Friday, May 11, 2018

क्या मोदी ने जानबूझकर भगत सिंह के बारे में झूठ बोला


हम यह मानने को तैयार नहीं कि भारत के प्रधानमंत्री के पास पीएमओ में लाइब्रेरी नहीं होगी, रिसर्चर नहीं होंगे और उनको भाषण के लिए इनपुट न दिए जाते होंगे। ...लगता यही है कि  मोदी की ऐसी कोई मजबूरी है जो उनसे शहीदे आज़म भगत सिंह और अन्य के बारे में जानबूझकर झूठे तथ्य बुलवा रही है ताकि उस झूठ को सच बताकर स्थापित किया जा सके। वरना मोदी से इतनी बड़ी ग़लती नामुमकिन है।

एक झूठ को सच साबित करने के लिए अगर कुछ बड़े लोग मिलकर झूठ बोलने लगें तो काफ़ी लोगों को वह झूठ सच लगने लगता है। बड़े लोगों का झूठ इतनी नफ़ासत से सामने आता है कि तथ्यों से बेख़बर लोग उसे सच मान लेते हैं। आररएसएस इसी नीति पर काम कर रहा है। बतौर प्रधानमंत्री मोदी जब बार बार ऐतिहासिक तथ्यों पर झूठ बोलेंगे तो लोग उसी झूठ को सच मानने लगेंगे। क्योंकि उनसे भारत का सामान्य मानवी ऐसी उम्मीद नहीं कर सकता। पीएमओ के बारे में मैं बहुत नज़दीक से जानता हूँ। वहाँ हर सूचना मात्र एक क्लिक पर उपलब्ध रहती है। हर चीज़ के एक्सपर्ट पीएमओ से जुड़े हुए हैं।  यह कैसे संभव है कि पीएम कुछ भी अंट शंट बोलने से पहले ऐतिहासिक जानकारियों की पुष्टि न करते हों। ज़रूर उन्हें किसी मजबूरी के तहत ऐतिहासिक तथ्यों पर झूठ बोलना पड़ रहा है। ऐसी ग़लती एकाध बार होती तो ठीक था लेकिन बार बार ग़लती की जाए तो उसके पीछे रणनीति ही होती है। 

हालाँकि मोदी जब पहली बार बनारस से अपना नामांकन करने गए थे और बोला था कि यहाँ मैं आया नहीं हूँ बल्कि गंगा मैया ने मुझे बुलाया था। तभी मुझे शक हुआ था कि यह प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देख रहे हैं और बात आस्था या अंधविश्वास की कर रहे हैं। लेकिन मैंने कोई टिप्पणी नहीं की। मैं तब चुप रहा लेकिन जब उन्होंने साइंस कांग्रेस में गणेश जी की प्लास्टिक सर्जरी पर अपना बहुमूल्य ज्ञान दिया तो शंकाएं बढ़ गईं। लेकिन जब यह सिलसिला आम हो गया तो लगा कि ज़रूर यह नागपुर यूनिवर्सिटी के सत्य को स्थापित करने की चाल है।

लेकिन क्या हम इसे मोदी की मजबूरी मानें या ऐतिहासिक भूल या ऐतिहासिक ग़लती मानें कि वह लगातार वही बोल रहे हैं जो संघ चाहता है। शायद उन्हें जिन्ना के प्रशंसक आडवाणी के साथ संघ का बरताव याद आता हो और वह उसी डर में ऐतिहासिक ग़लती कर बैठते हों। जिन दिनों संघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को अपना मुखौटा बता रहे थे उन्हीं दिनों हरियाणा भाजपा से संबंधित दिग्गज नेता मंगलसेन ने मुझसे कहा था कि क्या आप विश्वास करेंगे कि अटल जी का मूल चरित्र सेकुलर है। वह पार्टी की बैठकों में भी दिखता है लेकिन हमारे पास उनसे बड़ा चेहरा नहीं है, इसलिए संघ को बहरहाल उन्हें बर्दाश्त करना पड़ता है।

मोदी और भगवा ब्रिगेड वालों के भाषणों और करतबों से एक बात तो यह अच्छी हुई कि युवा पीढ़ी थोड़ा बहुत ही सही इतिहास टटोलने लगी। इससे यह आसानी होगी कि भगवा कल्चर को लेकर लोगों में उम्मीदों का जो रोशनदान खुला था वह बंद हो जाएगा। अब जैसे कल ही मोदी ने जब इस साल का सबसे बड़ा झूठ बोला कि शहीदे आज़म भगत सिंह जब जेल में थे तो उनसे मिलने कोई कांग्रेसी जेल में नहीं गया। ...कल से लेकर आज सुबह तक तमाम युवक भगत सिंह पर तमाम बातें पढ़ रहे हैं कि जवाहर लाल नेहरू ने कब मुलाक़ात की...कब गांधी जी ने सज़ा माफ़ कराने के लिए पत्र लिखा...कब जिन्ना और अरूणा आसिफ़ अली ने कोर्ट में उनकी पैरवी की। ...

अब लोग मोदी के बारे में इन तथ्यों के पढ़ने के बाद क्या राय बनाएँगे...इसे मोदी से बेहतर और कौन जान सकता है।...अब यह साफ़ होता जा रहा है कि एक साज़िश के तहत भगत सिंह, आंबेडकर, गांधी जी, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, जिन्ना समेत तमाम लोगों के ख़िलाफ़ जानबूझकर झूठ फैलाया जा रहा है ताकि नई पीढ़ी में यह बैठाया जा सके कि भारत की आज़ादी की लड़ाई संघियों ने लड़ी थी न कि कांग्रेसियों और हर मज़हब के लोगों ने। 

जिन्ना के मामले में भी यही हुआ। नई पीढ़ी जिन्ना के बारे में ज़रा भी नहीं जानती लेकिन आज देश के हर बड़े छोटे आदमी की ज़बान पर मोदी के बाद जिन्ना का नाम आ रहा है। पता नहीं यह साज़िश है या क्या... खुद बीजेपी सासंद सावित्री बाई ने जिन्ना को महान शख़्सियत बता डाला। जिस शख़्स ने देश के दो टुकड़े करा दिए उसे महान बताने वाले मुझे कांग्रेस में नहीं, भाजपा में मिले। पहले आडवाणी और अब सावित्री बाई फुले। 

हमारे कुछ दलित चिंतक पिछले दिनों जिन्ना को लेकर परेशान रहे। उनकी चिंता यह नहीं थी कि कुछ भगवा गुंडे एएमयू में मौजूद पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी पर हमला करने आए थे। चिंतक यह बताते रहे कि जिन्ना की तस्वीर वहाँ से निकालकर प्रधानमंत्री को भेज दी जाए। संघ भी यही चाहता है कि वहाँ से जिन्ना की तस्वीर ही हट जाए। हमारा सरोकार पसेमंदा समाज से आने वाले हामिद अंसारी की चिंता नहीं है बल्कि जिन्ना है। यानी संघ जो चाहता है वही दलित चिंतक भी चाहते हैं। 

डर यही है कि ये दलित चिंतक राज्यसभा वग़ैरह में पहुँचने के लिए कहीं आंबेडकर को पुराना स्वयंसेवक न बता दें। ख़ैर यह डर है लेकिन दलित चिंतकों को जब तब संघ का मोहरा बनने से परहेज़ करते रहना चाहिए।


1 comment:

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन जन्म दिवस - मृणाल सेन और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।