Thursday, August 3, 2017

कहानी - घृणा ... मोक्ष

लेखक ः एस. रजत अब्बास किरमानी

दुष्यंत को मरे हुए एक महीना हो चुका था। उसकी बीवी धरा एक महीने से न ढंग से खा पाई थीे न ढंग से सो पाई थी, बस आंसुओं से उसके होने का पता चलता था। लोग तो यह तक सोच चुके थे कि जिस दिन आंसू बंद हुए, उस दिन धरा की आँखें भी बंद हो जाएंगी। इसीलिए उसके रोने पर कोई नहीं टोकता। हालांकि सब उसे सब्र रखने और ढारस देने की कोशिश करते मगर सब बेकार ही चला जाता।

लोगों के बीच हैरानी की बात यह नहीं थी कि दुष्यंत की मौत कैसे हुई, हैरानी इस बात पर थी कि किस वक़्त और किस मौके पर हुई।

धरा का अब एक बेटा रह गया था, श्रवण। उसकी हाल ही में सुधा से शादी हुई थी। मगर लोग कहते हैं कि शादी सही महुर्त पर नही हुई। दुष्यंत, अपने बेटे की ही शादी में चल बसा। ग़ौर ओ फ़िक्र इस बात पर है कि बेटे-बहू के सातवें फेरे लेते ही उसका दम निकला। कुछ लोगों ने यह तक मजाक बनाया कि उधर बेटा की नई जिंदगी शुरू हुई और इधर बाप दूसरी दुनिया में जिंदगी शुरू करने चला गया।

धरा अपने बेटे से इस बात पर खफा थी कि बाप के मरने के वक़्त उसने बस एक बार पीछे मुड़ कर देखा और फिर एक बेहिस की तरह पंडित को शादी की प्रक्रिया जारी रखने को कहा। और उसकी मां का मानना यह भी था कि अंतिम संस्कार में वह बेमन से शामिल हुआ।

वक़्त बीत गया। ...और वक़्त का नियम है कि वह गहरे से गहरा घाव भर देता है, मगर यही वक़्त रिश्तों की टूटी कड़ियों को अक्सर जोड़ नही पाता। ऐसा ही कुछ हुआ श्रवण और उसकी मां के बीच में। धरा के अन्दर उसके पति से बिछड़ने का घाव भर तो गया था, मगर उसके बेटे से रिश्तों की उलझी डोर सुलझने के बजाय टूट ही गई थी। हालांकि श्रवण ने एक बार अपनी मां को समझाने की कोशिश की, मगर मां ने गुस्से से दुत्कार कर उसे भगा दिया। दोनों के आपसी झगड़े का असर बेचारी सुधा पर पड़ा। श्रवण ने यह प्रस्ताव तक सुधा के सामने रखा कि मां से अलग रहते हैं, मगर वह अपनी आज्ञाकारी बहू की भूमिका निभाने से पीछे न हटी। ताने बर्दाश्त किए, बद्दुआएं तक सुनीं और हद तो यह हो गई थी कि अब कभी-कभी मां का हाथ भी उठ जाता था।

उसकी मां को तब बुरा लगता था जब दोनों घूमने जाते थे, या अगर उन दोनों की हंसी मजाक की आवाज़ आती तब भी वो उन्हें बद्दुआएं देती रहती थी। घर में नई कार आने तक का जश्न नहीं था। वह तो सुधा ने आसपड़ोस में मिठाई खरीद कर बांट दी। इधर, घर में अकेले पड़े-पड़े धरा खुद को एक नजरन्दाज की गई वस्तु की तरह समझने लगी थी। रिश्तेदारों का मानना था कि इसका असर उसके दिमाग़ी संतुलन पर भी पड़ा।

एक रोज़ धरा हद ही पार कर गई। वह अपने घर में ही जोर-जोर से चिल्लाने लगी कि सुधा उसकी जान लेना चाहती है। श्रवण का घर छोटा था और बाहर सख्त गर्मी होने के कारण सन्नाटा था। इसलिए आवाज़ आसपड़ोस के लोगों तक पहुंच गई। मगर जब सब घर में आए और देखा कि सुधा तो अपने मायके गई है तो धरा को सब मन ही मन पागल बोल कर चले गए।

जब यह घटना सुधा के मां-बाप ने सुनी तो उन्होंने उसे सुसराल भेजने से मना कर दिया। लेकिन सुधा ने जब जिद की और कसमें दीं तब कहीं श्रवण के साथ जाने दिया। 

घर का माहौल थोड़ा ख़राब होता जा रहा था, हर हफ़्ते धरा कुछ न कुछ उधम मचाती थी।



सुधा को बच्चा होने वाला था, आखिरी महीना चल रहा था। डॉक्टर लावण्या कह चुकी थी कि डिलीवरी कभी भी हो सकती है। ...और फिर वह दिन भी आ गया था जब सुधा को जल्दी क्लिनिक ले जाना पड़ा। सुधा पिछले 5-6 दिन से पेट में अजीब दर्द महसूस कर रही थी़। सुधा को ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया। ऑपरेशन हुआ, डॉक्टर और नर्सों ने पूरी जी जन लगा दी, मगर सुधा और बच्चे दोनों ही मर गए। डॉक्टर लावण्या ने कहा बच्चा कुछ दिन पहले ही मर चुका था और मां के अन्दर वो जहर फैल गया।

दोनों शव घर लाए गए। घर का माहौल गमगीन था। सुधा के मां-बाप का रोते-रोते बुरा हाल था। आस पड़ोस के लोग भी अफसोस में थे। आखिर होते क्यूँ नहीं, दिल में दर्द पैदा करने वाला दृश्य सामने था। ज़मीन पर दो की बजाय तीन लाशें पड़ी थीं। ...एक बच्चे की लाश थी जिसने दुनिया देखने से पहले मोक्ष पा लिया था। एक औरत की लाश थी जिसने एक विवाहित ज़िन्दगी की उलझनों के बाद मोक्ष पाया और एक आदमी बेहोशी के आलम में उसी औरत के बग़ल में लेटा हुआ शायद मोक्ष का इंतज़ार कर रहा था। ...आसपड़ोस के लोगों ने धरा को वहीँ लाश के सामने से घर के बाहर निकलते देखा। यह किसी से सुना गया कि धरा उस दिन रंगीन कपड़ा और चश्मा पहने बाहर निकली थी। ...वह उसके बाद कभी वापस घर नही आई, शायद उस दिन उसकी घृणा ने भी मोक्ष पा लिया था।


लेखक के बारे में
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एस. रजत अब्बास किरमानी शायर, कहानीकार होने के अलावा एडवरटाइजिंग और डिजिटल मीडिया फील्ड से जुड़े हुए हैं। फोटोग्राफी के अलावा लघु फिल्में बनाने में भी वह दिलचस्पी लेते हैं।

दिल्ली स्थित डॉन डिजिटल में रजत किरमानी क्रिएटिव एग्जेक्यूटिव के पद पर कार्यरत हैं। हिंदी में लेखन के अलावा वह अंग्रेजी में भी लिखते हैं। उनकी कुछ रचनाएं हिंदीवाणी ब्लॉग पर भी उपलब्ध हैं।

Thursday, July 13, 2017

आतंकवाद के बीज से आतंकवाद की फसल ही काटनी पड़ेगी

- स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर, सलाहकार संपादक, द इकोनॉमिक टाइम्स 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी आतंकवाद को नियंत्रित करने और इसे खत्म करने पर काफी कुछ कहते रहते हैं। लेकिन आतंकवाद की सही परिभाषा क्या है ? डिक्शनरी में इसकी परिभाषा बताई गई है – अपना राजनीतिक मकसद पूरा करने के लिए खासतौर पर नागरिकों के खिलाफ हिंसा और धमकी का गैरकानूनी इस्तेमाल।
इस परिभाषा के हिसाब से जो भीड़ बीफ ले जाने की आशंका में लोगों को पीट रही है और जान से मार रही है, वह लिन्चिंग मॉब (जानलेवा भीड़) दरअसल आतंकवादी ही हैं। कश्मीर में भी जो लोग इस तरह पुलिसवालों की हत्या कर रहे हैं वह भी वही हैं। जान लेने वाली यह सारी भीड़ अपने धार्मिक-राजनीतिक मकसदों के लिए नागरिकों के खिलाफ गैरकानूनी हिंसा का सहारा ले रही है। यह सभी लोग आतंकवादी की परिभाषा के सांचे में फिट होते हैं।


हालांकि बीजेपी में बहुत सारे लोग इससे सहमत नहीं होंगे। वह कहेंगे कि हिंदुओं की भावनाएं आहत हुई हैं और बीफ विरोधी हिंसा को समझने की जरूरत है। कश्मीर में हुर्रियत भी मारे गए पुलिसवालों की मौत पर घड़ियाली आंसू बहाएगी और कहेगी कि भारतीय सेना जिस तरह कश्मीर में लोगों का दमन कर रही है, इसे उस संदर्भ में देखा जाना चाहिए। बचाव में दिए जा रहे ऐसे तर्क उसी तरह भोथरे हैं जैसे अलकायदा और आईएसआईएस के आतंकी भी हरकतों के लिए तर्क गढ़ते रहे हैं।
15 साल के जुनैद की हत्या का अपराध सिर्फ उसके मुस्लिम होने पर किया गया। लेकिन मोदी ने लंबी चुप्पी के बाद इसकी निंदा की। उनके कई मंत्रियों ने भी निंदा की। लेकिन एेसी लिन्च मॉब अचानक हवा में नहीं पैदा हुई, तीन साल के बीजेपी शासनकाल के दौरान सामाजिक-राजनीतिक माहौल को जिस तरह खाद पानी देकर सींचा गया यह उसी की देन हैं।
सांप्रदायिकता और अंध राष्ट्रवाद के खतरनाक तालमेल ने हालात को बदतर कर दिया है। इधर मोदी ने शांति की अपील की और उधर झारखंड में गौरक्षकों ने एक और मुस्लिम की हत्या कर दी। यह बताता है कि बोतल से बाहर निकले जिन्न को वापस बोतल में बंद करना कितना मुश्किल है।   
मुझे डर है कि अगर इसे जल्दी नहीं रोका गया तो कहीं हिंदू आतंक का मुस्लिम आतंक से आमना-सामना न हो जाए और पूरे देश में आग की लपटें दिखाई दें। अगर सरकार मुसलमानों की हिफाजत नहीं कर सकती तो इस बात का बहुत बड़ा खतरा है कि मुसलमान अपनी हिफाजत के लिए दस्ते न तैयार कर लें। इन हालात में हिंदू-मुस्लिम आतंक और बढ़ेगा और सरकार असहाय होकर सिर्फ तमाशा देखेगी।  
मोदी दुनिया को भारत की छवि एक ग्लोबल मैन्यूफैक्चरिंग हब के रूप में बेचना चाहते हैं। लेकिन अगर भारत की सबसे तेजी से बढ़ने वाली इंडस्ट्री लिन्च मॉब हो जाएगी तो यह नामुमकिन है। अर्थशास्त्री दानी रोड्रिक ने बताया है कि किसी भी देश की आर्थिक तरक्की उसके आंतरिक संघर्षों पर काबू पाकर ही हो सकती है। आजादी के बाद से ही भारत अपने आंतरिक संघर्षों को काफी हद तक काबू करता रहा है और इस वजह से बेहतर सामाजिक व आर्थिक नतीजे देश को मिले। लेकिन यह उपलब्धि अब खतरे में है।
 15 साल पहले यूएस के तत्कालीन राष्ट्रपति ने भारत को इस बात के लिए बधाई दी थी कि भारत में 150 मिलियन मुस्लिम होने के बावजूद कोई आतंकवादी नहीं है। हो सकता है कि उन्होंने बहुत बढ़ाचढ़ा कर यह बात कही हो लेकिन यह तारीफ भी किसी ने ऐसे ही नहीं कर दी थी। 2001 से जिस तरह से पूरा विश्व आतंकवाद की चपेट में आया, इसमें भारतीय मुसलमानों की छवि बेदाग रही है। तमाम राजनीतिक प्रयासों की वजह से यह संभव हुआ था और अल्पसंख्यकों ने भी माना कि भारत उनका भी है। लेकिन अफसोस है कि बढ़ते लिन्च मॉब ने अब उस युग के अंत होने का संकेत दे दिया है।
पूरे पश्चिम देशों में छोटे-छोटे मुस्लिम आतंकी गुटों ने भारी तबाही मचा रखी है। ये ग्रुप पैदा भी वहीं हुए हैं। उन्हें आईएसआईएस या किसी विदेशी एजेंसी से पैसे या मदद की दरकार नहीं है। इंटरनेट पर बम बनाने का तरीका और इसकी विशेषज्ञता मौजूद है। आतंकवाद इस्लाम की देन नहीं है। भारत की तरह पश्चिमी देशों में भारी तादाद में मुसलमान कानून को मानने वाले लोग ही है। लेकिन जहां मामूली मुस्लिम आबादी भी है वहां आतंकवादी भारी खतरा बने हुए हैं। इन सवालों पर गहराई से विचार करने की जरूरत है।
भारत में मुस्लिम आबादी अब करीब 180 मिलियन है। मान लीजिए कि इस आबादी में से सिर्फ 0.01 फीसदी ही मुस्लिम आतंकवाद को अपना लें तो कल्पना कीजिए कितनी तबाही मच जाएगी। और अगर 0.01 फीसदी हिंदू यह मान लें कि 0.01 फीसदी मुसलमानों की हिंसा के लिए सारे मुसलमान जिम्मेदार हैं तो सोचिए कि भारत में सांप्रदायिक आतंकवाद कहां तक पहुंचेगा। ऐसे में अगर हिंदू-मुसलमानों की 99.99 फीसदी आबादी इस तरह के अपराधों से नफरत भी करे तो भी हालात को बिगड़ने से कोई रोक नहीं पाएगा। यह तभी संभव है जब सारे विजिलेंट ग्रुपों को सख्ती से रोक न दिया जाए।
दाउद इब्राहिम ने मुंबई बम ब्लास्ट ऐसे ही नहीं कर दिया था। दो बड़ी घटनाएं इसके लिए जिम्मेदार थीं। 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद देशभर में बड़े पैमाने पर मुस्लिम विरोधी दंगे हुए। इसके बाद 1993 में मुंबई में शिवसेना की महाआरती के दौरान दंगे हुए। मुंबई में 13 स्थानों पर बम विस्फोट हुए, जिसमें शिवसेना का मुख्यालय भी था। संयोग से यह हिंसा और नहीं बढ़ी और लोगों का गुस्सा धीरे-धीरे शांत हो गया।
अगर अब हिंदू-मुस्लिम आतंक बढ़ता है तो उसे आसानी से रोक पाना मुश्किल होगा। मुझे डर है कि जो लोग हिंदू हिंसा का बीज बो रहे हैं वो बदले में मुस्लिम हिंसा की फसल काटेंगे। इसी तरह जो मुस्लिम हिंसा का बीज बो रहे हैं वो हिंदू हिंसा की फसल काटेंगे। यह अनवरत सिलसिला है जो फैलता चला जाएगा।
(मूल लेख अंग्रेजी में, अनुवाद - यूसुफ किरमानी)
मूल लेख द इकोनॉमिक टाइम्स पर उपलब्ध


Thursday, June 29, 2017

नफरतों के कारोबार के खिलाफ लोग सड़कों पर

अब रोके से न रुकेगा यह सैलाब

भारत की यही खूबसूरती है कि फूट डालो और राज करो वाली चाणक्य नीति से राज चलाने वालों को समय-समय पर मुंहतोड़ जवाब देती है। भारत ने 28 जून को सिर्फ दिल्ली या मुंबई में ही यह जवाब नहीं दिया, बल्कि लखनऊ, पांडिचेरी, त्रिवेंद्रम, जयपुर, कानपुर, भोपाल...में भी नफरतों का कारोबार करने वालों को जवाब देने के लिए लोग भारी तादाद में जुटे।...यह आह्वान किसी राजनीतिक दल या सामाजिक संगठन का नहीं था, बल्कि एक फेसबुक पोस्ट के  जरिए लोगों से तमाम जगहों पर #जुनैद, #पहलू खान, #अखलाक अहमद, रामबिलास महतो की हत्या के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने के लिए कहा गया था। ...लोग आए और #सांप्रदायिक गुंडों को बताया कि देखो हम एक हैं...हम तुम्हारी फूट डालो और राज करो वाली #चाणक्य नीति से सहमत नहीं हैं...यानी Not In My Name (#NotInMyName)

आइए विडियो और फोटो के जरिए जानें और देखें कि लोगों ने किस तरह और किन आवाज में अपना विरोध दर्ज कराया...




जंतर मंतर दिल्ली पर हुए कार्यक्रम की कुछ तस्वीरें...















Sunday, June 25, 2017

मैं चलती ट्रेन में आतंक बेचता हूं...

मैं उन्माद हूं, मैं जल्लाद हूं
मैं हिटलर की औलाद हूं
मैं धार्मिक व्यभिचार हूं
मैं एक चतुर परिवार हूं

मैं चलती ट्रेन में आतंक बेचता हूं
मैं ट्रकों में पहलू खान खोजता हूं
मैं घरों में सभी का फ्रिज देखता हूं
मैं हर बिरयानी में बीफ सोचता हूं

मैं एक खतरनाक अवतार हूं
मैं नफरतों का अंबार हूं
मैं दोधारी तलवार हूं
मैं दंगों का पैरोकार हूं

मैं आवारा पूंजीवाद का सरदार हूं
मैं राजनीति का बदनुमा किरदार हूं
मैं तमाम जुमलों का झंडाबरदार हूं
मैं गरीब किसान नहीं, साहूकार हूं

मुझसे यह हो न पाएगा, मुझसे वह न हो पाएगा
और जो हो पाएगा, वह नागपुरी संतरे खा जाएगा
फिर बदले में वह आम की गुठली दे जाएगा 
मेरे मन को जो सुन पाएगा, वह "यूसुफ" कहलाएगा 

........कवि का बयान डिसक्लेमर के रूप में........
यह एक कविता है। लेकिन मैं कोई स्थापित कवि नहीं हूं। इस कविता का संबंध किसी भी राजनीतिक दल या व्यक्ति विशेष से नहीं है। हालांकि कविता राजनीतिक है। हम लोगों की जिंदगी अराजनीतिक हो भी कैसे सकती है। आखिर हम लोग मतदाता भी हैं। हम आधार कार्ड वाले लोगों के आसपास जब कुछ घट रहा होता है तो बताइए चुप रह सकते हैं भला। आपके उद्गार किसी न किसी रूप में सामने आएंगे ही। यह वही है। एक आम भारतीय सांप, गोजर, बिच्छू या गोदी में बैठे लोगों पर कविता तो नहीं लिख सकता, वह वही लिखेगा जो देखेगा।...इसलिए कविता पढ़ने के बाद सामान्य रहें। आंदोलित कतई न हों। बेहतर हो कि इन हालात को कैसे बदला जाए, इस पर गहनता से विचार करें...शेष अशेष...

@copyrightsYusuf Kirmani

Saturday, June 24, 2017

नफरतों का संगठित कारोबार...बल्लभगढ़ से श्रीनगर तक

Organized Hate Business from Ballabhgarh to Srinagar

चिदंबरम ने बतौर होम मिनिस्टर कभी कहा था कि देश में भगवा आतंकवाद फैल रहा है।...मैंने उस वक्त उनके उस बयान की बड़ी निंदा की थी, क्योंकि वह सच नहीं था।...लेकिन अभी अपने देश में जिस तरह एक भीड़ किसी को घेर कर इसलिए मार देती है कि उसने दाढ़ी रखी है... सिर पर टोपी है...और वह लोग मीट खाते हैं...तो इस अपराध को आप किस श्रेणी में रखना चाहेंगे।...
मेरे एक अभिन्न संघी मित्र घटना से आहत हैं और बार-बार लिख रहे हैं कि वह बल्लभगढ़ में ट्रेन में कुछ मुस्लिम युवकों पर हुए हमले और एक की हत्या से बहुत आहत हैं...लेकिन उनका आग्रह है कि इसे हिंदू आतंकवाद न कहा जाए....मैंने अपने मित्र से कहा कि न तो आपकी पोस्ट पर किसी ने ऐसा कमेंट किया और न ही मैंने आपसे ऐसा कहा...फिर आप परेशान क्यूं हैं....संघी मित्र का कहना है कि देर-सवेर यह मामला यही रूप लेगा और हिंदू आतंकवाद शब्द फिर से कहा जाने लगेगा। कम से कम उदार हिंदू जो हमारे काम से प्रभावित होकर हमारे साथ जुड़े हैं वे फिर छिटक जाएंगे...
....मैं नहीं जानता कि देश के बाकी मुसलमान बल्लभगढ़ की घटना को किस रूप में लेंगे और उनकी प्रतिक्रिया किस रूप में सामने आएगी लेकिन इतना जरूर है कि इस घटना को लेकर अगर उदार हिंदू चुप रह गए तो इस देश में नफरत फैलाने वाली ताकतें अपने मकसद में कामयाब हो जाएंगी।...यह साफ तौर पर सामने आ गया है कि केंद्र में एनडीए की सरकार आने के बाद ऐसे तत्वों के हौसले बुलंद हो गए हैं।...बल्लभगढ़ जैसी घटनाएं भारत नामक देश की बुनियाद को हिला देंगी।
बल्लभगढ़ की घटना हर उस मानवता प्रेमी शख्स को उद्वेलित कर देगी जो इंसाफ पसंद है।
आप ट्रेन में सफर करते होंगे। आप का आमना-सामना ऐसे लोगों से जरूर हुआ होगा, जिनकी भाषा, मज़हब, संस्कृति अलग-अलग होती है...क्या इस आधार पर कुछ लोगों का समूह मिलकर उनकी हत्या कर देगा।....क्या मुसलमानों का कोई समूह एक ऐसे शख्स की हत्या कर दे जिसने माथे पर चंदन लगा रखा हो और जेनेऊ पहन रखा हो...क्या ऐसे ही भारत की कल्पना हमारे पूर्वजों या स्वतंत्रता सेनानियों ने की थी। ...दरअसल, दूसरे धर्म से नफरत, दूसरी संस्कृति से नफरत, दूसरी भाषा से नफरत का जो संगठित कारोबार इस देश में चलाया जा रहा है, वह अब खतरनाक मोड़ पर आ पहुंचा है। अगर एक गिरोह सरकारी संरक्षण में पलेगा, बढ़ेगा तो आप दूसरे गिरोहों को गलत दिशा में मुड़ने से कहां तक और कब तक रोक पाएंगे। ...याद रखिए कांग्रेस से लेकर बीजेपी तक कोई भी राजनीतिक दल हो, धर्म से नफरत के संगठित कारोबार का फायदा उन्हें हुआ और कीमत जनता को चुकानी पड़ी। यानी अंधे होकर आज या कल हम जिन राजनीतिक नेता या संगठनों के पीछे खड़े हैं या खड़े थे...उसका फायदा किसे मिल रहा है...क्या यह आपको अगर नज़र नहीं आता...
जिस मुस्लिम लीग पार्टी के नेताओं ने या असददुद्दीन ओवैसी ने अपनी पार्टी मुसलमानों के नाम पर बनाई, वो खुद संसद में जा पहुंचे और मजे से माल-पानी उड़ा रहे हैं। आरएसएस ने अपना जो ताना-बाना बुना है, उसका भी अंति लक्ष्य सत्ता की प्राप्ति ही था, जिसके जरिए वो अपने मंसूबे अंजाम दे रहे हैं। संघ के चंद नेताओं को ही सत्ता सुख मिल रहा है, बाकी स्वयंसेवक बेचारे पहाड़ और रेगिस्तान की धूल फांककर हिंदू राष्ट्र के निर्माण में लगे हैं।...
ऐसे समय में जब दुनिया सिकुड़ रही है, तकनीक इंसान को एक दूसरे के करीब ला रही है तब मजहब के नाम पर राष्ट्र निर्माण कहां तक उचित है।...आप पुष्पक विमान उड़ाएं या हाथी के सूंड की सर्जरी की कल्पना करें या गाय के गोबर से बिजली पैदा करें...लेकिन सोचिए कि विश्व मानचित्र पर आप कहां खड़े हैं....इन नेताओं और बड़े-बड़े स्वयंसेवकों के बच्चे विदेशी की यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैं और करीम व मातादीन के बच्चों को वहीं मदरसा या संस्कारी स्कूल में कट्टर राष्ट्रवाद का जहर भरा जा रहा है।
बल्लभगढ़ की घटना क्या थी...चार मुस्लिम लड़के दिल्ली से ईद के सामान की खरीदारी करके लोकल ईएमयू ट्रेन से घर वापस लौट रहे थे। डेली पैसेंजर ओखला रेलवे स्टेशन से चढ़े, उन्होंने पहले जबरन सीट मांगी। उन चारों ने एक बुजुर्ग को बैठा भी लिया। लेकिन कुछ देर बाद ही मुल्ले कहकर और बीफ खाने वाले कहकर उन चारों को छेड़ा जाने लगा। उन मुस्लिम युवकों ने टोपी पहन रखी थी और दाढ़ी भी थी, उनके मुसलमान होने में किसी को संदेह नहीं था। इतने में छेड़खानी करने वालों में से एक ने थप्पड़ मारा। उन्होंने विरोध किया। इसके बाद 15-20 लोगों का समूह उन पर टूट पड़ा। फिर पूरा डिब्बा उन पर टूट पड़ा...लोग चाकू मारते जा रहे थे और बीफ खाने वाले मुल्ले कह रहे थे।...उस भीड़ में एक भी ऐसा शख्स नहीं था जो बाकी को रोकने की कोशिश करता या समझाता।
...जरा सोचिए, उन निहत्थे मुसलमानों पर जो भीड़ टूटी, क्या उसे एक संगठित गिरोह द्वारा बहकाया नहीं गया था कि अपने मनमाफिक सरकार है, जो चाहे करो। ....राष्ट्रवाद में हिंसा को जायज ठहराने वाले संगठित गिरोह दरअसल ऐसे लोगों का इस्तेमाल अपने मकसद को पूरा करने के लिए कर रहे हैं। जिनका इस्तेमाल होगा, उसका प्रतिफल हिंसा करने वालों को नहीं मिलेगा, बल्कि उनमें से कुछ पर मुकदमा चलेगा और कुछ जेल भी जाएंगे।....वो तारीख भुगतेंगे और संगठित गिरोह के लोग मलाई काट रहे होंगे।
मीडिया की भूमिका.
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राष्ट्रवाद के लिए हिंसा को रोकने में देश का प्रिंट व इलेक्टट्रॉनिक मीडिया बड़ी भूमिका निभा सकता है। लेकिन अफसोस कि अंध राष्ट्रवादियों के गिरोह ने अपने मकसद को पूरा करने के लिए सबसे पहला काम मीडिया पर कब्जा करने का किया। बल्लभगढ़ की घटना को हिंदी अखबारों ने या तो दबा दिया या तोड़ मरोड़कर छापा।...अंग्रेजी अखबारों ने थोड़ी हिम्मत दिखाई है लेकिन तोड़ मरोड़ वहां भी है।...टीवी पत्रकारिता उसी चीखने चिल्लाने की जगह खड़ी है और बल्लभगढ़ की घटना भी टीआरपी बढ़ाने का खेल बन गई है।...आपसे यह नहीं कहा जा रहा कि आप मिशनरी पत्रकारिता करो लेकिन यह उम्मीद की जाती है कि आप सच को बयान करेंगे या दिखाएंगे लेकिन पुलिस जो कह रही है, वही सच मान लिया गया है।
सरकार से क्या उम्मीद करें
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यह लेख लिखे जाने तक न तो हरियाणा सरकार ने और न ही केंद्र सरकार ने ट्रेन के अंदर हुए इस सांप्रदायिक मर्डर की निंदा की। यहां तक की कांग्रेस ने भी अपनी कोई जांच समिति बल्लभगढ़ नहीं भेजी। सीपीएम नेता वृंदा करात और सीपीएम के सांसद मोहम्मद सलीम जरूर बल्लभगढ़ पहुंचे। सीपीएम का जो काम है वह तो करेगी ही लेकिन बाकी राजनीतिक दलों को क्या हुआ...क्या बल्लभगढ़ की घटना निंदनीय भी नहीं है।....मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर क्या एक समुदाय विशेष के मुख्यमंत्री हैं...ये सवाल हैं जो मुख्य मीडिया में नहीं बल्कि सोशल मीडिया पर पूछे जा रहे हैं, जवाब कोई नहीं देता...

Tuesday, June 20, 2017

एक घोर सांप्रदायिक शख्स का राष्ट्रपति बनना...

देश की सत्तारूढ़ पार्टी भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी अन्य दलों ने बिहार के गवर्नर रामनाथ #कोविंद को #राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के रूप में चुना है। भारतीय इतिहास में इतने बड़े पद पर कभी इतने ज्यादा विवादित व्यक्तित्व के मालिक को इस पद का प्रत्याशी नहीं बनाया गया। कोविंद अभी चुने नहीं गए हैं लेकिन उनके विवादित और भ्रष्ट आचरण को लेकर तमाम आरोप सामने आ रहे हैं। लेकिन हम यहां कुछ ठोस मुद्दे पर बात करेंगे।

यह जो रामनाथ कोविंद है न...यह घोर #सांप्रदायिक हैं....कैसे....

2010 में इस कोविंद ने कहा था कि ईसाई और मुसलमान इस देश के लिए एलियन हैं। "Islam and Christianity are alien to the nation." यानी मुसलमान और ईसाई भारत में आए हुए दूसरे ग्रह के प्राणी हैं।
इस शख्स ने यह बात क्यों कही थी...

2010 में जस्टिस रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट आई थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को सरकारी नौकरियों में 15 फीसदी रिजर्वेशन दिया जाए। कोविंद तब बीजेपी के प्रवक्ता थे, उन्होंने मिश्रा आयोग की सिफारिशों का विरोध किया। उसी समय उन्होंने मुसलमानों और ईसाईयों के लिए यह बात कही थी।

मतलब कि भारत की आजादी की लड़ाई में जिस पार्टी का कभी कोई योगदान नहीं रहा, उस पार्टी के शख्स ने भारत की आजादी की लड़ाई में मुसलमानों और ईसाईयों की भूमिका को एक झटके में नकार दिया।...उसके आका जिस लालकिले की प्राचीर से हर 15 अगस्त को झंडा फहराते हैं, उस लालकिले को बनवाने वालों की भूमिका को भुला दिया...उसी लालकिले से जहां से बहादुर शाह जफर ने अंग्रेजों के खिलाफ जंग का ऐलान किया था...

भारत में #प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दो पद ऐसे हैं जिन पर बैठे शख्स से उम्मीद रहती है कि वे धर्म, जाति, भाईभतीजावाद, भ्रष्टाचार से ऊपर उठकर देश की सेवा करेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र #मोदी गुजरात की लंबी सेवा के बाद देश की सेवा कर रहे हैं और उनका अतीत और वर्तमान तमाम विवादों के दायरे में है। अब भाजपा या यूं कहें कि मोदी राष्ट्रपति पद पर भी ऐसे शख्स को बैठाने जा रहे हैं जिसकी घुट्टी में सांप्रदायिक सोच शामिल है।

जाहिर है कि भाजपा कोविंद को राष्ट्रपति भवन तक ले जाने में भी सफल रहेगी...लेकिन क्या ऐसे सांप्रदायिक व्यक्तित्व के मालिक का इस पद पर बैठना तर्कसंगत माना जाएगा।


यह भूल जाइए कि रामनाथ कोविंद के चयन का आधार दलित होना है। इनका चयन का आधार उन मासूम या नाजुक पलों के लिए किया गया है जहां किसी राष्ट्रपति की भूमिका निर्णायक होती है, जैसे प्रणब मुखर्जी करते रहे हैं...जैसा कभी जैल सिंह ने किया था...जैसा कभी के. आर. नारायणन (Kocheril Raman Narayanan) ने किया था। बता दें कि नारायणन भी दलित थे। सूची लंबी है, एपीजे अब्दुल कलाम, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. राधाकृष्णन की तो बात ही अलग थी।...बीजेपी ने रामनाथ का चयन करके राष्ट्रपति पद की गरिमा को बहुत बड़ा झटका दिया है। ...जिस तरह से बाकी संस्थान रसातल में जाते दिख रहे हैं...यह उसी की अगली कड़ी है। किसी भी पार्टी का अधिकार है कि वह इस पद के लिए अपना प्रत्याशी घोषित करे लेकिन कम से कम गरिमा का ख्याल तो किया ही जाना चाहिए।


भ्रष्ट बंगारू का समर्थन...
फर्स्ट पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक #बीजेपी के कभी #दलित चेहरा रहे बतौर पार्टी प्रेसीडेंट बंगारू को जब एक लाख की रिश्वत लेते पकड़ा गया तो अदालत में इन्हीं कोविंद महाराज ने हलफनामा दिया था कि बंगारू को वह 20-25 साल से जानते हैं और वह रिश्वतखोर नहीं हैं। आप लोगों को शायद याद होगा कि बंगारू रिश्वत लेते हुए कैमरे में कैद हुए थे, उनका स्टिंग किया गया था। बंगारू चूंकि दलित थे, इसलिए कोविंद ने दलित होने की वजह से बंगारू की मदद के लिए वह हलफनामा दिया था। लेकिन जब एक शख्स को कैमरे में रिश्वत लेते हुए कैद किया जा चुका हो, ऐसे में सिर्फ जाति के आधार पर किसी का समर्थन करना क्या नैतिकता के दायरे में आता है...

बहरहाल, देश की भाग्यविधाता अब भारत की जनता नहीं है....वह भाग्यविधाता अब प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और भारत के चीफ जस्टिस हैं।...जिनके फैसले जनता के सामने हैं।



Reference : First Post 

Saturday, May 27, 2017

चुप रहिए न...विकास हो रहा

कहिए न कु
विकास हो रहा
बोलिए न कुछ
विकास हो रहा
टीवी-अखबार भी बता रहे विकास हो रहा

झूठी हैं तुम्हारी आलोचनाएं

हां, फर्जी हैं तुम्हारी सूचनाएं

जब हम कह रहे हैं 
तो विकास हो रहा
देशभक्त हैं वो जो 
कह रहे विकास हो रहा
गद्दार हैं वो जो 
कह रहे विनाश हो रहा

मक्कार हैं वो जो कर रहे
गरीबी की बातें
चमत्कार है, अब कितनी 
सुहानी हैं रातें

कमाल है, तीन साल के लेखे-जोखे पर
तुम्हें यकीन नहीं

इश्तेहार में इतने जुमले भरे हैं

फिर भी तुम्हें सुकून नहीं


अरे, सर्जिकल स्ट्राइक का 

कुछ इनाम तो दो

इसके गहरे हैं निहितार्थ

कुछ लगान तो दो

अरे भक्तों, अंधभक्तों, यूसुफ 
कैसे लिखेगा तुम्हारा यशोगान

हां, समय लिखेगा, उनका 
इतिहास जो चुप रहे और 
गाते रहे सिर्फ देशगान



कॉपीराइट यूसुफ किरमानी, नई दिल्ली
Copyright Yusuf Kirmani, New Delhi

Friday, April 21, 2017

लाल बत्ती से पब्लिक को क्या लेना - देना


वीआईपी गाड़ियों से लाल बत्ती वापस लेकर क्या केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है...दरअसल, यह शहरी मध्यम वर्गीय लोगों की एक पुरानी मांग थी, जिस पर सरकार को यह फैसला लेना पड़ा। ...वरना गांव के किसानों...गरीबों...रोज की दिहाड़ी कमाने वाले मजदूरो...को इन लाल बत्तियों से लेना-देना नहीं था। उन्हें इस बात से रत्ती भर फर्क पड़ने वाला नहीं है कि उनके सामने या पास से कौन #लालबत्ती से गुजरा।

...नरेंद्र #मोदी समेत तमाम असंख्य मंत्रियों और उनकी पार्टी के नेताओं को अच्छी तरह मालूम है कि जब तक ये लोग सत्ता से बाहर रहे तो इन्होंने शहरी मध्यम वर्गीय लोगों के बीच एक माहौल बनाया कि लाल बत्ती एक #वीआईपी कल्चर है और इसे खत्म होना चाहिए। क्योंकि तब #कांग्रेस सत्ता में थी और उसका छुटभैया नेता भी लाल बत्ती लगाए घूमता था। मेरा खुद का अनुभव है कि शहरी मध्यम वर्ग लाल बत्ती को बहुत अच्छी निगाह से नहीं देखता। कई ऐसे मामले भी सामने आए, जब लाल बत्ती वाली गाड़ियां तमाम तरह के अपराधों में लिप्त पाई गईं।...#भारतीयजनतापार्टी अभी भी शहरी मध्यम वर्गीय लोगों की पार्टी है।...इसलिए इस वर्ग को खुश करने के लिए उसने यह कदम उठाया जिसे इतना बड़ा फैसला बता दिया गया, मानों किसानों की समस्याएं, गरीबों की गरीबी और दिहाड़ी मजदूरों को रोटी इस लाल बत्ती के खत्म होने पर मिलने लगेगी। ...लेकिन ऐसा न होना है न होगा।...ये लाल बत्तियां धीरे-धीरे फिर से किसी न किसी बहाने लौट आएंगी और शहरी मध्यम वर्ग के लोगों के सीने में तब तक पूरी तरह ठंडक पड़ चुकी होगी।

मंत्रियों और बाकी वीआईपी लोगों को लाल बत्ती की जरूरत तो पहले से ही नहीं थी। सोचिए प्रधानमंत्री सड़क पर चले और किसी को पता न चले या कोई रास्ता न दे...क्या यह संभव है। हर मंत्री के साथ पुलिस की एक गाड़ी चलती है...वही बताने के लिए काफी है कि कोई वीआईपी आ रहा है।...जिन लोगों को लाल बत्ती नहीं चाहिए थी वे तो जबरन लगाए घूमते थे। लेकिन छुटभैये नेता जो लाल बत्ती से अब वंचित हैं वे सिक्योरिटी के नाम पर पुलिस या होमगार्ड की सेवाएं लेंगे और जनता के बीच में जाकर पहले की ही तरह रौब दिखाते रहेंगे।...भारत में वीआईपी कल्चर कोई भी राजनीतिक दल या सरकार खत्म नहीं कर सकती।...

...#भाजपा अब वह सारे फैसले ले रही है जिस तरह कांग्रेस कभी शहरी मध्य वर्गीय लोगों को खुश करने के लिए लेती थी। लेकिन शहरी मध्य वर्गीय कभी भी कांग्रेस से खुश नहीं हो पाया।

भाजपा का अभी हनीमून पीरियड चल रहा है।...शहरी मध्यम वर्गीय आबादी उससे खुश नजर आ रही है। हो सकता है कि 2019 में यह तबका लाल बत्ती जैसे फैसलों से खुश होकर उसे वोट दे दे। लेकिन उसके मोह भंग होने की शुरुआत 2020 आते-आते शुरू हो जाएगी।

...यह शहरी मध्यम वर्गीय #वोटर बहुत चालाक है। ...वह हर वक्त इसी उम्मीद में रहता है कि कौन सी पार्टी उसे तत्कालिक लाभ दे सकती है, कौन सी पार्टी फेयरनेस क्रीम की तरह उसे गोराहोने के झांसे में रख सकती है। ...शहरी मध्यम वर्ग दरअसल उम्मीदों में ही जीने का आदी हो चुका है। ...यह उम्मीद आजकल दुनियाभर में सबसे पॉजिटिव चीज है। इसकी आड़ में अमेरिका से लेकर भारत तक में बड़े-बड़े गुल खिलाए जाते हैं। .

#भारत में भी नेताओं के पास किसानों, गरीबों,  मजदूरों के लिए कुछ करने की कोई कार्य योजना नहीं है। उनके पास कार्ययोजना है तो बड़े बड़े कॉरपोरेट्स के बैंक लोन माफ करने और माल्या जैसे लोगों को लंदन भगा देने की कार्य योजना है। किसानों का कर्ज माफ करने की लंबी चौड़ी घोषणा ढोल बजाकर की जाती है लेकिन उसे अमली जामा पहनाने के नाम पर एक इंच भी कदम नहीं बढ़ाया जाता है। किसानों को सस्ती खाद देने का वादा किया जाता है लेकिन उसे सस्ता करने का कोई उपाय नहीं किया जाता। किसानों की जमीन सस्ते दाम पर लेकर उस पर औद्योगिक घरानों के महल खड़े कर दिए जाते हैं।

गौर से सोचिए और तथ्यों को परखिए। प्रचंड बहुमत के साथ नरेंद्र मोदी या भाजपा की सरकार केंद्र में आई। लेकिन अभी तक हमारे सामने सबसे बड़े मुद्दे क्या पेश किए गए हैं -

1. बीफ बैन और स्लाटर हाउसों पर पाबंदी

2. तीन तलाक

3. अज़ान


यह तीनों मुद्दे सीधे मुसलमानों से जुड़े हुए हैं। सरकार की नीयत कुछ और है। ...इसी से लगता है कि सरकार किसी अजेंडे पर काम कर रही है।...पूरे भारत में बीफ निर्यात में सबसे ज्यादा गैर मुसलमान लगे हुए हैं। ...खुद मुसलमानों ने मांग की गो हत्या पर पूरे देश में रोक लगाने का कानून पास किया जाए। लेकिन सरकार इस पर काम नहीं कर रही है।...सरकार की हिम्मत नहीं की वह अल कबीर जैसे मीट निर्यातक का लाइसेंस रद्द कर दे या सब्बरवाल की मीट फैक्ट्री पर ताला लगा दे। अलबत्ता उसने उन हजारों गरीब मुसलमानों के पेट पर लात मारने की कोशिश की है जो छोटी-मोटी दुकान खोलकर चिकन-मटन बेचते हैं। बीफ की आड़ में इन दुकानों को भी बंद कराया जा रहा है।

#तीनतलाक गलत है। ...यह घोषित रूप से सारे मुस्लिम उलेमा कह रहे हैं। आपके पास बहुमत है, आप कानून बनाइए। आपको कौन रोक रहा है। लेकिन आपका मकसद सिर्फ हंगामा खड़ा करना है।

#अज़ान का मुद्दा खुद न उठाकर #बॉलिवुड के एक छुटभैये गवैए #सोनूनिगम से उठवाया गया है। #रमजान का महीना मई के अंत में शुरू होगा। इस मुद्दे को जानबूझकर रमजान से पहले ही उठा दिया गया है। ..ठीक है आप लाउडस्पीकर पर बैन लगाना चाहते हैं, लगा दीजिए। ध्वनि प्रदूषण बुरी चीज है। लेकिन काशी में बाबा विश्वनाथ #मंदिर में लगे लाउडस्पीकर को क्या बंद कराने की हिम्मत है...#अयोध्या के किसी मंदिर में लाउडस्पीकर बंद कराकर दिखाइए।...जो लोग अयोध्या गए होंगे, वहां उन्हें शाम को मंदिरों से आरती और घंटे की आने वाली आवाज का पता है...क्या उन्हें बंद कराया जा सकता है।....

....इन तीनों ही मुद्दों को इसलिए उठाया गया है ताकि कट्टर हिंदुओं को संतुष्ट  किया जा सके और पार्टी के एजेंडे को आगे बढ़ाया जा सके। इन तीनों मुद्दों को उठाने से पब्लिक का ध्यान असली मुद्दों से हटा रहेगा।...उसे साफ और अच्छी सड़कें नहीं चाहिए...नालियां गंदगी से भरी होनी चाहिए....रोजगार नहीं चाहिए...क्योंकि उसे तो बीफ पर बैन लगवाना है...उसे तो #मुसलमानों में तीन तलाक बंद कराना है....क्योंकि उसे तो अजान में लाउडस्पीकर बंद कराना है।....सरकार के पास करने को कुछ नहीं....पब्लिक को अपने मुद्दों का पता नहीं....उसे एक उम्मीद में जिंदा रखा जा रहा है कि एक दिन भारत विश्व की महाशक्ति बन जाएगा...बेशक किसान भूखा रहकर आत्महत्या कर लेगा....हम पाकिस्तान से एक जंग करेंगे....बेशक हमारे युवकों को रोजगार मिले या न मिले...जंग होगी तभी हथियार बिकेंगे और तभी कमीशन मिलेगा। ...#राष्ट्रवाद को इसीलिए खाद-पानी दे देकर सींचा जा रहा है।...राष्ट्रवाद से ही वोटों की फसल काटी जा सकती है। मकसद अंध राष्ट्रवाद को फैलाना है, जो बिना लाल बत्ती के भी फलफूल सकता है।...

...आप लोग ऐसे ही मुद्दों से खुश होते रहें...जैसे लाल बत्ती खत्म होने से 1000-2000 लोगों को रोजगार मिल जाएगा...किसान आत्महत्या करना बंद कर देंगे...एमसीडी चुनाव में यह लाल बत्ती इमोशनल वोट जरूर दिला जाएगी।...भाटिया जी, बत्रा जी, शर्मा जी, वर्मा जी को इस बात से मतलब नहीं कि इन लाल बत्ती हटाने वालों ने किस कदर उनके मुहल्ले की नालियों को गंदा रखा...मच्छर पनपते रहे पर उफ न किया...बस खुश हैं कि लाल बत्ती हट गई...जीवन तर गया...



मेरे नादान दोस्तों...लाल बत्ती हटना समस्या का हल नहीं है...

Wednesday, April 19, 2017

बीएसएफ से बर्खास्त जवान तेजबहादुर यादव की पत्नी का दर्द कौन जाने...







क्या #करप्शन के खिलाफ आवाजा उठाना गलत है...लेकिन #बीएसएफ जवान तेजबहादुर यादव को बर्खास्त करने से तो यही साबित होता है कि बीएसएफ में खाने की खराब क्वॉलिटी पर सवाल उठाने पर यही नतीजा होगा...

#तेजबहादुरयादव का एक #विडियो वायरल हुआ था, जिसमें बताया गया था कि किस तरह वह #सियाचिन मोर्चे पर तैनात हैं और किस तरह पानी वाली दाल और जली हुई रोटियां उन लोगों को खिलाई जा रही हैं।

बीएसएफ ने तेजबहादुर का कोर्टमार्शल करने के बाद यह सजा बुधवार को सुनाई। अगर उनकी पत्नी अपने विडियो संदेश के जरिए दुनिया को यह न बताती कि उनके पति को बर्खास्त कर दिया गया है तो हम लोगों को यह पता भी न चलता।



...हैरानी की बात है कि तेजबहादुर यादव के परिवार को उन #राष्ट्रवादियों का भी साथ नहीं मिला जो रातदिन भारत माता की जय बोलकर #राष्ट्रीयता की अलख जलाए रखते हैं। हमने आपने इन राष्ट्रवादियों को सत्ता इस उम्मीद से सौंपी थी कि चलो अब हर तरह के करप्शन खत्म हो जाएंगे।...



हमें अपने देश की सेना पर बड़ा मान है।...कितनी दुर्गम जगहों पर हमारे जवान मोर्चे पर तैनात रहते हैं। अगर इन जवानों को कुछ शिकायत है तो उसे दूर किया जाना चाहिए न कि उन्हें उसके बदले डराया जाए, सस्पेंड किया जाए और फिर बर्खास्त किया जाए...अदालत का फैसला इतनी जल्दी नहीं आता, जितनी जल्दी बीएसएफ ने इस जवान का कोर्टमार्शल खत्म करने में लगाया।



#प्रधानमंत्री को इस मामले में सीधा दखल देना चाहिए। तेजबहादुर यादव ने बीएसएफ में संस्थागत करप्शन का मुद्दा उठाया है। उन्होंने किसी अफसर विशेष या किसी यूनिट विशेष में परोसे जाने वाले खाने की क्वॉलिटी में घटियापन का मुद्दा नहीं उठाया है।...प्रधानमंत्री अगर इस मामले में सीधा दखल नहीं देते तो पब्लिक में यह संदेश जाएगा कि सरकार संस्थागत करप्शन को और बढ़ाना चाहती है। उसकी मंशा इसे खत्म करने की नहीं है।



माना कि बीएसएफ या सेना में करप्शन नहीं है। वहां का खाना बहुत अच्छा और शानदार है।...लेकिन तेजबहादुर यादव और कुछ अन्य जवानों ने जो कुछ कहा है, उससे तो पता यही चलता है कि दाल में कुछ काला जरूर है, हो सकता है कि पूरी दाल काली न हो।



...तेजबहादुर यादव की पत्नी ने अपने विडियो मैसेज में कहा है कि अब कौन मां अपने बच्चे को फौज में लड़ने के लिए भेजना चाहेगी, जिसे दो वक्त की रोटी भी सुकून से नहीं मिलती।...बात में दम है। यादव परिवार हरियाणा के रेवाड़ी जिले का रहने वाला है। रेवाड़ी से सबसे ज्यादा लोग सेना में भर्ती होते हैं। करगिल युद्ध में सबसे ज्यादा सेना के लोग रेवाड़ी जिले से ही शहीद हुए थे। रेवाड़ी, महेंद्रगढ़ ऐसे जिले हैं, जहां अगर किसी घर से कोई फौज में नहीं है तो उसे इलाके में इज्जत की नजर से नहीं देखा जाता है।...ऐसे में तेज बहादुर यादव की पत्नी का मार्मिक बयान देश न सही रेवाड़ी के लोगों को तो झकझोर कर रख ही देगा...



बहरहाल, उन जवानों को सलाम जो हमारे देश की सीमा की रखवाली करते हैं लेकिन उससे ज्यादा उन जवानों के जज्बे, हिम्मत और उन हालात को सलाम, जिनमें उन्हें जिंदगी गुजारनी पड़ रही है।...तेज बहादुर यादव ने कारनामा तो अंजाम दे ही दिया है, चाहे आप और हम उसे माने या नहीं मानें...








Thursday, April 13, 2017

हिंदी कविता : सन्नाटा और गीतफरोश : Sannata and GeetFarosh : Bhawani Prasad Mishr















भवानी प्रसाद मिश्र की एक और मशहूर कविता- गीतफरोश





Sunday, April 2, 2017

ईवीएम मशीनों से कराए गए चुनाव का काला सच....





यह वायरल विडियो बताता है कि ईवीएम मशीनों का काला सच क्या है...

देश को ईवीएम मशीनों के जरिए लाया गया लोकतंत्र नहीं चाहिए....

ऐसे मतदान पर कैसे भरोसा हो, जिसमें सत्ताधीशों की नीयत खराब हो...

ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी करके भारतीय लोकतंत्र के साथ साजिश की जा रही है....

आखिर जनता कब जागेगी और इस नाजायज हरकत का विरोध कब करेगी...

भारतीय लोकतंत्र में ऐसे बुरे दिन कभी नहीं आए...यह इमरजेंसी से भी बुरा दौर है...

जिन राजनीतिक दलों के नेताओं व कार्यकर्ताओं को सड़कों पर उतरकर इसका विरोध करना चाहिए था...वे घरों में सो रहे हैं....यहां तक कि जिस पार्टी ने सबसे पहले ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी करके चुनाव जीतने का आरोप लगाया था, उस पार्टी के नेता व वर्कर भी सो रहे हैं...उनमें जरा भी साहस नहीं है कि वे सड़कों पर आकर इसका खुला विरोध करें...

चुनाव में ईवीएम मशीनों के दुरुपयोग की कहानी सामने आने लगी है। यूपी चुनाव नतीजों के बाद जब भारतीय जनता पार्टी के मुकाबले बाकी राजनीतिक दलों की सीटें बहुत कम आईं तो इन मशीनों पर सवाल उठे। बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने सबसे पहले इस मुद्दे को उठाया...तब सहसा मुझे और मेरे जैसे तमाम लोगों को मायावती के आरोप पर विश्वास नहीं हुआ ...लेकिन जिस तरह से महाराष्ट्र और अब मध्य प्रदेश में यह गड़बड़ी पकड़ी गई है, उससे यह शक विश्नवास में बदल गया कि ईवीएम के जरिए यूपी चुनाव में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की गई।

आखिर ऐसा कैसे हुआ कि मध्यप्रदेश की ईवीएम मशीनों में किसी भी बटन को दबाने पर भाजपा की पर्ची निकलती थी। इन मशीनों को वीवीपीटी मशीन से जोड़ कर ऐसा किया गया। चुनाव आयोग ने 19 अफसरों पर एक्शन लिया है और कई मध्य प्रदेश के कई आईएएस अफसरों के खिलाफ जांच शुरू हो गई है लेकिन यह सवाल रहस्य ही रहेगा कि आखिर किन लोगों के कहने पर ये गड़बड़ियां की गईं।








Wednesday, March 29, 2017

महिलाओं पर अत्याचार को बतातीं 4 कविताएं



ये हैं परितोष कुमार  'पीयूष' जो बिहार में जिला मुंगेर के जमालपुर निवासी है। हिंदीवाणी पर पहली बार पेश उनकी कविताएं नारीवाद से ओतप्रोत हैं। ...लेकिन उनका नारीवाद किसी रोमांस या महिला के नख-शिख का वर्णन नहीं है।...बल्कि समाज में महिलाओं पर होने वाले अत्याचार पर उनकी पैनी नजर है। गांव के पंचायत से लेकर शहरों में महिला अपराध की कहानियां या समाचार उनकी कविता की संवेदना का हिस्सा बन जाते हैं।...उनकी चार कविताओं में ...आखिर मैं पीएचडी नहीं कर पायी...मुझे बेहद पसंद है।

बीएससी (फिजिक्स) तक पढ़े परितोष की रचनाएं तमाम साहित्य पत्र-पत्रिकाओं में, काव्य संकलनों में प्रकाशित हो चुकी हैं। वह फिलहाल अध्ययन व स्वतंत्र लेखन में जुटे हुए हैं।




ठगी जाती हो तुम !

पहले वे परखते हैं
तुम्हारे भोलेपन को
तौलते हैं तुम्हारी अल्हड़ता
नांपते हैं तुम्हारे भीतर
संवेदनाओं की गहराई

फिर रचते हैं प्रेम का ढोंग
फेंकते है पासा साजिश का
दिखाते हैं तुम्हें
आसमानी सुनहरे सपने

जबतक तुम जान पाती हो
उनका सच उनकी साजिश
वहशी नीयत के बारे में
वे तुम्हारी इजाजत से
टटोलते हुए
तुम्हारे वक्षों की उभारें
रौंद चुके होते हैं
तुम्हारी देह

उतार चुके होते हैं
अपने जिस्म की गर्मी
अपने यौवन का खुमार
मिटा चुके होते हैं
अपने गुप्तांगों की भूख

और इस प्रकार तुम
हर बार ठगी जाती हो
अपने ही समाज में
अपनी ही संस्कृति में
अपने ही प्रेम में
अपने ही जैसे
तमाम शक्लों के बीच





खर-पतवारों के बीच!
                                
                                                                                    

बदहाली की मात्रक
फटेहाली की पैदाइश
वो नन्हें कदमों से
परचून की दूकान जाते वक्त

जब खींच ली गई होगी
सड़क किनारे से
खर-पतवारों के बीच
सुनसान जंगली खेतों में

कितनी
छटपटायी होगी
कितनी
मिन्नतें मांगी होंगी
आबरू बचा लेने की खातिर

कैसा लगा होगा उसे
जब उसकी सुनने वाला
कोई नहीं होगा
उसकी अपनी ही आवाज
डरावनी चीखों में तब्दील हो
लौटती होगी कानों में

उसका हर एक विरोध
जब उत्तेजित करता होगा
मानवी गिद्धों के झुंड को
उसके सारे सपने
सारी आकांक्षाओं ने
दम तोड़ दिये होंगे

और वह ढ़ीली,
निढाल पड़ गयी होगी
मानवी गिद्धों की पकड़ में
जिस्म पर बचे कपड़ों के
चंद फटे टुकड़ों के साथ

उसकी खुली आँखों के सामने
हो रहा था
उसके अंगों का बँटवारा
आपस में गिद्धों के बीच

शायद उसे पता चल चुका था
परसों रात भी यही हुआ होगा
नीम के पेड़ से लटकी
रज्जो की लाश के साथ

जिसे आत्महत्या
साबित कर दिया था
समाज के कद्दावर लोगों ने
पंचायत की चौकी पर


सुनवायी के दौरान !
                                                                                                        
                                                                                     

                        
हमारे देश की
लोकतांत्रिक कचहरी में
काले लबादों के बीच
जब भी/प्रायः मुकदमों में
बलात्कार की सुनवायी होनी होती है
बहुत ही भद्दे, बेहूदे
और वाहयात किस्म के
प्रश्न पूछे जाते हैं।

क्रमानुसार देने होते हैं
पीड़िता को सारे जवाब
प्रदर्शित करने होतें हैं
हर एक जख्मी अंगों को
दिलाने होते हैं एहसास सिहरनों के
दर्ज करानी होती है
सिसकियों की गिनतियाँ
रेपिस्टों की संख्या
और वस्त्रों की बारीकियां

इस प्रकार
फिर एक बार किया जाता है
आभासी बलात्कार
पीड़िता के साथ
न्याय की काली कोठरी में

फिर सुनवायी की
अगली तारीख पर
रिहा कर दिया जाता है
बलात्कारियों को
चश्मदीद के अभाव में।

और वो चल पड़ते हैं
स्वच्छंद वा उन्मुक्त
नये शिकार की खोज में


आखिर मैं पीएचडी नहीं कर पायी!                                                                             


                                                                                                       
                                            

                                                                                                     
आखिर मैं
पीएचडी
नहीं कर पायी।

एम०ए० की कक्षा में
जिस प्रोफेसर ने
मेरी फेक आईडी
फेसबुक पर बनाई
उन्हीं के पल्ले मैं
पीएचडी में आई।

शोध के मेरे टॉपिक
'फेमीनिज्म' पर
डिस्कशन क्लास के नाम
उस गाइड ने
खूब आभासी मस्तियाँ लूटीं।

अन्य शोधार्थियों ने भी
कमरतोड़ मेहनत की
कुछ ने मालिश किए
कुछ ने जूते पॉलिश किए
किसी ने बनियान धोये
किसी ने गेहूँ पिसाए।

थीसिस पास करने के
अश्वासन दे-देकर
उस गाइड ने आये दिन
अपनी बीवी के
पेटीकोट सिलवाये
पीएचडी की लालच में
मैंने भी अपने अत्याधुनिक
कौशल खूब दिखलाए
और फेलोशिप के पैसे भी
बीवी की चकमक
साड़ियों में जगमगाए।

अभी-अभी
दो साल बीते ही थे कि
देर रात गाइड के
स्वीटहार्ट
और जानू वाले
मैसेज आने लगे।

अपनी थीसिस की खातिर
मैंने उसे भी
नजरअंदाज किया
लेकिन बात यहाँ
रुकी कहां।

अगली ही शाम
उस गाइड के
बुढ़ापे की डूबती जवानी ने
अपना परचम लहराया।

फिर क्या था
मैंने अपनी थीसिस फाड़
गाइड के मुंह पर लहराया
घर की ओर
कदम बढ़ाया।

और
आखिर मैं
पीएचडी
नहीं कर पायी।
                                                                                                                                                                                                                         


-परितोष कुमार 'पीयूष'
ईमेल- piyuparitosh@gmail.com

Monday, March 27, 2017

आरती तिवारी की चार कविताएं

आरती तिवारी मध्य प्रदेश के मंदसौर से हैं। हिंदीवाणी पर उनकी कविताएं पहली बार पेश की जा रही हैं। आरती किसी परिचय की मोहताज नहीं है। तमाम जानी-मानी पत्र-पत्रिकाओं में उनकी असंख्य रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रगतिशील लेखक संघ से भी वह जुड़ी हुई हैं।...हालांकि ये कविताएं हिंदीवाणी ब्लॉग के तेवर के थोड़ा सा विपरीत हैं...लेकिन उम्मीद है कि पाठकों को यह बदलाव पसंद आएगा...


तेरे-मेरे वो पल

प्रेम के वे पल
जिन्हें लाइब्रेरी की सीढ़ियों पे बैठ हमने बो दिए थे 
बंद आंखों की नम ज़मीन पर उनका प्रस्फुटन 
महसूस होता रहा 
कॉलेज छोड़ने तक
संघर्ष की आपाधापी में 
फिर जाने कैसे विस्मृत हो गए 
रेशमी लिफाफों में तह किये वादे जिन्हें न बनाये रखने की 
तुम नही थीं दोषी प्रिये 
मैं ही कहां दे पाया
भावनाओं की थपकी 
तुम्हारी उजली सुआपंखी आकांक्षाओं को 
जो गुम हो गया
कैरियर के आकाश में
लापता विमान सा
तुम्हारी प्रतीक्षा की आँख
क्यों न बदलती आखिर 
प्रतियोगी परीक्षाओं में 
तुम्हें तो जीतना ही था!
हां, तुम डिज़र्व जो करती थीं !

हम मिले क्षितिज पे 
अपना अपना आकाश 
हमने सहेज लिया
उपेक्षित कोंपलों को 
वफ़ा के पानी का छिड़काव कर 
हम दोनों उड़ेलने लगे
अंजुरियों भर भर कर
मोहब्बत की गुनगुनी धूप
अभी उस अलसाये पौधे ने 
आंखे खोली ही थीं कि 
हमें फिर याद आ गए 
गन्तव्य अपने अपने ! 

हम दौड़ते ही रहे
सुबह की चाय से 
रात की नींद तक
पसरे ही रहे हमारे बीच काम
घर बाहर मोबाइल लैपटॉप
फिट रहना
सुंदर दिखना 
अपडेट रहने की दौड़ 
आखिर हम जीत ही गए 
बस मुरझा गया 
पर्याप्त प्रेम के अभाव में 
लाल- लाल कोंपलों वाला 
हमारे प्यार का पौधा
जो हमने रोपा था 
लाइब्रेरी की सीढ़ियों पर बैठ




 कुछ लम्हे फुरसत के 

जैसे पहाड़ पे
उतर आती है धूप
चुरा के रेशमी गुच्छे
कोमल किरणों के
जैसे एक नदी
मुस्कुरा उठती है, अनायास
किसी अजनबी कंकड़ के
परदेसी स्पर्श से
जैसे गायों के झुंड से
तहसनहस हुए बगीचे में
किसी टहनी पर
फूटती एक कली
बची रहने की
ख़ुशी मना रही हो
वैसे ही तुम भी
कामों के इस ढेर से
गर्दन झटक कर
मुट्ठी में क़ैद कर लो
फुरसत के कुछ लम्हे
कभी जीकर देखो ऐसे भी




कभी यूं भी


ज़ेहन में कौंध गईं स्मृतियां
  वही सोलहवें साल वाली
     जब तुम, एक चित्रलिपि सी
            एक बीजक मंत्र सी
            अबूझ पहेली थीं

जब पत्तियां थीं, फूल थे
पर सिर्फ मैं नही था
तुम्हारी नोटबुक में
चकित, विस्मित दरीचों की ओट से
    पढ़ता तुम्हारा लिखा 
     इतिहास बनाती तुम
     विस्फारित नेत्रों से तलाशता अपना नाम
        जो कहीं न था नोटबुक में
          उसे ही पढ़ने की जिद
          ...कभी यूं भी
 
मेरे अवचेतन में प्रतिध्वनि थी
    मेरी ही आवाज़ की
     नदारद था तुम्हारा उच्चारा
       मेरा नाम
ऐसी कैसी कोयल, कूकने को
राजी न थी जो
  मुझे लगा तुम्हारा अनिंद्य सौंदर्य
    रुग्ण हो जैसे
   जैसे पानी में उतरी परछाईं
     जो डूब गई हो
    मुझे बिठा कर किनारे पे
      लौट जाने के लिए
 
 कभी यूं भी   
सिर्फ फूल ही नहीं
गमले भी गुनहगार थे
मेरी उदासी के
आहें, चाहें, उमंगें, तरंगे
बेगानी  हुई
इन्हीं की नसीहतों से




फिक्र

वो एक मासूम फिक्र है
  अन्यास पैदा हुई
  लाभ हानि के गणित से जुदा
मन की दुर्गम घाटियों से
संभल संभल के गुज़रती
हौले से खोल सीमाओं की सांकलें
उतर आई प्रार्थनाओं के स्वर में
व्यक्त हुई दफ़्न होने के पहले
मिलने बिछुड़ने की रीत से
अनभिज्ञ रहकर
सिर्फ कुशल चाहने तक


@copyrights Arti Tiwari