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Showing posts from February, 2010

इसे जरूर पढ़े ः कॉमरेड, आपने मुसलमानों के साथ ये क्या किया?

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल अपनी धारदार लेखनी के लिए जाने जाते हैं। पश्चिम बंगाल में मुसलमानों को आरक्षण के ड्रामें पर उन्होंने बहुत विचारोत्तेजक लेख लिखा है। यह लेख जनसत्ता में 23 फरवरी को संपादकीय पेज पर छपा है। वही लेख अब उनके ब्लॉग रिजेक्ट माल पर भी उपलब्ध है...उस लेख को जरूर पढ़ें। लिंक यहां दिया जा रहा है...

कॉमरेड, आपने मुसलमानों के साथ ये क्या किया?
-दिलीप मंडल

पुणे ब्लॉस्ट पर द हिंदू अखबार की सनसनीखेज रिपोर्ट

पुणे ब्लॉस्ट पर द हिंदू अखबार ने 19 फरवरी 2010 को बहुत ही सनसनीखेज रिपोर्ट प्रकाशित की है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पुणे ब्लॉस्ट में हिंदूवादी संगठन का हाथ होने से इनकार नहीं किया जा सकता। उसने अपनी रिपोर्ट में अभिनव भारत का नामं लिया है जिसके तमाम पदाधिकारियों पर मालेगांव व अन्य स्थानों पर बम विस्फोट का आरोप है। द हिंदू अखबार की रिपोर्ट कितनी सही या गलत है कि यह आप उस रिपोर्ट को पढ़कर खुद तय करें। इस मामले पर अभी से कोई राय कायम करना सही नहीं होगा।

इस रिपोर्ट को मैं यहां पेश कर रहा हूं लेकिन उसका लिंक भी दे रहा हूं जिससे आप सीधे उनकी वेबसाइट पर भी जाकर पढ़ सकते हैं। लिंक है...http://beta.thehindu.com/news/national/article109312.ece?homepage=true

और अब द हिंदू की रिपोर्ट पढ़ें...

Hindutva terror probe haunts Pune investigation

Praveen Swami

Investigators focus on jihadist groups, but some fear Hindutva group may have carried out German Bakery bombing.

Back in November 2008, as Lieutenant-Colonel Prasad Shrikant Purohit walked into a Nashik court to face trial for his alleged role in t…

ब्लॉग के माध्यम का दुरुपयोग दुर्भाग्यपूर्ण

परदे को अब और न खीचों मौलवी साहब

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मुस्लिम महिलाओं का फोटो मतदाता सूची में हो या न हो, इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बहुत साफ शब्दों में तस्वीर साफ कर दी है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से तमाम भारतीय मुस्लिम संगठनों, मौलवियों, विद्वानों ने सहमति जताई है लेकिन इसके बावजूद कुछ लोगों ने शरीयत और कुरान को लेकर नए सिरे से बहस छेड़ दी है।

साल-दर-साल से और हर साल कोई न कोई ऐसा मुद्दा आता है जब शरीयत को लेकर बहस छिड़ जाती है और मुसलमानों की बहुसंख्यक आबादी खुद को असुविधाजनक स्थिति में पाती है। अभी मदुरै के जिन सज्जन की याचिका पर पर्दानशीं महिलाओं की फोटो को लेकर सुप्रीम कोर्ट को कड़ी टिप्पणी करनी पड़ी, उसकी नौबत जानबूझकर पैदा की गई। हालांकि इस तरह के मसलों पर अदालत को तो कायदे से याचिका ही नहीं स्वीकार करनी चाहिए।

आम मुस्लिम जनमानस क्या सोचता है, इसको जानने की ईमानदार कोशिश नहीं की जाती। जुमे की नमाज में एकत्र नमाजियों की तादाद से गदगद मुस्लिम उलेमा या राजनीतिक दल इस जनमानस का मन नहीं पढ़ पाते। अगर अभी कोई मुस्लिम या गैरमुस्लिम संगठन सर्वे करा ले तो पता चल जाएगा कि मुसलमानों की एक बहुत बड़ी आबादी सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सहमत है। ए…