Saturday, March 27, 2010

मोदी अपडेटः कौन सही – कौन गलत

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को सुप्रीम कोर्ट की उस विशेष जांच समिति (सिट) के सामने पेश हुए जो गुलबर्गा सोसायटी नरसंहार के मामले की जांच कर रही है। सिट ने उनसे 5 घंटे तक पूछताछ की।

अपने पिछले लेख में मैंने इस मुद्दे को सामने रखा था। उस वक्त उस लेख पर कमेंट करने वालों ने कहा था कि मोदी को जब उस कमिटी ने तलब ही नहीं किया तो मोदी के पेश होने का मतलब ही नहीं था। बहरहाल, अब उन शीर्ष टिप्पणीकारों को जवाब मिल गया होगा कि मोदी को दरअसल उसी समय तलब किया गया था लेकिन उनकी तैयारी नहीं थी कि वे कमिटी को किस बात का जवाब किस तरह देंगे। उन्होंने अब 6 दिन का समय तैयारी में लगाया और शनिवार को कमिटी के सामने पेश हो गए।

अब वे शीर्ष टिप्पणीकार तय करें कि कौन सही था और कौन गलत।

Monday, March 22, 2010

अदालतें भी तो अपने गिरेबान में झांकें

क्या वह दिन आने वाला है कि जब अदालतों का कोई महत्व नहीं रह जाएगा और लोग इसके फैसलों को मनाने से इनकार कर देंगे। क्या भारत की अदालतें भी सांप्रदायिक ध्रवीकरण का शिकार हो रही हैं। इस जैसे ही कुछ और सवाल हैं जो आम आदमी के मन में इस समय कौंध रहे हैं। हाल ही में हुई कुछ घटनाओं के बाद इस तरह के सवाल उठ खड़े हुए हैं।

अहमदाबाद की गुलबर्गा सोसायटी में हुए नरसंहार के मामले में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पेश नहीं हुए। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले के लिए गठित विशेष जांच कमेटी (सिट) ने उन्हें एक नोटिस भेजकर कमेटी के सामने पूछताछ के लिए उपस्थित होने को कहा था। मोदी सरकार के अधिकारियों ने यह कहकर बचाव किया कि वह नोटिस कोई समन यानी कानूनी नोटिस नहीं था, इसलिए मोदी उसे मानने को बाध्य नहीं हैं। मोदी की बीजेपी पार्टी ने नई दिल्ली में बयान दिया कि जो कानून के मुताबिक होगा, मोदी उस पर चलेंगे।

गुजरात में मोदी की रहनुमाई में एक समुदाय विशेष के साथ जो हुआ, उस पर काफी कुछ लिखा जा चुका है। कुछ महीनों में ऐसी घटनाओं को पूरा एक दशक हो जाएगा लेकिन कानून तोड़ने वाले खादी पहने अब भी आजाद घूमते नजर आ रहे हैं। किसी भी एक मामले में इस देश की न्यायपालिका किसी बड़े खद्दरधारी को जेल तक नहीं पहुंचा सकी है। चाहे वह 1984 के सिख विरोधी दंगों का मामला हो या फिर गुजरात के तमाम शहरों में हुए सामूहिक नरसंहार का मामला हो।

देश के दो बड़े राष्ट्रीय दल – कांग्रेस और बीजेपी – दोनों नरसंहारों से जुड़े हुए हैं। सिख विरोधी दंगों के लिए कांग्रेस आज तक माफी मांग रही है लेकिन गुजरात के मामले में हालात को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। गुजरात के कई शहरों में ऐसे मामलों से एफआईआर दर्ज हुई पड़ी है लेकिन अदालतों की हिम्मत नहीं है कि वे किसी मुलजिम को तलब कर लें। क्योंकि उनमें से अधिकांश बीजेपी के विधायक, मंत्री या पदाधिकारी हैं।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित विशेष जांच कमेटी ने मोदी को पेश होने के लिए समन क्यों नहीं जारी किया, जिससे कि वह पेश होने के लिए बाध्य होते, इसके जवाब में उस कमेटी ने कोई तर्क नहीं दिया है। कमेटी चाहती तो वह मोदी को कानूनी नोटिस जारी कर सकती थी। कमेटी को सुप्रीम कोर्ट ने असीमित अधिकार दे रखे हैं लेकिन वह इसका इस्तेमाल कब करेगी, इसे कोई नहीं जानता। ऐसी कमेटियों के प्रमुख ऐसी तमाम तरह की जांचों के बाद जो पद लाभ के रूप में प्राप्त करते हैं, वह भी किसी से छिपा नहीं है। भ्रष्टाचार के तमाम मामलों में गठित जांच आयोगों के प्रमुखों को सेवा के बाद प्राइवेट कंपनियों में सलाहकार की नौकरी मिल रही है। वह एक तरह की पेंशन होती है, प्राइवेट कंपनियां उस जांच आयोग के प्रमुख की जनता से की गई नमक हरामी के एवज में उसे यह पैसा पेंशन के रूप में देती हैं।
मोदी से जुड़ा यह पहला मामला नहीं है। नानवटी आयोग ने तो मोदी को तलब किए जाने के संबंध में दाखिल अर्जी को ही खारिज कर दिया। जन संघर्ष मंच लंबे समय से इसकी मांग कर रहा था। अब सोमवार को गुजरात हाई कोर्ट ने नानावटी आयोग से साफ-साफ पूछा कि वह मोदी को तलब किए जाने की स्थिति साफ करे। वह मोदी को बुलाना चाहता है या नहीं (कृपया नीचे इस संबंध में पीटीआई द्वारा 22 मार्च 2010 को जारी की गई खबर पढ़ें, पूरा मुद्दा समझने के लिए जरूरी है)।

मोदी के बाद आते हैं अब बटला हाउस एनकाउंटर पर, जहां न्यायपालिका फिर कसौटी पर है। नई दिल्ली के मुस्लिम बहुल इलाके में हुए इस एनकाउंटर में दिल्ली पुलिस के एक होनहार इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा भी मारे गए (या शहीद हो गए – अपनी सुविधा से आप जो भी मानना या कहना चाहें)। बहस का मुद्दा यह नहीं है कि उस एनकाउंटर में जो मारे गए वह आतंकवादी थे या नहीं। अब बहस का मुद्दा यह है कि वह एनकाउंटर असली था या फर्जी। इस मामले में सचमुच न्यायपालिका की आंखों पर पट्टी बंध गई हैं।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के एक छात्र ने सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत दोनों कथित आतंकवादियों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट निकलवाई है। उस रिपोर्ट से और फोटो से यह साफ है कि दोनों युवकों को बटला हाउस में सिर में गोली मारी गई है जो किसी भी एनकाउंटर में संभव नहीं है। एनकाउंटर में गोली सामने से चलती है। दोनों युवकों को लगी चोटों पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं कि आखिर एनकाउंटर में चोट कैसे लग गई।

जिस छात्र ने आरटीआई के तहत इस पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट को प्राप्त किया है, उसे इसे पाने में छह महीने लग गए। ध्यान दीजिए कि यह हरकत कौन कर रहा है मानवाधिकार आयोग यानी जिसे आपके अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार ने बनाया है।

जामिया नगर के लोग और इस देश के तमाम अमनपसंद लोग मांग कर रहे हैं कि इस मामले की न्यायिक जांच कराई जाए। लेकिन सरकार ने तो उसके लिए मना ही कर दिया, न्यायपालिका ने भी साफ मना कर दिया। जैसा कि मैंने पहले कहा कि वे दोनों युवक आतंकवादी थे या नहीं, यह फैसला तो न्यायपालिका ही करेगी लेकिन न्यायिक जांच से यह जरूर पता चल जाता कि यह एनकाउंटर असली था। सरकार ने और न्यायपालिका ने दिल्ली पुलिस की यह बात आसानी से मान ली कि देशहित में इस मामले की न्यायिक जांच नहीं कराई जानी चाहिए। दरअसल, दिल्ली पुलिस का डर दूसरा है। इस एनकाउंटर में मोहनचंद शर्मा के मारे जाने को लेकर शुरू से ही संशय बना हुआ है। जो हालात वहां के लोगों ने मीडिया के सामने बताए थे, उससे तमाम तरह के संदेह पैदा हुए, जो ताजा रिपोर्ट आने के बाद और गहरा उठे हैं। अगर न्यायिक जांच होती है तो इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा की मौत का मामला भी उसके दायरे में आएगा।
बहरहाल, इस सारे मामले में न्यायपालिका का रवैया शुरू से ही अजीबोगरीब रहा।

अब बात करते हैं उस मामले पर जिसने न्यायपालिका की साख को जबर्दस्त नुकसान पहुंचाया। हालांकि वह मामला आप इस ब्लॉग पर पढ़ चुके हैं लेकिन महज याद दिलाने के लिए उसका उल्लेख जरूरी है। मध्य प्रदेश के एक स्कूल से सलीम नामक छात्र को एक ईसाई स्कूल से इसलिए निकाल दिया गया कि उसने अपनी दाढ़ी मु़ड़ाने से साफ मना कर दिया था। मामला हाई कोर्ट तक पहुंचा और उसने स्कूल के फैसले को सही ठहराया। छात्र ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। इस मामले को जस्टिस मार्केंडय काटजू ने सुना, उन्होंने न सिर्फ स्कूल के फैसले को सही ठहराया बल्कि यह भी टिप्पणी कर डाली कि इस देश के तालिबानीकरण की इजाजत नहीं दी जा सकती।

देखिए सलीम की आस्था यहां के न्यायिक व्यवस्था में फिर भी बनी रही। उसने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के सामने इसे चुनौती दी। उसने काफी मनन के बाद काटजू के फैसले को पलट दिया। पीठ ने काटजू की टिप्पणी पर भी सख्त एतराज जताया। काटजू ने बाद में इसके लिए माफी मांगी और खेद जताया।

आप अंदाजा लगाएं कि अदालत की इस तरह की टिप्पणियों और फैसले से क्या ध्वनि निकलती है। धीरे-धीरे यही होगा कि आज नरेंद्र मोदी, बाल ठाकरे और राज ठाकरे जैसे सांप्रदायिक लोग अदालत में हाजिर होने से साफ मना कर देते हैं तो कल को यही सारे या इन जैसे मिलकर एक कानून पास कर देंगे कि नेता अदालत से ऊपर हैं। उन्हें अदालत में आने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। वैसे भी तमाम नेताओं को यह मुगालता तो है ही कि वे कानून बनाते हैं तो वे अदालत से ऊपर हुए ही। यही वजह है कि सारे अपराधी लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा में पहुंचना चाहते हैं।


पीटीआई की वह खबर जो 22 मार्च 2010 को जारी हुई

HC asks Nanavati Commission to clarify stand on summoning Modi

Ahmedabad, Mar 22: The Gujarat High Court today asked the Nanavati Commission, which is probing the 2002 riots, to clarify by April 1 whether it has taken a final decision not to summon Chief Minister Narendra Modi for questioning.

The court sought this information from the government pleader, a day after Modi refused to appear before the Supreme Court-appointed Special Investigation Team(SIT) which had summoned the senior BJP leader for questioning on March 21 in connection with the riots in Gulburg society here.

A division bench of Chief Justice S J Mukhopadhaya and Justice Akil Kureshi posed the query while hearing an appeal by Jan Sangarsh Manch (JSM), an NGO representing the 2002 riot victims.
The court order came even as Modi explored legal options on responding to SIT summons. Senior BJP leader Arun Jaitley is also expected to have discussions with Modi on this issue.

When the matter came up for hearing today, the court asked the pleader to get a clarification from the Nanavati Commission by April 1 with regard to its September 2009 order and inform whether its decision not to summon Modi and others was a final decision or a tentative one.

Nanavati Commission, in September last year had disposed of JSM's application asking for summoning of Modi and others saying that it did not find justification in cross-examining them at that point of time for the purpose stated by JSM.

The Commission had further stated in the order that allegations made in JSM's application were vague and based on wrong or unwarranted assumptions.
JSM had sought quashing of the Nanavati Commission's order in the Gujarat High Court and prayed that Modi and three others -- the then home minister Gordhan Zadafia, health minister Ashok Bhat and DCP Zone 5, R J Savani-- be called for cross-examination with regard to the 2002 riots.

A single bench of Justice K S Jhaveri dismissed JSM's petition in November last year saying that the Commission has not completed its inquiry and still has power to summon Modi under section 8(b) of Commissions of Inquiry Act.

The JSM then filed an appeal before a division bench where it sought quashing of Commission's order and issuance of summons to Modi and three others for cross examination with regard to the 2002 riots.
The Nanavati Commission had last month informed the High Court on the status of its inquiry.

(Courtesy - PTI)

Thursday, March 18, 2010

आओ बाबा रामदेव, आप ही बाकी रह गए थे

इस समय बाबा लोग चर्चा में है। कभी किसी वजह से तो कभी वजह से। ताजा चर्चा बाबा रामदेव की है, जिन्हें राजनीति का चस्का लग गया है। हालांकि पिछले काफी दिनों से वह इस तरफ यह जुमला कहकर इशारा कर रहे थे कि वह राजनीति को बदलना चाहते हैं। बाबा ने मंगलवार को दिल्ली में बाकायदा अपने राजनीतिक अभियान की शुरुआत कर दी है।उन्होंने राजनीतिक पार्टी बनाने की घोषणा की है।

बाबा के इस पहलू पर मैंने अपने ताजा लेख में नजर डालने की कोशिश की है। लेकिन वह पूरा लेख पढ़ने के लिए आपको जाना पड़ेगा जनपक्ष ब्लॉग पर। उसका लिंक आप लोगों के लिए दे रहा हूं...http://jantakapaksh.blogspot.com/2010/03/blog-post_17.html

Thursday, March 11, 2010

इस षड्यंत्र से मुसलमान हो जाएं होशियार

महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा में पास होने के बाद पूरे देश में तालियां पीटी जा रही हैं। वाजिब भी है, भारत जैसे देश में महिलाओं को यह हक गए-गुजरे देश बांग्लादेश और पाकिस्तान से भी बाद में मिला है। लेकिन इस सारे शोर में यह बात दबकर रह गई है कि इस बिल के जरिए अल्पसंख्यकों और अन्य जातियों के गरीब तबके को हाशिए पर लाने का षड्यंत्र पर बहुत शानदार तरीके से रचा गया है। कांग्रेस-बीजेपी की मिलीभगत पूरी तरह खुलकर सामने आ गई है, रीढ़ विहीन वामपंथियों की औकात मुसलमानों को आरक्षण और सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के जरिए पता चल चुकी है।

मुसलमानों के लिए राजनीति में भागीदारी अब और भी मुश्किल हो जाएगी। अभी तमाम राजनीतिक दलों में उनकी न तो कोई आवाज है और न ही हैसियत। अगर यह मान भी लिया जाए कि तमाम मुस्लिम महिलाएं अचानक राजनीति में सक्रिय हो जाएंगी और उन्हें उनके घर वाले पूरी छूट दे देंगे तो यह एक खूबसूरत ख्वाब के अलावा और कुछ नहीं होगा। मुसलमानों को तमाम नए समीकरणों पर विचार करना होगा। यह काम कैसे होगा, इसकी शुरुआत कैसे होगी, यह सब बहुत पेचीदा सवाल हैं, जिनका जवाब समय के गर्भ में है। हो सकता है कि कल को कोई अचानक इस नाम पर सामने आए और मुसलमानों को इकट्ठा करने लगे तो भी सतर्क रहने की जरूरत है। क्योंकि अब ऐसे लोगों पर यकीन करना बहुत मुश्किल होता जा रहा है। मायावती और मुलायम या लालू के पास ऐसे मौलाना हैं जिन्हें वे मंच पर खड़ा करके इस तरह का सीन खड़ा कर सकते हैं। इसलिए बहुत सावधानी से संभलकर चलने का वक्त है। बहुत मुमकिन है कि मुलायम और लालू मुसलमानों को साथ लेकर माई (MY – Muslims and Yadavs) जैसा गठबंधन फिर से खड़ा करने की कोशिश करें या मायावती डीएम (DM – Dalits and Muslims) बनाने की फिराक में जुट जाएं। ऐसे दोनों गठबंधनों को मुसलमानों ने बार-बार परखा है और धोखा खाया है। हालांकि मैं यह भी नहीं कह रहा कि ऐसे गठबंधनों के वजूद में आने के बाद उससे दूर रहा जाए। जो भी फैसला हो वह सोच समझकर हो।

कई मुस्लिम संगठनों (आल इंडिया मिल्ली कौंसिल, मूवमेंट फार इंपावरमेंट आफ इंडियन मुस्लिम, सोशल जस्टिस मोर्चा और डॉ. भीमराव आंबेडकर सेवादल) ने इस बिल में अपना हिस्सा मांगने या इसके विरोध में पहल की है। लेकिन इनकी एकजुटता से कोई सही तस्वीर उभरेगी, इस बात में शक है। इसलिए जल्दबाजी से बचते हुए, बड़े मंथन के बाद ही कोई फैसला लेना वक्त की नजाकत है। इस मुद्दे पर कांग्रेस पर दबाव बनाने के लिए माई या डीएम गठबंधन से रणनीतिक तौर पर हाथ मिलाना फायदेमंद हो सकता है लेकिन दीर्घकालीन राजनीति के लिए इनसे हाथ नहीं मिलाया जा सकता है। अगर कांग्रेस विधेयक में कुछ संशोधन के साथ यह कहे कि वह दो टर्म में से एक टर्म मुस्लिम महिला के लिए आरक्षण का प्रावधान कर सकती है तो भी गनीमत है। तब यह बंदोबस्त माई या डीएम के मुकाबले ज्यादा ठीक रहेगा। अगर कांग्रेस ऐसा नहीं करती है तो फिर विकल्प खुले रखे जा सकते हैं।


बहरहाल, तमाम पार्टियों में मौजूद मुस्लिम नेताओं पर जिम्मेदारी है कि वह पार्टी राजनीति से ऊपर उठकर इस मामले में एक हों और कोई पहल करें। उन्हें याद रखना होगा वह फोटो जो राज्यसभा में विधेयक पास होने के बाद बीजेपी नेता सुषमा स्वराज और सीपीएम नेता वृंदा करात ने मुस्कुराते हुए और एक दूसरे से गलबहियां करते हुए खिंचवाया था। कुछ ऐसा ही करने का वक्त आ गया है।


अभी जो हालात हैं, उसमें मुसलमानों को रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं है। मेनस्ट्रीम मीडिया जिस पर यह जिम्मेदारी है कि वह सही तस्वीर सामने लाए, वह कांग्रेस-बीजेपी की बिछाई बिसात पर ही अपनी ढपली बजा रहा है। पहले तो यह साफ हो जाए कि मेरा मकसद इस बिल का विरोध या इसके खिलाफ खड़े होना नहीं है।

देश की राष्ट्रीय पार्टियों और क्षेत्रीय दलों ने मुसलमानों के नाम पर जमकर राजनीति की लेकिन जब उन्हें कुछ देने का मौका आता है तो यह सारे एक ही थैली के चट्टे-बट्टे नजर आते हैं। कांग्रेस ने किस कदर मुसलमानों के वोट बैंक की राजनीति की और उसे धोखा दिया, यहां उसे दोहराने की जरूरत नहीं है। संघ परिवार का हिस्सा – बीजेपी - का स्टैंड मुसलमानों को लेकर जगजाहिर है। मुलायम, लालू ने मुस्लिम वोटरों का फायदा उठाया और जब-जब देने की बारी आई तो यादववाद से और फिल्मी दुनिया की चमक-दमक से ऊपर नहीं उठ पाए। शरद यादव ने भी बीजेपी से हाथ मिलाकर अपनी मंशा जाहिर कर दी थी।

मायावती दलित राजनीति करने के नाम पर क्या कर रही हैं, वह किसी अंधे आदमी को भी दिख सकता है। उनका इस विधेयक को लेकर अपना मतलतब है। ममता और पासवान ने इस डर में इसका विरोध किया है कि कहीं उनका जमीन से जुड़ा कार्यकर्ता नाराज न हो जाए। यानी इस बिल के विरोध में उठे नेता अपने-अपने मतलब के लिए ही इसका विरोध कर रहे हैं। मुसलमान यह भूल जाएं कि यह नेता उनके लिए कोई कुर्बानी देने के नाम पर एकजुट हुए हैं। दरअसल, यह लोग मुसलमानों के सहारे से इस मामले में अपनी ही बिरादरी की राजनीति को चमकाना चाहते हैं। अगर यह लोग सत्ता में होते तो शायद इस तरह का विरोध न कर पाते। बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार का मामला सामने है, उनकी पार्टी के मुखिया शरद यादव जिस स्वर में इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं, वह स्वर नीतिश के पास नहीं है।

चाहे वह लोकसभा हो या राज्यसभा या फिर तमाम राज्यों की विधानसभाएं, सभी में मुसलमानों की राजनीतिक हिस्सेदारी लगातार कम हो रही है। यह काम बहुत तरीके से हो रहा है। इस बिल ने भी रही-सही कसर पूरी कर दी है। मुस्लिम महिलाएं अब भी घर की चारदीवारी से बाहर नहीं आ सकी हैं। यह बिल निश्चित रूप से उस तबके की महिलाओं को ही मजबूत करेगा, जिनके पति पहले से ही देश की संसद को चूना लगा रहे हैं। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे किस पार्टी में हैं। अब वह जमात चूंकि बूढ़ी हो चुकी है तो चाहती है कि संसद का सुख उनकी बहुएं और बेटियां भोगें। विधेयक के पक्ष या विपक्ष में घड़ियाली आंसू बहाने वाले यह तमाम सफेदपोश खद्दरधारी अपनी बीवियों, बहुओं और बेटियों को संसद सुख दिलवाने में सबसे आगे हैं। कांग्रेस-बीजेपी उस सुख को और पुख्ता करना चाहती है तो उसने जुगलबंदी कर ली है।

मैं यहां कोई लंबे चौड़े आंकड़े पेश कर अपनी बात को दुरुह नहीं बनाना चाहता। बीजेपी को छोड़कर इन तमाम पार्टियों में जब भी किसी मुसलमान को टिकट देने की बारी आती है तो उसे तमाम कारणों से काट दिया जाता है। हाल ही में फिरोजबाद (यूपी) लोकसभा सीट पर सभी ने यही देखा। मुसलमानों की दुहाई देने वाले मुलायम ने किसी मुसलमान को टिकट देने की बजाय अपनी बहू को वहां से उतार दिया। बदायूं में तो यह तमाशा कई बार हो चुका है। बरेली की कई विधानसभा सीटों पर यही खेल मुलायम और मायावती हर चुनाव में दोहराते हैं।

इस बिल के पास होने पर दरअसल इन्हें खतरा यह नहीं है कि मुस्लिम महिलाएं विधानसभा या लोकसभा में नहीं पहुंच पाएंगी, खतरा यह है कि महिला वोटरों के गेम में अब सिर्फ कांग्रेस और बीजेपी ही रह जाएंगी। यानी सास अगर कांग्रेस के रास्ते संसद में पहुंचेगी तो कोई ताज्जुब नहीं कि उसकी बहू बीजेपी के रास्ते संसद में पहुंचेगी। इस देश में ऐसे तमाम रसूख वाले परिवार मौजूद हैं जिन्होंने एक योजना के तहत आधे परिवार को कांग्रेस में और आधे को बीजेपी में अपने स्वार्थों के कारण फिट कर रखा है। जाहिर है कि इनमें से किसी को भी सत्ता मिलने पर परिवार का बिजनेस चलता रहेगा।

Thursday, March 4, 2010

तू मुसलमान है तो क्यों है...

तमाम वजहों से मुसलमान हर वक्त चर्चा में रहता है लेकिन इन दिनों कुछ ज्यादा चर्चा में है। कभी किसी ब्लॉग पर तो कभी किसी अखबार में। लगता है कि इस समय देश का सबसे जरूरी काम मुसलमानों पर चर्चा करना ही रह गया है। तो मैं भला पीछे क्यों रहूं। मैं अपने इस ब्लॉग पर इस चर्चा को जानबूझकर कर रहा हूं। पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ियों पर फिल्म अभिनेता शाहरुख खान की टिप्पणी के बाद उनकी फिल्म माई नेम इज खान का शिवसेना के गुंडों ने जिस तरह से विरोध की कोशिश की, उसे इस देश के लोगों ने अपने ही ढंग से जवाब देकर उनकी कोशिश को तार-तार कर दिया। हालांकि शिवसेना के लोग यह जाने बिना विरोध कर रहे थे कि हो सकता है कि यह शाहरुख की अपनी फिल्म को सफल बनाने के लिए की गई चालाकी हो, क्योंकि मुझसे निजी बातचीत में तमाम मुस्लिम लोगों ने कहा कि यह सब शाहरुख की चालाकी थी, जिसमें शिवसेना पस्त हो गई। लेकिन मैं शाहरुख पर कोई शक किए बिना इस बात को आगे बढ़ाना चाहता हूं।

इस देश में कट्टरवाद के पोषक एक खास किस्म के तालिबानियों (मैं यहां किसी धर्म विशेष का नाम नहीं ले रहा हूं, आप समझदार हैं) ने जो माहौल बना दिया है, उसमें आम मुसलमान क्या सोचता है, उस पर विचार करना जरूरी हो गया है। चाहे वह किसी राजनीतिक दल का मंच हो, आपका दफ्तर हो या फिर मीडिया हो, एक बहुत खतरनाक कोशिश हो रही है सभी संप्रदायों या धर्म के लोगों को आपस में बांटने की। यानी अंग्रेज जो काम अधूरा छोड़कर गए थे, उसे अब कुछ लोग हवा देना चाहते हैं। यह काम बहुत संगठित तरीके से किया जा रहा है।

मेरे अभिन्न मित्र धीरेश सैनी का ब्लॉग है - एक जिद्दी धुन । धीरेश ने अपने ब्लॉग पर मशहूर पेंटर मकबूल फिदा हुसैन को कतर देश की नागरिकता मिलने पर एक लेख लिखा, जिस पर विरोध में आई टिप्पणियों को आप पढ़ेंगे तो आपको हालात का अंदाजा हो जाएगा। लोग किस गिरी हुई हद तक सोचते हैं, उसका गवाह हुसैन का मुद्दा है। मैंने अपने इसी ब्लॉग पर जब पुणे ब्लॉस्ट पर द हिंदू अखबार की एक रिपोर्ट छापी तो फिर उसी तरह की टिप्पणियां दिखाई पड़ीं। अब देखिए जब मैं बुरके के खिलाफ लेख लिखता हूं तो वही तमाम लोग उसकी प्रशंसा करते नहीं थकते। यानी ऐसे लोगों में एक उम्मीद दिखाई देती है कि देखों एक मुसलमान किस तरह अपनी ही बिरादरी एक मामले पर चोट कर रहा है। लेकिन उसी मुसलमान की बाकी बातें कोई पसंद करने को तैयार नहीं है। धीरेश सैनी के ब्लॉग का लिंक- http://ek-ziddi-dhun.blogspot.com/2010/03/blog-post.html

इसके बाद मुसलमानों पर हाल ही में तीन ब्लॉगों पर ताजा पोस्ट देखने को मिली। भड़ास ब्लॉग पर जगदीश्वर चतुर्वेदी ने एक पोस्ट लिखी - आरएसएस-अमेरिका भाई-भाई। इस लेख में चतुर्वेदी जी ने लिखा है कि किस तरह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साजिश करके मुसलमानों को उसमें फंसाया जा रहा है। इस खेल में संघ परिवार से लेकर अमेरिका तक शामिल है। हालांकि उस लेख से यह ध्वनि भी निकलती है कि मुसलमान तो पिटने के लिए ही बना है। बहरहाल, वह पूरा लेख पढ़ें तो आप समझ जाएंगे। जगदीश्वर चतुर्वेदी के ब्लॉग का लिंक- http://bhadas.blogspot.com/2010/02/blog-post_1655.html

अभी-अभी मुझे एक और ब्लॉग पर जाने का मौका मिला। ब्लॉग का नाम है आई एम फौजिया डॉट ब्लॉग स्पाट कॉम । इस ब्लॉग को पेशे से रेडियो जॉकी फौजिया रियाज चलाती हैं। उनकी बहुत ज्यादा तारीफ न करते हुए, मैं आप लोगों से अनुरोध करता हूं कि उनके ब्लॉग पर जाकर ताजा पोस्ट पढ़ें- मैं मुसलमान हूं। इस लेख में फौजिया ने एक दर्द बयान किया है कि नास्तिक होने के बावजूद किस तरह उन्हें पाक समर्थक माना जाता है। यह सब उनके साथ अभी से नहीं बल्कि स्कूल में पढ़ाई के दौरान भी हुआ। वह सेकुलर विचारधारा की है लेकिन उन्हें बार-बार अपने देशभक्त होने की गवाही देनी पड़ती है। फौजिया के ब्लॉग का लिंक- http://iamfauziya.blogspot.com/2010/03/blog-post.html


अंत में एक बार फिर से धीरेश के ब्लॉग एक जिद्दी धुन की चर्चा करना चाहता हूं। धीरेश ने उस पर लेखक-कवि-पत्रकार विष्णु नागर की एक कविता लगाई - क्योंकि मैं एक मुसलमान हूं। उस कविता पर एक मुस्लिम सज्जन ने बेहूदा टिप्पणी की, जिसका मैंने धीरेश के ब्लॉग पर विरोध भी किया। उस कविता में मुसलमान होने की विडबंना कुछ अपने ढंग से ही बयान की गई थी। वह कविता उन मुस्लिम सज्जन को समझ नहीं आई थी और उन्होंने बिना सोचे-समझे टिप्पणी कर दी थी। मेरे अलावा भी तमाम लोगों ने उसका प्रतिवाद किया। आप लोग उस कविता को पढ़ें और जानें कि मनमोहन, विष्णु नागर या धीरेश सैनी जैसे लोग क्या सोचते हैं और क्या कहना चाहते हैं। भारत को शिव सेना या मुन्ना बजरंगी टाइप जैसे मुट्ठी भर लोगों समूह अपनी तरह हांक नहीं सकता। ऐसे लोगों के रास्ते में विष्णु नागर और धीरेश सैनी जैसे लोग एक मजबूत दीवार की तरह हैं।


विष्णु नागर की वह शानदार कविता


क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ
मेरे दस सिर हैं
क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ
मेरे बीस हाथ हैं
क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ
मैंने सीता का अपहरण किया है
क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ
सोने की लंका मेरी राजधानी है
क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ
मुझे खाक में मिला दिया जाएगा
क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ

लेकिन मेरी तुलना रावण से करना भी ज़्यादती है
क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ

मेरी क्या हैसियत
कि मैं अट्टहास कर सकूँ
मेरी क्या हस्ती
कि मैं सीता का अपहरण करने की सोच भी सकूँ
मैं हूँ क्या
जो सोने की लंका में रह सकूँ
मैंने ऐसा किया क्या जो तुलसी के राम के हाथों
मरने की कल्पना भी कर सकूँ

क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ

(धीरेश सैनी के ब्लॉग से साभार)
***

मैं मुसलमान हूं

-फौजिया रियाज

मेरा जन्म हिंदुस्तान में हुआ है यहीं पली बड़ी हूँ अपने मुल्क से बेहद प्यार है. जब छोटी थी तो स्कूल में जब भी किसी क्लास में पाकिस्तान के बारे में ज़िक्र होता तो सब मेरी तरफ देखने लगते. मुझे अपने क्लासमेटस पर बेहद गुस्सा आता. उस वक़्त मेरा बच्चा मन यही सोचता जब इंडिया पाकिस्तान का क्रिकेट मैच होता है तब मैं इंडिया के जीतने की दुआएं मांगती हूँ. फिर ऐसा क्यूँ? सब पाकिस्तान का ज़िक्र आते ही मेरी तरफ क्यूँ घूरते हैं.

खैर वो बचपन की बात थी पर अब भी हालात बदले नहीं हैं. मेरे ऑफिस में एक जनाब हैं जिन्हें पाकिस्तान से बेहद नफरत है और वो इस नफरत को भारत के प्रति अपना देशप्रेम मानते हैं. पाकिस्तान से नफरत यानी हिंदुस्तान से देशप्रेम ये फिलोसोफी मुझे आजतक समझ नहीं आई. कहते हैं की दोनों मुल्कों के आम लोगों के दिल में एक दुसरे के लिए प्यार है और हुकूमत अपने फायदे के लिए जंग करती है. मगर असल में दोनों ही मुल्कों के आम लोगों के बीच बेपनाह नफरत है. बंटवारे के वक़्त सिर्फ ज़मीन का टुकड़ा नहीं बंटा था बल्कि दिल भी बंट गए थे.

मैं नमाज़ नहीं पढ़ती रोज़े नहीं रखती खुद को नास्तिक मानती हूँ पर ऑफिस में एक शिवसेना समर्थक जनाब की बातें सुन कर लग रहा है की मैं खुद को नास्तिक कह कर पल्लू नहीं झाड सकती. नास्तिकता मेरी विचारधारा है पर जन्म से मैं एक मुसलमान हूँ. इस्लामिक परिवेश में पैदा हुई हूँ, माँ बाप बड़ी बहन, खानदान के लोग सब नमाज़ पढ़ते हैं रोज़े भी रखते है पर साथ ही हिंदुस्तान और पाकिस्तान के क्रिकेट मैच में हिंदुस्तान की जीत पर ख़ुशी मनाते हैं. जब कहीं ब्लास्ट हो तब वो भी उतने ही परेशां या दुखी होते हैं जितना कोई गेंर मुस्लिम. हालही में मेरे एक दोस्त को किसी ने आतंकवादी कहा क्यूंकि कसाब के ऊपर हो रही किसी debate में उन्होंने कहा "कसाब को इतनी जल्दी फांसी नहीं दी जा सकती क्यूंकि पुलिस को कसाब से बहुत कुछ उगलवाना हज़ाहिर सी बात है यही अगर किसी गेंर मुस्लिम ने कहा होता तो उसकी देशभक्ति पर कोई सवाल नहीं उठता.
ये सब सोच कर आँख में उसी तरह आंसू आ जाते है जिस तरह राष्ट्रगान सुनते हुए जज़्बात में पलकें भीग जाती हैं.

(फौजिया रियाज के ब्लॉग से साभार)