

हिंदू - हिंदी - हिदुस्तान

कभी न होगा पाकिस्तान

राम बहादुर राय कहते हैं, "दरअसल उन पर आख़िरी दिनों में जो कलंक लगा है, उसने सावरकर की विरासत पर अंधकार का बादल डाल दिया है. दुनिया में शायद ही कोई ऐसा उदाहरण मिले जो क्राँतिकारी कवि भी हो, साहित्यकार भी हो और अच्छा लेखक भी हो."

'पोलराइज़िग फ़िगर'
1966 में अपनी मृत्यु के कई दशकों बाद भी भारतीय राजनीति में वीर सावरकर एक 'पोलराइज़िग फ़िगर' है. या तो वो आपके हीरों हैं या विलेन.

निरंजन तकले कहते हैं, "साल 2014 में संसद के सेंट्रल हॉल में जब नरेंद्र मोदी सावरकर के चित्र को सम्मान देने वहाँ पहुंचे तो उन्होंने अनजाने में अपनी पीठ महात्मा गांधी की तरफ़ कर ली, क्योंकि गाँधीजी का चित्र उनके ठीक सामने लगा था."

"ये आज की राजनीति की वास्तविकता है. अगर आपको सावरकर को सम्मान देना है तो आपको गाँधी की विचारधारा की तरफ़ पूरी तरह से पीठ घुमानी ही पड़ेगी. अगर आपको गांधी को स्वीकारना है तो आपको सावरकर की विचारधारा को नकारना होगा. शायद सही वजह है कि सावरकर अभी भी भारत में एक 'पोलराइज़िंग फ़िगर' हैं."


(साभार बीबीसी- रेहान फैज़ल)

Sunday, May 19, 2019

एग्जिट पोल और Artificial Intelligence managed Media

आज आख़िरी दौर के वोट डाले जा रहे हैं।...शाम को गोदी मीडिया पर एक्ज़िट पोल यानि कौन सरकार बनाएगा की भविष्यवाणी आने लगेगी...ज़ाहिर है कि ये सारे के सारे एक्ज़िट पोल अमित शाह द्वारा मैनेज कराये गए एग्जिट पोल हैं...इसलिए इनको गंभीरता से लेने की ज़रूरत नहीं है। 

अगर आप रोज़ेदार हैं तो आराम से रोज़ा खोलिए। दुआ माँगिए और कुरानशरीफ की तिलावत कीजिए।...कोई भी शैतानी ताक़त आपके ईमान को हराने की ताक़त नहीं रखती। शैतानी ताक़तों ने अपनी पराजय पहले ही स्वीकार कर ली है। 

अगर आप रोज़ेदार नहीं हैं तो आपको भी एग्जिट पोल को दिल पर लेने की ज़रूरत नहीं है। आराम से टीवी के सामने कुछ जूस, नारियल पानी, चाय-पकौड़े वग़ैरह लेकर बैठिए और टीवी एंकरों द्वारा बोली जा रही भाषा पर ध्यान दीजिए। ...और फिर 23 मई को चुनाव नतीजों से इसका मिलान कीजिए। आपको समझ आ जाएगा कि आपसे किस क़दर झूठ बोला गया। 

कुछ बातें आपके काम की और भविष्य के पत्रकारों के लिए
.........................................................................

भारतीय मीडिया अब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (Artificial  Intelligence managed Media =AIM) का शिकार हो चुका है जो पहले से तय लक्ष्यों के लिए तैयार की गई भाषा का इस्तेमाल करता है। इसीलिए इसका नाम ही बनावटी बुद्धिमत्ता नियंत्रित मीडिया है। जहाँ आपके दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया जाता बल्कि किसी और के दिमाग से इस्तेमाल से तैयार कंटेंट को आगे बढ़ाया जाता है। डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम के लिए AIM को तैयार किया गया है। बनावटी संवेदनाएँ यानी इमोशन बनाने, पैदा करने और उसे तय मक़सद के लिए भुनाने की क्षमता भी AIM के पास है। आने वाले समय पर इस पर मेरा लिखना जारी रहेगा।

हाल ही में मोदी के लिए इस्तेमाल सबसे लोकप्रिय शब्द चीफ़ डिवाइडर ऑफ़ इंडिया जैसे शब्द यहाँ अब लिखना मुश्किल होगा। 

मॉस कम्यूनिकेशन यानी पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे मेरे युवा साथी इस शब्द AIM को नोट करके रख लें। उनके लिए काम की चीज़ है और आज पहली बार मैं इसके बारे में लिख रहा हूँ। क्योंकि अब वो जिस मीडिया में नौकरी करेंगे उन्हें इसका सामना करना पड़ेगा। जिस प्रोफ़ेशन में वो घुसने जा रहे हैं उन्हें AIM नियंत्रित कंटेंट को लिखना या बताना होगा। रोज़ाना दफ़्तर में घुसने से पहले अपने संवेदनाओं की हत्या करके उसे पैरों तले मसल कर अंदर क़दम रखिएगा।




Saturday, May 18, 2019

भगवान से भी धंधा...पूजा पाठ की मार्केटिंग का लाइव प्रसारण...

 
तुम्हारे पूजा-पाठ पर सवाल नहीं...तुम्हारी आस्था पर चोट नहीं...

लेकिन यार... क्या तुम्हारी कोई प्राइवेसी नहीं है...ध्यान तो तुम अकेले में ही करोगे, फिर तुम्हें वहां मीडिया की जरूरत किसलिए है...तुम अपना पूजा पाठ देश की जनता को क्यों दिखाना चाहते हो।...सुबह उठकर मंदिर और मस्जिदों में इबादत करने वाले अपनी आस्था का प्रदर्शन यूं तो नहीं करते।

क्या तुमने अमेरिका के राष्ट्रपति...ब्रिटेन की प्रधानमंत्री को लाइव किसी चर्च के मास प्रेयर में देखा है। ...क्या तुमने सऊदी अरब के सुल्तान को कभी मक्का में तवाफ करते लाइव देखा है...क्या तुमने कर्बला में किसी धर्मगुरु के जियारत का लाइव प्रसारण देखा है...
 
हां, तुमने न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री का लाइव प्रसारण जरूर देखा होगा जब वह अपनी आस्था को ताक पर रखकर हिजाब बांधकर न्यूजीलैंड के अल्पसंख्यकों के घावों पर मरहम लगाने पहुंच गई थी।...लेकिन फिर भी तुमने शर्म महसूस नहीं की।

तुमने अपनी धार्मिक आस्था के लाइव प्रसारण को बच्चों का बाइस्कोप बना दिया है।

आखिर तुम वहां किस चीज की मार्केटिंग कर रहे हो...क्या संवैधानिक पद पर बैठा तुम्हारे जैसा शख्स प्रधानमंत्री कैमरे के साथ पूजा पाठ करता है...क्या वो अपनी आस्था का लाइव प्रसारण कराता है...


हमने उस सरदार को कभी किसी गुरुद्वारे या दरबार साहिब में मत्था टेकते हुए लाइव नहीं देखा....वह भी तुम्हारी तरह दरबारी मीडिया ले जा सकता था। उसके पास भी सरकारी मीडिया था, लेकिन क्या कभी किसी ने उसकी आस्था का भोंडा प्रदर्शन देखा....

दरअसल, इस पूजा पाठ में तुम्हारा एक खास रंग का प्रदर्शन बता रहा है कि तुम बहुसंख्यक तुष्टिकरण की नीति पर चल रहे हो।

किसी लोकतांत्रिक देश में बहुसंख्यक तुष्टिकरण भी एक तरह का दबंगपन है।

बहुसंख्यक तुष्टिकरण से देश टूट जाते हैं।बहुसंख्यक तुष्टिकण किसी भी देश में अराजकता को बढ़ाते हैं।

बहुसंख्यक तुष्टिकरण की आड़ में किसानों के सवाल, बेरोजगारी के सवाल, महिला सुरक्षा के सवाल, गरीब बच्चों के कुपोषण के सवाल, असंगठित मजदूरों के सवाल खत्म हो जाते हैं।

दरअसल, तुम्हारी आस्था, तुम्हारा पूजा पाठ भी एक धंधा है। तुम वहां भगवान से बिजनेस डील करने गए हो। तुम बहुसंख्यकों के लिए एक ऐसे राष्ट्र की डील करने गए हो जिसे देश के करोड़ों मेहनतकश लोग नामुमकिन बना देंगे।...




गांधी को गाली दो, गोडसे को देशभक्त बताओ...तुम्हारे पास काम ही क्या है?

पिछले पाँच साल में महात्मा गांधी को गाली देने का चलन आम हो गया है। आरएसएस और उसकी राजनीतिक शाखा भाजपा ने इसे एक मिशन की तरह आगे बढ़ाया है। अपने छुटभैये नेताओं से गाली दिलवाते हैं। फिर उस गाली को उसका निजी विचार बता दिया जाता है। बहुत दबाव महसूस हुआ तो उसको पार्टी से निकालने का बयान जारी कर दिया जाता है या माफ़ी माँग ली जाती है। 



मैं अक्सर कहता रहा हूँ कि जिन राजनीतिक दलों या जिस क़ौम के पास गर्व करने लायक कुछ नहीं होता वो या तो अपने प्रतीक गढ़ते हैं या फिर मिथक का सहारा लेते हैं। कई बार अंधविश्वास तक का सहारा ले लेते हैं। 
गांधी, आंबेडकर, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, आज़ाद या भगत सिंह से आरएसएस और भाजपा सिर्फ इसलिए चिढ़ते हैं क्योंकि ये सारे गढ़े गए प्रतीक नहीं हैं। ये सभी भारतीय जनमानस में बसे हुए प्रतीक हैं। 
बहुसंख्यकवाद के तुष्टिकरण की नीति पर चलने वाले संगठनों के पास गर्व करने लायक कोई प्रतीक नहीं है। इनके प्रतीकों का अतीत अंग्रेज़ों की मुखबिरी करने और उनसे माफ़ी माँगने में बीता है। भारत जब आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था तो इनके गढ़े गए प्रतीक सावरकर, गोडसे वग़ैरह मुखबिर थे या माफ़ीनामा लिख रहे थे। भारतीय इतिहास के निर्णायक मोड़ पर ये लोग गांधी की हत्या करते पाये गए...उससे अगले मोड़ पर ये लोग नफ़रत फैलाते और समाज को बाँटते पाए गए। हेगडेवार की देश की आज़ादी में क्या भूमिका थी? उन लोगों के पास कहने के लिए कुछ नहीं हैं। ग्वालियर जेल में बंद अटल बिहारी वाजपेयी की लिखी इबारत कौन भूल सकता है।

राष्ट्रपिता के सम्मान में आतंकी मुलज़िम प्रज्ञा ठाकुर की नीच हरकत के लिए भाजपा या उसके नेताओं के घड़ियाली आँसू एक बहाना हैं। वो सिर्फ 23 मई तक टाइमपास के लिए माफ़ी माँग रहे हैं। सत्ता में लौटते ही भारतीय गौरव के प्रतीकों को दोगुना तेज़ आवाज़ में गाली देने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। यह सब आप लोगों की आंखों के सामने होगा और आप लोग कुछ नहीं कर पायेंगे। उसका एक सीन तो आज ही सामने आ गया। मोदी ने दिन में माफी मांगी, शाम को भाजपा मुख्यालय में अमित शाह ने जो प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई, उसमें प्रज्ञा का मामला उठने पर अमित शाह ने कहा कि हमने सभी को नोटिस जारी कर दिया है। उनके जवाब के बाद उचित कार्रवाई होगी। इसके बाद अमित शाह ने भगवा आतंकवाद के लिए कांग्रेस को कोसना शुरू किया और प्रज्ञा ठाकुर को विक्टिम (पीड़ित) बताया।

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में अमित शाह ने एक बार भी गांधी जी के बारे में दिए गए प्रज्ञा के बयान की निंदा नहीं की। मोदी ने भी अपने उन वाक्यों को नहीं दोहराया जो उन्होंने दिन में बोला था कि मैं प्रज्ञा ठाकुर को माफ नहीं कर पऊंगा।...इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि दोगलेपन की सीमा कहां तक फैली हुई है। संघ और भाजपा के तमाम नेता और कार्यकर्ताओं के दिलों में गोडसे बसा हुआ है। वह ऊपरी माफीनामे से नहीं खत्म होने वाला।

भाजपा में हिम्मत है तो ऐसे सभी लोगों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाये। प्रज्ञा के बयान की तुलना मणिशंकर अय्यर के बयान से करना दरअसल प्रज्ञा को भी प्रतीक की तरह स्थापित करने की नाकाम कोशिश है। महात्मा गांधी के प्रति संघ और भाजपा का प्रेम एक बड़ा फ्राड है।

गोडसे आतंकवादी ही तो है
..................................
अगर गोडसे को आतंकवादी नहीं कहा जाएगा तो क्या रंगा-बिल्ला को आतंकवादी कहा जाएगा? 
कमल हासन ने गलत क्या है...क्या महात्मा गांधी का हत्यारा गोडसे पहला हिंदू आतंकवादी नहीं था? 
क्या आजाद भारत में यह पहली आतंकी घटना नहीं थी? गोडसे को किस विचारधारा ने खड़ा किया था? 
कमल हासन ने ऐतिहासिक तथ्य ही तो बताएं हैं। इसमें एक खास राजनीतिक दल को क्यों ऐतराज है। 
उसे तब शर्म नहीं आती है जब वह कश्मीर में पूर्व आतंकवादियों से चुनाव में गठजोड़ करती है।

उसे तब भी शर्म नहीं आती जब वह कश्मीर के अलगाववादियों का समर्थन करने वाली पार्टी से मिलकर सरकार बनाती है। कल को उसे मुस्लिम लीग की मदद से मिलकर केंद्र में सरकार बनानी पड़े तो भी वह मुस्लिम लीग का समर्थन लेने से नहीं हिचकेगी।

क्या अंग्रेजों के समय में कायदे-आजम मोहम्मद अली जिन्ना की पार्टी के साथ हिंदू महासभा ने संयुक्त सरकार नहीं बनाई थी। कह दो कि यह झूठ है, फिर क्यों नहीं इतिहास की किताबों से जिन्ना-हिंदू महासभा गठजोड़ के पन्नों को हटा देते?

फासिस्ट आंधियों की गिरफ़्त में भारत
..............................................

हिंदीवाणी,  नई दिल्ली : इंदिरा गांधी ने 1975 से 1977 तक  आपातकाल लगाया था। सारे विरोधी दलों के नेता गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिए। प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी गई। उसके बाद चुनाव हुए तो कांग्रेस बुरी तरह हार गई।...यह बात उस समय के ज़िंदा लोग जानते हैं और अब इतिहास में भी दर्ज है। 

एक बात और है जो उस समय के ज़िंदा लोग और उस समय का इतिहास बताता है कि इमर्जेंसी के दौरान हुए आम चुनाव यानी लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी चाहतीं तो क्या नहीं कर सकती थीं। वह चाहतीं तो चुनाव निष्पक्ष नहीं होते और वह फिर से सत्ता में लौट सकती थीं। पर, उन्होंने कुख्यात होने के बावजूद लोकसभा चुनाव में बेईमानी नहीं कराई। तब तक चुनाव आयोग उनकी मुट्ठी में था और टी एन शेषन का भी अवतार नहीं हुआ था।

2014 के चुनाव में भी कांग्रेस बेईमानी करा सकती थी।

अब 2019 के आम चुनाव पर नज़र डालिए।

चुनाव आयोग की इज़्ज़त गिरवी है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस विवादों में आ गए। अदालतों के कई फ़ैसलों पर लोगों ने नुक्ताचीनी की। जिन राजनीतिक दलों और उनके कार्यकर्ताओं को फासिस्ट ताक़तों से सड़कों पर लड़ना था वो दुम दबाकर बैठे हैं। यहाँ तक कि एक दो दल जो फासिस्ट ताक़तों के खिलाफ हैं उनके कार्यकर्ता और लोकल नेता लंबी तान कर सो रहे हैं।

पश्चिम बंगाल की घटनाएँ बता रही हैं कि वहाँ भाजपा और आरएसएस ममता बनर्जी नामक महिला को हराने के लिए गुंडे, मवालियों तक इस्तेमाल कर रहे हैं। इतिहासकार और बंगाल सुधारवादी आंदोलन के अग्रणी नेता रहे ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की मूर्ति की मूर्ति टूटने की जब खबर आई तो मुझे यक़ीन नहीं हुआ। क्योंकि कोई बंगाली यह हरकत नहीं करेगा। फिर मैंने उस घटना के विडियो देखे।...जो शंका थी, वही सच साबित हुई। दूसरे राज्यों से भेजे गए गुंडों ने वहाँ तोड़फोड़ मचाई। एक संगठित गिरोह ने वह मूर्ति उसी अंदाज में तोड़ी जैसे अयोध्या की घटना को अंजाम दिया गया था। मीडिया ने इस घटना की सही रिपोर्टिंग नहीं की है। एकाध चैनलों पर ही उन विडियो को दिखाया गया। बहरहाल, सोशल मीडिया पर वो विडियो अनगिनत लोगों द्वारा डाले गए है।

आरएसएस ने ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के लिखे इतिहास को कभी पसंद नहीं किया। आरएसएस के निशाने पर तमाम बंगला लेखक, सुधारक, इतिहासकार रहे हैं। 

भाजपा और मोदी ब्रिगेड अगर यह चुनाव जीतता है यह जनता की हार नहीं बल्कि उन राजनीतिक दलों और उनके कार्यकर्ताओं की हार होगी जो ममता और उनके वर्करों के अंदाज में फासिस्ट ताक़तों से टकराने के लिए घरों से बाहर नहीं निकले। कांग्रेस, कम्युनिस्ट, बसपा, सपा के सुविधाभोगी कार्यकर्ताओं की कमज़ोरी के चलते फासिस्ट ताक़तें लगातार मज़बूत हो रही हैं। 

एक तरफ़ आतंकी मुलज़िम साध्वी प्रज्ञा ठाकुर बड़ी बेहियाई से आतंकवादी नाथूराम गोडसे को देशभक्त बता रही है तो दूसरी तरफ़ उतनी ही बेहियाई से भाजपा नेता गांधी जी को माल्यार्पण करते हैं। भाजपा में ज़रा भी शर्म बची हो तो आज ही प्रज्ञा को पार्टी से निकाल बाहर करे। वरना गोडसे देशभक्त और महात्मा गांधी को माला एकसाथ नहीं चल सकते।

लँगड़ा भारतीय लोकतंत्र किसी और तरफ़ बढ़ चला है। 23 मई के बाद अगर मोदी लौटे तो आपको इसका अंदाज़ा हो जाएगा...तमाम लचकदार शाखें भी टूट जाएंगी। (हिंदीवाणीडॉटइ