Saturday, September 12, 2009

क्या होगा इन कविताओं से

उन्हें मैं करीब एक दशक से जानता हूं। आजतक मिला नहीं लेकिन यूपी के एक बड़े नामी और ईमानदार आईएएस अफसर हरदेव सिंह से जब उनकी तारीफ सुनी तो जेहन में यह बात कहीं महफूज रही कि इस शख्स से एक बार मिलना चाहिए। उनका नाम है प्रो. शैलेश जैदी। वह पहले अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में हिंदी के विभागाध्यक्ष भी रहे। हरदेव सिंह ने भी यही बताया था कि शैलेश साहब हिंदी के वाकई बड़े विद्वान हैं। मेरी मुलाकात उनसे अब तक नहीं हुई। अभी जब दिलीप मंडल ने इशरतजहां पर नीचे वाली कविता इस ब्लॉग हिंदी वाणी के लिए लिखी तो प्रतिक्रिया में उन्हीं प्रो. शैलेश जैदी ने एक कविता भेजी है। जिसे मैं इस ब्लॉग के पाठकों और मित्रों के लिए पेश कर रहा हूं -

क्या होगा इन कविताओं से

कितने हैं दिलीप मन्डल जैसे लोग ?
और क्या होता है इन कविताओं से ?
आंसू भी तो नहीं पोंछ पातीं ये एक माँ के।
अप्रत्यक्ष चोटें व्यंग्य तो कहला सकती हैं,
पर गर्म लोहे के लिए हथौडा नहीं बन सकतीं ।
इसलिए कि गर्म लोहा अब है भी कहाँ
अब तो हम ठंडे लोहे की तरह जीते हैं
और गर्म सांसें उगलते हैं।
हरिजन गाथा की बात और थी
वह किसी इशरत जहाँ पर लिखी गयी कविता नहीं थी,
इशरतों के तो पहले भी
गुजरात में भस्म तैयार किये गये
और इस भस्म को शरीर पर मलकर
जीते गये चुनाव्।
कितने दिलीप मंडलों ने लिखी थीं
उस समय कविताएं ?
खैर ! कल की बात जाने दीजिए
कविता अच्छी है ।
किसे दूं मैं इस कविता की बधाई ?
इशरत जहाँ को ?
उनकी माँ को ?
दिलीप मंडल को ?
या खुद को ?
इसलिए, कि इस कविता से सब ख़ुश हुए।
बस इतनी ही है किसी कविता की नियति।

-शैलेश ज़ैदी


इसी बहाने


प्रो. शैलेश जैदी की एक और ताजतरीन गजल पेश कर रहा हूं जिसे मैने सीधे उनके ब्लॉग युगविमर्श से उठाया है। मुझे यह गजल बहुत पसंद है और मौजूदा दौर में बहुत प्रासंगिक है। आइए पढ़ते हैं-

जमाने के लिए मैं ज़ीनते-निगाह भी था

ज़माने के लिए मैं ज़ीनते-निगाह भी था ।
ये बात और है सर-ता-क़दम तबाह भी था॥

ख़मोशियों से मैं बढ़ता रहा सुए-मंज़िल ,
सियासतों का जहां जब के सद्दे-राह भी था॥

बयान कर न सका मैं सितम अज़ीज़ों के,
के ऐसा करने में अन्देशए-गुनाह भी था ॥

जो ख़ुद को करता था मेरे फ़िदाइयों में शुमार,
मेरे ख़िलाफ़ वही शख़्स कल गवाह भी था ॥

ख़ुलूस उस का बज़ाहिर बहोत ही दिलकश था,
बरत के देखा तो क़ल्बो-जिगर सियाह भी था॥

गुज़र रही थी फ़क़ीरी में ज़िन्दगी उस की,
ख़बर किसे थी सुख़न का वो बादशाह भी था ॥

उसी की सिम्त किया क़िब्ला रास्त खुसरो ने,
जो कज-कुलाह भी था और दीं-पनाह भी था॥*
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* अमीर खुसरो के गुरु हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने एक दिन कुछ हिन्दुओं को यमुना में नहाते देख कर सहज भाव से कहा - हर क़ौमे-रास्त राहे, दीने व क़िब्लागाहे। अर्थात प्रत्येक क़ौम का अपना सन्मार्ग होता है, धर्म होता है और पूज्य स्थल भी। हज़रत अमीर ख़ुसरो पास में ही खड़े थे, उन्हों ने अप्ने गुरु की ओर सकेत कर के तत्काल इस शेर को दूसरा चरण कह कर पूरा कर दिया - मन क़िब्ला रास्त करदम बर सिम्ते-कज-कुलाहे अर्थात मै अपना पूज्य स्थल तिर्छी टोपी वाले की ओर सीधा करता हूं।मुसलमानों में क़िब्ला [काबे] की ओर मुंह कर के नमाज़ पढ़ी जाती है और हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया तिरछी टोपी [कजकुलाह] लगाते थे। इस शेर में यही सकेत है।

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प्रोफेसर साहब से संपर्क और संवाद करें

प्रोफेसर एवं पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष
तथा डीन, फैकल्टी आफ आर्ट्स
मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ,
Mob. 9412273068

http://yugvimarsh.blogspot.com/

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