Saturday, August 7, 2010

क्या भारत में एक और गदर (1857) मुमकिन है

महमूद फारुकी तब चर्चा में आए थे जब विलियम डेल रेम्पेल की किताब द लास्ट मुगल आई थी। लेकिन इस वक्त यह शख्स दो खास वजहों से चर्चा में है, एक तो उनकी फिल्म फिल्म पीपली लाइव आने वाली है दूसरा उनकी किताब बीसीज्ड वायसेज फ्रॉम दिल्ली 1857 पेंग्विन से छपकर बाजार में आ चुकी है। 1857 की क्रांति में दिल्ली के बाशिंदों की भूमिका और उनकी तकलीफों को बयान करने वाली यह किताब कई मायने में अद्भभुद है। महमूद फारूकी ने मुझसे इस किताब को लेकर बातचीत की है...यह इंटरव्यू नवभारत टाइम्स में 7 अगस्त 2010 को प्रकाशित हो चुका है। इसे वहां से साभार सहित लिया जा रहा है...

इसे महज इतिहास की किताब कहें या दस्तावेज

इसे दस्तावेज कहना ही ठीक होगा। यह ऐसा दस्तावेज है जो लोगों की अपनी जबान में था। मैंने उसे एक जगह कलमबंद करके पेश कर दिया है। लेकिन अगर उसे जिल्द के अंदर इतिहास की एक किताब मानते हैं तो हमें कोई ऐतराज नहीं है।

आपने इसमें क्या बताया है

यह 1857 में दिल्ली के आम लोगों की दास्तान है। अंग्रेजों ने शहर का जब घेराब कर लिया तो उस वक्त दिल्ली के बाशिंदों पर क्या गुजरी। यह किताब दरअसल यही बताती है। इतिहास में 1857 की क्रांति को अलग-अलग नजरिए से पेश करने की कोशिश की जाती रही है। उस वक्त के इतिहास को जिन लोगों ने कलमबंद किया, उनके अपने-अपने हीरो इस क्रांति को बयान करते नजर आते हैं लेकिन जिस दिल्ली में अंग्रेजों ने सबसे बड़ा कत्लोगारत किया, उसका जिक्र कम है। इस किताब में दिल्ली के लोगों की रोजमर्रा जिंदगी पर क्या बीती, उन्हें किस तरह दरबदर होना पड़ा है, यह घटनाओं सहित बताया गया है। यह भारत की पहली ऐसी क्रांति थी जिसमें आम लोगों शामिल थे। लोगों में एक विश्वास था कि वे अंग्रेजों को उखाड़ फेकेंगे। ऐसा हुआ भी लेकिन इस क्रांति का श्रेय आम लोगों को नहीं मिला। यह क्रांति अपने वजूद, अपनी संस्कृति, अपनी भाषा को कायम रखने के लिए थी। कांग्रेस, महात्मा गांधी व आजादी के अन्य हीरो बाद में पिक्चर में आए। लेकिन बाद के इतिहास को जितना बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया, उतना 1857 के इतिहास को नहीं।

इसे कलमबंद करने का विचार कैसे आय़ा

द लास्ट मुगल पर काम करते वक्त दरअसल विलियम डेलरेम्पेल और मैंने वह दस्तावेज देखे थे। 1857 में दिल्ली के लोगों ने उस वक्त की हुकूमत के अफसरों और शहजादों को खत और शिकायतें लिखी थीं कि अंग्रेजों के कब्जे के दौरान उन पर क्या गुजर रही है। किसी में इस बात का जिक्र था कि अंग्रेजी फौज का सिपाही उसकी बीवी को लेकर भाग गया है, किसी ने लिखा है कि उसे 20 दिन से पान तक खाने को नहीं मिला और वह एकतरह से नजरबंद होकर रह गया। किसी को एक महीने तक दाल खाने को नहीं मिली। उन खतूत को देखने के दौरान ही यह ख्याल आया कि क्यों न दिल्ली के बाशिंदों पर जो गुजरी है, उसे एक किताब की शक्ल में सामने आय़ा। पेंग्विन वालों को भी यह आइडिया पसंद आया और उन्होंने काम करने की सहमति दे दी।

तो यह सारे दस्तावेज जो खतों की शक्ल में हैं, कैसे बचे रह गए

दरअसल, अंग्रेज बहादुर शाह जफर को अंग्रेजी हुकूमत का गद्दार साबित करने के लिए सुबूत जुटा रहे थे। उन्होंने ही इन सारे खतों को इकट्ठा किया था और एक जगह सुरक्षित रख दिया। बाद में यह राष्ट्रीय अभिलेखागार (नैशनल आरकाइव्ज) की संपत्ति बन गए। यह सारे खत या तो पर्शियन (फारसी) या फिर शिकस्ता उर्दू में हैं।



इन सारे दस्तावेजों की कोई बहुत खास बात

देखिए जब अंग्रेजों ने इस शहर पर कब्जा किया तो उन्होंने सबसे पहले यहां के लोकल लोगों को शहर से बाहर जाने को मजबूर कर दिया। इसके बाद जब लोकल लोगों को आने की इजाजत मिली तो सबसे पहले हिंदुओं को शहर में घुसने दिया गया और उसके बाद मुसलमानों को। शहर की जामा मस्जिद मुसलमानों को 1862 में वापस सौंपी गई और इससे पहले अंग्रेजों और इसके अफसरों ने इसकी बेहुरमती में कोई कसर नहीं छोड़ी। मस्जिद के अंदर अंग्रेज फौजों ने अपने घोड़े बांधे और बूट पहनकर चले। वह पांच साल का वक्त दिल्ली के लिए बहुत बुरा बीता। इस किताब से यह भी पता चलता है कि बहादुर शाह जफर ने दिल्ली के लोगों की मदद से किस तरह अंग्रेज फौजों का अंतिम समय तक मुकाबला किया। दिल्ली के हर मजहब के लोगों ने किस तरह जफर की मदद की।

तो किस तरह के धार्मिक आघात लग रहे थे

उस वक्त दीन धर्म के तहत बहुत ऐसी चीजें आती थीं जिन्हें आज हम धर्म का हिस्सा नहीं समझते। ऐसे खत भी मिले हैं जिसमें लोगों ने शिकायत की है कि जिस हकीम के पास वे इलाज के लिए जाते थे, उसे नुस्खा नहीं लिखने दिया जाता था। अंग्रेज डरते थे कि क्या पता इसके जरिए उर्दू में कोई संदेश शहर में फ्लैश कर दिया जाए। उस वक्त साहित्य की स्थिति तो बहुत अच्छी थी लेकिन अंग्रेजी पढ़ने के लिए माहौल बनने लगा था और इसे अंग्रेजों की तरफ से काफी बढ़ावा भी मिल रहा था।

1857 की क्रांति और मौजूदा दौर कहीं आपस में जुड़ते हैं

यह दुखद है कि देश के पहले बड़े जनआंदोलन को कोर्स की किताबों में चंद पेज का चैप्टर बना दिया गया। भारत के लोगों ने जगह-जगह जिस आत्मविश्वास से अंग्रेजों का मुकाबला किया, वैसा आत्मविश्वास फिर किसी आंदोलन में नहीं दिखा। यह ऐसा आंदोलन था जिसे लोगों ने अपने देश को बचाने, अपने स्वाभिमान को बचाने, अपनी सेकुलर तहजीब को बचाने के लिए छेड़ा था। भारत के लोगों से आज जिस तरह छिपे रूप में और विभिन्न शक्लों में उसकी आजादी छीनी जा रही है, मानवता का गला घोंटा जा रहा है, धर्म के नाम पर राजनीति की जा रही है, लोगों को लड़ाया जा रहा है, दरअसल आज जरूरत 1857 के उसी नफरत वाले विद्रोह की है। लेकिन उस विद्रोह को अंग्रेजों से ज्यादा भारत में राज करने वाली हुकूमतों ने कहीं गहराई में दफना दिया है। लोगों में अब वह आत्मविश्वास बाकी नहीं बचा है जो उन्होंने 1857 में दिखाया था।

आपकी फिल्म पीपली लाइव आने से पहले चर्चा में है और उसके गाने भी लोगों की जबान पर हैं, क्या आपके विचारों की उसमें कहीं झलक मिलेगी

इस फिल्म को मैंने अपनी पत्नी अनुषा रिजवी के साथ डायरेक्ट किया है। बस इतना कह सकता हूं कि फिल्म आने दीजिए और फिर बताइएगा कि आजकल के हालात पर हम लोग कितनी सटीक टिप्पणी कर पाए हैं। यह फैसला भारत की जनता और मीडिय़ा पर छोड़ता हूं।

Courtesy: Nav Bharat Times, 7th August 2010

नोट – पीपली लाइव (Peepli Live)फिल्म का यह गाना खासा पॉपुलर हो चुका है। आप उसकी एक झलक यहां देख सकते हैं। यह फिल्म इसी महीने रिलीज होने वाली है।

6 comments:

शहरोज़ said...

सन सन्तावन की सुरंगों से चीख,पुकार, वहशत को खींच लाने वाले लेखक-सिने-कर्मी से आपका संवाद कई खिड़कियाँ खोलता है.
समय हो तो पढ़ें
हिरोशीमा की बरसी पर एक रिक्शा चालक
http://hamzabaan.blogspot.com/2010/08/blog-post_06.html

VICHAAR SHOONYA said...

किरमानी साहब इस प्रकार के दस्तावेज भी मौजूद हैं जान कर हैरानी हुई. मैं इस पुस्तक के दर्शन करना चाहूँगा. देखे दरियागंज के सन्डे बाजार में कब तक पहुचती है. अपनी तो वहीँ तक पहुच है. इस जानकारी के लिए धन्यवाद.

आपका पिछला लेख भी सुन्दर था. दिल में बहुत से सुन्दर विचार और यादें लोट आयी पर कमेन्ट कि शक्ल ना ले पाई. इसके लिए क्षमायाचन.

हाँ एक बात और ये शीर्षक समझ नहीं आया. क्या ब्लॉगजगत के वर्तमान हालत को भुनाने का प्रयास है :-)

Yusuf Kirmani said...

विचार शून्य जी, आप सही कह रहे हैं कि शीर्षक कुछ समझ में नहीं आया। दरअसल यह इंटरव्यू आज के ही नवभारत टाइम्स में भी छपा है। मैं उस शीर्षक को यहां दोहराना नहीं चाहता था। देखिए, मुझे कामयाबी मिली कि नहीं, इस अटपटे शीर्षक के कारण ही आप यहां तक आने को मजबूर हुए।...
बहरहाल, यह तो एक बात थी। टिप्पणी के लिए शुक्रिया। स्नेह बनाए रखें।

minoo bhagia said...
This comment has been removed by the author.
minoo bhagia said...

sounds interesting
..I mean peepli (live)

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

आज ही अपने एक मुस्लिम दोस्त से १८५७ के गदर के बारे मे बात हो रही थी कैसे जामा मस्जिद में अस्तबल बना दिया गया था . और अभी यही आपने पढवा भी दिया .

ब्लाग का सबसे खराब पहलू यह है गम्भीर विषय के लिये भी विवादित शीर्षक चाहिये .