Tuesday, March 13, 2012

आप मानते रहिए मुसलमानों को वोट बैंक

नवभारत टाइम्स में मेरा यह लेख आज (13 मार्च 2012) को प्रकाशित हो चुका है। इस ब्लॉग के नियमित पाठकों के लिए उसे यहां भी पेश किया जा रहा है। लेकिन यहां मैं एक विडियो दे रहा हूं जो मुस्लिम वोटरों से बातचीत के बाद विशेष रिपोर्ट के तौर पर आईबीएन लाइव पर करीब एक महीने पहले दी गई थी। अगर कांग्रेस पार्टी के पॉलिसीमेकर्स ने इसे देखा होता तो शायद वे खुद को सुधार सकते थे....


पांच राज्यों के चुनाव नतीजे आ चुके हैं। इनमें से यूपी के चुनाव नतीजों पर सबसे ज्यादा बहस हो रही है और उसके केंद्र में हैं मुस्लिम वोटर (Muslim Voter)। मुसलमानों के वोटिंग पैटर्न को देखते हुए चुनाव अभियान से बहुत पहले और प्रचार के दौरान सभी पार्टियों का फोकस मुस्लिम वोटर ही था। 
मुस्लिम वोटों को बांटने के लिए रातोंरात कई मुस्लिम पार्टियां खड़ी कर दी गईं। माहौल ऐसा बनाया गया अगर मुसलमान कांग्रेस, बीएसपी, समाजवादी पार्टी (एसपी) को वोट न देना चाहें तो उसके पास मुस्लिम पार्टियों का विकल्प मौजूद है। हर पार्टी का एक ही अजेंडा था कि या तो मुस्लिम वोट उसकी पार्टी को मिले या फिर वह इतना बंट जाए कि किसी को उसका फायदा न मिले। लेकिन इसके साथ ही तमाम राजनीतिक दल मुस्लिम वोटरों से एक हास्यास्पद अपील भी कर रहे थे कि वे किसी पार्टी का वोट बैंक न बनें। 

इसके बरक्स बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती यूपी के हर जिले में कुछ खानकाहों के सज्जदानशीनों को लेकर दलित-मुस्लिम सम्मेलन कर रही थीं तो समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह किसी तरह से आजम खान की मान-मनोव्वल कर उन्हें पार्टी में ला चुके थे।...और दो राष्ट्रीय पार्टियां कांग्रेस व बीजेपी, वे भी पीछे नहीं थीं। 30 अक्टूबर 2011 को लखनऊ में आरएसएस ने मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के बैनर तले एक सम्मलेन आयोजित किया। इसमें पूर्व संघ प्रमुख के. सी. सुदर्शन के अलावा आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (All India Muslim Personal Law Board) के उपाध्यक्ष व प्रमुख शिया धर्म गुरु मौलाना कल्बे सादिक ने हिस्सा लिया था। सम्मेलन के बाद दोनों ने एक बयान जारी किया कि मुसलमान किसी पार्टी का वोट बैंक बनने की बजाय साफ सुथरी छवि वाले प्रत्याशियों को वोट दें। कांग्रेस के भी कई दरबारी सक्रिय थे जो कांग्रेस आला कमान सोनिया गांधी के बटला हाउस एनकाउंटर पर रोने से लेकर मुसलमानों को 4.5 फीसदी आरक्षण की टॉफी बांट रहे थे। 

...लेकिन अगर कोई चुप था तो वह यूपी का मुस्लिम वोटर था। वह सुदर्शन और कल्बे सादिक के बयान के पीछे छिपी हुई इबारत को आसानी से पढ़ पा रहा था। उसे कांग्रेसी दरबारियों के राग-अलाप की भी समझ थी। वह एक बार फिर खुद को वोट बैंक कहलवाने को तो तैयार था लेकिन धोखा खाने को नहीं। यूपी के नतीजे आए तो उसने इस बार वहां की विधानसभा में पिछले चुनाव (2007) के मुकाबले 69 मुस्लिमों को भेज दिया। 2007 में यह तादाद 56 थी। इस बार इसमें समाजवादी पार्टी का शेयर 43, बीएसपी का 16, कांग्रेस 4, पीस पार्टी 3, कौमी एकता दल 2 व इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल का 1 विधायक है। यूपी में कुल आबादी के मुकाबले मुस्लिम आबादी 18.50 फीसदी है और इस बार यूपी विधानसभा की 403 सीटों में उसका शेयर 17.12 फीसदी है। यानी आबादी के लिहाज से यह शेयर काफी करीब है। 

इस चुनाव में तमाम तथाकथित मुस्लिम पार्टियों को मुसलमानों ने बहुत स्पष्ट संदेश दे दिया है। मुसलमान वोटर को बेशक कोई भी पार्टी वोट बैंक मानती रहे लेकिन उसने इस बार फिर साबित किया है कि अगर वह वाकई वोट बैंक होते तो उन्हें मुस्लिम नेतृत्व वाली पार्टियों को वोट देना चाहिए था। लेकिन सिर्फ यूपी का ही नहीं इस देश का मुसलमान बार-बार इन पार्टियों को तो छोड़िए, मुस्लिम राजनीति करने वाली सबसे पुरानी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग तक को बार-बार रिजेक्ट करता रहा है, वरना वह आज भारतीय मुसलमानों की बहुत बड़ी पार्टी होती। यूपी चुनाव से पहले जिस तरह रातोंरात कई नए मुस्लिम राजनीतिक दल बने या पैसा देकर बनाए गए, उन्हें इन नतीजों से जरूर सदमा लगा होगा। मुस्लिम वोटर ने इस कदम को न तो पसंद किया और न ही इसके हक में फैसला सुनाया। हालांकि यूपी के नतीजों पर बहुत ही कम नोटिस की गई एक टिप्पणी एक टीवी चैनल पर सुनाई दी कि मुसलमानों ने यह प्रोटेक्शन वोट (Protection Vote) दिया है। 

ऐसी टिप्पणी करने वाले भूल गए कि जब तमाम राजनीतिक दल ओबीसी और अन्य फैक्टर देखकर ही टिकट बांटते हैं तो फिर मुसलमानों को आप वोट बैंक न बनने या किसी एक पार्टी का साथ न देने की पैरोकारी क्यों करते हैं। अगर कोई पार्टी किसी दूसरी पार्टी की ओबीसी पॉलिटिक्स (OBC Politics) फेल करने के लिए इंपोर्टेड नेता ला सकती है तो फिर मुसलान वोटर अगर अपनी बेहतरी के लिए मुस्लिम के बजाय हिंदू नेतृत्व वाली पार्टी का दामन थामते हैं तो इसमें बुराई कैसी। 

हालांकि मुलायम-मुसलमान गठजोड़ का पिछला अनुभव कोई अच्छा नहीं रहा है। पिछली बार सत्ता मिलने पर मुलायम मुसलमान को उर्दू अनुवादक तो बना रहे थे लेकिन पीएसी और यूपी पुलिस की भर्तियों में उसे कोई शेयर नहीं दिया जा रहा था। बाकी सरकारी नौकरियां भी किसी और के लिए थीं। तब से हालात और बदले हैं। इस बार मुलायम की ऐसी कोई चालाकी नहीं चलने वाली है। देश और यूपी में युवा वोटर अगर बढे़ हैं तो उनकी तादाद मुसलमानों में भी बढ़ी है। कम से कम मुलायम उसे दोबारा उर्दू अनुवादक बनने का झांसा तो नहीं देंगे खासकर तब जब 2014 के लोकसभा चुनाव में मुसलमान एक बार फिर अपनी भूमिका निभाने को तैयार बैठा है।

 बेशक आप उसे वोट बैंक कहते रहें लेकिन वह तमाम पॉलिटिक्स के पीछे छिपी इबारत पढ़ना सीख चुका है। मायावती के लिए भी मुस्लिम वोटर ने गुंजाइश रख छोड़ी है, जहां-जहां से मायावती ने ठीकठाक मुस्लिम प्रत्याशी खड़े किए थे, वहां मुस्लिम वोटर ने उसे एसपी के मुकाबले तरजीह दी है। दलित-मुस्लिम गठजोड़ भविष्य में या 2014 में ही नए रूप में आ सकता है, बशर्ते की उसके लिए दोनों पक्ष अपनी-अपनी जिद छोड़कर कुछ कुर्बानी देने को तैयार रहें।
Courtesy : NavBharat Times, March 13, 2012
edited article is also available at this newspaper's website http://nbt.in   


2 comments:

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

vah din bhi aaye ki muslim ko vote bank ke chashme se na dekha jaye .

सुशील झुनझुनवाला said...

बहुत ही सुन्दर आलेख; लेकिन हडबड़ी में आ गए मुलायम पर कमेंट्स, क्या वो जो हर बात सिमी और पाकिस्तान एवं साम्प्रदायिकता पर समर्थन देते रहे हैं की मुसलमानों में उनको लेकर कोई बेकलेस न हो! अब प्रश्न ये उठता है की हिन्दुओं में उनको लेकर बेकलेस हो और युपि साम्प्रदायिकता की आग में झुलसे! विसेस्कर जो गलती उन्होंने ८९-९० में की थी! मै समझता हूँ यदि मुसलमानों में गरीबी सबसे ज्यादा है तो सीधे मुसलमानों को मिलनेवाला हर लाभ गरीबों और उससे भी पहले गरीब महिलाओं को ही मिलना चाहिए ये लोलीपोप मुल्ला और अधार्मिक भ्रष्ट अपराधी को ही मिलता रहा है, जितना इन्हें इन लाभों से दूर रखें आम व्यक्ति धनात्मक रूप से प्रभावित होगा; इसी लिए उसने उन्हें वोट दिया है !