Thursday, August 3, 2017

कहानी - घृणा ... मोक्ष

लेखक ः एस. रजत अब्बास किरमानी

दुष्यंत को मरे हुए एक महीना हो चुका था। उसकी बीवी धरा एक महीने से न ढंग से खा पाई थीे न ढंग से सो पाई थी, बस आंसुओं से उसके होने का पता चलता था। लोग तो यह तक सोच चुके थे कि जिस दिन आंसू बंद हुए, उस दिन धरा की आँखें भी बंद हो जाएंगी। इसीलिए उसके रोने पर कोई नहीं टोकता। हालांकि सब उसे सब्र रखने और ढारस देने की कोशिश करते मगर सब बेकार ही चला जाता।

लोगों के बीच हैरानी की बात यह नहीं थी कि दुष्यंत की मौत कैसे हुई, हैरानी इस बात पर थी कि किस वक़्त और किस मौके पर हुई।

धरा का अब एक बेटा रह गया था, श्रवण। उसकी हाल ही में सुधा से शादी हुई थी। मगर लोग कहते हैं कि शादी सही महुर्त पर नही हुई। दुष्यंत, अपने बेटे की ही शादी में चल बसा। ग़ौर ओ फ़िक्र इस बात पर है कि बेटे-बहू के सातवें फेरे लेते ही उसका दम निकला। कुछ लोगों ने यह तक मजाक बनाया कि उधर बेटा की नई जिंदगी शुरू हुई और इधर बाप दूसरी दुनिया में जिंदगी शुरू करने चला गया।

धरा अपने बेटे से इस बात पर खफा थी कि बाप के मरने के वक़्त उसने बस एक बार पीछे मुड़ कर देखा और फिर एक बेहिस की तरह पंडित को शादी की प्रक्रिया जारी रखने को कहा। और उसकी मां का मानना यह भी था कि अंतिम संस्कार में वह बेमन से शामिल हुआ।

वक़्त बीत गया। ...और वक़्त का नियम है कि वह गहरे से गहरा घाव भर देता है, मगर यही वक़्त रिश्तों की टूटी कड़ियों को अक्सर जोड़ नही पाता। ऐसा ही कुछ हुआ श्रवण और उसकी मां के बीच में। धरा के अन्दर उसके पति से बिछड़ने का घाव भर तो गया था, मगर उसके बेटे से रिश्तों की उलझी डोर सुलझने के बजाय टूट ही गई थी। हालांकि श्रवण ने एक बार अपनी मां को समझाने की कोशिश की, मगर मां ने गुस्से से दुत्कार कर उसे भगा दिया। दोनों के आपसी झगड़े का असर बेचारी सुधा पर पड़ा। श्रवण ने यह प्रस्ताव तक सुधा के सामने रखा कि मां से अलग रहते हैं, मगर वह अपनी आज्ञाकारी बहू की भूमिका निभाने से पीछे न हटी। ताने बर्दाश्त किए, बद्दुआएं तक सुनीं और हद तो यह हो गई थी कि अब कभी-कभी मां का हाथ भी उठ जाता था।

उसकी मां को तब बुरा लगता था जब दोनों घूमने जाते थे, या अगर उन दोनों की हंसी मजाक की आवाज़ आती तब भी वो उन्हें बद्दुआएं देती रहती थी। घर में नई कार आने तक का जश्न नहीं था। वह तो सुधा ने आसपड़ोस में मिठाई खरीद कर बांट दी। इधर, घर में अकेले पड़े-पड़े धरा खुद को एक नजरन्दाज की गई वस्तु की तरह समझने लगी थी। रिश्तेदारों का मानना था कि इसका असर उसके दिमाग़ी संतुलन पर भी पड़ा।

एक रोज़ धरा हद ही पार कर गई। वह अपने घर में ही जोर-जोर से चिल्लाने लगी कि सुधा उसकी जान लेना चाहती है। श्रवण का घर छोटा था और बाहर सख्त गर्मी होने के कारण सन्नाटा था। इसलिए आवाज़ आसपड़ोस के लोगों तक पहुंच गई। मगर जब सब घर में आए और देखा कि सुधा तो अपने मायके गई है तो धरा को सब मन ही मन पागल बोल कर चले गए।

जब यह घटना सुधा के मां-बाप ने सुनी तो उन्होंने उसे सुसराल भेजने से मना कर दिया। लेकिन सुधा ने जब जिद की और कसमें दीं तब कहीं श्रवण के साथ जाने दिया। 

घर का माहौल थोड़ा ख़राब होता जा रहा था, हर हफ़्ते धरा कुछ न कुछ उधम मचाती थी।



सुधा को बच्चा होने वाला था, आखिरी महीना चल रहा था। डॉक्टर लावण्या कह चुकी थी कि डिलीवरी कभी भी हो सकती है। ...और फिर वह दिन भी आ गया था जब सुधा को जल्दी क्लिनिक ले जाना पड़ा। सुधा पिछले 5-6 दिन से पेट में अजीब दर्द महसूस कर रही थी़। सुधा को ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया। ऑपरेशन हुआ, डॉक्टर और नर्सों ने पूरी जी जन लगा दी, मगर सुधा और बच्चे दोनों ही मर गए। डॉक्टर लावण्या ने कहा बच्चा कुछ दिन पहले ही मर चुका था और मां के अन्दर वो जहर फैल गया।

दोनों शव घर लाए गए। घर का माहौल गमगीन था। सुधा के मां-बाप का रोते-रोते बुरा हाल था। आस पड़ोस के लोग भी अफसोस में थे। आखिर होते क्यूँ नहीं, दिल में दर्द पैदा करने वाला दृश्य सामने था। ज़मीन पर दो की बजाय तीन लाशें पड़ी थीं। ...एक बच्चे की लाश थी जिसने दुनिया देखने से पहले मोक्ष पा लिया था। एक औरत की लाश थी जिसने एक विवाहित ज़िन्दगी की उलझनों के बाद मोक्ष पाया और एक आदमी बेहोशी के आलम में उसी औरत के बग़ल में लेटा हुआ शायद मोक्ष का इंतज़ार कर रहा था। ...आसपड़ोस के लोगों ने धरा को वहीँ लाश के सामने से घर के बाहर निकलते देखा। यह किसी से सुना गया कि धरा उस दिन रंगीन कपड़ा और चश्मा पहने बाहर निकली थी। ...वह उसके बाद कभी वापस घर नही आई, शायद उस दिन उसकी घृणा ने भी मोक्ष पा लिया था।


लेखक के बारे में
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एस. रजत अब्बास किरमानी शायर, कहानीकार होने के अलावा एडवरटाइजिंग और डिजिटल मीडिया फील्ड से जुड़े हुए हैं। फोटोग्राफी के अलावा लघु फिल्में बनाने में भी वह दिलचस्पी लेते हैं।

दिल्ली स्थित डॉन डिजिटल में रजत किरमानी क्रिएटिव एग्जेक्यूटिव के पद पर कार्यरत हैं। हिंदी में लेखन के अलावा वह अंग्रेजी में भी लिखते हैं। उनकी कुछ रचनाएं हिंदीवाणी ब्लॉग पर भी उपलब्ध हैं।