Sunday, February 8, 2015

सलमान रश्दी का कूड़ा और भालचंद्र निमाड़े



सलमान ऱश्दी की बौखलाहट समझ में आती है। तमाम तरह का कूड़ा लिखने के बाद भारत में जब उन्हें पहचान

नहीं मिली तो वह मराठी लेखक भालचंद्र निमाड़े को गाली देने पर उतर आए। निमाड़े को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने की घोषणा के बाद रश्दी बौखला गए। किसी भी लेखक को दूसरे लेखक के काम का आकलन करने का अधिकार है।

निमाड़े का आकलन है कि सलमान ऱश्दी और वी. एस. नॉयपाल जैसे लेखकों ने पश्चिमी देशों का प्रचार किया और उनका लेखन उस स्तर का नहीं है...इसमें क्या गलत है लेकिन इसके बदले अगर दूसरा लेखक पलटकर गाली देने लगे तो आप इसे क्या कहेंगे।...मैं साहित्यकार नहीं हूं लेकिन साहित्य की समझ जरूर रखता हूं। सलमान रश्दी या भारत में चेतन भगत सरीखे लेखक अंग्रेजी में जो चीजें परोस रहे हैं, उससे कहीं बेहतर भालचंद्र निमाड़े का लेखन है।...भारत की क्षेत्रीय भाषाओं में रश्दी औऱ चेतन भगत जैसा कूड़ा करकट लिखने वालों से कहीं बेहतर उपन्यासकार मौजूद हैं। ...और तो और अरुंधति राय का लेखन रश्दी या चेतन भगत के स्तर से बहुत ऊंचा और बड़ा है। रश्दी औऱ नॉयपाल ने अपने लेखन में वह सब बेचा जो पश्चिमी देशों को गरीब देशों के बारे में जानना और सुनना पसंद है। दोनों ने एक धर्म के खिलाफ लिखने को अपने लेखन का आधार बनाया, पश्चिमी देशों ने उन्हें हाथोंहाथ लिया। पश्चिमी देशों के कतिपय विश्लेषकों ने इस सारे मुद्दे को इस्लाम बनाम ईसाइयत के नारे से जोड़ा है यानी इस्लाम के विरोध में लिखने वाले लेखकों को देखने का नजरिया पश्चिमी देशों और वहां की सरकार का अलग तरह से है। मुझे एतराज इस पर नहीं है कि रश्दी औऱ नॉयपाल इस्लाम के खिलाफ लिखते हैं,...वो खूब लिखें....जी भरकर लिखें लेकिन भारत को और एशिया महाद्वीप के तमाम देशों को अपने चश्मे से देखने का नजरिया बदलें।

लेखन इसलिए न किया जाए कि वह पश्चिमी देशों की नीतियों और नजरिए से मेल खाता हो। लेखन इस नजरिए
से न किया जाए कि आप भारतीय लोगों के सरोकार को महत्व न देकर साम्राज्यवादी ताकतों के सरोकारों को
महत्व दें। दुनिया सिर्फ इंग्लैंड और अमेरिका में ही नहीं बसती, अलबत्ता वहां से अंग्रेजी साहित्य में लिखने पर मोटी रकम पुरस्कार के रूप में देने का इंतजाम जरूर है।

साम्राज्यवाद या उसके कुछ पैरोकार देश पुरस्कार और पैसे की आड़ में नॉयपाल या रश्दी से जिस तरह का लेखन करा रहे हैं वही काम भारत में चेतन भगत यहां के कॉरपोरेट के लिए कर रहे हैं। चेतन भगत भी अब खुद को साहित्यकार मानने लगे हैं और भारत की तमाम तरह की समस्याओं पर उलूल जुलूल ढंग से अपने विचार पेश करते रहते हैं। उनकी कुछ नॉवेल पर फिल्में बन गईं और वह रातोरात विख्यात हो गए लेकिन जब-जब वह भारत की समस्या पर कोई लेख लिखते हैं तो उनके अंदर का छिपा हुआ उपभोक्तावाद का पैरोकारी करने वाला लेखक बाहर आ जाता है। गंभीर अंग्रेजी साहित्य पढ़ने वाले युवा तो अब चेतन भगत सरीखों को रिजेक्ट भी करने लगे हैं।

रश्दी, नॉयपाल, चेतन भगत सरीखे लेखक उस भारत का प्रतिनिधित्व नहीं करते, जिस भारत का प्रतिनिधित्व मुंशी प्रेमचंद या निमाड़े करते हैं। इन्हें भारत तो क्या ठीक से किसी एशियाई देश के गांव का सतही ज्ञान तक नहीं है। जिसके बारे में वह लिख सके। नॉयपाल अपनी एक किताब में एक एशियाई देश के गांव का जिक्र करते हुए वहां के लोगों के गंदे कपड़े, साफ सुथरा न रहने पर भाषण देते हुए नजर आते हैं। नॉयपाल अपनी एक किताब में एक देश के लोगों द्वारा वहां की क्रांति में हिस्सा लेने का मजाक उड़ाते हुए नजर आते हैं। जन आंदोलन रश्दी, नॉयपाल और चेतन भगत के लेखन का हिस्सा नहीं हैं, वे क्यों होते हैं, क्यों होने चाहिए, इसके पक्ष में ये लोग खड़े होते हुए नजर नहीं आते। पर्यावरण को लेकर अगर एशियाई महाद्वीप के किसी देश के गांव का कोई आदमी चिंतिति है तो यह इनके लेखन का हिस्सा नहीं है। हां, ये इसलिए लेखन करते हैं कि साम्राज्यवादी ताकतों को अगर कोई देश उनकी हां में हां मिलाता हुआ नजर नहीं आता तो वह उसका मजाक उड़ाने के लिए किताब लिख देते हैं और अगले ही साल मोटी रकम का कोई बड़ा पुरस्कार झटक लेते हैं।



भारत में चेतन भगत से बेहतर कई लोग अंग्रेजी में साहित्य लिख रहे हैं लेकिन चूंकि वे कॉरपोरेट घरानों के
मनमाफिक नहीं हैं तो उनकी कोई जगह नहीं बन पाई है। माफ कीजिएगा निमाड़े या प्रेमचंद का साहित्य जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल में जगह पाने या चर्चा पाने के लिए नहीं लिखा जाता। वहां राजदीप सरदेसाई पर बात होती है
जो एक तरफ तो अपनी जाति-बिरादरी को कहीं सम्मान पाने पर खुश हो जाते हैं और ट्वीट करते हैं तो दूसरी
तरफ मोदी के विरोध में लिखने वाला जैसी छवि बनाकर खुद को भुनाना भी चाहते हैं। इतना अंतरविरोध अगर
आपकी छवि में होगा तो वह रश्दी, नॉयपाल या चेतन भगत ही क्यों न हों, निमाड़े को उनकी आलोचना का पूरा
अधिकार है। और हां... रश्दी, नॉयपाल किसी भी धर्म के खिलाफ कुछ भी लिखें लेकिन बड़े लेखक का टैग लगवाने के बाद निमाड़े को गाली देने का अधिकार नहीं रखते हैं।

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