Wednesday, March 29, 2017

महिलाओं पर अत्याचार को बतातीं 4 कविताएं



ये हैं परितोष कुमार  'पीयूष' जो बिहार में जिला मुंगेर के जमालपुर निवासी है। हिंदीवाणी पर पहली बार पेश उनकी कविताएं नारीवाद से ओतप्रोत हैं। ...लेकिन उनका नारीवाद किसी रोमांस या महिला के नख-शिख का वर्णन नहीं है।...बल्कि समाज में महिलाओं पर होने वाले अत्याचार पर उनकी पैनी नजर है। गांव के पंचायत से लेकर शहरों में महिला अपराध की कहानियां या समाचार उनकी कविता की संवेदना का हिस्सा बन जाते हैं।...उनकी चार कविताओं में ...आखिर मैं पीएचडी नहीं कर पायी...मुझे बेहद पसंद है।

बीएससी (फिजिक्स) तक पढ़े परितोष की रचनाएं तमाम साहित्य पत्र-पत्रिकाओं में, काव्य संकलनों में प्रकाशित हो चुकी हैं। वह फिलहाल अध्ययन व स्वतंत्र लेखन में जुटे हुए हैं।




ठगी जाती हो तुम !

पहले वे परखते हैं
तुम्हारे भोलेपन को
तौलते हैं तुम्हारी अल्हड़ता
नांपते हैं तुम्हारे भीतर
संवेदनाओं की गहराई

फिर रचते हैं प्रेम का ढोंग
फेंकते है पासा साजिश का
दिखाते हैं तुम्हें
आसमानी सुनहरे सपने

जबतक तुम जान पाती हो
उनका सच उनकी साजिश
वहशी नीयत के बारे में
वे तुम्हारी इजाजत से
टटोलते हुए
तुम्हारे वक्षों की उभारें
रौंद चुके होते हैं
तुम्हारी देह

उतार चुके होते हैं
अपने जिस्म की गर्मी
अपने यौवन का खुमार
मिटा चुके होते हैं
अपने गुप्तांगों की भूख

और इस प्रकार तुम
हर बार ठगी जाती हो
अपने ही समाज में
अपनी ही संस्कृति में
अपने ही प्रेम में
अपने ही जैसे
तमाम शक्लों के बीच





खर-पतवारों के बीच!
                                
                                                                                    

बदहाली की मात्रक
फटेहाली की पैदाइश
वो नन्हें कदमों से
परचून की दूकान जाते वक्त

जब खींच ली गई होगी
सड़क किनारे से
खर-पतवारों के बीच
सुनसान जंगली खेतों में

कितनी
छटपटायी होगी
कितनी
मिन्नतें मांगी होंगी
आबरू बचा लेने की खातिर

कैसा लगा होगा उसे
जब उसकी सुनने वाला
कोई नहीं होगा
उसकी अपनी ही आवाज
डरावनी चीखों में तब्दील हो
लौटती होगी कानों में

उसका हर एक विरोध
जब उत्तेजित करता होगा
मानवी गिद्धों के झुंड को
उसके सारे सपने
सारी आकांक्षाओं ने
दम तोड़ दिये होंगे

और वह ढ़ीली,
निढाल पड़ गयी होगी
मानवी गिद्धों की पकड़ में
जिस्म पर बचे कपड़ों के
चंद फटे टुकड़ों के साथ

उसकी खुली आँखों के सामने
हो रहा था
उसके अंगों का बँटवारा
आपस में गिद्धों के बीच

शायद उसे पता चल चुका था
परसों रात भी यही हुआ होगा
नीम के पेड़ से लटकी
रज्जो की लाश के साथ

जिसे आत्महत्या
साबित कर दिया था
समाज के कद्दावर लोगों ने
पंचायत की चौकी पर


सुनवायी के दौरान !
                                                                                                        
                                                                                     

                        
हमारे देश की
लोकतांत्रिक कचहरी में
काले लबादों के बीच
जब भी/प्रायः मुकदमों में
बलात्कार की सुनवायी होनी होती है
बहुत ही भद्दे, बेहूदे
और वाहयात किस्म के
प्रश्न पूछे जाते हैं।

क्रमानुसार देने होते हैं
पीड़िता को सारे जवाब
प्रदर्शित करने होतें हैं
हर एक जख्मी अंगों को
दिलाने होते हैं एहसास सिहरनों के
दर्ज करानी होती है
सिसकियों की गिनतियाँ
रेपिस्टों की संख्या
और वस्त्रों की बारीकियां

इस प्रकार
फिर एक बार किया जाता है
आभासी बलात्कार
पीड़िता के साथ
न्याय की काली कोठरी में

फिर सुनवायी की
अगली तारीख पर
रिहा कर दिया जाता है
बलात्कारियों को
चश्मदीद के अभाव में।

और वो चल पड़ते हैं
स्वच्छंद वा उन्मुक्त
नये शिकार की खोज में


आखिर मैं पीएचडी नहीं कर पायी!                                                                             


                                                                                                       
                                            

                                                                                                     
आखिर मैं
पीएचडी
नहीं कर पायी।

एम०ए० की कक्षा में
जिस प्रोफेसर ने
मेरी फेक आईडी
फेसबुक पर बनाई
उन्हीं के पल्ले मैं
पीएचडी में आई।

शोध के मेरे टॉपिक
'फेमीनिज्म' पर
डिस्कशन क्लास के नाम
उस गाइड ने
खूब आभासी मस्तियाँ लूटीं।

अन्य शोधार्थियों ने भी
कमरतोड़ मेहनत की
कुछ ने मालिश किए
कुछ ने जूते पॉलिश किए
किसी ने बनियान धोये
किसी ने गेहूँ पिसाए।

थीसिस पास करने के
अश्वासन दे-देकर
उस गाइड ने आये दिन
अपनी बीवी के
पेटीकोट सिलवाये
पीएचडी की लालच में
मैंने भी अपने अत्याधुनिक
कौशल खूब दिखलाए
और फेलोशिप के पैसे भी
बीवी की चकमक
साड़ियों में जगमगाए।

अभी-अभी
दो साल बीते ही थे कि
देर रात गाइड के
स्वीटहार्ट
और जानू वाले
मैसेज आने लगे।

अपनी थीसिस की खातिर
मैंने उसे भी
नजरअंदाज किया
लेकिन बात यहाँ
रुकी कहां।

अगली ही शाम
उस गाइड के
बुढ़ापे की डूबती जवानी ने
अपना परचम लहराया।

फिर क्या था
मैंने अपनी थीसिस फाड़
गाइड के मुंह पर लहराया
घर की ओर
कदम बढ़ाया।

और
आखिर मैं
पीएचडी
नहीं कर पायी।
                                                                                                                                                                                                                         


-परितोष कुमार 'पीयूष'
ईमेल- piyuparitosh@gmail.com

8 comments:

Shahnaz Imrani said...

आख़िर मैं पीएचडी नहीं कर पायी !!
बढ़िया और विरोध को दर्शाती कविता अच्छी लगी।

paritosh kumar piyush said...

शुक्रिया

वत्सला पाण्डेय said...

बहुत खूब पीयूष...👏👏👏👏👏

Paritosh Kumar Piyush said...

शुक्रिया

Paritosh Kumar Piyush said...
This comment has been removed by the author.
Anonymous said...

मैं क्या कहूँ पारितोष तुम्हें बस निःशब्द हूँ ।हर कविता अपने आप में सच्चाई उकेरती हुई बेहतरीन है ।यूँ ही आगे बढ़ते रहो बस लिखते रहो लिख़ने वालों की संख्या बहुत है पर तुम वही लिखना जो मन को छू जाएं ।

Paritosh Kumar Piyush said...

शुक्रिया

Paritosh Kumar Piyush said...

शुक्रिया