Friday, October 14, 2016

मोहर्रम और आज का मुसलमान

इस बार मोहर्रम और दशहरा साथ-साथ पड़े। यानी बुराई के खिलाफ दो पर्व। संस्कृतियों का अंतर होने के बावजूद दोनों पर्वों का मकसद एक ही है। फर्क सिर्फ इतना है कि मोहर्रम बुराई पर अच्छाई की जीत के बावजूद दुख का प्रतीक है, जबकि दशहरा बुराई के प्रतीक रावण को नेस्तोनाबूद किए जाने की वजह से खुशी का प्रतीक है।  

कुछ साल पहले ईद और दीवाली आसपास पड़े थे। उसकी सबसे ज्यादा खुशी बाजार ने मनाई थी। कनॉट प्लेस में मेरी जान पहचान वाले एक दुकानदार ने कहा था कि काश, ये त्यौहार हमेशा आसपास पड़ते। मैंने उसकी वजह पूछी तो उसने कहा कि पता नहीं क्यों अच्छा लगता है। बिजनेस तो अच्छा होता ही है लेकिन देश भी एक ही रंग में नजर आता है। ...मैंने दोनों त्यौहारों पर इतना कमा लिया है, जितना मैं सालभर भी नहीं कमा पाता।

इस बार दोनों पर्व इस बार ऐसे वक्त में साथ-साथ आए जब पूरी दुनिया हर तरह की बुराई से लड़ने के लिए नया औजार खोज रही है। पुराने कारगर औजार पर या तो उसका यकीन नहीं है या उसकी नजर नहीं है। दशहरा और मोहर्रम धार्मिक होने के बावजूद सांस्कृतिक रंग से सराबोर हैं। दशहरा पर लगने वाले मेलों में जाइए तो आपको वहां हर समुदाय के लोग मिलेंगे।

इस्लाम में सलाफी यानी वहाबी विचारधारा की समस्या से जूझ रहे सऊदी अरब समेत कई देशों में मोहर्रम पर पाबंदी है। इसके ठीक उलट भारत, अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, स्वीडन, रूस जैसे गैर इस्लामी देशों में मोहर्रम वहां की संस्कृति का हिस्सा बन गया है। पाकिस्तान में मोहर्रम मनाने वालों की टारगेट किलिंग के बावजूद वहां अलम-ताजिए का जुलूस, मजलिसों का सिलसिला नहीं रुका। बलूचिस्तान में मोहर्रम करने वाले हजारा समुदाय बर्रबादी के कगार पर है लेकिन उसने मोहर्रम करना नहीं छोड़ा। भारत की संस्कृति में मोहर्रम के रचने बसने के ऐतिहासिक कारण रहे हैं।     

मोहर्रम हमें बताता है कि पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब जिस दीन यानी जिस मजहब को मुसलमानों के लिए छोड़कर गए थे, उसे तत्कालीन शासक वर्ग ने किस तरह बर्बाद कर दिया था, किस तरह उसके उसूलों को ताक पर रख दिया गया था।
उन उसूलों और मूल्यों को फिर से स्थापित करने के लिए जब शासक वर्ग को पैगंबर के नवासे इमाम हुसैन से चुनौती मिली तो उसने पैंतरा बदला और संदेश भेजा कि आप मेरी अधीनता स्वीकार करें। हुसैन ने प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया। शासक ने माहौल बिगाड़ा तो हुसैन ने अपने 72 लोगों के दल के साथ उस मदीना शहर को छोड़ दिया, जो उनके नाना यानी पैगंबर का घर था। हुसैन ने वहां से चलते वक्त इच्छा जताई थी कि वो भारत की ओर कूच जाएंगे, जहां उस समय की मान्यता के अनुसार बहुत ही सहिष्णु लोग रहते हैं। यानी धार्मिक रूप से सहिष्णु भारत की छवि 1400 साल पहले भी थी। लेकिन अगर सहिष्णु नहीं था तो वहां का शासक वर्ग।
इराक में कर्बला नामक जगह पर हुसैन को रोक लिया गया। उनका खाना-पानी रोक दिया गया। यजीद की हजारों लोगों की सेना ने 72 लोगों को युद्ध के लिए ललकारा। हुसैन को पहले से ही आदेश था कि इस्लाम को बचाने के लिए उन्हें अपने पूरे कुनबे, जिसमें उनका छह महीने का छोटा बेटा भी शामिल था, की कुर्बानी देनी होगी।

मुंशी प्रेमचंद ने कर्बला में उस वक्त का मंजर बताया है कि एक तरफ इस्लाम के पैगंबर का अपना परिवार शहादत के लिए तैयार था तो दूसरी तरफ वो मुसलमान उन्हें शहीद करने के लिए तलवार और तीर कमान चला रहा था, जो कल तक पैगंबर का बोसा लेता था, उनके लिए मर मिटने की कसमें खाता था। बहरहाल, कर्बला हुई, यजीद वो युद्ध जीतने के बावजूद हार गया। विश्व इतिहास में इस सच्ची घटना को मानवीय मूल्यों को बचाने के लिए शहादत देने वाले हुसैन की विजय के रूप में ही दर्ज किया गया है।


अब इस्लामिक देशों में हो रही घटनाओं पर नजर डालिए। आपको इन देशों में पैगंबर का इस्लाम कहीं नजर आता है। हद तो यह है कि मुसलमानों का एक गिरोह जो खुद को खलीफा भी बताता है, नया इस्लाम लेकर आ गया है। पता ये चलता है कि खुद को मक्का-मदीना का असली पैरोकार बताने वाले नए इस्लाम को हवा देने में हर पैंतरेबाजी का इस्तेमाल कर रहे हैं। आज इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन यही गिरोह है। 1400 साल पहले पैगंबर के नवासे ने जिन मुसलमानों के कारण मदीना छोड़ा था, आज उन्हीं मुसलमानों के स्वयंभू पैरोकार फिर से वही हालात पैदा करते दिखाई दे रहे हैं। इस्लाम एक है, कुरान एक है लेकिन इस्लाम के नए पैरोकारों और स्वयंभू खलीफा ने हालात को बदतर बना दिया है। ऐसे में हम लोग पैगंबर और उनके परिवार की कुर्बानी से बहुत कुछ सीख सकते हैं। 

Sunday, October 2, 2016

पाकिस्तान में ऐसे लोग भी हैं

मानवाधिकार आय़ोग पाकिस्तान के डायरेक्टर आई. ए. रहमान का लेख वहां चर्चा में है

नोट ः मेरा यह लेख आज नवभारत टाइम्स, लखनऊ में ग्लोबल पेज पर छप चुका है। जिसका हेडिंग है - लीक से हट कर बोलते हैं रहमान



भारत-पाकिस्तान के बिगड़ते रिश्तों में मीडिया की भूमिका अहम हो गई है। पाकिस्तान के आग उगलते न्यूज चैनल और रक्त रंजित हेडिंग से भरे हुए वहां के अखबारों के बीच पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग के डायरेक्टर आई.ए. रहमान का लेख चर्चा का विषय बन गया है। रहमान के लेख को पाकिस्तान के लोकप्रिय अखबार डान ने अंग्रेजी और उर्दू में पहले पेज पर एंकर प्रकाशित किया है। बता दें कि डान अखबार की स्थापना पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने की थी।

ऐसे वक्त में जो उम्मीद भारत सरकार यहां के मीडिया से लगाए बैठी है, वही उम्मीद पाकिस्तान सरकार वहां की मीडिया से लगाए बैठी है। लेकिन डान ने कई मायने में कमाल कर दिया है। डान टीवी ने भारत के रक्षा विश्लेषक सी. उदय भास्कर को पैनल में लाकर और उनकी बात बिना किसी काट-छांट के अपने दर्शकों को दिखा देना, निश्चित रूप से पाकिस्तान सरकार और वहां की आर्मी को पसंद नहीं आया होगा। ये बात उसी रात यानी 29 सितंबर की है, जब दोनों देशों के चैनलों में एक शोर सा मचा हुआ था और लग रहा था कि असली युद्ध इन चैनलों पर लड़ा जा रहा है। पाकिस्तान के और भी बहुत से संजीदा पैनलिस्ट इस बात पर चिंतित नजर आ रहे थे कि भारतीय कश्मीर के नाम पर पाकिस्तान आखिर कब तक कट्टर मौलवियों को बढ़ावा देता रहेगा। इन मौलवियों की वजह से कश्मीर की असली बात पीछे छूट गई है और ये लोग चंदा जमाकर मलाई उड़ा रहे हैं।


टीवी पर खबरें आती हैं और वो बाद में हटा ली जाती हैं। उन्हें कोई याद नहीं रख पाता लेकिन रहमान का लेख डान के पहले पेज पर हमेशा के लिए महफूज हो गया है। उन्होंने पाकिस्तान की नई पीढ़ी के लिए लिखा है कि उसके लिए भारत-पाक के पुराने रिश्तों को जानना क्यों जरूरी है और जो आज हालात हैं, वैसे पहले कभी नहीं रहे। जबकि हम दो युद्ध भी लड़ चुके हैं। वो लिखते हैं कि एक वक्त था जब 1971 में दोनों देशों में युद्ध होने के बाद जब पाकिस्तानी सैनिकों ने सरेंडर कर दिया तो एक भारतीय ब्रिगेडियर जो पाकिस्तानी ब्रिगेडियर के साथ पढ़ा होने की वजह से जानता था, उसे अलग ले गया। उसे ड्रिंक की आफर की और कहा कि आप लोगों ने ये क्या कर डाला...भारतीय ब्रिगेडियर चाहता तो बहुत खुशी मना सकता था लेकिन उसके चार लफ्जों ने बताया कि जीतने के बावजूद वो ब्रिगेडियर और उसकी यूनिट के हालात पर दुखी था।


...पाकिस्तान के शायरों, लेखकों, एक्टरों, एक्ट्रेसेज को जो प्यार-मोहब्बत भारत में मिलती है, वो पाकिस्तान में दुर्लभ है। पाकिस्तान के शायर भारत में मुशायरों में जाते हैं तो उनके लिए वहां पलकें बिछा दी जाती हैं। नुसरत फतेह अली खान कैसे करोड़ों भारतीयों के दिलो-दिमाग में छाए हुए हैं....कैसे आबिदा परवीन को सुनने के लिए दिल्ली के कनॉट प्लेस में भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी। ...कैसे राजा गजनफर अली ने पाकिस्तान-भारत की सरकारों को बाध्य किया कि एक क्रिकेट मैच अमृतसर में कराया जाए, जिसे दोनों देशों के लोग एकसाथ देखें। वो मैच हुआ और लाहौरी युवक अमृतसर में उन अनजान सिख परिवारों में मेहमान बने, जिनसे कभी पहले वो मिले ही नहीं थे। सिख परिवारों ने पाकिस्तान से आए लोगों की मेहमाननवाजी में कोई कसर नहीं छोड़ी।...कैसे अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री बने तो पाकिस्तान के काफी पत्रकार उनको कवर करने के लिए दिल्ली पहुंचे। ऐसे कई उदाहरण उन्होंने दोनों तरफ के गिनाए हैं। भारत के कुछ मौजूदा पत्रकारों का जिक्र करते हुए उनकी तारीफ भी की गई है। 



रहमान मौजूदा हालात का जिक्र करते हुए कहते हैं कि आज हालात ये हैं कि पाकिस्तान में कोई युवक अगर क्रिकेटर विराट कोहली की तारीफ करता है तो हुकूमत कट्टरपंथियों के दबाव में उसे जेल भेज देती है। वो लिखते हैं कि ऐसे हालात दोनों तरफ अचानक नहीं बने हैं। इसके लिए सरकारी एजेंसियों ने दिन-रात मेहनत की है। दोनों तरफ के मीडिया की गलती ये है कि वो ऐसी सरकारी एजेंसियों का बिना सोचे समझे खिलौना बन गए। उनका कहना है कि दोनों तरफ का मीडिया इन हालात को और बिगाड़ सकता है और सुधार भी सकता है। खासतौर पर उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के संदर्भ में ये बात कही है।