Friday, October 31, 2014

बुखारी पर चंद बातें


दो बातें...
ठेलना का मतलब जानते हैं...मीडिया यही कर रहा है। खासकर शाही इमाम अहमद बुखारी के मामले में...उनको जबरन ठेल-ठेल कर मुसलमानों का नेता बना दे रही है। कुछ लोगों की रहनुमाई करने का दावा करने वाला शख्स अपने निजी कार्यक्रम में किसी को बुलाए या न बुलाए, उसका निजी मामला है। इसमें मीडिया राजनीति क्यों खोज रहा है। बीजेपी भी मीडिया के सुर में बोल रही है और शाही इमाम को जबरन भारतीय मुसलमानों का नेता बना दे रही है...11 नवंबर से दिल्ली में विश्व हिंदू कॉन्फ्रेंस होने जा रही है...बहुत बड़ा आय़ोजन है। किसी मौलवी या धर्मगुरु को क्यों ऐतराज होना चाहिए कि विश्व हिंदू कॉन्फ्रेंस में उन्हें नहीं बुलाया गया।

दूसरी बात...
बुखारी ने बड़ी ही चालाकी से देश के मुसलमानों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है कि देखो तुम अब सारी पार्टियों से इतना पिट चुके हो कि अब मुझे अपना नेता मान लो...मैं ही तुम्हारा रहबर (रास्ता दिखाने वाला) हूं। मेरी शरण में आ जाओ। बताइए जिस शख्स ने अपने दामाद को मंत्री बनवाने के लिए समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव से हाथ मिलाया औऱ फिर उन्हें छोड़ दिया...बताइए जिस शख्स पर जामा मस्जिद की तमाम प्रॉपर्टी को लेकर आरोप हैं...वह शख्स अचानक देश के 35 करोड़ (सरकारी आंकड़ा...हालांकि यह ज्यादा है) मुसलमानों का नेता बनने का ख्वाब देखने लगा।

खतरनाक संकेत...
भारत का मुसलमान कभी सांप्रदायिक नहीं रहा लेकिन एक समुदाय विशेष का प्रतिनिधित्व करने वाली बीजेपी नामक धार्मिक पार्टी ने उसे सांप्रदायिक बना दिया। देश के मुसलमान किसी मुस्लिम लीग के पीछे जाकर नहीं खड़े हुए। ...जिन्होंने पाकिस्तान मांगा होगा, वे चले गए लेकिन जिन्होंने नहीं मांगा वो नहीं गए और ऐसे लोगों की तादाद ज्यादा थी औऱ है। ...उन्होंने कभी कांग्रेस का दामन पकड़ा तो कभी मुलायम सिंह यादव का...जहां से उन्हें धोखा मिला। बीजेपी और उसके रहनुमा चाहते हैं कि मुसलमान अब उसके पाले में आएं...कभी उसे देशभक्त बताया जाता है तो कभी एक ऐसा पप्पी बताया गया कि वह गलती से किसी कार के नीचे आकर कुचल जाता है। ...कभी उसकी टोपी पहन ली जाती है और कभी उसकी टोपी को वापस कर दिया जाता है।

मौजूदा हालात
इन हालात का फायदा बुखारी और अकबरुद्दीन ओवैसी जैसे लोग उठा रहे हैं। ये दोनों शख्सियतें जिस खतरनाक रास्ते पर बढ़ रही हैं वो बहुत डरावना है। ओवैसी की पार्टी ने ध्रुवीकरण के आधार पर महाराष्ट्र में 4 सीटें जीत लीं औऱ फूले नहीं समा रहे। वो अब देश के बारे में सोचने लगे हैं। ...बुखारी मुसलमानों को दिशाहीन पाकर उसका नेता बनने को आतुर हो गए हैं। ...बीजेपी खुश है, क्योंकि ये हालात उसको अपने लिए मुफीद लग रहे हैं। उसे मुसलमानों का साथ न तो चाहिए था और न आगे चाहेगा। वह अपनी विचारधारा पर अडिग है, उसमें बदलाव नहीं आएगा। आना होता तो लोकसभा में यूपी की कुछ सीटों से मुसलमानों को टिकट देकर वह इसका संकेत दे सकती थी लेकिन ऐसा नहीं किया। उसने मंत्रिमंडल में मुख्तार अब्बास नकवी को जगह तक नहीं दी, जो कभी मुखर हो जाते हैं तो कभी एकदम चुप। यानी पार्टी उन्हें जिस तरह इस्तेमाल करना चाहती है, वही उनको मंजूर है। शाहनवाज हुसैन की भी यही हालत है। नजमा हैपतुल्लाह एक मामूली सा विभाग पाने के बाद कंफर्ट जोन में हैं...भारतीय मुसलमान इन तथ्यों को जानते हैं, बेवकूफ नहीं। ऐसे में बुखारी और ओवैसी उनका फायदा नहीं उठाएंगे तो कौन उठाएगा....हालात बदतर होने वाले हैं। इसे याद रखिएगा।
...तो इनका हल क्या है...आप लोगों की प्रतिक्रिया के बाद अगले लेख में इस पर बात कर सकते हैं।

Friday, October 24, 2014

महान अडानी जी...वगैरह


देश विकास के रास्ते पर बढ़ चला है। अच्छे दिन लाने के लिए एक से बढ़कर एक फैसले किए जा रहे हैं। तमाम फैसलों को मिलाकर हम एक ऐसे भारत का निर्माण करने जा रहे हैं, जहां जनता को मनरेगा, कोयला, स्पेक्ट्रम जैसे घोटालों से निजात दिलाने की कोशिशें शुरु हो गई हैं। केंद्र का सबसे ताजा फैसला इस विकास को और रफ्तार देने जा रहा है...

क्या आप अडाणी या अडानी (Adani) को जानते हैं...शायद कुछ सिरफिरे हों, जो न जानते हों। संक्षेप में ये है कि ये गुजरात के बहुत बड़े बिजनेसमैन हैं और देश की तरक्की के लिए खुद को समर्पित कर चुके हैं। केंद्र का ताजा फैसला इन्हीं के बारे में है...

*महाराष्ट्र के विदर्भ के गोंडिया जिले में अडानी ग्रुप के पावर प्लांट (Power Plant) के लिए केंद्र सरकार ने 148.59 हेक्टेयर वन भूमि (Forest Land) मंजूर कर दी है। यहां पर 1980 मेगावॉट का पावर प्लांट अडानी ग्रुप लगाएगा। 2008 से प्रोजेक्ट लटका हुआ था लेकिन केंद्र में नई सरकार आने के बाद 28 अगस्त 2014 को प्रोजेक्ट को पहले मंजूरी दी गई, फिर 20 अक्टूबर 2014 को केंद्रीय पर्यावरण (Enviornment) और वन मंत्रालय ने भी इसे मंजूर कर लिया। मंत्रालय को उस इलाके में वन क्षेत्र के पेड़ काटे जाने और उसकी जगह पावर प्लांट लगाने पर कोई आपत्ति नहीं है। आठ साल पहले मंत्रालय यह सोच नहीं पाया, उसकी अक्ल पर तरस आता है...

तमाम आला सरकारी अधिकारी इस बात पर लज्जित नजर आए कि महाराष्ट्र में चुनाव आचार संहिता लागू होने के कारण केंद्र सरकार और वो लोग इस प्रोजेक्ट को पहले मंजूर नहीं कर सके। वैसे, अडानी ग्रुप ने अधिकारियों के इस रवैए पर जरा भी ऐतराज नहीं जताया है। जहां 8 साल तक इस दिन का इंतजार करना पड़ा, अब सिर्फ एक महीने की देरी से क्या फर्क पड़ता है...


आप सोच रहे होंगे लेखक यूसुफ किरमानी का दिमाग फिर गया है, इस तरह के विषय पर कहीं लेख लिखे जाते हैं, ये तो खबर है। इस पर लेखक बेकार का राग अखबारी (Newspaper Raga) छेड़े हुए है।...अरे भाई, अडानी जी ने एक तरह से देश पर कितना उपकार किया है। बिजली कितनी जरूरी है, इसे सिर्फ या तो यह सरकार समझ सकी है या फिर अडानी जी...वगैरह...

कोयला संकट की वजह से वैसे भी बिजली संकट बना हुआ है, अब अगर हरे-भरे पेड़ों की जगह पावर प्लांट न लगा तो बिजली संकट कैसे दूर होगा। जब ये हरे-भरे वन कटेंगे, तभी तो शहरों में कंक्रीट के जंगल उगेंगे न...आप लोग समझते क्यों नहीं भाई...। बताइए, लोग विकास भी नहीं चाहते। जरा सी बात का हवाई जहाज बना देते हैं...पेड़ तो कहीं भी लगाए जा सकते हैं। ...लेकिन पावर प्लांट तो उसी जमीन पर लगेगा, जहां अडानी जी की कंपनी को सूट करेगा। अगर वह इस जमीन पर नहीं लगाएंगे तो किसी न किसी जमीन पर लगाएंगे ही। इससे रत्ती भर फर्क नहीं पड़ता कि वहां से सैकड़ों वन श्रमिकों या वन प्राणियों को इधर-उधर छिपना पड़ेगा या जान से हाथ धोना पड़ेगा। ऐसे कितने लोग होंगे...100-200 लोग...सोचिए इस पावर प्लांट से जो बिजली पैदा होगी, वह लाखों नहीं तो कम से कम हजारों घरों को रोशन करेगी, हमारे मॉल जगमग रहेंगे। बाजार भी चढ़ेगा, विकास इसी को तो कहते हैं।...ये चमक कमजोर पड़ी नहीं कि बाजार (Share Market) में मनहूसियत छा जाएगी। अडानी जी इस चमक को बचाए रखने में कितने महत्वपूर्ण साबित हो रहे हैं देश के लिए, कम से कम अगले गणतंत्र दिवस पर किसी पद्म पुरस्कार के लिए तो हकदार हैं।


सरकार के इस फैसले पर अगर आपकी राय नकारात्मक है, तो उससे सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन आपके मुंह से कांग्रेस या यूपीए एजेंट होने की बदबू जरूर आएगी। उनके तमाम गुर्गों की सूंघने की शक्ति इतनी तेज है कि वे कांग्रेसी एजेंटों को फौरन सूंघ लेते हैं। इसलिए बेहतरी इसी में है कि आप किसी भी फैसले पर नकारात्मक राय न बनाएं और न ही उसे व्यक्त करें। वरना कांग्रेस एजेंट का दाग लग जाएगा। ब्लैक मनी (Black Money) न आए तो न आए...आप नकारात्मक राय न बनाएं। सकारात्मक रहें...एक दिन तो आएगी...क्या पता 2019 तक आ जाए...    

  *यह खबर मुंबई मिरर में प्रकाशित हुई है। पूरी खबर इस लिंक पर है - http://www.mumbaimirror.com/mumbai/cover-story/Centre-clears-370-acre-forest-land-for-Adanis-Gondia-power-project/articleshow/44912873.cms

नोट - यह लेख नवभारत टाइम्स अखबार की वेबसाइट पर भी उपलब्ध है, जहां मेरे अन्य लेख पढ़े जा सकते हैं और पाठकों की राय जानी जा सकती है। 

Sunday, October 19, 2014

कुछ उलझनें...गर तुम सुलझा सको...

 ये कुछ उलझनें हैं...परोस रहा हूं आपको...गर तुम सुलझा सको...


टि्वटर (Twitter) पर आप की पार्टी के सांसद ने एक फोटो पोस्ट किया है...

आप देश के सबसे ब़ड़े उद्योगपति की पत्नी और बेटे से मिल रहे हैं...अपने दफ्तर में...

मिलना ही चाहिए...बुराई क्या है...

...लेकिन तीन दिन बाद गैस के दाम बढ़ा दिए जाते हैं और डीजल के दाम कम कर दिए जाते हैं...लेकिन साथ ही

 डीजल के दाम तय करने का अधिकार खुले बाजार में कंपनियों को दे दिया जाता है...(इसे लेकर मैं क्यो

उलझन में हूं, समझ में नहीं आता...)

मित्रों, ने फेसबुक (Facebook, Youtube) पर आपके चुनावी भाषणों की याद ताजा की ...काले धन की एक-एक पाई वापस लाएंगे...

आपका मंत्री कह रहा है कि...ऐसा होगा तो वैसा हो जाएगा और अगर वैसा हो जाएगा तो ऐसा हो जाएगा...

देश के सबसे बड़े रईस आपके दोस्त हैं...किसका कितना काला धन कहां रखा है, आपके रईस दोस्त को तो

जरूर पता होगा, उन्हीं से पूछ लीजिए...(ये उलझन तो आसानी से सुलझ सकती है)

लव जेहाद के इतने नाटकीय अंत की उम्मीद किसी को नहीं थी, क्या आपको थी...क्या आप भी फिर से लव

और जेहाद दोनों करेंगे...आखिर एकाकीपन तो आपको भी सताता होगा...क्या आपको दोनों की जरूरत नहीं है...

(ये मेरी ही नहीं देश की उलझन है...)


एक साधू बाबा कह रहे हैं कि मंदिरों में दलितों का प्रवेश नहीं होना चाहिए, ऐसा हुआ तो अनर्थ हो

जाएगा...फेसबुक (Facebook) पर तुलसीदास के रामायण की पंक्तियां...शूद्र गंवार, पशु और नारी...पोस्ट की जा रही हैं...

क्या ऐसी बातें करने वाले साधू बाबा को जेल भेजने का कोई कानून है, याद आता है कि गरबा के बयान पर एक

मौलाना को पकड़ कर अंदर कर दिया गया था...इस साधू बाबा का कोई इंतजाम है क्या...(ये बहुत बड़ी उलझन है...)

एक मीट कारोबारी जिस पर हवाला (Money Laundring) का काम करने का आऱोप है, उसके पूर्व सीबीआई डायरेक्टर से संबंधों और

कांग्रेस नेताओं से मिलीभगत की खबर खूब उछली, आपकी पार्टी ने गहन जांच की मांग की थी, अब वही

कारोबारी झाड़ू लगाने के एक कार्यक्रम में शामिल किए गए तथाकथित वीआईपी लोगों की लिस्ट में शामिल है,

क्या अब उसे देशभक्त मान लिया जाए...(इसे लेकर तो अल्पसंख्यक समुदाय भी उलझन में है...)


ब्रैंडिंग, मार्केटिंग, घृणा फैलाने वाली बातों के सहारे कब तक और कितने चुनाव जीते जा सकते हैं, क्या कभी

इस तरह के बेस्ट सेलिंग (Best Selling) विषय पर पुस्तक लिखने का विचार आया...चेतन भगत (Chetan Bhagat) से सलाह की जा सकती है,

तमाम बेस्ट सेलर (Best Seller) लिखने औऱ चापलूसी के सारे गुर इस महान लेखक को आते हैं...(ये उलझन तो चेतन भगत की भी है...)

किसी आईआईएम (IMM) वाले से भी बात की जा सकती है...जब वो लालू को रेलवे के प्रॉफिट पर बोलने के लिए बुला

सकते हैं तो आपको आपके प्रिय विषय...कैसे किसी को चोर और देशद्रोही साबित किया जा सकता है...पर

बोलने के लिए नहीं बुला सकते...हमें आईआईएम प्रशिक्षित लोग ही देश चलाने के लिए भी चाहिए...आप

जाएंगे, समझाएंगे तो नए लीडर पैदा होंगे....जो समाज औऱ देश को बांटने की फसल दोगुनी-चौगुनी ताकत से

पैदा करेंगे...2019 से भी आगे का इंतजाम हो जाएगा...(ये उलझन आपसे हमदर्दी के तहत साझा की जा रही है...)

...और कहां तक गिनाऊं...


Sunday, June 22, 2014

शिया - सुन्नी विवाद नहीं...ये है वहाबी आतंकवाद


यह हैरानी की बात है कि तमाम आधुनिक टेक्नॉलजी से लैस अमेरिका और उसके ग्रुप के साथी देशों को आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट इन इराक एंड  लेवांतजैसे कट्टर आतंकवादी संगठन के बारे में वक्त रहते पता नहीचला। जिसने अचानक पूरे विश्व समुदाय को चुनौती दे दी है औऱ उसकी आंच भारत तक पहुंच चुकी है। आइए जानते हैं कि अल-कायदा या वहाबी आतंकवाद का चोला पहने आईएसआईएस कैसे अचानक इतना खतरनाक हो गया।

पहले नजरन्दाज किया
सीरिया में गृह युद्ध खत्म हुए अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं। सीरिया का संकट जब शुरू हुआ तो सबसे पहले ईरान और खुद सीरिया ने खासतौर पर अमेरिका और उसके साथी देशों को चेताया कि वे सीरिया में गृहयुद्ध भड़का रहे अलकायदा के ही आतंकवादियों का ग्रुप है। सभी ने इस चेतावनी को नजरन्दाज करते रहे औऱ सीरिया को कथित रूप से आजाद कराने के लिए वहां के आतंकी संगठनों की मदद करते रहे। बीच में यूएन ने भी चेतावनी जारी कि सीरिया के आंतकी गुटों को मदद नहीं मिलनी चाहिए। गृहयुद्ध से परेशान होकर सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद ने अमेरिका से हाथ मिलाना पड़ा। अगले दिन सीरिया में गृह युद्ध थमता नजर आया। लेकिन जिन आतंकी संगठनों को इंसानी खून मुंह लग चुका थावो कहां चुप बैठते। उन्होंने एक नई मुहिम शुरू की वो सीरिया औऱ इराक के कुछ हिस्सों को मिलाकर अपना आईएसआईएस स्टेट बनाएंगे और फिर निकल पड़े। इस पर कभी बात नहीं की जाती कि मिडिल ईस्ट के संकट पर सऊदी अरब की क्या भूमिका रहती है और क्या उसमें अमेरिका की भी सहमति भी होती है।

शिया-सुन्नी नहीं वहाबी आतंकवाद
अमेरिकी मीडिया ने आईएसआईएस संकट सामने आने के बाद इसे फौरन शिया-सुन्नी संघर्ष का रूप दे दिया और पूरी दुनिया का मीडिया इसे शिया-सुन्नी संघर्ष ही मानकर चल रहा है। लेकिन इस तथ्य को भुला दिया जाता है कि इस आतंकवाद की जड़ वो वहाबी आतंकवाद हैजिसकी पैदाइश अलकायदा के रूप में सबसे पहले सऊदी अरब में हुई। जिसने ओसामा बिन लादेन से लेकर अबू बकर अल बगदादी तक की मंजिल बिना सऊदी अरब की मदद के तय नहीं की है। भारत और पाकिस्तान में इसे वहाबी आतंकवाद के नाम से जाना जाता हैजो कभी लश्कर--तैबाकभी जैश--मोहम्मदकभी तहरीक--तालिबानकभी अल-कायदाकभी अहले हदीसकभी लश्कर--झंगवी के नाम से सामने आता है। अब आईएसआईएस के नाम से सामने हैजो वास्तव में वहाबी विचारधारा को फैलाने के मकसद से बनाया गया है। इसे मात्र शिया विरोधी राजनीतिक गुट कहकर मान्यता नहीं दी जा सकती। ये एक चाल है जो बाद में इसे फिलिस्तीनी मुक्ति संघर्ष जैसी मान्यता दी जा सके। आईएसआईएस हर उस देश और धर्म के खिलाफ हैं जो अमन और लोकतंत्र चाहते हैं। हालांकि जहां इन्हें पाला-पोसा जाता हैवहां खुद लोकतंत्र नहीं है। सऊदी अरब इसका सबसे बड़े उदाहरण है। इनके निशाने पर शिया देश या समुदाय इसलिए हैं कि शिया देश या समुदाय सबसे पहले इनके विरोध में उठ खड़े होते हैं। यह सदियों पुराना सिलसिला है जो चल रहा है। एक ही धर्म के दो फिरके जब लड़ते हैं तो बाकी लोगों को कहने का मौका मिलता है। इसलिए ऐसे संगठनों का सपना है कि सबसे पहले आबादी और देश के हिसाब से सबसे कम संख्या वाले लोगों यानी शिया आबादी को कुचल डालो फिर पूरी दुनिया में इस्लाम फैलता चला जाएगा। लेकिन इस राह में सबसे पहले शिया रोड़े के रूप में आ जाते हैं और वहाबियों की जंग वहां से आगे नहीं बढ़ पाती। लेकिन इस बार आईएसआईएस जिस खतरनाक रूप में सामने आया है वह गंभीर चिंता का विषय उन तमाम देशों के लिए है जिनके नागरिक मिडिल ईस्ट में तमाम वजहों से गए हुए हैं या जिनके व्यापारिक हित जुड़े हुए हैं।  

वहाबी और सुन्नी में मोटा फर्क ये है कि भारत-पाकिस्तान औऱ विश्व के किसी भी कोने में किसी महापुरुष की दरगाहें या रौजे हैं, वहाबी लोग न उनको मानते हैं और न वहां जाते हैं। जैसे भारत में अजमेरशरीफ दरगाह, हजरत निजामुद्दीन औलिया, किछौछा शरीफ, देवा शरीफ (बाबा बुल्ले शाह)  या पाकिस्तान में बाबा फरीद की दरगाह या बीबी पाक दामन की दरगाह पर वहाबी लोग जाने के खिलाफ हैं। लेकिन बहुसंख्यक सुन्नी लोग ठीक उसी तरह जाते हैं, जैसे अन्य धर्मों के लोग इन दरगाहों पर जाते हैं। वहाबी आतंकी संगठन तो बाबा फरीद की दरगाह में विस्फोट तक कर चुके हैं। वहाबी सूफी विचारधार के भी सख्त खिलाफ हैं और उनके यहां उसका कोई स्थान नहीं है। इसी तरह करबला ही नहीं विश्व में जितने भी शिया दरगाहें या रौजे हैं, वहाबी उसके भी खिलाफ हैं लेकिन सुन्नी औऱ अन्य समुदायों के लोग वहां जाते हैं। इस विरोध की ऐतिहासिक वजहें और उसे बताने के लिए यह लेख बहुत लंबा हो जाएगा। लेकिन किसी धर्म का कोई फिरका जब आतंकवाद को गले लगा ले तो समाज और पूरी दुनिया को आगाह करना बहुत जरूरी है। पश्चिमी देशों का मीडिया औऱ वहां की सरकारें इसे अपने व्यापारिक हितों के हिसाब से बताती हैं और बढ़ावा देती हैं। बीबीसी की एक रिपोर्ट बताती है कि आईएसआईएस को अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने अलकायदा की तरह ही सीरिया में गृहयुद्ध भड़काने के लिए तैयार किया था लेकिन वही गुट अब बैकफायर कर गया। यह ठीक उसी तरह हुआ जिस तरह सीआईए ने ओसामा बिन लादेन को तैयार किया और बाद में वह अमेरिका के खिलाफ हो गया लेकिन तब तक अमेरिका लादेन के जरिए अपना मकसद यानी अफगानिस्तान में रूस की फौज को भगाने के रूप में कर चुका था। यही वजह है कि मिडिल ईस्ट या खाड़ी देशों की पॉलिटिक्स को अमेरिका ने आज जिस मोड़ पर ला खड़ा किया है, उससे तमाम अमन पसंद मुल्कों के लिए खतरा पैदा हो गया। इस आग में हर कोई झुलस सकता है। इसलिए मौजूदा संकट को शिया-सु्न्नी नजरिए से देखने की हिमाकत नहीं की जानी चाहिए। 


क्या चाहता है आईएसआईएस
-यह संगठन इराक और सीरिया में वहाबी या तालिबानी हुकूमत चाहता हैक्योंकि ये देश शिया बाहुल्य हैं और वहां उन्हीं की हुकूमत है। मुख्य मकसद है ईरान की पॉलिटिक्स को चुनौती देना।
-दुनिया के नक्शे पर इराक औऱ सीरिया की बसावट बहुत रणनीतिक है जो अमेरिका ही नहीं आईएसआईएस को भी मुफीद लगती है। अगर इन दोनों देशों पर कब्जा हो जाता है तो फिर ईरानइजिप्ट दूर नहीं हैं।
-आईएसआईएस ऐसी स्थिति चाहता है कि नक्शे पर फिलिस्तीन जैसा कोई छोटा सा स्टेट उभर आए जहां तालिबानी या वहाबी हुकूमत कायम की जा सके।
-ईरान इन सारे आतंकी संगठनों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। ईरान ने खुद भी अल कायदा के हमले झेले और उसे वहां कुचलने में कामयाबी पाई है। आईएसआईएस स्टेट बनने के बाद ईरान के लिए आसानी से मुश्किलें पैदा की जा सकती हैं।
-सीरिया गृहयुद्ध झेल चुका हैउसे अपेक्षाकृत दबाना आसान होगा और अबू बकर अल बगदादी जो पहले सीरिया में ही आतंकी संगठनों का नेतृत्व कर रहा थावह वहां के हालात से वाकिफ है
-आईएसआईएस ने अभी अमेरिका के खिलाफ कुछ नहीं कहा है। लेकिन समय आने पर वह अमेरिका से बात करने को राजी हो जाएगा और अमेरिका अपने तेल बिजनेस की खातिर इराक को भूलकर आईएसआईएस से हाथ मिला सकता है
-ईरान ने अमेरिका के साथ मिलकर आईएसआईएस पर हमला करने की पेशकश जरूर की हैलेकिन चालाक अमेरिका ने अभी इसके लिए हामी नहीं भरी है। तरह-तरह के बहाने बनाकर समय काटा जा रहा है। अभी से इस बारे में इसके भविष्य के लिए कोई भी भविष्यवाणी चुनौतीपूर्ण है।

(नोट - नवभारत टाइम्स में 22 जून 2014 को वर्ल्ड व्यू कॉलम में इस लेख के संपादित अंश छपे हैं। यहां पाठकों की सेवा में इस लेख को असंपादित यानी मूल रूप में पेश किया जा रहा है। यही लेख नवभारत टाइम्स अॉनलाइन पर भी उपलब्ध है। पाठक वहां भी चुनिंदा पाठकों की राय पढ़ने के लिए जा सकते हैं। - यूसुफ किरमानी


  




Wednesday, March 19, 2014

छह मुल्ले मोदी के साथ क्यों....

                                                 ये मैं नहीं फेसबुक पर लोग कह रहे हैं




Note : This article also available on NBT ONLINE. Most of the readers are commenting there. You can visit there and read comments. Link - http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/yusufkirmani/entry/bjp-trying-to-woo-muslims

नोटः .ये लेख नवभारत टाइम्स की अॉनलाइन साइट पर भी उपलब्ध है। वहां पाठकों की भारी प्रतिक्रिया आ रही है। उन प्रतिक्रियाओं को पढ़ने और सारे मुद्दे को समझने के लिए आप भी वहां जाकर टिप्पणियों को पढ़ सकते हैं। इस लिंक पर जाएं - http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/yusufkirmani/entry/bjp-trying-to-woo-muslims


चुनाव का मौसम है...फेसबुक का साथ है...वल्लाह क्या बात है। कायदे से इस तरह से मेरे लेख की शुरुआत नहीं होनी चाहिए थी लेकिन अब हो गई तो आइए बात करते हैं। हुआ यह कि अभी नरेंद्र मोदी का एक फोटो कुछ मौलाना लोगों के साथ अखबारों और फेसबुक पर प्रकट हुआ। ....आफत हो गई। मौलाना लोगों को यह गलतफहमी है कि वे अगर हां कहेंगे तो इस देश के मुसलमान हां कहेंगे औऱ नहीं कहेंगे तो नहीं...पर उनकी इस गलतफहमी को भारत के मुसलमान बार-बार दूर कर रहे हैं लेकिन भाई लोग फिर भी न मानने को तैयार हैं और न ही सबक लेने को।

यह एक आम फोटो है जिसके जरिए संदेश देने की कोशिश की गई है कि अब तो मौलानाओं का भी समर्थन मोदी को मिल गया है। जो लोग इस जवाब की तलाश में है कि इस बार मोदी क्यों नहीं अपने भाषण में दंगों का, मुसलमानों का जिक्र नहीं कर रहे हैं तो उन्हें जवाब मिल गया होगा।

अब ये फोटो जैसे ही फेसबुक पर शेयर होने लगी तो आम मुसलमान हाथ धोकर पीछे पड़ गया। मुझे लगा कि इस फोटो पर उन लोगों के विचार आप लोगों के सामने आने चाहिए जो इस चुनाव में किसी गलतफहमी का शिकार हैं....तो अपनी बात यहीं पर खत्म...अब नीचे पढ़ें उस फोटो पर आम लोगों की प्रतिक्रिया....





अख्तर खान अकेला 
कल मुझ से किसी ने कहा के कुछ लोग दाडी तो रख लेते है लेकिन खतना इनकी ठीक तरह से नहीं होती ,, पता नहीं सच क्या है ,,,,


सातों मुल्ले एक साथ.....कौन कहता है कौम और मुल्लों में मिल्लत नहीं है....??
Seven mulle together. ....Who says the community and is not in millat mullon?? (Translated by Bing)


Usman Khan Ye sub muslman nhai dadi ki aad mai r.s.s. Ke agent hai.


Vora Nasir Inko kom shaye koi matlab nahi inka iman tho paisa or jina haye Allah tala kaye ghar kaye shabshaye bdaey chor haye

Nawab Shaheen Afroz wo madani to modi ki gadiyo m ghomta h

Zulfiqar Khan Shame on all of them.

Shiv Rao mout ka sodagar

Riyasat Ali Qoum ke gaddhar hai ye dadi wale


Syed Masum शक्ल से तो मुल्ले नहीं लग रहे 

Mazid Khan Khaildar Munafik hai yeh sab

Yusuf  हर दाढ़ी रखने वाला मुसलमान नहीं होता, जैसे हर चुटिया रखने वाला पंडित नहीं होता।...अगर दारुल नदवा और देवबंद मोदी के साथ हैं तो यह अंदाजा मत लगाइए कि सारे दाढ़ी वाले उनके साथ हैं...


Mohammed Tarique Azmi kaun Bewakuf kahta hai k Kabul me gadhe nahe hotey hai,1992 ka 6 Dec.yad hai,apne 54 gadhe b parliament me the sirf ek Ghoda nikala C.K.Jafer Shareef baki sab gadhe.aur ye Alhale Hadees,Deobandi ahale khabbis kab musalman hai jo inki baat ki jai.dekh lo ye sab wahabi hai.

Sd Sharma ACHHA TO YAH HOTA KI MODI BHI IN KI TOPI PAHAN LETA.


Vinit Vijay काश हमारे इस भारत में ऐसे दिन भी आये, हिंदू मुस्लिम दोनों मिलकर एक साथ मुस्काए। तुम मस्जिद की मीनारों से होली जलती देखो, हम मंदिर में शंख बजाकर अपनी ईद मनाये।

Yusuf कल्पना अच्छी है...हम लोग हमेशा साथ थे और रहेंगे...पर इस फोटो के संदर्भ में आपके ये विचार बेमानी लगते हैं। नेताओं के संदर्भ में इस तरह के विचार न प्रकट करें। वे गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं...वे रंगे हुए सियार हैं...चाहे आपके हों या हमारे हों...एेसे गिरगिटों और ऐसे सियारों को नंगा करना वक्त की सबसे बड़ी जरूरत हैं। आप जरा समझिए...इस देश के साथ कुछ लोग बहुत बड़ी साजिश कर रहे हैं...ये फोटो और ये गिरगिट लोग उसी साजिश का हिस्सा हैं...उसका संचालन करने वाले...

Zamin Hussain Dadi ke topi pe na jao ...in jese bikau nkali molviyo se savdhan ....

Zamin Hussain Sale salman khan ke to piche pad gye the pta nhi kya kya keh thw the use ..ab in bikao dadi topi ka kya kre....


Faheem Abbad Farahi bikaau mullaoN sey hoshiyar rahiye

अख्तर खान अकेला इस्लाम में जिन मोलवी मौलानाओं को दीनी तालीम देने लायक़ बनाया है ,,जिन इमामों को नमाज़ पढ़ाने का दर्जा दिया है ऐसे दीन के जानकार अगर दिनी तब्लीग को छोड़कर सियासत में जुड़कर खुद को बेच दे और हुलिया इस्लाम का बना कर इस्लाम को बदनाम करे अपने हुलिये के इस्लामिक तोर तरीक़े बताकर सियासी तोर पर रूपये और सियासी पदों की सौदेबाज़ी करे तो ऐसे लोगों के लिए दुनिया तो क्या जहन्नुम में भी जगह नहीं है ,,,,,,,,,,,,ऐसा तो क़ुरान और हदीस की तालीम से निकल कर आता है फिर भी यह मोलाना ,,,मोलवी ,,,इमाम ,,जो इस्लाम आम मुसलमान से ज़यादा समझते है सियासी गुलामी और सौदेबाज़ी का जुर्म खूब करते है अल्लाह से डरते नहीं और दुनियावी लोगों से डर कर उनके सामने खुद को इस्लामिक हुलिया बनाकर बेच कर पार्टियों के ब्रांड एम्बेसेडर प्रचारक बनने का गुनाह करते है अल्लाह तोबा ऐसे लोगों को खुदा अक़ल दे ,,अगर सियासत करना है तो फिर तब्लीग का हुलिया इस्लाम का हुलिया हटा कर आम हुलिया बनाओ मोलवी गिरी मोलाना गिरी छोडो और फिर सियासी रूप से आज़ाद होकर जिधर चाहे उधर जाइये और प्रचार करिये किसी को कोई ऐतराज़ नहीं रहेगा ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

Anis Ansari Kya peta photo khivhane ke paisa mile ho




फोटो के बारे मेंः ये फोटो फेसबुक से साभार सहित लिया गया है।