Wednesday, December 26, 2018

2019 में कौन जीतेगा - धर्म या किसान...


 नवभारत टाइम्स (एनबीटी) में आज 26 दिसंबर 2018 को प्रकाशित मेरा लेख...

आजकल 2019 का अजेंडा तय किया जा रहा है। हर चुनाव से पहले यह होता है। लेकिन इस बार एक बात नई है। इस बार अजेंडा ‘धर्म बनाम किसान’ हो गया है जबकि इससे पहले भारत में चुनाव गरीबी हटाओ, भ्रष्टाचार, आरक्षण, दलितों-अल्पसंख्यकों की कथित तुष्टिकरण नीति, पाकिस्तान और सीआईए से खतरे के नाम पर लड़ा जाता रहा है। किसानों की बात भी हर चुनाव में की जाती है लेकिन उनका जिक्र सारी पार्टियां सरसरी तौर पर करती रही हैं। इस बार परिदृश्य बदला हुआ है। केंद्र सरकार के खिलाफ विपक्ष की कथित एकजुटता की तेज चर्चा के बावजूद अगले आम चुनाव का एक जमीनी अजेंडा भी अभी से बनने लगा है।

समय की कमी
2014 में केंद्र में नई सरकार बनने के बाद देश भर के किसान संगठन दो साल तक हालात का आकलन करते रहे। लेकिन 2016 से वे बार-बार दिल्ली और मुंबई का दरवाजा खटखटा रहे हैं कि हमारी बात सुनो। 2016 में सबसे पहले तमिलनाडु के किसान जंतर मंतर पर आए। उसके बाद मध्य प्रदेश के किसान संगठन दिल्ली आए। किसानों की शक्ल से भी अपरिचित मुंबई ने पिछले डेढ़ वर्षों में थोड़े ही अंतर से किसानों के दो बड़े जुलूस देखे और बांहें फैलाकर उनका स्वागत किया। अक्टूबर 2018 में पश्चिमी यूपी के संपन्न किसान भारतीय किसान यूनियन के बैनर तले दिल्ली पहुंचे। फिर 29-30 नवंबर को तमाम वामपंथी संगठन छोटे किसानों और खेतिहर मजदूरों को लेकर दिल्ली आए। इनकी आमद से किसानों का मुद्दा सत्ता के केंद्र में आ गया।



तीन राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों ने सत्ता संभालने के 24 घंटे के अंदर अपने-अपने यहां किसानों के कर्ज माफ करने की घोषणा कर दी। ऐन लोकसभा चुनाव से पहले के इस घटनाक्रम से किसानों का मुद्दा सभी राजनीतिक दलों के लिए खास हो गया है। बीजेपी ने अपनी नीतियों पर फिर से विचार शुरू कर दिया है। किसानों के मुद्दे को लेकर पार्टी में तमाम धर्मसंकट हैं। बीजेपी के रणनीतिकारों ने केंद्र सरकार को किसानों के लिए सरकारी खजाना खोलने जैसी बात कही है। लेकिन सरकार के पास इतना कम वक्त बचा है कि अगर वह योजनाओं की झड़ी लगा दे तो भी उनके क्रियान्वयन के लिए समय कब मिलेगा? किसान योजनाओं की घोषणा नहीं, उन पर अमल चाहता है।

बीजेपी के मुकाबले कांग्रेस और वामपंथी दलों ने किसानों के मुद्दों की सबसे ज्यादा मार्केंटिंग की है। हालांकि केंद्र की सत्ता में सबसे ज्यादा दिनों तक रहने के बावजूद कांग्रेस किसानों को मजबूत आधार नहीं दे सकी। मेट्रो, मारुति कार और कंप्यूटर तो कांग्रेस ले आई लेकिन किसानों के लिए ऐसी योजना नहीं ला सकी, जिसके लिए उसे याद रखा जा सके। मनरेगा के नतीजे अच्छे रहे थे लेकिन उसे यादगार योजना की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। यूपीए सरकार की एकमुश्त कर्जमाफी के बावजूद पंजाब-महाराष्ट्र में किसान कर्ज की वजह से खुदकुशी करते रहे। अभी कांग्रेस शासित तीन राज्यों में कर्ज माफी का कितना वास्तविक फायदा किसानों तक पहुंचेगा, इसका पता कुछ समय बाद चलेगा। लेकिन कांग्रेस के इस ऐक्शन से किसानों का मुद्दा मुखर जरूर हुआ है।

बीजेपी ने किसानों के मुद्दे पर कांग्रेस की गलतियों से कुछ भी नहीं सीखा। वह नेहरू, इंदिरा, राजीव, सोनिया, मनमोहन और राहुल गांधी को निशाना बनाती रही। इसके बजाय उसने खेती-किसानी को लेकर कांग्रेस की गलतियां सुधारने पर फोकस किया होता तो आज तस्वीर कुछ और होती। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 में बीजेपी ने किसानों से कर्जमाफी का वादा किया था। प्रचंड बहुमत पाकर योगी आदित्यनाथ ने कुर्सी संभाली तो उन्होंने अपना वादा पूरा भी किया। उन्होंने 11 लाख 93 हजार 224 छोटे और मंझोले किसानों का 7371 करोड़ रुपये का कर्ज माफ कर दिया। लेकिन कर्जमाफी की यह सुनहरी तस्वीर सिर्फ कागजों पर है। हकीकत में इसकी पात्रता को इतना तकनीकी बना दिया गया कि कहीं किसानों के दस रुपये कर्ज के रूप में माफ हुए, कहीं सौ रुपये तो कहीं पांच सौ रुपये। यूपी के विभिन्न विभागों में किसानों की नौ लाख अर्जियां कर्जमाफी को लेकर लंबित हैं।

बीजेपी को लगता है कि अयोध्या में मंदिर बनाने के लिए जगह-जगह जो धर्म संसद आयोजित की जा रही है, चुनाव में उसका बेड़ा इसी से पार हो जाएगा। किसान उसकी प्राथमिकता नहीं है। उसे लगता है कि धर्म एक ऐसा मुद्दा है जिस पर किसान भी अपनी खेती-वेती भूलकर पिघल जाएंगे। बीजेपी राष्ट्रीय स्वयंसेवक की राजनीतिक इकाई है। उसके अलावा संघ के ढेरों आनुषंगिक संगठन हैं, जिनके अजेंडे पर इस वक्त मंदिर के लिए धर्म संसद का आयोजन मुख्य विषय है। इसकी कमान विश्व हिंदू परिषद के पास है। 2016 से ही किसानों के मुद्दे के समानांतर मंदिर का मुद्दा सरगर्म है। अगर कोई घटनाक्रम का बारीकी से अध्ययन करे तो पाएगा कि जब-जब किसानों के बड़े प्रदर्शन हुए, तब-तब धर्म संसद आयोजित करके मंदिर के लिए हुंकार भरी गई।

दो ही विकल्प
दिल्ली के रामलीला मैदान में नवंबर में हुई धर्म संसद में आए कुछ युवकों से एक टीवी चैनल के पत्रकार ने पूछा कि उनके लिए रोटी-रोजी और किसान बड़ा मुद्दा है या अयोध्या में मंदिर। उन युवकों ने पूरे होशोहवास में जवाब दिया था कि मंदिर उनके लिए सबसे बड़ा मुद्दा है- ‘रोटी-रोजी आती रहेगी, पहले हमें मंदिर चाहिए।’ धर्म संसद का सिलसिला केंद्र में सत्ता मिलने के बाद ही शुरू हो गया था। आज देश के हर बड़े शहर में धर्म संसद का आयोजन हो रहा है। जाहिर है, चुनाव तक मंदिर निर्माण बड़ा मुद्दा बना रहेगा। अगले लोकसभा चुनाव में देश के सामने दो ही विकल्प होंगे कि उसे धर्म प्यारा है या किसान। ठहरकर सोचें तो धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय है जबकि किसान एक बड़े सरोकार से जुड़ता है। 2019 में तय करना होगा कि आप किस ओर खड़े हैं?


Sunday, December 9, 2018

इतिहासकार रामचंद्र गुहा को इस विवाद से क्या मिला...


इस प्रसिद्ध इतिहासकार का मेरे दिल में बहुत सम्मान है। उनके विचारों का मैं आदर करता हूं। लेकिन बीफ खाने वाला उनका ट्वीट और फोटो निहायत गैरजरूरी था। क्योंकि आप क्या खाते हैं, इससे शेष भारत को क्या लेना देना...और एक बड़े वर्ग की भावनाएं इस पर आहत होती हैं तो उन्हें ऐसा करने से परहेज करना चाहिए था। 

लेकिन संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों ने उन्हें जिस तरह जान से मारने की धमकी दे डाली, वह भी निंदनीय है।
हद यह है कि रॉ (रिसर्च एनॉलिसिस विंग) के एक रिटायर्ड अधिकारी तक ने उन्हें धमकी दी। बुलंदशहर हिंसा में एक फौजी का नाम आने के बाद और अब गुहा को धमकी देने में रॉ के पूर्व अधिकारी का नाम आने के बाद इन सेवाओं में काम करने वालों को लेकर चिंता पैदा होना स्वाभाविक है। अगर इन सेवाओं में कार्यरत लोग धर्म, जाति के आधार पर इस तरह की घटनाओं में हिस्सा लेंगे तो भारतीय समाज के लिए चिंताजनक स्थिति है। 

इतिहासकार गुहा ने शनिवार को अपने गोवा प्रवास का एक फोटो ट्विटर पर शेयर किया जिसमें वह बीफ (गाय का मांस) खाते नजर आ रहे हैं। साथ ही उन्होंने लिखा कि भाजपा शासित राज्य में बीफ खाना जश्न मनाने जैसा है। गुहा दरअसल यह बताना चाहते हैं कि भाजपा की दुरंगी चाल देखो...एक तरफ वह उत्तर भारत के राज्यों में गोकशी का खुलकर न सिर्फ विरोध करती है बल्कि आरएसएस के जरिए अपने अनुषांगिक संगठनों को आगे करके प्रदर्शन भी कराती है। आरोप है कि इस दौरान हिंसा भी होती है जो अन्तत: हिंदू-मुस्लिम दंगे में बदल जाती है। 

 ...जाहिर है इसका विरोध होना ही था। सोशल मीडिया पर भाजपा आईटी सेल के लोग हाथ धोकर उनके पीछे पड़ गए। रॉ के एक पूर्व अधिकारी ने गुहा को धमकियां दीं। गुहा साहब ने रविवार को अपना वो फोटो और ट्वीट डिलीट कर दिया। मेरे पास उसका स्क्रीन शॉट है लेकिन मैं उसे दोबारा पोस्ट करना जरूरी नहीं समझता हूं। लेकिन गुहा साहब से यह सवाल जरूर है कि अगर आपने डर कर ऐसा किया तो शेष भारत और खासकर मानसिकता विशेष के लोगों को शर्म महसूस करना चाहिए।...लेकिन जब आपको मालूम था कि इस पर हंगामा हो सकता है और ऐसी स्थितियां आ सकती थीं तो ट्वीट और फोटो के बजाय बीफ खाकर और गोवा के फाइव स्टार होटल में हग कर चले आते। उसके प्रचार की जरूरत क्या थी।

...मेरा वोट भाजपा को जाएगा...
मेरी मांग है कि देशभर में बीफ खाने पर पाबंदी लगनी चाहिए। ...मेरी इस मांग को सिर्फ और सिर्फ भाजपा पूरा कर सकती है। अगर वह अगले चुनाव में अपने घोषणापत्र में इसकी घोषणा करती है कि दोबारा सत्ता में आने पर वह पूरे देश में बीफ खाने और गोकशी बंद करने का कानून पास करेगी, तो मेरा और मेरे परिवार का वोट भाजपा को जाएगा।  

Monday, November 19, 2018

यौन शुचिता के मिथकों को ध्वस्त करती है 'देह ही देश'....जेएनयू में परिचर्चा


 'देह ही देश' को एक डायरी समझना भूल होगा। इसमें दो सामानांतर डायरियां हैं, पहली वह जिसमें पूर्वी यूरोप की स्त्रियों के साथ हुई ट्रेजडी दर्ज है और दूसरी में भारत है। यह वह भारत है जहाँ स्त्रियों के साथ लगातार मोलस्ट्रेशन होता है और उसे दर्ज करने की कोई कार्रवाई नहीं होती। सुप्रसिद्ध पत्रकार और सी एस डी एस के भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक अभय कुमार दुबे ने  कहा कि हमारे देश में मोलस्ट्रेशन की विकृतियों की भीषण अभियक्तियाँ निश्चय ही चौंकाने और डराने वाली हैं, जिनकी तरफ हमारा ध्यान 'देह ही देश' को पढ़ते हुए जाता है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र में "कड़ियाँ" संस्था द्वारा क्रोएशिया प्रवास पर आधारित प्रो. गरिमा श्रीवास्तव की पुस्तक "देह ही देश " पर आयोजित परिचर्चा में प्रो दुबे ने हिंसा और बलात्कार की घटनाओं पर वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर प्रसारित करने को भीषण सामाजिक विकृति बताया।


परिचर्चा में हिन्दू कालेज के डॉ पल्लव ने कहा कि यह पुस्तक संस्मरण, डायरी, रिपोर्ताज, यात्रा आख्यान और स्मृति के अंकन का मंजुल सहकार है। उन्होंने इसे यौन शुचिता के मिथकों को ध्वस्त करने वाली जरूरी किताब बताते हुए कहा कि शुद्धता की उन्मादी प्रवृत्ति के विरुद्ध 'देह ही देश' में नये जमाने की स्त्री की छटपटाहट है। 



राजधानी कॉलेज के डॉ राजीव रंजन गिरि ने कहा कि युद्ध इतिहास और कालखंड में तो समाप्त हो जाते हैं लेकिन भोगने वाले के चेतन और अवचेतन मन मे ताउम्र बना रहता है। उन्होंने कहा कि एक प्रकार के कट्टर राष्ट्रवाद की अवधारणा बढ़ती जा रही है जिसके फलस्वरूप युद्ध नीति के तौर पर बलात्कार की नीति को बढ़ावा मिल रहा है। सुप्रसिद्ध पत्रकार भाषा सिंह ने अपने कहा कि "देह ही देश" सुलगते सच से साक्षात्कार कराती है और युद्ध तथा उन्माद के इस समय में अपने शीर्षक को सार्थक करती है  



परिचर्चा में भारतीय भाषा केंद्र के अध्यक्ष प्रो. गोविंद प्रसाद, प्रो. रमण प्रसाद सिन्हा , प्रो. राजेश पासवान सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी और शोधार्थी मौजूद थे  आयोजन के अंत में श्रोताओं के सवालों के जवाब भी वक्ताओं द्वारा दिए गए। ज्ञातव्य है कि राजपाल एंड सन्ज़ द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक 2018 की बेस्ट सेलर साबित  हुई है।  कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी बृजेश यादव ने किया। अंत मे एम द्वितीय वर्ष  के छात्र चंचल कुमार ने सभी का आभार व्यक्त किया






फोटो और रिपोर्ट - चंचल कुमार 

Saturday, November 17, 2018

क्या इसे ‘रामराज्य’ कहते हैं ?

लेखक : पंकज त्रिवेदी,  ગુજરાતી - हिन्दी साहित्यकार एवं संपादक - विश्वगाथा (हिन्दी साहित्य की त्रैमासिक  प्रिंट पत्रिका)

छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी ने देशभक्त और बुद्धिमान होने के लिए अपनी ही एक परिभाषा दे दी। मनोज तिवारी ने कहा – “वे लोग देशभक्त और बुद्धिमान होते हैं, जिनकी माँ छठपूजा करती हैं। सोनिया गांधी ने कभी छठ पूजा नहीं की, अगर सोनिया जी ने छठ पूजा की होंती तो बड़ा बुद्धिमान..आता.. छठ की पूजा किया करिए आप लोग.. न कर सकें तो साथ में शामिल होइए।''
महिलाओं का सम्मान नहीं करने वाला ये सड़कछाप गवैया पहले भी एक शिक्षिका को मंच से अपमानित करते हुए उतरने का आदेश देकर कार्यवाही करने की धमकी दे चूका है। बहुत से राज्यों में छठ पूजा नहीं होती। गुजरात में भी नहीं होती तो क्या मोदी जी और अमित शाह को भी मनोज तिवारी ने उस कटघरे में खड़ा कर दिया, जिसके लिए उन्हों ने व्यंग्य किया था ! बीजेपी आलाकमान के आगे पीछे चलकर ये गवैया क्या साबित करना चाहता है? जनता यदि एक कलाकार का सम्मान करते हुए उसे सांसद बनने का मौका दे रही है इसका मतलब यह तो नहीं कि घमंड सर पे चढ़कर बोले। आप अगर सांसद बन गए है तो उसकी नींव में आपकी गायकी है। जनता उस लोक गायक को चाहते थे इसलिए चुनाव में जीताया है। किसी की माँ के लिए अपशब्द बोलने वाला यह मनोज तिवारी को ये पता होना चाहिए कि कलाकार माँ की कोख़ से पैदा होते हैं, सांसद नहीं !
ऐसी ही दूसरी घटना दिल्ली के सिग्नेचर ब्रिज के उद्घाटन से पहले बीजेपी सांसद मनोज तिवारी के हंगामे का मामला तूल पकड़ चूका था। इस प्रकरण में एक वीडियो सामने आया था, जिसमें आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान सांसद मनोज तिवारी को स्टेज से नीचे धक्का देते हुए दिख रहे थे। ध्यान हो कि मनोज तिवारी ने सिग्नेचर ब्रिज के उद्घाटन से पहले अपने साथ आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा बदसलूकी करने का आरोप लगाया था और एक पुलिसकर्मी को थप्पड़ जड़ दिया था। सोशल मीडिया पर मनोज तिवारी की कड़ी आलोचना हो रही थी। दरअसल महत्त्वपूर्ण बात यह है कि आप अगर नेता-अभिनेता बन गए तो क्या जनता पर अत्याचार करने का अधिकार मिल जाता है? जरुरी नहीं कि आप शारीरिक अत्याचार ही करें। अगर आप किसी का सरेआम अपमान करते हैं तो वो भी अत्याचार कहा जाएगा।
सलमान खान को काले हिरन और हीट एंड रन के मामले में जिस तरह से इस सरकार ने बचा लिया है, उस बात से जनता अनजान नहीं है। जब आप किसी व्यक्ति या प्राणी की जान ले लेते हैं तब अभिनेता होने के कारण सरकार बचा लेती है ! मोदी जी की सरकार ने सेलिब्रिटीज को उनकी प्रसिद्धि के अनुसार बीजेपी के गुणगान गाने के लिए रख दिया है। हो सकता है कुछ लोग खुशी से गए होंगे और कुछ लोग मजबूरन जुड़े होंगे। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन राजनीति में अपने मित्र और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कारण आएं और इलाहाबाद क्षेत्र से जीत भी प्राप्त की थी। उनके पिता कवि हरिवंशराय बच्चन सम्पूर्ण कांग्रेसी थे। ‘कुछ दिन तो गुज़ारो गुजरात में’ विज्ञापन के लिए अमिताभ जी ने पैसे नहीं लिए थे। तब मोदी जी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। अब वो प्रधानमंत्री बन गए तो नॉटबंदी और जीएसटी के कारण देश के उद्योगपति एवं बड़े व्यापारीओं पर शिकंजा कसने के हौवा दिखाकर मोदी जी ने अपनी ओर खींच लिया है। सोचने वाली बात यह है कि कायदे का डंडा दिखाकर मजबूर किया जाता है और अगर कोई समर्पण नहीं करते तो उनको परेशान किया जाता है। अप्रत्यक्ष रूप में यह इमरजंसी तो है।
सरकार किसी भी दल की हो, जनता का शोषण ही उनका मुख्य एजंडा रहा है। भ्रष्टाचार कांग्रेस सरकार में बहुत हुआ। जनता के गुस्से को देखकर मोदी जी के प्रति पूरे देश ने विश्वास जताया और रिकार्डब्रेक बहुमत दिलाकर प्रधानमंत्री बना दिया। इसका मतलब यह नहीं कि कोई भी प्रधानमंत्री देश का मालिक बन जाएं। सुप्रीमकोर्ट के पूर्व जस्टिस चेलामेश्वर ने गर्भित खुलासा किया है कि हम तीन जजों ने जो प्रेस कांफ्रेंस की थी उसका खुलासा एक वर्ष तक नहीं करूँगा । अदालतों में जजों की नियुक्ति में भी सरकार का हस्तक्षेप भी उस विवाद की जड़ में था । सीबीआई और आरबीआई के साथ सरकार की ज्यादती अब नई बात नहीं है। उत्तर कोरिया में किम जोंग-उन ने लोकतंत्र को ख़त्म करने के लिए क्रूरता का सहारा लिया था। हमारे यहाँ महंगाई, नॉटबंदी, रोजगारी और किसानों की आत्महत्या, हिन्दुत्त्व के नाम धर्म और जातिवाद से जनता के बीच असुरक्षा का खौफ़ पैदा कर दिया गया है। क्या इसे ‘रामराज्य’ कहते हैं? चुनाव से पहले मंदिर बनाने का वचन एजंडा में शामिल था। मंदिर कब बनेगा ये कोई नहीं जानता मगर 2019 का चुनाव यूपी केन्द्रित होगा। मोदी जी अपने भाषणों में जो तेवर दिखाते हैं, ‘ऐसा करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए..’ जैसे सवालों का जनता उत्साह से जवाब देती थी। अब लोग समझ गए हैं कि झूठ और ज्यादती का जवाब कैसे दिया जाएं। राहुल गांधी ने भी पिछले कुछ भाषणों में शिष्ट भाषा, संयम और मद्धम आवाज़ में जो कहा उसे जनता गौर से सुन रही है, समझ रही है। सता कभी भी पलट सकती है। आप किसी भी समय हीरो से जीरो हो सकते हो। आपके साथ चलने वाले और आपकी हाँ में हाँ मिलाने वाले दो ही पल में पलटी खायेगें। फिर सत्ता नहीं तो क्या करोगे। फिर तो आपके शब्द अनुसार ‘झोला’ लेकर निकलना पड़ेगा ।” 2019 में नतीजा ऐसा आएगा कि घमंडी वाणी-विलास के सामने संयमित और मुद्दे पर बात करने वाली कांग्रेस कांटे की टक्कर देगी। देश के अन्य प्रांतीय दल भी वर्त्तमान सरकार से नाराज़ है। यूपी, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ से भी अवांछित चुनावी परिणाम आ सकते है।  

Tuesday, November 13, 2018

ताकतवर को ऐसे दी जा सकती है चुनौती...देखिए यह विडियो

 अक्सर लोग सवाल करते हैं कि आखिर अपने से ताकतवर या मजबूत को चुनौती कैसे दी जाए। यह सवाल पूरी दुनिया में तब ज्यादा उठते हैं जब कोई देश, कोई सत्ता, कोई खलनायक अपनी ताकत के नशे में चूर हो जाता है। उस हालत या हालात में अगर उसे चुनौती नहीं मिलती है तो वह तानाशाह बन जाता है और हालात खतरनाक होते चले जाते हैं।...हालांकि इसका बहुत आसान सा जवाब है, जो हम सभी को मालूम है। लेकिन मैंने उसका जवाब एक विडियो के माध्यम से देने की कोशिश की है।
यह विडियो...

दुनियाभर में उन तमाम संघर्षशील लोगों, समाजिक राजनीतिक संगठनों, मुजाहिदीनों, एनजीओ, पत्रकारों, खिलाड़ियों, अर्बन नक्सलियों को समर्पित है, जिनमें ताकतवर से टकराने का हौसला है...इस हौसले को दो जंगली प्राणियों के जरिए बताया गया है...इसीलिए मैंने इस विडियो को नाम दिया है...डेयर टू फाइट Dare to Fight...अगर हौसला है तो इस दो मिनट के विडियो को पूरा देखिए...मजा न आए तो इनाम मिलेगा। मजा आए तो शेयर कीजिएगा...

ध्यान रहे यह कॉपीराइट विडियो है। आप इसके इस्तेमाल को आजाद हैं लेकिन वहां साभार लिखना और मुझसे लेना न भूलें। देखने में आया है कि कुछ साथी मेरी पोस्ट को हूबहू अपनी टाइमलाइन और व्हाट्सऐप पर शेयर करते हैं। यह अच्छी बात है। लेकिन मेरी पोस्ट को मुझसे जोड़कर अग्रसारित करेंगे तो किसी कानूनी पचड़े में फंसने से बच जाएंगे।...भारत सरकार रोजाना सोशल मीडिया पर अपना फंदा कसती जा रही है। अभी कल ही ट्विटर के अधिकारियों को धमकाया गया है। इसलिए सभी को सावधान रहने की जरूरत है।... आइए कुर्सीनशीनों सत्तानशीनों को चुनौती देने के लिए यह विडियो देखते हैं... 

Saturday, November 10, 2018

मुस्लिम विमर्श....एक पैगाम...

(वैसे तो यह पब्लिक पोस्ट है, कोई भी पढ़ सकता है लेकिन इसमें पैगाम सिर्फ मुसलमानों के नाम है...)

रात मेरे ख़्वाब में पैगंबर-ए-रसूल आए...मुझे उनका चेहरा तो नहीं दिखाई दिया लेकिन उनकी आवाज़ गूँजती रही और मैं सुनता रहा। उन्होंने यह पैग़ाम भारतीय मुसलमानों तक पहुँचाने को कहा है...

आए दिन ऐतिहासिक शहरों के नामकरण और भाजपा के मंदिर राग और कांग्रेस के साफ्ट हिंदुत्व के खेल के बावजूद अगर आप लोग शांत (मुतमइन) हैं तो आप लोगों को इस धैर्य को न खोने देने वाले जज़्बे को कई लाख सलाम...

आप लोग 2019 के चुनाव तक इसी धैर्य का परिचय दें। ...क्योंकि वोट के लिए मची जंग का सबसे घिनौना चेहरा अभी आना बाकी है...। वह सब होने वाला है, जिसकी आपने कल्पना नहीं की होगी।...हर दिन साजिशों से शुरू हो रहा है। लेकिन अगर आप लोग किसी उकसावे में नहीं आए तो यक़ीन मानिए बाकी ताक़तें अपने मकसद में नाकाम हो जाएंगी।

अभी आपको शिया-सुन्नी ...अशरफ़-पसमांदा...बरेलवी-देवबंदी-कादियानी-इस्माइली-खोजा-बोहरा, सैयद-पठान जैसे फ़िरक़ों या बिरादरी में बाँटने की हरचंद कोशिशें होंगी। मैंने अल्लाह की जो किताब तुम लोगों तक पहुंचाई उसमें सिर्फ सामाजिक समानता और सामाजिक न्याय (Social Equality and Social Justice) की बात लिखी गई है। दुनिया का कोई धार्मिक ग्रंथ सामाजिक समानता की बात नहीं करता। अल्लाह के लिए न कोई अव्वल है न अफजल। सब बराबर हैं।

आप सिर्फ और सिर्फ अल्लाह के रसूल की उम्मत समझकर एकजुट रहना है।

अभी जब आरएसएस ने संत सम्मेलन कराया तो उसे उम्मीद थी कि आप लोगों की तरफ से जबरदस्त प्रतिक्रिया होगी और पूरा माहौल बदल जाएगा। लेकिन आप लोगों की प्रतिक्रियाविहीन खामोशी ने उनका ब्लडप्रेशर बढ़ा दिया । उनकी पूरी रणनीति पर पानी फिर गया। उन्हें आप से ऐसी उम्मीद नहीं थी।...वो बेचैन हैं और एक बिफरा हुआ इंसान सौ गलतियां करता है। आप बस खामोशी से इस तमाशे को देखिए।

ये जो शहरों के नाम बदले जा रहे हैं और आप लोग चुप हैं, ये भी उनकी परेशानी का सबब बना हुआ है। शहरों का नाम बदलने से आप लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है, लेकिन सामने वाले पर इतना फर्क पड़ने वाला है कि उसकी कई पीढ़ियां याद रखेंगी। यही वजह है कि सामने वालों में बहुत बड़ी तादाद में समझदार लोग इसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं। लेकिन आपको हर हाल में खामोश रहना है। यहां तक कि जो लोग विरोध कर रहे हैं, उनके साथ भी शामिल नहीं होना है। ...आपको घेरने की हर कोशिश नाकाम हो जाएगी...अगर यह खामोशी बरकरार रही। ...यह उस तरफ के समझदार लोगों को सोचने दीजिए कि वो इन ताकतों का मुकाबला कैसे करेंगे।

...दरअसल, वो लोग जातियों में बंटे हुए हैं और उसी हिसाब से वे अपनी रणनीति बनाते हैं। उनकी जातियों के मसले आपके फिरकों से बहुत ज्यादा टेढ़े हैं। उनमें जो दबे कुचले लोग हैं, वो ढुलमुल यकीन हैं। कभी इस तरफ होते हैं तो कभी उस तरफ होते हैं। उनको सिर्फ इतना बता दिया गया है कि बस अपना आरक्षण बचा लो तो आप कामयाब रहोगे। उनकी कुल लड़ाई आरक्षण बचाने तक सिमट कर रह गई है। ...आरक्षण रहेगा तो भी आपको (मुसलमानों) कोई फायदा नहीं होगा और नहीं रहेगा तो भी कोई फायदा नहीं होगा। बीच-बीच में पसमांदा मुसलमानों की बात और उन्हें मिलने वाले आरक्षण की बात फैलाई जाती है, लेकिन हकीकत में किसी भी मुसलमान को आरक्षण का कोई लाभ किसी सूरत में न तो मिल रहा है और न मिलने वाला है।...वैसे भी अगर आप आरक्षण के सहारे जिंदगी बसर करने के बारे में सोच रहे हैं तो यह आपकी कमअक्ली के अलावा और कुछ नहीं है। इसलिए आप सभी के साथ रहें, जो आरक्षण विरोधी हैं और जो आरक्षण समर्थक हैं। 

आपकी तरक्की का राज कुरानशरीफ में छिपा है।...इल्म हासिल कीजिए। पढ़ा लिखा इंसान बड़ी से बड़ी दुनियावी ताकत को हरा सकता है। मुझे मालूम है कि आपको नौकरियां नहीं मिल रही हैं। लेकिन अगर आपके पास इल्म है और कोई रोजगार करना चाहते हैं तो बाकी लोगों के मुकाबले आप उस रोजगार बेहतर तरीके से कर सकेंगे।

पैगंबर के नाम पर आज से पूरी दुनिया में 9 दिसंबर तक पैगंबर दिवस मनाया जा रहा है। इस दौरान मैं आप लोगों को सुझाव दे रहा हूं कि आप लोग सारी राजनीति से किनारा करते हुए इस दौरान किसी भी सात दिन इन चीजों पर अमल करें।...

पहला दिन...
-पेड़ पौधे लगाएं और लोगों में बांटें
-जिन पेड़ों को पानी न मिल रहा हो, उन्हें पानी से सींचें
-अपने आसपास की सड़कों और नालियों को साफ करें
-इस पोस्ट का ज्यादा से ज्यादा प्रचार करें


दूसरा दिन...
-अपने पड़ोसियों और दोस्तों से मिलें, उन्हें कोई भी गिफ्ट दें
-सबील लगाएं और साधन संपन्न लोग गरीबों को जूस पिलाएं
-अपने आसपास रहने वाले गरीबों और जरूरतमंदों की किसी भी रुप में मदद करें

तीसरा दिन
-किसी यतीमखाने (अनाथालय) और ओल्ड ऐज होम (वृद्ध आश्रम) में जाएं
-अस्पताल और जेलों में जाएं
-वहां गरीबों के बीच खाना, कपड़ा, कंबल बांटें
-अगर हैसियत वाले हैं तो व्हीलचेयर, छड़ी या उनके काम आने वाला सामान बांटें

चौथा दिन
-आतंकवाद के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चलाकर जागरूकता फैलाएं
-स्कूलों में शांति मार्च आयोजित कराएं
-इस्लाम को शांति का मजहब बताते हुए विचार गोष्ठियां आयोजित करें, इससे संबंधित रिसर्च पेपर पढ़ें


पांचवां दिन...
-मुफ्त मेडिकल चेकअप कैंप लगाएं...यह पूरी तरह नॉन कमर्शल हो
-रक्तदान शिविर आयोजित करें
-लोगों को सेहत और सफाई के बारे में जागरूक करें

छठा दिन...
-सरकारी स्कूलों और स्पेशल बच्चों (मूक बधिर) के स्कूलों में जाएं और वहां स्टेशनरी बांटें
-जिनसे संभव हो सके वो स्कॉलरशिप बांटे...यानी कुछ पैसे गरीबों के बच्चों को दें
-पैगंबर की जिंदगी के बारे में स्कूल के बच्चों को बताएं, उनसे सवाल पूछें
-बच्चों को पढ़ाई और उनके करियर के बारे में जागरूक करें

सातवां दिन...
-पैगंबर के कोट्स या चुनिंदा कही बातों का वितरण करें
-अॉटो, रिक्शा, ईरिक्शा, कैब में बैठी सवारियों को कलम बांटें
-पोस्टर चिपकाएं, बैनर चिपकाएं
-शहर में कॉन्फ्रेंस और वर्कशॉप आयोजित करें
-इस पोस्ट का ज्यादा से ज्यादा प्रचार करें

वसीयत....
मैं फिर से ईद-ए-मोबाहिला में कही गई अपनी वसीयत दोहरा रहा हूं जिसे आप लोग भूलते जा रहे हैं...
-अगर कुरान और मेरे अहलेबैत का दामन थामे रहे तो भारत ही नहीं किसी भी दुनियां में तुम लोगों को शर्मिंदा नहीं होना पड़ेगा...तुम लोग जिंदा कौम की एक बेहतरीन मिसाल हो...अपनी ताकत को पहचानो।...

















Tuesday, November 6, 2018

कर्नाटक वाले निरे मूर्ख निकले...



आरएसएस - भाजपा के मंदिर आंदोलन पर इतना शोर शराबा किया जा रहा है...कि कर्नाटक में पार्टी को चार सीटें हारना पड़ीं। अगर यह शोर नहीं होता तो अपनी पार्टी की जीत तय थी। 

पिछले पाँच साल में कोई ऐसा दिन बताइए जब हमारी पार्टी और पिता तुल्य संगठन इस धंधे से पीछे हटे हों...यह उनकी ईमानदारी है। ...

ख़ैर, कर्नाटक में जो हुआ सो हुआ।अब तो उनको अपना काम करने दीजिए...उन्हें हर शहर में श्रीराम की मूर्ति लगाने और हर शहर में राम मंदिर बनाने में सब लोगों को मदद करनी चाहिए...

हम लोगों के लिए मूर्ति और मंदिर पहले होना चाहिए...रोटी, रोज़गार बाद मे देखेंगे...अगर समय मिला तो। वरना भूखे पेट भी तो भजन किया जा सकता है। 

कथित सेकुलर जमात के बदमाश यूसुफ़ किरमानी जैसों  से कोई पूछे कि भाजपा - आरएसएस के ख़िलाफ़ शोर मचाकर उन्होंने अब तक क्या तीर मार लिया...कितनी नालायक है यह सेकुलर जमात कि रोटी - रोज़ी की तुलना मंदिर और मूर्ति से कर रही है।

...जब हर शहर और गाँव में आंबेडकर की मूर्ति हो सकती है तो श्रीराम की क्यों नहीं? आंबेडकर को हर कोई नहीं मानता...राम को तो सब मानते हैं...बेचारे आंबेडकर वाले और दलित चिंतक भी राम को मानते हैं। क्या कांशीराम के नाम में नाम नहीं लगा था। आंबेडकर वाले सच्चे हैं, मौक़ा मिलते ही हमारी पार्टी को वोट देते हैं। हम राष्ट्रवादियों का जब तब मन होता है तो उनको लतिया भी देते हैं। बेचारे कुछ दिन नाराज़ रहने के बाद हमारे पाले में लौट आते हैं। 
...इनके कुछ चिंतक तो हमारे टुकड़ों पर पलते हैं। लतियाये जाने के बावजूद बेचारे सेवाभाव से लगे रहते हैं।...असली ख़तरा यह सेकुलर जमात है जो लाल झंडे वालों के साथ मिलकर सारे प्रपंच करती रहती है और हमारी पार्टी के लिए मुसीबत खड़ी करती रहती है।