Monday, July 15, 2019

राष्ट्रवाद जब लानत बन जाए

इंग्लैंड और न्यूज़ीलैंड के बीच कल खेले गए वर्ल्ड कप फ़ाइनल से भारत के लोग बहुत कुछ सीख सकते हैं। ...

क्या आपको दोनों देशों के क्रिकेट प्रेमियों की कोई उन्मादी तस्वीर दिखाई दी कि कोई जीत के लिए हवन करा रहा हो या मस्जिद में दुआ कर रहा है? क्या इंग्लैंड की जीत के बाद न्यूज़ीलैंड में किसी ने टीवी सेट तोड़ा, किसी ने खिलाड़ियों के फोटो जलाए?


इंग्लैंड के किसी शहर में वर्ल्ड की जीत के बाद किसी ने पटाखे छोड़े जाते हुए कोई तस्वीर देखी? न्यूज़ीलैंड में किसी ने क्रिकेट खिलाड़ियों की फोटो पर जूते मारते देखा? दोनों टीमों ने बेहतरीन खेल का मुज़ाहिरा किया- बस इतनी प्रतिक्रिया जताकर लोग रह गए।

दरअसल, एशिया के सिर्फ दो देशों भारत और पाकिस्तान की मीडिया और वहाँ के राजनीतिक दलों ने क्रिकेट को राष्ट्रवाद से जोड़ दिया है। दोनों देशों की जाहिल जनता धर्म की अफ़ीम चाट चाट कर उन्माद की हद तक क्रिकेट से प्यार करने लगी है। देश में मैरी कॉम, पीटा उषा या हिमा दास का वह रूतबा नहीं है जो विराट कोहली या धोनी का है। इन तीनों महिला खिलाड़ियों की हैसियत पैसे के हिसाब से क्रिकेट के किसी मामूली खिलाड़ी से करिए। क्रिकेट वाला भारी पड़ेगा। 

दोनों ही देशों के लोग सट्टेबाज़ों द्वारा, अंडरवर्ल्ड डॉन द्वारा, नेताओं द्वारा इस खेल में लगाए जा रहे पैसे से पैसा कमाने की हक़ीक़त नहीं समझ पा रहे हैं।...क्योंकि धार्मिक और राष्ट्रीय उन्माद उन्हें कुछ और सोचने और समझने नहीं दे रहा है।

देश क्रिकेट के नाम पर एकजुट नज़र आता है...लेकिन बॉम्बे के पास बुलेट ट्रेन के लिए हज़ारों पेड़ काटे जा रहे हैं, उसे रोकने के नाम पर एकजुट नज़र नहीं आ रहा है। ...देश दसवीं क्लास तक सभी बच्चों को प्राइवेट या सरकारी स्कूलों में मुफ़्त शिक्षा की माँग के लिए कभी एकजुट होता नज़र नहीं आता...देश सभी पाँच सितारा अस्पतालों का अधिग्रहण कर उन्हें जनता के मुफ़्त इलाज के लिए खोल देने के नाम पर एकजुट होता नज़र नही आता...दिल्ली-हरियाणा-राजस्थान के अरावली पहाड़ में एक ठग योग गुरू द्वारा ज़मीन हथियाए जाने के खिलाफ एकजुट होता नज़र नहीं आता...

जब क्रिकेट नहीं हो रहा होता है तब हम दंगों में, मॉब लिंचिंग में, मामूली झगड़ों में अपने अपने धर्म और जाति के साथ एकजुट नज़र आते हैं।....

राष्ट्रवाद एक लानत बनता जा रहा है। ...एक धब्बा...



Tuesday, June 25, 2019

मुस्तजाब की कविता ः सब कुछ धुंधला नजर आ रहा है

मुस्तजाब की कविताएं हिंदीवाणी पर आप लोग पहले भी पढ़ चुके हैं...पेश है उनकी नवीनतम कविता





सब धुंधला नजर आ रहा है
..........................................


सब धुंधला नजर आ रहा है
सच, झूठ, तारीख, तथ्य
किसे मानें, रह गया है क्या सत्य

सलाखें बन गए हैं मस्तिष्क हमारे
अंदर ही घुट घुट कर सड़ रहे हैं लोग बेचारे

एक कतार में हम सब अटक गए हैं
समझ रहे हैं राह है सही, मगर भटक गए हैं

जो कहता है अंध बहुमत उसे मान लेते हैं
चाहे झूठ हो, संग चलने की ठान लेते हैं

क्या हुआ जो लोग मर रहे हैं
आजादी के पीर सलाखों में सड़ रहे हैं

कहने पर रोक है,
अंधा हो गया कोर्ट है

डरपोक सब ठंडी हवा में बैठे हैं
कातिल संसद में टिका बैठे हैं
सच्चे तो खैर आजादी ही गवां बैठे हैं

मगर हमें क्या हम तो धुंधलेपन के मुरीद हैं
धरम तक ही रह गई साली सारी भीड़ है

और इसी धुंधलेपन का फायदा मसनदखोर उठा रहा है
हम अंधे हो रहे हैं वो हमारा देश जला रहा है

-मुस्तजाब



मुस्तजाब की कुछ कविताओं के लिंक -

http://www.hindivani.in/2017/12/blog-post.html

http://www.hindivani.in/2019/02/blog-post_16.html

Tuesday, May 28, 2019

सावरकर की अंदरूनी कहानियां

सावरकर पर बेहतरीन लेख...ज़रूर पढ़ें...           


अक्तूबर, 1906 में लंदन में एक ठंडी शाम चितपावन ब्राह्मण विनायक दामोदर सावरकर इंडिया हाउज़ के अपने कमरे में झींगे यानी 'प्रॉन' तल रहे थे.

सावरकर ने उस दिन एक गुजराती वैश्य को अपने यहाँ खाने पर बुला रखा था जो दक्षिण अफ़्रीका में रह रहे भारतीयों के साथ हो रहे अन्याय के प्रति दुनिया का ध्यान आकृष्ट कराने लंदन आए हुए थे.

उनका नाम था मोहनदास करमचंद गांधी. गाँधी सावरकर से कह रहे थे कि अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ उनकी रणनीति ज़रूरत से ज़्यादा आक्रामक है. सावरकर ने उन्हें बीच में टोकते हुए कहा था, "चलिए पहले खाना खाइए."

बहुचर्चित किताब 'द आरएसएस-आइकॉन्स ऑफ़ द इंडियन राइट' लिखने वाले नीलांजन मुखोपाध्याय बताते हैं, "उस समय गांधी महात्मा नहीं थे. सिर्फ़ मोहनदास करमचंद गाँधी थे. तब तक भारत उनकी कर्म भूमि भी नहीं बनी थी."

"जब सावरकर ने गांधी को खाने की दावत दी तो गांधी ने ये कहते हुए माफ़ी माँग ली कि वो न तो गोश्त खाते हैं और न मछली. बल्कि सावरकर ने उनका मज़ाक भी उड़ाया कि कोई कैसे बिना गोश्त खाए अंग्रेज़ो की ताक़त को चुनौती दे सकता है? उस रात गाँधी सावरकर के कमरे से अपने सत्याग्रह आंदोलन के लिए उनका समर्थन लिए बिना ख़ाली पेट बाहर निकले थे."

साल 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के छठवें दिन विनायक दामोदर सावरकर को गाँधी की हत्या के षड्यंत्र में शामिल होने के लिए मुंबई से गिरफ़्तार कर लिया गया था. हाँलाकि उन्हें फ़रवरी 1949 में बरी कर दिया गया था.

आरएसएस का न होते हुए भी संघ परिवार में इज़्ज़त
इसे एक विडंबना ही कहा जाएगा कि कभी भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनसंघ के सदस्य न रहे वीर सावरकर का नाम संघ परिवार में बहुत इज़्ज़त और सम्मान के साथ लिया जाता है.

वर्ष 2000 में वाजपेयी सरकार ने तत्कालीन राष्ट्पति केआर नारायणन के पास सावरकर को भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' देने का प्रस्ताव भेजा था, लेकिन उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया था.

नीलांजन मुखोपाध्याय बताते हैं, "26 मई, 2014 को नरेंद्र मोदी शपथ लेते हैं. उसके दो दिन बाद ही वीर सावरकर की 131वीं जन्म तिथि पड़ती है. वो संसद भवन जा कर सावरकर के चित्र के सामने सिर झुका कर उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं. हमें मानना पड़ेगा कि सावरकर बहुत ही विवादास्पद शख़्सियत थे."

"हम नहीं भूल सकते कि गाँधी हत्याकांड में उनके ख़िलाफ़ केस चला था. वो छूट ज़रूर गए थे, लेकिन उनके जीवन काल में ही उसकी जाँच के लिए कपूर आयोग बैठा था और उसकी रिपोर्ट में शक की सुई सावरकर से हटी नहीं थी. उस नेता को सार्वजनिक रूप से इतना सम्मान देना मोदी की तरफ़ से एक बहुत बड़ा प्रतीकात्मक कदम था."

नासिक के कलेक्टर की हत्या के सिलसिले में गिरफ़्तारी

अपने राजनीतिक विचारों के लिए सावरकर को पुणे के फरग्यूसन कालेज से निष्कासित कर दिया गया था. साल 1910 में उन्हें नासिक के कलेक्टर की हत्या में संलिप्त होने के आरोप में लंदन में गिरफ़्तार कर लिया गया था.

सावरकर पर ख़ासा शोध करने वाले निरंजन तकले बताते हैं, "1910 में नासिक के जिला कलेक्टर जैकसन की हत्या के आरोप में पहले सावरकर के भाई को गिरफ़्तार किया गया था."

"सावरकर पर आरोप था कि उन्होंने लंदन से अपने भाई को एक पिस्टल भेजी थी, जिसका हत्या में इस्तेमाल किया गया था. 'एसएस मौर्य' नाम के पानी के जहाज़ से उन्हें भारत लाया जा रहा था. जब वो जहाज़ फ़ाँस के मार्से बंदरगाह पर 'एंकर' हुआ तो सावरकर जहाज़ के शौचालय के 'पोर्ट होल' से बीच समुद्र में कूद गए."

आगे की कहानी उनकी जीवनी 'ब्रेवहार्ट सावरकर' लिखने वाले आशुतोष देशमुख बताते हैं, "सावरकर ने जानबूझ कर अपना नाइट गाउन पहन रखा था. शौचालय में शीशे लगे हुए थे ताकि अंदर गए क़ैदी पर नज़र रखी जा सके. सावरकर ने अपना गाउन उतार कर उससे शीशे को ढ़क दिया."

"उन्होंने पहले से ही शौचालय के 'पोर्ट होल' को नाँप लिया था और उन्हें अंदाज़ा था कि वो उसके ज़रिए बाहर निकल सकते हैं. उन्होंने अपने दुबले-पतले शरीर को पोर्ट-होल से नीचे उतारा और बीच समुद्र में कूद गए."

"उनकी नासिक की तैरने की ट्रेनिंग काम आई और वो तट की तरफ़ तैरते हुए बढ़ने लगे. सुरक्षाकर्मियों ने उन पर गोलियाँ चलाईं, लेकिन वो बच निकले."


सुरक्षाकर्मियों की गिरफ़्त में
देशमुख आगे लिखते हैं, "तैरने के दौरान सावरकर को चोट लगी और उससे ख़ून बहने लगा. सुरक्षाकर्मी भी समुद्र में कूद गए और तैर कर उनका पीछा करने लगे."

"सावरकर करीब 15 मिनट तैर कर तट पर पहुंच गए. तट रपटीला था. पहली बार तो वो फिसले लेकिन दूसरे प्रयास में वो ज़मीन पर पहुंच गए. वो तेज़ी से दौड़ने लगे और एक मिनट में उन्होंने करीब 450 मीटर का फ़ासला तय किया."

"उनके दोनों तरफ़ ट्रामें और कारें दौड़ रही थीं. सावरकर क़रीब क़रीब नंगे थे. तभी उन्हें एक पुलिसवाला दिखाई दिया. वो उसके पास जा कर अंग्रेज़ी में बोले, 'मुझे राजनीतिक शरण के लिए मैजिस्ट्रेट के पास ले चलो.' तभी उनके पीछे दौड़ रहे सुरक्षाकर्मी चिल्लाए, 'चोर! चोर! पकड़ो उसे.' सावरकर ने बहुत प्रतिरोध किया, लेकिन कई लोगों ने मिल कर उन्हें पकड़ ही लिया."

अंडमान की सेल्युलर जेल की कोठरी नंबर 52 में

इस तरह सावरकर की कुछ मिनटों की आज़ादी ख़त्म हो गई और अगले 25 सालों तक वो किसी न किसी रूप में अंग्रेज़ों के क़ैदी रहे.

उन्हें 25-25 साल की दो अलग-अलग सजाएं सुनाई गईं और सज़ा काटने के लिए भारत से दूर अंडमान यानी 'काला पानी' भेज दिया गया.

उन्हें 698 कमरों की सेल्युलर जेल में 13.5 गुणा 7.5 फ़ीट की कोठरी नंबर 52 में रखा गया.

वहाँ के जेल जीवन का ज़िक्र करते हुए आशुतोष देशमुख, वीर सावरकर की जीवनी में लिखते हैं, "अंडमान में सरकारी अफ़सर बग्घी में चलते थे और राजनीतिक कैदी इन बग्घियों को खींचा करते थे."

"वहाँ ढंग की सड़कें नहीं होती थीं और इलाक़ा भी पहाड़ी होता था. जब क़ैदी बग्घियों को नहीं खींच पाते थे तो उनको गालियाँ दी जाती थीं और उनकी पिटाई होती थी. परेशान करने वाले कैदियों को कई दिनों तक पनियल सूप दिया जाता था."

"उनके अलावा उन्हें कुनैन पीने के लिए भी मजबूर किया जाता था. इससे उन्हें चक्कर आते थे. कुछ लोग उल्टियाँ कर देते थे और कुछ को बहुत दर्द रहता था."

अंग्रेज़ों को माफ़ीनामा
लेकिन यहाँ से सावरकर की दूसरी ज़िदगी शुरू होती है. सेल्युलर जेल में उनके काटे 9 साल 10 महीनों ने अंग्रेज़ों के प्रति सावरकर के विरोध को बढ़ाने के बजाय समाप्त कर दिया.

निरंजन तकले बताते हैं, "मैं सावरकर की ज़िंदगी को कई भागों में देखता हूँ. उनकी ज़िदगी का पहला हिस्सा रोमांटिक क्रांतिकारी का था, जिसमें उन्होंने 1857 की लड़ाई पर किताब लिखी थी. इसमें उन्होंने बहुत अच्छे शब्दों में धर्मनिरपेक्षता की वकालत की थी."

"गिरफ़्तार होने के बाद असलियत से उनका सामना हुआ. 11 जुलाई 1911 को सावरकर अंडमान पहुंचे और 29 अगस्त को उन्होंने अपना पहला माफ़ीनामा लिखा, वहाँ पहुंचने के डेढ़ महीने के अंदर. इसके बाद 9 सालों में उन्होंने 6 बार अंग्रेज़ों को माफ़ी पत्र दिए."

"जेल के रिकॉर्ड बताते हैं कि वहाँ हर महीने तीन या चार कैदियों को फाँसी दी जाती थी. फाँसी देने का स्थान उनके कमरे के बिल्कुल नीचे था. हो सकता है इसका सावरकर पर असर पड़ा हो. कुछ हलकों में कहा गया कि जेलर बैरी ने सावरकर को कई रियायतें दीं."

"एक और कैदी बरिंद्र घोष ने बाद में लिखा कि सावरकर बंधु हम लोगों को जेलर के ख़िलाफ़ आंदोलन करने के लिए गुपचुप तौर से भड़काते थे. लेकिन जब हम उनसे कहते कि खुल कर हमारे साथ आइए, तो वो पीछे हो जाते थे. उनको कोई भी मुश्किल काम करने के लिए नहीं दिया गया था."

"सावरकर ने ये भी कहा था कि अंग्रेज़ों द्वारा उठाए गए गए कदमों से उनकी संवैधानिक व्यवस्था में आस्था पैदा हुई है और उन्होंने अब हिंसा का रास्ता छोड़ दिया है. शायद इसी का परिणाम था कि काला पानी की सज़ा काटते हुए सावरकर को 30 और 31 मई, 1919 को अपनी पत्नी और छोटे भाई से मिलने की इजाज़त दी गई थी."

जेल से बाहर रहने के लिए बनाई थी ये रणनीति
बाद में सावरकर ने खुद और उनके समर्थकों ने अंग्रेज़ों से माफ़ी माँगने को इस आधार पर सही ठहराया था कि ये उनकी रणनीति का हिस्सा था, जिसकी वजह से उन्हें कुछ रियायतें मिल सकती थीं.

सावरकर ने अपनी आत्मकथा में लिखा था, "अगर मैंने जेल में हड़ताल की होती तो मुझसे भारत पत्र भेजने का अधिकार छीन लिया जाता."

मैंने वरिष्ठ पत्रकार और इंदिरा गांधी सेंटर ऑफ़ आर्ट्स के प्रमुख राम बहादुर राय से पूछा कि आख़िर भगत सिंह के पास भी माफ़ी माँगने का विकल्प था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. तब सावरकर के पास ऐसा करने की क्या मजबूरी थी?

राम बहादुर राय का जवाब था, "भगत सिंह और सावरकर में बहुत मौलिक अंतर है. भगत सिंह ने जब बम फेंकने का फ़ैसला किया, उसी दिन उन्होंने तय कर लिया था कि उन्हें फाँसी का फंदा चाहिए. दूसरी तरफ़ वीर सावरकर एक चतुर क्रांतिकारी थे."

"उनकी कोशिश रहती थी कि भूमिगत रह करके उन्हें काम करने का जितना मौका मिले, उतना अच्छा है. मेरा मानना ये है कि सावरकर इस पचड़े में नहीं पड़े की उनके माफ़ी मांगने पर लोग क्या कहेंगे. उनकी सोच ये थी कि अगर वो जेल के बाहर रहेंगे तो वो जो करना चाहेंगे, वो कर सकेंगे."

सावरकर की हिंदुत्व की अवधारणा
अंडमान से वापस आने के बाद सावरकर ने एक पुस्तक लिखी 'हिंदुत्व - हू इज़ हिंदू?' जिसमें उन्होंने पहली बार हिंदुत्व को एक राजनीतिक विचारधारा के तौर पर इस्तेमाल किया.

निलंजन मुखोपाध्याय बताते हैं, "हिंदुत्व को वो एक राजनीतिक घोषणापत्र के तौर पर इस्तेमाल करते थे. हिंदुत्व की परिभाषा देते हुए वो कहते हैं कि इस देश का इंसान मूलत: हिंदू है. इस देश का नागरिक वही हो सकता है जिसकी पितृ भूमि, मातृ भूमि और पुण्य भूमि यही हो."

"पितृ और मातृ भूमि तो किसी की हो सकती है, लेकिन पुण्य भूमि तो सिर्फ़ हिंदुओं, सिखों, बौद्ध और जैनियों की हो हो सकती है, मुसलमानों और ईसाइयों की तो ये पुण्यभूमि नहीं है. इस परिभाषा के अनुसार मुसलमान और ईसाई तो इस देश के नागरिक कभी हो ही नहीं सकते."

"एक सूरत में वो हो सकते हैं अगर वो हिंदू बन जाएं. वो इस विरोधाभास को कभी नही समझा पाए कि आप हिंदू रहते हुए भी अपने विश्वास या धर्म को मानते रहें."

अंग्रेज़ों के साथ समझौता
साल 1924 में सावरकर को पुणे की यरवदा जेल से दो शर्तों के आधार पर छोड़ा गया.

एक तो वो किसी राजनैतिक गतिविधि में हिस्सा नहीं लेंगे और दूसरे वो रत्नागिरि के ज़िला कलेक्टर की अनुमति लिए बिना ज़िले से बाहर नहीं जाएंगे.

निरंजन तकले बताते हैं, "सावरकर ने वायसराय लिनलिथगो के साथ लिखित समझौता किया था कि उन दोनों का समान उद्देश्य है गाँधी, कांग्रेस और मुसलमानों का विरोध करना है."

"अंग्रेज़ उनको पेंशन दिया करते थे, साठ रुपए महीना. वो अंग्रेज़ों की कौन सी ऐसी सेवा करते थे, जिसके लिए उनको पेंशन मिलती थी ? वो इस तरह की पेंशन पाने वाले अकेले शख़्स थे."

काली टोपी और इत्र की बोतल
अतिवादी विचारों के बावजूद निजी ज़िदगी में वो अच्छी चीज़ों के शौकीन थे. वो चॉकलेट्स और 'जिन्टान' ब्रैंड की विहस्की पसंद करते थे.

उनके जीवनीकार आशुतोष देशमुख लिखते हैं, "सावरकर 5 फ़ीट 2 इंच लंबे थे. अंडमान की जेल में रहने के बाद वो गंजे हो गए थे. उन्हें तंबाकू सूँघने की आदत पड़ गई थी. अंडमान की जेल कोठरी में वो तंबाकू की जगह जेल की दीवारों पर लिखा चूना खुरच कर सूँघा करते थे, जिससे उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा."

"लेकिन इससे उनकी नाक खुल जाती थी. उन्होंने सिगरेट और सिगार पीने की भी कोशिश की, लेकिन वो उन्हें रास नहीं आया. वो कभी-कभी शराब भी पीते थे. नाश्ते में वो दो उबले अंडे खाते थे और दिन में कई प्याले चाय पीते थे. उनको मसालेदार खाना पसंद था, ख़ासतौर से मछली."

"वो अलफ़ांसो आम, आइसक्रीम और चॉकलेट के भी बहुत शौकीन थे. वो हमेशा एक जैसी पोशाक पहनते थे... गोल काली टोपी, धोती या पैंट, कोट, कोट की जेब में एक छोटा हथियार, इत्र की एक शीशी, एक हाथ में छाता और दूसरे हाथ में मुड़ा हुआ अख़बार!"

महात्मा गांधी हत्याकांड में गिरफ़्तारी

सावरकर की छवि को उस समय बहुत धक्का लगा जब 1949 में गांधी हत्याकांड में शामिल होने के लिए आठ लोगों के साथ उन्हें भी गिरफ़्तार कर लिया गया.

लेकिन ठोस सबूतों के अभाव में वो बरी हो गए.

नीलांजन मुखोपाध्याय बताते हैं, "पूरे संघ परिवार को बहुत समय लग गया गाँधी हत्याकाँड के दाग़ को हटाने में. सावरकर इस मामले में जेल गए, फिर छूटे और 1966 तक ज़िदा रहे लेकिन उन्हें उसके बाद स्वीकार्यता नहीं मिली."

"यहाँ तक कि आरएसएस ने भी उनसे पल्ला झाड़ लिया. वो हमेशा हाशिए पर ही पड़े रहे, क्यों कि उनसे गांधी हत्या की शक की सुई कभी नहीं हटी ही नहीं. कपूर कमिशन की रिपोर्ट में भी साफ़ कहा गया कि उन्हें इस बात का यकीन नहीं है कि सावरकर की जानकारी के बिना गांधी हत्याकाँड हो सकता था."

सावरकर की राजनीतिक विचारधारा
सावरकर के जीवन के आख़िरी दो दशक राजनीतिक एकाकीपन और अपयश में बीते.

उनके एक और जीवनीकार धनंजय कीर उनकी जीवनी 'सावरकर एंड हिज़ टाइम्स' में लिखते हैं कि लाल किले में चल रहे मुक़दमें में जज ने जैसे ही उन्हें बरी किया और नथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को फाँसी की सज़ा सुनाई, कुछ अभियुक्त सावरकर के पैर पर गिर पड़े और उन्होंने मिल कर नारा लगाया,

हिंदू - हिंदी - हिदुस्तान

कभी न होगा पाकिस्तान

राम बहादुर राय कहते हैं, "दरअसल उन पर आख़िरी दिनों में जो कलंक लगा है, उसने सावरकर की विरासत पर अंधकार का बादल डाल दिया है. दुनिया में शायद ही कोई ऐसा उदाहरण मिले जो क्राँतिकारी कवि भी हो, साहित्यकार भी हो और अच्छा लेखक भी हो."

'पोलराइज़िग फ़िगर'
1966 में अपनी मृत्यु के कई दशकों बाद भी भारतीय राजनीति में वीर सावरकर एक 'पोलराइज़िग फ़िगर' है. या तो वो आपके हीरों हैं या विलेन.

निरंजन तकले कहते हैं, "साल 2014 में संसद के सेंट्रल हॉल में जब नरेंद्र मोदी सावरकर के चित्र को सम्मान देने वहाँ पहुंचे तो उन्होंने अनजाने में अपनी पीठ महात्मा गांधी की तरफ़ कर ली, क्योंकि गाँधीजी का चित्र उनके ठीक सामने लगा था."

"ये आज की राजनीति की वास्तविकता है. अगर आपको सावरकर को सम्मान देना है तो आपको गाँधी की विचारधारा की तरफ़ पूरी तरह से पीठ घुमानी ही पड़ेगी. अगर आपको गांधी को स्वीकारना है तो आपको सावरकर की विचारधारा को नकारना होगा. शायद सही वजह है कि सावरकर अभी भी भारत में एक 'पोलराइज़िंग फ़िगर' हैं."


(साभार बीबीसी- रेहान फैज़ल)

Sunday, May 19, 2019

एग्जिट पोल और Artificial Intelligence managed Media

आज आख़िरी दौर के वोट डाले जा रहे हैं।...शाम को गोदी मीडिया पर एक्ज़िट पोल यानि कौन सरकार बनाएगा की भविष्यवाणी आने लगेगी...ज़ाहिर है कि ये सारे के सारे एक्ज़िट पोल अमित शाह द्वारा मैनेज कराये गए एग्जिट पोल हैं...इसलिए इनको गंभीरता से लेने की ज़रूरत नहीं है। 

अगर आप रोज़ेदार हैं तो आराम से रोज़ा खोलिए। दुआ माँगिए और कुरानशरीफ की तिलावत कीजिए।...कोई भी शैतानी ताक़त आपके ईमान को हराने की ताक़त नहीं रखती। शैतानी ताक़तों ने अपनी पराजय पहले ही स्वीकार कर ली है। 

अगर आप रोज़ेदार नहीं हैं तो आपको भी एग्जिट पोल को दिल पर लेने की ज़रूरत नहीं है। आराम से टीवी के सामने कुछ जूस, नारियल पानी, चाय-पकौड़े वग़ैरह लेकर बैठिए और टीवी एंकरों द्वारा बोली जा रही भाषा पर ध्यान दीजिए। ...और फिर 23 मई को चुनाव नतीजों से इसका मिलान कीजिए। आपको समझ आ जाएगा कि आपसे किस क़दर झूठ बोला गया। 

कुछ बातें आपके काम की और भविष्य के पत्रकारों के लिए
.........................................................................

भारतीय मीडिया अब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (Artificial  Intelligence managed Media =AIM) का शिकार हो चुका है जो पहले से तय लक्ष्यों के लिए तैयार की गई भाषा का इस्तेमाल करता है। इसीलिए इसका नाम ही बनावटी बुद्धिमत्ता नियंत्रित मीडिया है। जहाँ आपके दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया जाता बल्कि किसी और के दिमाग से इस्तेमाल से तैयार कंटेंट को आगे बढ़ाया जाता है। डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम के लिए AIM को तैयार किया गया है। बनावटी संवेदनाएँ यानी इमोशन बनाने, पैदा करने और उसे तय मक़सद के लिए भुनाने की क्षमता भी AIM के पास है। आने वाले समय पर इस पर मेरा लिखना जारी रहेगा।

हाल ही में मोदी के लिए इस्तेमाल सबसे लोकप्रिय शब्द चीफ़ डिवाइडर ऑफ़ इंडिया जैसे शब्द यहाँ अब लिखना मुश्किल होगा। 

मॉस कम्यूनिकेशन यानी पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे मेरे युवा साथी इस शब्द AIM को नोट करके रख लें। उनके लिए काम की चीज़ है और आज पहली बार मैं इसके बारे में लिख रहा हूँ। क्योंकि अब वो जिस मीडिया में नौकरी करेंगे उन्हें इसका सामना करना पड़ेगा। जिस प्रोफ़ेशन में वो घुसने जा रहे हैं उन्हें AIM नियंत्रित कंटेंट को लिखना या बताना होगा। रोज़ाना दफ़्तर में घुसने से पहले अपने संवेदनाओं की हत्या करके उसे पैरों तले मसल कर अंदर क़दम रखिएगा।




Saturday, May 18, 2019

भगवान से भी धंधा...पूजा पाठ की मार्केटिंग का लाइव प्रसारण...

 
तुम्हारे पूजा-पाठ पर सवाल नहीं...तुम्हारी आस्था पर चोट नहीं...

लेकिन यार... क्या तुम्हारी कोई प्राइवेसी नहीं है...ध्यान तो तुम अकेले में ही करोगे, फिर तुम्हें वहां मीडिया की जरूरत किसलिए है...तुम अपना पूजा पाठ देश की जनता को क्यों दिखाना चाहते हो।...सुबह उठकर मंदिर और मस्जिदों में इबादत करने वाले अपनी आस्था का प्रदर्शन यूं तो नहीं करते।

क्या तुमने अमेरिका के राष्ट्रपति...ब्रिटेन की प्रधानमंत्री को लाइव किसी चर्च के मास प्रेयर में देखा है। ...क्या तुमने सऊदी अरब के सुल्तान को कभी मक्का में तवाफ करते लाइव देखा है...क्या तुमने कर्बला में किसी धर्मगुरु के जियारत का लाइव प्रसारण देखा है...
 
हां, तुमने न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री का लाइव प्रसारण जरूर देखा होगा जब वह अपनी आस्था को ताक पर रखकर हिजाब बांधकर न्यूजीलैंड के अल्पसंख्यकों के घावों पर मरहम लगाने पहुंच गई थी।...लेकिन फिर भी तुमने शर्म महसूस नहीं की।

तुमने अपनी धार्मिक आस्था के लाइव प्रसारण को बच्चों का बाइस्कोप बना दिया है।

आखिर तुम वहां किस चीज की मार्केटिंग कर रहे हो...क्या संवैधानिक पद पर बैठा तुम्हारे जैसा शख्स प्रधानमंत्री कैमरे के साथ पूजा पाठ करता है...क्या वो अपनी आस्था का लाइव प्रसारण कराता है...


हमने उस सरदार को कभी किसी गुरुद्वारे या दरबार साहिब में मत्था टेकते हुए लाइव नहीं देखा....वह भी तुम्हारी तरह दरबारी मीडिया ले जा सकता था। उसके पास भी सरकारी मीडिया था, लेकिन क्या कभी किसी ने उसकी आस्था का भोंडा प्रदर्शन देखा....

दरअसल, इस पूजा पाठ में तुम्हारा एक खास रंग का प्रदर्शन बता रहा है कि तुम बहुसंख्यक तुष्टिकरण की नीति पर चल रहे हो।

किसी लोकतांत्रिक देश में बहुसंख्यक तुष्टिकरण भी एक तरह का दबंगपन है।

बहुसंख्यक तुष्टिकरण से देश टूट जाते हैं।बहुसंख्यक तुष्टिकण किसी भी देश में अराजकता को बढ़ाते हैं।

बहुसंख्यक तुष्टिकरण की आड़ में किसानों के सवाल, बेरोजगारी के सवाल, महिला सुरक्षा के सवाल, गरीब बच्चों के कुपोषण के सवाल, असंगठित मजदूरों के सवाल खत्म हो जाते हैं।

दरअसल, तुम्हारी आस्था, तुम्हारा पूजा पाठ भी एक धंधा है। तुम वहां भगवान से बिजनेस डील करने गए हो। तुम बहुसंख्यकों के लिए एक ऐसे राष्ट्र की डील करने गए हो जिसे देश के करोड़ों मेहनतकश लोग नामुमकिन बना देंगे।...




गांधी को गाली दो, गोडसे को देशभक्त बताओ...तुम्हारे पास काम ही क्या है?

पिछले पाँच साल में महात्मा गांधी को गाली देने का चलन आम हो गया है। आरएसएस और उसकी राजनीतिक शाखा भाजपा ने इसे एक मिशन की तरह आगे बढ़ाया है। अपने छुटभैये नेताओं से गाली दिलवाते हैं। फिर उस गाली को उसका निजी विचार बता दिया जाता है। बहुत दबाव महसूस हुआ तो उसको पार्टी से निकालने का बयान जारी कर दिया जाता है या माफ़ी माँग ली जाती है। 



मैं अक्सर कहता रहा हूँ कि जिन राजनीतिक दलों या जिस क़ौम के पास गर्व करने लायक कुछ नहीं होता वो या तो अपने प्रतीक गढ़ते हैं या फिर मिथक का सहारा लेते हैं। कई बार अंधविश्वास तक का सहारा ले लेते हैं। 
गांधी, आंबेडकर, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, आज़ाद या भगत सिंह से आरएसएस और भाजपा सिर्फ इसलिए चिढ़ते हैं क्योंकि ये सारे गढ़े गए प्रतीक नहीं हैं। ये सभी भारतीय जनमानस में बसे हुए प्रतीक हैं। 
बहुसंख्यकवाद के तुष्टिकरण की नीति पर चलने वाले संगठनों के पास गर्व करने लायक कोई प्रतीक नहीं है। इनके प्रतीकों का अतीत अंग्रेज़ों की मुखबिरी करने और उनसे माफ़ी माँगने में बीता है। भारत जब आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था तो इनके गढ़े गए प्रतीक सावरकर, गोडसे वग़ैरह मुखबिर थे या माफ़ीनामा लिख रहे थे। भारतीय इतिहास के निर्णायक मोड़ पर ये लोग गांधी की हत्या करते पाये गए...उससे अगले मोड़ पर ये लोग नफ़रत फैलाते और समाज को बाँटते पाए गए। हेगडेवार की देश की आज़ादी में क्या भूमिका थी? उन लोगों के पास कहने के लिए कुछ नहीं हैं। ग्वालियर जेल में बंद अटल बिहारी वाजपेयी की लिखी इबारत कौन भूल सकता है।

राष्ट्रपिता के सम्मान में आतंकी मुलज़िम प्रज्ञा ठाकुर की नीच हरकत के लिए भाजपा या उसके नेताओं के घड़ियाली आँसू एक बहाना हैं। वो सिर्फ 23 मई तक टाइमपास के लिए माफ़ी माँग रहे हैं। सत्ता में लौटते ही भारतीय गौरव के प्रतीकों को दोगुना तेज़ आवाज़ में गाली देने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। यह सब आप लोगों की आंखों के सामने होगा और आप लोग कुछ नहीं कर पायेंगे। उसका एक सीन तो आज ही सामने आ गया। मोदी ने दिन में माफी मांगी, शाम को भाजपा मुख्यालय में अमित शाह ने जो प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई, उसमें प्रज्ञा का मामला उठने पर अमित शाह ने कहा कि हमने सभी को नोटिस जारी कर दिया है। उनके जवाब के बाद उचित कार्रवाई होगी। इसके बाद अमित शाह ने भगवा आतंकवाद के लिए कांग्रेस को कोसना शुरू किया और प्रज्ञा ठाकुर को विक्टिम (पीड़ित) बताया।

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में अमित शाह ने एक बार भी गांधी जी के बारे में दिए गए प्रज्ञा के बयान की निंदा नहीं की। मोदी ने भी अपने उन वाक्यों को नहीं दोहराया जो उन्होंने दिन में बोला था कि मैं प्रज्ञा ठाकुर को माफ नहीं कर पऊंगा।...इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि दोगलेपन की सीमा कहां तक फैली हुई है। संघ और भाजपा के तमाम नेता और कार्यकर्ताओं के दिलों में गोडसे बसा हुआ है। वह ऊपरी माफीनामे से नहीं खत्म होने वाला।

भाजपा में हिम्मत है तो ऐसे सभी लोगों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाये। प्रज्ञा के बयान की तुलना मणिशंकर अय्यर के बयान से करना दरअसल प्रज्ञा को भी प्रतीक की तरह स्थापित करने की नाकाम कोशिश है। महात्मा गांधी के प्रति संघ और भाजपा का प्रेम एक बड़ा फ्राड है।

गोडसे आतंकवादी ही तो है
..................................
अगर गोडसे को आतंकवादी नहीं कहा जाएगा तो क्या रंगा-बिल्ला को आतंकवादी कहा जाएगा? 
कमल हासन ने गलत क्या है...क्या महात्मा गांधी का हत्यारा गोडसे पहला हिंदू आतंकवादी नहीं था? 
क्या आजाद भारत में यह पहली आतंकी घटना नहीं थी? गोडसे को किस विचारधारा ने खड़ा किया था? 
कमल हासन ने ऐतिहासिक तथ्य ही तो बताएं हैं। इसमें एक खास राजनीतिक दल को क्यों ऐतराज है। 
उसे तब शर्म नहीं आती है जब वह कश्मीर में पूर्व आतंकवादियों से चुनाव में गठजोड़ करती है।

उसे तब भी शर्म नहीं आती जब वह कश्मीर के अलगाववादियों का समर्थन करने वाली पार्टी से मिलकर सरकार बनाती है। कल को उसे मुस्लिम लीग की मदद से मिलकर केंद्र में सरकार बनानी पड़े तो भी वह मुस्लिम लीग का समर्थन लेने से नहीं हिचकेगी।

क्या अंग्रेजों के समय में कायदे-आजम मोहम्मद अली जिन्ना की पार्टी के साथ हिंदू महासभा ने संयुक्त सरकार नहीं बनाई थी। कह दो कि यह झूठ है, फिर क्यों नहीं इतिहास की किताबों से जिन्ना-हिंदू महासभा गठजोड़ के पन्नों को हटा देते?

फासिस्ट आंधियों की गिरफ़्त में भारत
..............................................

हिंदीवाणी,  नई दिल्ली : इंदिरा गांधी ने 1975 से 1977 तक  आपातकाल लगाया था। सारे विरोधी दलों के नेता गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिए। प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी गई। उसके बाद चुनाव हुए तो कांग्रेस बुरी तरह हार गई।...यह बात उस समय के ज़िंदा लोग जानते हैं और अब इतिहास में भी दर्ज है। 

एक बात और है जो उस समय के ज़िंदा लोग और उस समय का इतिहास बताता है कि इमर्जेंसी के दौरान हुए आम चुनाव यानी लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी चाहतीं तो क्या नहीं कर सकती थीं। वह चाहतीं तो चुनाव निष्पक्ष नहीं होते और वह फिर से सत्ता में लौट सकती थीं। पर, उन्होंने कुख्यात होने के बावजूद लोकसभा चुनाव में बेईमानी नहीं कराई। तब तक चुनाव आयोग उनकी मुट्ठी में था और टी एन शेषन का भी अवतार नहीं हुआ था।

2014 के चुनाव में भी कांग्रेस बेईमानी करा सकती थी।

अब 2019 के आम चुनाव पर नज़र डालिए।

चुनाव आयोग की इज़्ज़त गिरवी है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस विवादों में आ गए। अदालतों के कई फ़ैसलों पर लोगों ने नुक्ताचीनी की। जिन राजनीतिक दलों और उनके कार्यकर्ताओं को फासिस्ट ताक़तों से सड़कों पर लड़ना था वो दुम दबाकर बैठे हैं। यहाँ तक कि एक दो दल जो फासिस्ट ताक़तों के खिलाफ हैं उनके कार्यकर्ता और लोकल नेता लंबी तान कर सो रहे हैं।

पश्चिम बंगाल की घटनाएँ बता रही हैं कि वहाँ भाजपा और आरएसएस ममता बनर्जी नामक महिला को हराने के लिए गुंडे, मवालियों तक इस्तेमाल कर रहे हैं। इतिहासकार और बंगाल सुधारवादी आंदोलन के अग्रणी नेता रहे ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की मूर्ति की मूर्ति टूटने की जब खबर आई तो मुझे यक़ीन नहीं हुआ। क्योंकि कोई बंगाली यह हरकत नहीं करेगा। फिर मैंने उस घटना के विडियो देखे।...जो शंका थी, वही सच साबित हुई। दूसरे राज्यों से भेजे गए गुंडों ने वहाँ तोड़फोड़ मचाई। एक संगठित गिरोह ने वह मूर्ति उसी अंदाज में तोड़ी जैसे अयोध्या की घटना को अंजाम दिया गया था। मीडिया ने इस घटना की सही रिपोर्टिंग नहीं की है। एकाध चैनलों पर ही उन विडियो को दिखाया गया। बहरहाल, सोशल मीडिया पर वो विडियो अनगिनत लोगों द्वारा डाले गए है।

आरएसएस ने ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के लिखे इतिहास को कभी पसंद नहीं किया। आरएसएस के निशाने पर तमाम बंगला लेखक, सुधारक, इतिहासकार रहे हैं। 

भाजपा और मोदी ब्रिगेड अगर यह चुनाव जीतता है यह जनता की हार नहीं बल्कि उन राजनीतिक दलों और उनके कार्यकर्ताओं की हार होगी जो ममता और उनके वर्करों के अंदाज में फासिस्ट ताक़तों से टकराने के लिए घरों से बाहर नहीं निकले। कांग्रेस, कम्युनिस्ट, बसपा, सपा के सुविधाभोगी कार्यकर्ताओं की कमज़ोरी के चलते फासिस्ट ताक़तें लगातार मज़बूत हो रही हैं। 

एक तरफ़ आतंकी मुलज़िम साध्वी प्रज्ञा ठाकुर बड़ी बेहियाई से आतंकवादी नाथूराम गोडसे को देशभक्त बता रही है तो दूसरी तरफ़ उतनी ही बेहियाई से भाजपा नेता गांधी जी को माल्यार्पण करते हैं। भाजपा में ज़रा भी शर्म बची हो तो आज ही प्रज्ञा को पार्टी से निकाल बाहर करे। वरना गोडसे देशभक्त और महात्मा गांधी को माला एकसाथ नहीं चल सकते।

लँगड़ा भारतीय लोकतंत्र किसी और तरफ़ बढ़ चला है। 23 मई के बाद अगर मोदी लौटे तो आपको इसका अंदाज़ा हो जाएगा...तमाम लचकदार शाखें भी टूट जाएंगी। (हिंदीवाणीडॉटइ

Tuesday, May 7, 2019

यह चुनावी व्यवस्था भ्रष्ट है...इसे उखाड़ फेंकिये

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों पर टीका टिप्पणी की मनाही है लेकिन इधर जिस तरह से तमाम मुद्दों पर उसका रूख सामने आया है, वो कहीं न कहीं आम नागरिक को बेचैन कर रहा है।...

विपक्ष ने ईवीएम (EVM) से निकलने वाली 50 फ़ीसदी पर्चियों का वीवीपैट (VVPAT) से मिलान करने की माँग करते हुए पुनर्विचार की माँग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने अभी थोड़ी देर पहले उस माँग को ख़ारिज कर दिया। हद यह है कि सुप्रीम कोर्ट 25 फ़ीसदी पर्चियों के मिलान पर भी राज़ी नहीं हुआ...

देखने में यह आ रहा है कि चुनाव आयोग नामक संस्था ने इस पूरे चुनाव में सत्ता पक्ष के साथ बगलगीरी कर ली है। ...और सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग को ठीक से निर्देशित तक नहीं कर पा रहा है। कितनी दयनीय स्थिति है देश की दो सबसे बड़ी लोकतांत्रिक संस्थाओं की।

इससे पहले सुनाई पड़ता था कि किसी एक सीट या दो सीटों पर धाँधली पर चुनाव आयोग आँख मूँद लेता था। उसने मोदी के खिलाफ की गई हर शिकायत को नजरन्दाज करके क्लीन चिट दी। जिस बोफ़ोर्स मामले में फ़ाइनल फ़ैसला तक आ चुका हो, उसे लेकर एक मृत शख़्स को भला बुरा कहा। चुनाव आयोग ने इसका संज्ञान तक नहीं लिया। महान चुनाव आयुक्त स्व. टी. एन. शेषन द्वारा जिस संस्था की विश्वसनीयता बनाई गई हो, उसको इस तरह तार तार किया जाएगा, इसकी कल्पना तक किसी ने नहीं की थी।

भारत में फ़िलहाल ऐसे जनआंदोलन का अभाव है, जिसमें सत्ता की ताक़त और धृतराष्ट्र बन चुकी संस्थाओं से टकराने का माद्दा हो। विपक्षी दल आज सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका ख़ारिज होने के बाद दुम दबाकर चले आये। यह उचित समय है ऐसे तमाम मुद्दों पर जनआंदोलन खड़ा करने का लेकिन कम्युनिस्ट अभी कॉर्ल मार्क्स का अध्ययन कर रहे हैं और गांधीवादी सोशलिस्ट संघियों की गोद में बैठे हुए हैं। इतना बुरा दौर भारतीय इतिहास में नहीं आया था।

पिछले आंदोलन की कटु यादें अभी तक ज़िंदा हैं। अन्ना संघ का एजेंट निकला और वैकल्पिक राजनीति करने आया शख़्स दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रधानमंत्री बनने के सपने देखने लगा। सपने देखना बुरी बात नहीं थी लेकिन बिना अखिल भारतीय संगठन खड़ा किये इधर उधर राज्यों में फुदक फुदक कर चुनाव लड़ने ने सब गुड़गोबर कर दिया। 

वैकल्पिक राजनीति का लक्ष्य बिना सशक्त संगठन हासिल नहीं होता। लेकिन इन महाशय ने इसी को नजरन्दाज कर दिया। देश के लाखों बेरोज़गारों, किसानों, मज़दूरों  को एक मंच पर लाकर वैकल्पिक राजनीति की बात करने वाला कोई दल या संगठन दूर दूर  तक नज़र नहीं आ रहा है।

23 मई को इस चुनाव का नतीजा आएगा। आप देखेंगे कि कितने ही राजनीतिक दल भाजपा या कांग्रेस के साथ सारे आदर्श को ताक पर रखकर खड़े नज़र आयेंगे। सत्ता के लिए येन केन प्रकारेण का खेल खेलेंगे। युद्ध और चुनाव में सब जायज़ जैसे मुहावरे बोले जायेंगे। यानी मौजूदा चुनाव का सिस्टम और उसके ज़रिए सत्ता तक पहुँचने का तरीक़ा भारत में सबसे बड़ा करप्शन है। कॉरपोरेट के पैसे से चुनाव लड़ने वाले दल चूँकि भ्रष्ट तरीक़े से पैसा लेकर सत्ता में आते हैं तो वह वही व्यवस्था बनायेंगे या निर्माण करेंगे जो उस भ्रष्टाचार को और संरक्षित करेगा। भारत में कॉरपोरेट से चंदा लेकर चुनाव लड़ने की पूरी व्यवस्था ही खुला भ्रष्टाचार है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में आया लेकिन इस व्यवस्था को पारदर्शी बनाने का कोई आदेश अभी तक सुप्रीम कोर्ट ने पारित नहीं किया है। 2014 के चुनाव में सबसे ज़्यादा चुनावी चंदा भाजपा को मिला था, उसमें भारत के सभी उद्योग घरानों के नाम थे। उसमें अंबानी और अडानी का नाम सबसे प्रमुख था। उसके बाद भाजपा सत्ता में आई। पिछले पाँच साल के केंद्र सरकार सरकार के कारनामे बताने की ज़रूरत नहीं है। ऐसा नहीं कि यह करप्शन सिर्फ 2014 के चुनाव में ही हुआ था। उसके पहले हुए कुछ चुनाव भी कॉरपोरेट के पैसे से कांग्रेस लड़ती रही है। फ़र्क़ सिर्फ यह है कि पहले धीरू भाई अंबानी चंदा देते थे और अब उनके बेटे चुनावी चंदा देते हैं। पार्टियाँ बदल गई हैं लेकिन कॉरपोरेट घराने और उनके दलाल वही हैं। किसी पर फ़िल्म बना देने और उसे गुरू बता देने भर से उसके पाप नहीं धुल जाते। बेशक डायरेक्शन मणि रत्नम का रहा हो या किसी बच्चन ने उसमें उसकी भूमिका निभाई हो।
बहरहाल,  इस करप्शन या इस नासूर को ठीक करने के लिए लंबे और बड़े संघर्ष की रूपरेखा तय करने की ज़रूरत ग़ैर राजनीतिक संगठनों को है। देखना है वो कब हो पाता है। 

(अपडेट 1:30 pm : अभी खबर मिली है कि सुप्रीम कोर्ट के बाहर चीफ़ जस्टिस के खिलाफ  हो रहे प्रदर्शन को कवर करने वाले पत्रकारों को पुलिस ने धमकाकर भगाने की कोशिश की।)


कुछ बात वकीलों पर भी
...............................

सत्ता पक्ष और विपक्षी दलों में ऐसे वकीलों का क़ब्ज़ा है जो एक दिन अपने नेता के लिए कोर्ट में एड़ियाँ रगड़ता है तो अगले दिन किसी कॉरपोरेट का वकालतनामा जमाकरा कर किसी अंबानी की ज़मानत के लिए बेक़रार नज़र आता है। जज भी इन हालात से वाक़िफ़ हैं। उनका रूख भी जैसा होता है वह तटस्थता के दायरे में कम से कम नहीं होता।

मैं ऐसे तमाम वकीलों को नज़दीक से जानता हूँ जो वैसे तो तमाम बड़े छोटे पत्रकारों के दोस्त बने फिरते हैं और तमाम सार्वजनिक मंचों पर स्वतंत्र पत्रकारिता की दुहाई देते हैं लेकिन कोर्ट में जब किसी मीडिया मालिक के खिलाफ कोई केस होता है तो मीडिया मालिक की तरफ़ से खड़े हो जाते हैं। यह ठीक है कि वह उनका पेशा है लेकिन तब उन्हें स्वतंत्र पत्रकारिता की दुहाई नहीं देनी चाहिए न टीवी चैनलों पर बैठकर लफ्फाजी करनी चाहिए। 

एक लफ़्फ़ाज़ वक़ील ऐसा है कि आज तक कोई चुनाव नहीं जीत सका लेकिन डॉ मनमोहन सिंह के अर्थशास्त्र को भी चुनौती दे देता है।...ऐसे लोगों से आप भला लोकतांत्रिक संस्थाओं को बचाने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?  हालाँकि इन्हीं में प्रशांत भूषण और ऐसे असंख्य वक़ील हैं जो हमें उम्मीद भी बँधाते हैं। कुछ वकीलों के नाम सामने नहीं आते और वे बेहतरीन काम कर जाते हैं।


Thursday, May 2, 2019

मसूद अज़हर के बाद आगे क्या...

अंग्रेज़ी का शब्द हाइप बहुत लाजवाब शब्द है। हाइप यानि किसी चीज़ को इतना बढ़ा चढ़ाकर पेश करना कि लोग उस चीज़ के, उस शब्द के निगेटिव (नकारात्मक) या पॉज़िटिव (सकारात्मक) ढंग से दीवाने हो जायें।

पश्चिम की मीडिया और उनके नेताओं को यह खेल आता है। भारत में किस पार्टी को इसमें निपुणता मिली है, उसका अंदाज़ा आपको अब हो रहा होगा।...

चुनाव शुरू होते ही उस आतंकी यानी मसूद अज़हर के नाम से हाइप वाली ख़बरें आने लगीं जिसे भाजपा की पिछली सरकार यानी अटल सरकार अजीत डोभाल के नेतृत्व में कंधार छोड़कर आई थी। ...भोले भारतीय भूल गये इस घटना को। 

भारतीय मीडिया और भाजपा नेताओं ने यह नाम इस हद तक जपा कि हम जनता के लोगों को ऐसा लगा कि अगर यह मसूद अज़हर नामक आतंकी अगर ज़िंदा या मुर्दा मिल जाये तो भारत में आतंकवाद खत्म हो जाएगा। 

हम भारत सरकार के साथ हाइप खड़ा करने में जी जान से जुट गये...हमारी हर समस्या का निदान मसूद अज़हर हो गया...

रोज़गार नहीं मिल रहा, बस मसूद अज़हर के ग्लोबल आतंकी घोषित होते ही रोज़गार मिलने लगेगा...किसानों को फसल का वाजिब मूल्य नहीं मिल रहा, कोई बात नहीं, मसूद अज़हर जैसे ग्लोबल आतंकी घोषित हुआ वैसे ही किसान मालामाल हो जायेंगे। नीरव मोदी-मेहुल चौकसी भी लौट आयेंगे सारा लूटा हुआ पैसा लेकर और कहेंगे - ये लो मसूद अज़हर पर इतना पैसा हम न्यौछावर कर रहे हैं।

...ख़ैर अब तो हमारी बहुत बड़ी जीत साबित हुई बताई जा रही है कि मसूद अज़हर को आख़िरकार भारत के दबाव में उसे ग्लोबल आतंकी घोषित कर दिया गया। मीडिया मोदी जी पर क़ुर्बान हो गई। मोदी जी की वजह से यह कामयाबी मिली। ...



हमारे पड़ोसी इतने ख़ुश हुए कि कहने लगे अब भारत में आतंकवाद खत्म हो जायेगा। हमारे सैनिकों पर हमले नहीं होंगे। उन्हें शहादत नहीं देनी पड़ेगी। मैंने उनकी ख़ुशी को काफ़ूर नहीं करना चाहा यह बताकर कि अभी अभी गढ़ चिरौली (महाराष्ट्र) में 15 शहीद हो गये। ...लेकिन मैंने उनको बताया कि जिस यूएन प्रस्ताव के तहत उसे बैन किया गया, उसमें पुलवामा अटैक का ज़िक्र नहीं है। वह बरस पड़े। बोले- आप पत्रकार लोगों में यही कमी है। चीज़ों को समग्रता में नहीं देखते। अरे उसे टटोल आतंकवाद के लिए बैन किया गया है। पुलवामा भी उसमें शामिल है। मैंने कहा- सारा प्रस्ताव अब सार्वजनिक है। अशार पढ़ लो। वह ग़ुस्सा निकालते और पैर पटकते चले गये।

थोड़ी देर बाद फिर लौटे। पूछा- आपका फलाने मंत्रालय में कुछ जुगाड़ है या यूँ ही पत्रकार बने फिरते हो। मैंने कहा- सेवा तो बताइये। उन्होंने कहा- हमारे छोटे का इंटरव्यू है। अगर मंत्री कह देगा तो काम बन जायेगा। मैंने कहा- अब किसी से नौकरी के लिए कहना ही नहीं पड़ेगा। वह बोले- कैसे? मैंने कहा- बस मसूद अज़हर ग्लोबल आतंकी बन गया है। मोदी जी पहली फ़ुर्सत में नौकरियाँ देंगे। उन्होंने मुझे घूरा और यह कहते हुए उठ खड़े हुए कि आप मुद्दे से भटका रहे हैं।

सचमुच यक़ीन मानिये....हम एक दूसरे को मुद्दे से भटका रहे हैं। क्या अमेरिका पोषित ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद आतंकवाद खत्म हुआ, क्या इस्राइल पोषित जहन्नुमी अबू बकर बगदादी के पैर उखड़ने या मारे जाने के बाद आतंकवाद खत्म हुआ, पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई पोषित हाफिज सईद तो मुंबई टेरर अटैक के बाद ग्लोबल आतंकी घोषित किया जा चुका है, क्या उसके बाद हाफिज सईद या उसके आतंकी नेटवर्क का ख़ात्मा हो पाया? दरअसल, ये सारे नाम हाइप वाले हैं जिन्हें मीडिया खड़ा करता है या कराया जाता है।

दरअसल, ग्लोबल आतंकवाद अमेरिका-इस्राइल-सऊदी अरब (वहाबी आतंकी देश) के रहमोकरम पर ज़िंदा है। आतंकियों के ग्लोबल नेटवर्क को खादपानी भी यही देते हैं। 

यह तमाम देशों में छोटे छोटे गुट खड़े करके आतंक फैलाते हैं और अपनी सुविधा और नीति के तहत उसे खत्म भी कर देते हैं। आपको जूनियर बुश का ज़माना याद है? किस तरह से आतंकवाद के खिलाफ युद्ध छेड़ने के नाम पर इराक़ पर हमला किया गया और उसके सारे तेल और खनिज संपदा पर अमेरिका ने क़ब्ज़ा कर लिया। 

चीन ने अपने स्वार्थों के तहत मसूद अज़हर को ग्लोबल आतंकी घोषित करने के मामले में पहले चार बार अड़ंगा लगाया और अब अपने सिल्क रूट प्रोजेक्ट में भारत को शामिल करने के लिए उसने दाँव खेला है। चीन अपने प्रोजेक्ट में भारत, पाकिस्तान, ईरान आदि को शामिल करके यूरोपियन यूनियन जैसा कुछ बनाना चाहता है। जिसकी अपनी इकॉनमी होगी। उधर, यूएन में अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस मसूद अज़हर पर प्रस्ताव इसलिए लाये ताकि भारत को ईरान के तेल कारोबार से निकालकर सऊदी अरब के ज़रिये अमेरिकी तेल बेचा जा सके। 

पाकिस्तानी सेना हमारे कश्मीर में खासी दिलचस्पी लेती है। कश्मीरी अवाम के संघर्ष को वह हर तरह से मदद करती है। उसके पास मसूद अज़हर और हाफिज सईद जैसे असंख्य प्यादे हैं। वह फिर नया प्यादा खड़ा कर देगी। लेकिन मसूद अज़हर का हाइप खड़ा करके या इसकी आड़ में राष्ट्रवाद को ही देश का सबसे बड़ा मुद्दा बनाकर पेश करना खुद को धोखा देना है। मसूद अज़हर तो ग्लोबल आतंकी घोषित हो गया लेकिन उसके बाद क्या...?    






Wednesday, April 24, 2019

हमारा तेल खरीदो, हमारा हथियार खरीदो...फिर चाहे जिसको मारो-पीटो




भारत अमेरिका-इस्राइल-अरब के जाल में फँस गया है। नया वर्ल्ड ऑर्डर (विश्व व्यवस्था) अपनी शर्तें खुलेआम बता रहा है। ...हमारा तेल ख़रीदो और हमारे ही हथियार ख़रीदो। नहीं तो बम धमाकों, तख़्ता पलट, दंगों का सामना करो।...अगर किसी आतंकवादी गुट से बातचीत या समझौता करना होगा तो वह भी हम करेंगे। अगर तुम अपने देश में अपनी किसी आबादी या समूह पर जुल्म करना चाहते हो, उनका नरसंहार करना चाहते हो तो वह हमारी बिना मर्जी के नहीं कर सकते। हमारी सहमति है तो उस आबादी और समूह से तुम्हारी फौज, तुम्हारी पुलिस कुछ भी करे, हम कुछ नहीं बोलेंगे। बस तुम्हारी अर्थव्यवस्था हमारी मर्जी से चलनी चाहिए और वहां के समूहों को कुचलने में हथियार हमारे इस्तेमाल होने चाहिए। 

इस वर्ल्ड ऑर्डर में चीन और उसका सिल्क रूट, ईराऩ जैसे कई मुल्क सबसे बड़ी बाधा हैं। भारत ने तटस्थ होने की कोशिश की लेकिन उसके नेता नैतिक साहस नहीं जुटा पाए और अमेरिकी वर्ल्ड आर्डर के सामने घुटने टेक दिये।



#अमेरिका ने #भारत से कहा, #ईरान का तेल मत ख़रीदो, हम सऊदी अरब से महँगा तेल दिलवा देंगे लेकिन ख़रीदना सऊदी का तेल ही पड़ेगा। यानि अब भारत महँगा तेल #सऊदी #अरब से ख़रीदेगा। भारत में तेल महँगा बिकेगा, महँगाई बढ़ेगी। भारत के मौजूदा नेतृत्व में इंदिरा गांधी जैसा साहस नहीं है कि वह अमेरिकी वर्ल्ड आर्डर को चुनौती दे सके। इंदिरा गांधी यूं ही नहीं कहती थीं कि सीआईए उनकी हत्या कराना चाहता है। सीआईए ने पाकिस्तान की मदद से #खालिस्तान आंदोलन खड़ा कराया। खालिस्तानी नेता अमेरिका- #कनाडा में बैठकर भारत में अलग देश बनवाने की कोशिश करते रहे। इसी दौरान इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई। अमेरिकी मदद से #लिट्टे खड़ा हुआ। पूरी फंडिंग अमेरिका- #इस्राइल पोषित कंपनियों की थी। लिट्टे ने राजीव गांधी की हत्या कर दी। भारत में अब भाजपा की सरकार है। उसका झुकाव शुरू से अमेरिका-इस्राइल की तरफ रहा है। वहां के संगठनों से फंडिंग तक होती रही है। यानी भारत में उन तीन देशों के अनुकूल सरकार है।

खैर, हमारी बाततीच का विषय नया अमेरिकी वर्ल्ड आर्डर और भारतीय हितों को समझना है। 

सऊदी अरब के अय्याश शेख़ और आले सऊद तेल बेचकर मिलने वाले पैसे अमेरिकी बैंकों में रखते हैं। पूरा लेनदेन अमेरिकी सरकार की नजर में होता है। लेहमन बैंक जब अमेरिका में डूबा तो शेखों के पैसे भी डूब गए। लेकिन अमेरिका का जो घराना दुनिया के सारे बैंकों को नियंत्रित करता है, उस पर कोई असर नहीं पड़ा। उसने सऊदी पैसों को पहले ही ठिकाने लगा दिया था। नाम के लिए तेल सऊदी अरब का है, दरअसल, उस पर अमेरिकी-इस्राइली कंपनियों का नियंत्रण है।

सऊदी अरब में कल सरेआम 37 लोगों को आले सऊद की हुकूमत ने क़त्ल करा दिया। उनकी लाशों के टुकड़े-टुकड़े कर उन्हें वहां खंभों पर टांग दिया गया। कत्ल किए जाने वालों में वहाँ बग़ावत की आवाज़ बुलंद करने वाले शिया-सुन्नी मौलाना, छात्र, मज़दूर शामिल थे। इसमें वह लड़का अब्दुल हकीम भी था जिसे 16 साल की उम्र में पकड़ा गया और अब बालिग होने पर 19 साल की उम्र में कत्ल कर दिया गया। पूरी दुनिया में मानवाधिकार की चिंता करने वाले अमेरिका ने वहाबी हुकूमत के इस जुल्म पर एक शब्द भी नहीं कहा। सरेआम कत्ल का आदेश वहाबियत के पैरोकार उस सऊदी प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने दिया था जिसे अभी हाल ही में भारत और पाकिस्तान आने पर दोनों देशों में सम्मानित किया गया था।

आतंकी गुट भाई-भाई
.............................

#तालिबान जो एक आतंकवादी संगठन है और भारतीय हितों के खिलाफ काम करता है। उसके दोस्त अलक़ायदा और आईएस दुनिया के किसी भी हिस्से में धमाका कर देने की ताकत रखते हैं। ओसामा बिन #लादेन से लेकर अब तक आईएस की लीडरशिप को खड़ा करने वाले अमेरिका, इस्राइल, सऊदी अरब ही हैं। ईरान और सीरिया को तोड़ने के लिए इस्राइल के नियंत्रण वाले गोलान हाइट से एक अनजान से मुसलमानों के नाम पर कलंक अबू बकर #बगदादी को तलाशा गया और उसे रातोंरात #खलीफा बनाकर आईएसआईएस की कमान सौंप दी गई। यह साजिश सीरिया और ईरान ने आपसी समझबूझ से नेस्तोनाबूद कर दी। दुनिया में अपनी दादागीरी स्थापित करने के लिए अमेरिका उसी तालिबान, #अलकायदा और #आईएस के आतंकियों से समझौता करने के लिए कभी उनके साथ सऊदी अरब की राजधानी रियाद में बात करता है तो कभी नार्वे में। यह सीधा सा संकेत है कि अमेरिका चाहे तो क्या नहीं कर सकता। #आतंकी संगठनों के खाते सऊदी अरब में खुले हुए हैं और पैसा उनमें अमेरिका-इस्राइल से आता है।

सोचिए, अगर अमेरिका #आतंकवाद के खिलाफ है तो वह तालिबान और आईएस से बात क्यों कर करता रहता है? अगर अमेरिका मानवाधिकार का इतना बड़ा रक्षक है तो सऊदी अरब में किए जा रहे कत्ल पर उसकी जुबान बंद क्यों है। अगर अमेरिका इतना बड़ा हकपरस्त है तो फिलस्तीन समेत एशिया के कई देशों में जो समूह अपनी आजादी और अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उनके साथ क्यों नहीं खड़ा हो रहा है। ऐसा क्यों है कि इन सभी देशों में इस्राइली हथियारों का इस्तेमाल उन समूहों और उन आवाजों को कुचलने के लिए हो रहा है। पिछले दिनों जब भारत ने #पाकिस्तान के बालाकोट में बम बरसाये तो पाकिस्तानी मीडिया और अमेरिकी मीडिया में यह रिपोर्ट और लेख छापे गए कि अब समय आ गया है कि पाकिस्तान ने इस्राइली हथियार खरीदने पर जो अघोषित बैन लगा रखा है, वह खत्म करे और इस्राइल से हथियार खरीदे जायें। ताकि उनका इस्तेमाल भारत पर किया जा सके। यानी इस्राइली-अमेरिकी परस्त लेखकों, सैन्य अफसरों ने पाकिस्तान सरकार को सलाह दी कि वह भी भारत की ही तरह इस्राइल से हथियार खरीदे। ऐसी सलाह देने वाले दरअसल पाकिस्तान के हित चिंतक नहीं थे, बल्कि वे इस्राइली हथियार कंपनियों की लॉबिंग कर रहे थे। ऐसा होने पर फायदे में कौन रहेगा, जाहिर है इस्राइल रहेगा, जिसका हथियार बिकेगा। भारत-पाकिस्तान अगर लड़ते हैं, युद्ध करते हैं तो फायदे में इस्राइल-अमेरिकी कंपनियां रहेंगी, जिनके हथियारों का इस्तेमाल दोनों देश करेंगे।


सिल्क रूट पर नजर
...........................

#श्रीलंका में मामूली आबादी में मुसलमान रहते हैं। वहाँ की सरकार को और वहाँ के मुसलमानों को एक दूसरे से कभी कोई शिकायत नहीं रही है। इसके बावजूद श्रीलंका में कोआर्डिनेटेड बम धमाके कराये जाते हैं जो बिना बाहरी देश की मदद के बिना नामुमकिन है। श्रीलंका को स्पष्ट चेतावनी है कि वह चीन के ग्रुप से बाहर निकले। हिंद महासागर में श्रीलंका का सामरिक महत्व है। 900 बिलियन डॉलर वाले चीनी सिल्क रूट का श्रीलंका मुख्य ट्रांजिट पॉइंट है। इस सिल्क रूट में #चीन के बाद श्रीलंका, ईरान, पाकिस्तान सबसे महत्वपूर्ण कड़ियाँ हैं। श्रीलंका सिल्क रूट का फायदा उठाकर अपने देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए चीन की तरफ बढ़ रहा है। अमेरिका को श्रीलंका की यह जुर्रत पसंद नहीं है।



चीन पर पाकिस्तान की निर्भरता बढ़ती जा रही है। जब एक तरफ़ ईरान और उसके तेल पर दुनिया के तीन बड़े आतंकवादी परस्त देश अमेरिका, इस्राइल और सऊदी अरब तमाम तरह के प्रतिबंध लगा रहे हैं तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ईरान की यात्रा पर चले जाते हैं। ये कूटनीतिक संकेत इशारों में दिये जाते हैं। बहुत साफ़ है कि इमरान की वही नीतियाँ हैं जो बेनज़ीर भुट्टो की थीं। पाकिस्तान का इस्तेमाल अमेरिका अपने हितों के लिए करता रहा है। अफगानिस्तान को रूस के प्रभुत्व से मुक्त कराने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान की मदद से वहां तालिबान को खड़ा किया था। अमेरिका के कहने पर पाकिस्तान के पूर्व तानाशाह परवेज मुशर्फ ने ओसामा बिन लादेन को अपने देश में शरण दी। लादेन वहां छिपा रहा, अमेरिका ने उसे कुछ समय बाद मार भी दिया। लाश को समुद्र में बहा दिया। बगदादी मरा या जिंदा है, कोई नहीं जानता। अमेरिका-इस्राइल लादेन या अबू बकर बगदादी जैसे जो पात्र गढ़ते हैं और खड़ा करते हैं, उनकी मौत पर अंत तक रहस्य बना रहता है। अफगानिस्तान मिशन अब पूरा हो चुका है। लेकिन पाकिस्तान कम चालाक नहीं है। उसने चीन से दोस्ती गांठ ली। चीन अब पाकिस्तान में पानी की तरह पैसा बहा रहा है। ईरान-चीन की दोस्ती पहले से ही चली आ रही है। पाकिस्तान की नई हुकूमत को ईरान से दोस्ती इन्हीं हालात के मद्देनजर करनी पड़ रही है। इमरान का ईरान में जाकर यह कहना कि हां, हमारे ही देश के आतंकी संगठन ने आपके सैनिकों की हत्या की है। संकेत साफ है कि इमरान अब ईरान के खिलाफ अपने देश से कोई आतंकवादी गतिविधि नहीं चलने देंगे।

एक तरफ तो अमेरिकी परस्त मीडिया और इस्राइल मिलकर मुसलमानों को विश्वव्यापी आतंकी कौम घोषित करने में लगे हुए तो दूसरी तरफ चीन में रहने वाले उगुइर मुसलमानों की चिंता के नाम पर घड़ियाली आंसू भी बहाते हैं। तमाम उगुइर नेता इस समय अमेरिका में रह रहे हैं और चीन के एक हिस्से में उगुइर मुसलमानों को हिंसा के लिए प्रेरित कर रहे हैं। इस्राइली एनजीओ भी इन उगुइर नेताओं की फंडिंग करते हैं। अचानक आप देखेंगे कि चीन में मानवाधिकारों की कथित हत्या पर अमेरिकी परस्त प्रेस लंबे चौड़े लेख प्रकाशित करती रहती है। इस तरह चीन को अमेरिका-इस्राइल घेरना चाहते हैं लेकिन चीन इस समय इतना शक्तिशाली है कि वह इनके काबू में नहीं आ रहा है। चीन, ईरान, रूस मिलकर अमेरिका के सामने ऐसी प्रतिरोधी ताकतें बन गई हैं जो अमेरिका-इस्राइल को चिंतित रखती हैं। 


ईरान के चारों तरफ़ फैले मुल्क अगर अमेरिकी-इस्राइली-सऊदी नेक्सस में नहीं होंगे तो अमेरिका ईरान पर हमला नहीं कर पायेगा। अमेरिका ने ईरान की इस्लामिक क्रांति के दौरान ऐसी हिमाक़त की थी लेकिन उसके छह फाइटर विमान नष्ट हो गए थे। इसलिए तीन देशों के इस नेक्सस को भारत और श्रीलंका के एयरबेस चाहिए। जहाँ से उसके फाइटर विमान ईरान पर चढ़ाई कर सकें। अमेरिका, भारत और सऊदी अरब की जनता चाहे भले ही इन हमलों के पक्ष में न हो लेकिन वहाँ की सरकारें उन तेल बेचने वाले अमीरों और हथियार बनाने वाली कंपनियों के हितों को देख रही है। इसलिए नए अमेरिकी वर्ल्ड आर्डर में भारत-श्रीलंका-अफगानिस्तान-पाकिस्तान जैसे देशों का महत्व बढ़ गया है। लेकिन ये देश इस्तेमाल होने के लिए बने हैं। चूंकि ईरान के नजदीक हैं इसलिए अमेरिका ईरान को घेरने के लिए इन छोटे देशों का हर तरह से इस्तेमाल करना चाहता है।

भारत का मौजूदा नेतृत्व जो इस देश को बहुत शक्तिशाली बता रहा है और आने वाले वक्त में विश्व महाशक्ति बनने की बात भी कर रहा है तो क्यों नहीं अमेरिका को नजरन्दाज कर ईरान से तेल की खरीद जारी रखने की घोषणा करता। तेल भारत की लाइनफलाइन है। तेल के दाम से ही यहां महंगाई घटती और बढ़ती है। ईरानी तेल जब हमारे लिए सस्ता है और भारत के हित में है तो अमेरिका को मना करने में क्या हर्ज है। भारत को अमेरिकी हितों की चिंता छोड़कर अपने हितों की चिंता करनी चाहिए। ईरान का तेल भारत को तमाम संकटों से बचा सकता है लेकिन महंगा सऊदी तेल भारत में नए संकटों को जन्म दे सकता है। जिसका असर देश के राजनीतिक नेतृत्व पर पड़ना तय है।