Tuesday, March 20, 2018

देश में दलालों की जुगलबंदी


भारतीय लोगों की दुनिया रिलायंस की मुट्ठी में कैद हो चुकी है...
देश की संसद में जो तमाशा चल रहा है, उसके लिए कहीं न कहीं जनता भी जिम्मेदार है। वरना मीडिया की औकात नहीं है कि वह आपको सही जानकारी न दे। यानी अगर आप लोग खबरों वाले चैनल देखना, न्यूज वेबसाइट पर जाना और कुछ अखबार पढ़ना बंद कर दें तो मीडिया ने भारत सरकार से दलाली की जो जुगलबंदी कर रखी है, वह बेनकाब हो जाएगी।
विपक्षी पार्टियां लोकसभा में मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दे रही हैं और स्पीकर सुमित्रा महाजन तरह-तरह के बहाने लेकर प्रस्ताव का रखा जाना रोक रही हैं। क्योंकि प्रस्ताव पर बहस होनी है, सभी दलों को बोलने का मौका मिलेगा, सरकार और भाजपा इससे भाग रहे हैं।
पिछले हफ्ते यह प्रस्ताव लाया गया था, तब संसद में होहल्ले का बहाना बनाया गया। सोमवार यानी कल खुद भाजपा ने जयललिता की पार्टी एआईडीएमके के साथ मिलकर हल्ला मचवा दिया। सुमित्रा महाजन को बहाना मिल गया। फिर से अविश्वास प्रस्ताव का रखा जाना रोक दिया गया...सोमवार को लोकसभा में जबरन मचाया जा रहा शोर इस बात की गवाही दे रहा था कि वह प्रायोजित शोर है और सिर्फ अविश्वास प्रस्ताव रोकने के लिए ऐसा किया जा रहा है।
किसी भी मीडिया ने सरकार की इस हरकत पर चर्चा करने की जरूरत नहीं समझी। लेकिन जनता भी तो वही चाहती है। जनता की जागरूकता की कमी की वजह से देश में ऐसा मीडिया तंत्र खड़ा हो गया है जो अंततः जनता के मूल अधिकारों के खिलाफ ही जा रहा है। जबकि मीडिया का पूरा मायाजाल सिर्फ और सिर्फ आपके टीवी देखने, अॉनलाइन खबरों को देखने और कुछ अखबार पढ़ने के दम पर खड़ा किया गया है। अगर आप अपनी यह आदत छोड़ दें तो मीडिया की औकात सामने आ जाएगी। लेकिन आप लोग ऐसा करने वाले नहीं हैं और यह मीडिया आने वाले समय में आपको और भी ज्यादा नियंत्रित करने वाला है। न आपको सही सूचनाएं मिलेंगी और न आप खबरों के पीछे चलने वाले खेल जान सकेंगे। कॉरपोरेट नियंत्रित मीडिया की मर्जी से आप न तो कुछ देख पाएंगे और न पढ़ पाएंगे।

रिलायंस का खेल देखो
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अंबानी खानदान ने आज रिलायंस बिग टीवी का अॉफर लॉन्च किया है। यह काफी उत्तेजक है। आपको रिलायंस सिर्फ 500 रुपये में पूरे साल डीटीएच (डायरेक्ट टू होम) के जरिए सारे चैनल दिखाएगा। शुरुआत में जो हजार या बारह सौ रुपये लिए जाएंगे वो भी आपको तीन साल बाद वापस मिल जाएंगे या एडजस्ट कर लिए जाएंगे। रिलायंस बिग टीवी छोटे अंबानी यानी अनिल अंबानी का है। बड़ा अंबानी यानी मुकेश अंबानी भी इस क्षेत्र में कूदने की तैयारी कर रहा है या फिर भाई की कंपनी को ही खरीद लेगा।
आप इस खेल को समझ पा रहे हैं या नहीं ...

चलिए समझते हैं। सारे चैनल को लगभग मुफ्त में मुकेश और अनिल मिलकर दिखाएंगे। सारे न्यूज चैनलों में दोनों भाइयों में से किसी न किसी के शेयर हैं। मुकेश करीब सौ से ज्यादा चैनलों के सीधे मालिक हैं। अब अगर किसी न्यूज चैनल को मार्केट में खुद को बने रहना है या चाहता है कि उसे देखा जाए तो उसे अंबानी बंधु में से किसी एक की छतरी के नीचे आना होगा। ...आप जिन कुछ चैनलों को बहुत अच्छा मानते हैं या बेहतर मानते हैं, उन तक में अंबानी बंधुओं के शेयर हैं। यह खबर पुरानी है, फिर भी याददाश्त में जिंदा रखने के लिए दोहरा देते हैं कि टीवी 18 ग्रुप को किस तरह मुकेश अंबानी ग्रुप ने खरीदा और रातोंरात 700 पत्रकारों की नौकरी चली गई। कई सारे चैनल मार्केट में जिंदा रहने के लिए रिलायंस से लोन तक ले लेते हैं।

हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप जो बिड़ला घराने का इतना बड़ा साम्राज्य है। जिसे उनकी बेटी शोभना भरतिया चलाती हैं। इस ग्रुप तक में रिलायंस की हिस्सेदारी हो चुकी है।
इसका नतीजा यह निकलेगा कि टाटा स्काई, एयरटेल जैसे डीटीएच खत्म हो जाएंगे या फिर मार्केट में उनकी हिस्सेदारी कम हो जाएगी। जी न्यूज वालों का डिश टीवी में इतनी औकात नहीं कि वह रिलायंस से टकरा सके। रिलायंस से कोई भी टकरा नहीं पाएगा, कम से कम मौजूदा सरकार के रहते हुए।
रिलायंस जियो इंटरनेट डेटा सस्ता करके आपको 24 घंटे व्यस्त रखने का इंतजाम पहले ही कर चुका है। आप घर में हों या रास्ते में हों...बस हरदम रिलायंस द्वारा नियंत्रित कंटेंट के कब्जे में कब्जे में रहेंगे। जब शैतान किसी का यह हाल कर देता है तो जो वह चाहता है, आपको वही करना पड़ेगा। जो सूचना वह देगा, उसी पर आपको यकीन करना पड़ेगा। भारत में अब जो विदेशी कंपनी इस क्षेत्र में उतरेगी, वह भी बिना रिलायंस की मर्जी के कुछ नहीं कर सकेगी। भारतीय लोगों की दुनिया रिलायंस की मुट्ठी में कैद हो चुकी है।

क्या आपको यह सूचना मिली
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क्या आप लोगों को पता है कि अबकी बार आप लोगों ने जो सरकार चुनी थी, उसने संसद में हाल ही में फाइनैंस बिल चुपचाप पास करा लिया। एक भी राजनीतिक दल ने इसका विरोध नहीं किया। जब देश तीन लोकसभा चुनाव नतीजों की बहस में उलझा हुआ था, तभी इस हरकत को अंजाम दिया गया।
इस हरकत को बहुत घिनौने ढंग से अंजाम दिया गया। इस जानकारी को मैं गिरीश मालवीय जी की कलम से साझा कर रहा हूं...
फाइनैंस बिल द्वारा विदेशी अंशदान (नियमन) अधिनियम (एफसीआरए) 2010 में संशोधन किया गया है यह अधिनियम राजनीतिक दलों को विदेशी कंपनियों द्वारा मिले चंदे पर रोक लगाता है। वैसे तो भारत सरकार ने वित्त विधेयक 2016 के जरिए एफसीआरए में संशोधन कर राजनीतिक दलों के लिए विदेशी चंदा लेने को आसान बनाया था लेकिन अब ताजा संशोधन के बाद पार्टियों को 1976 से मिले विदेशी चंदे की जांच की कोई गुंजाइश नहीं रह जाएगी। 

ध्यान दीजिएगा 1976 से , यानी इससे बीते 42 वर्ष में राजनीतिक दलों को हुई तमाम विदेशी फंडिंग वैध हो गई है।

कानून की भाषा मे इसे भूतलक्षी प्रभाव से किया गया संशोधन कहा जाता है इस तरह के संशोधन की अनुमति बहुत विषम परिस्थितियों में ही दी जानी चाहिए। 

इस तरह के रेयर किस्म के प्रावधान को लागू क्यो करना पड़ा ?
2017 की शुरुआत में गैर-सरकारी संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने एक याचिका दिल्ली हाईकोर्ट में दायर की। याचिका में एडीआर ने केंद्र सरकार पर अदालत की अवमानना करने का आरोप लगाया।
दरअसल 2014 में दिल्ली हाई कोर्ट ने पाया था कि भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों ने ब्रिटेन स्थित कंपनी वेदांता रिसोर्सेज की भारतीय सहायक कंपनियों से चंदा लेकर फॉरेन कॉन्ट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (एफसीआरए) का उल्लंघन किया था। 
एफसीआरए की धारा-4 राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों पर विदेशों से चंदा लेने पर रोक लगाती है। उस वक्त दिल्ली हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग और केंद्रीय गृह मंत्रालय को छह महीने के भीतर कांग्रेस और भाजपा दोनों के खातों की जांच करने और उन पर कार्रवाई करने का आदेश दिया था। लेकिन न तो चुनाव आयोग ने कुछ किया और न ही गृहमंत्रालय द्वारा कोई कदम उठाया गया।
जुलाई 2017 में एडीआर की याचिका पर कार्यवाही करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार के रवैए पर सवाल उठाया। अदालत ने पूछा कि आखिर केंद्र सरकार इस मामले में कोई कदम क्यों नहीं उठाना चाहती.सरकार ने उस वक्त अदालत में दलील दी थी कि उसे रिकॉर्ड खंगालने के लिए 31 मार्च 2018 तक का वक्त दिया जाए।
अदालत ने 8 अक्टूबर 2017 मामले में कार्रवाई करने के लिए केंद्र को आखिरी छह हफ्ते का समय दिया था लेकिन यह छह हफ़्तों की अवधि यानी लगभग डेढ़ महीना तो दिसम्बर 2017 में ही खत्म हो गयी थी।
तो सवाल उठता है कि उसके बाद अदालत ने क्या किया ? बहुत ढूंढने पर भी जवाब तो नही मिला पर यह जरूर मालूम पड़ा कि दिल्ली हाई कोर्ट की कार्यवाहक चीफ जस्टिस गीता मित्तल जो जस्टिस सी हरिशंकर के साथ मिलकर यह मुकदमा सुन रही थीं, उन्हें केंद्र सरकार ने 8 मार्च 2018 को नारी शक्ति पुरस्कार से नवाज दिया। 

Tuesday, March 13, 2018

संघ प्रमुख के विचार और राजनीतिक नियम



आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत क्या मोदी को हटाना चाहते हैं या वह 2019 में नए चेहरे को पीएम पद पर बैठाना चाहते हैं...उनका नागपुर में स्कयं सेवकों के बीच दिया गया कल का बयान काफी महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि भाजपा किसी एक ख़ास व्यक्ति की वजह से नहीं जीत रही बल्कि तात्कालिक परिस्थितियाँ उसकी मदद कर रही हैं।...

भागवत की इन बातों के बहुत गहरे अर्थ हैं।...वो मंत्री, वो सांसद, वो विधायक, वो भाजपा नेता और थर्ड क्लास भक्त जो उठते बैठते मोदी-मोदी करते हैं उनसे संघ प्रमुख ख़ुश नहीं हैं। संघ प्रमुख भविष्य देख रहे हैं...उनकी नज़र लक्ष्य पर है। 

...पर वह यह कहना चाहते हैं कि संघ की बजाय किसी ख़ास का मुखौटा लगाकर जिस तरह भाजपा आगे बढ़ रही है वह घातक है क्योंकि भाजपा संघ की पैदा की गई परिस्थितियों की वजह से जीत रही है न कि नरेंद्र मोदी या अमित शाह की वजह से।

संघ प्रमुख ने यह बात शीशे की तरह साफ़ कर दी है कि अगर किसी संगठन में व्यक्ति पूजा शुरू हो जाए तो वह पार्टी कांग्रेस बनते देर नहीं लगती है। एक अच्छे खासे राजनीतिक दल कांग्रेस की गिरावट हमारे सामने है। व्यक्ति या परिवार पूजा ने इस पार्टी को आज रसातल में पहुँचा दिया है।

लेकिन भागवत जी पूँजीवादी राजनीति के कुछ नियम भूल गए हैं। उनकी सारी बातें सही हो सकती हैं लेकिन राजनीति के कुछ नियम हैं जो कांग्रेस को तो क्या भाजपा को भी रसातल में ले जाएँगे। उनका संगठन भी उसी पूँजीवादी राजनीति या व्यवस्था का हिस्सा है। भारत जैसे देश में आवारा पूँजीवाद (क्रोनी कैपटलिज्म) ने देश  की राजनीति को भी आवारा बना दिया है। जहाँ नियम क़ायदे कोई राजनीतिक दल या उसका मातृ संगठन नहीं तय कर रहे हैं। सब कुछ आवारा पूँजीवाद तय कर रहा है। 

मसलन कोई भी नेता किसी भी बैकग्राउंड से आए लेकिन पूँजीवादी राजनीति उसे भ्रष्ट और निरंकुश बना देती है। यह राजनीति उसे बताती है कि वही महत्वपूर्ण है बाक़ी सब महत्वहीन है। उसके शीर्ष पर होने से ही उसकी पार्टी का वजूद है। पूँजीवादी राजनीति इस बात की पुख़्ता व्यवस्था करती है कि जिस ग़ुलाम को वह शीर्ष पद पर लेकर आई है उसे इस्तेमाल किए जाने तक हर तरह की मदद देकर उसे क़ायम रखती है। ....एक समय माना जाता था कि आडवाणी तो अटल से भी बड़े नेता हैं। लेकिन पूँजीवादी राजनीति ने उन्हें निरंकुश बनने का लालच दिया और वह खुद को सबसे ताक़तवर मान बैठे।...उनके ही मातृ संगठन ने उन्हें ज़मीन पर पटक दिया। यह काम संघ के ज़रिए पूँजीवादी राजनीति ने कराया। 

भागवत जी, आप यह मान लीजिए कि बिना पूँजीवादी राजनीति के ख़ात्मे के आप अपने किसी भी मुखौटे को एक सीमा से आगे संचालित नहीं कर सकते। एक सीमा के बाद उस मुखौटे को पूँजीवादी राजनीति संचालित करती है। आपका संगठन उसे क़ाबू नहीं कर सकता। आप उस मुखौटे को नोच कर फेंक सकते हैं लेकिन अगला चयन भी आपको पूँजीवादी राजनीति के किसी एजेंट का ही करना पड़ेगा। पूँजीवादी राजनीति अपने क़लम के सिपाहियों को आदेश देती है कि किन्हें पीएम मटीरियल लिखना है और किसे नहीं। यानि कौन पीएम बनने लायक है कौन नहीं। बस आपको यह तय करना होता है उसमें से किसका चयन किया जाना है। पूँजीवादी राजनीति ऐसे संगठनों व राजनीतिक दलों को जेब में रखकर चलती है। वह अपने इरादे अपने प्यादे क़लम के सिपाहियों के ज़रिए ज़ाहिर कर देती है। तमाम राजनीतिक दल ग़ुलामों की तरह उसी पूँजीवादी राजनीति का हुक्म बजाते हैं। 

अगर संघ अगर वाक़ई इस देश का भला चाहता है तो क्यों नहीं वह पूँजीवादी राजनीति को बदलने की बात करता है ? क्यों नहीं वह पूँजीवादी व्यवस्था से लड़ने की बात करता ?  क्यों नहीं वह किसानों के हितों के लिए सड़कों पर उतरता है ? क्यों नहीं वह सामाजिक न्याय के मुद्दे पर नीति स्पष्ट करता है ? मोहन भागवत के किसी दलित के घर जाने या भोजन करने मात्र से दलितों के हालात नहीं सुधरने वाले। अभी मुंबई में किसानों का जो सैलाब दिखा,  आजतक संघ कभी किसानों का इतना बड़ा सैलाब जुटा पाया? हाँ, वह धर्म के नाम पर ज़रूर लोगों का सैलाब दिखाने में कामयाब रहता है। पूँजीवादी राजनीति में धर्म एक मोहरा भर है। संघ या मोहन भागवत को वही करना पड़ेगा जो पूँजीवादी राजनीति कराएगी। हो सकता है कि कभी संघ का ही कोई विचारक या स्वयंसेवक इस रहस्य का पर्दाफ़ाश करे कि दरअसल संघ आवारा पूँजीवाद का ही हिस्सा था या है। 


Sunday, March 4, 2018

लड़ाई इतनी आसान नहीं है...

...दरअसल, वह शख़्स अपने एजेंडे पर बहुत सधे हुए तरीक़े से आगे बढ़ रहा है। 
बहुत थोड़े होने के बावजूद हम सब बिखरे हुए हैं। ...
उसके रंग बदलते भाषण, हर एक एक्शन उसकी रणनीति का ऐलान करते नज़र आते हैं।...

वह डॉगी के पिल्ले से बात शुरू करता है और कई साल बाद अजान की आवाज़ सुनते ही सेकुलर बन जाता है।...
आप उसके अगले दाँव का अंदाज़ा नहीं लगा सकते।...
हर इवेंट उसके लिए अवसर है।...हर अवसर उसके लिए इवेंट है।...
इवेंट में दिमाग़ है, साज़िश है, ब्रॉन्डिंग है। 

वह रूस का नहीं भारत का ज़ार है। हमारी नई पीढ़ी बेज़ार है।वह ज़ार को नहीं जानती।...शायद अधिकांश ने यह नाम ही न सुना हो...और सुना भी हो तो क्या पता गूगल ने उसे जार- जार में भ्रमित कर दिया हो।...
अपना हर लम्हा वह ज़ार अपने क्रोनी कैपिटलिस्ट गिरोह के लिए जीता है।...
यह क्रोनी कैपटलिस्ट गिरोह उसकी ताक़त है। गिरोह के पास हर तरह की ताक़त है। ज़ार की जान इस गिरोह में क़ैद है।...जब तक गिरोह ताक़तवर है। ज़ार भी ताक़तवर है।...गिरोह की ताक़त घटे या खत्म हो, अब तभी ज़ार भी कमज़ोर होगा।...या खत्म होगा।
यह सब आसान नहीं है।...
हम थोड़े हैं और बिखरे हुए हैं। ज़ार और उसके गिरोह से लड़ने की लड़ाई आसान नहीं है। ...नए तरीक़े खोजने होंगे।...लड़ाई का तरीक़ा बदलना होगा।...






Thursday, March 1, 2018

होली के बहाने...एक अधूरी ग़ज़ल

रंग कोई भी डाल दो, गुलाल कोई भी लगा दो
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दीवारों पर लिखी इबारत मिटाना आसान है,
दिलों पर लिखी इबारत मिटाता नादान है...

रंग कोई भी डाल दो, गुलाल कोई भी लगा दो,
ज़ख़्मों पर फिर मरहम लगाता नहीं शैतान है...y

राष्ट्रवाद को बेशक तिरंगे में लपेट दो,
क़ातिल को यूँ भुलाना क्या आसान है...

रहबर ही जब बन गये हों रहजन जिस मुल्क में,
बचे रहने का क्या अब कुछ इमकान है ??....

(मेरी एक अधूरी ग़ज़ल की कुछ लाइनें होली और साहेब के ताज़ा बयान पर...बहरहाल, हर आम व ख़ास को, दूर के, नज़दीक को होली बहुत बहुत मुबारक)