Friday, October 31, 2014

बुखारी पर चंद बातें


दो बातें...
ठेलना का मतलब जानते हैं...मीडिया यही कर रहा है। खासकर शाही इमाम अहमद बुखारी के मामले में...उनको जबरन ठेल-ठेल कर मुसलमानों का नेता बना दे रही है। कुछ लोगों की रहनुमाई करने का दावा करने वाला शख्स अपने निजी कार्यक्रम में किसी को बुलाए या न बुलाए, उसका निजी मामला है। इसमें मीडिया राजनीति क्यों खोज रहा है। बीजेपी भी मीडिया के सुर में बोल रही है और शाही इमाम को जबरन भारतीय मुसलमानों का नेता बना दे रही है...11 नवंबर से दिल्ली में विश्व हिंदू कॉन्फ्रेंस होने जा रही है...बहुत बड़ा आय़ोजन है। किसी मौलवी या धर्मगुरु को क्यों ऐतराज होना चाहिए कि विश्व हिंदू कॉन्फ्रेंस में उन्हें नहीं बुलाया गया।

दूसरी बात...
बुखारी ने बड़ी ही चालाकी से देश के मुसलमानों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है कि देखो तुम अब सारी पार्टियों से इतना पिट चुके हो कि अब मुझे अपना नेता मान लो...मैं ही तुम्हारा रहबर (रास्ता दिखाने वाला) हूं। मेरी शरण में आ जाओ। बताइए जिस शख्स ने अपने दामाद को मंत्री बनवाने के लिए समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव से हाथ मिलाया औऱ फिर उन्हें छोड़ दिया...बताइए जिस शख्स पर जामा मस्जिद की तमाम प्रॉपर्टी को लेकर आरोप हैं...वह शख्स अचानक देश के 35 करोड़ (सरकारी आंकड़ा...हालांकि यह ज्यादा है) मुसलमानों का नेता बनने का ख्वाब देखने लगा।

खतरनाक संकेत...
भारत का मुसलमान कभी सांप्रदायिक नहीं रहा लेकिन एक समुदाय विशेष का प्रतिनिधित्व करने वाली बीजेपी नामक धार्मिक पार्टी ने उसे सांप्रदायिक बना दिया। देश के मुसलमान किसी मुस्लिम लीग के पीछे जाकर नहीं खड़े हुए। ...जिन्होंने पाकिस्तान मांगा होगा, वे चले गए लेकिन जिन्होंने नहीं मांगा वो नहीं गए और ऐसे लोगों की तादाद ज्यादा थी औऱ है। ...उन्होंने कभी कांग्रेस का दामन पकड़ा तो कभी मुलायम सिंह यादव का...जहां से उन्हें धोखा मिला। बीजेपी और उसके रहनुमा चाहते हैं कि मुसलमान अब उसके पाले में आएं...कभी उसे देशभक्त बताया जाता है तो कभी एक ऐसा पप्पी बताया गया कि वह गलती से किसी कार के नीचे आकर कुचल जाता है। ...कभी उसकी टोपी पहन ली जाती है और कभी उसकी टोपी को वापस कर दिया जाता है।

मौजूदा हालात
इन हालात का फायदा बुखारी और अकबरुद्दीन ओवैसी जैसे लोग उठा रहे हैं। ये दोनों शख्सियतें जिस खतरनाक रास्ते पर बढ़ रही हैं वो बहुत डरावना है। ओवैसी की पार्टी ने ध्रुवीकरण के आधार पर महाराष्ट्र में 4 सीटें जीत लीं औऱ फूले नहीं समा रहे। वो अब देश के बारे में सोचने लगे हैं। ...बुखारी मुसलमानों को दिशाहीन पाकर उसका नेता बनने को आतुर हो गए हैं। ...बीजेपी खुश है, क्योंकि ये हालात उसको अपने लिए मुफीद लग रहे हैं। उसे मुसलमानों का साथ न तो चाहिए था और न आगे चाहेगा। वह अपनी विचारधारा पर अडिग है, उसमें बदलाव नहीं आएगा। आना होता तो लोकसभा में यूपी की कुछ सीटों से मुसलमानों को टिकट देकर वह इसका संकेत दे सकती थी लेकिन ऐसा नहीं किया। उसने मंत्रिमंडल में मुख्तार अब्बास नकवी को जगह तक नहीं दी, जो कभी मुखर हो जाते हैं तो कभी एकदम चुप। यानी पार्टी उन्हें जिस तरह इस्तेमाल करना चाहती है, वही उनको मंजूर है। शाहनवाज हुसैन की भी यही हालत है। नजमा हैपतुल्लाह एक मामूली सा विभाग पाने के बाद कंफर्ट जोन में हैं...भारतीय मुसलमान इन तथ्यों को जानते हैं, बेवकूफ नहीं। ऐसे में बुखारी और ओवैसी उनका फायदा नहीं उठाएंगे तो कौन उठाएगा....हालात बदतर होने वाले हैं। इसे याद रखिएगा।
...तो इनका हल क्या है...आप लोगों की प्रतिक्रिया के बाद अगले लेख में इस पर बात कर सकते हैं।

Friday, October 24, 2014

महान अडानी जी...वगैरह


देश विकास के रास्ते पर बढ़ चला है। अच्छे दिन लाने के लिए एक से बढ़कर एक फैसले किए जा रहे हैं। तमाम फैसलों को मिलाकर हम एक ऐसे भारत का निर्माण करने जा रहे हैं, जहां जनता को मनरेगा, कोयला, स्पेक्ट्रम जैसे घोटालों से निजात दिलाने की कोशिशें शुरु हो गई हैं। केंद्र का सबसे ताजा फैसला इस विकास को और रफ्तार देने जा रहा है...

क्या आप अडाणी या अडानी (Adani) को जानते हैं...शायद कुछ सिरफिरे हों, जो न जानते हों। संक्षेप में ये है कि ये गुजरात के बहुत बड़े बिजनेसमैन हैं और देश की तरक्की के लिए खुद को समर्पित कर चुके हैं। केंद्र का ताजा फैसला इन्हीं के बारे में है...

*महाराष्ट्र के विदर्भ के गोंडिया जिले में अडानी ग्रुप के पावर प्लांट (Power Plant) के लिए केंद्र सरकार ने 148.59 हेक्टेयर वन भूमि (Forest Land) मंजूर कर दी है। यहां पर 1980 मेगावॉट का पावर प्लांट अडानी ग्रुप लगाएगा। 2008 से प्रोजेक्ट लटका हुआ था लेकिन केंद्र में नई सरकार आने के बाद 28 अगस्त 2014 को प्रोजेक्ट को पहले मंजूरी दी गई, फिर 20 अक्टूबर 2014 को केंद्रीय पर्यावरण (Enviornment) और वन मंत्रालय ने भी इसे मंजूर कर लिया। मंत्रालय को उस इलाके में वन क्षेत्र के पेड़ काटे जाने और उसकी जगह पावर प्लांट लगाने पर कोई आपत्ति नहीं है। आठ साल पहले मंत्रालय यह सोच नहीं पाया, उसकी अक्ल पर तरस आता है...

तमाम आला सरकारी अधिकारी इस बात पर लज्जित नजर आए कि महाराष्ट्र में चुनाव आचार संहिता लागू होने के कारण केंद्र सरकार और वो लोग इस प्रोजेक्ट को पहले मंजूर नहीं कर सके। वैसे, अडानी ग्रुप ने अधिकारियों के इस रवैए पर जरा भी ऐतराज नहीं जताया है। जहां 8 साल तक इस दिन का इंतजार करना पड़ा, अब सिर्फ एक महीने की देरी से क्या फर्क पड़ता है...


आप सोच रहे होंगे लेखक यूसुफ किरमानी का दिमाग फिर गया है, इस तरह के विषय पर कहीं लेख लिखे जाते हैं, ये तो खबर है। इस पर लेखक बेकार का राग अखबारी (Newspaper Raga) छेड़े हुए है।...अरे भाई, अडानी जी ने एक तरह से देश पर कितना उपकार किया है। बिजली कितनी जरूरी है, इसे सिर्फ या तो यह सरकार समझ सकी है या फिर अडानी जी...वगैरह...

कोयला संकट की वजह से वैसे भी बिजली संकट बना हुआ है, अब अगर हरे-भरे पेड़ों की जगह पावर प्लांट न लगा तो बिजली संकट कैसे दूर होगा। जब ये हरे-भरे वन कटेंगे, तभी तो शहरों में कंक्रीट के जंगल उगेंगे न...आप लोग समझते क्यों नहीं भाई...। बताइए, लोग विकास भी नहीं चाहते। जरा सी बात का हवाई जहाज बना देते हैं...पेड़ तो कहीं भी लगाए जा सकते हैं। ...लेकिन पावर प्लांट तो उसी जमीन पर लगेगा, जहां अडानी जी की कंपनी को सूट करेगा। अगर वह इस जमीन पर नहीं लगाएंगे तो किसी न किसी जमीन पर लगाएंगे ही। इससे रत्ती भर फर्क नहीं पड़ता कि वहां से सैकड़ों वन श्रमिकों या वन प्राणियों को इधर-उधर छिपना पड़ेगा या जान से हाथ धोना पड़ेगा। ऐसे कितने लोग होंगे...100-200 लोग...सोचिए इस पावर प्लांट से जो बिजली पैदा होगी, वह लाखों नहीं तो कम से कम हजारों घरों को रोशन करेगी, हमारे मॉल जगमग रहेंगे। बाजार भी चढ़ेगा, विकास इसी को तो कहते हैं।...ये चमक कमजोर पड़ी नहीं कि बाजार (Share Market) में मनहूसियत छा जाएगी। अडानी जी इस चमक को बचाए रखने में कितने महत्वपूर्ण साबित हो रहे हैं देश के लिए, कम से कम अगले गणतंत्र दिवस पर किसी पद्म पुरस्कार के लिए तो हकदार हैं।


सरकार के इस फैसले पर अगर आपकी राय नकारात्मक है, तो उससे सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन आपके मुंह से कांग्रेस या यूपीए एजेंट होने की बदबू जरूर आएगी। उनके तमाम गुर्गों की सूंघने की शक्ति इतनी तेज है कि वे कांग्रेसी एजेंटों को फौरन सूंघ लेते हैं। इसलिए बेहतरी इसी में है कि आप किसी भी फैसले पर नकारात्मक राय न बनाएं और न ही उसे व्यक्त करें। वरना कांग्रेस एजेंट का दाग लग जाएगा। ब्लैक मनी (Black Money) न आए तो न आए...आप नकारात्मक राय न बनाएं। सकारात्मक रहें...एक दिन तो आएगी...क्या पता 2019 तक आ जाए...    

  *यह खबर मुंबई मिरर में प्रकाशित हुई है। पूरी खबर इस लिंक पर है - http://www.mumbaimirror.com/mumbai/cover-story/Centre-clears-370-acre-forest-land-for-Adanis-Gondia-power-project/articleshow/44912873.cms

नोट - यह लेख नवभारत टाइम्स अखबार की वेबसाइट पर भी उपलब्ध है, जहां मेरे अन्य लेख पढ़े जा सकते हैं और पाठकों की राय जानी जा सकती है। 

Sunday, October 19, 2014

कुछ उलझनें...गर तुम सुलझा सको...

 ये कुछ उलझनें हैं...परोस रहा हूं आपको...गर तुम सुलझा सको...


टि्वटर (Twitter) पर आप की पार्टी के सांसद ने एक फोटो पोस्ट किया है...

आप देश के सबसे ब़ड़े उद्योगपति की पत्नी और बेटे से मिल रहे हैं...अपने दफ्तर में...

मिलना ही चाहिए...बुराई क्या है...

...लेकिन तीन दिन बाद गैस के दाम बढ़ा दिए जाते हैं और डीजल के दाम कम कर दिए जाते हैं...लेकिन साथ ही

 डीजल के दाम तय करने का अधिकार खुले बाजार में कंपनियों को दे दिया जाता है...(इसे लेकर मैं क्यो

उलझन में हूं, समझ में नहीं आता...)

मित्रों, ने फेसबुक (Facebook, Youtube) पर आपके चुनावी भाषणों की याद ताजा की ...काले धन की एक-एक पाई वापस लाएंगे...

आपका मंत्री कह रहा है कि...ऐसा होगा तो वैसा हो जाएगा और अगर वैसा हो जाएगा तो ऐसा हो जाएगा...

देश के सबसे बड़े रईस आपके दोस्त हैं...किसका कितना काला धन कहां रखा है, आपके रईस दोस्त को तो

जरूर पता होगा, उन्हीं से पूछ लीजिए...(ये उलझन तो आसानी से सुलझ सकती है)

लव जेहाद के इतने नाटकीय अंत की उम्मीद किसी को नहीं थी, क्या आपको थी...क्या आप भी फिर से लव

और जेहाद दोनों करेंगे...आखिर एकाकीपन तो आपको भी सताता होगा...क्या आपको दोनों की जरूरत नहीं है...

(ये मेरी ही नहीं देश की उलझन है...)


एक साधू बाबा कह रहे हैं कि मंदिरों में दलितों का प्रवेश नहीं होना चाहिए, ऐसा हुआ तो अनर्थ हो

जाएगा...फेसबुक (Facebook) पर तुलसीदास के रामायण की पंक्तियां...शूद्र गंवार, पशु और नारी...पोस्ट की जा रही हैं...

क्या ऐसी बातें करने वाले साधू बाबा को जेल भेजने का कोई कानून है, याद आता है कि गरबा के बयान पर एक

मौलाना को पकड़ कर अंदर कर दिया गया था...इस साधू बाबा का कोई इंतजाम है क्या...(ये बहुत बड़ी उलझन है...)

एक मीट कारोबारी जिस पर हवाला (Money Laundring) का काम करने का आऱोप है, उसके पूर्व सीबीआई डायरेक्टर से संबंधों और

कांग्रेस नेताओं से मिलीभगत की खबर खूब उछली, आपकी पार्टी ने गहन जांच की मांग की थी, अब वही

कारोबारी झाड़ू लगाने के एक कार्यक्रम में शामिल किए गए तथाकथित वीआईपी लोगों की लिस्ट में शामिल है,

क्या अब उसे देशभक्त मान लिया जाए...(इसे लेकर तो अल्पसंख्यक समुदाय भी उलझन में है...)


ब्रैंडिंग, मार्केटिंग, घृणा फैलाने वाली बातों के सहारे कब तक और कितने चुनाव जीते जा सकते हैं, क्या कभी

इस तरह के बेस्ट सेलिंग (Best Selling) विषय पर पुस्तक लिखने का विचार आया...चेतन भगत (Chetan Bhagat) से सलाह की जा सकती है,

तमाम बेस्ट सेलर (Best Seller) लिखने औऱ चापलूसी के सारे गुर इस महान लेखक को आते हैं...(ये उलझन तो चेतन भगत की भी है...)

किसी आईआईएम (IMM) वाले से भी बात की जा सकती है...जब वो लालू को रेलवे के प्रॉफिट पर बोलने के लिए बुला

सकते हैं तो आपको आपके प्रिय विषय...कैसे किसी को चोर और देशद्रोही साबित किया जा सकता है...पर

बोलने के लिए नहीं बुला सकते...हमें आईआईएम प्रशिक्षित लोग ही देश चलाने के लिए भी चाहिए...आप

जाएंगे, समझाएंगे तो नए लीडर पैदा होंगे....जो समाज औऱ देश को बांटने की फसल दोगुनी-चौगुनी ताकत से

पैदा करेंगे...2019 से भी आगे का इंतजाम हो जाएगा...(ये उलझन आपसे हमदर्दी के तहत साझा की जा रही है...)

...और कहां तक गिनाऊं...