Saturday, April 28, 2012

कवि-कथाकार संजय कुंदन क्या वाकई ब्राह्मणवादी हैं


अविनाश के मोहल्ला ब्लॉग पर फॉरवर्ड प्रेस में प्रकाशित प्रमोद रंजन की संपादकीय टिप्पणी, मॉडरेटर का वक्तव्य और इन सब पर कुछ लोगों की प्रतिक्रियाएं पढ़ीं तो मन में कुछ सवाल उठे, बातें उभरीं, जिन्हें आप लोगों से शेयर करना चाहता हूं। पहली बार बहुजन आलोचना की अवधारणा का पता चला। अगर इस संदर्भ को समझने में परेशानी हो तो पहले प्रमोद रंजन की टिप्पणी मोहल्ला लाइव ब्लॉग पर पढ़ें, इस लिंक पर जाएं http://mohallalive.com/2012/04/24/bahujan-sahitya-varshiki-editorial-of-forward-press
- यूसुफ किरमानी

साहित्य एक जनतांत्रिक माध्यम है। हर किसी को हक है कि वह नई-नई अïवधारणा लेकर आए। वैसे बहुजन का फॉर्मूला यूपी और बिहार की राजनीति में पिट चुका है। राजनेता अब इससे आगे निकल चुके हैं। लेकिन अब साहित्य में इसे चलाने की कोशिश की जा रही है।

सच्चाई यह है कि सामाजिक संरचना को बौद्धिकों से बेहतर राजनेता ही समझते हैं। (क्या इसीलिए अब भी हिंदीभाषी क्षेत्र की जनता पर साहित्यकारों-बुद्धिजीवियों से ज्यादा राजनेताओं की बात का असर होता है?) खैर, प्रमोद रंजन ने जो बहुजन आलोचना पेश की है उसके मानदंड बड़े दिलचस्प हैं। इसके मुताबिक एक कहानी के पात्रों की सूची तैयार करें। उनके सरनेम पर नजर डालिए। ज्यों ही कोई सवर्ण सरनेम नजर आए उसे खारिज कर दीजिए ब्राह्मणवादी कह कर। अगर सरनेम दलित-ओबीसी वगैरह का है तो कहानी बहुत अच्छी होगी। कोई सरनेम न हो तो उस पर मनमुताबिक सरनेम लगा दीजिए। कितना आसान है यह प्रतिमान। कहानी पढऩे की कोई जरूरत नहीं। कहानी की कथावस्तु क्या है, वह क्या कहती है, कहां ले जाती है, इस पर ज्यादा दिमाग खपाने की कोई जरूरत नहीं। कहानी वाकई कहानी है भी या नहीं। उसमें पठनीयता है या नहीं, वह पाठकों को अपने साथ जोड़ पाती है या नहीं-ये सब कोई मुद्दा ही नहीं है।

सचमुच आलोचना लिखने का एक नया शॉटकर्ट निकाला है प्रमोद रंजन ने। कहने को तो वह खुद को ब्राह्मणवाद विरोधी कहते हैं पर वह खुद नायक की पंडिताऊ परिभाषा से बाहर नहीं निकल सके हैं। वह नायक की परंपरागत परिभाषा (जो भरत मुनि और दूसरे कुछ आचार्यों ने दी है) में फंसे हुए हैं जो यह कहती है कि नायक को धीरोदात्त होना चाहिए। महान आदर्शों से युक्त होना चाहिए। साहित्य के पंडितों की तरह प्रमोद भी चरित्रों को ब्लैक एंड व्हाइट में देखते हैं यानी या तो व्यक्ति बहुत अच्छा होगा या बहुत बुरा। अगर विश्व साहित्य, नाटक या कुछ बेहतर फिल्मों की ओर उन्होंने नजरें डाली होतीं तो उन्हें पता चलता कि नायक का रूप कितना बदल चुका है। सच तो यह है कि सिनेमा के दर्शक ज्यादा परिपक्व हैं जो एंटी हीरो के कॉन्सेप्ट को आत्मसात कर चुके हैं। बड़ा और प्रामाणिक चरित्र वह होता है जिसमें ज्यादा से ज्यादा शेड्स होते हैं, जो अपनी पूरी मानवीय अच्छाइयों और बुराइयों के साथ आता है। अगर इस रोशनी में खुले मन से उन्होंने बॉस की पार्टी के करैक्टर्स को देखा होता तो शायद उनकी राय कुछ और होती। वे ब्राह्मण होने और ब्राह्मणवादी होने में फर्क नहीं कर पाते।

जैसे कोई धार्मिक हिंदू या धार्मिक मुसलमान होने भर से ही सांप्रदायिक नहीं हो जाता, उसी तरह ब्राह्मण होने से ही कोई ब्राह्मणवादी नहीं हो जाता। जबकि दूसरी तरफ कोई गैर ब्राह्मण भी घोर ब्राह्मणवादी हो सकता है। ब्राह्मणवाद तो एक प्रवृत्ति है जिसका मतलब है हर तरह के परिवर्तनों का विरोध, यथास्थितिवाद का समर्थन और जातीय आत्ममुग्धता और अहंकार। प्रमोद सिर्फ इसलिए संजय कुंदन को ब्राह्मणवादी कहते हैं क्योंकि उनके कुछ पात्र ब्राह्मण हैं। अब केएनटी की कार कहानी पर गौर करें। अगर उसके पात्र का नाम कमल नारायण तिवारी न होकर कमल नारायण यादव होता तो क्या कोई फर्क पड़ता? वह कहानी तो हिंदी पत्रकारिता में आ रही गिरावट पर लिखी गई है जिससे प्रमोद भी भलीभांति परिचित हैं। 

क्या मुख्यधारा की पत्रकारिता का आम जनता के सरोकारों से कटने पर लिखना ब्राह्मणवाद है? इस कहानी में केएनटी भ्रष्ट लोगों की करतूतों को उजागर करने के लिए अखबार निकालते हैं। क्या यह ब्राह्मणवादी कार्य है? प्रमोद को यह बात अटपटी लगती है कि एक सवर्ण पात्र आखिर क्यों पिछड़ी जाति की सरकार आने पर चिढ़ रहा है? प्रमोद तो बिहार के हैं। वहां की सत्ता से बाहर होने पर सवर्णों के भीतर जो छटपटाहट पैदा हुई है, वह वहां का एक सामाजिक यथार्थ है। किसी भी सवर्ण परिवार में ऐसी बातें होना स्वाभाविक है। अगर संजय कुंदन ब्राह्मणवादी होते तो वह बड़ी चालाकी से इस तथ्य को छुपा ले जाते। पर उन्होंने इसे छुपाया नहीं बल्कि उजागर किया।

मुझे अब्दुल बिस्मिल्लाह का उपन्यास झीनी झीनी बीनी चदरिया याद आता है जिसमें उन्होंने बुनकरों के जीवन का चित्रण करते हुए उनके भीतर के सांप्रदायिक रुझानों को भी साफ-साफ व्यक्त किया है। कुंदन ने भी ऐसा ही किया है। वह चाहते तो ब्राह्मण पात्रों को महान आदर्शवादी गरीब-पिछड़ा समर्थक, क्रांतिकारी साबित कर प्रगतिशील होने का तमगा हासिल कर सकते थे( ऐसा हाल में एक फैशन के तहत कई सवर्ण लेखकों ने किया है) पर उन्होंने लेखकीय ईमानदारी को नहीं छोड़ा। फिर केंद्रीय पात्र को अनिवार्य रूप से लेखक का प्रतिनिधि मानना भी बहुत बड़ी भूल है। जैसे मुक्तिबोध की अंधेरे में कविता के मैंको बहुत से आलोचकों ने कवि का प्रतिरूप बताकर उसकी अनर्थकारी आलोचना की है। कुंदन जैसे लेखक दरअसल हिंदी कहानी में चरित्रों के बने-बनाए ढांचे को तोड़ रहे हैं। ऐसा करने में गलत समझे जाने का जोखिम तो है ही।

प्रमोद रंजन को लगता है कि हिंदी साहित्य में सिर्फ जाति, पैसे और ताकत से ही जगह बनाई जाती है। अगर ऐसा होता तो आज सभी आईएएस-आईपीएस लेखक हिंदी के सर्वाधिक प्रतिष्ठित और चर्चित रचनाकार होते। पर ऐसा नहीं है। दरअसल प्रमोद इस बात को भूल रहे हैं कि साहित्य में सबसे बड़ी सत्ता है- पाठक वर्ग। हिंदी का पाठक समुदाय बहुत मौन होकर पर्दे के पीछे से फैसले करता है। वह जिसे महत्व देता है वही प्रतिष्ठित होता है। वह सवर्ण-अवर्ण से ऊपर उठकर सोचता है। नामवर सिंह आज अगर इस ऊंचाई पर हैं तो यह जगह उन्हें पाठकों ने ही सौंपी है। वरना जोड़तोड़ करने वाले तो बहुत आए और गए। अगर साहित्य में जाति विशेष का ही वर्चस्व होता तो रेणु आज कथा साहित्य के शिखर पर नहीं होते। पुरस्कारों और संस्थानों में जरूर घटिया राजनीति होती है पर साहित्य का भविष्य इन सब से निर्धारित नहीं होता। अंतत: वही चलता है वही टिकता है जिस पर पाठक अपनी मुहर लगाता है।   


Thursday, April 26, 2012

ज्योति संग की खूबसूरत खलिश


यह लेख नवभारत टाइम्स की वेबसाइट पर भी उपलब्ध है। मैं इसे वहां से साभार अपने इस ब्लॉग के लिए ले रहा हूं।

उस शख्स को मैं पिछले दो दशक से तो जानता ही हूं। उसके व्यक्तित्व के कई आयाम हैं। कुछ से मैं रूबरू रहा। यूं ही तमाम कहानियों और किताबों पर चर्चा करने के दौरान एक दिन उसकी कहानियों की किताब पहला उड़ने वाला घोड़ा आई और वह उस किताब के साथ गायब हो गया।...वक्त बीत गया। ज्योति संग रचना कर्म से लेकर रंग कर्म में जुटे रहे। मैं भी कई शहरों की खाक छानकर जब वापस दिल्ली पहुंचा तो दोबारा मुलाकात हुई ज्योति संग से। उसने तो खबर नहीं दी लेकिन दूसरे लोगों ने बताया कि ज्योति संग की गजलों की किताब खूबसूरत खलिश आने वाली है। पर, किताब जब मेरे हाथ आई तो मैं दंग था, एक तरफ हिंदी में गजल और दूसरी तरफ उसी का उर्दू में अनुवाद।

मुझे यह तो मालूम था कि ज्योति संग के पिता उन लाखों रिफ्यूजी लोगों में शामिल थे जो भारत-पाकिस्तान बंटवारे के वक्त उजड़कर भारत में आए और उन लोगों को दिल्ली के आसपास बसाया गया था। लेकिन मुझे यह नहीं मालूम था कि इस शख्स को उर्दू से जुनून की हद तक लगाव है। किताब के पन्ने पलटे तो पाकिस्तान में उर्दू साहित्य और पत्रकारिता के कुछ चिरपरिचित नाम भी पढ़ने को मिले। लाहौर का जाना-माना नाम आयशा जी़ खान ने तो खैर किताब की भूमिका ही लिखी है। भारत में अब उर्दू एक मरणासन्न भाषा (कम से कम लिखे और पढ़े जाने के लिहाज से) की तरफ बढ़ रही है। मुझे यह कहने में जरा भी संकोच नहीं कि उसमें भी मेरे जैसे लोगों का हाथ है। मेरे परिवार में माहौल होने के बावजूद मेरे डॉक्टर पिता ने कभी उर्दू पढ़ने के लिए न तो दबाव डाला और न प्रेरित किया। मुझे इसका अफसोस आज भी है। हालांकि मेरे बोलने की वजह से लोग अंदाजा नहीं लगा पाते कि मुझे उर्दू आती है या नहीं।


 
खैर, ज्योति संग की उर्दू-हिंदी शायरी को साहित्य के किसी आंदोलन से जोड़ने के झमेले में न पड़ते हुए उनके कुछ शेर मेरी निगाह से गुजरे हैं, वह आपकी नजर कर रहा हूं

हजार बस्तियां मैंने बसा के रख दी हैं
तमाम उम्र खुदाया मैं घर बना न सका
करता दीवार-ओ-दरीचों का तसव्वुर कैसे
एक बुनियाद का पत्थर भी मैं जुटा न सका
मेरे घऱ और मेरे बीच इक सूखी नदी थी
मैं कश्ती में ही बैठा रह गया, घर जा न सका

यह शख्स अपने साथ हुई ज्यादतियों का अपने शेरों के जरिए शिकवा तो करता है लेकिन अपनी गलती मानने से भी परहेज नहीं करता। यह शेर देखिए

तारीकी-ए-शब में नहीं खाई कभी ठोकर
मैं दिन के उजालों में कई बार गिरा हूं
बेकार मुझे दार पे लटका रहे हैं लोग
मैं जिल्लत-ए-अहसास से सौ बार मरा हूं

उनकी शायरी का एक रंग इस शेर में मिलता है-

हर अपरिचित को लगा लो दिल से आंखें मूंद कर
एक ही अल्लाह की हैं औलाद मत घबराइए
गर सलीबों पर ही होगा झूठ सच का फैसला
तान कर चादर कयामत तक सभी सो जाइए
आपको रास आए गर मौज-ए-फकीरी का सरूर
बेझिझक इस झोपड़े में लौट कर आ जाइए

यहां खूबसूरत खलिश की सारी गजलों के शेरों को समेट पाना नामुमकिन है। ज्योति संग के जिस जुनून का जिक्र मैंने ऊपर किया है, उससे जुड़ी एक घटना मैं आप लोगों से बांटना चाहता हूं। 1 जनवरी 1989 को एक नुक्कड़ नाटक (हल्ला बोल) खेलने के दौरान प्रसिद्ध रंगकर्मी सफदर हाशमी (इनके बारे में ज्यादा जानकारी के लिए इस लाइन को क्लिक करें) और उनके साथियों पर जानलेवा हमला हुआ। घायल सफदर हाशमी की दो दिन बाद मौत हो गई। इस हत्याकांड से हर कोई दहल उठा। ज्योति संग ने मुझे फोन करके कहा, मेरा खून खौल रहा है, मैं एक नाटक कर इसका विरोध करना चाहता हूं। उन दिनों फरीदाबाद में नगर निगम का आडिटोरियम बनकर तैयार नहीं हुआ था, सिर्फ फर्श बना था और ऊपर खुला आसमान। मैंने किसी तरह वहां नाटक खेलने की अनुमति प्रशासनिक अधिकारियों को तरह-तरह से फुसलाकर हासिल कर ली।

ज्योति ने रामलीला में विभिन्न पात्र निभाने वालों को जुटाया, उन्हें मकसद समझाया और दो दिन में स्क्रिप्ट तैयार कर थमा दी। मेरे जिम्मे सूत्रधार का काम था और उस गाने की तलाश जो मोहम्मद रफी ने कई दशक पहले गाया था- वतन की राह में वतन के नौजवां शहीद हों...। इस गाने को क्लाइमैक्स पर बजना था। तीसरे दिन शाम को नाटक था। जो नाटक देखने के शौकीन नहीं थे, वे भी पहुंचे। एंट्री फ्री थी। नाटक खत्म हुआ तो लोगों की आंखें नम थीं। मैं एक जुनून वाले चेहरे पर संतोष के भाव पढ़ सकता था।




किसी शहर की सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए ऐसे ही लोगों की जरूरत होती है। अब जब सबकुछ व्यावसायिक होता जा रहा है तो ऐसे लोग भला उसमें कहां खपेंगे। जिस शहर में ज्योति संग रहते हैं, वहां भी वक्त के साथ सबकुछ बदल चुका है। 

नोट - ठीक ऊपर का फोटो किताब के विमोचन समारोह का है। फरीदाबाद के डीएवी कॉलेज में जाने-माने पत्रकार और लेखक कुलदीप नैयर ने इसका विमोचन किया था। कार्यक्रम में हरियाणा उर्दू अकादमी के डायरेक्टर डी. आर. सपरा, शायर के.के. बहल, जीवा शिक्षण संस्थान के एमडी ऋषिपाल चौहान वगैरह मौजूद थे।











Saturday, April 21, 2012

पहचानिए शब्दों की ताकत को


अगर न होते शब्द

लेखक - सागर कौशिक  

लेखक का परिचय - सागर कौशिक दरअसल टीवी से जुड़े हुए पत्रकार हैं और जब-तब लिखते भी रहते हैं। उनका मानना है कि कुछ ऐसा लिखा जाए जो समाज के लिए भी सार्थक हो। उनके मुताबिक लोगों तक कुछ सकारात्मक बातें पहुंचाने के लिए वह कलम और कैमरे का इस्तेमाल करते हैं। उम्मीद है कि उनका यह लेख आपको पसंद आएगा।
संपर्क - 361, गली नं. 12, वेस्ट गुरु अंगद नगर, लक्ष्मी नगर, दिल्ली-110092


बुजुर्गों की एक कहावत है: लात का घाव तो भर जाता है, नहीं भरता तो बातों का घाव! बातें, जो शब्दों से बनती है! शब्द, जिनसे इतिहास बनता है! शब्द, जिनसे जहां प्यार झलकता है, वहीं नफरत भी जन्म लेती है! शब्द, जो अपने आप में पूरे जहान को समेट लेता है, प्यार का इजहार भी तो इन्हीं शब्दों से ही होता है!  - जब बच्चा पहली बार बोलता है तो लगता है तीनों जहां की खुशियां जैसे सिमट कर मांकी झोली में गिर आई हैं! प्रेमिका भी तो अपने प्रेम का इजहार करने के लिए शब्दों का ही तो सहारा लेती है।

लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा कि इन शब्दों की अपनी एक ताकतभी होती है। जैसे समय को कभी किसी ने नहीं देखा होता और बड़े से बड़ा पहलवान भी उसके सामने धराशायी हो जाता है, ठीक ऐसे ही शब्दों को भी किसी ने कभी नहीं देखा होता और इतिहास के इतिहास ये शब्द बना जाते हैं! इन्हीं शब्दोंने ही महाकाव्यों गीता’, ‘रामायण’ ‘महाभारत’ ‘कुरानबाइबिल की रचना की। अगर ये शब्द नहीं होते तो शायद इतिहास भी न होता!
देखा आपने शब्दों की ताकत का चमत्कार! एक बहुत ही प्रसिद्ध कव्वाली की याद आ रही है, जिसका अर्थ है मानव जब इस धरती पर जन्म लेता है, तब से मृत्युपर्यंत लकड़ीउसका साथ नहीं छोड़ती, परन्तु लकड़ी  तो उसके शरीर का साथ नहीं छोड़ती, लेकिन शब्दतो मृत्यु के बाद भी उसका साथ नहीं छोड़ते! लोग संसार में आ कर तो चले जाते हैं, परन्तु उनके कहे शब्दही तो इतिहास बन कर संसार को चलायमान बनाए रखते हैं।

शब्द, जो हमें कभी प्यार करते हैं, कभी रूलाते हैं, कभी हंसाते हैं, कभी डराते हैं, कभी दोस्त को दुश्मन बना देते हैं तो कभी दुश्मनी दोस्ती में बदल डालते हैं। क्या मजेदार बात है कि स्वयं अस्तित्वहीन होकर सारे संसार को चलाते रहते हैं। जो स्वयं अस्तित्वहीन होते हैं, मगर अस्तित्व की तरह अपनी ताकतरखते हैं। इनकी ताकत क्या होती है, इसके लिए एक बहुत ही प्रसिद्ध कहानी है, जो हमने तब समझ ली होती तो शायद हमारे समाज का वह हाल न होता, जो आज हो रहा है।

एक बहेलिया था, जिसके पास दो तोते थे। वह उन्हें बाजार में बेचने के लिए गया। ग्राहक उससे उन दोनों तोतों के दाम पूछते तो एक का दाम नगण्य और दूसरे का अनमोल बताता। एक सभ्य ग्राहक ने जब उससे इसका कारण जानना चाहता तो उसने जवाब दिया, ‘खुद ही तोतों से पूछ लो।उसने जब नगण्यदाम वाले तोते से कुछ कहना चाहा तो उस तोते ने जवाब देने से पूर्व ही उसको गालियों से तोल दिया, जब कि अमूल्यदाम वाले तोते ने पूरे स्वागत-सत्कार के साथ उसकी बातों का जवाब दिया। तब बहेलिए ने बताया कि ये नगण्य दाम वाला तोता डाकुओं का साथी रहा, जबकि ये अमूल्यदाम वाला तोता साधु-संतों का साथी रहा है।

इस कहानी का सार केवल यही है कि वे शब्द, ,जो हम गुस्से में अथवा प्यार में बोलते हैं, उसका प्रभाव हमारे आसपास के वातावरण को भी दूषित अथवा स्वच्छ बना देता है। हमारे कहे हुए शब्द अथवा अपशब्द हमारे मुख से निकल कर समाप्तनहीं होते, बल्कि वे हमारे इस समाज की आबोहवा में घुल जाते हैं। हमारे घर की दीवारों में वे जज्ब हो जाते हैं। हमारे घर के वातावरण में वे घुल-मिल जाते हैं और जब हम उस घर के वातावरण में सांस लेते हैं तो वे हमारे शरीर पर वही दुष्प्रभाव छोड़ते हैं, जैसे हमने वातावरण में उन्हें छोड़ा था। ये वातावरण ही तो था कि एक तोता नगण्यदाम वाला बन गया और दूसरा अमूल्य

इन शब्दों को वातावरण में लाने में जो सबसे सहायक सिद्ध होती है, वह है हमारी जिह्वï, जिसके लिए गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं:
तुलसी जिह्वïा बावरी,
कह गई सरग पाताल।
आप तो कह भीतर गई,
जूती खात कपाल॥
तो ये है शब्दों की ताकत। इन्हें पहचानो और अपने आसपास के वातावरण को दूषित होने से बचाओ।
 

Wednesday, April 18, 2012

धर्म गुरुओं की राजनीतिक चाहतें

भारत के धर्मगुरुओं की राजनीतिक चाहतें छिपी नहीं हैं। पर, वे लोग जब यही काम कौम के नाम पर करने लगें तो उन पर तरह-तरह के संदेह पैदा होते हैं। फिर अगर इस खेल में धार्मिक संस्थाएं भी शामिल हो जाएं तो कौम बेचारी बेवकूफ बनती रहती है। मेरा यह लेख नवभारत टाइम्स की आनलाइन साइट पर उपलब्ध है। पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - नवभारत टाइम्स