Monday, April 13, 2015

जिन्ना की आस छोड़ो...वो नहीं आएगा...



वाकई भारतीय मुसलमान बेपेंदी के लोटे हैं, जब पाकिस्तान बन रहा था, तब वहां गए नहीं...घर वापसी भी नहीं की...अब भुगतो...वोट देने के लायक भी नहीं रहोगे...नसबंदी भी करवानी पड़ेगी...यार सिग्नल पकड़ो...कानून तुम्हारे साथ नहीं...अदालतें भी तुम्हें नापसंद करती हैं...हाशिमपुरा- नरोदापाटिया से तुम्हें भगाया जाता है, तुम फिर लौटकर वहीं आ जाते हो...कभी पिल्ले बन जाते हो तो कभी टोपी पहनाने पहुच जाते हो...इस्लामिक आतंकवाद का कलंक तुम्हारे माथे पर है...शाकाहारी बनने में क्या बुराई है...मांस तो अब उनके खाने की चीज है जिनके लिए इसका खाना कभी एडवेंचर था, झूठ है तो बरेली वाले त्रिपाठी जी से पूछ लो...जालंधर वाले शर्मा जी से पूछ लो...आखिर क्या चाहते हो...जाओ, यार भाग जाओ पाकिस्तान...यहां रहकर क्या करोगे...या फिर नाम बदल लो...तुम इस्तेमाल किए जाने के लिए बने हो, यूज एंड थ्रो...सेकुलर शब्द गाली है, उसे अपने सीने से चिपकाए बैठे हो...

देखो हिटलर के वक्त का जर्मनी याद करो...सब नाजी अंध राष्ट्रभक्त हो गए थे...गैस चैंबर तैयार थे...कत्लेआम की साजिश चारों तरफ से थी...अब राष्ट्रभक्तों का जमाना है...तुम्हारा कोई भी खतरनाक विचार या सद् विचार अंध राष्ट्रभक्तों के आगे टिक नहीं पाएगा। ...लो फिर वही बात...अरे ये सब क्या पागलपन है, याद क्यों दिलाते हो इनकी - अशफाकउल्ला खान, मौलाना अबुल कलाम आजाद, एपीजे अब्दुल कलाम, एआर रहमान, दिलीप कुमार, बिसमिल्लाह खान...लंबी फेहरिस्त है...गिनते रहो...अब भगत सिंह को भी उन्होंने अपने ब्रैंड में शामिल कर लिया है...आंबेडकर पर नजरे हैं...तुम्हारे पास कुछ कहने या जवाब देने के लिए कुछ नहीं बचेगा, अपने विचारों को वे भगत सिंह और आंबेडकर का बताकर उसे भी हाईजैक कर रहे हैं...भगत सिंह का ऱाष्ट्रवाद हिटलर का चोला पहनकर सामने आने वाला है भाई...आंबेडकर के संविधान को कूड़ेदान में फेंककर किसी दीनानाथ के लिखे संविधान से काम चलाने का जमाना आ चुका है...सुबह-सुबह श्लोक पढ़ा करो...उसमें सुई बनाने से लेकर हवाई जहाज बनाने के सूत्र छिपे हैं...अरे मिसाइल की बात करते हो, कलाम से भी बहुत पहले एक श्लोक में इसे बनाने का तरीका बताया जा चुका है...तुम अपनी आदत से कभी बाज नहीं आते, जिस पर हाथ रखते हो, वो दो मुंहा सांप निकलता है, दोनों तरफ से काटता है...इससेअच्छा नेवला ही पाल लेते...कम से कम आस्तीन के सांपों को ठिकाने लगाने में मदद ही करता...अब न घर के रहे और न घाट के...

वो वक्त कुछ और था...अंग्रेज था...नेहरू था, जिन्ना था...ले लिया एक देश...अब खतरनाक विचार मत पालो...पालोगे तो अब कोई जिन्ना नहीं आएगा, न मोहनदास मिलेगा...जो तुम्हारे खतरनाक विचार को मान लेगा...ओवैसी सौदागर है, उनके चक्कर में मत पड़ना...

देखो, बात अभी भी बन सकती है...लेकिन पहले खतरनाक विचार छोड़ो...तुम बार-बार जिन्ना को क्यों याद कर रहे हो...क्या चाहते हो...आडवाणी बूढ़े हो चुके हैं, कोई और गलती से भी जिन्ना की तारीफ अब नहीं करेगा, इसलिए तुम भी उसे याद मत करो...मान लो कि जिन्ना की आत्मा प्रकट भी हो जाए तो वह इच्छाधारी सांपों का मुकाबला नहीं कर पाएगा...वो भगत सिंह की आत्मा और उनका चोला पहनकर आने वाले राष्ट्रभक्तों के हल्ले में कुचला जाएगा...इसलिए खतरनाक विचार मत पालो...देखो नदी को बहना है, वह कभी-कभी अपनी धारा बदल लेती है...नदी बनो, समुद्र को तलाशो, उसमें जाकर समाहित हो जाओ लेकिन उससे पहले खतरनाक विचार छोड़ो...इतना भी क्यों सोच रहे हो कि ...शहर-शहर बस्तियां जल रही होंगी, हमले हो रहे होंगे...भगत सिंह, आजाद, सुभाषचंद्र बोस, आंबेडकर का सेकुलर राष्ट्र कहीं लहुलूहान पड़ा होगा...एक प्रयोगशाला में बरसों पहले किया गया प्रयोग सफल होने पर सब राष्ट्रभक्त एक दूसरे को बधाइयां दे रहे होंगे...वक्त है अभी भी....खतरनाक विचार छोड़ो...जिन्ना नहीं आएगा...





2 comments:

Kavita Rawat said...

वक्त है अभी भी....खतरनाक विचार छोड़ो...

Naya India said...

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