Thursday, April 22, 2010

जज साहबान...मीडिया ट्रायल तो होगा


मॉडल जेसिका लाल मामले में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया और मंगलवार को यह खबर अखबारों में प्रमुखता से छपी। मेरे साथ काम करने वाले एक साथी पत्रकार की दिलचस्पी यह देखने की थी कि जेसिका लाल के हत्यारे मनु शर्मा के परिवार के अखबार आज समाज ने इस खबर को किस तरह छापा।

हमारे वह सहयोगी खुद ही उठे और जाकर आईटीओ के स्टाल से आज समाज अखबार खरीद लाए। हम दोनों ने उस अखबार की हर खबर पर उंगली रख-रखकर पढ़ा कि कहीं वही खबर तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले की नहीं है लेकिन आखिरी पेज और लोकल पेज खंगालने के बावजूद न तो वह खबर मिली और नही कोई संपादकीय उस पर पढ़ने को मिला। मंगलवार का वह अखबार पत्रकारिता जगत में अब ऐतिहासिक दस्तावेज बन चुका है।

हम लोग झूठों की दुनिया में रहते हैं लेकिन इसके बावजूद ऐसी उम्मीद करते हैं कि सभी लोग अपने प्रोफेशन में ईमानदार और कम से कम सच बात कहने की कोशिश तो जरूर करें। हालांकि मिशनरी पत्रकारिता तो नहीं रही लेकिन कम से कम इतना तो है ही कि और प्रोफेशनों के मुकाबले पत्रकारों के प्रोफेशन में अलग किस्म की हल्की लकीर तो खिंची हुई है जो उसे बार-बार उसके जिम्मेदार होने का एहसास कराती को रहती ही है। वे लोग भी जो इसे (पत्रकारिता को) महज एक नौकरी समझ कर कर रहे हैं, उनकी पूरी कोशिश रहती है कि आम आदमी तक सही और सच्ची खबर पहुंचे।

बहरहाल, मैं और मेरे वह सहयोगी पत्रकार गलत थे। आज समाज अखबार भला क्यों कातिल मनु शर्मा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का फैसला छापता। आप आरएसएस के अखबार में यह सोचें कि वह गुलबर्गा सोसायटी (अहमदाबाद) नरसंहार के आरोपी नरेंद्र मोदी के खिलाफ कुछ छापेगा तो जाहिर है कि नाममुकिन है। पर भावुकता में बहुत सारे पत्रकार ऐसा सोच लेते हैं। बहरहाल, ऐसा होता तो एक चमत्कार होता लेकिन न्यूज चैनलों के बजाय अखबारों में चमत्कार की आशा करना मूर्खता से कम नहीं। अब सारे चमत्कार न्यूज चैनल पर दिखते हैं। जादू...टोना...फूंक.. वगैरह।

खैर, आज समाज अखबार के मालिक कार्तिकेय शर्मा हैं जो मनु शर्मा के भाई हैं। मनु शर्मा और कार्तिकेय शर्मा हरियाणा के कांग्रेस नेता विनोद शर्मा के बेटे हैं। चंडीगढ़ का मशहूर पिकाडली होटल इन्हीं का है और इसके अलावा भी इनका बड़ा बिजनेस साम्राज्य है।

जेसिका लाल कांड दरअसल मीडिया की जीत की जीती-जागती मिसाल है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इसी मामले में मीडिया पर बहुत सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे केसों में या किसी भी केस में मीडिया ट्रायल नहीं होना चाहिए। मीडिया को इससे बचना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से मैं सहमत नहीं हूं। कानून की कुछ किताबें पढ़ लेने वाले जज साहबान मीडिया को बार-बार उसका कर्तव्यबोध क्यों याद दिलाते हुए नजर आते हैं। मैं जज साहबान से जानना चाहता हूं कि आखिर ऐसे लोग जिन्हें समाज में रसूखदार कहा जाता है, उनसे किस तरह निपटा जाए। हजूर, माई-बाप का फैसला आने में तो दशक लग जाते हैं। तारीख पर तारीख...क्या करे इंसान, सिवाय इस फिल्मी डॉयलॉग के दोहराने के अलावा।

यह बिल्कुल सही है कि मीडिया के अपने स्वार्थ हैं और वह उसी ढंग से चलता है लेकिन इस देश में जितने भी बड़े मामले या कह लीजिए हाई प्रोफाइल मामले सामने आए हैं, वह मीडिया ट्रायल की ही बदौलत अपने अंजाम तक पहुंचे। अगर जेसिका लाल मामले में मीडिया ट्रायल नहीं हो रहा होता तो क्या जरूरत थी मनु शर्मा के पिता और भाई को अपना अखबार और न्यूज चैनल लाने की। वे लोग सिर्फ मीडिया से मुकाबला करने के लिए ही अपना मीडिया लेकर आए थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचने तक तमाम अखबार और न्यूज चैनल अपने स्टैंड पर कायम रहे और उनके मीडिया की परवाह नहीं की। जब अंतिम फैसला आया तो साबित हो गया कि विनोद शर्मा ने जिस मकसद के लिए अखबार और न्यूज चैनल का जुआ खेला था वह उसी में फंस कर रह गए।

क्या उनके अखबार और न्यूज चैनल में सुप्रीम कोर्ट के फैसले की खबर न होने से इस देश के लोग वह सूचना जानने से वंचित रह गए...नहीं क्योंकि अब कोई मीडिया हाउस, राजनीतिक पार्टी या असरदार लोग सूचना के प्रवाह को नहीं रोक पाएंगे। यहां तक कि अदालतें भी एक सीमा तक ही कुछ कर पाएंगी लेकिन मेरे इस ब्लॉग को ब्लॉक कराने के लिए अदालत को गूगल से कहना पड़ेगा और अगर गूगल पाएगा कि मैं समाज में घृणा फैला रहा हूं तो वह इसे ब्लॉक करने के बारे में सोचेगा। वह दिन आएगा जब भारतीय अदालतों के फैसलों पर एक बहस सोशल मीडिया में भी होगी। जब ट्विटर के जरिए अदालत की रिपोर्टिंग हो सकती है तो बहस क्यों नहीं हो सकती।

सोशल मीडिया सभी के सामने सीना ताने खड़ा है। रोक सको तो रोक लो। यह उसी की देन है कि मैं अपने यह तुच्छ विचार आप लोगों को तक पहुंचा सका। अगर यह लेख मैं किसी अखबार या अपने अखबार में देता तो शायद वहां पॉलिसी का वास्ता देकर उसे नहीं छापा जाता या फिर उसमें संपादन कर दिया जाता। अब वह वक्त गया। अपनी बात आप पहुंचा सकते हैं।

पर, यह तो एक मामला, एक अखबार, एक चैनल और कोर्ट की बात थी। हम लोग तमाम ऐसे अखबारों को जानते हैं जो इस या उस पार्टी अथवा विचारधारा का समर्थन करते हुए नजर आते हैं। यही वजह है कि जब बड़े मामले सामने आते हैं तो तमाम अखबार या चैनल अपने आप किसी न किसी खेमे से जुड़ा हुआ पाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के संदर्भ में अगर यह कहा होता कि मीडिया किसी भी व्यक्ति या किसी भी पार्टी के प्रति पूर्वाग्रह न अपनाए तो बात कुछ समझ में आती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट तो सिर्फ कर्तव्यबोध करा रहा है।

मेरा यह कहने का कतई मकसद नहीं है कि मीडिया बहुत साफसुथरा है। मीडिया के पूर्वाग्रह की बात मैं बार-बार कर रहा हूं। होना तो यह चाहिए कि मीडिया अपनी जिम्मेदारी निभाए और अदालतें अपनी जिम्मेदारी निभाएं। आखिर दोनों ही तो सोसायटी के वॉच डॉग हैं।

Thursday, April 8, 2010

आओ, सवाल पूछकर जहर फैलाएं

नक्सलवाद पर आपका क्या कहना है...सानिया मिर्जा - शोएब की शादी के बारे में आप क्या सोचते हैं...यह सवाल अचानक सोशल नेटवर्किंग साइट, आपके दफ्तर या आपके आसपास रहने वाले लोग किसी भी वक्त पूछ सकते हैं। जरा सोच समझकर जवाब दीजिएगा, नहीं तो आपको राष्ट्रविरोधी, देशद्रोही और न जाने किन-किन खिताबों से नवाजा जा सकता है। अंध राष्ट्रभक्त अब इस देश में फैशन बन चुका है। जर्मनी में हिटलर के दौर में अंध राष्ट्रभक्त के चलते जो नाजीवाद पैदा हुआ था, कुछ-कुछ उस तरह का खतरा मंडराता नजर आ रहा है।

सानिया-शोएब विवाह का मसाला जब इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों ने परोसना शुरू किया तो फौरन इसे भारत-पाकिस्तान का सवाल बना डाला गया। जाहिर है इसकी अगुआई उन्हीं लोगों ने की, जिनके जिम्मे इसका ठेका है। लेकिन हद तो तब हो जाती है जब आपके आसपास के लोग भी आपके सामने वही बेतुके और बेहूदे सवाल पेश करने लगें। यह सवाल सिर्फ पढ़े-लिखे और सलीके वाले ही नहीं कर रहे हैं, बल्कि अपने आपको हाई-फाई प्रोफेशनल मानने वाले भी कर रहे हैं। जाहिर है कि रणनीतिक तौर पर ऐसे सवाल पूछकर जहरीला वातावरण पैदा किया जा रहा है।

फेसबुक पर एक सज्जन ने एक बुर्के वाली महिला का फोटो डालकर सवाल पूछा कि क्या इस्लाम में वाकई चार शादियों की इजाजत है...फिर उनका अगला सवाल या सुझाव था कि क्यों नहीं इसमें बदलाव कर मुसलमान इससे छुटकारा पा लेते। यह सवाल अब से नहीं जबसे मैंने होश संभाला है तभी से पूछा जा रहा है और वक्त-वक्त पर इस बारे में तमाम तथ्य उलेमा और प्रबुद्ध मुसलमानों का तबका रखता भी है लेकिन उन तथ्यों से ऐसे लोगों को चैन नहीं आया। उन्हें तो महज माहौल बनाने के लिए सवाल पूछना है।

इस तरह के सवाल उठाने वालों का न तो पढ़ने-लिखने में यकीन है और न ही दूसरे धर्म की गहराई में जाकर चीजों को समझना चाहते हैं। यहां मैं आपके सामने चार शादियों पर सफाई नहीं पेश करने जा रहा हूं बल्कि बताना चाहता हूं कि इस तरह के प्रचार के जरिए माहौल में जो जहर घोला जा रहा है, उससे इस तरह के लोग समाज का कोई बहुत बड़ा भला नहीं कर रहे हैं। हंस हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में से एक है। उसमें रिसर्च स्कॉलर शीबा असलम फहमी का कॉलम छपता है – जेंडर जिहाद। अभी मार्च महीने में हंस में ही प्रकाशित लेख में उन्होंने मुल्ला-मौलवियों की जमकर खबर ली है लेकिन साथ ही यह भी बताया कि इस्लाम में चार शादियां किन परिस्थितियों में होती रही हैं और मौजूदा सूरतेहाल क्या है। वह लेख पढ़ने से ताल्लुक रखता है। लेकिन सोशल नेटवर्किंग साइटों पर इस तरह का अभियान चलाने वालों के पास ऐसे लेख पढ़ने की फुर्सत नहीं है। हालांकि वह इसे पढ़कर इसमें से नया शगूफा भी छेड़ सकते हैं लेकिन चूंकि सारा मामला कहीं और से संचालित हो रहा है तो उसकी वे जरूरत भी नहीं महसूस करते। एक खास बात का जिक्र करना चाहूंगा कि हंस में जब वह लेख आया था तो उस वक्त सानिया-शोएब शादी की चर्चा दूर-दूर तक नहीं थी। लेकिन इस संदर्भ में अब वह लेख सबसे सामयिक बन गया है।

अब बढ़ते हैं नक्सलवाद की चर्चा की तरफ। इस मामले में भी वही सब दोहराया जा रहा है जो सानिया-शोएब विवाह के मामले में दोहराया गया। दंतेवाड़ा में नक्सली हमले से बहुत पहले पिछले दिनों अंग्रेजी आउटलुक में मशहूर लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता अरूंधति राय की रिपोर्ट आई है। उन्होंने नक्सलियों के बीच जाकर विस्तार से उनसे बात की और उस पर अपनी कलम चलाई। उन्होंने देश के सामने तमाम तथ्यों को रखा। उन्होंने वहां तैनात अफसरों के हवाले से लिखा कि नक्सलियों को कुचलने की मौजूदा सरकारी नीति से नक्सलियों को खत्म नहीं किया जा सकता। उनके साथ आदिवासी दिलोजान से लगे हुए हैं।

इस रिपोर्ट का आना था कि लोगों ने अरुंधति राय को राष्ट्र विरोधी होने का प्रमाणपत्र जारी करते देर नहीं लगाई। लोगों ने कहा कि देश के तमाम बुद्धिजीवियों के पास और कोई काम नहीं है, वे सिर्फ ऐसी बातों को सामने लाते हैं जिनसे राष्ट्रद्रोहियों यानी नक्सलियों को मदद मिलती है। अब देखिए जिस मीडिया के बीच ऐसे लोग रहते हैं, उसी मीडिया पर नक्सली भी भरोसा करते हैं। उन्हीं नक्सलियों ने अपनी बात पहुंचाने के लिए अरुंधति राय को उनके बीच आने और बात करने की इजाजत दी। इसी बीच एक और छोटी सी घटना हुई जिसे दिल्ली में बैठे मीडिया मुगल समझ नहीं पाए। नक्सलियों ने झारखंड से एक अफसर का अपहरण किया और उसे शर्ते पूरी होने के बाद प्रभात खबर के पत्रकार को सौपा। आखिर ऐसी क्या वजह है कि नक्सली पत्रकारों और लेखकों पर भरोसा करने को तो तैयार हैं लेकिन सरकार और उसकी मशीनरी पर नहीं।

इस घटना के बाद सरकार और पुलिस की नजर ऐसे पत्रकारों की तरफ गई जो नक्सलियों की खबरें छापते हैं या उनके संपर्क में रहते हैं। एक महिला पत्रकार को इसी आधार पर गिरफ्तार भी कर लिया गया। दिल्ली यूनीवर्सिटी के एक प्रोफेसर से पुलिस ने सिर्फ इसलिए पूछताछ कर डाली कि वह नक्सलियों के प्रति हमदर्दी रखते हैं। अब कल को सरकार अरुंधति राय को गिरफ्तार कर लेती है तो कतई हैरान मत होइएगा। जेल में बंद नक्सली नेता कोबाद गांधी के इलाज को लेकर पिछले दिनों दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई, उसमें जिन लोगों ने कोबाद के समर्थन में बोला, वह सब के सब पुलिस के रेडार पर आ गए।

जहरीला माहौल बनाने वालों की यह रणनीति काफी कारगर साबित हो रही है। पहले वे लोग ऐसे सवाल पूछते हैं, जिससे आप उबलें और कुछ टिप्पणी करें। उसके बाद उनका पूरा परिवार (खानदान भी कह सकते हैं) इस मामले को भुनाने में जुट जाता है।