Wednesday, May 25, 2016

खतरनाक ख्यालात....Dangerous Thoughts ...Must Read for Muslims...मुसलमान जरूर पढ़ें


उसके खतरनाक ख्याल ने मेरी नींद हराम कर दी है।

अयोध्या में विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल ने एक ट्रेनिंग कैंप लगाया, जिसके फोटो मीडिया और सोशल मीडिया पर वायरल हुए। जिसमें दिखाया गया है कि कुछ युवकों के हाथों में हथियार हैं और वे हथियार चलाने की ट्रेनिंग ले रहे हैं।
इस फोटो के सामने आने के बाद फौरन स्वयंभू मुस्लिम परस्त नेता असाउद्दीन ओवैसी का बयान आया कि अगर मुसलमान भी इस तरह के ट्रेनिंग कैंप लगाएं तो क्या होगा...

कुछ बेवकूफ, जाहिल और कुछ पढ़े-लिखे मुसलमान ओवैसी की जयजयकार करते हुए कूद पड़े और कहा, हां बताओ...अगर हम भी ऐसा करें तो...

यह खतरनाक विचार है...खतरनाक ख्याल है...जिसे मुसलमानों को ओवैसी की राजनीति के साथ ही दफन कर देना चाहिए...हालांकि तमाम मुसलमान चिंतक मेरी इस सलाह की धज्जियां उड़ा देंगे औऱ उर्दू अखबारों में मेरे खिलाफ लिखकर पन्ने काले कर देंगे...लेकिन मुझे उनकी परवाह नहीं है। ...और जो लोग मुझे नहीं जानते हैं, वे भी रातोंरात मुझे संघ समर्थक या उनका एजेंट बताने में जुट जाएंगे। बहरहाल, सारा घटनाक्रम एक बहुत नाजुक मोड़ पर सामने आया है, इसलिए सभी को आगाह करना मेरा फर्ज और जिम्मेदारी है... 

मैं क्या कहना चाहता हूं...मुसलमान उसको गौर से पढ़ें और समझें...

मुसलमानों, तुम्हें मालूम है कि जिन्ना ने पाकिस्तान बनाने के लिए क्या कोई हथियार उठाया था। मोहम्मद अली जिन्ना नामक शख्स ने सिर्फ अपने टाइपराइटर और दिमाग का इस्तेमाल किया, हालात का फायदा उठाया और पाकिस्तान लेकर माना। जिन्ना के पास तो कोई फौज भी नहीं थी, पिस्तौल का लाइसेंस तक नहीं था। जिन्ना की राजनीतिक महत्वकांक्षा की वजह से जो देश खड़ा हुआ, आज उसका हाल देखिए। काश, अगर पाकिस्तान न बना होता और वहां के मुसलमान और भारत में बचे बाकी मुसलमान एक बड़े देश के रूप में कितनी बड़ी ताकत होते...लेकिन अंग्रेजों ने जिन्ना के साथ मिलकर खेल खेला और जिसका खामियाजा आज दोनों ही देशों के मुसलमान भुगत रहे हैं। लेकिन बात जिन्ना की काबलियत की हो रही है। उसने बिना हथियार उठाए, पाकिस्तान नामक कारनामा अंजाम दिया। ...मैं यह नहीं कह रहा कि हमें दूसरा जिन्ना चाहिए या कोई और पाकिस्तान चाहिए। हमें अपनी रणनीति बदलनी होगी।...

इस्लाम के मूल सिद्धांतों पर लौटना होगा। इस्लाम का मूल सिद्धांत रोजे-नमाज के अलावा यह भी कहता है कि इल्म हासिल करो और इल्म से हर चीज पर कब्जा कर लो। भारत के मुसलमानों को अगर भारत पर फिर से कब्जा करना है तो उसे इल्म हासिल करना होगा। गांव-गांव...शहर-शहर तहरीक चलाकर हर क्षेत्र में इल्म हासिल करो। सिर्फ फेसबुक या ट्विटर पर स्टेटस अपडेट करने से ये सब हासिल नहीं होगा। मेरा धर्म अच्छा-तेरा धर्म खराब कहने से आप इस्लाम नहीं फैला सकते।  

अब भगत सिंह पर बात करते हैं। जी हां, शहीद-ए-आजम भगत सिंह। जिनकी शहादत को बार-बार मैं सलाम करता हूं। इसी कड़ी में नेता जी सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद, बिस्मिल, सुखदेव, राजगुरु, अशफाक उल्ला खान समेत क्रांतिकारियों का नाम भी शामिल है। इन लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हथियार उठाया था लेकिन क्या भारत को आजादी इनके हथियार उठाने और उसका सही इस्तेमाल करने पर मिली....इसका जवाब नहीं में है। हालांकि इससे इनके आंदोलन को कम करके नहीं आंका जा सकता लेकिन सशस्त्र हिंसा से आप अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच सकते। छोटी-मोटी कामयाबियां मिल सकती हैं लेकिन बड़ी कामयाबी नामुमकिन है। दूसरा ये है कि हम एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं। वोट डालकर सरकार बदलते हैं। लोकतंत्र में सशस्त्र क्रांति जरूरत फिलहाल महसूस नहीं हो रही है। इसलिए विश्व हिंदू परिषद या आरएसएस या अन्य कोई हिंदू संगठन अगर हथियारों का ट्रेनिंग कैंप लगाते हैं या त्रिशूल बांटते हैं तो उन्हें ऐसा करने दीजिए। यकीन मानिए उनकी संख्या बहुत थोड़ी सी है। भारत में हिंदुओं की बहुत बड़ी आबादी इन हथियार ट्रेनिंग कैंपों को पसंद नहीं करती। आरएसएस या विहिप की छटपटाहट भी यही है। इसीलिए ये लोग तरह-तरह के करतब करके हिंदू हितैषी संगठन होने का ड्रामा करते रहते हैं।
   
चलिए अब रणनीति पर बात करते हैं...भारत के युवा मुस्लिम एक नई तहरीक को जन्म दे सकते हैं। क्योंकि वे देवबंदी-बरेलवी या शिया-सुन्नी के चक्कर में नहीं हैं। कुछ मुस्लिम युवक हर गांव, हर शहर से निकलें। सबसे पहले हर मुसलमान घर के बारे में आंकड़े जुटाएं। किसकी किस तरह की जरूरत है। उसे दर्ज करें। एक-एक रुपया चंदा हर घर से लें। इसके बाद एक नेटवर्क बनाएं। वो नेटवर्क इस तरह का हो कि गांव अपने जिले से जुड़ें, जिले वाले अपने डिवीजन से जुड़ें और डिवीजन वाले अपने राज्य से जुड़ें। फिर राज्य मिलकर पूरे भारत की एक तहरीक, जिसका कोई भी नाम रखकर संगठन खड़ा कर दें। जो एक-एक रुपया चंदा देश भर से जमा हो, उसे बैंक में रखें और उसके ब्याज से जरूरतमंद मुसलमानों की पढ़ाई और अन्य इल्म हासिल करने में मदद करें। अनुमान के तौर पर अगर भारत में 40 करोड़ मुसलमान हैं तो 40 करोड़ का ब्याज अच्छा खासा मिल जाएगा। 40 करोड़ में सारे जरूरतमंद नहीं हैं। कुछ लोगो ज्यादा पैसा देंगे। तो यह रकम 50 करोड़ के आसपास होनी चाहिए। एक सिस्टम बनाकर इस पैसे का इस्तेमाल किया जा सकता है। किसी मुस्लिम बैंकर की सेवा ली जा सकती है। ...संगठन का नाम किसी मुस्लिम नाम पर न हो, बल्कि कोई आधुनिक नाम सोचें। जिससे अगर कोई गैर मुसलमान मदद करना चाहे तो उसे परहेज न हो। ये प्रोजेक्ट बड़ा है, इस पर विस्तार से यहां नहीं लिखा जा सकता।

इसमें कट्टर मुल्ला-मोलवी एक पेंच फंसा सकते हैं। वे कह सकते हैं कि बैंक के ब्याज का इस्तेमाल हराम है। उनकी बात कतई न सुनें। उनके खुद के खाते सरकारी-प्राइवेट बैंकों में हैं और वे ब्याज का इस्तेमाल भी करते हैं। इस मामले में मुल्ला-मौलवी की बातों को नजरन्दाज कर दें। मुझे पूरी उम्मीद है कि बैंक के ब्याज से अगर कोई मुस्लिम बच्चा पढ़-लिख लेता है या अन्य इल्म हासिल कर लेता है तो अल्लाह भी इस गुनाह (अगर ये है तो) के लिए हम सब को माफ कर देगा। क्योंकि वो बहुत मेहरबान और दयालु है। वो अपनी सबसे जहीन मखलूख को कतई जहन्नुम में नहीं भेजेगा।  

...ऊपर मैंने जिन्ना की बात की। ...अब चलिए माननीय कांशीराम और बाबा साहब आंबेडकर की बात करते हैं। जाहिल मुसलमानों और इनके तथाकथित रहनुमाओं को इन दोनों नेताओं की जीवनी (आटोबायोग्राफी) का अध्ययन करना चाहिए। जिन्ना की तरह बाबा साहब विदेश से कानून की पढ़ाई करके आए और अपने समाज यानी दलितों की स्थिति का बारीकी से अध्ययन किया। भारतीय संविधान लिखने का मौका मिला तो दलितों को नहीं भूले। आंबेडकर की वजह से दलित कांग्रेस के साथ हो लिए। सत्ता के नशे में चूर कांग्रेस भ्रष्ट हो गई। बाबा साहब चले गए। दलित कांग्रेस के गुलाम बने रहे। फिर एक सरकारी नौकरी करने वाले शख्स कांशीराम को लगा कि जब कांग्रेस सत्ता के नशे में दलितों को भूल चुकी है और कुछ क्रीमीलेयर वाले दलित ही सारी मौज उड़ा रहे हैं तो उन्होंने दलितों को जगाने का अभियान शुरू किया।
...आंबेडकर मेरे पैदा होने से पहले दुनिया से कूच कर चुके थे। लेकिन कांशीराम की पूरी राजनीति मेरे सामने पली-बढ़ी और परवान चढ़ी। शुरुआत उन्होंने अपने उसी सरकारी दफ्तर से की। वहां बामसेफ बनाया, तमाम दलित सरकारी कर्मचारियों और अफसरों की नेटवर्किंग की। उनसे फंड लिया। फिर एक दिन राजनीतिक दल खड़ा कर दिया। कांशीराम की कई सभाओं की कवरेज और बहुत बार उनसे बातचीत करने के बाद मैं अन्य पत्रकारों की ही तरह इस विश्लेषण पर पहुंचा कि ये शख्स भारतीय राजनीति में बहुत बड़ा गुल खिलाएगा। ...बरेली, जालंधर, फरीदाबाद, लखनऊ, लुधियाना, फैजाबाद, अमृतसर में मैंने इस शख्स को गंदे कपड़ों में एक अटैची हाथ में लिए हुए सरकारी सर्किट हाउसों में कमरा तलाशते देखा है। उसी गंदे कपड़े में और कभी-कभी पायजामा व बनियान पहने हुए उन्हें न तो उन्हें पत्रकारों से मिलने में हिचकिचाहट होती थी औऱ न आम कार्यकर्ताओं से। इन तमाम शहरों में मेरे कई पत्रकार मित्र उस सीन के गवाह रहे हैं। ...बहुत सारी बातों को संक्षेप में करते हुए यहां पर आते हैं कि उन्होंने बहुजन समाज पार्टी बनाई और देश के सबसे बड़े राज्य यूपी को प्रयोगशाला बनाते हुए वहां प्रयोग किया और वहां बीएसपी की पहली सरकार बनी। मायावती को उन्होंने बागडोर सौंप दी। लेकिन इस सारे दौरान उनकी सेहत लगातार गिरती जा रही थी। मायावती विरासत को तो न ठीक से संभाल आईं और न आगे बढ़ा पाईं। लेकिन दलित मजबूती से बहुजन समाज पार्टी से जुड़ चुके थे और अभी भी वहीं हैं। मायावती ने कुछ गलतियां की हैं, जिन्हें अभी भी सुधारा जा सकता है औऱ दलित आंदोलन को आगे बढ़ाया जा सकता है।

बीच में मायावती चुनाव हार गईं, दलित आंदोलन ढीला पड़ गया। यही बाकीक फर्क आरएसएस और कांशीराम के प्रयोग में है। संघ ने गुजरात को प्रयोगशाला बनाया, वहां बीजेपी का भी अभी भी कब्जा है। संघ वहां से एक प्रचारक को निकालकर लाया और पीएम की कुर्सी तक पहुंचा दिया। भ्रष्टों तत्वों की वजह से कांशीराम का ऐसा ही प्रयोग यूपी में फेल हो गया। दलित आंदोलन कमजोर पड़ गया। अन्यथा दलितों की आबादी इस देश में एक दलित प्रधानमंत्री बनाने की हैसियत रखती है। आरएसएस से दलित राजनीति का यह हिसाब अभी होना है। देखते हैं कि दलित कब तक अपना प्रधानमंत्री संसद में भेज पाते हैं। दलित नेता ऐसा प्रयोग मुसलमानों के साथ मिलकर कर सकते हैं। दोनों मिलकर जब चाहें ये प्रयोग कर लें।

मायावती के तौर-तरीके से बस एक ही खतरा है कि उनके सलाहकार सोशल इंजीनियरिंग के दम पर उन्हें खिसका कर कहीं उधर न ले जाएं। यूपी विधानसभा के पिछले दो चुनावों में इस सोशल इंजीनियरिंग का काफी प्रचार हुआ था कि दलित वोटों के साथ मायावती को कथित ऊंची जातियों या स्वर्णों का भी वोट मिला था। मायावती उस धारा में बह भी गईं। सतीश मिश्रा जैसे फायदे उठाने वाले लोग सामने आए, जिनकी मां के नाम पर कॉलेज या यूनिवर्सिटी खोलने के लिए मायावती ने लखनऊ के नजदीक कीमती जमीन भी दी। मतलब ये हुआ कि इस सोशल इंजीनियरिंग का फायदा या तो मायावती ने उठाया या फिर सतीश मिश्रा ने, जिन्हें फिर से राज्यसभा में लाया जा रहा है। 2017 के यूपी चुनाव में बहुत उम्मीद है कि मायावती के साथ मुसलमान भी होंगे। नसीमुद्दीन को मुस्लिम चेहरा बनाकर पेश भी किया जा रहा है। लेकिन नसीमुद्दीन भी दूसरे सतीश मिश्रा हैं जो मुस्लिम वोट कार्ड खेलकर फायदा उठाना चाहते हैं। तो आखिर मुसलमान करे क्या...

मुसलमान हालात पर बारीक नजर रखे। पहली पसंद दलित मंच ही होना चाहिए। लेकिन अगर मायावती में सुधार नहीं आता है तो देर-सवेर नया दलित लीडर खड़ा करके उनसे यह ताकत छीननी चाहिए। बेशक इसके लिए बहुजन समाज पार्टी से ही कोई निकल कर आए। अगर मायावती नहीं सुधरती हैं और गरीब दलितों, पिछड़ों व मुसलमानों को लेकर सही फैसले नहीं करती हैं तो नया लीडर उभारने के लिए तैयार रहिए या फिर नए विकल्पों पर विचार कीजिए। क्या ऐसा संभव है कि कांग्रेस में कोई दलित लीडर उठकर खड़ा हो और दलित-मुसलमान फिर से कांग्रेस में लौटकर नई राजनीति को जन्म दें। राहुल या सोनिया चाहें तो ये प्रयोग कर सकते हैं। वे अपनी पार्टी के जुझारू दलित व मुस्लिम युवाओं को आगे बढ़ने का मौका दें। खुद पीछे रहें। शायद कुछ करामात हो जाए। एक बार इस प्रयोग करने में क्या बुराई है...गांधी परिवार ने बहुत राज किया। उन्हें वाकई अगर फिरकापरस्त ताकतों से बदला लेना है तो वे किसी दलित को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाने में पहल करें। इतिहास में वो अमर हो जाएंगे।
   
 ...हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या और जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के स्टूडेंट्स मूवमेंट को कुचलने की जिस तरह कोशिश हुई। उसके बाद जरूरी हो गया है कि दलित-मुस्लिम युवा एक राजनीतिक मंच पर आएं। ...दलित और मुस्लिम संगठनों, बुद्धिजीवियों ने जिस तरह से दोनों आंदोलनों को बुलंद करने में अपनी भूमिका निभाई, उससे एक नई रोशनी आती दिखाई दे रही है। दलित-मुसलमान एक मंच पर आकर भारत की पूरी राजनीति बदल सकते हैं। खैर, इस मुद्दे पर भविष्य में भी सभी साथी और विचार करेंगे। इसकी पूरी रूपरेखा फिलहाल अस्पष्ट है। कुछ चीजें दिख रही हैं लेकिन अभी भी धुंध छंटी नहीं है।

अभी मसला दूसरा दरपेश है। चलिए...बात को आगे बढ़ाते हैं...

भारत में मुसलमान मुगलों की शक्ल में आए और यहां हुकूमत की। भारत तब तक बारुद खोज नहीं पाया था...(याद रखिएगा इस ऐतिहासिक तथ्य को)...मुगल बारुद लेकर आया था, उसने तलवार से लड़ने लड़ने वालों को लगभग रौंदते हुए युद्ध में हरा दिया और अपना राज स्थापित किया। तब का यही नियम था, भौगोलिक सीमाएं आज की तरह नहीं थीं। लोग लड़ते थे, जो जीता वही सिकंदर। हालांकि दक्षिणपंथी इतिहासकार मुगलों को लुटेरा और न जाने क्या-क्या कहते हैं लेकिन चूंकि बेचारे इतिहास का अध्ययन ठीक से नहीं करते तो इस तरह की हल्की बातें लिखते और बोलते हैं। भारत में बाद में भी हिंदू राजा-महाराजा भी तो आपस में युद्ध करते थे और एक दूसरे के गांव-शहर पर कब्जा कर लेते थे।...खैर...

ठीक है...ये तो बहुत पुराना इतिहास है। इसकी तह में हम नहीं जाते। लेकिन मुसलमानों को सोचना चाहिए कि आखिर वो कौन सी सोच थी, जो मुगलों को यहां तक लाई। भारत मे उन्होंने कई सौ साल राज किया। इस्लाम न सिर्फ फैलाया बल्कि उसे मजबूत भी किया। लेकिन मुगल मूल रूप से सेकुलर ही थे, तो यहां के लोगों का अस्तित्व पूरी तरह मिटाने पर आमादा नहीं हुए बल्कि उन्होंने भारत की संस्कृति को भी आत्मसात किया। जो सिर्फ भारत की ही खूबी है कि जो यहां रचता-बसता है, भारत उसको निराश नहीं करता है। भारत ने मुगलों को भी निराश नहीं किया।

...सत्ता के नशे में चूर मुगल बादशाहत धीरे-धीरे डगमगाने लगी। जो कुदरत का भी एक नियम है...एक क्रम है। उसे नष्ट होना ही था। उसकी चमक फीकी पड़नी ही थी। अंग्रेज आए जो वाकई लुटेरे थे, हालांकि बंकिमचंद्र ने अपने उपन्यास आनंद मठ में उन्हें कहीं भी लुटेरा नहीं लिखा है, बल्कि उनका गुणगान किया है। अंग्रेजों ने न सिर्फ भारत को जमकर लूटा बल्कि उसे मजहबी आधार पर भी बांट दिया। जिसका फायदा जिन्ना ने उठा लिया। जिन्ना तो अपना पाकिस्तान लेकर मेरे नाना के साथ पाकिस्तान चले गए। लेकिन जिन मुसलमानों ने यहां रहने का फैसला किया, क्या वो घाटे में रहे। मेरी नजर में जरा भी घाटे नहीं रहे। मेरे पास जो फीडबैक है उसके मुताबिक भारत का मुसलमान पाकिस्तान के मुसलमान से हर मामले में ज्यादा मजबूत है।

...लेकिन जिस तरह से भारत में वो तरक्की कर रहा है। उसके हालात बदल रहे हैं....कतिपय संगठनों और तत्वों को ये बुरा लग रहा है। उनमें कहीं न कहीं असुरक्षा की भावना पनप रही है। कई ऐसे लेख सामने आए हैं जिनमें इन बातों का प्रचार किया जा रहा है कि भारतीय मुसलमान बहुत आगे निकल रहे हैं। इसलिए उसे छोटे-छोटे मसलों में उलझाने की कोशिश जारी रहती है। भारत का ही नहीं अंतरराष्ट्रीय कारपोरेट मीडिया जिस तरह मुसलमानों को आतंकवादी बताकर उसके धर्म की गंदी तस्वीर पेश करता है, दरअसल वो वही असुरक्षा की भावना है।

....तो मेरे भारत के मुसलमान भाइयो...मित्रों...डर कौन रहा है। अरे, आपसे सामने वाला डर रहा है। क्योंकि उसे कुछ लोग साजिशन मिलकर डरा रहे है। इसीलिए हम निहत्थे लोगों से असुरक्षित महसूस कर वो हथियारों का ट्रेनिंग कैंप लगा रहे हैं। बताइए...आप बेकार हाय-तौबा मचा रहे हैं। इसलिए ओवैसी को बकने दीजिए। आपको किसी भी तरह का ट्रेनिंग लगाने और न इस विचार को अपने अंदर लाने की जरूरत है। जो लोग असुरक्षित होते हैं, उन्हें ही हथियार चाहिए होते हैं, उन्हें ही ट्रेनिंग कैंप लगाने की जरूरत पड़ती है।

यकीन मानिए...वक्त जरूर बदलता है। ये मुट्ठी भर लोग जो आज ट्रेनिंग कैंप लगा रहे हैं, एक दिन इन कैंपों को छोड़कर भाग खड़े होंगे। भारत सेकुलर है, रहेगा। क्योंकि बाबा साहब उसे बहुत गहराई से लिखकर गए हैं, उसे घनघोर हिंदू विचारधारा कभी बदल नहीं पाएगी। वक्त का इंतजार कीजिए और ट्रेनिंग कैंप व ओवैसी को भूल जाइए। सिर्फ दलित-मुस्लिम राजनीति को ठोस रूप में आकार लेना होगा, ये लोग भागते नजर आएंगे...



 khataranaak khyaalaat....

usake khataranaak khyaal ne meree neend haraam kar dee hai.

ayodhya mein vishv hindoo aur bajrang dal parishad ne ek trening kaimp lagaaya, jisake photo meediya aur soshal meediya par vaayaral hue. jisamen dikhaaya gaya hai ki kuchh yuvakon ke haathon mein hathiyaar hain aur ve hathiyaar chalaane kee trening le rahe hain.

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kuchh bevakooph, jaahil aur kuchh padhe-likhe musalamaan ovaisee kee jayajayakaar karate hue kood pade aur kaha, haan batao...agar ham bhee aisa karen to... 

yah khataranaak vichaar hai...khataranaak khyaal hai...jise musalamaanon ko ovaisee kee raajaneeti ke saath hee daphan kar dena chaahie...haalaanki tamaam musalamaan chintak meree is salaah kee dhajjiyaan uda denge aur urdoo akhabaaron mein mere khilaaph likhakar panne kaale kar denge...lekin mujhe unakee paravaah nahin hai. ...aur jo log mujhe nahin jaanate hain, ve bhee raatonraat mujhe sangh samarthak ya unaka ejent bataane mein jut jaenge. baharahaal, saara ghatanaakram ek bahut naajuk mod par saamane aaya hai, isalie sabhee ko aagaah karana mera pharj aur jimmedaaree hai... 

main kya kahana chaahata hoon...musalamaan usako gaur se padhen aur samajhen...
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...oopar mainne jinna kee baat kee. ...ab chalie maananeey kaansheeraam aur baaba saahab aambedakar kee baat karate hain. jaahil musalamaanon aur inake tathaakathit rahanumaon ko in donon netaon kee jeevanee (aatobaayograaphee) ka adhyayan karana chaahie. jinna kee tarah baaba saahab videsh se kaanoon kee padhaee karake aae aur apane samaaj yaanee daliton kee sthiti ka baareekee se adhyayan kiya. bhaarateey sanvidhaan likhane ka mauka mila to daliton ko nahin bhoole. aambedakar kee vajah se dalit kaangres ke saath ho lie. satta ke nashe mein choor kaangres bhrasht ho gaee. baaba saahab chale gae. dalit kaangres ke gulaam bane rahe. phir ek sarakaaree naukaree karane vaale shakhs kaansheeraam ko laga ki jab kaangres satta ke nashe mein daliton ko bhool chukee hai aur kuchh kreemeeleyar vaale dalit hee saaree mauj uda rahe hain to unhonne daliton ko jagaane ka abhiyaan shuroo kiya. 

...aambedakar mere paida hone se pahale duniya se kooch kar chuke the. lekin kaansheeraam kee pooree raajaneeti mere saamane palee-badhee aur paravaan chadhee. shuruaat unhonne apane usee sarakaaree daphtar se kee. vahaan baamaseph banaaya, tamaam dalit sarakaaree karmachaariyon aur aphasaron kee netavarking kee. unase phand liya. phir ek din raajaneetik dal khada kar diya. kaansheeraam kee kaee sabhaon kee kavarej aur bahut baar unase baatacheet karane ke baad main any patrakaaron kee hee tarah is vishleshan par pahuncha ki ye shakhs bhaarateey raajaneeti mein bahut bada gul khilaega. ...barelee, jaalandhar, phareedaabaad, lakhanoo, ludhiyaana, phaijaabaad, amrtasar mein mainne is shakhs ko gande kapadon mein ek ataichee haath mein lie hue sarakaaree sarkit hauson mein kamara talaashate dekha hai. usee gande kapade mein aur kabhee-kabhee paayajaama va baniyaan pahane hue unhen na to unhen patrakaaron se milane mein hichakichaahat hotee thee aur na aam kaaryakartaon se. in tamaam shaharon mein mere kaee patrakaar mitr us seen ke gavaah rahe hain. ...bahut saaree baaton ko sankshep mein karate hue yahaan par aate hain ki unhonne bahujan samaaj paartee banaee aur desh ke sabase bade raajy yoopee ko prayogashaala banaate hue vahaan prayog kiya aur vahaan beeesapee kee pahalee sarakaar banee. maayaavatee ko unhonne baagador saump dee. lekin is saare dauraan unakee sehat lagaataar giratee ja rahee thee. maayaavatee viraasat ko to na theek se sambhaal aaeen aur na aage badha paeen. lekin dalit majabootee se bahujan samaaj paartee se jud chuke the aur abhee bhee vaheen hain. maayaavatee ne kuchh galatiyaan kee hain, jinhen abhee bhee sudhaara ja sakata hai aur dalit aandolan ko aage badhaaya ja sakata hai.

beech mein maayaavatee chunaav haar gaeen, dalit aandolan dheela pad gaya. yahee baakeek phark aareses aur kaansheeraam ke prayog mein hai. sangh ne gujaraat ko prayogashaala banaaya, vahaan beejepee ka bhee abhee bhee kabja hai. sangh vahaan se ek prachaarak ko nikaalakar laaya aur peeem kee kursee tak pahuncha diya. bhrashton tatvon kee vajah se kaansheeraam ka aisa hee prayog yoopee mein phel ho gaya. dalit aandolan kamajor pad gaya. anyatha daliton kee aabaadee is desh mein ek dalit pradhaanamantree banaane kee haisiyat rakhatee hai. aareses se dalit raajaneeti ka yah hisaab abhee hona hai. dekhate hain ki dalit kab tak apana pradhaanamantree sansad mein bhej paate hain. dalit neta aisa prayog musalamaanon ke saath milakar kar sakate hain. donon milakar jab chaahen ye prayog kar len.

maayaavatee ke taur-tareeke se bas ek hee khatara hai ki unake salaahakaar soshal injeeniyaring ke dam par unhen khisaka kar kaheen udhar na le jaen. yoopee vidhaanasabha ke pichhale do chunaavon mein is soshal injeeniyaring ka kaaphee prachaar hua tha ki dalit voton ke saath maayaavatee ko kathit oonchee jaatiyon ya svarnon ka bhee vot mila tha. maayaavatee us dhaara mein bah bhee gaeen. sateesh mishra jaise phaayade uthaane vaale log saamane aae, jinakee maan ke naam par kolej ya yoonivarsitee kholane ke lie maayaavatee ne lakhanoo ke najadeek keematee jameen bhee dee. matalab ye hua ki is soshal injeeniyaring ka phaayada ya to maayaavatee ne uthaaya ya phir sateesh mishra ne, jinhen phir se raajyasabha mein laaya ja raha hai. 2017 ke yoopee chunaav mein bahut ummeed hai ki maayaavatee ke saath musalamaan bhee honge. naseemuddeen ko muslim chehara banaakar pesh bhee kiya ja raha hai. lekin naseemuddeen bhee doosare sateesh mishra hain jo muslim vot kaard khelakar phaayada uthaana chaahate hain. to aakhir musalamaan kare kya...

musalamaan haalaat par baareek najar rakhe. pahalee pasand dalit manch hee hona chaahie. lekin agar maayaavatee mein sudhaar nahin aata hai to der-saver naya dalit leedar khada karake unase yah taakat chheenanee chaahie. beshak isake lie bahujan samaaj paartee se hee koee nikal kar aae. agar maayaavatee nahin sudharatee hain aur gareeb daliton, pichhadon va musalamaanon ko lekar sahee phaisale nahin karatee hain to naya leedar ubhaarane ke lie taiyaar rahie ya phir nae vikalpon par vichaar keejie. kya aisa sambhav hai ki kaangres mein koee dalit leedar uthakar khada ho aur dalit-musalamaan phir se kaangres mein lautakar naee raajaneeti ko janm den. raahul ya soniya chaahen to ye prayog kar sakate hain. ve apanee paartee ke jujhaaroo dalit va muslim yuvaon ko aage badhane ka mauka den. khud peechhe rahen. shaayad kuchh karaamaat ho jae. ek baar is prayog karane mein kya buraee hai...gaandhee parivaar ne bahut raaj kiya. unhen vaakee agar phirakaaparast taakaton se badala lena hai to ve kisee dalit ko pradhaanamantree pad tak pahunchaane mein pahal karen. itihaas mein vo amar ho jaenge. 

...haidaraabaad sentral yoonivarsitee ke chhaatr rohit vemula kee sansthaagat hatya aur javaahar laal neharu yoonivarsitee (jeenayoo) ke stoodents moovament ko kuchalane kee jis tarah koshish huee. usake baad jarooree ho gaya hai ki dalit-muslim yuva ek raajaneetik manch par aaen. ...dalit aur muslim sangathanon, buddhijeeviyon ne jis tarah se donon aandolanon ko buland karane mein apanee bhoomika nibhaee, usase ek naee roshanee aatee dikhaee de rahee hai. dalit-musalamaan ek manch par aakar bhaarat kee pooree raajaneeti badal sakate hain. khair, is mudde par bhavishy mein bhee sabhee saathee aur vichaar karenge. isakee pooree rooparekha philahaal aspasht hai. kuchh cheejen dikh rahee hain lekin abhee bhee dhundh chhantee nahin hai. 
abhee masala doosara darapesh hai. chalie...baat ko aage badhaate hain... 

bhaarat mein musalamaan mugalon kee shakl mein aae aur yahaan hukoomat kee. bhaarat tab tak baarud khoj nahin paaya tha...(yaad rakhiega is aitihaasik tathy ko)...mugal baarud lekar aaya tha, usane talavaar se ladane ladane vaalon ko lagabhag raundate hue yuddh mein hara diya aur apana raaj sthaapit kiya. tab ka yahee niyam tha, bhaugolik seemaen aaj kee tarah nahin theen. log ladate the, jo jeeta vahee sikandar. haalaanki dakshinapanthee itihaasakaar mugalon ko lutera aur na jaane kya-kya kahate hain lekin choonki bechaare itihaas ka adhyayan theek se nahin karate to is tarah kee halkee baaten likhate aur bolate hain. bhaarat mein baad mein bhee hindoo raaja-mahaaraaja bhee to aapas mein yuddh karate the aur ek doosare ke gaanv-shahar par kabja kar lete the....khair...

theek hai...ye to bahut puraana itihaas hai. isakee tah mein ham nahin jaate. lekin musalamaanon ko sochana chaahie ki aakhir vo kaun see soch thee, jo mugalon ko yahaan tak laee. bhaarat me unhonne kaee sau saal raaj kiya. islaam na sirph phailaaya balki use majaboot bhee kiya. lekin mugal mool roop se sekular hee the, to yahaan ke logon ka astitv pooree tarah mitaane par aamaada nahin hue balki unhonne bhaarat kee sanskrti ko bhee aatmasaat kiya. jo sirph bhaarat kee hee khoobee hai ki jo yahaan rachata-basata hai, bhaarat usako niraash nahin karata hai. bhaarat ne mugalon ko bhee niraash nahin kiya.

...satta ke nashe mein choor mugal baadashaahat dheere-dheere dagamagaane lagee. jo kudarat ka bhee ek niyam hai...ek kram hai. use nasht hona hee tha. usakee chamak pheekee padanee hee thee. angrej aae jo vaakee lutere the, haalaanki bankimachandr ne apane upanyaas aanand math mein unhen kaheen bhee lutera nahin likha hai, balki unaka gunagaan kiya hai. angrejon ne na sirph bhaarat ko jamakar loota balki use majahabee aadhaar par bhee baant diya. jisaka phaayada jinna ne utha liya. jinna to apana paakistaan lekar mere naana ke saath paakistaan chale gae. lekin jin musalamaanon ne yahaan rahane ka phaisala kiya, kya vo ghaate mein rahe. meree najar mein jara bhee ghaate nahin rahe. mere paas jo pheedabaik hai usake mutaabik bhaarat ka musalamaan paakistaan ke musalamaan se har maamale mein jyaada majaboot hai. 

...lekin jis tarah se bhaarat mein vo tarakkee kar raha hai. usake haalaat badal rahe hain....katipay sangathanon aur tatvon ko ye bura lag raha hai. unamen kaheen na kaheen asuraksha kee bhaavana panap rahee hai. kaee aise lekh saamane aae hain jinamen in baaton ka prachaar kiya ja raha hai ki bhaarateey musalamaan bahut aage nikal rahe hain. isalie use chhote-chhote masalon mein ulajhaane kee koshish jaaree rahatee hai. bhaarat ka hee nahin antararaashtreey kaaraporet meediya jis tarah musalamaanon ko aatankavaadee bataakar usake dharm kee gandee tasveer pesh karata hai, darasal vo vahee asuraksha kee bhaavana hai.

....to mere bhaarat ke musalamaan bhaiyo...mitron...dar kaun raha hai. are, aapase saamane vaala dar raha hai. kyonki use kuchh log saajishan milakar dara rahe hai. iseelie ham nihatthe logon se asurakshit mahasoos kar vo hathiyaaron ka trening kaimp laga rahe hain. bataie...aap bekaar haay-tauba macha rahe hain. isalie ovaisee ko bakane deejie. aapako kisee bhee tarah ka trening lagaane aur na is vichaar ko apane andar laane kee jaroorat hai. jo log asurakshit hote hain, unhen hee hathiyaar chaahie hote hain, unhen hee trening kaimp lagaane kee jaroorat padatee hai.

yakeen maanie...vakt jaroor badalata hai. ye mutthee bhar log jo aaj trening kaimp laga rahe hain, ek din in kaimpon ko chhodakar bhaag khade honge. bhaarat sekular hai, rahega. kyonki baaba saahab use bahut gaharaee se likhakar gae hain, use ghanaghor hindoo vichaaradhaara kabhee badal nahin paegee. vakt ka intajaar keejie aur trening kaimp va ovaisee ko bhool jaie. sirph dalit-muslim raajaneeti ko thos roop mein aakaar lena hoga, ye log bhaagate najar aaenge...


 Dangerous Thoughts

His dangerous idea has me sleepless.

Ayodhya VHP and Bajrang Dal had a training camp, which have gone viral on social media and photo media. Which showed that the weapons in the hands of some young men, and they are trained as weapons.
Shortly after this photo in front of the self-proclaimed pro-Muslim leader's statement comes Asauddin Owaisis if Muslims find such a training camp, what will happen ...

Some stupid, uneducated and educated Muslims with singing of Owaisis plunged and said to tell ... if we do that then ...

It is considered dangerous ... dangerous ... what do you think Muslims should be buried with Owaisis politics ... However, many Muslim thinkers will tear my advice Awrh Pages Black to write against me in Urdu newspapers ... but I do not give a damn. ... And those who do not know me, they also started overnight will tell me the pro-union or his agent. However, all the events unfolded at a very crucial point, so all my duty and responsibility to warn ...

What I want to say ... Muslims read carefully and understand him ...

Muslims, you know, to make Pakistan what Jinnah had picked up a weapon. Mohammed Ali Jinnah, the man simply used his typewriter and mind, took advantage of the situation and considered to Pakistan. Jinnah did not have any army, was not licensed pistol. Jinnah stood the country because of political ambitions, his recent look today.are. But getting the ability Jinnah. He took up arms without, called Pakistan been done. ... I am not saying that we should second Jinnah and Pakistan should no. We have to change their strategy ....

A return to the fundamentals of Islam. In addition to the basic principles of Islam, fasting, prayers, and it also says that the knowledge gained from knowledge capture everything up. India aims to recapture the Muslims of India, it will have acquired knowledge. Tehrik running from city to city, village ... Do acquire knowledge in every field. Only status updates on Facebook or Twitter will not achieve all these. You say good-bad your religion, my religion, Islam can not spread.

Now talk to Bhagat Singh. Yes, Shaheed-e-Azam Bhagat Singh. I salute their martyrdom repeatedly. In the series, Netaji Subhash Chandra Bose, Chandrashekhar Azad, Bismil, Sukhdev and Raj Guru, Ashfaq Ullah Khan has also been named among revolutionaries. These people took up arms against the British but their freedom to India to take up arms and get it right .... the answer is no. Although it can not be reduced to their movement from armed violence but can not reach its destination. Small successes can get great success, but it is impossible. The second is that we live in a democratic country. Votes cast change government. Armed revolution is taking place in a democracy need not feel now. Therefore, if any Hindu organization Vishwa Hindu Parishad or RSS or weapons training camp so let them take a share or trident. Believe Their number is very small. A large section of Hindus in India does not like these weapons training camps. This is the desperate struggle of the RSS or VHP. So these people by tricks such drama to keep the Hindu-friendly organization.

Now let's talk strategy ... India can lead to young Muslim Tehrik a new. Shia-Sunni Deobandi-Barelvi or because they are not in the affair. Some Muslim youth every village, every city exit. First, gather data about every Muslim home. What else is needed. enter the. Every single penny donations from home stay. Then create a network. Those networks that do this kind of village Join your district, district and division of their division Join Join your state. The state of the country, consisting of a movement, whose name no one should be standing with the organization. The rupee donations from around the country to accumulate, keep it in the bank and its interest to acquire knowledge and education of needy Muslims Help. 

As estimated 40 million Muslims, 40 million in India will get significant interest. 40 million are not all the needy. Some people will pay more. So it should be around Rs 50 crore. The money can be used by the system. The service may be a Muslim banker. ... The name of the organization is not a Muslim name, but consider a modern name. If someone wants to help the non-Muslims do not refrain. The project is large, it can not be written in detail here.

It can trap radical Islamic Molvi a screw. They can say that the use of the Bank's interest is forbidden. Do not listen to them at all. His own account of the use of public-private banks and they also have interest. In this case, the mullahs may Njrndaj things. I sincerely hope that the bank's interest-read if a Muslim child takes or acquires the knowledge God the crime (if you have it), we will forgive all. Because he is generous and kind. He will not send in their best crop Mkluk hell at all.

... I Jinnah spoke of above. ... Now let us talk of the Honourable Ram and Babasaheb Ambedkar. Goth Muslims and their so-called leaders of these two leaders biography (Atobayografi) should study. Jinnah came to study law abroad like Ambedkar and the Dalit situation closely studied their society. Dalits did not forget the opportunity to write the constitution. Ambedkar Dalit Congress due to be with. Drunk with power, Congress has become corrupt. Babasaheb left. Ghulam remained depressed. Ram was a man who had a government job again felt the intoxication of power in Congress has forgotten the Dalits and Dalit creamy whole surroundings are blown, they began a campaign to awaken Dalits.

... Ambedkar had traveled the world before I was born. But Ram's politics grew up in front of me and climbed Parwan. He started from the office of the government. BAMCEF there made all the downtrodden public servants and officers of networking. Funds taken from them. Then one day put a political party. ... Bareilly, Jalandhar, Faridabad, Lucknow, Ludhiana, Faizabad, Amritsar I soiled the man holding a briefcase in the room searching for houses have seen the official circuit. At the same dirty clothes and sometimes wearing trousers and vest them neither of them were afraid to meet journalists or ordinary workers Awrh. 

Many of my journalist friends in these cities are the scene witnessed. ... In short, the many things that come on here and they created the country's largest state, Uttar Pradesh, the Bahujan Samaj Party, making the laboratory and used there, the first government of the BSP. He handed her the reins. But all this time his health was steadily decreasing. Not properly handle the legacy she had not been able to move forward. But strong Dalit Bahujan Samaj Party had joined and are still there. Mayawati has made some mistakes, which may still be below it, and can be carried on the Dalit movement.

She lost in the elections, the Dalit movement was breaking loose. Bakik difference is in the use of the RSS and Ram. Union built laboratory Gujarat, where BJP is still occupied. The association brought forth a publicist and reached the PM's chair. Ram because of the corrupt elements in the state, failed to use it. Dalit movement faltered. Otherwise Dalit population in this country has the status of a Dalit prime minister. RSS Dalit politics it is yet to be accounted for. Let's see how long the underdog send its prime minister in Parliament find. You can use it together with Dalit Muslims. Together, you want to make use of these.

She is just one of the ways of the danger that their own social engineering consultant, move them around and not move elsewhere. UP Assembly in the last two elections were widely publicized this social engineering Mayawati alleged that Dalit votes of upper castes or Swarnon had voted. She also said that the stream flowing. People who come advantages such as Satish Mishra, whose mother's name to open a college or university near Lucknow Mayawati given prime land. This meant that she was raised by social engineering or exploit either Satish Mishra, who is again being brought to the Rajya Sabha. Mayawati in UP in 2017 with great hopes that there will be Muslim. Nasimuddin being introduced by the Muslim face. But also other Nasimuddin Satish Mishra playing card which want to benefit the Muslim vote. So what should the Muslims ...

Muslims watching the situation closely. Dalit platform should be first choice. But if she does not improve, then sooner or later force them to raise new Dalit leader should take away. Of course, no one came out of the BSP. If she does not improve and the poor Dalits, backward classes and Muslims do not take the right decisions, be prepared to highlight the new leader or consider new options. It is possible that a Dalit leader in Congress stood up and Dalit-Muslim in Congress returned again to give birth to the new politics. He or she can use it if you wish. Dalit and Muslim youth of his party militant allowing proceed. Stay behind himself. Perhaps some may Karamat. What is the harm in using a time ... Gandhi family ruled much. If sectarian forces them to take revenge on you, they take the initiative to reach a Dalit prime minister. He will be immortalized in history.

 ... Hyderabad Central University and Jawaharlal Nehru University student Rohit Vemula institutional murder (JNU) Students Movement was trying to crush way. After that it was necessary that both Dalit-Muslim youth a political platform. ... Dalit and Muslim organizations, intellectuals, by the way both played their part in upholding movements, appears to come from a new light. Dalit-Muslim of India to come together and change politics. Well, on this issue in the future and will consider all partners. The entire framework is unclear at present. Some things that are seen but still not trimmed mist.

Still another issue is ... It's bucking ...

Came in the form of Muslims in India and the rule of the Mughals. Until then I had not dynamite India ... (Take remember this historical fact) ... Mughal had brought ammunition, sword fighting, fighters he defeated in battle and almost tread established their rule. That was the rule then, like today, was not bound by geography. People were fighting, who won the same Alexander. Although predatory wing Mughal historian and what not to say, but the poor do not have to study the history properly write and speak of such things light.

Well ... that is a very old history. We do not go into that at all. But what Muslims should think that after all she was thinking, even brought the Mughals. He ruled for hundreds of years in India. Islam is not only strong but also dispersed. But Mughal were basically secular, then the existence of the people, but he did not fully intent on destroying Indian culture imbibed. India is only the beauty that dwells here-creates, India does not disappoint him. Mughal India also did not disappoint.

... Power drunk Mughal reign slowly started to crumble. ... Is a sequence which is a rule of nature. He had to be destroyed. Befall her was dull shine. Englishman who came were really robbers, although Bankim's novel Anand Math robber is not written anywhere in, but he is lauded. The British not only in India but also robbed him fiercely divided on religious grounds. Jinnah took the advantage. Jinnah of Pakistan to take her with my grandfather migrated to Pakistan. But Muslims who chose to live here, she losers. Deficits are not at all in my view.


















Thursday, May 19, 2016

मीडिया को बीजेपी की जीत कुछ ज्यादा ही बड़ी नजर आ रही है

आज 19 मई को आए पांच राज्यों के चुनाव नतीजे बता रहे हैं कि बीजेपी को काफी फायदा हुआ है। असम में उसकी सरकार बन गई है। मीडिया ने कांग्रेस का मरसिया पढ़ दिया है। लेकिन मीडिया अपने खेल से बाज नहीं आ रहा है। उसे बीजेपी की जीत कुछ ज्यादा ही बड़ी नजर आ रही है।


हम लोग बहुत जल्द पिछला चुनाव भूल जाते हैं।...बिहार में कुछ महीने पहले जो इतिहास बना था, उसे असम के शोर में दबाने की कोशिश हो रही है। ...मीडिया वाले उस शिद्दत से केरल में कम्युनिस्टों की वापसी का शोर नहीं मचा रहे हैं। जितनी शिद्दत से वो असम केंद्रित चुनाव विश्लेषण को पेश कर रहे हैं। ...

...लेकिन क्या वाकई इसे बीजेपी की ऐतिहासिक जीत करार दिया जाए। क्या वाकई जनता ने कांग्रेस को दफन कर दिया है। लेकिन अगर इन चुनाव नतीजों की गहराई में जाकर देखा जाए तो अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग कारणों से पब्लिक ने विभिन्न पार्टियों को चुना है। असम की बात पहले करते हैं। असम में लंबे अर्से से कांग्रेस की सरकार थी और तरुण गोगोई के पास कमान थी। लेकिन 10 सालों में कांग्रेस ने इस राज्य में ऐसा ठोस कुछ भी नहीं किया कि जनता उसे तीसरी बार भी मौका देती। असम में कांग्रेस मुस्लिम वोटों के बूते लगातार जीत रही थी। कुछ समय से इत्र व्यापारी बदरुद्दीन अजमल के नेतृत्व में वहां एक क्षेत्रीय पार्टी एआईयूडीएफ खड़ी हुई और उसने कांग्रेस के मुस्लिम वोट बैंक में पूरी तरह सेंध लगा दी। बीजेपी असम पर लगातार अपना ध्यान केंद्रित किए हुए थी, उसने वहां कुछ नहीं किया, उसने वहां सिर्फ हिंदू वोटों को एकजुट किया और आसानी से इस बार चुनाव जीत लिया। इस बार असम में मुस्लिम मतदाता बुरी तरह बिखर गए। इस राज्य में बांग्लादेश से आने वाले रिफ्यूजियों का बड़ा मुद्दा रहता है। उनके काफी वोट भी असम में हैं। लगता है कि वो मतदाता इस बार अजमल की पार्टी की तरफ चले गए।

लेकिन आपको बता दूं कि असम में कांग्रेस खत्म नहीं हुई है। पिछले विधानसभा चुनाव में उसे 30 पर्सेंट वोट मिले थे तो इस बार भी उसे 30 पर्सेंट वोट मिले लेकिन उसके सामने जो अलग-अलग छोटे दल थे, उन्होंने बीजेपी से समझौता किया और वो उन वोटों को बीजेपी के खाते में ले आए। यह बहुत आसान सा चुनावी गणित है। इसलिए असम में पहली बार बीजेपी सत्ता में है लेकिन कांग्रेस को वहां खत्म मान लेना, भूल होगी।

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि असम में 35 फीसदी मुस्लिम आबादी के बीच बीजेपी अपनी सरकार किस तरह चलाती है, क्या वो यहां अपने हिंदुत्ववादी एजेंडे पर ही सरकार चलाएगी...क्या वो यहां भी गुजरात जैसे प्रयोग करेगी या फिर वो असम में एक ऐसा शासन देगी जो असम को कांग्रेस से हमेशा के लिए दूर कर देगा।

असम में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत के अलावा पश्चिम बंगाल और केरल में उसका खाता खुलने को भी तमाम टीवी चैनलों के विश्लेषक बहुत बड़ा फायदा बता रहे हैं लेकिन अगर पैमाना यही है तो गुजरात में एक सीट के लिए हुए उपचुनाव में बीजेपी क्यों हार गई...यूपी में दो सीटों पर उपचुनाव हुए, एक सीट पर समाजवादी पार्टी और दूसरी सीट पर बीजेपी जीती। इस नतीजे से आप क्या नतीजा निकालेंगे। दिल्ली नगर निगम के चुनावों में बीजेपी बुरी तरह हार गई, कांग्रेस अच्छी सीटें लाईं... इस नतीजे से आप क्या संभावना टटोलेंगे...अगर आप इन चुनावों से संकेत ही तलाशने निकले हैं तो फिर अपने-अपने हिसाब से संकेत निकाल लीजिए...कौन रोक सकता है किसी को।

तमाम पार्टियों के नेता जनता के इस संकेत बार-बार समझने में भूल कर रहे हैं कि वो सिर्फ काम चाहती है। पश्चिम बंगाल में मोदी ने ताबड़तोड़ रैलियां कीं, ममता बनर्जी के खिलाफ चुन-चुन कर जुमलों का इस्तेमाल किया लेकिन इसके बावजूद ममता वहां 2011 के विधानसभा चुनाव से भी ज्यादा सीटें लेकर आई हैं। पश्चिम बंगाल में लंबे वक्त तक कम्युनिस्टों की सरकार रही है। इस दौरान उनके मुख्यमंत्रियों ने एक भी ऐसा बेमिसाल काम नहीं किया जो उन्हें दोबारा सत्ता दिला पाता। ममता वहां तब तक जीतती रहेंगी, जब तक वो कुछ अच्छे काम करती रहेंगी। यहां पर बीजेपी का कुछ सीटें पाना, दरअसल मैं इसलिए अच्छा मान रहा हूं कि राष्ट्रीय पार्टियों की उपस्थिति राज्यों में जरूर रहनी चाहिए, अन्यथा उस राज्य की सरकार पर अंकुश खत्म हो जाता है। लेकिन कुछ सीटों के आधार पर इसे बीजेपी की जीत की शुरुआत मानवा सही नहीं होगा। पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों को सत्ता में लौटने के लिए कुछ अलग तरह की रणनीति पर काम करना होगा, वो सिर्फ ममता की आलोचना करके चुनाव जीतने का सपना देखना भूल जाएं।

तमिलनाडु में एग्जिट पोल करने वाले दलालों को बड़ा झटका लगा है। इस राज्य को लेकर एक पोल कहता था कि वहां करुणानिधि की डीएमके व कांग्रेस मिलकर सरकार बनाएंगे। दूसरा पोल डरते हुए बता रहा था कि जयललिता जीत सकती हैं। लेकिन नतीजे आए तो पता चला कि जयललिता भारी बहुमत से वापस लौट आई हैं।

केरल में वामपंथी पार्टियों की वापसी हुई है। यह राज्य कांग्रेस के हाथ से निकल गया है। हालांकि केरल के लोग हर पांच साल बाद सरकार बदल देते हैं। हर विधानसभा चुनाव में इसे दोहराया जाता है।

पुड्डुचेरी में कांग्रेस की सरकार बन सकती है। वहां के चुनाव नतीजे इस लेख को लिखे जाने तक साफ नहीं थे।

पांच राज्यों के अलावा यूपी में हुए उपचुनाव में दोनों सीटें समाजवादी पार्टी ने जीत ली है। गुजरात में एक सीट पर हुए उपचुनाव में बीजेपी ने जीत हासिल कर ली है।


पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में भी मोदी ने कई जनसभाएं की थीं लेकिन उनकी तादाद अकेले बिहार के मुकाबले कम थी। मतलब यह हुआ पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु में भी बीजेपी ने काफी कुछ दांव पर लगाया हुआ था और तस्वीर इस तरह पेश की जा रही थी कि लगता है कि यहां भी बीजेपी छा जाने वाली है लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। दो-चार सीटें मिल जाने को अब सबसे बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा है। ...तो कुल मिलाकर बीजेपी सिर्फ और सिर्फ असम की जीत का जश्न मना सकती है लेकिन यह जीत उसे कांग्रेस की नासमझी, भ्रष्टाचार की वजह से मिली है। आने वाला वक्त तय करेगा कि असम की जीत भविष्य में बीजेपी के लिए पूर्वोत्तर में और क्या रास्ता तय करेगी...पर कांग्रेस के लिए यह जरूर संकट की घड़ी है।...उसे फिर से सारी रणनीति बनानी होगी। गांधी परिवार को पीछे होकर पार्टी को प्रमुखता देनी होगी।

Monday, May 16, 2016

व्हील चेयर पर मां...


-यूसुफ किरमानी

मेरे पास मां नहीं है। ट्वीटर पर डालने के लिए फोटो भी नहीं है। एक फोटो थी, उसे भाई या बहन ने ले लिया, तब से वापस नहीं किया। लेकिन फिर सोचता हूं कि कोई फोटो मेरी मां का वजूद तय नहीं कर सकता। क्योंकि मां के होने का एहसास हर वक्त रहता है।

जिनके पास मां है...उनसे जलन होती है। काश, मेरी मां भी आज जिंदा होती...कुछ नहीं तो फलाने साहब की तरह मां की फोटो ट्वीट कर ज़माने भर की हमदर्दी पा लेता। ...लोग कहते देखों इतना बड़ा लेखक-पत्रकार और मां की फोटो ट्वीट कर रहा है बेचारा। कितना बड़ा दिल है...मां को छोटे-छोटे गमले भी दिखा रहा है।

मां हमेशा अपने बच्चे के लिए ढाल का काम करती है। बच्चे पर कोई आफत आए, मां सबसे पहले उस आफत का सामना करने को तैयार रहती है। बच्चा अगर चोर या गिरहकट है तो भी उसकी मां आसानी से उसे चोर या गिरहकट मानने को तैयार नहीं होती। जब ज़माना आप पर तरह-तरह के आरोप लगाए तो एक मां ही ऐसी होती है जो आपके साथ खड़ी होती है। देश में या विदेश में या फिर किसी कंपनी में जब आपकी साख फर्जी डिग्री, फर्जी हलफनामे, फर्जी जुमलेबाजी से डूबने लगती है तो ऐसे में आप मां को आगे कर देते हैं और ज़माने को आपसे हमदर्दी सी हो जाती है कि देखो इतना बड़ा आदमी...लेकिन मां को नहीं भूला। ...आप मां की व्हीलचेयर की आड़ में बहुत खूबसूरती से खुद को तमाम आरोपों की बौछार से बचा ले जाते हैं।

मुझे चाय नहीं बेचनी पड़ी, ठीक से पढ़ लिख भी गया। फर्जी डिग्री बनवाने की नौबत नहीं आई। हैपी बर्थडे को लेकर भी कोई विवाद नहीं रहा। आधी पढ़ाई मां के सामने कर ली थी और थोड़ा-मोड़ा कमाने भी लग गया था। उन्हें यकीन और सुकून था कि मेरी जिंदगी ठीक से कट जाएगी, चाहे 99 के फेर में रहूं या न रहूं।

कहते हैं मां के पैरों के नीचे जन्नत होती है यानी अगर आप मां की सेवा करते हैं तो आपका स्वर्ग में जाना तय है। हालांकि यह कहावत उन अर्थों में विवादास्पद मानी जाएगी...जब आपके हाथ कई बेगुनाहों के खून से रंगे हों...जब आपने जीतेजी कई मांओं का सिंदूर उजाड़ दिया हो...जब आप के इशारे पर मां बनने से पहले कई बेटियों की इज्जत लूटी गई हो...ऐसे में आपकी मां भला आपको कैसे जन्नत में ले जा सकती है। मुझे इस कहावत में जरा भी यकीन नहीं है कि कोई मां अपने खूनी बेटे को भी जन्नत ले जा सकती है। ...मौलवी-मौलाना और धर्मगुरु कहते हैं कि बेटा जैसा भी हो, एक मां उसके जन्नत में ही जाने की कामना करती है। वो कहते हैं कि चाहे आप अपनी मां को बगीचे  में घुमाए या नहीं, चाहे किसी मॉल में लेजाकर आइसक्रीम खिलाएं या नहीं, वो आपके लिए जन्नत की ही दुआ करेगी। बहरहाल, मुझे इन मुल्लाओं की बात पर भरोसा नहीं है। जन्नत अगर मां की दुआ से मिलती होती तो हिटलर भी जरूर स्वर्ग में बैठा हुक्का पी रहा होगा। मुझे खुद हिटलर या हिटलरनुमा कोई शख्स आकर बताए कि वाकई उसके तमाम पापों को ऊपर वाले ने कूड़ेदान में फेंक दिया और उसकी मां की दुआओं के बदले जन्नत मिल गई।


सोचता हूं...अगर आज मां जिंदा होती तो क्या मैं भी अपनी इमेज बनाने के लिए उनकी मार्केटिंग करता...विज्ञापन कंपनियां मां की मार्केंटिंग अपने थर्ड क्लास प्रोडक्ट्स को बेचने के लिए बहुत पहले से करती रही हैं।...मैगी की वापसी पर एक मां को ढाल बनाकर पेश किया गया। मैगी के पांव अभी दोबारा जमे या नहीं लेकिन मां की मार्केंटिंग उस प्रोडक्ट के लिए मजबूत रही। मेरा बेटा यही काम करता है, हर विज्ञापन के पीछे जो मार्केटिंग दिमाग और कॉपी राइटिंग का कमाल रहता है वो बराबर मुझे बताता रहता है। तमाम अच्छे-बुरे या सड़े-गले विज्ञापनों की जानकारी मुझे उसी से मिलती है। बेटे ने ही बताया था कि मैगी वाली मां का विज्ञापन असरदार है...यानी नेस्ले के मार्केटियर्स ने मां के जरिए मैगी को मार्केट में उतार दिया। ...पता नहीं आपकी नजर में इससे मां की गरिमा घटी या बढ़ी, मुझे इसका अंदाजा नहीं है। बेटा कहता है कि आप लोग अंदाजा लगाते रहिए। मां तो प्रोडक्ट बेचकर और बाजार में मैगी को फिर से जमाकर चली गई। जय हो मां मैगी वाली की...

भारत मां की जय बोलने या न बोलने वालों के बीच अभी हाल ही में हुआ झगड़ा आपको याद है...मैंने इस मुद्दे पर बयान देने वाले तमाम नेताओं की मांओं पर अध्ययन किया तो बहुत दुखद बात पता चली। इनमें से तमाम सफेदपोश अपनी मां का ख्याल नहीं रखते हैं लेकिन भारत मां पर आस्तीनें चढ़ा लेते हैं। वो टोपी वाला मुल्ला अगर उस वक्त ये कहता कि चाहे मेरी गर्दन पर छुरी रख दो, पहले अपनी अम्मी की जय बोलूंगा तब भारत मां की जय बोलूंगा तो शायद विवाद इतना नहीं बढ़ता। लेकिन जब इंसान मां के नाम पर किसी और के एजेंडे को आगे बढ़ाए तो समझिए कि वो भारत मां को भी अपमानित करने जा रहा है। जो इंसान अपनी मां का न हुआ, वो भारत मां का कैसे हो सकता है।...

एक बहुत सीनियर पत्रकार और लेखक विनोद शर्मा ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा कि मेरी मां मेरे घर नहीं आती थी...मेरे घर मेरे साथ रहती थी...बहुत वजनदार लाइन लिखी शर्मा जी ने। लेकिन कई भक्त नाराज हो गए कि आखिर शर्मा जी की हिम्मत कैसे हुई की वो फलाने साहब की मां के संदर्भ में अपनी मां का जिक्र करें। फिर क्या था भक्तगण हाथ धोकर उनके पीछे पड़ गए। हालांकि शर्मा जी ने कहीं भी फलाने साहब की मां का जिक्र नहीं किया था।


मेरे बुकशेल्फ में मां उपन्यास आज भी मौजूद है। ...जानते हैं, इसे किसने लिखा है, ...मेरे बहुत ही प्रिय लेखक मक्सिक गोर्की ने। दरअसल, मेरे पास हिंदी वाला ही उन्यास था लेकिन बाद में मेरे अब्बा ने इसी उपन्यास को अंग्रेजी में (द मदर) मुझे खरीदकर पढ़ने को दिया। मैंने उन्हें बताया कि हिंदी में पढ़ चुका हूं तो उन्होंने अंग्रेजी वाला भी पढ़ने की सलाह दी। मां पर यह उपन्यास आज मेरी सबसे बड़ी धरोहर है।

मां का जिक्र हो तो मैं एक शायर का जिक्र न करूं तो तमाम मांओं के साथ बहुत नाइंसाफी होगी। उर्दू के मशहूर और जिंदा शायर रजा सिरसवी साहब ने मां पर एक बहुत खूबसूरत लंबी नज्म लिखी है। हालांकि यह विडंबना है कि रजा सिरसवी को किसी भी सरकार ने आजतक किसी पद्म पुरस्कार के योग्य नहीं समझा। वैसे मां की शान में जावेद अख्तर साहब समेत तमाम शायरों ने अपनी कलम चलाई है। मां पर सबसे पहले जिस शायरी से मेरा आमना-सामना हुआ, वो बॉलिवुड की किसी फिल्म का गाना था, जिसे मोहम्मद रफी साहब ने गाया था – मां तू कितनी अच्छी है, कितनी प्यारी है ओ मां....इसे लिखने वाले शायर का नाम मुझे नहीं मालूम लेकिन मेरा बचपन इसी गाने के साथ बीता। बात हो रही है रजा सिरसवी साहब की नज्म की। यह नज्म आज भी उर्दू बोलने वाले देश भारत व पाकिस्तान समेत तमाम जगहों पर महफिलों और मजलिसों में बहुत सम्मान से पढ़ी जाती है। सुनने वालों की आंखों से आंसू छलक आते हैं। उस लंबी नज्म की चंद लाइनें पेश हैं –


फिक्र में बच्चों की यूं हर दम घुली जाती है मां
नौजवां होते हुए भी बूढ़ी नजर आती है मां....

जिंदगानी के सफर में गर्दिशों की धूप में
कोई साया नहीं मिलता तो याद आती है मां

सबको देती है सुकूं और खुद गमों की धूप में
रफ्ता रफ्ता बर्फ की सूरत पिघल जाती है मां

दर्द, आहें, सिसकियां, आंसू, जुदाई, इंतजार
जिंदगी में और क्या औलाद से पाती है मां

प्यार कहते हैं किसे और मामता क्या चीज है
कोई उन बच्चों से पूछे जिनकी मर जाती है मां.....


(@Copyright यूसुफ किरमानी - प्राइम कंटेंट)


maan kee vheel cheyar ke peechhe kya hai


mere paas maan nahin hai. tveetar par daalane ke lie photo bhee nahin hai. ek photo thee, use bhaee ya bahan ne le liya, tab se vaapas nahin kiya. lekin phir sochata hoon ki koee photo meree maan ka vajood tay nahin kar sakata. kyonki maan ke hone ka ehasaas har vakt rahata hai. 

jinake paas maan hai...unase jalan hotee hai. kaash, meree maan bhee aaj jinda hotee...kuchh nahin to phalaane saahab kee tarah maan kee photo tveet kar zamaane bhar kee hamadardee pa leta. ...log kahate dekhon itana bada lekhak-patrakaar aur maan kee photo tveet kar raha hai bechaara. kitana bada dil hai...maan ko chhote-chhote gamale bhee dikha raha hai.

maan hamesha apane bachche ke lie dhaal ka kaam karatee hai. bachche par koee aaphat aae, maan sabase pahale us aaphat ka saamana karane ko taiyaar rahatee hai. bachcha agar chor ya girahakat hai to bhee usakee maan aasaanee se use chor ya girahakat maanane ko taiyaar nahin hotee. jab zamaana aap par tarah-tarah ke aarop lagae to ek maan hee aisee hotee hai jo aapake saath khadee hotee hai. desh mein ya videsh mein ya phir kisee kampanee mein jab aapakee saakh pharjee digree, pharjee halaphanaame, pharjee jumalebaajee se doobane lagatee hai to aise mein aap maan ko aage kar dete hain aur zamaane ko aapase hamadardee see ho jaatee hai ki dekho itana bada aadamee...lekin maan ko nahin bhoola. ...aap maan kee vheelacheyar kee aad mein bahut khoobasooratee se khud ko tamaam aaropon kee bauchhaar se bacha le jaate hain. 

mujhe chaay nahin bechanee padee, theek se padh likh bhee gaya. pharjee digree banavaane kee naubat nahin aaee. haipee barthade ko lekar bhee koee vivaad nahin raha. aadhee padhaee maan ke saamane kar lee thee aur thoda-moda kamaane bhee lag gaya tha. unhen yakeen aur sukoon tha ki meree jindagee theek se kat jaegee, chaahe 99 ke pher mein rahoon ya na rahoon. 

kahate hain maan ke pairon ke neeche jannat hotee hai yaanee agar aap maan kee seva karate hain to aapaka svarg mein jaana tay hai. haalaanki yah kahaavat un arthon mein vivaadaaspad maanee jaegee...jab aapake haath kaee begunaahon ke khoon se range hon...jab aapane jeetejee kaee maanon ka sindoor ujaad diya ho...jab aap ke ishaare par maan banane se pahale kaee betiyon kee ijjat lootee gaee ho...aise mein aapakee maan bhala aapako kaise jannat mein le ja sakatee hai. mujhe is kahaavat mein jara bhee yakeen nahin hai ki koee maan apane khoonee bete ko bhee jannat le ja sakatee hai. ...maulavee-maulaana aur dharmaguru kahate hain ki beta jaisa bhee ho, ek maan usake jannat mein hee jaane kee kaamana karatee hai. vo kahate hain ki chaahe aap apanee maan ko bageeche mein ghumae ya nahin, chaahe kisee mol mein lejaakar aaisakreem khilaen ya nahin, vo aapake lie jannat kee hee dua karegee. baharahaal, mujhe in mullaon kee baat par bharosa nahin hai. jannat agar maan kee dua se milatee hotee to hitalar bhee jaroor svarg mein baitha hukka pee raha hoga. mujhe khud hitalar ya hitalaranuma koee shakhs aakar batae ki vaakee usake tamaam paapon ko oopar vaale ne koodedaan mein phenk diya aur usakee maan kee duaon ke badale jannat mil gaee. 

ek bahut seeniyar patrakaar aur lekhak vinod sharma ne apanee phesabuk vol par likha ki meree maan mere ghar nahin aatee thee...mere ghar mere saath rahatee thee...bahut vajanadaar lain likhee sharma jee ne. lekin kaee bhakt naaraaj ho gae ki aakhir sharma jee kee himmat kaise huee kee vo phalaane saahab kee maan ke sandarbh mein apanee maan ka jikr karen. phir kya tha bhaktagan haath dhokar unake peechhe pad gae. haalaanki sharma jee ne kaheen bhee phalaane saahab kee maan ka jikr nahin kiya tha.

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mere bukashelph mein maan upanyaas aaj bhee maujood hai. ...jaanate hain, ise kisane likha hai, ...mere bahut hee priy lekhak maksik gorkee ne. darasal, mere paas hindee vaala hee unyaas tha lekin baad mein mere abba ne isee upanyaas ko angrejee mein (da madar) mujhe khareedakar padhane ko diya. mainne unhen bataaya ki hindee mein padh chuka hoon to unhonne angrejee vaala bhee padhane kee salaah dee. maan par yah upanyaas aaj meree sabase badee dharohar hai. 

maan ka jikr ho to main ek shaayar ka jikr na karoon to tamaam maanon ke saath bahut nainsaaphee hogee. urdoo ke mashahoor aur jinda shaayar raja sirasavee saahab ne maan par ek bahut khoobasoorat lambee najm likhee hai. haalaanki yah vidambana hai ki raja sirasavee ko kisee bhee sarakaar ne aajatak kisee padm puraskaar ke yogy nahin samajha. vaise maan kee shaan mein jaaved akhtar saahab samet tamaam shaayaron ne apanee kalam chalaee hai. maan par sabase pahale jis shaayaree se mera aamana-saamana hua, vo bolivud kee kisee philm ka gaana tha, jise mohammad raphee saahab ne gaaya tha – maan too kitanee achchhee hai, kitanee pyaaree hai o maan....ise likhane vaale shaayar ka naam mujhe nahin maaloom lekin mera bachapan isee gaane ke saath beeta. baat ho rahee hai raja sirasavee saahab kee najm kee. yah najm aaj bhee urdoo bolane vaale desh bhaarat va paakistaan samet tamaam jagahon par mahaphilon aur majalison mein bahut sammaan se padhee jaatee hai. sunane vaalon kee aankhon se aansoo chhalak aate hain. us lambee najm kee chand lainen pesh hain – 

phikr mein bachchon kee yoon har dam ghulee jaatee hai maan
naujavaan hote hue bhee boodhee najar aatee hai maan....

jindagaanee ke saphar mein gardishon kee dhoop mein 
koee saaya nahin milata to yaad aatee hai maan 

sabako detee hai sukoon aur khud gamon kee dhoop mein
raphta raphta barph kee soorat pighal jaatee hai maan

dard, aahen, sisakiyaan, aansoo, judaee, intajaar
jindagee mein aur kya aulaad se paatee hai maan

pyaar kahate hain kise aur maamata kya cheej hai
koee un bachchon se poochhe jinakee mar jaatee hai maan.....

Sunday, May 15, 2016

रहस्यः भगवा आतंकवाद को हिंदू धर्म से कौन जोड़ रहा है


केंद्र में बीजेपी की सरकार बने हुए अब दो साल से ज्यादा हो चुके हैं। पहले दो साल तक तमाम चिंतक, स्तंभकार और लेखक इस बात पर जोर देते रहे कि इतना बहुमत मिला है तो केंद्र सरकार जरूर कुछ करेगी। हमारे जैसे लोग जो किसी भी सरकार को आलोचनात्मक नजरिए से ही देखने की कोशिश करते हैं, इस उम्मीद में रहे कि हो सकता है कि बीजेपी सरकार के तरकश में कोई तीर हो और वो भारत की तमाम बीमारियों का इलाज करने में जुट जाए। लेकिन ऐसा कुछ होता दिखाई नहीं दे रहा और सब्र का पैमाना अब छलकने को है।

यह बात धीरे-धीरे साफ होती जा रही है कि बीजेपी सरकार को ऐसे लोगों का समूह संचालित कर रहा है, जिनके इरादे कुछ और हैं। इस समूह ने संघ परिवार तक को प्रभावित कर रखा है। इस समूह ने जो एजेंडा सरकार बनने के वक्त तय किया था, केंद्र सरकार उसी एजेंडे पर पहले दिन से ही चल रही है। यह समूह अपने एजेंडे को लागू कराने की इतनी जल्दी में है कि उसे लगता है कि अगला मौका नहीं मिलेगा।

बात की शुरुआत ताजा घटनाक्रम से करते हैं। मालेगांव ब्लास्ट में आरोपी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, कर्नल पुरोहित समेत तमाम लोगों को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने क्लीन चिट दे दी है। ऐसे कदमों से सरकार अब उस तरफ बढ़ रही है, जिस तरफ उसे जाना नहीं चाहिए था। इसके नतीजे बहुत अच्छे नहीं आएंगे। देश के अमन-चैन को पलीता लगाने की कोशिश में सभी लोगों के हाथ बहुत बुरी तरह झुलस सकते हैं। मैं क्या कहना चाहता हूं, उसकी कल्पना या विश्लेषण आप खुद करके देखिए, अगर आप वाकई देशभक्त हैं तो विचलिए हुए बिना नहीं रह सकते।

मालेगांव ब्लास्ट, समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट, मक्का मस्जिद ब्लास्ट वगैरह के बाद देश को बताया गया कि जिस तरह इस्लामिक आतंकवाद का अस्तित्व है, ठीक उसी तरह भगवा आतंकवाद का अस्तित्व भी है। हालांकि इस्लामिक आतंकवाद शब्द इस्राइल ने गढ़ा और पश्चिमी मीडिया ने उसे अपनाने में देर नहीं लगाई। इस्लाम एक धर्म है और दुनिया का कोई भी धर्म आतंकवाद की शिक्षा नहीं देता है। लेकिन भगवा आतंकवाद को जिस तरह हिंदू धर्म से जोड़ने की नापाक कोशिश की गई, उसके पीछे बहुत गहरी साजिश की बदबू आती है।

 इस देश में कई करोड़ हिंदू रहते हैं और उनके बीच भगवा विचारधारा के लोगों की तादाद मुट्ठीभर हैं। इन मुट्ठीभर लोगों की विचारधारा को भारत के अमनपसंद हिंदुओं की विचारधारा नहीं माना जाना चाहिए। जिस तरह अबू बकर बगदादी की विचारधारा का इस्लाम और कुरान से कोई तालमेल नहीं है, ठीक उसी तरह आम भारतीय हिंदूओं का मुट्ठीभर भगवा विचारधारा वालों से कोई संबंध नहीं है।

मैं न तो पहले ये मानने को तैयार था और न आज...कि भारत के तमाम हिंदुओं की आस्था या झुकाव किसी तरह के आतंकवाद में है। पता नहीं किन फर्जी राष्ट्रवादियों के बहकावे में कुछ लोगों ने एक ग्रुप बनाकर ऐसे ब्लास्ट या हमले किए जिनसे भगवा आतंकवाद की बात शुरू हुई।

...लेकिन जिन लोगों ने जिस मकसद से इस शब्द को गढ़ा था, दरअसल वो बहुत चालाकी से बताना चाह रहे थे कि भगवा आतंकवाद ही हिंदू आतंकवाद है। यह हरकत किसने की, अगर उस वक्त की मीडिया रिपोर्ट्स को कोई खंगाले तो पाएगा कि भगवा आतंकवाद शब्द वही लोग लाए जिनके एजेंडे में हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण शुरू से शामिल रहा है यानी हिंदू-मुसलमानों को जब तक बांटा नहीं जाएगा तब तक भगवा राजनीति पूरी तरह इस देश को अपने हिसाब से चला नहीं सकती। तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम अति उत्साह में दक्षिणपंथी विचारकों के जाल में फंसते चले गए और दिन-रात भगवा आतंकवाद का राग अलाप कर संघ और बीजेपी को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करते रहे।

 संघ भी यही चाहता था। संघ इस स्थिति से खुश है। उसने यह भी मान लिया है कि आम हिंदू ने उसे हिंदू हितैषी संगठन के रूप में स्वीकार कर लिया है लेकिन यह उसकी भूल है। ...लगता है कि भारत देश के लोगों की नब्ज पर उसका हाथ नहीं है। हालांकि अभी मैं इसके विस्तार में नहीं जाना चाहता लेकिन इस पर अन्य किसी लेख में चर्चा जरूर की जाएगी।

देश की आजादी के बाद से ही संघ की यह कोशिश रही है कि उसे हिंदू हितैषी चेहरा बताकर माना जाए। इसीलिए उसने हर उस कोशिश को नाकाम करने की पहल की, जिन्होंने भारत को एकता या सभी धर्म-जाति-बिरादरी को साथ लेकर चलने की कोशिश की। देश को एकता के सूत्र में पिरोने वाले महात्मा गांधी की हत्या की उसने कभी निंदा नहीं की। आजादी की लड़ाई में उसने अंग्रेजों का साथ दिया। याद कीजिए देश की आजादी की लड़ाई में जब हिंदू, मुसलमान, दलित, सिख, ईसाई तमाम लोग धर्म, जाति, बिरादरी से ऊपर उठकर शामिल थे तब दक्षिणपंथियों ने तमाम किताबें लिखकर, पर्चे बांटकर, पत्रिकाएं छपवाकर स्वतंत्रता आंदोलन का विरोध किया था।

बहरहाल, 2014 के आम चुनाव में देश के 33-34 फीसदी लोगों ने तमाम धर्म, जाति और बिरादरी से ऊपर उठकर संघ के एजेंडे को आगे बढ़ाने वाली बीजेपी को भारी बहुमत से जिता दिया। ध्यान रहे कि उस आम चुनाव में दक्षिण भारत से बीजेपी की सीटें नहीं आई थीं। यानी भारत नामक देश के आधे हिस्से ने बीजेपी या संघ के एजेंडे पर मुहर नहीं लगाई।

उत्तर भारत के सबसे प्रमुख राज्य बिहार ने भी आम चुनाव की गलती 2016 के विधानसभा चुनाव में न दोहराते हुए बीजेपी को धूल चटा दी यानी कांग्रेस जैसी अखिल भारतीयता बीजेपी को लोकसभा में प्रचंड बहुमत के बाद भी हासिल नहीं है। कुछ राज्यों के चुनाव नतीजे फिर आने वाले हैं। उसके बाद हालात और बदलेंगे। यानी संघ या बीजेपी जिस एजेंडे पर देश को चलाना चाहते हैं, देश के लोग उस पर चलने को तैयार नहीं हैं।      

मालेगांव ब्लास्ट में जिन भी लोगों का हाथ रहा हो, महाराष्ट्र पुलिस के जाबांज अफसर हेमंत किरकिरे उन चेहरों को बेनकाब करके सामने लाए। लेकिन मामूली हितों और अपने एजेंडे को लागू करने की जल्दबाजी में आज वही ताकतें हेमंत किरकिरे की शहादत को अपने पैरों तले मसलना चाह रही हैं। जाहिर है कि देश का अधिकांश मीडिया केंद्र सरकार के इशारों पर जब नाच रहा हो तो वो ताकतें अपने मकसद में कामयाब भी हो जाएंगी।

लेकिन जो चीजें इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुकी हैं बीजेपी अगर उनका पुनर्लेखन भी करा ले तो उन धब्बों को वो उन पन्नों से नहीं मिटा पाएगी। अगर भगवा आतंकवाद वाकई फर्जी है या था तो भी यह देश याद रखेगा कि कैसे देश को बांटने के लिए इस शब्द को गढ़ा गया, कैसे अमनपसंद मुलमानों और हिंदुओं को डराने के लिए इस शब्द का जमकर प्रचार किया गया।

इस देश के लोग मूर्ख नहीं हैं कि वे इन बातों को समझ नहीं पाएंगे कि गुजरात में पुलिस एनकाउंटर का शिकार हुई इशरतजहां को आप आतंकवादी बताएं और साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित को आप बेदाग छूट जाने दें। हिंदू धर्म सहिष्णु है, उसके लोग उससे भी ज्यादा उदारवादी हैं, वे इन हरकतों को पसंद नहीं कर रहे हैं। उन्होंने आपको इसलिए नहीं जिताया था कि आप अपनी सारी ताकत इशरतजहां को आतंकवादी बताने में लगा दें....कि आप भगवा आतंकवाद का दाग मिटाने के लिए एक साध्वी को जेल से छुड़ा लाएं....कि आप गांधी परिवार को बेइमान साबित करने के लिए देश की जनता का करोड़ों रुपया इसी पर खर्च कर दें...कि आप स्टूडेंट्स नेताओं को चुप कराने के लिए गुंडों का इस्तेमाल करें...अनगिनत मिसाले हैं इस सरकार की फूहड़ता की, जिन्हें गिनाने पर जगह कम पड़ जाएगी।

आपकी आर्थिक नीति का दिवाला पिट चुका है। कुछ लोगों को सरकारी बैंकों का पैसा लूटने की खुली छूट मिल चुकी है। आपकी विदेश नीति को चीन और पाकिस्तान आए दिन मिलकर पीट रहे हैं। हालत ये है कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा और उनकी खबर तक न ली गई। मीडिया का एक बहुत बड़ा वर्ग सुषमा की असली बीमारी पर खबर न छाप सका। स्वच्छता अभियान दफन हो चुका है, अलबत्ता जनता इस अभियान के लिए लगाए गए टैक्स (सेस) को भर रही है। आप चाहे विदेश घूमें या वाराणसी जाकर रोजाना गंगा आरती उतारें या फिर उज्जैन जाकर जुमले उछालें...जनता को काम चाहिए....बातें फिर कर लेना मेरे भाई...




Mystery : Who is implicating Saffron Terrorism with Hindu Religion
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-by Yusuf Kirmani

BJP government at the Centre has made more than two years now. Until two years ago, many thinkers, columnists and authors insist that the government must have won a majority will do so. But it does not see some measure of patience and is now overflowing.

It is gradually becoming clear that the BJP government has been conducting a group of people whose intentions are anything else. The group has influenced by the Sangh Parivar. The group, which was set at the time of forming the government agenda, the Centre operates from the first day on the same agenda. This group is in such a hurry to get his agenda that he will not get the next chance.

Let's start with the latest developments. Malegaon blast accused Pragya Thakur, Col Purohit all people, including the National Investigation Agency (NIA) has given a clean chit. Measures that the government is now increasing that side, the side should not be him. The results will not be very good. Trying to subvert the peace in the hands of all the people can very severely injured.

 What I want to say, his imagination or analysis you see it yourself, if you can not live without Vichlia so patriotic.Malegaon blast, Samjhauta Express blast, Mecca Masjid blast and others were told that the way the country is the existence of Islamic terrorism, just as the existence of saffron terrorism.

 Israel and Western media coined the word Islamic terrorism was quick to adopt her. Islam is a religion and any religion of the world does not teach terrorism. But the way the saffron terrorists were wicked attempt to add Hinduism behind him smelled of very deep conspiracy.

Several million Hindus live in the country and the number of those among them a handful of saffron ideology are. These handful of people peaceable Indian Hindu ideology ideology should not be considered. Abu Bakr Baghdadi way incompatible with the ideology of Islam and the Koran, just a handful of Indian saffron Hindu ideology has nothing to do with those.

I was ready to accept neither before nor today ... all of India's Hindu faith or leaning in any terrorism. Do not know what some people under the influence of nationalists staged a blast or an attack by a group of saffron terrorism that has started talking.

... But the objective of those who coined the term was, in fact, wanted to tell that he is very clever Hindu saffron terrorism is terrorism. Who was this act, if the media reports at that time will have a Spinning word saffron terrorism that the people who brought the Hindu-Muslim polarization in the agenda has been involved from the beginning until the Hindu-Muslim divide will not be completed until the saffron this country can not run its own way.

The then Home Minister P. Chidambaram moved fallen into the trap of over-excitement-wing thinkers and day and night to sing the melody of saffron terrorism are brought to justice RSS and BJP were trying to do. The association also wanted. Union is happy with the situation. He also assumed that the common Hindu Hindu friendly organization is accepted as it is his mistake. ... It is not his hand on the pulse of the people of India. However, I want to go into detail, but it definitely will be discussed in another article.

Since the country's independence has been the endeavor of the Union to be considered by telling him that Hindu friendly face. That is why he tried to thwart every initiative, that all religion-caste community in India's unity or tried to carry. Segue into the country unity, he never condemned the assassination of Mahatma Gandhi. He sided with the British in the War of Independence.

 Recall, the country's freedom struggle when Hindus, Muslims, Dalits, Sikhs, Christians, all people of religion, caste, community, rising above all the books were written by the wing, distributing pamphlets, magazines Cpwakr opposed the freedom movement.

However, 33-34 per cent of the land in the 2014 general election, all religion, caste and community to rise above the party advancing the agenda of the Union gave a landslide victory. Note that the seats of the BJP in the general elections did not come from South India. Ie half of the country called India or the BJP did not approve of the union agenda. Some states, however the results are coming. After that, things will change. The association or the party would run the country on the agenda of the country, people are not prepared to walk.

Even people who have been involved in Malegaon blasts, the Maharashtra police officer Hemant Kirkire Jabanj brought to expose those faces. But minor interests and in a hurry to implement his agenda today Hemant Kirkire martyrdom of the forces are trying to chafe under his feet. Obviously most of the country when dancing to the tunes of the media if the government forces it will be achieving its objective.

But things have been recorded in history to make the party even if they rewrite those spots that will not wipe out those pages. Saffron terrorism was bogus or even if you will remember the country that coined the term for how to divide the land, how to scare peace-loving Hindus Mulmanon and the term was highly publicized.

The people of this country are not stupid they will not understand these things was the victim of a police encounter in Gujarat Isaratjhan Pragya and Col Purohit and to tell you the terror let you unblemished. Hinduism is tolerant, even more so his people are moderate, they are not like these antics. He had never voted for you so that you plug it into your strength Isaratjhan .... the terrorists to erase the stain of saffron terrorism that a nun .... Get out of jail to prove that you are dishonest Gandhi family for millions of people of the country should be spending money on this ... that you use goons to silence student leaders ... countless Misale the government of vulgarity, which would have to reel in.

Pit your economic policy is bankrupt. Some people have got a free hand to rob money from state-owned banks. Your foreign policy, China and Pakistan have been beating up the day. The condition is that the External Affairs Minister Sushma Swaraj had to be hospitalized and not taken up their news.

A large section of the media reported on the splendor of the real disease could not print. Sanitation campaign has been buried, but a public campaign for the taxes (SASE) is across. Whether you go abroad regularly roam Varanasi Ganga Aarti or by float or phrase Flip Ujjain ... people should work to make things again .... My brother ...



rahasyah:  bhagava aatankavaad ko hindoo dharm se kaun jod raha hai
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-Yusuf Kirmani

kendr mein beejepee kee sarakaar bane hue ab do saal se jyaada ho chuke hain. pahale do saal tak tamaam chintak, stambhakaar aur lekhak is baat par jor dete rahe ki itana bahumat mila hai to kendr sarakaar jaroor kuchh karegee. hamaare jaise log jo kisee bhee sarakaar ko aalochanaatmak najarie se hee dekhane kee koshish karate hain, is ummeed mein rahe ki ho sakata hai ki beejepee sarakaar ke tarakash mein koee teer ho aur vo bhaarat kee tamaam beemaariyon ka ilaaj karane mein jut jae. lekin aisa kuchh hota dikhaee nahin de raha aur sabr ka paimaana ab chhalakane ko hai. 

yah baat dheere-dheere saaph hotee ja rahee hai ki beejepee sarakaar ko aise logon ka samooh sanchaalit kar raha hai, jinake iraade kuchh aur hain. is samooh ne sangh parivaar tak ko prabhaavit kar rakha hai. is samooh ne jo ejenda sarakaar banane ke vakt tay kiya tha, kendr sarakaar usee ejende par pahale din se hee chal rahee hai. yah samooh apane ejende ko laagoo karaane kee itanee jaldee mein hai ki use lagata hai ki agala mauka nahin milega. 

baat kee shuruaat taaja ghatanaakram se karate hain. maalegaanv blaast mein aaropee saadhvee pragya thaakur, karnal purohit samet tamaam logon ko raashtreey jaanch ejensee (enaeee) ne kleen chit de dee hai. aise kadamon se sarakaar ab us taraph badh rahee hai, jis taraph use jaana nahin chaahie tha. isake nateeje bahut achchhe nahin aaenge. desh ke aman-chain ko paleeta lagaane kee koshish mein sabhee logon ke haath bahut buree tarah jhulas sakate hain. main kya kahana chaahata hoon, usakee kalpana ya vishleshan aap khud karake dekhie, agar aap vaakee deshabhakt hain to vichalie hue bina nahin rah sakate. 

maalegaanv blaast, samajhauta eksapres blaast, makka masjid blaast vagairah ke baad desh ko bataaya gaya ki jis tarah islaamik aatankavaad ka astitv hai, theek usee tarah bhagava aatankavaad ka astitv bhee hai. haalaanki islaamik aatankavaad shabd israil ne gadha aur pashchimee meediya ne use apanaane mein der nahin lagaee. islaam ek dharm hai aur duniya ka koee bhee dharm aatankavaad kee shiksha nahin deta hai. lekin bhagava aatankavaad ko jis tarah hindoo dharm se jodane kee naapaak koshish kee gaee, usake peechhe bahut gaharee saajish kee badaboo aatee hai. is desh mein kaee karod hindoo rahate hain aur unake beech bhagava vichaaradhaara ke logon kee taadaad muttheebhar hain. in muttheebhar logon kee vichaaradhaara ko bhaarat ke amanapasand hinduon kee vichaaradhaara nahin maana jaana chaahie. jis tarah aboo bakar bagadaadee kee vichaaradhaara ka islaam aur kuraan se koee taalamel nahin hai, theek usee tarah aam bhaarateey hindooon ka muttheebhar bhagava vichaaradhaara vaalon se koee sambandh nahin hai. 

main na to pahale ye maanane ko taiyaar tha aur na aaj...ki bhaarat ke tamaam hinduon kee aastha ya jhukaav kisee tarah ke aatankavaad mein hai. pata nahin kin pharjee raashtravaadiyon ke bahakaave mein kuchh logon ne ek grup banaakar aise blaast ya hamale kie jinase bhagava aatankavaad kee baat shuroo huee. 
...lekin jin logon ne jis makasad se is shabd ko gadha tha, darasal vo bahut chaalaakee se bataana chaah rahe the ki bhagava aatankavaad hee hindoo aatankavaad hai. yah harakat kisane kee, agar us vakt kee meediya riports ko koee khangaale to paega ki bhagava aatankavaad shabd vahee log lae jinake ejende mein hindoo-muslim dhruveekaran shuroo se shaamil raha hai yaanee hindoo-musalamaanon ko jab tak baanta nahin jaega tab tak bhagava raajaneeti pooree tarah is desh ko apane hisaab se chala nahin sakatee.

 tatkaaleen grhamantree pee. chidambaram ati utsaah mein dakshinapanthee vichaarakon ke jaal mein phansate chale gae aur din-raat bhagava aatankavaad ka raag alaap kar sangh aur beejepee ko kataghare mein khada karane kee koshish karate rahe. sangh bhee yahee chaahata tha. sangh is sthiti se khush hai. usane yah bhee maan liya hai ki aam hindoo ne use hindoo hitaishee sangathan ke roop mein sveekaar kar liya hai lekin yah usakee bhool hai. ...lagata hai ki bhaarat desh ke logon kee nabj par usaka haath nahin hai. haalaanki abhee main isake vistaar mein nahin jaana chaahata lekin is par any kisee lekh mein charcha jaroor kee jaegee.

desh kee aajaadee ke baad se hee sangh kee yah koshish rahee hai ki use hindoo hitaishee chehara bataakar maana jae. iseelie usane har us koshish ko naakaam karane kee pahal kee, jinhonne bhaarat ko ekata ya sabhee dharm-jaati-biraadaree ko saath lekar chalane kee koshish kee. desh ko ekata ke sootr mein pirone vaale mahaatma gaandhee kee hatya kee usane kabhee ninda nahin kee. aajaadee kee ladaee mein usane angrejon ka saath diya. yaad keejie desh kee aajaadee kee ladaee mein jab hindoo, musalamaan, dalit, sikh, eesaee tamaam log dharm, jaati, biraadaree se oopar uthakar shaamil the tab dakshinapanthiyon ne tamaam kitaaben likhakar, parche baantakar, patrikaen chhapavaakar svatantrata aandolan ka virodh kiya tha.
baharahaal, 2014 ke aam chunaav mein desh ke 33-34 pheesadee logon ne tamaam dharm, jaati aur biraadaree se oopar uthakar sangh ke ejende ko aage badhaane vaalee beejepee ko bhaaree bahumat se jita diya. dhyaan rahe ki us aam chunaav mein dakshin bhaarat se beejepee kee seeten nahin aaee theen.

 yaanee bhaarat naamak desh ke aadhe hisse ne beejepee ya sangh ke ejende par muhar nahin lagaee. uttar bhaarat ke sabase pramukh raajy bihaar ne bhee aam chunaav kee galatee 2016 ke vidhaanasabha chunaav mein na doharaate hue beejepee ko dhool chata dee yaanee kaangres jaisee akhil bhaarateeyata beejepee ko lokasabha mein prachand bahumat ke baad bhee haasil nahin hai. kuchh raajyon ke chunaav nateeje phir aane vaale hain. usake baad haalaat aur badalenge. yaanee sangh ya beejepee jis ejende par desh ko chalaana chaahate hain, desh ke log us par chalane ko taiyaar nahin hain. 

maalegaanv blaast mein jin bhee logon ka haath raha ho, mahaaraashtr pulis ke jaabaanj aphasar hemant kirakire un cheharon ko benakaab karake saamane lae. lekin maamoolee hiton aur apane ejende ko laagoo karane kee jaldabaajee mein aaj vahee taakaten hemant kirakire kee shahaadat ko apane pairon tale masalana chaah rahee hain. jaahir hai ki desh ka adhikaansh meediya kendr sarakaar ke ishaaron par jab naach raha ho to vo taakaten apane makasad mein kaamayaab bhee ho jaengee. lekin jo cheejen itihaas ke pannon mein darj ho chukee hain beejepee agar unaka punarlekhan bhee kara le to un dhabbon ko vo un pannon se nahin mita paegee. agar bhagava aatankavaad vaakee pharjee hai ya tha to bhee yah desh yaad rakhega ki kaise desh ko baantane ke lie is shabd ko gadha gaya, kaise amanapasand mulamaanon aur hinduon ko daraane ke lie is shabd ka jamakar prachaar kiya gaya.

is desh ke log moorkh nahin hain ki ve in baaton ko samajh nahin paenge ki gujaraat mein pulis enakauntar ka shikaar huee isharatajahaan ko aap aatankavaadee bataen aur saadhvee pragya aur karnal purohit ko aap bedaag chhoot jaane den. hindoo dharm sahishnu hai, usake log usase bhee jyaada udaaravaadee hain, ve in harakaton ko pasand nahin kar rahe hain. unhonne aapako isalie nahin jitaaya tha ki aap apanee saaree taakat isharatajahaan ko aatankavaadee bataane mein laga den....ki aap bhagava aatankavaad ka daag mitaane ke lie ek saadhvee ko jel se chhuda laen....ki aap gaandhee parivaar ko beimaan saabit karane ke lie desh kee janata ka karodon rupaya isee par kharch kar den...ki aap stoodents netaon ko chup karaane ke lie gundon ka istemaal karen...anaginat misaale hain is sarakaar kee phoohadata kee, jinhen ginaane par jagah kam pad jaegee. 
aapakee aarthik neeti ka divaala pit chuka hai. 

kuchh logon ko sarakaaree bainkon ka paisa lootane kee khulee chhoot mil chukee hai. aapakee videsh neeti ko cheen aur paakistaan aae din milakar peet rahe hain. haalat ye hai ki videsh mantree sushama svaraaj ko aspataal mein bhartee hona pada aur unakee khabar tak na lee gaee. meediya ka ek bahut bada varg sushama kee asalee beemaaree par khabar na chhaap saka. svachchhata abhiyaan daphan ho chuka hai, alabatta janata is abhiyaan ke lie lagae gae taiks (ses) ko bhar rahee hai. aap chaahe videsh ghoomen ya vaaraanasee jaakar rojaana ganga aaratee utaaren ya phir ujjain jaakar jumale uchhaalen...janata ko kaam chaahie....baaten phir kar lena mere