Sunday, May 19, 2019

एग्जिट पोल और Artificial Intelligence managed Media

आज आख़िरी दौर के वोट डाले जा रहे हैं।...शाम को गोदी मीडिया पर एक्ज़िट पोल यानि कौन सरकार बनाएगा की भविष्यवाणी आने लगेगी...ज़ाहिर है कि ये सारे के सारे एक्ज़िट पोल अमित शाह द्वारा मैनेज कराये गए एग्जिट पोल हैं...इसलिए इनको गंभीरता से लेने की ज़रूरत नहीं है। 

अगर आप रोज़ेदार हैं तो आराम से रोज़ा खोलिए। दुआ माँगिए और कुरानशरीफ की तिलावत कीजिए।...कोई भी शैतानी ताक़त आपके ईमान को हराने की ताक़त नहीं रखती। शैतानी ताक़तों ने अपनी पराजय पहले ही स्वीकार कर ली है। 

अगर आप रोज़ेदार नहीं हैं तो आपको भी एग्जिट पोल को दिल पर लेने की ज़रूरत नहीं है। आराम से टीवी के सामने कुछ जूस, नारियल पानी, चाय-पकौड़े वग़ैरह लेकर बैठिए और टीवी एंकरों द्वारा बोली जा रही भाषा पर ध्यान दीजिए। ...और फिर 23 मई को चुनाव नतीजों से इसका मिलान कीजिए। आपको समझ आ जाएगा कि आपसे किस क़दर झूठ बोला गया। 

कुछ बातें आपके काम की और भविष्य के पत्रकारों के लिए
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भारतीय मीडिया अब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (Artificial  Intelligence managed Media =AIM) का शिकार हो चुका है जो पहले से तय लक्ष्यों के लिए तैयार की गई भाषा का इस्तेमाल करता है। इसीलिए इसका नाम ही बनावटी बुद्धिमत्ता नियंत्रित मीडिया है। जहाँ आपके दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया जाता बल्कि किसी और के दिमाग से इस्तेमाल से तैयार कंटेंट को आगे बढ़ाया जाता है। डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम के लिए AIM को तैयार किया गया है। बनावटी संवेदनाएँ यानी इमोशन बनाने, पैदा करने और उसे तय मक़सद के लिए भुनाने की क्षमता भी AIM के पास है। आने वाले समय पर इस पर मेरा लिखना जारी रहेगा।

हाल ही में मोदी के लिए इस्तेमाल सबसे लोकप्रिय शब्द चीफ़ डिवाइडर ऑफ़ इंडिया जैसे शब्द यहाँ अब लिखना मुश्किल होगा। 

मॉस कम्यूनिकेशन यानी पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे मेरे युवा साथी इस शब्द AIM को नोट करके रख लें। उनके लिए काम की चीज़ है और आज पहली बार मैं इसके बारे में लिख रहा हूँ। क्योंकि अब वो जिस मीडिया में नौकरी करेंगे उन्हें इसका सामना करना पड़ेगा। जिस प्रोफ़ेशन में वो घुसने जा रहे हैं उन्हें AIM नियंत्रित कंटेंट को लिखना या बताना होगा। रोज़ाना दफ़्तर में घुसने से पहले अपने संवेदनाओं की हत्या करके उसे पैरों तले मसल कर अंदर क़दम रखिएगा।




Saturday, May 18, 2019

भगवान से भी धंधा...पूजा पाठ की मार्केटिंग का लाइव प्रसारण...

 
तुम्हारे पूजा-पाठ पर सवाल नहीं...तुम्हारी आस्था पर चोट नहीं...

लेकिन यार... क्या तुम्हारी कोई प्राइवेसी नहीं है...ध्यान तो तुम अकेले में ही करोगे, फिर तुम्हें वहां मीडिया की जरूरत किसलिए है...तुम अपना पूजा पाठ देश की जनता को क्यों दिखाना चाहते हो।...सुबह उठकर मंदिर और मस्जिदों में इबादत करने वाले अपनी आस्था का प्रदर्शन यूं तो नहीं करते।

क्या तुमने अमेरिका के राष्ट्रपति...ब्रिटेन की प्रधानमंत्री को लाइव किसी चर्च के मास प्रेयर में देखा है। ...क्या तुमने सऊदी अरब के सुल्तान को कभी मक्का में तवाफ करते लाइव देखा है...क्या तुमने कर्बला में किसी धर्मगुरु के जियारत का लाइव प्रसारण देखा है...
 
हां, तुमने न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री का लाइव प्रसारण जरूर देखा होगा जब वह अपनी आस्था को ताक पर रखकर हिजाब बांधकर न्यूजीलैंड के अल्पसंख्यकों के घावों पर मरहम लगाने पहुंच गई थी।...लेकिन फिर भी तुमने शर्म महसूस नहीं की।

तुमने अपनी धार्मिक आस्था के लाइव प्रसारण को बच्चों का बाइस्कोप बना दिया है।

आखिर तुम वहां किस चीज की मार्केटिंग कर रहे हो...क्या संवैधानिक पद पर बैठा तुम्हारे जैसा शख्स प्रधानमंत्री कैमरे के साथ पूजा पाठ करता है...क्या वो अपनी आस्था का लाइव प्रसारण कराता है...


हमने उस सरदार को कभी किसी गुरुद्वारे या दरबार साहिब में मत्था टेकते हुए लाइव नहीं देखा....वह भी तुम्हारी तरह दरबारी मीडिया ले जा सकता था। उसके पास भी सरकारी मीडिया था, लेकिन क्या कभी किसी ने उसकी आस्था का भोंडा प्रदर्शन देखा....

दरअसल, इस पूजा पाठ में तुम्हारा एक खास रंग का प्रदर्शन बता रहा है कि तुम बहुसंख्यक तुष्टिकरण की नीति पर चल रहे हो।

किसी लोकतांत्रिक देश में बहुसंख्यक तुष्टिकरण भी एक तरह का दबंगपन है।

बहुसंख्यक तुष्टिकरण से देश टूट जाते हैं।बहुसंख्यक तुष्टिकण किसी भी देश में अराजकता को बढ़ाते हैं।

बहुसंख्यक तुष्टिकरण की आड़ में किसानों के सवाल, बेरोजगारी के सवाल, महिला सुरक्षा के सवाल, गरीब बच्चों के कुपोषण के सवाल, असंगठित मजदूरों के सवाल खत्म हो जाते हैं।

दरअसल, तुम्हारी आस्था, तुम्हारा पूजा पाठ भी एक धंधा है। तुम वहां भगवान से बिजनेस डील करने गए हो। तुम बहुसंख्यकों के लिए एक ऐसे राष्ट्र की डील करने गए हो जिसे देश के करोड़ों मेहनतकश लोग नामुमकिन बना देंगे।...




गांधी को गाली दो, गोडसे को देशभक्त बताओ...तुम्हारे पास काम ही क्या है?

पिछले पाँच साल में महात्मा गांधी को गाली देने का चलन आम हो गया है। आरएसएस और उसकी राजनीतिक शाखा भाजपा ने इसे एक मिशन की तरह आगे बढ़ाया है। अपने छुटभैये नेताओं से गाली दिलवाते हैं। फिर उस गाली को उसका निजी विचार बता दिया जाता है। बहुत दबाव महसूस हुआ तो उसको पार्टी से निकालने का बयान जारी कर दिया जाता है या माफ़ी माँग ली जाती है। 



मैं अक्सर कहता रहा हूँ कि जिन राजनीतिक दलों या जिस क़ौम के पास गर्व करने लायक कुछ नहीं होता वो या तो अपने प्रतीक गढ़ते हैं या फिर मिथक का सहारा लेते हैं। कई बार अंधविश्वास तक का सहारा ले लेते हैं। 
गांधी, आंबेडकर, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, आज़ाद या भगत सिंह से आरएसएस और भाजपा सिर्फ इसलिए चिढ़ते हैं क्योंकि ये सारे गढ़े गए प्रतीक नहीं हैं। ये सभी भारतीय जनमानस में बसे हुए प्रतीक हैं। 
बहुसंख्यकवाद के तुष्टिकरण की नीति पर चलने वाले संगठनों के पास गर्व करने लायक कोई प्रतीक नहीं है। इनके प्रतीकों का अतीत अंग्रेज़ों की मुखबिरी करने और उनसे माफ़ी माँगने में बीता है। भारत जब आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था तो इनके गढ़े गए प्रतीक सावरकर, गोडसे वग़ैरह मुखबिर थे या माफ़ीनामा लिख रहे थे। भारतीय इतिहास के निर्णायक मोड़ पर ये लोग गांधी की हत्या करते पाये गए...उससे अगले मोड़ पर ये लोग नफ़रत फैलाते और समाज को बाँटते पाए गए। हेगडेवार की देश की आज़ादी में क्या भूमिका थी? उन लोगों के पास कहने के लिए कुछ नहीं हैं। ग्वालियर जेल में बंद अटल बिहारी वाजपेयी की लिखी इबारत कौन भूल सकता है।

राष्ट्रपिता के सम्मान में आतंकी मुलज़िम प्रज्ञा ठाकुर की नीच हरकत के लिए भाजपा या उसके नेताओं के घड़ियाली आँसू एक बहाना हैं। वो सिर्फ 23 मई तक टाइमपास के लिए माफ़ी माँग रहे हैं। सत्ता में लौटते ही भारतीय गौरव के प्रतीकों को दोगुना तेज़ आवाज़ में गाली देने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। यह सब आप लोगों की आंखों के सामने होगा और आप लोग कुछ नहीं कर पायेंगे। उसका एक सीन तो आज ही सामने आ गया। मोदी ने दिन में माफी मांगी, शाम को भाजपा मुख्यालय में अमित शाह ने जो प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई, उसमें प्रज्ञा का मामला उठने पर अमित शाह ने कहा कि हमने सभी को नोटिस जारी कर दिया है। उनके जवाब के बाद उचित कार्रवाई होगी। इसके बाद अमित शाह ने भगवा आतंकवाद के लिए कांग्रेस को कोसना शुरू किया और प्रज्ञा ठाकुर को विक्टिम (पीड़ित) बताया।

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में अमित शाह ने एक बार भी गांधी जी के बारे में दिए गए प्रज्ञा के बयान की निंदा नहीं की। मोदी ने भी अपने उन वाक्यों को नहीं दोहराया जो उन्होंने दिन में बोला था कि मैं प्रज्ञा ठाकुर को माफ नहीं कर पऊंगा।...इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि दोगलेपन की सीमा कहां तक फैली हुई है। संघ और भाजपा के तमाम नेता और कार्यकर्ताओं के दिलों में गोडसे बसा हुआ है। वह ऊपरी माफीनामे से नहीं खत्म होने वाला।

भाजपा में हिम्मत है तो ऐसे सभी लोगों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाये। प्रज्ञा के बयान की तुलना मणिशंकर अय्यर के बयान से करना दरअसल प्रज्ञा को भी प्रतीक की तरह स्थापित करने की नाकाम कोशिश है। महात्मा गांधी के प्रति संघ और भाजपा का प्रेम एक बड़ा फ्राड है।

गोडसे आतंकवादी ही तो है
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अगर गोडसे को आतंकवादी नहीं कहा जाएगा तो क्या रंगा-बिल्ला को आतंकवादी कहा जाएगा? 
कमल हासन ने गलत क्या है...क्या महात्मा गांधी का हत्यारा गोडसे पहला हिंदू आतंकवादी नहीं था? 
क्या आजाद भारत में यह पहली आतंकी घटना नहीं थी? गोडसे को किस विचारधारा ने खड़ा किया था? 
कमल हासन ने ऐतिहासिक तथ्य ही तो बताएं हैं। इसमें एक खास राजनीतिक दल को क्यों ऐतराज है। 
उसे तब शर्म नहीं आती है जब वह कश्मीर में पूर्व आतंकवादियों से चुनाव में गठजोड़ करती है।

उसे तब भी शर्म नहीं आती जब वह कश्मीर के अलगाववादियों का समर्थन करने वाली पार्टी से मिलकर सरकार बनाती है। कल को उसे मुस्लिम लीग की मदद से मिलकर केंद्र में सरकार बनानी पड़े तो भी वह मुस्लिम लीग का समर्थन लेने से नहीं हिचकेगी।

क्या अंग्रेजों के समय में कायदे-आजम मोहम्मद अली जिन्ना की पार्टी के साथ हिंदू महासभा ने संयुक्त सरकार नहीं बनाई थी। कह दो कि यह झूठ है, फिर क्यों नहीं इतिहास की किताबों से जिन्ना-हिंदू महासभा गठजोड़ के पन्नों को हटा देते?

फासिस्ट आंधियों की गिरफ़्त में भारत
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हिंदीवाणी,  नई दिल्ली : इंदिरा गांधी ने 1975 से 1977 तक  आपातकाल लगाया था। सारे विरोधी दलों के नेता गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिए। प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी गई। उसके बाद चुनाव हुए तो कांग्रेस बुरी तरह हार गई।...यह बात उस समय के ज़िंदा लोग जानते हैं और अब इतिहास में भी दर्ज है। 

एक बात और है जो उस समय के ज़िंदा लोग और उस समय का इतिहास बताता है कि इमर्जेंसी के दौरान हुए आम चुनाव यानी लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी चाहतीं तो क्या नहीं कर सकती थीं। वह चाहतीं तो चुनाव निष्पक्ष नहीं होते और वह फिर से सत्ता में लौट सकती थीं। पर, उन्होंने कुख्यात होने के बावजूद लोकसभा चुनाव में बेईमानी नहीं कराई। तब तक चुनाव आयोग उनकी मुट्ठी में था और टी एन शेषन का भी अवतार नहीं हुआ था।

2014 के चुनाव में भी कांग्रेस बेईमानी करा सकती थी।

अब 2019 के आम चुनाव पर नज़र डालिए।

चुनाव आयोग की इज़्ज़त गिरवी है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस विवादों में आ गए। अदालतों के कई फ़ैसलों पर लोगों ने नुक्ताचीनी की। जिन राजनीतिक दलों और उनके कार्यकर्ताओं को फासिस्ट ताक़तों से सड़कों पर लड़ना था वो दुम दबाकर बैठे हैं। यहाँ तक कि एक दो दल जो फासिस्ट ताक़तों के खिलाफ हैं उनके कार्यकर्ता और लोकल नेता लंबी तान कर सो रहे हैं।

पश्चिम बंगाल की घटनाएँ बता रही हैं कि वहाँ भाजपा और आरएसएस ममता बनर्जी नामक महिला को हराने के लिए गुंडे, मवालियों तक इस्तेमाल कर रहे हैं। इतिहासकार और बंगाल सुधारवादी आंदोलन के अग्रणी नेता रहे ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की मूर्ति की मूर्ति टूटने की जब खबर आई तो मुझे यक़ीन नहीं हुआ। क्योंकि कोई बंगाली यह हरकत नहीं करेगा। फिर मैंने उस घटना के विडियो देखे।...जो शंका थी, वही सच साबित हुई। दूसरे राज्यों से भेजे गए गुंडों ने वहाँ तोड़फोड़ मचाई। एक संगठित गिरोह ने वह मूर्ति उसी अंदाज में तोड़ी जैसे अयोध्या की घटना को अंजाम दिया गया था। मीडिया ने इस घटना की सही रिपोर्टिंग नहीं की है। एकाध चैनलों पर ही उन विडियो को दिखाया गया। बहरहाल, सोशल मीडिया पर वो विडियो अनगिनत लोगों द्वारा डाले गए है।

आरएसएस ने ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के लिखे इतिहास को कभी पसंद नहीं किया। आरएसएस के निशाने पर तमाम बंगला लेखक, सुधारक, इतिहासकार रहे हैं। 

भाजपा और मोदी ब्रिगेड अगर यह चुनाव जीतता है यह जनता की हार नहीं बल्कि उन राजनीतिक दलों और उनके कार्यकर्ताओं की हार होगी जो ममता और उनके वर्करों के अंदाज में फासिस्ट ताक़तों से टकराने के लिए घरों से बाहर नहीं निकले। कांग्रेस, कम्युनिस्ट, बसपा, सपा के सुविधाभोगी कार्यकर्ताओं की कमज़ोरी के चलते फासिस्ट ताक़तें लगातार मज़बूत हो रही हैं। 

एक तरफ़ आतंकी मुलज़िम साध्वी प्रज्ञा ठाकुर बड़ी बेहियाई से आतंकवादी नाथूराम गोडसे को देशभक्त बता रही है तो दूसरी तरफ़ उतनी ही बेहियाई से भाजपा नेता गांधी जी को माल्यार्पण करते हैं। भाजपा में ज़रा भी शर्म बची हो तो आज ही प्रज्ञा को पार्टी से निकाल बाहर करे। वरना गोडसे देशभक्त और महात्मा गांधी को माला एकसाथ नहीं चल सकते।

लँगड़ा भारतीय लोकतंत्र किसी और तरफ़ बढ़ चला है। 23 मई के बाद अगर मोदी लौटे तो आपको इसका अंदाज़ा हो जाएगा...तमाम लचकदार शाखें भी टूट जाएंगी। (हिंदीवाणीडॉटइ

Tuesday, May 7, 2019

यह चुनावी व्यवस्था भ्रष्ट है...इसे उखाड़ फेंकिये

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों पर टीका टिप्पणी की मनाही है लेकिन इधर जिस तरह से तमाम मुद्दों पर उसका रूख सामने आया है, वो कहीं न कहीं आम नागरिक को बेचैन कर रहा है।...

विपक्ष ने ईवीएम (EVM) से निकलने वाली 50 फ़ीसदी पर्चियों का वीवीपैट (VVPAT) से मिलान करने की माँग करते हुए पुनर्विचार की माँग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने अभी थोड़ी देर पहले उस माँग को ख़ारिज कर दिया। हद यह है कि सुप्रीम कोर्ट 25 फ़ीसदी पर्चियों के मिलान पर भी राज़ी नहीं हुआ...

देखने में यह आ रहा है कि चुनाव आयोग नामक संस्था ने इस पूरे चुनाव में सत्ता पक्ष के साथ बगलगीरी कर ली है। ...और सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग को ठीक से निर्देशित तक नहीं कर पा रहा है। कितनी दयनीय स्थिति है देश की दो सबसे बड़ी लोकतांत्रिक संस्थाओं की।

इससे पहले सुनाई पड़ता था कि किसी एक सीट या दो सीटों पर धाँधली पर चुनाव आयोग आँख मूँद लेता था। उसने मोदी के खिलाफ की गई हर शिकायत को नजरन्दाज करके क्लीन चिट दी। जिस बोफ़ोर्स मामले में फ़ाइनल फ़ैसला तक आ चुका हो, उसे लेकर एक मृत शख़्स को भला बुरा कहा। चुनाव आयोग ने इसका संज्ञान तक नहीं लिया। महान चुनाव आयुक्त स्व. टी. एन. शेषन द्वारा जिस संस्था की विश्वसनीयता बनाई गई हो, उसको इस तरह तार तार किया जाएगा, इसकी कल्पना तक किसी ने नहीं की थी।

भारत में फ़िलहाल ऐसे जनआंदोलन का अभाव है, जिसमें सत्ता की ताक़त और धृतराष्ट्र बन चुकी संस्थाओं से टकराने का माद्दा हो। विपक्षी दल आज सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका ख़ारिज होने के बाद दुम दबाकर चले आये। यह उचित समय है ऐसे तमाम मुद्दों पर जनआंदोलन खड़ा करने का लेकिन कम्युनिस्ट अभी कॉर्ल मार्क्स का अध्ययन कर रहे हैं और गांधीवादी सोशलिस्ट संघियों की गोद में बैठे हुए हैं। इतना बुरा दौर भारतीय इतिहास में नहीं आया था।

पिछले आंदोलन की कटु यादें अभी तक ज़िंदा हैं। अन्ना संघ का एजेंट निकला और वैकल्पिक राजनीति करने आया शख़्स दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रधानमंत्री बनने के सपने देखने लगा। सपने देखना बुरी बात नहीं थी लेकिन बिना अखिल भारतीय संगठन खड़ा किये इधर उधर राज्यों में फुदक फुदक कर चुनाव लड़ने ने सब गुड़गोबर कर दिया। 

वैकल्पिक राजनीति का लक्ष्य बिना सशक्त संगठन हासिल नहीं होता। लेकिन इन महाशय ने इसी को नजरन्दाज कर दिया। देश के लाखों बेरोज़गारों, किसानों, मज़दूरों  को एक मंच पर लाकर वैकल्पिक राजनीति की बात करने वाला कोई दल या संगठन दूर दूर  तक नज़र नहीं आ रहा है।

23 मई को इस चुनाव का नतीजा आएगा। आप देखेंगे कि कितने ही राजनीतिक दल भाजपा या कांग्रेस के साथ सारे आदर्श को ताक पर रखकर खड़े नज़र आयेंगे। सत्ता के लिए येन केन प्रकारेण का खेल खेलेंगे। युद्ध और चुनाव में सब जायज़ जैसे मुहावरे बोले जायेंगे। यानी मौजूदा चुनाव का सिस्टम और उसके ज़रिए सत्ता तक पहुँचने का तरीक़ा भारत में सबसे बड़ा करप्शन है। कॉरपोरेट के पैसे से चुनाव लड़ने वाले दल चूँकि भ्रष्ट तरीक़े से पैसा लेकर सत्ता में आते हैं तो वह वही व्यवस्था बनायेंगे या निर्माण करेंगे जो उस भ्रष्टाचार को और संरक्षित करेगा। भारत में कॉरपोरेट से चंदा लेकर चुनाव लड़ने की पूरी व्यवस्था ही खुला भ्रष्टाचार है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में आया लेकिन इस व्यवस्था को पारदर्शी बनाने का कोई आदेश अभी तक सुप्रीम कोर्ट ने पारित नहीं किया है। 2014 के चुनाव में सबसे ज़्यादा चुनावी चंदा भाजपा को मिला था, उसमें भारत के सभी उद्योग घरानों के नाम थे। उसमें अंबानी और अडानी का नाम सबसे प्रमुख था। उसके बाद भाजपा सत्ता में आई। पिछले पाँच साल के केंद्र सरकार सरकार के कारनामे बताने की ज़रूरत नहीं है। ऐसा नहीं कि यह करप्शन सिर्फ 2014 के चुनाव में ही हुआ था। उसके पहले हुए कुछ चुनाव भी कॉरपोरेट के पैसे से कांग्रेस लड़ती रही है। फ़र्क़ सिर्फ यह है कि पहले धीरू भाई अंबानी चंदा देते थे और अब उनके बेटे चुनावी चंदा देते हैं। पार्टियाँ बदल गई हैं लेकिन कॉरपोरेट घराने और उनके दलाल वही हैं। किसी पर फ़िल्म बना देने और उसे गुरू बता देने भर से उसके पाप नहीं धुल जाते। बेशक डायरेक्शन मणि रत्नम का रहा हो या किसी बच्चन ने उसमें उसकी भूमिका निभाई हो।
बहरहाल,  इस करप्शन या इस नासूर को ठीक करने के लिए लंबे और बड़े संघर्ष की रूपरेखा तय करने की ज़रूरत ग़ैर राजनीतिक संगठनों को है। देखना है वो कब हो पाता है। 

(अपडेट 1:30 pm : अभी खबर मिली है कि सुप्रीम कोर्ट के बाहर चीफ़ जस्टिस के खिलाफ  हो रहे प्रदर्शन को कवर करने वाले पत्रकारों को पुलिस ने धमकाकर भगाने की कोशिश की।)


कुछ बात वकीलों पर भी
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सत्ता पक्ष और विपक्षी दलों में ऐसे वकीलों का क़ब्ज़ा है जो एक दिन अपने नेता के लिए कोर्ट में एड़ियाँ रगड़ता है तो अगले दिन किसी कॉरपोरेट का वकालतनामा जमाकरा कर किसी अंबानी की ज़मानत के लिए बेक़रार नज़र आता है। जज भी इन हालात से वाक़िफ़ हैं। उनका रूख भी जैसा होता है वह तटस्थता के दायरे में कम से कम नहीं होता।

मैं ऐसे तमाम वकीलों को नज़दीक से जानता हूँ जो वैसे तो तमाम बड़े छोटे पत्रकारों के दोस्त बने फिरते हैं और तमाम सार्वजनिक मंचों पर स्वतंत्र पत्रकारिता की दुहाई देते हैं लेकिन कोर्ट में जब किसी मीडिया मालिक के खिलाफ कोई केस होता है तो मीडिया मालिक की तरफ़ से खड़े हो जाते हैं। यह ठीक है कि वह उनका पेशा है लेकिन तब उन्हें स्वतंत्र पत्रकारिता की दुहाई नहीं देनी चाहिए न टीवी चैनलों पर बैठकर लफ्फाजी करनी चाहिए। 

एक लफ़्फ़ाज़ वक़ील ऐसा है कि आज तक कोई चुनाव नहीं जीत सका लेकिन डॉ मनमोहन सिंह के अर्थशास्त्र को भी चुनौती दे देता है।...ऐसे लोगों से आप भला लोकतांत्रिक संस्थाओं को बचाने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?  हालाँकि इन्हीं में प्रशांत भूषण और ऐसे असंख्य वक़ील हैं जो हमें उम्मीद भी बँधाते हैं। कुछ वकीलों के नाम सामने नहीं आते और वे बेहतरीन काम कर जाते हैं।


Thursday, May 2, 2019

मसूद अज़हर के बाद आगे क्या...

अंग्रेज़ी का शब्द हाइप बहुत लाजवाब शब्द है। हाइप यानि किसी चीज़ को इतना बढ़ा चढ़ाकर पेश करना कि लोग उस चीज़ के, उस शब्द के निगेटिव (नकारात्मक) या पॉज़िटिव (सकारात्मक) ढंग से दीवाने हो जायें।

पश्चिम की मीडिया और उनके नेताओं को यह खेल आता है। भारत में किस पार्टी को इसमें निपुणता मिली है, उसका अंदाज़ा आपको अब हो रहा होगा।...

चुनाव शुरू होते ही उस आतंकी यानी मसूद अज़हर के नाम से हाइप वाली ख़बरें आने लगीं जिसे भाजपा की पिछली सरकार यानी अटल सरकार अजीत डोभाल के नेतृत्व में कंधार छोड़कर आई थी। ...भोले भारतीय भूल गये इस घटना को। 

भारतीय मीडिया और भाजपा नेताओं ने यह नाम इस हद तक जपा कि हम जनता के लोगों को ऐसा लगा कि अगर यह मसूद अज़हर नामक आतंकी अगर ज़िंदा या मुर्दा मिल जाये तो भारत में आतंकवाद खत्म हो जाएगा। 

हम भारत सरकार के साथ हाइप खड़ा करने में जी जान से जुट गये...हमारी हर समस्या का निदान मसूद अज़हर हो गया...

रोज़गार नहीं मिल रहा, बस मसूद अज़हर के ग्लोबल आतंकी घोषित होते ही रोज़गार मिलने लगेगा...किसानों को फसल का वाजिब मूल्य नहीं मिल रहा, कोई बात नहीं, मसूद अज़हर जैसे ग्लोबल आतंकी घोषित हुआ वैसे ही किसान मालामाल हो जायेंगे। नीरव मोदी-मेहुल चौकसी भी लौट आयेंगे सारा लूटा हुआ पैसा लेकर और कहेंगे - ये लो मसूद अज़हर पर इतना पैसा हम न्यौछावर कर रहे हैं।

...ख़ैर अब तो हमारी बहुत बड़ी जीत साबित हुई बताई जा रही है कि मसूद अज़हर को आख़िरकार भारत के दबाव में उसे ग्लोबल आतंकी घोषित कर दिया गया। मीडिया मोदी जी पर क़ुर्बान हो गई। मोदी जी की वजह से यह कामयाबी मिली। ...



हमारे पड़ोसी इतने ख़ुश हुए कि कहने लगे अब भारत में आतंकवाद खत्म हो जायेगा। हमारे सैनिकों पर हमले नहीं होंगे। उन्हें शहादत नहीं देनी पड़ेगी। मैंने उनकी ख़ुशी को काफ़ूर नहीं करना चाहा यह बताकर कि अभी अभी गढ़ चिरौली (महाराष्ट्र) में 15 शहीद हो गये। ...लेकिन मैंने उनको बताया कि जिस यूएन प्रस्ताव के तहत उसे बैन किया गया, उसमें पुलवामा अटैक का ज़िक्र नहीं है। वह बरस पड़े। बोले- आप पत्रकार लोगों में यही कमी है। चीज़ों को समग्रता में नहीं देखते। अरे उसे टटोल आतंकवाद के लिए बैन किया गया है। पुलवामा भी उसमें शामिल है। मैंने कहा- सारा प्रस्ताव अब सार्वजनिक है। अशार पढ़ लो। वह ग़ुस्सा निकालते और पैर पटकते चले गये।

थोड़ी देर बाद फिर लौटे। पूछा- आपका फलाने मंत्रालय में कुछ जुगाड़ है या यूँ ही पत्रकार बने फिरते हो। मैंने कहा- सेवा तो बताइये। उन्होंने कहा- हमारे छोटे का इंटरव्यू है। अगर मंत्री कह देगा तो काम बन जायेगा। मैंने कहा- अब किसी से नौकरी के लिए कहना ही नहीं पड़ेगा। वह बोले- कैसे? मैंने कहा- बस मसूद अज़हर ग्लोबल आतंकी बन गया है। मोदी जी पहली फ़ुर्सत में नौकरियाँ देंगे। उन्होंने मुझे घूरा और यह कहते हुए उठ खड़े हुए कि आप मुद्दे से भटका रहे हैं।

सचमुच यक़ीन मानिये....हम एक दूसरे को मुद्दे से भटका रहे हैं। क्या अमेरिका पोषित ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद आतंकवाद खत्म हुआ, क्या इस्राइल पोषित जहन्नुमी अबू बकर बगदादी के पैर उखड़ने या मारे जाने के बाद आतंकवाद खत्म हुआ, पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई पोषित हाफिज सईद तो मुंबई टेरर अटैक के बाद ग्लोबल आतंकी घोषित किया जा चुका है, क्या उसके बाद हाफिज सईद या उसके आतंकी नेटवर्क का ख़ात्मा हो पाया? दरअसल, ये सारे नाम हाइप वाले हैं जिन्हें मीडिया खड़ा करता है या कराया जाता है।

दरअसल, ग्लोबल आतंकवाद अमेरिका-इस्राइल-सऊदी अरब (वहाबी आतंकी देश) के रहमोकरम पर ज़िंदा है। आतंकियों के ग्लोबल नेटवर्क को खादपानी भी यही देते हैं। 

यह तमाम देशों में छोटे छोटे गुट खड़े करके आतंक फैलाते हैं और अपनी सुविधा और नीति के तहत उसे खत्म भी कर देते हैं। आपको जूनियर बुश का ज़माना याद है? किस तरह से आतंकवाद के खिलाफ युद्ध छेड़ने के नाम पर इराक़ पर हमला किया गया और उसके सारे तेल और खनिज संपदा पर अमेरिका ने क़ब्ज़ा कर लिया। 

चीन ने अपने स्वार्थों के तहत मसूद अज़हर को ग्लोबल आतंकी घोषित करने के मामले में पहले चार बार अड़ंगा लगाया और अब अपने सिल्क रूट प्रोजेक्ट में भारत को शामिल करने के लिए उसने दाँव खेला है। चीन अपने प्रोजेक्ट में भारत, पाकिस्तान, ईरान आदि को शामिल करके यूरोपियन यूनियन जैसा कुछ बनाना चाहता है। जिसकी अपनी इकॉनमी होगी। उधर, यूएन में अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस मसूद अज़हर पर प्रस्ताव इसलिए लाये ताकि भारत को ईरान के तेल कारोबार से निकालकर सऊदी अरब के ज़रिये अमेरिकी तेल बेचा जा सके। 

पाकिस्तानी सेना हमारे कश्मीर में खासी दिलचस्पी लेती है। कश्मीरी अवाम के संघर्ष को वह हर तरह से मदद करती है। उसके पास मसूद अज़हर और हाफिज सईद जैसे असंख्य प्यादे हैं। वह फिर नया प्यादा खड़ा कर देगी। लेकिन मसूद अज़हर का हाइप खड़ा करके या इसकी आड़ में राष्ट्रवाद को ही देश का सबसे बड़ा मुद्दा बनाकर पेश करना खुद को धोखा देना है। मसूद अज़हर तो ग्लोबल आतंकी घोषित हो गया लेकिन उसके बाद क्या...?    






Wednesday, April 24, 2019

हमारा तेल खरीदो, हमारा हथियार खरीदो...फिर चाहे जिसको मारो-पीटो




भारत अमेरिका-इस्राइल-अरब के जाल में फँस गया है। नया वर्ल्ड ऑर्डर (विश्व व्यवस्था) अपनी शर्तें खुलेआम बता रहा है। ...हमारा तेल ख़रीदो और हमारे ही हथियार ख़रीदो। नहीं तो बम धमाकों, तख़्ता पलट, दंगों का सामना करो।...अगर किसी आतंकवादी गुट से बातचीत या समझौता करना होगा तो वह भी हम करेंगे। अगर तुम अपने देश में अपनी किसी आबादी या समूह पर जुल्म करना चाहते हो, उनका नरसंहार करना चाहते हो तो वह हमारी बिना मर्जी के नहीं कर सकते। हमारी सहमति है तो उस आबादी और समूह से तुम्हारी फौज, तुम्हारी पुलिस कुछ भी करे, हम कुछ नहीं बोलेंगे। बस तुम्हारी अर्थव्यवस्था हमारी मर्जी से चलनी चाहिए और वहां के समूहों को कुचलने में हथियार हमारे इस्तेमाल होने चाहिए। 

इस वर्ल्ड ऑर्डर में चीन और उसका सिल्क रूट, ईराऩ जैसे कई मुल्क सबसे बड़ी बाधा हैं। भारत ने तटस्थ होने की कोशिश की लेकिन उसके नेता नैतिक साहस नहीं जुटा पाए और अमेरिकी वर्ल्ड आर्डर के सामने घुटने टेक दिये।



#अमेरिका ने #भारत से कहा, #ईरान का तेल मत ख़रीदो, हम सऊदी अरब से महँगा तेल दिलवा देंगे लेकिन ख़रीदना सऊदी का तेल ही पड़ेगा। यानि अब भारत महँगा तेल #सऊदी #अरब से ख़रीदेगा। भारत में तेल महँगा बिकेगा, महँगाई बढ़ेगी। भारत के मौजूदा नेतृत्व में इंदिरा गांधी जैसा साहस नहीं है कि वह अमेरिकी वर्ल्ड आर्डर को चुनौती दे सके। इंदिरा गांधी यूं ही नहीं कहती थीं कि सीआईए उनकी हत्या कराना चाहता है। सीआईए ने पाकिस्तान की मदद से #खालिस्तान आंदोलन खड़ा कराया। खालिस्तानी नेता अमेरिका- #कनाडा में बैठकर भारत में अलग देश बनवाने की कोशिश करते रहे। इसी दौरान इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई। अमेरिकी मदद से #लिट्टे खड़ा हुआ। पूरी फंडिंग अमेरिका- #इस्राइल पोषित कंपनियों की थी। लिट्टे ने राजीव गांधी की हत्या कर दी। भारत में अब भाजपा की सरकार है। उसका झुकाव शुरू से अमेरिका-इस्राइल की तरफ रहा है। वहां के संगठनों से फंडिंग तक होती रही है। यानी भारत में उन तीन देशों के अनुकूल सरकार है।

खैर, हमारी बाततीच का विषय नया अमेरिकी वर्ल्ड आर्डर और भारतीय हितों को समझना है। 

सऊदी अरब के अय्याश शेख़ और आले सऊद तेल बेचकर मिलने वाले पैसे अमेरिकी बैंकों में रखते हैं। पूरा लेनदेन अमेरिकी सरकार की नजर में होता है। लेहमन बैंक जब अमेरिका में डूबा तो शेखों के पैसे भी डूब गए। लेकिन अमेरिका का जो घराना दुनिया के सारे बैंकों को नियंत्रित करता है, उस पर कोई असर नहीं पड़ा। उसने सऊदी पैसों को पहले ही ठिकाने लगा दिया था। नाम के लिए तेल सऊदी अरब का है, दरअसल, उस पर अमेरिकी-इस्राइली कंपनियों का नियंत्रण है।

सऊदी अरब में कल सरेआम 37 लोगों को आले सऊद की हुकूमत ने क़त्ल करा दिया। उनकी लाशों के टुकड़े-टुकड़े कर उन्हें वहां खंभों पर टांग दिया गया। कत्ल किए जाने वालों में वहाँ बग़ावत की आवाज़ बुलंद करने वाले शिया-सुन्नी मौलाना, छात्र, मज़दूर शामिल थे। इसमें वह लड़का अब्दुल हकीम भी था जिसे 16 साल की उम्र में पकड़ा गया और अब बालिग होने पर 19 साल की उम्र में कत्ल कर दिया गया। पूरी दुनिया में मानवाधिकार की चिंता करने वाले अमेरिका ने वहाबी हुकूमत के इस जुल्म पर एक शब्द भी नहीं कहा। सरेआम कत्ल का आदेश वहाबियत के पैरोकार उस सऊदी प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने दिया था जिसे अभी हाल ही में भारत और पाकिस्तान आने पर दोनों देशों में सम्मानित किया गया था।

आतंकी गुट भाई-भाई
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#तालिबान जो एक आतंकवादी संगठन है और भारतीय हितों के खिलाफ काम करता है। उसके दोस्त अलक़ायदा और आईएस दुनिया के किसी भी हिस्से में धमाका कर देने की ताकत रखते हैं। ओसामा बिन #लादेन से लेकर अब तक आईएस की लीडरशिप को खड़ा करने वाले अमेरिका, इस्राइल, सऊदी अरब ही हैं। ईरान और सीरिया को तोड़ने के लिए इस्राइल के नियंत्रण वाले गोलान हाइट से एक अनजान से मुसलमानों के नाम पर कलंक अबू बकर #बगदादी को तलाशा गया और उसे रातोंरात #खलीफा बनाकर आईएसआईएस की कमान सौंप दी गई। यह साजिश सीरिया और ईरान ने आपसी समझबूझ से नेस्तोनाबूद कर दी। दुनिया में अपनी दादागीरी स्थापित करने के लिए अमेरिका उसी तालिबान, #अलकायदा और #आईएस के आतंकियों से समझौता करने के लिए कभी उनके साथ सऊदी अरब की राजधानी रियाद में बात करता है तो कभी नार्वे में। यह सीधा सा संकेत है कि अमेरिका चाहे तो क्या नहीं कर सकता। #आतंकी संगठनों के खाते सऊदी अरब में खुले हुए हैं और पैसा उनमें अमेरिका-इस्राइल से आता है।

सोचिए, अगर अमेरिका #आतंकवाद के खिलाफ है तो वह तालिबान और आईएस से बात क्यों कर करता रहता है? अगर अमेरिका मानवाधिकार का इतना बड़ा रक्षक है तो सऊदी अरब में किए जा रहे कत्ल पर उसकी जुबान बंद क्यों है। अगर अमेरिका इतना बड़ा हकपरस्त है तो फिलस्तीन समेत एशिया के कई देशों में जो समूह अपनी आजादी और अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उनके साथ क्यों नहीं खड़ा हो रहा है। ऐसा क्यों है कि इन सभी देशों में इस्राइली हथियारों का इस्तेमाल उन समूहों और उन आवाजों को कुचलने के लिए हो रहा है। पिछले दिनों जब भारत ने #पाकिस्तान के बालाकोट में बम बरसाये तो पाकिस्तानी मीडिया और अमेरिकी मीडिया में यह रिपोर्ट और लेख छापे गए कि अब समय आ गया है कि पाकिस्तान ने इस्राइली हथियार खरीदने पर जो अघोषित बैन लगा रखा है, वह खत्म करे और इस्राइल से हथियार खरीदे जायें। ताकि उनका इस्तेमाल भारत पर किया जा सके। यानी इस्राइली-अमेरिकी परस्त लेखकों, सैन्य अफसरों ने पाकिस्तान सरकार को सलाह दी कि वह भी भारत की ही तरह इस्राइल से हथियार खरीदे। ऐसी सलाह देने वाले दरअसल पाकिस्तान के हित चिंतक नहीं थे, बल्कि वे इस्राइली हथियार कंपनियों की लॉबिंग कर रहे थे। ऐसा होने पर फायदे में कौन रहेगा, जाहिर है इस्राइल रहेगा, जिसका हथियार बिकेगा। भारत-पाकिस्तान अगर लड़ते हैं, युद्ध करते हैं तो फायदे में इस्राइल-अमेरिकी कंपनियां रहेंगी, जिनके हथियारों का इस्तेमाल दोनों देश करेंगे।


सिल्क रूट पर नजर
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#श्रीलंका में मामूली आबादी में मुसलमान रहते हैं। वहाँ की सरकार को और वहाँ के मुसलमानों को एक दूसरे से कभी कोई शिकायत नहीं रही है। इसके बावजूद श्रीलंका में कोआर्डिनेटेड बम धमाके कराये जाते हैं जो बिना बाहरी देश की मदद के बिना नामुमकिन है। श्रीलंका को स्पष्ट चेतावनी है कि वह चीन के ग्रुप से बाहर निकले। हिंद महासागर में श्रीलंका का सामरिक महत्व है। 900 बिलियन डॉलर वाले चीनी सिल्क रूट का श्रीलंका मुख्य ट्रांजिट पॉइंट है। इस सिल्क रूट में #चीन के बाद श्रीलंका, ईरान, पाकिस्तान सबसे महत्वपूर्ण कड़ियाँ हैं। श्रीलंका सिल्क रूट का फायदा उठाकर अपने देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए चीन की तरफ बढ़ रहा है। अमेरिका को श्रीलंका की यह जुर्रत पसंद नहीं है।



चीन पर पाकिस्तान की निर्भरता बढ़ती जा रही है। जब एक तरफ़ ईरान और उसके तेल पर दुनिया के तीन बड़े आतंकवादी परस्त देश अमेरिका, इस्राइल और सऊदी अरब तमाम तरह के प्रतिबंध लगा रहे हैं तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ईरान की यात्रा पर चले जाते हैं। ये कूटनीतिक संकेत इशारों में दिये जाते हैं। बहुत साफ़ है कि इमरान की वही नीतियाँ हैं जो बेनज़ीर भुट्टो की थीं। पाकिस्तान का इस्तेमाल अमेरिका अपने हितों के लिए करता रहा है। अफगानिस्तान को रूस के प्रभुत्व से मुक्त कराने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान की मदद से वहां तालिबान को खड़ा किया था। अमेरिका के कहने पर पाकिस्तान के पूर्व तानाशाह परवेज मुशर्फ ने ओसामा बिन लादेन को अपने देश में शरण दी। लादेन वहां छिपा रहा, अमेरिका ने उसे कुछ समय बाद मार भी दिया। लाश को समुद्र में बहा दिया। बगदादी मरा या जिंदा है, कोई नहीं जानता। अमेरिका-इस्राइल लादेन या अबू बकर बगदादी जैसे जो पात्र गढ़ते हैं और खड़ा करते हैं, उनकी मौत पर अंत तक रहस्य बना रहता है। अफगानिस्तान मिशन अब पूरा हो चुका है। लेकिन पाकिस्तान कम चालाक नहीं है। उसने चीन से दोस्ती गांठ ली। चीन अब पाकिस्तान में पानी की तरह पैसा बहा रहा है। ईरान-चीन की दोस्ती पहले से ही चली आ रही है। पाकिस्तान की नई हुकूमत को ईरान से दोस्ती इन्हीं हालात के मद्देनजर करनी पड़ रही है। इमरान का ईरान में जाकर यह कहना कि हां, हमारे ही देश के आतंकी संगठन ने आपके सैनिकों की हत्या की है। संकेत साफ है कि इमरान अब ईरान के खिलाफ अपने देश से कोई आतंकवादी गतिविधि नहीं चलने देंगे।

एक तरफ तो अमेरिकी परस्त मीडिया और इस्राइल मिलकर मुसलमानों को विश्वव्यापी आतंकी कौम घोषित करने में लगे हुए तो दूसरी तरफ चीन में रहने वाले उगुइर मुसलमानों की चिंता के नाम पर घड़ियाली आंसू भी बहाते हैं। तमाम उगुइर नेता इस समय अमेरिका में रह रहे हैं और चीन के एक हिस्से में उगुइर मुसलमानों को हिंसा के लिए प्रेरित कर रहे हैं। इस्राइली एनजीओ भी इन उगुइर नेताओं की फंडिंग करते हैं। अचानक आप देखेंगे कि चीन में मानवाधिकारों की कथित हत्या पर अमेरिकी परस्त प्रेस लंबे चौड़े लेख प्रकाशित करती रहती है। इस तरह चीन को अमेरिका-इस्राइल घेरना चाहते हैं लेकिन चीन इस समय इतना शक्तिशाली है कि वह इनके काबू में नहीं आ रहा है। चीन, ईरान, रूस मिलकर अमेरिका के सामने ऐसी प्रतिरोधी ताकतें बन गई हैं जो अमेरिका-इस्राइल को चिंतित रखती हैं। 


ईरान के चारों तरफ़ फैले मुल्क अगर अमेरिकी-इस्राइली-सऊदी नेक्सस में नहीं होंगे तो अमेरिका ईरान पर हमला नहीं कर पायेगा। अमेरिका ने ईरान की इस्लामिक क्रांति के दौरान ऐसी हिमाक़त की थी लेकिन उसके छह फाइटर विमान नष्ट हो गए थे। इसलिए तीन देशों के इस नेक्सस को भारत और श्रीलंका के एयरबेस चाहिए। जहाँ से उसके फाइटर विमान ईरान पर चढ़ाई कर सकें। अमेरिका, भारत और सऊदी अरब की जनता चाहे भले ही इन हमलों के पक्ष में न हो लेकिन वहाँ की सरकारें उन तेल बेचने वाले अमीरों और हथियार बनाने वाली कंपनियों के हितों को देख रही है। इसलिए नए अमेरिकी वर्ल्ड आर्डर में भारत-श्रीलंका-अफगानिस्तान-पाकिस्तान जैसे देशों का महत्व बढ़ गया है। लेकिन ये देश इस्तेमाल होने के लिए बने हैं। चूंकि ईरान के नजदीक हैं इसलिए अमेरिका ईरान को घेरने के लिए इन छोटे देशों का हर तरह से इस्तेमाल करना चाहता है।

भारत का मौजूदा नेतृत्व जो इस देश को बहुत शक्तिशाली बता रहा है और आने वाले वक्त में विश्व महाशक्ति बनने की बात भी कर रहा है तो क्यों नहीं अमेरिका को नजरन्दाज कर ईरान से तेल की खरीद जारी रखने की घोषणा करता। तेल भारत की लाइनफलाइन है। तेल के दाम से ही यहां महंगाई घटती और बढ़ती है। ईरानी तेल जब हमारे लिए सस्ता है और भारत के हित में है तो अमेरिका को मना करने में क्या हर्ज है। भारत को अमेरिकी हितों की चिंता छोड़कर अपने हितों की चिंता करनी चाहिए। ईरान का तेल भारत को तमाम संकटों से बचा सकता है लेकिन महंगा सऊदी तेल भारत में नए संकटों को जन्म दे सकता है। जिसका असर देश के राजनीतिक नेतृत्व पर पड़ना तय है।




Tuesday, April 9, 2019

अभाव, गंदगी, चुनाव के झूठे वायदों के बावजूद हरिजन कैंप में जिंदगी गुलज़ार है

जगह- हरिजन कैंप, लोदी कॉलोनी, साउथ दिल्ली की मस्जिद

बच्चे का नाम - मोहम्मद सलमान

सोर्स का नाम - मोहम्मद मोती, राज मिस्त्री (मैंशन)

पहले वीडियो देखें फिर नीचे की तस्वीर देखें...वीडियो में क्या है, जानबूझकर नहीं लिखा। अगर आपने सुना तो शायद आप ही बता दें।


दिल्ली में लोदी रोड पर इंडिया हबीतात सेंटर है और इसी से चंद कदम की दूरी पर हरिजन कैंप आबाद है। जिस इंडिया हबीतात सेंटर में ग़रीबों और ग़रीबी पर आए दिन सेमीनार होते रहते हैं, वहीं चंद कदम की दूरी पर यह बस्ती उन तमाम लफ्फाजियों को मुंह चिढ़ाती रहती है।

मैं इस बस्ती में कल था। लोग बता रहे थे तीन दिन से पानी नहीं आ रहा है। लेकिन लोग उस गुस्से में शिकायत नहीं कर रहे थे, जिसकी उम्मीद की जाती है। चुनाव के मौसम में जब हर वोटर अपनी समस्याएं बताते नहीं थकता है, ऐसे में इस बस्ती में चुनाव कोलाहल से दूर लोग खुद में मस्त नजर आए। खबरों के मामले में टीवी के तमाम घटिया प्रभावों के बावजूद इस बस्ती के लोगों को नहीं मालूम कि इस आम चुनाव में कौन जीतेगा। उनका कहना था कि हमें कल फिर दिहाड़ी पर निकल जाना है, हमें क्या फर्क पड़ेगा, कौन जितेगा और कौन हारेगा।...

हरिजन कैंप में हिंदू-मुसलमानों की मिली जुली आबादी है। गरीबी दरवाजे से झांकती है। लेकिन इसके बावजूद जितनी खुशहाली इस बस्ती में दिखी, उसका बयान मुश्किल है। इसी बस्ती के बीच में हमें एक मस्जिद मिली, जहां इस बच्चे को एक कलाम पढ़ते पाया तो उसका विडियो बना लिया। मस्जिद के मौलवी साहब यहां पर ऐसे मुस्लिम बच्चों की पीढ़ी तैयार कर रहे थे, जो भारत को सभी समुदायों का एक गुलदस्ता समझे। इल्म के बारे में बच्चों को बता रहे थे। हरिजन बस्ती के बीच में इस मस्जिद और मदरसे से जो रोशनी मुझे निकलती दिखी, शायद आप इस विडियो को सुनने के बाद महसूस करें।

 बहरहाल, इस बस्ती के पास एक मार्केट भी है, जहाँ कथित इलीट क्लास शॉपिंग के लिए जाता है। इसमें नेताओं और मंत्रियों की पत्नियाँ शामिल हैं...। यही लोग फिर गरीब और गरीबी पर भाषण झाड़ते हैं लेकिन ऐसे लोगों को इस बस्ती की तकलीफ नजर नहीं आती है।




 






#DelhiDiary
#IndiaHabitatCentre

Saturday, March 16, 2019

मस्जिदों में गोलीबारी के बाद न्यूजीलैंड महान है या भारत...


कोई भी देश महान उसके लोगों से बनता है...भारत न्यूज़ीलैंड की घटना से बहुत कुछ सीख सकता है...सिर्फ नारा भर देने से कि गर्व से कहो हम फलाने महान हैं तो कोई महान नहीं बनता।

पूरे न्यूजीलैंड के लोग अपने आसपास के मुस्लिम घरों में जा रहे हैं, वे उन्हें गुलाब पेश करते हैं और कहते हैं हम आपके साथ हैं।...वहां की प्रधानमंत्री का भाषण कल रात से मैंने कई बार सुना।...प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डन का मारे गए लोगों के लिए बोला गया यह शब्द - They are us (दे आर अस) यानी वो हम ही हैं - अब वायरल है और ऐसे ही शब्द किसी देश के नेता के व्यक्तित्व का परिचय कराते हैं। वरना ढिंढोरचियों की तो कमी नहीं है।





कोई बुज़ुर्ग पोस्टर लेकर न्यूजीलैंड से मीलों दूर मैन्चेस्टर की मस्जिद के बाहर खड़ा है, जिस पर लिखा है- मैं आपका दोस्त हूँ। जब आप नमाज़ पढ़ेंगे, मैं आपकी सुरक्षा करूँगा।...और उस बुज़ुर्ग की बेटी उस पोस्टर को शेयर करते हुए लिखती है कि मुझे गर्व है कि आप मेरे पिता हैं। आज मैंने जाना कि  सेकुलर होने का मतलब क्या है? बीबीसी को इस बुज़ुर्ग के पोस्टर में इतनी गहराई नज़र आती है कि वह उसे अपने हर प्लैटफ़ॉर्म पर वायरल कर देता है। आज सुबह से यह पोस्टर सोशल मीडिया पर तैर रहा है।




यह पोस्टर सिर्फ ब्रिटेन में ही नहीं शेयर हो रहा, इसे न्यूज़ीलैंड में भी शेयर किया जा रहा है। 

इस पोस्टर को देखने के बाद लिसा जेनकिन्स ने लिखा- आप किसी भी मज़हब के हों, लेकिन हमें जिंदगी में इस बुज़ुर्ग जैसा ही होना चाहिए।

इतना ही नहीं, ऐसे पोस्टर शेयर किए जा रहे हैं जिनमें शिया, सुन्नी, ईसाई धर्मगुरु एकता प्रदर्शित करते हुए दिख रहे हैं।

न्यूज़ीलैंड, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया में एक मुस्लिम युवक रज़ी रिज़वी का यह ट्वीट भी आज काफ़ी ट्रेंड में है कि चाहे तुम हमारे लिए बेशक इस्लामिक आतंकवाद लिखो और कहो लेकिन मैं इसे ईसाई आतंकवाद नहीं कहूँगा क्योंकि हज़रत ईसा (Christ) हमारे भी पैग़म्बर हैं। तुम्हारा इस्लाफफोबिया तुम्हें मुबारक।

रूज एलिना ने लिखा है कि नस्लीय भेदभाव (Racism) के बिना ज़िंदगी कितनी ख़ूबसूरत होती है।... फिर वो अपने दोस्तों को लिखती हैं कि इस्लाम में क्या-क्या अच्छाइयाँ हैं...फिर वह कहती हैं कि दूसरे धर्मों को वही सम्मान दो जो तुम्हें अपने धर्म के लिए चाहिए।

याद कीजिए पुलवामा आतंकी हमले की घटना के बाद भारत में बना माहौल। इसमें कोई शक नहीं कि पुलवामा में चालीस बेक़सूर जवानों की हत्या न सिर्फ़ निंदनीय थी बल्कि कायराना थी। भारत के तमाम मुस्लिम संगठनों ने पुलवामा के आतंकी हमले का विरोध किया। कोई मस्जिद ऐसी नहीं थी जिसमें आतंकवाद के ख़िलाफ़ और पुलवामा की घटना के ख़िलाफ़ मुस्लिम धर्मगुरुओं ने खुतबा न पढ़ा हो। लेकिन दूसरी तरफ़ भारत को तोड़ने की कोशिश में लगे एक ख़ास विचारधारा के लोग यहाँ-वहाँ सड़कों पर निकल आए और उन्होंने उन कश्मीरियों को निशाना बनाने की कोशिश की जो मेवे बेच रहे थे, जो कपड़े बेच रहे थे, जो परीक्षा देने आए थे या कश्मीर से बाहर पढ़ रहे थे। 

...लेकिन उस विचारधारा के फ़र्ज़ी राष्ट्रवादियों का इसमें क़सूर नहीं है। वो अपने नेता से सब सीखते हैं। जब उनका नेता गुजरात नरसंहार में मुसलमानों के क़त्लेआम की तुलना गाड़ी के नीचे आने वाले पिल्ले से करता है तो संवेदनशीलता का अंदाजा लगाना कठिन नहीं है....जब वह नेता मौलाना की दी हुई टोपी पहनने से इनकार कर देता है तो उसकी कुटिलता का पता लगाना कठिन नहीं है...जब वह ईद की मुबारकबाद नहीं देने जैसा घृणित काम करता है तो उसकी गलीज सोच का पता लगाना कठिन नहीं है...तो उसकी पार्टी का कैडर, समर्थक भी तो वही करेगा, जो उसका नेता करेगा।

वसुधैव कुटुम्बकम वाले भारत के लोगों को संकीर्ण विचारधाराओं के बंधन में बाँधने की कोशिश हो रही है। एकतरफा राष्ट्रवाद को नियो नाजियों के अंदाज में फैलाया जा रहा है। सरहद पर सेना लड़ती है। लेकिन उसके पराक्रम को नेता और मीडिया भुनाता है। नेता उस पर फिल्म बनवाता है, पोस्टर जारी कराता है। वह बताता है कि यह फौज भी  पराक्रमी नेता की वजह से पराक्रमी फौज है। इसीलिए लड़ पा रही है। विडम्बना देखिए सियाचिन में जवान खड़ा है लेकिन वहां गया नेता बुलटप्रूफ जैकेट पहनकर राष्ट्रवादी बन जाता है और हम लोग मान भी लेते हैं।

...भारत में हम हर समय हिंदू-मुसलमान में लगे रहते हैं। न्यूज़ीलैंड में कल मुसलमानों पर हुए आतंकी हमले के बाद क्या हुआ, क्या आपने वहां के मीडिया के ज़रिए जानने की कोशिश की...क्योंकि भारतीय मीडिया ने आपके सोचने-समझने की ताकत छीन ली है। आप बाकी दुनिया की मीडिया पर भरोसा नहीं करते लेकिन दलाल मीडिया पर जरूर भरोसा करते हैं।

सीखो भारत...न्यूजीलैंड से कुछ सीखो...


Tuesday, February 26, 2019

देवताओं का वॉर रस प्रवचन

देवता आसमान से पुष्प वर्षा कर रहे हैं...आज वॉर रस पर प्रवचन का दिन है...

देवता वॉर वाणी (War Sermons) कर रहे हैं...बच्चा जीवन में टाइमिंग का ही महत्व है।...कुछ कार्य का समय चुन लो...वॉर रस से मंत्रमुग्ध जनता को अगर शांति पाठ करने को कहोगे तो तुम्हें कच्चा चबा जाएगी लेकिन वॉर रस में अगर उसे पबजी गेम में भी अटैक बोलोगे तो वह ख़ुश हो जाएगी। टाइमिंग की कला जिसको आती है, वही वीर है।

अच्छे टाइमिंग का ताजा उदाहरण देखो...कल वॉर मेमोरियल (War Memorial) का उद्घाटन हुआ, आज यानी 26 फ़रवरी को  भारतवर्ष की सेना ने अपने पड़ोस में जाकर कई किलो बम गिरा दिए...नोमैंस लैंड में क़रीब तीन सौ लोग मारे गए...कई आतंकी शिविर हमेशा के लिए तबाह हो गए। यही टाइमिंग है...वॉर रस में डूबी जनता को अपना टॉपिक और टॉनिक मिल गया है। सीआरपीएफ़ जवानों की तेरहवीं के दिन किए गए इस अटैक से संबंधित पक्षों ने कई हसरतें पूरी कर ली हैं। वॉर रस में डूबी जनता जश्न मोड में आ चुकी है। स्कूलों में पढ़ाई की जगह बच्चों में भी नारे लगवा कर वॉर रस का संचार किया जा रहा है।

जब तक इस वॉर रस का ख़ुमार उतरेगा तो धर्म का रस तैयार है। देवता कह रहे हैं कि अयोध्या को सजाया जा रहा है। तैयार किया जा रहा है। कतिपय लोग फिर से पंचायत को भी कह रहे हैं।...देवता कह रहे हैं कि टाइमिंग का चुनाव फिर मायने रखेगा। फिर चुनाव आ जाएगा। तीन महीने तक उसका उत्सव रहेगा।...फिर योजना रस पिलाया जाएगा।....ग़रीबी, भुखमरी, आतंकवाद से लड़ने के वादे और संकल्प लिए जाएँगे।...आपको फिर अगले वॉर रस का टॉनिक दिया जाएगा।...आपकी जिंदगी यूँ ही चलती रहेगी। उसमें आपको बदलाव खुद लाना होगा। वॉर रस का टॉनिक आपकी जिंदगी नहीं बदल सकता।

मेरे इन शब्दों को हमेशा के लिए संकलित कर लें...
थोपा गया युद्ध और ओढ़ा गया युद्ध एक ही सिक्के के दो पहलू हैं...

Monday, February 18, 2019

पुलवामा पर तमाम प्रयोगशालाओं की साजिशें नाकाम रहीं

पुलवामा ने हमें बहुत कुछ दिया। जहां देश के लोगों ने सीआरपीएफ के 40 जवानों की शहादत पर एकजुट होकर अपने गम-ओ-गुस्से का इजहार किया, वहां तमाम लोगों ने नफरत के सौदागरों के खिलाफ खुलकर मोर्चा संभाला।

पुलवामा की घटना के पीछे जब गुमराह कश्मीरी युवक का नाम आया तो कुछ शहरों में ऐसे असामाजिक तत्व सड़कों पर निकल आए जिन्होंने कश्मीरी छात्रों को, समुदाय विशेष के घरों, दुकानों को निशाना बनाने की कोशिश की लेकिन सभी जगह पुलिस ने हालात संभाले। लेकिन इस दौरान सोशल मीडिया के जरिए भारत की एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसकी कल्पना न तो किसी राजनीतिक दल के आईटी सेल ने की थी न किसी नेता ने की थी।

उन्हें लगा था कि नफरत की प्रयोगशाला में किए गए षड्यंत्रकारी प्रयोग इस बार भी काम कर जाएंगे। देश की जानी-मानी हस्तियों ने, लेखकों ने, इतिहासकारों ने, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने, पत्रकारों ने, कुछ फिल्म स्टारों ने और सबसे बढ़कर बहुत ही आम किस्म के लोगों ने अपील जारी कर दी कि अगर किसी जगह किसी कश्मीरी या समुदाय विशेष के लोगों को नफरत फैलाकर निशाना बनाया जा रहा है तो उनके दरवाजे ऐसे लोगों को शरण देने के लिए खुले हैं।

देश में जब 1947, 1984, 2002 जैसे भयानक दंगे और नरसंहार हुए तब टारगेट किए गए समुदाय के किसी परिवार को पनाह देने पर वह खबर बन जाया करती थी, कहानियां बन जाया करती थीं। लेकिन 2019 में सोशल मीडिया का दौर है और उसने अपनी ताकत की पहचान फिर से करा दी है। नफरतों का कारोबार करने वालों को इतनी बड़ी चुनौती 1947, 1984 और 2002 के नरसंहारों में नहीं मिली थी।

1984 में जब सिख विरोधी दंगे हुए तो जिस शहर में मैं पढ़ाई के साथ-साथ छोटी-मोटी पत्रकारिता कर रहा था, वहां अहसास हुआ कि दंगाई किस हद तक जा सकते हैं और ऐसे में अगर कोई सिर्फ किसी एक पीड़ित परिवार की मदद कर दे तो सामाजिक ताना-बाना बिखरने से बच जाता है। उस परिवार की सोच हमेशा के लिए बदल जाती है और वह अपनी पीढ़ी दर पीढ़ी इसी सामाजिक ताने-बाने को बचाने का संदेश देता चला जाता है।

मेरी फेसबुक लिस्ट बहुत लंबी नहीं है। लेकिन जितनी है, उतनी पर मुझे पहली बार गर्व का एहसास हुआ। इतने बड़े पैमाने पर लोगों ने अपील जारी की थी कि एक-एक का नाम लेकर बताने पर इस लेख के कई पेज भर जाएंगे। और ऐसी अपीलें सिर्फ दिल्ली एनसीआर से ही नहीं रक्सौल और औरंगाबाद तक से आ रही थीं। हालांकि एक राजनीतिक दल की आईटी सेल के दिहाड़ीदार ने टिप्पणी की कि फेसबुक पर अपील जारी करना आसान है और लोगों तक मदद पहुंचाना अलग बात है। मैंने उनको बताया कि जिन लोगों ने मदद पहुंचाई है, वह लोग यहां तो गा-गाकर बताने से रहे कि उन्होंने किसको मदद पहुंचाई है।

पुलवामा की घटना से राजनीतिक दलों ने इमोशनल अत्याचार की जो फसल काटने का प्लान तैयार किया था, उसे भी सोशल मीडिया ने नेस्तोनाबूद कर दिया। हुआ यह कि जब हमारे 40 जवानों के शव उनके गांव और शहरों में पहुंचने लगे तो नागपुरी प्रयोगशाला से निकले एक राजनीतिक दल के तमाम नेता उन शवों के साथ दांत चिंयारते और हंसते हुए जनता के बीच से निकले, कहीं किसी ने शव को अपने पीछे रखते हुए सेल्फी ले ली। लोगों को यह सब पसंद नहीं आया और ऐसे नेताओं को सोशल मीडिया पर लोगों ने सरेआम जलील किया। ऐसा गुस्सा मुझे पहली बार दिखा।

ऐसी घटनाएं पहली बार नहीं हुई हैं, इससे पहले भी लोग ऐतराज जताते रहे हैं, लेकिन उसका दायरा वहीं तक सीमित होता था। अब उसका दायरा बढ़ रहा है और उस गुस्से को अब व्यापक समर्थन मिलने लगा है। नेताओं से मोहभंग की शुरुआत ऐसी ही घटनाओं से होती है। पर नेता इसके बावजूद अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे।

यह नेताओं के आत्ममंथन का समय है। पुलवामा जैसी घटना को अगर वह अपने चुनाव जीतने का जरिया बनाएंगे तो जनता उन्हें किसी तरह और क्यों माफ करेगी। अगर आप वाकई गमजदा हैं तो उसके सार्वजनिक प्रदर्शन की क्या जरूरत है। आप शहीद के शव के साथ उस वाहन पर क्यों सवार होना चाहते हैं, जहां उस जवान के पिता, भाई, चाचा, बेटे को खड़ा होना है। क्योंकि आप उस स्थिति को भुनाना चाहते हैं। आप जानते हैं कि शातिर मीडिया सिर्फ आपको ही पहचानता है, वह शहीद के परिवार को नहीं पहचानता तो फोकस आप पर ही रहेगा। लेकिन असंख्य आंखे जो उन तस्वीरों को, विडियो को देख रही हैं वे आपको माफ नहीं करने वाले हैं।

अगर आप वाकई शहादत पर गमजदा हैं तो जाकर अपने मुहल्ले में शांति पाठ कराइए, मंदिर में प्रार्थना करिए कि पुलवामा फिर कहीं और न दोहराया जाए, अपनी पार्टी पर दबाव बनाइए कि वह इन शहीदों को जल्द से जल्द वन रैंक वन पेंशन के दायरे में लाए। उनकी शहादत सेना के किसी जवान की शहादत से कम तो नहीं। आप अगर वाकई गमजदा हैं तो उन हालात को देश में पैदा कीजिए, जहां ऐसी आतंकी घटना करने को कोई सोच भी न सके। अपनी पार्टी से कहिए नफरत का नहीं मोहब्बत के वातारण का निर्माण करे। अंध देशभक्ति नफरत को जन्म देती है और दिल से की गई देशभक्ति देश को और मजबूत करती है।

पुलवामा की घटना के विरोध में जिस तरह इस बार देशभर में मुसलमानों ने अपने गुस्से का विरोध जताया, उसे भी दर्ज करना जरूरी है। ऐसा नहीं है कि मुसलमानों को सेना या पैरामिलिट्री फोर्स के जवानों की शहादत पर गुस्सा नहीं आता था। लेकिन वह अपने सीमित दायरे में ही उस पर बात करके, गुस्सा जताकर चुप रह जाते थे। उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि अपने गुस्से के साथ सामने आना जरूरी है, शातिर टीवी मीडिया चाहे उसकी कवरेज करे न करे। शायद आपको किसी टीवी चैनल ने यह तथ्य न बताया हो कि पुलवामा में 40 जवानों की शहादत जुमेरात (गुरुवार) को हुई और अगले दिन जुमा था। देशभर में शायद ही कोई ऐसी मस्जिद बची होगी, जहां जमात के साथ हुई नमाज में मौलाना ने जवानों की शहादत पर अपने खुतबे में खिराज-ए-अकीदत न पेश की हो। मेरा वाट्सऐप, मेरा ईमेल ऐसी असंख्य फोटो से बजबजा रहा था।

आजमगढ़ के मुबारकपुर नामक कस्बे से एक साहब ने मुझे शनिवार को शिकायत भेजी की उनके इलाके की मीडिया ने हमारी मस्जिद के खुतबे को और हमारे प्रदर्शन को तवज्जो नहीं दी। एक लाइन न छापी और न कुछ दिखाया। मैंने उन्हें समझाया कि शायद जगह न रही हो, शायद बड़े शहरों के मुकाबले कस्बों पर ध्यान न गया हो। लेकिन वह शातिर मीडिया पर पूर्वाग्रह से ग्रसित होने का इलजाम लगाते रहे। लेकिन मैं मन ही मन खुश हो रहा था कि देश का आम मुसलमान भी अब दूसरों की तरह अपनी मार्केटिंग की कला सीख रहा है। हालांकि उसने दर कर दी है, लेकिन यह शुरुआत भी रंग लाएगी। मुझे नागपुर का एक फोटो देखने को मिला, नमाज के बाद बमुश्किल 50 दाउंदी बोहरा समुदाय के लोग शहीद जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है। दाऊदी बोहरा लोग आमतौर पर खुद में सिमटे रहने वाला समुदाय है। लेकिन वह लोग भी इस तरह पहली बार खुलकर सामने आए।

बहरहाल, सोशल मीडिया के जमाने में जब मार्केंटिंग के फंडे बदल रहे हैं तो एक पूरी कौम का जागना शुभ संकेत माना जाएगा।....इसके छिपे संकेत खद्दरधारी नेताओं को पढ़ने होंगे। नफरतों का कारोबार अब यह देश आगे नहीं बढ़ने देगा।







 








Friday, February 15, 2019

पुलवामा की बर्फीली सड़क और छद्म युद्ध

जब आप इस वक्त गहरी नींद में हैं, तब कश्मीर के पुलवामा में उन जवानों की लाशों के टुकड़े जमा किए जा रहे हैं, जिन्हें आतंकी हमले में मार दिया गया...
मेरी नींद भी गायब है...मैं उन 42 नामों की सूची को पढ़ रहा हूं, जो अब हमारे बीच नहीं हैं। शहीदों की सूची में दूसरा ही नाम निसार अहमद का है...

थोड़ा तसल्ली सी हुई कि चलो, भक्तों और भगवा ब्रिगेड को यह कहने का मौका नहीं मिलेगा...कि मरने वाले एक ही धर्म या बिरादरी के थे...या इस्लामिक आतंकवाद ने सिर्फ एक ही धर्म वालों को मार दिया...

जैश-ए-मोहम्मद या हिजबुल मुजाहिदीन सिर्फ एक ही धर्म या देश के दुश्मन नहीं है। दरअसल, वह मुसलमान और कश्मीरियत के दुश्मन हैं। ...जानते हैं इस हमले से कश्मीरी अवाम की आवाज कमजोर कर दी गई है। उनके साथ अब लिबरल लोग खड़े होने से छिटक जाएंगे।...

हर हिंसक हमला बड़े आंदोलन को कमजोर कर देता है।

खैर, ऐसे बहुत सारे निसार अहमद आज उन 42 लोगों में हो सकते थे, लेकिन बेचारे जब भर्ती किए जाएंगे, तभी तो ढेर सारे निसार अहमद ऐसी कुर्बानी देने को मिलेंगे।...यह एक शिकवा है, निसार अहमदों को जब भर्ती नहीं करोगे तो इस्लामिक आतंकवाद की झूठी कहानी को कैसे फैलाओगे, दोहराओगे।...हूरें और अप्सराएं मिलने की झूठी कहानियों को पंख कैसे लगेंगे।

अगर ऐसे हमलों में ज्यादा निसार अहमद मरने लगे तो ...इस्लामिक आतंकवाद फैलने का नारा कमजोर पड़ता जाएगा। अंग्रेजों की मुखबिरी करने वालों का, गांधी की हत्या करने वाली मानसिकता का धार्मिक ध्रुवीकरण का अनुष्ठान फीका पड़ जाएगा। 

चर्चिल जो कहकर गया था, निसार अहमदों की कुर्बानी उसे कमजोर कर देगी। गोडसे जो करके गया है, निसार अहमदों की कुर्बानी उस पर पानी फेर देगी।

रात का सन्नाटा है। पुलवामा की बर्फीली सड़कें सायं सायं कर रही हैं। कोई दो बूंद आंसू बहाने वाला नहीं।...लेकिन उन्नाव में मातम है। बहन, बीवी, बेटी, मां, मौसी, चाची सब पछाड़े खा रहे हैं। कोई कुछ भी नहीं जानता पर सवाल सबकी जबान पर हैं। 

ढाई हजार जवानों का काफिला गुजर रहा था। सड़क के दोनों तरफ चप्पे-चप्पे पर पुलिस की चौकियां, आर्मी की पोजिशन, इसके बावजूद एक कार आकर सीआरपीएफ के काफिले से टकरा जाती है। उस पर तुर्रा यह कि आतंकवादी फायरिंग भी कर देते हैं।...पुलवामा की उस बर्फीली सड़क पर क्या उस वक्त पुलिस की एक भी चौकी, एक भी आर्मी की पोजिशन ने आरडीएक्स से भरी गाड़ी को नहीं देखा। आखिर किन-किन को मालूम था कि सीआरपीएफ का एक बड़ा काफिला उस बर्फीली सड़क से गुजरने वाला है। 

...तीन दिन से वह सड़क बंद थी। ...इतनी सुरक्षा, इतनी पिछली सर्जिकल स्ट्राइक, एक के बदले 10 सिर लाने का जज्बा और फिर भी इतना बड़ा हमला...

बहरहाल, मेरी नींद गायब है...एंकरों की ललकार ने मेरी नींद उड़ा दी है। आईटी सेल के ट्विटर कर्मचारियों के ट्वीट ने मेरी धमनियों के खून को जमा दिया है। सुबह तक क्या पाकिस्तान पर अटैक हो जाएगा। टीवी एंकर और आईटी सेल के कर्मचारी तो यही चाहते हैं। ...हर टीवी एंकर पाकिस्तान को, इस्लामिक आतंकवाद को और उसकी आड़ में एएमयू को-जेएनयू को सबक सिखाना चाहता है। एक टीवी एंकर का ट्वीट पढ़ रहा हूं- हम जोशीली आवाज में इसलिए बोलते हैं ताकि हमारे दर्शक गर्व का अनुभव कर सकें। हम देश के साथ खड़े हैं। यही मौका है पाकिस्तान को सबक सिखाने का....

एक मोहतरमा टीवी एंकर कैसे पीछे रहतीं, उन्होंने फरमाया - कश्मीर में देखते ही गोली मारने का आदेश जारी होना चाहिए...यानी कोई भी कश्मीरी दिखे, उसे भून दो। ...ये लोग ऐसे नहीं मानेंगे।...सिर में दर्द होने लगता है। ...फिर से 42 जवानों के नामों की सूची पर नजर डालने लगता हूं।...

नामों की सूची पढ़ते-पढ़ते नजर गई... कि मरने वाले ज्यादातर सीआरपीएफ जवान कॉन्स्टेबल, हेड कॉन्स्टेबल, कुक, ड्राइवर, माली, लॉन्ड्रीमैन, खलासी आदि पदों पर थे। किसी अफसर की शहादत उस सूची में शामिल नहीं है। निसार अहमद भी हेड कॉन्स्टेबल थे।...अफसर भी मरते हैं, लेकिन उनकी शहादत जवानों के मुकाबले कम है लेकिन शौर्य चक्र या वीर चक्र या कोई भी मेडल सबसे ज्यादा अफसर ले जाते हैं। कोई सरकार जब फौजियों को पेट्रोल पंप देने को सोचती है तो अफसर रैंक वालों को पेट्रोल पंप ज्यादा मिलते हैं। पता नहीं ऐसा क्यों होता होगा।...बस इस लिस्ट को देखते हुए यह ख्याल आया।

भारत-पाकिस्तान युद्ध टीवी पर शुरू हो गया है। इतिहास टटोलता हूं।... पहला विश्वयुद्द जो भारत को आजादी मिलने से बहुत पहले 1914 से लेकर 1918 तक लड़ा गया। रूस, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन इस युद्ध के नायक थे। दूसरा विश्वयुद्ध जो 1939 से लेकर 1945 तक लड़ा गया, जिसके नायक जर्मनी, जापान, अमेरिका समेत 70 देश थे।

वे सारे के सारे देश दो बड़े विश्व युद्द में तबाह-बर्बाद होने के बावजूद जाने कहां से कहां पहुंच गए। यूरोप एक हो गया, जर्मनी एक हो गया। अमेरिका महाशक्ति बन गया। जापान ने तरक्की का हर रास्ता तय कर लिया। भारत-पाकिस्तान ने भी तीन युद्द लड़े। हम वहीं आज भी खड़े हैं। एक और युद्ध लड़ने को तैयार।...दोनों के पास परमाणु बम है। लेकिन दोनों एक दूसरे को गरीब समझते हैं।

...यह सच भी है कि दोनों तरफ के हर गरीब हिंदू-मुसलमान के पेट की रोटी छीनकर दोनों देशों ने युद्ध लड़े हैं। हर युद्ध ने दोनों तरफ के गरीबों को और गरीब किया है। युद्ध एक धंधा बन गया है। अमेरिका-रूस इस धंधे के बड़े साहूकार हैं। भारत-पाकिस्तान के युद्ध उन धंधेबाजों की छोटी सी रणनीति का सौवां हिस्सा होंगे।

कुछ महारथियों ने आज रात को ही ट्विटर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप को टैग करते हुए भारत की ओर से पाकिस्तान से लड़ने के लिए मदद मांग ली है।...कुछ ने फरमाया है कि चीन के रहते हुए भारत पड़ोसी पाकिस्तान का कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। सिर्फ अमरीका ही हमारा सच्चा मददगार है। ये वे लोग हैं जिन्होंने ट्रंप के जीतने पर जंतर मंतर पर हथियारों के साथ ट्रंप के फोटो की आरती उतारी थी। इन्हें शायद पता नहीं युद्ध क्या होता है और कैसे लड़ा जाता है। नागपुर औऱ इनकी भाषा में ज्यादा अंतर नहीं है। 

अब नींद का झोंका आने लगा है, लेकिन आंखों में पुलवामा की बर्फीली सड़क का मंजर रह-रह कर लौट आता है। ...एक छद्म युद्ध लड़ते-लड़ते हमने मौत को कितना क्रूर और भयावह बना दिया है। ... हमारी प्राथमिकता उन्माद है, शांति नहीं। अगले चुनाव में हमें उन्माद की खेती करनी है, राष्ट्रवाद की फसल काटनी है। ...मुर्दा कौमें ऐसे छद्म युद्दों में मोहरा ही बनती हैं। ...




Saturday, January 5, 2019

अलीबाबा के जैक मा की बातें और अपना देश भारत...

यहां मैं आप लोगों के लिए एक विडियो पोस्ट कर रहा हूं जो पूरा देखने के बाद आपको सोचने को मजबूर कर देगा। हालांकि उसमें कही बातों को मैं अपनी बात के साथ आप लोगों के पढ़ने के लिए यहां दे रहा हूं। लेकिन हो सकता है कि अनुवाद में कुछ कमियां हों, इसलिए अगर आप पूरा विडियो देखेंगे तो ज्यादा बेहतर होगा।

दुनिया की बड़ी कंपनियों में गिनी जाने वाली अलीबाबा (Alibaba) के मालिक जैक मा (Jack Ma) को हाल ही में हॉगकॉग यूनिवर्सिटी ने पीएचडी से नवाजा है। इस मौके पर जैक मा ने जो बातें कहीं हैं, उसका संबंध भारत से या किसी भी देश से जुड़ता है।...
जैक मा कहते हैं...
तमाम नाकामियों की वजह से मैं यही सोचता था कि कभी मुझे पीएचडी की डिग्री किसी यूनिवर्सिटी से मिलेगी। यह मेरा सपना था। लेकिन मैं हिम्मत नहीं हारा। एक दिन ऐसा भी आता है जब कोई यूनिवर्सिटी आपको पीएचडी की डिग्री देने को बेताब होती है...
एक अच्छा बिजनेसमैन सिर्फ पैसा कमाना ही नहीं जानता, बल्कि उस पैसे को अच्छी तरह खर्च करना भी जानता है। लेकिन हम सिर्फ पैसा कमाने के लिए जिंदा नहीं रहते।...अगर आपके पास 10 लाख डॉलर हैं, वो आपका पैसा है...जब आपके पास 10 लाख डॉलर होते हैं, दरअसल, तब समस्या खड़ी होती है।...लेकिन जब आपके पास 100 लाख डॉलर होते हैं तो आपको मान लेना चाहिए कि वो आपका पैसा नहीं है।...यह पैसा उस सोसायटी का विश्वास होता है जो पैसे के रूप में आपके पास पहुंचा है। सोसायटी या लोग आपको पैसा इसलिए देते हैं कि उन्हें यकीन है कि वो पैसा आप ठीक से खर्च करेंगे।...असली बिजनेसमैन वही है जो उस पैसे का इस्तेमाल दूसरों की सामाजिक समस्याओं को खत्म करने के लिए करता है। यानी वह ऐसे काम करता है, जिसका फायदा सोसायटी को मिलता है।

(फिर वह विषय बदलते हैं) वह कहते हैं...
मुझे लगता है कि तमाम बड़ी चुनौतियों के बीच सबसे बड़ी चुनौती शिक्षा के क्षेत्र में है। तमाम बड़ी बड़ी यूनिवर्सटियां इसका सामना कर रही हैं।...हमने अपने बच्चों को पिछले 200 सालों में यही पढ़ाया है कि मशीनें बहुत अच्छा करेंगी। यानी बड़ी बड़ी मशीनों के अविष्कार हमने अपनी जरूरतों के लिए किया।...लेकिन अब हमें सोचना होगा कि हम अपने बच्चों को भविष्य के लिए तैयार करने के लिए उन्हें ऐसा क्या पढ़ाएं...मुझे लगता है कि हमें अपने बच्चों को पढ़ाना चाहिए कि वो मशीनों पर कैसे जीत हासिल करें...ना कि मशीनें उन पर हावी हो जाएं या जीत हासिल कर लें।...क्योंकि मशीनों में तो चिप लगी होती है लेकिन इंसान के पास तो दिल है।...
इसलिए हमें अब एजुकेशन सिस्टम को बदलना होगा। भविष्य जानकारी (Knowledge) रखने की प्रतियोगिता का नहीं है। ...भविष्य कुछ सृजन (Creativity) करने और कल्पनाशीलता (Imagination) का है। ...भविष्य की प्रतियोगिता कुछ सीखने और स्वतंत्र सोचने की है।...लेकिन अगर आप एक मशीन की तरह सोचेंगे तो समस्या पैदा होगी।...पिछले 20 वर्षों में हमने इंसान को मशीन बना दिया है।..इसलिए भविष्य जानकारी (Knowledge Driven) रखने वालों का नहीं बल्कि बुद्धिमत्ता पूर्ण (Wisdom Driven) लोगों का होगा... यह अनुभवी लोगों का होगा... जबकि अतीत में यह जानकारी रखने वालों और निर्माण करने (Manufacturing Driven) वालों का था।...भविष्य सृजन करने (Creativity Driven) वालों का है। ...दुनिया इसी पर खुद को केंद्रित करने वाली है।

मेरी बात...
जैक मा ने जितनी बातें कहीं हैं, उन पर हम भारतीय संदर्भों में लंबी चौड़ी बातें कर सकते हैं।...लेकिन संक्षेप में कुछ बातें तो की ही जानी चाहिए।...आप लोग जैक मा की शुरू में कही गई बातों पर गौर करिए - वह कहते हैं कि जो अथाह पैसा आपके पास आया है, वह आपको सोसायटी ने दिया है। सोसायटी आपको इस पैसे को सही से खर्च करने के यकीन के साथ देती है...
मैं आपको यहां पर मुकेश अंबानी की बेटी की शादी में खर्च किए 110 करोड़ रुपये (Bloomberg के मुताबिक) का उदाहरण देना चाहूंगा।...मुकेश अंबानी की कंपनियों ने जो भी पैसे कमाए...वह सारे पैसे भारतीय लोगों से यानी हम लोगों से कमाए गए पैसे हैं। हम लोगों ने वो पैसा उन्हें चाहे जियो (Jio) के फोन और सिम खरीद कर दिया हो या विमल शूटिंग (Reliance Industries) के कपड़े खरीद कर दिया हो या उनके पेट्रोल पंप से पेट्रोल खरीद कर दिया हो या उनकी कंपनियों के शेयर खरीद कर दिया हो...लेकिन अंबानी के पास पैसा भारत के लोगों का है।...उस शख्स ने हमारे दिए गए पैसे में से 110 करोड़ रुपये अपनी बेटी की शादी पर खर्च कर दिए।...जैक मा यही कहते हैं कि आप देश के लोगों से अथाह पैसा लेने के बाद आप उस सोसायटी या देश के लिए जवाबदेह हो जाते हैं।...देश के लोगों ने आप पर यकीन किया है। आप उस पैसे को समाज पर खर्च कीजिए...उस यकीन को मत तोड़िए।...लेकिन मुकेश अंबानी की कंपनियों ने जनता को निचोड़ने के बाद जो पैसा अपने मालिक को दिया...उस पैसे में से वह एक शादी में 110 करोड़ उड़ा देता है...वह उस पैसे से एक देश की सरकार को चलाता है। उसके पैसे से राजनीतिक दल पाले-पोसे जाते हैं।...
सोसायटी का यकीन पैसे के रूप में अंबानी को मिला...अंबानी खानदान ने उस पैसे से पूरी सत्ता खरीद ली...अब वो किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है।

एक शादी विप्रो (Wipro) कंपनी के मालिक अजीम प्रेमजी ने भी की। अपने बेटे की शादी में उन्होंने कार्ड पर साफ लिखा था कि आपको दूल्हा-दूल्हन को कोई गिफ्ट वगैरह देने की जरूरत नहीं है। आप जो कुछ देना चाहते हैं वह इस एनजीओ को दें, वह देश में लड़कियों का 250 स्कूल खोलने जा रही है। सारा पैसा उसी में लगाया जाना है। करीब 250 करोड़ रुपये उस एनजीओ को मिले। ...यह सारा रेकॉर्ड भारत सरकार के पास है, और वह हैरानी से अजीम प्रेम जी द्वारा की गई कोशिश का अध्ययन कर रही है कि क्या ऐसा भी हो सकता है। जैक मा जो कहना चाहते हैं उस मानक पर अजीम प्रेमजी पूरी तरह खरे उतरे और मुकेश अंबानी....। दोनों ही सफल बिजनेसमैन हैं। लेकिन दोनों की सोसायटी के प्रति जवाबदेही देखने लायक है...

जैक मा की अब अगली बात पर आते हैं। जिसमें उन्होंने नॉलेज और क्रिएटिविटी की तुलना की है और कहा है कि भविष्य क्रिएटिविटी का है। मसलन, यह एक क्रिएटिविटी है, जिसके तहत मैं आपको यह लेख पढ़ा रहा हूं। मैंने जैक मा के संदर्भ में यह लेख लिखा और आपको पढ़ाने की कोशिश कर रहा हूं। यह क्रिएटिविटी मैं सोसायटी के लिए कर रहा हूं ताकि इससे समाज में सकारात्मक या अच्छे विचारों का आदान-प्रदान हो। लेकिन जैक मा ने जो सबसे बड़ी बात इसमें कही वो यह कि पिछले 20 साल में हम लोगों ने इंसान को मशीन बना दिया है। ...जैक मा कहना चाहते हैं कि जबसे इंसान मशीन बना है, उसकी क्रिएटिविटी खत्म होती जा रही है। आइंस्टीन ने अपना फॉर्म्युला बम बनाने के लिए नहीं दिया था...उसे हिरोशिमा नागासकी पर गिराकर कई इंसानी नस्लें खत्म करने के लिए नहीं दिया था...ऐसे तमाम अविष्कार या फॉर्म्युले हैं जिन्होंने इंसानों को मशीनों का गुलाम बना दिया है।...उन्होंने एक बात अनुभव के संदर्भ में भी कही है कि भविष्य अनुभवी लोगों का भी होगा।...लेकिन आज हम लोग क्या देख रहे हैं कि नॉलेज की कीमत तो है लेकिन अनुभव की कीमत खत्म कर दी गई है। अनुभव पर नॉलेज को तरजीह दी जा रही है लेकिन एक अनुभवी आदमी ही नॉलेज का सही इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन अनुभवहीन की नॉलेज खतरनाक रूप ले लेती है। अनुभवहीनता की वजह से नॉलेज होते हुए भी तमाम बड़ी गलतियां सामने आती हैं। 
बहरहाल, जैक मा से आप सहमत हों या न हों...लेकिन उनकी इन बातों पर नाराज तो नहीं होंगे ना। 

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