Thursday, June 29, 2017

नफरतों के कारोबार के खिलाफ लोग सड़कों पर

अब रोके से न रुकेगा यह सैलाब

भारत की यही खूबसूरती है कि फूट डालो और राज करो वाली चाणक्य नीति से राज चलाने वालों को समय-समय पर मुंहतोड़ जवाब देती है। भारत ने 28 जून को सिर्फ दिल्ली या मुंबई में ही यह जवाब नहीं दिया, बल्कि लखनऊ, पांडिचेरी, त्रिवेंद्रम, जयपुर, कानपुर, भोपाल...में भी नफरतों का कारोबार करने वालों को जवाब देने के लिए लोग भारी तादाद में जुटे।...यह आह्वान किसी राजनीतिक दल या सामाजिक संगठन का नहीं था, बल्कि एक फेसबुक पोस्ट के  जरिए लोगों से तमाम जगहों पर #जुनैद, #पहलू खान, #अखलाक अहमद, रामबिलास महतो की हत्या के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने के लिए कहा गया था। ...लोग आए और #सांप्रदायिक गुंडों को बताया कि देखो हम एक हैं...हम तुम्हारी फूट डालो और राज करो वाली #चाणक्य नीति से सहमत नहीं हैं...यानी Not In My Name (#NotInMyName)

आइए विडियो और फोटो के जरिए जानें और देखें कि लोगों ने किस तरह और किन आवाज में अपना विरोध दर्ज कराया...




जंतर मंतर दिल्ली पर हुए कार्यक्रम की कुछ तस्वीरें...















Sunday, June 25, 2017

मैं चलती ट्रेन में आतंक बेचता हूं...

मैं उन्माद हूं, मैं जल्लाद हूं
मैं हिटलर की औलाद हूं
मैं धार्मिक व्यभिचार हूं
मैं एक चतुर परिवार हूं

मैं चलती ट्रेन में आतंक बेचता हूं
मैं ट्रकों में पहलू खान खोजता हूं
मैं घरों में सभी का फ्रिज देखता हूं
मैं हर बिरयानी में बीफ सोचता हूं

मैं एक खतरनाक अवतार हूं
मैं नफरतों का अंबार हूं
मैं दोधारी तलवार हूं
मैं दंगों का पैरोकार हूं

मैं आवारा पूंजीवाद का सरदार हूं
मैं राजनीति का बदनुमा किरदार हूं
मैं तमाम जुमलों का झंडाबरदार हूं
मैं गरीब किसान नहीं, साहूकार हूं

मुझसे यह हो न पाएगा, मुझसे वह न हो पाएगा
और जो हो पाएगा, वह नागपुरी संतरे खा जाएगा
फिर बदले में वह आम की गुठली दे जाएगा 
मेरे मन को जो सुन पाएगा, वह "यूसुफ" कहलाएगा 

........कवि का बयान डिसक्लेमर के रूप में........
यह एक कविता है। लेकिन मैं कोई स्थापित कवि नहीं हूं। इस कविता का संबंध किसी भी राजनीतिक दल या व्यक्ति विशेष से नहीं है। हालांकि कविता राजनीतिक है। हम लोगों की जिंदगी अराजनीतिक हो भी कैसे सकती है। आखिर हम लोग मतदाता भी हैं। हम आधार कार्ड वाले लोगों के आसपास जब कुछ घट रहा होता है तो बताइए चुप रह सकते हैं भला। आपके उद्गार किसी न किसी रूप में सामने आएंगे ही। यह वही है। एक आम भारतीय सांप, गोजर, बिच्छू या गोदी में बैठे लोगों पर कविता तो नहीं लिख सकता, वह वही लिखेगा जो देखेगा।...इसलिए कविता पढ़ने के बाद सामान्य रहें। आंदोलित कतई न हों। बेहतर हो कि इन हालात को कैसे बदला जाए, इस पर गहनता से विचार करें...शेष अशेष...

@copyrightsYusuf Kirmani

Saturday, June 24, 2017

नफरतों का संगठित कारोबार...बल्लभगढ़ से श्रीनगर तक

Organized Hate Business from Ballabhgarh to Srinagar

चिदंबरम ने बतौर होम मिनिस्टर कभी कहा था कि देश में भगवा आतंकवाद फैल रहा है।...मैंने उस वक्त उनके उस बयान की बड़ी निंदा की थी, क्योंकि वह सच नहीं था।...लेकिन अभी अपने देश में जिस तरह एक भीड़ किसी को घेर कर इसलिए मार देती है कि उसने दाढ़ी रखी है... सिर पर टोपी है...और वह लोग मीट खाते हैं...तो इस अपराध को आप किस श्रेणी में रखना चाहेंगे।...
मेरे एक अभिन्न संघी मित्र घटना से आहत हैं और बार-बार लिख रहे हैं कि वह बल्लभगढ़ में ट्रेन में कुछ मुस्लिम युवकों पर हुए हमले और एक की हत्या से बहुत आहत हैं...लेकिन उनका आग्रह है कि इसे हिंदू आतंकवाद न कहा जाए....मैंने अपने मित्र से कहा कि न तो आपकी पोस्ट पर किसी ने ऐसा कमेंट किया और न ही मैंने आपसे ऐसा कहा...फिर आप परेशान क्यूं हैं....संघी मित्र का कहना है कि देर-सवेर यह मामला यही रूप लेगा और हिंदू आतंकवाद शब्द फिर से कहा जाने लगेगा। कम से कम उदार हिंदू जो हमारे काम से प्रभावित होकर हमारे साथ जुड़े हैं वे फिर छिटक जाएंगे...
....मैं नहीं जानता कि देश के बाकी मुसलमान बल्लभगढ़ की घटना को किस रूप में लेंगे और उनकी प्रतिक्रिया किस रूप में सामने आएगी लेकिन इतना जरूर है कि इस घटना को लेकर अगर उदार हिंदू चुप रह गए तो इस देश में नफरत फैलाने वाली ताकतें अपने मकसद में कामयाब हो जाएंगी।...यह साफ तौर पर सामने आ गया है कि केंद्र में एनडीए की सरकार आने के बाद ऐसे तत्वों के हौसले बुलंद हो गए हैं।...बल्लभगढ़ जैसी घटनाएं भारत नामक देश की बुनियाद को हिला देंगी।
बल्लभगढ़ की घटना हर उस मानवता प्रेमी शख्स को उद्वेलित कर देगी जो इंसाफ पसंद है।
आप ट्रेन में सफर करते होंगे। आप का आमना-सामना ऐसे लोगों से जरूर हुआ होगा, जिनकी भाषा, मज़हब, संस्कृति अलग-अलग होती है...क्या इस आधार पर कुछ लोगों का समूह मिलकर उनकी हत्या कर देगा।....क्या मुसलमानों का कोई समूह एक ऐसे शख्स की हत्या कर दे जिसने माथे पर चंदन लगा रखा हो और जेनेऊ पहन रखा हो...क्या ऐसे ही भारत की कल्पना हमारे पूर्वजों या स्वतंत्रता सेनानियों ने की थी। ...दरअसल, दूसरे धर्म से नफरत, दूसरी संस्कृति से नफरत, दूसरी भाषा से नफरत का जो संगठित कारोबार इस देश में चलाया जा रहा है, वह अब खतरनाक मोड़ पर आ पहुंचा है। अगर एक गिरोह सरकारी संरक्षण में पलेगा, बढ़ेगा तो आप दूसरे गिरोहों को गलत दिशा में मुड़ने से कहां तक और कब तक रोक पाएंगे। ...याद रखिए कांग्रेस से लेकर बीजेपी तक कोई भी राजनीतिक दल हो, धर्म से नफरत के संगठित कारोबार का फायदा उन्हें हुआ और कीमत जनता को चुकानी पड़ी। यानी अंधे होकर आज या कल हम जिन राजनीतिक नेता या संगठनों के पीछे खड़े हैं या खड़े थे...उसका फायदा किसे मिल रहा है...क्या यह आपको अगर नज़र नहीं आता...
जिस मुस्लिम लीग पार्टी के नेताओं ने या असददुद्दीन ओवैसी ने अपनी पार्टी मुसलमानों के नाम पर बनाई, वो खुद संसद में जा पहुंचे और मजे से माल-पानी उड़ा रहे हैं। आरएसएस ने अपना जो ताना-बाना बुना है, उसका भी अंति लक्ष्य सत्ता की प्राप्ति ही था, जिसके जरिए वो अपने मंसूबे अंजाम दे रहे हैं। संघ के चंद नेताओं को ही सत्ता सुख मिल रहा है, बाकी स्वयंसेवक बेचारे पहाड़ और रेगिस्तान की धूल फांककर हिंदू राष्ट्र के निर्माण में लगे हैं।...
ऐसे समय में जब दुनिया सिकुड़ रही है, तकनीक इंसान को एक दूसरे के करीब ला रही है तब मजहब के नाम पर राष्ट्र निर्माण कहां तक उचित है।...आप पुष्पक विमान उड़ाएं या हाथी के सूंड की सर्जरी की कल्पना करें या गाय के गोबर से बिजली पैदा करें...लेकिन सोचिए कि विश्व मानचित्र पर आप कहां खड़े हैं....इन नेताओं और बड़े-बड़े स्वयंसेवकों के बच्चे विदेशी की यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैं और करीम व मातादीन के बच्चों को वहीं मदरसा या संस्कारी स्कूल में कट्टर राष्ट्रवाद का जहर भरा जा रहा है।
बल्लभगढ़ की घटना क्या थी...चार मुस्लिम लड़के दिल्ली से ईद के सामान की खरीदारी करके लोकल ईएमयू ट्रेन से घर वापस लौट रहे थे। डेली पैसेंजर ओखला रेलवे स्टेशन से चढ़े, उन्होंने पहले जबरन सीट मांगी। उन चारों ने एक बुजुर्ग को बैठा भी लिया। लेकिन कुछ देर बाद ही मुल्ले कहकर और बीफ खाने वाले कहकर उन चारों को छेड़ा जाने लगा। उन मुस्लिम युवकों ने टोपी पहन रखी थी और दाढ़ी भी थी, उनके मुसलमान होने में किसी को संदेह नहीं था। इतने में छेड़खानी करने वालों में से एक ने थप्पड़ मारा। उन्होंने विरोध किया। इसके बाद 15-20 लोगों का समूह उन पर टूट पड़ा। फिर पूरा डिब्बा उन पर टूट पड़ा...लोग चाकू मारते जा रहे थे और बीफ खाने वाले मुल्ले कह रहे थे।...उस भीड़ में एक भी ऐसा शख्स नहीं था जो बाकी को रोकने की कोशिश करता या समझाता।
...जरा सोचिए, उन निहत्थे मुसलमानों पर जो भीड़ टूटी, क्या उसे एक संगठित गिरोह द्वारा बहकाया नहीं गया था कि अपने मनमाफिक सरकार है, जो चाहे करो। ....राष्ट्रवाद में हिंसा को जायज ठहराने वाले संगठित गिरोह दरअसल ऐसे लोगों का इस्तेमाल अपने मकसद को पूरा करने के लिए कर रहे हैं। जिनका इस्तेमाल होगा, उसका प्रतिफल हिंसा करने वालों को नहीं मिलेगा, बल्कि उनमें से कुछ पर मुकदमा चलेगा और कुछ जेल भी जाएंगे।....वो तारीख भुगतेंगे और संगठित गिरोह के लोग मलाई काट रहे होंगे।
मीडिया की भूमिका.
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राष्ट्रवाद के लिए हिंसा को रोकने में देश का प्रिंट व इलेक्टट्रॉनिक मीडिया बड़ी भूमिका निभा सकता है। लेकिन अफसोस कि अंध राष्ट्रवादियों के गिरोह ने अपने मकसद को पूरा करने के लिए सबसे पहला काम मीडिया पर कब्जा करने का किया। बल्लभगढ़ की घटना को हिंदी अखबारों ने या तो दबा दिया या तोड़ मरोड़कर छापा।...अंग्रेजी अखबारों ने थोड़ी हिम्मत दिखाई है लेकिन तोड़ मरोड़ वहां भी है।...टीवी पत्रकारिता उसी चीखने चिल्लाने की जगह खड़ी है और बल्लभगढ़ की घटना भी टीआरपी बढ़ाने का खेल बन गई है।...आपसे यह नहीं कहा जा रहा कि आप मिशनरी पत्रकारिता करो लेकिन यह उम्मीद की जाती है कि आप सच को बयान करेंगे या दिखाएंगे लेकिन पुलिस जो कह रही है, वही सच मान लिया गया है।
सरकार से क्या उम्मीद करें
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यह लेख लिखे जाने तक न तो हरियाणा सरकार ने और न ही केंद्र सरकार ने ट्रेन के अंदर हुए इस सांप्रदायिक मर्डर की निंदा की। यहां तक की कांग्रेस ने भी अपनी कोई जांच समिति बल्लभगढ़ नहीं भेजी। सीपीएम नेता वृंदा करात और सीपीएम के सांसद मोहम्मद सलीम जरूर बल्लभगढ़ पहुंचे। सीपीएम का जो काम है वह तो करेगी ही लेकिन बाकी राजनीतिक दलों को क्या हुआ...क्या बल्लभगढ़ की घटना निंदनीय भी नहीं है।....मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर क्या एक समुदाय विशेष के मुख्यमंत्री हैं...ये सवाल हैं जो मुख्य मीडिया में नहीं बल्कि सोशल मीडिया पर पूछे जा रहे हैं, जवाब कोई नहीं देता...

Tuesday, June 20, 2017

एक घोर सांप्रदायिक शख्स का राष्ट्रपति बनना...

देश की सत्तारूढ़ पार्टी भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी अन्य दलों ने बिहार के गवर्नर रामनाथ #कोविंद को #राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के रूप में चुना है। भारतीय इतिहास में इतने बड़े पद पर कभी इतने ज्यादा विवादित व्यक्तित्व के मालिक को इस पद का प्रत्याशी नहीं बनाया गया। कोविंद अभी चुने नहीं गए हैं लेकिन उनके विवादित और भ्रष्ट आचरण को लेकर तमाम आरोप सामने आ रहे हैं। लेकिन हम यहां कुछ ठोस मुद्दे पर बात करेंगे।

यह जो रामनाथ कोविंद है न...यह घोर #सांप्रदायिक हैं....कैसे....

2010 में इस कोविंद ने कहा था कि ईसाई और मुसलमान इस देश के लिए एलियन हैं। "Islam and Christianity are alien to the nation." यानी मुसलमान और ईसाई भारत में आए हुए दूसरे ग्रह के प्राणी हैं।
इस शख्स ने यह बात क्यों कही थी...

2010 में जस्टिस रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट आई थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को सरकारी नौकरियों में 15 फीसदी रिजर्वेशन दिया जाए। कोविंद तब बीजेपी के प्रवक्ता थे, उन्होंने मिश्रा आयोग की सिफारिशों का विरोध किया। उसी समय उन्होंने मुसलमानों और ईसाईयों के लिए यह बात कही थी।

मतलब कि भारत की आजादी की लड़ाई में जिस पार्टी का कभी कोई योगदान नहीं रहा, उस पार्टी के शख्स ने भारत की आजादी की लड़ाई में मुसलमानों और ईसाईयों की भूमिका को एक झटके में नकार दिया।...उसके आका जिस लालकिले की प्राचीर से हर 15 अगस्त को झंडा फहराते हैं, उस लालकिले को बनवाने वालों की भूमिका को भुला दिया...उसी लालकिले से जहां से बहादुर शाह जफर ने अंग्रेजों के खिलाफ जंग का ऐलान किया था...

भारत में #प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दो पद ऐसे हैं जिन पर बैठे शख्स से उम्मीद रहती है कि वे धर्म, जाति, भाईभतीजावाद, भ्रष्टाचार से ऊपर उठकर देश की सेवा करेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र #मोदी गुजरात की लंबी सेवा के बाद देश की सेवा कर रहे हैं और उनका अतीत और वर्तमान तमाम विवादों के दायरे में है। अब भाजपा या यूं कहें कि मोदी राष्ट्रपति पद पर भी ऐसे शख्स को बैठाने जा रहे हैं जिसकी घुट्टी में सांप्रदायिक सोच शामिल है।

जाहिर है कि भाजपा कोविंद को राष्ट्रपति भवन तक ले जाने में भी सफल रहेगी...लेकिन क्या ऐसे सांप्रदायिक व्यक्तित्व के मालिक का इस पद पर बैठना तर्कसंगत माना जाएगा।


यह भूल जाइए कि रामनाथ कोविंद के चयन का आधार दलित होना है। इनका चयन का आधार उन मासूम या नाजुक पलों के लिए किया गया है जहां किसी राष्ट्रपति की भूमिका निर्णायक होती है, जैसे प्रणब मुखर्जी करते रहे हैं...जैसा कभी जैल सिंह ने किया था...जैसा कभी के. आर. नारायणन (Kocheril Raman Narayanan) ने किया था। बता दें कि नारायणन भी दलित थे। सूची लंबी है, एपीजे अब्दुल कलाम, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. राधाकृष्णन की तो बात ही अलग थी।...बीजेपी ने रामनाथ का चयन करके राष्ट्रपति पद की गरिमा को बहुत बड़ा झटका दिया है। ...जिस तरह से बाकी संस्थान रसातल में जाते दिख रहे हैं...यह उसी की अगली कड़ी है। किसी भी पार्टी का अधिकार है कि वह इस पद के लिए अपना प्रत्याशी घोषित करे लेकिन कम से कम गरिमा का ख्याल तो किया ही जाना चाहिए।


भ्रष्ट बंगारू का समर्थन...
फर्स्ट पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक #बीजेपी के कभी #दलित चेहरा रहे बतौर पार्टी प्रेसीडेंट बंगारू को जब एक लाख की रिश्वत लेते पकड़ा गया तो अदालत में इन्हीं कोविंद महाराज ने हलफनामा दिया था कि बंगारू को वह 20-25 साल से जानते हैं और वह रिश्वतखोर नहीं हैं। आप लोगों को शायद याद होगा कि बंगारू रिश्वत लेते हुए कैमरे में कैद हुए थे, उनका स्टिंग किया गया था। बंगारू चूंकि दलित थे, इसलिए कोविंद ने दलित होने की वजह से बंगारू की मदद के लिए वह हलफनामा दिया था। लेकिन जब एक शख्स को कैमरे में रिश्वत लेते हुए कैद किया जा चुका हो, ऐसे में सिर्फ जाति के आधार पर किसी का समर्थन करना क्या नैतिकता के दायरे में आता है...

बहरहाल, देश की भाग्यविधाता अब भारत की जनता नहीं है....वह भाग्यविधाता अब प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और भारत के चीफ जस्टिस हैं।...जिनके फैसले जनता के सामने हैं।



Reference : First Post