Sunday, June 26, 2016

अमजद साबरी जैसा कोई नहीं

26 जून 2016 के नवभारत टाइम्स लखनऊ में प्रकाशित पाकिस्तान के मशहूर कव्वाल अमजद साबरी पर

प्रकाशित मेरा लेख...बाकी पाठकों को भी यह उपलब्ध हो सके, इसलिए इसे यहां पेश किया जा रहा है...


पाकिस्तान में सूफी विरासत को मिटाने का सिलसिला जारी है। चाहे वो सूफियाना कलाम गाने वाले गायक हों या सूफी संतों की दरगाहें हों, लगातार वहाबियों व तालिबानी आतंकवादियों का निशाना बन रही हैं। 45 साल के अमजद साबरी 22 जून 2016 को इसी टारगेट किलिंग का शिकार बने। वहाबियों का सीधा सा फंडा है, पैगंबर और उनके परिवार का जिक्र करने वाले सूफी गायकों, शायरों और सूफी संतों की दरगाहों को अगर मिटा दिया गया तो इन लोगों का नामलेवा कोई नहीं बचेगा। लेकिन कट्टरपंथी यह भूल जाते हैं कि किसी को मारने से उस विचारधारा का खात्मा नहीं होता। वह और भी जोरदार तरीके से नए रूप में वापसी करती है।



अमजद साबरी के साथ भी तो यही हुआ। कहां तो अमजद को हमेशा कैरम और क्रिकेट खेलने का शौक रहा लेकिन विरासत में मिली जिम्मेदारी को निभाने के लिए उन्हें कव्वाल बनना पड़ा। ...और वो न सिर्फ बने बल्कि मरते दम तक वो पाकिस्तानी यूथ के आइकन थे।

क्रिकेट के खेल में मस्त अमजद को एक दिन उनके पिता फरीद गुलाम साबरी पकड़कर लाए और कहा, मेरे अपने चाचा के साथ बैठकर रियाज किया करो। उस दिन से अमजद ने पीछे मुड़कर नहीं देखा लेकिन उनका क्रिकेट खेलने का शौक अंत तक जारी रहा। यही वजह थी कि कराची में 23 जून को अमजद के जनाजे में उमड़ी भीड़ में युवकों की तादाद ज्यादा थी। अमजद की मौत पर पूरा भारतीय उपमहाद्वीप और जहां-जहां उनके चाहने वाले थे, निहायत रंजों-गम में डूब गए।



साबरी घराने का ताल्लुक भारत से है। हरियाणा के भिवानी जिले की चरखी दादरी तहसील में कलियाणा गांव से साबरी परिवार 1947 में भारत-पाकिस्तान बंटवारे के वक्त पाकिस्तान कूच कर गया था। भारत से पाकिस्तान गए इन लोगों को आज भी मुहाजिर (रिफ्यूजी) बोला जाता है। ये लोग पाकिस्तान बड़ी उम्मीदों से पहुंचे थे लेकिन वहां इन्हें अपने शुरुआती दिन बहुत ग़रीबी में बिताने पड़े। इसी दौर में गुलाम फरीद साबरी की ज़ुबान पर ये कलाम
- भर दो झोली मेरी या मोहम्मद, लौट के न जाउंगा खाली – आया और साबरी ब्रदर्स भारतीय उपमहाद्वीप में छा गए। इसके बाद तो उन्होंने एक से एक कव्वालियां पेश कीं और उन्होंने इस क्षेत्र में एक इतिहास रच दिया।

पिता और चाचा के निधन के बाद अमजद पर इस विरासत को संभालने की पूरी जिम्मेदारी आन पड़ी। अमजद की आवाज अपने पिता व चाचा से बहुत भिन्न नहीं थी तो अमजद के पैर भी आसानी से इस क्षेत्र में जम गए। तब तक कव्वाली भी महफिलों से निकलकर टीवी पर आ गई। अमजद ने अमीर खुसरो, निजामुद्दीन औलिया, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के कलाम को नए अंदाज में पेश किया और वो बहुत जल्द पाकिस्तान के यूथ की पहचान बन गए। संगीत की दुनिया में नुसरत फतेह अली खान, राहत फतेह अली खान के बाद अगर किसी की पहचान थी तो वो अमजद साबरी ही थे।
मई 2014 में उन्होंने जियो टीवी पर एक कार्यक्रम पेश किया। इस कार्यक्रम के होते ही पाकिस्तान में कट्टरपंथियों ने शोर मचा दिया। उन्होंने कहा कि जियो पर इस कार्यक्रम को बंद कराया जाए और ईश निंदा (Blasphemy ) कानून के तहत अमजद साबरी, जियो टीवी के मालिक, एंकर, और शायर अकील मोहसिन नकवी पर केस दर्ज किया जाए। इसी के बाद से अपने पिता की तरह ही अमजद पर आतंक का साया मंडराने लगा। अमजद की खासियत थी कि वो महज कव्वाल नहीं थे। वो मूलतः एक शायर थे, जो पैगंबर की शान में, उनके परिवारों वालों की शान में, कर्बला की शान में तमाम रचनाएं पढ़ते थे। जिस दिन अमजद साबरी की हत्या हुई, उसी दिन कराची में ही कुछ घंटे बाद भारतीय मूल के प्रसिद्ध नौहाख्वान फरहान अली वारिस की कार पर भी गोलियां बरसाईं गईं। उस वक्त वो कार में नहीं थे। फरहान अली वारिस पिछले साल लखनऊ, फैजाबाद के कई कार्यक्रमों में आ चुके हैं। वहाबी कट्टरपंथियों को हर वो इंसान नापसंद है जो उनकी नीति के हिसाब से नहीं चलता। पाकिस्तान के कट्टर मौलवियों ने इस पूरे पाकिस्तान को इसी आग में झोंक दिया है। इन मौलवियों का हीरो मुल्ला उमर जैसा शख्स है।

साबरी ब्रदर्स समेत तमाम कलाकार, लेखक, शायर पाकिस्तान में बहुत बुरे दौर से गुजर रहे हैं। वक्त ने साबरी ब्रदर्स का बार-बार इम्तेहान लिया है। 1977 में पाकिस्तान में जुल्फिकार अली भुट्टो की चुनी हुई सरकार को अपदस्थ करके जनरल जिया उल हक ने सत्ता संभाली और पाकिस्तान में मार्शल लॉ लगा दिया। जिया उल हक चूंकि वहाबी विचारधारा को मानता था इसलिए उसने फौरन पाकिस्तान को कट्टर इस्लामिक देश में बदलने का फैसला किया। पाकिस्तान में 1978 से 1988 तक काला दौर रहा। साबरी ब्रदर्स से कहा गया कि वे अपने सूफियाना कलाम में सिर्फ पैगंबर का जिक्र करें, उनके परिवार के अन्य लोगों का नहीं। साबरी ब्रदर्स ने पाकिस्तान की महफिलों में गाना छोड़ दिया और तब उनके कार्यक्रम अमेरिका, भारत में बहुतायत में होने लगे। इसी दौर में -बोल की लब आजाज हैं- और -हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे- जैसा तराना लिखने वाले मशहूर शायर फैज़ अहमद फैज़ को भी पाकिस्तान छोड़कर बेरूत में राजनीतिक शरण लेनी पड़ी। यानी उस दौर में जिसने भी जिया उल हक की कट्टर वहाबी विचारधारा का विरोध किया, उसे पाकिस्तान छोड़ना पड़ा।

...लेकिन पाकिस्तान जिस रास्ते पर बढ़ चुका था, उससे पीछे नहीं पलटा। बाबा फरीद की मज़ार, दाता दरबार की दरगाह समेत पाकिस्तान में सूफी संतों की मजारों को चुन-चुनकर वहाबी कट्टरपंथियों ने निशाना बना रहे हैं। यह क्रम पिछले कई दशक से जारी है। इनमें वो हत्याएं शामिल नहीं हैं जिनमें अहमदियों, शियों, ईसाईयों, हिंदुओं व अन्य अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया गया। वहां फौजी शासक या हुकुमतें बदलती रहीं लेकिन उसके डीएनए में कट्टरपंथ का जो बीज बोया गया था, उससे उसकी वापसी नहीं हुई। बहरहाल, अमजद का बेटा मुजदिद साबरी औऱ भाई तल्हा साबिरी अमजद की विरासत संभालने को तैयार हैं। सूफी गायिका आबिदा परवीन ने कहा है कि हालांकि अब अमजद जैसा दूसरा पैदा नहीं होगा लेकिन मुझे उनके बेटों से उम्मीद है कि वो परंपरा को आगे बढ़ाएंगे।


Amjad Sabri none like

Pkistan continues to erase the Sufi heritage. Whether or Sufi singers who sing the melody Kalam Drgahen are Wahhabis, and constantly being hit by Taliban militants. Amjad Sabri June 22, 2016, corresponding to 45 years were victims of targeted killings. RIGHT plainly Wahhabis, the Prophet and his family to describe the Sufi singers, poets and Sufi shrines of saints deleted if none of these people will be left unheard. But do not forget that this radical ideology that killing someone is not eradicated. He has also returned strongly to the new look.

The same happened with Amjad Sabri. So where Amjad was always fond of cricket and carrom but inherited them Qawwal had to fulfill the responsibility. ... And he just made it to the death, but the icon of the Pakistani youth.

The game of cricket Mast Amjad Ghulam Fareed Sabri took a day to bring his father and said, I sit with my uncle Do Riaz. Amjad has not looked back since that day but he likes to play cricket continued until the end. That was the reason that Amjad funeral in Karachi on June 23, the number of youths in the thronging crowd over. Amjad's death and the Indian subcontinent, where their loved ones were, exceedingly Rnjon-drowned in sorrow.

Sabri's family hails from India. Charkhi Dadri Tehsil of Bhiwani district Kliana Sabri family from the village in 1947 had traveled to Pakistan during Partition of India and Pakistan. Even today these people from India to Pakistan Muhajir (refugee) is spoken. They had come from Pakistan but they are great expectations of his early days spent in poverty. About that time, the tongue of Ghulam Farid Sabri Kalam
- Fill my bag or Mohammed, will go not to return empty - Sabri Brothers came and rocked the Indian subcontinent. After that he gave a Kwwalian and he made history in this area.

Father and uncle after the death of Amjad assuming full responsibility for this heritage why not. Amjad's voice was not very different from his father and uncle Amjad feet so easily frozen in the region. Qawwali by then out of the gatherings came on TV. By Amjad Amir Khusrau, Nizamuddin Aulia, Khwaja Moinuddin Chishti Kalam presented in a way and they soon become the hallmark of Pakistani youth. In the world of music Nusrat Fateh Ali Khan, Rahat Fateh Ali Khan was the identity of anyone he was Amjad Sabri.
In May 2014, he presented a program on Geo TV. The program consists of the noise caused by extremists in Pakistan. He closed the program may be made on the Geo and blasphemy (Blasphemy) Act Amjad Sabri, owner of Geo TV, anchors, and poet Aqeel Mohsin Naqvi should file a case. Amjad like this since his father took over the looming shadow of terror. Amjad was typical of that he was not just Qawwal. He was originally a poet, to the elegance of the Prophet, in the elegance of those of their families, all the compositions studied elegance of Karbala. Amjad Sabri was assassinated the day, a few hours later the same day in Karachi famous Indian Nauhakwan Farhan Ali Waris were fired at the car. At that time he was not in the car. Farhan Ali Waris last Lucknow, Faizabad have arrived in many programs. Wahhabi fundamentalists dislike that person at all, according to their policy does not. Pakistan's hardline clerics have burned the whole Pakistan. Mullah Omar is somebody like the hero of these clerics.

Sabri Brothers, including many artists, writers, poets in Pakistan are going through a very bad phase. While the Sabri Brothers have repeatedly TEST. Zulfikar Ali Bhutto in Pakistan in 1977 by overthrowing the elected government of General Zia ul Haq took power and imposed martial law in Pakistan. Zia was the Wahhabi ideology considers Pakistan a radical Islamic country, he immediately decided to change. In Pakistan from 1978 to 1988 was charred. Sabri Brothers Kalam said in his melody, just refer to the Prophet, his family and not others. Sabri Brothers song gatherings left Pakistan and America and their program, there were in abundance in India. -We See -bol in this period and the club are Ajaj, Lajim that we will look at the famous poet Faiz Ahmad Faiz, who wrote the song, leaving Pakistan in Beirut also had to seek political asylum. At that time the radical Wahhabi ideology of Zia-ul Haq, who also opposed Pakistan had to leave him.

... But on the way in which Pakistan had increased, her second relapse. Mazar of Baba Farid, donor Darbar Sufi shrine in Pakistan, including the graves of selectively Wahhabi fundamentalists are targeting. This order continues the past several decades. They do not include these killings which Ahmadis, Shias, Christians, Hindus and other minorities were targeted. The military ruler or Hukumten varied but the seed was sown in the DNA of radicalism, that he did not return. However, the son of Amjad Sabri Mujadid Awrh brother Talha Amjad Sabiri are willing to assume the mantle. Sufi singer Abida Parveen as Amjad said that although the second will not arise now, but I hope that their sons will carry forward that tradition.


Amajad Saabaree jaisa koee nahin

-Yusuf Kirmani


paakistaan mein soophee viraasat ko mitaane ka silasila jaaree hai. chaahe vo soophiyaana kalaam gaane vaale gaayak hon ya soophee santon kee daragaahen hon, lagaataar vahaabiyon va taalibaanee aatankavaadiyon ka nishaana ban rahee hain. 45 saal ke amajad saabaree 22 joon 2016 ko isee taaraget kiling ka shikaar bane. vahaabiyon ka seedha sa phanda hai, paigambar aur unake parivaar ka jikr karane vaale soophee gaayakon, shaayaron aur soophee santon kee daragaahon ko agar mita diya gaya to in logon ka naamaleva koee nahin bachega. lekin kattarapanthee yah bhool jaate hain ki kisee ko maarane se us vichaaradhaara ka khaatma nahin hota. vah aur bhee joradaar tareeke se nae roop mein vaapasee karatee hai. 

amajad saabaree ke saath bhee to yahee hua. kahaan to amajad ko hamesha kairam aur kriket khelane ka shauk raha lekin viraasat mein milee jimmedaaree ko nibhaane ke lie unhen kavvaal banana pada. ...aur vo na sirph bane balki marate dam tak vo paakistaanee yooth ke aaikan the.

kriket ke khel mein mast amajad ko ek din unake pita phareed gulaam saabaree pakadakar lae aur kaha, mere apane chaacha ke saath baithakar riyaaj kiya karo. us din se amajad ne peechhe mudakar nahin dekha lekin unaka kriket khelane ka shauk ant tak jaaree raha. yahee vajah thee ki karaachee mein 23 joon ko amajad ke janaaje mein umadee bheed mein yuvakon kee taadaad jyaada thee. amajad kee maut par poora bhaarateey upamahaadveep aur jahaan-jahaan unake chaahane vaale the, nihaayat ranjon-gam mein doob gae. 

saabaree gharaane ka taalluk bhaarat se hai. hariyaana ke bhivaanee jile kee charakhee daadaree tahaseel mein kaliyaana gaanv se saabaree parivaar 1947 mein bhaarat-paakistaan bantavaare ke vakt paakistaan kooch kar gaya tha. bhaarat se paakistaan gae in logon ko aaj bhee muhaajir (riphyoojee) bola jaata hai. ye log paakistaan badee ummeedon se pahunche the lekin vahaan inhen apane shuruaatee din bahut gareebee mein bitaane pade. isee daur mein gulaam phareed saabaree kee zubaan par ye kalaam

- bhar do jholee meree ya mohammad, laut ke na jaunga khaalee – aaya aur saabaree bradars bhaarateey upamahaadveep mein chha gae. isake baad to unhonne ek se ek kavvaaliyaan pesh keen aur unhonne is kshetr mein ek itihaas rach diya. 

pita aur chaacha ke nidhan ke baad amajad par is viraasat ko sambhaalane kee pooree jimmedaaree aan padee. amajad kee aavaaj apane pita va chaacha se bahut bhinn nahin thee to amajad ke pair bhee aasaanee se is kshetr mein jam gae. tab tak kavvaalee bhee mahaphilon se nikalakar teevee par aa gaee. amajad ne ameer khusaro, nijaamuddeen auliya, khvaaja moinuddeen chishtee ke kalaam ko nae andaaj mein pesh kiya aur vo bahut jald paakistaan ke yooth kee pahachaan ban gae. sangeet kee duniya mein nusarat phateh alee khaan, raahat phateh alee khaan ke baad agar kisee kee pahachaan thee to vo amajad saabaree hee the. 

maee 2014 mein unhonne jiyo teevee par ek kaaryakram pesh kiya. is kaaryakram ke hote hee paakistaan mein kattarapanthiyon ne shor macha diya. unhonne kaha ki jiyo par is kaaryakram ko band karaaya jae aur eesh ninda (blasphaimy ) kaanoon ke tahat amajad saabaree, jiyo teevee ke maalik, enkar, aur shaayar akeel mohasin nakavee par kes darj kiya jae. isee ke baad se apane pita kee tarah hee amajad par aatank ka saaya mandaraane laga. amajad kee khaasiyat thee ki vo mahaj kavvaal nahin the. vo moolatah ek shaayar the, jo paigambar kee shaan mein, unake parivaaron vaalon kee shaan mein, karbala kee shaan mein tamaam 

rachanaen padhate the. jis din amajad saabaree kee hatya huee, usee din karaachee mein hee kuchh ghante baad bhaarateey mool ke prasiddh nauhaakhvaan pharahaan alee vaaris kee kaar par bhee goliyaan barasaeen gaeen. us vakt vo kaar mein nahin the. pharahaan alee vaaris pichhale saal lakhanoo, phaijaabaad ke kaee kaaryakramon mein aa chuke hain. vahaabee kattarapanthiyon ko har vo insaan naapasand hai jo unakee neeti ke hisaab se nahin chalata. paakistaan ke kattar maulaviyon ne is poore paakistaan ko isee aag mein jhonk diya hai. in maulaviyon ka heero mulla umar jaisa shakhs hai.

saabaree bradars samet tamaam kalaakaar, lekhak, shaayar paakistaan mein bahut bure daur se gujar rahe hain. vakt ne saabaree bradars ka baar-baar imtehaan liya hai. 1977 mein paakistaan mein julphikaar alee bhutto kee chunee huee sarakaar ko apadasth karake janaral jiya ul hak ne satta sambhaalee aur paakistaan mein maarshal lo laga diya. jiya ul hak choonki vahaabee vichaaradhaara ko maanata tha isalie usane phauran paakistaan ko kattar islaamik desh mein badalane ka phaisala kiya. paakistaan mein 1978 se 1988 tak kaala daur raha. saabaree bradars se kaha gaya ki ve apane soophiyaana kalaam mein sirph paigambar ka jikr karen, unake parivaar ke any logon ka nahin. saabaree bradars ne paakistaan kee mahaphilon mein gaana chhod diya aur tab unake kaaryakram amerika, bhaarat mein bahutaayat mein hone lage.

 isee daur mein -bol kee lab aajaaj hain- aur -ham dekhenge, laazim hai ki ham bhee dekhenge- jaisa taraana likhane vaale mashahoor shaayar phaiz ahamad phaiz ko bhee paakistaan chhodakar beroot mein raajaneetik sharan lenee padee. yaanee us daur mein jisane bhee jiya ul hak kee kattar vahaabee vichaaradhaara ka virodh kiya, use paakistaan chhodana pada.

...lekin paakistaan jis raaste par badh chuka tha, usase peechhe nahin palata. baaba phareed kee mazaar, daata darabaar kee daragaah samet paakistaan mein soophee santon kee majaaron ko chun-chunakar vahaabee kattarapanthiyon ne nishaana bana rahe hain. yah kram pichhale kaee dashak se jaaree hai. inamen vo hatyaen shaamil nahin hain jinamen ahamadiyon, shiyon, eesaeeyon, hinduon va any alpasankhyakon ko nishaana banaaya gaya. vahaan phaujee shaasak ya hukumaten badalatee raheen lekin usake deeene mein kattarapanth ka jo beej boya gaya tha, usase usakee vaapasee nahin huee. baharahaal, amajad ka beta mujadid saabaree aur bhaee talha saabiree amajad kee viraasat sambhaalane ko taiyaar hain. soophee gaayika aabida paraveen ne kaha hai ki haalaanki ab amajad jaisa doosara paida nahin hoga lekin mujhe unake beton se ummeed hai ki vo parampara ko aage badhaenge. 

1 comment:

Satish Saxena said...

सामयिक व अावश्यक लेख !!
श्रद्धांजलि उनको ...