Wednesday, August 26, 2009

न वो गुरुजन न वो चेले...गलत

रोजाना आपका सामना टीवी से लेकर अखबार तक ऐसी खबरों से पड़ता होगा जो आपको विक्षोभ से भर देती होंगी। लेकिन इसी दौरान कुछ खबरें ऐसी भी आती हैं कि जिनसे आपको ऊर्जा मिलती है और आप कहते उठते हैं कि दुनिया में अच्छाई अभी बाकी है। ऐसी ही दो खबरों के हवाले से अपनी बात कहना चाहता हूं।

दोनों ही खबरें बुधवार बहुत कम जगह में अंग्रेजी अखबार द हिंदुस्तान टाइम्स (26 अगस्त 2009) में जगह पा सकी हैं। एक खबर दक्षिण भारत के शहर मद्रास (चेन्नै) से है। नामक्कल जिले के एक गांव में तमिल भाषा (Tamil Language) के विद्वान (Scholar)और रिटायर्ड टीचर एस. वी. वेंकटरमण को उनके चेलों ने इसी 5 सितंबर (2009) को गुरु दक्षिणा में एक अनोखा तोहफा (Unique Gift) देने का निर्णय लिया है। यह तोहफा है एक दो मंजिला मकान।

खबर में पूरी बात यह कही गई है कि वेंकटरमण रिटायर हो गए और उनको वह इलाका छोड़कर अपने गांव इसलिए वापस जाना पड़ा कि वे मकान का महंगा किराया अदा नहीं कर सकते थे। उनके पास अपना मकान नहीं था। रिटायरमेंट के बाद उनको जो फंड का पैसा मिला वह उन्होंने लड़कियों की शादी में खर्च किया। यह अफसोसनाक सूचना जब उनके पढ़ाए हुए पुराने स्टूडेंट्स को मिली तो उन लोगों को बड़ी आत्मग्लानि (Guilty) हुई। उन लोगों ने एक मीटिंग बुलाई जिसमें उनके पढ़ाए हुए 500 पुराने स्टूडेंट्स जमा हुए। इन लोगों ने आपस में ही चंदा किया और देखते ही देखते 10 लाख रुपये एकत्र हो गए। इसके बाद एक प्लॉट खरीदा गया और इस पर दो मंजिला मकान बनाया गया। इस मकान की चाभी 5 सितंबर को उनके चेले अपने गुरुजी को सौंपेंगे। जानते हैं यह सब किसने किया, उनके पढ़ाए हुए स्टूडेंट एम. ए. अर्थनराई जो रिटायर्ड म्युनिस्पल कमिश्नर हैं।

इस खबर का क्लाईमैक्स यह है कि जिन लोगों ने चंदा एकत्र किया या इसमें बढ़चढ़कर भाग लिया वे सब या तो कहीं नौकरी कर रहे हैं या फिर खुद रिटायर हो चुके हैं। इस खबर को पढ़ने के साथ ही मैं अपने उन गुरुजनों को याद करने लगा जिन्होंने मुझे छोटी क्लासों में पढ़ाया, दरअसल किसी भी स्टूडेंट की नींव को मजबूत बनाने की शुरुआत वहीं से होती है इसका अंदाजा अब जाकर होता है। वाकई मेरे जैसे व्यक्ति में अगर इंसानियत या कह लें कोई भी सदगुण है तो वह उन्हीं गुरूजनों की बदौलत है। यूपी के जिस शहर में मैंने पढ़ाई की थी, वहां एक अनुशासन आज भी मुझे याद है।

कोई बार मेरी अम्मा मुझे कुछ सामान लाने अगर मार्केट में भेज देती थीं तो मार्केट में रिस्क (Risk)लेकर जाना पड़ता था। कुछ गुरुओं के नाम मुझे याद हैं...श्याम नारायण पांडे, बी. के. सिंह, लाल जी वर्मा, हरिओम श्रीवास्तव। होता यह था कि यह सभी टीचर गांवों में रहते थे और घर जाते हुए हमारे शहर की मार्केट में कुछ न कुछ खरीदारी करते थे। जब मेरा सामना उनसे हो जाता था तो मार्केट में वह कुछ नहीं कहते थे लेकिन अगले दिन क्लास में खबर ली जाती थी। उनका मानना था कि मार्केट में मेरे घूमने का मतलब था कि मैं आवारागर्दी कर रहा हूं। हालांकि मैं उन्हें बार-बार बताता था कि अम्मा ने सामान लाने भेजा था लेकिन उन लोगों को पता नहीं क्यों लगता था कि मैं झूठ बोल रहा हूं। हालांकि परीक्षा में अच्छे नंबर लाने और एक वाद विवाद प्रतियोगिता (Debate Compettion) में स्कूल के लिए शील्ड जीतकर लाने पर इन लोगों का उस समय का गुस्सा कुछ शांत हो गया था। हिंदी पढ़ाने टीचर श्याम नारायण पांडे जी ने कहा भी कि हम लोग शायद गलत समझते थे।
...पिछले साल जब मैं अपने शहर गया तो इन तमाम गुरुजनों के बारे में पता किया। सभी का निधन हो चुका था। अफसोस करता रहा। मेरे उस समय के मित्र नंदलाल गुप्ता ने बताया कि जब मैं अखबारों में छपने लगा और कुछ खबरें उसने इन गुरुओं को पढ़ाई तो वे काफी गदगद थे। उनका कहना है कि उन लोगों ने एक अच्छे शिष्य को तैयार किया था। हालांकि मेरे तमाम सहपाठी मुझसे बेहतर पेशे में हैं और खुद नंद एक बेहद सफल बिजनेसमैन है लेकिन उसका कहना था कि वे तमाम गुरुजन पता नहीं क्यों मेरे पत्रकारिता के पेशे को बाकी सभी के मुकाबले बहुत अच्छा मानते थे। बहरहाल, ईश्वर उन लोगों की आत्मा को शांति दे। यह मुझे पता है कि यह पेशा आज के दौर में कितना अच्छा है...

अब दूसरी खबर पर आते हैं। दूसरी खबर मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले की है। इस खबर के साथ फोटो भी है। खबर के मुताबिक नवीन मिडल स्कूल के कुछ स्टूडेंट्स ने अपने स्कूल की प्रिंसिपल और दो अन्य टीचरों को कमरे में बंद कर दिया। स्टूडेंट्स इस बात पर नाराज हैं कि उनके स्कूल के सबसे अच्छे टीचर ओमप्रकाश घोष का वहां से कहीं और तबादला कर दिया गया। टीचर बेचारे स्कूल में दो घंटे बंद रहे और जब जिला मुख्यालय से शिक्षा अधिकारी व अन्य अधिकारी पहुंचे तब जाकर उस बंद कमरे से उन्हें निकाला जा सका। इसी टीचर का तबादला किए जाने के मुद्दे पर दो दिन पहले इस गांव के लोग सड़क जाम कर चुके थे लेकिन प्रशासन उनकी सुन नहीं रहा था। अफसरों का कहना है कि गांव वाले जानबूझकर इस मामले को तूल दे रहे हैं और वे वहां की ग्राम पंचायत की महिला सरपंच के पति के खिलाफ कार्रवाई का मन बना रहे हैं। अफसरों का कहना है कि स्टूडेंट्स और गांव वाले नासमझ हैं और वह टीचर उनको भड़का रहा है।

इस घटना पर आपकी जो भी राय होगी, लेकिन मेरा मानना है कि कोई टीचर इतने बड़े पैमाने पर स्टूडेंट्स और ग्रामीणों (Villagers) को भड़का सके कि वे इस तरह की हरकत पर आमादा हो जाएं। जरूर उस शिक्षक में कोई विशेषता है तभी सारे स्टूडेंट्स और ग्रामीण उसकी उसी स्कूल में वापसी चाहते हैं। मैंने ऐसे टीचर देखे हैं जिनके जाने से स्टूडेंट्स वाकई दुखी होते हैं। दिल्ली जैसे महानगर (Metro City) में नामी गिरामी स्कूलों के स्टूडेंट्स अक्सर ऐसी चर्चा करते हैं कि फलां विषय के टीचर के जाने की वजह से उनका उस विषय की पढ़ाई में मन नहीं लग रहा है।

इसका एकमात्र हल मुझे तो यही लगता है कि खासकर सरकारी स्कूलों में टीचरों का तबादला तभी हो जब उन क्लासों के स्टूडेंट्स चाहें। अगर नब्बे फीसदी स्टूडेंट्स किसी टीचर के पक्ष में हैं तो उसे उसी स्कूल में रखा जाना चाहिए। चाहे यह अवधि बेशक बहुत लंबी क्यों न हो।

कुल मिलाकर गुरुजनों के सम्मान वाली दो खबरें पढ़कर मुझे तो बहुत अच्छा लगा। ऐसे शिक्षकों की इस देश को बहुत जरूरत है।

कपिल सिब्बल के पक्ष में...

केंद्रीय मानव संसाधन विकास (HRD) मंत्री कपिल सिब्बल ने अभी हाल ही में कहा है कि पूरे देश में मैथ्स और साइंस की पढ़ाई एक जैसी होनी चाहिए यानी पाठ्यक्रम एक जैसा हो। मैं इसके पक्ष में हूं और अगर ऐसा हो सका तो स्टूडेंट्स पर कांग्रेस सरकार का यह एक उपकार ही होगा। इसकी हमें सख्त जरूरत है। सिब्बल को इसलिए भी बधाई कि उन्होंने हिंदी को बतौर राष्ट्रभाषा (National Language) और मजबूत किए जाने की वकालत की है।

Friday, August 21, 2009

जसवंत और रश्दी की किताब का फर्क

मोहम्मद अली जिन्ना पर जसवंत सिंह की किताब का बीजेपी पर इतना असर होगा, यह खुद जसवंत सिंह को नहीं मालूम था। बीजेपी के इस फैसले से यह तो साफ हो ही गया है कि बीजेपी में किसी तरह का आंतरिक लोकतंत्र (internal democracy) नहीं है। वरना जिस तथ्य को जसवंत ने अपनी किताब में कलमबंद किया, उन बातों को बतौर बीजेपी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी कई साल पहले कह चुके थे। फिर अब क्या हुआ।
जाने-माने पत्रकार वीर संघवी ने आज हिंदुस्तान टाइम्स में इस विषय पर काफी विस्तार से लिखा है। यहां मैं अपनी बात न रखकर उनके हवाले से कुछ तथ्य रखना चाहता हूं। वीर संघवी ने लिखा है कि जसवंत सिंह ने जिन्ना से जुड़े चैप्टर आडवाणी के पास बहुत पहले देखने के लिए भेजे थे। आडवाणी ने उसे पढ़ा था और उस पर मुहर लगा दी थी। आडवाणी और पूरी बीजेपी को मालूम था कि जसवंत सिंह की किताब भारत-पाकिस्तान बंटवारे जैसे मुद्दे पर आ रही है। ऐसा नहीं है कि यह किताब अचानक आई और बीजेपी नेता हतप्रभ रह गए। शिमला में चल रही चिंतन बैठक से पहले जसवंत ने आडवाणी से पूछा भी था कि क्या वे शिमला बैठक (BJP Shimla Meet ) में शामिल हों या फिर किनारा कर जाएं। आडवाणी ने उन्हें शिमला न आने की सलाह दी लेकिन अगले दिन अखबारों में उन्हें बीजेपी से निकाले जाने की खबरें थीं। संघवी ने लिखा है कि खुद बीजेपी के कई बड़े नेताओं को इस तरह के फैसले की उम्मीद नहीं थी। यानी संघवी का विश्लेषण यह कहता है कि बीजेपी के चंद नेताओं ने शायद आरएसएस के निर्देश पर यह कदम उठाया। मतलब यह हुआ कि यह कदम या तो RSS के इशारे पर उठाया गया या फिर बीजेपी के कुछ नेताओं का अपना फैसला है, जिसमें आडवाणी की रजामंदी भी शामिल है।
1. बीजेपी की कार्रवाई के साथ-साथ गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किताब पर प्रतिबंध लगाने का आदेश भी साथ-साथ आया। मतलब यह कि दोनों ही फैसले महज गुजरात के मद्देनजर लिए गए। मोदी गुजरात को आरएसएस की प्रयोगशाला बता ही चुके हैं। साफ है कि वल्लभ भाई पटेल के मुद्दे पर गुजरातियों को खुश करने के लिए जसवंत को पार्टी से निकाला गया और किताब पर बैन लगा दिया गया। जिन्ना पर यह कोई पहली किताब नहीं है। इससे पहले भी उनके व्यक्तित्व को शानदार तरीके से बयान करने वाली और गलत तरह से पेश करने वाली ढेर सारी किताबें आ चुकीं है। लेकिन उन पर तो आज तक बैन नहीं लगाया गया। ऐसा क्यों होता है कि अंग्रेजों की संस्कृति में पला-बढ़ा विवादास्पद लेखक सलमान रश्दी (Salman Rushdie) जब सैटनिक वर्सेज (Satanic Verses) जैसी किताब लिखता है और भारत में उस पर बैन लगाया जाता है तो बीजेपी उसका विरोध करती नजर आती है लेकिन महज एक राज्य के लोगों को खुश करने के लिए किसी किताब पर बैन लगा दिया जाता है तो वह चुप रहती है। हालांकि उस किताब पर बैन लगाना भी गलत फैसला था। सैटनिक वर्सेज ने मुसलमानों की एक बड़ी आबादी की आस्था पर चोट की थी। लेकिन बीजेपी और संघ परिवार तभी बोलते हैं जब उनकी आस्था पर कोई चोट करता है, औरों की आस्था भाड़ में जाए।
मेरा मानना है कि जरूर संघ की दीक्षा और बीजेपी की ट्रेनिंग में कहीं कोई खोट है, जब वहां लोग एक लंबा समय बिताने के बाद वह कर बैठते हैं जो उन्हें अपनी पार्टी और संगठन के हिसाब से नहीं करना चाहिए। आडवाणी उन दिनों बीजेपी अध्यक्ष थे, पाकिस्तान गए तो वहां इतने अभिभूत हुए कि जिन्ना को महान बता बैठे। संघ बुरी तरह विफर गया। भारत लौटे, खूब लानतें भेजी गईं। पद से नहीं हटाए गए। इस्तीफा देने का नाटक किया। लेकिन बने रहे। कुछ दिन बाद पार्टी ने उठाकर किनारे लगा दिया। प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग वेट करते रहे।
जसवंत ने लंबे समय तक खाकी निकर पहना और आनंद मठ का गीत गाते रहे। लेकिन अपना बुढ़ापा सुधारने को उन्होंने एक किताब लिख दी और अब तक की गलतियों पर पछतावा किया। यानी इतने दिन संघ का जो चोला उन्होंने पहना, वह सब दिखावा था। उस चोले को उन्होंने एक झटके में तार-तार कर दिया। इसी तरह वे कई ऐसे चेहरों को लाए जिन्होंने समय रहते वहां से नमस्ते करना ठीक समझा।
मैं यह नहीं कह रहा कि बीजेपी के मुकाबले बाकी पार्टियां या कोई एक खास पार्टी बहुत अच्छी है लेकिन देश की मुख्य विपक्षी पार्टी से ऐसी उम्मीद की जाती है कि वह कुछ इस तरह की भूमिका निभाएगी जैसे अमेरिका, इंग्लैंड या अन्य लोकतांत्रिक देशों की पार्टियां अपना रोल निभाती हैं। अब देखना है कि शिमला की ठंडी वादियों में चिंतन के बाद बीजेपी की चिंता कहां तक और किस हद तक पहुंचती है और संघ परिवार उसे दरअसल कितनी आजादी देता है।

Tuesday, August 18, 2009

जिन्ना का जिन्न

जिन्ना नामक जिन्न फिर बाहर निकल आया है। इस बार न तो संघ परिवार (RSS Family) में और न ही बीजेपी में वैसी बेचैनी दिखी जैसी लालकृष्ण आडवाणी की जिन्ना पर टिप्पणी के समय दिखी थी। बीजेपी में हैसियत के नेता माने जाने वाले और कभी विदेश मंत्री रह चुके जसवंत सिंह ने लगभग वही बातें दोहराईं जो आडवाणी ने पाकिस्तान में जाकर कहीं थीं और भारत वापस आते ही संघ परिवार ने उनकी छीछालेदर में कोई कमी नहीं छोड़ी। आखिर अब ऐसा क्या हुआ कि संघ परिवार इस पर प्रतिक्रिया देने तक को तैयार नहीं है।
मुझे तो यही लगता है कि जरूर इसके पीछे जरूर कोई निहितार्थ (Reasons) है। निहितार्थ शब्द का इस्तेमाल बीजेपी और संघ के लोग काफी करते हैं इसलिए मैंने भी उसी शब्द का इस्तेमाल किया है। अब विश्लेषण करते हैं कि आखिर वे निहितार्थ क्या हो सकते हैं। उमा भारती, मदनलाल खुराना, कल्याण सिंह, गोविंदाचार्य से लेकर वसंधुरा राजे सिंधिया ने बीजेपी को उसकी औकात बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी इसलिए इस पर अनावश्यक चर्चा कर संघ और बीजेपी बाकी राजनीतिक दलों को मौका नहीं देना चाहती है कि वे बवाल को आगे बढ़ाएं। लगभग हर राज्य में इस समय बीजेपी संगठन में उठापटक चल रही है और उसके नेता नया मोर्चा (New Front) नहीं खोलना चाहते।
देश में इस समय महंगाई चरम पर है। लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। बीजेपी इस मुद्दे पर कोई देशव्यापी आंदोलन छेड़ने की बजाय या तो खुद के नेताओं से संघर्ष कर रही है या फिर संगठन में अनुशासनहीनता से जूझ रही है। हालांकि यह बात साफ तौर पर हर कोई जानता है कि जसवंत सिंह ने महज अपनी किताब के प्रचार-प्रसार के लिए जिन्ना विवाद को फिर से हवा दी है। लेकिन अगर बीजेपी यह सोचती है कि भारतीय मुसलमान (Indian Muslims) जिन्ना की तारीफ से खुश हो जाएंगे तो यह उसकी गलतफहमी है। मौजूदा पीढ़ी का मुस्लिम युवक तो जिन्ना के बारे में जानता तक नहीं है। जहां तक पाकिस्तान के विभाजन की बात है तो बीजेपी से कहीं ज्यादा दर्द भारतीय मुसलमान को पाकिस्तान बनने से है। सरहदों का यह कैसा बंटवारा है कि एक जैसी बोली और संस्कृति होने के बावजूद हम आपस में मिल नहीं सकते। भारत-पाकिस्तान बंटवारे से दरअसल भारतीय मुसलमान तो ही घाटे में रहा है। भारत में रह रहे मुसलमानों को आखिर पाकिस्तान बनने से फायदा क्या हुआ। कोई बताए तो सही।
बहरहाल, इस मुद्दे पर मैं ज्यादा कुछ न कहते हुए नवभारत टाइम्स में 18-8-2009 को इसी मुद्दे पर प्रकाशित संपादकीय आप लोगों के ध्यानार्थ पेश कर रहा हूं। इस राष्ट्रीय अखबार में जसवंत सिंह की टिप्पणी पर प्रकाशित संपादकीय अपने आप में काफी कुछ कहता है।

.......साभार नवभारत टाइम्स............

जिन्ना के सहारे
इधर बीजेपी के जिन्ना प्रेम में फिर से इजाफा हुआ है। पार्टी के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह ने एक किताब लिखी है -जिन्ना- इंडिया, पार्टीशन, इंडिपेंडेंस। जैसा कि किताब के नाम से ही स्पष्ट है, इसमें भारत की आजादी और विभाजन का विश्लेषण मोहम्मद अली जिन्ना के इर्द-गिर्द घूमता है। जसवंत सिंह ने इसमें लिखा है कि जिन्ना साहब एक महान व्यक्ति थे और उन्हें ख्वामख्वाह हिंदुस्तान में बदनाम किया गया। इसके अलावा पिछले दिनों उन्होंने एक टीवी इंटरव्यू में भी कहा है कि जिन्ना साहब एक महान नेता थे। चार साल पहले लालकृष्ण आडवाणी ने इसकी शुरुआत की थी। जब वह पाकिस्तान गए थे, तब विजिटर्स बुक में लिख आए थे कि जिन्ना साहब हिंदू-मुस्लिम एकता के अग्रदूत थे। एक भाषण के हवाले से उन्हें धर्मनिरपेक्ष भी बताया था। आडवाणी जी के उस बयान की वजह से बीजेपी में खूब घमासान हुआ और बहुत दिनों तक वह संघ के कोपभाजन बने रहे। इधर जसवंत सिंह जब आडवाणी जी के कोपभाजन बने, तो उन्होंने भी जिन्ना साहब की प्रशंसा शुरू कर दी। बीजेपी के नेताओं को लगता है कि जिन्ना की प्रशंसा करते ही मुसलमान वोटर उन्हें धर्मनिरपेक्ष और उदार मान लेंगे। यदि ऐसा होता तो पिछले आम चुनाव में बीजेपी को आडवाणी जी के उस बयान का जरूर फायदा मिला होता। जिन्ना की प्रशंसा के पीछे दूसरा मकसद है, उनके माध्यम से उनके समकालीन कांग्रेसी नेताओं की रगड़ाई। जाहिर है कि यदि जिन्ना महान थे, तो उस समय जो गलत हुआ उसके लिए नेहरू और पटेल जैसे लोग दोषी थे। इसलिए प्रिय देशवासियों, उन्हें महान मत समझो। जसवंत सिंह ने किताब में इस आशय की बात लिखी भी है।

बीजेपी के लिए इस समय जिन्ना और नेहरू का मूल्यांकन बिल्कुल निरापद और मनोनुकूल फल देने वाला है, क्योंकि इससे नेहरू को तो नीचा दिखाया जा सकता है, लेकिन यह बताना जरूरी नहीं है कि जिन्ना के समय संघ और हिंदू महासभा के नेता क्या कर रहे थे और जिन्ना के बारे में क्या राय रखते थे। फिर भी यह देखना दिलचस्प होगा कि जसवंत सिंह की इस थ्योरी का असर बीजेपी के भीतर क्या होता है, क्योंकि यह सवाल तो साफ है कि संघ यदि आडवाणी के उस बयान के बाद भी पार्टी के आला नेता के रूप में मंजूर कर सकता है, तो उन्हें क्यों नहीं। इसलिए किताब तो प्रकाशित हो गई, इसका असर कुछ दिनों बाद स्पष्ट होगा। (Courtesy - NavBharat Times)

अमेरिका परस्ती मुबारक हो

शाहरुख खान के साथ अमेरिका में हुए बर्ताव के बारे में मेरी नीचे वाली पोस्ट पर कुछ मित्रों ने तीखी टिप्पणियां दीं और कुछ ने शालीनता से परे जाकर शब्दों का इस्तेमाल किया है। बहरहाल, इस विषय में हर टिप्पणीकार को जवाब देने की बजाय सिर्फ यही कहना चाहता हूं कि भारत में खालिस्तान आंदोलन से लेकर जम्मू-कश्मीर में अलगाववादियों के आंदोलन और इसमें अगर नक्सलियों की हिंसा को भी जोड़ लें तो अपने यहां अमेरिका में 9/11 के मुकाबले कहीं ज्यादा बेगुनाह लोग मारे जा चुके हैं। इनमें तमाम शहरों में हुए सांप्रदायिक दंगों में मारे गए निर्दोष शामिल नहीं हैं। इनमें सबसे ज्यादा लोग आतंकवादियों के हाथों मारे गए। अमेरिका अपने एयरपोर्टों पर शाहरूख खान, जॉर्ज फर्नांडीज और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के साथ जो हरकत कर चुका है उसे देखते हुए तो भारत को और कड़े कानून बनाने चाहिए थे। लेकिन आतंकवादी फिर भी एक भारतीय विमान का अपहरण कर कंधार ले गए और जसवंत सिंह आतंकवादियों से डील करने वहां गए।
9/11 की घटना के बाद अमेरिका आतंकवाद को कुचलने का स्वयंभू प्रधान हो गया है और हर देश में जांच करने के लिए उसके एजेंट पहुंच जाते हैं। अलकायदा से ज्यादा मजबूत शस्त्र और सेना अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशों के पास है। अमेरिका के पिट्ठू इस्राइल के पास मोस्साद जैसा संगठन है जिसे सीआईए से भी ज्यादा तेजतर्रार माना जाता है।
कहना कुल मिलाकर यह है कि अगर कोई लोकतांत्रिक देश दूसरे देशों के लोकप्रिय नेताओं, अभिनेता-अभिनेत्रियों के बारे में जानकारी नहीं रखता तो यह उसकी बदनसीबी ही कही जाएगी। हद तो यह है कि अमेरिका के तमाम ऐरे-गैरे संगठन भारत को तमाम तरह के अधिकारों के मामले में वॉचलिस्ट में रखते हैं और अपने यहां हो रही बदमाशी उन्हें नहीं नजर आ रही। इसे महज सुरक्षा के नाम पर कहकर माफ नहीं किया जा सकता। फिर भी अमेरिका परस्त इसे अच्छा मानते हैं तो यह उनको मुबारक हो। बस इस मुद्दे पर इतना ही कहना था।
इस बीच जिन्ना की महानता पर फिर विवाद शुरू हो गया है और अब हम लोगों को उस पर बहस करनी चाहिए। अगला विषय वही है।

Sunday, August 16, 2009

अमेरिकी दादागीरी और हम बेचारे भारतीय

अमेरिका के नेवॉर्क एयरपोर्ट (Newark Airport) पर लोकप्रिय भारतीय फिल्म अभिनेता शाहरूख खान के साथ जो कुछ हुआ वह हम भारतीयों के लिए चुल्लू भर पानी में डूब मरने के लिए काफी है। वह नेवॉर्क जाने वाली ही अमेरिकन एयरलाइंस की फ्लाइट थी जिसके मामूली अफसरों ने पूर्व प्रेजीडेंट एपीजे अब्दुल कलाम की जमा तलाशी ली थी और उलुलजुलूल सवाल पूछे थे। लेकिन शाहरुख के साथ यह घटना अमेरिका में हुई। कलाम की घटना का पता तभी चला जब कई महीने बाद कलाम ने खुद बताया। उस घटना के बाद एयरलाइंस ने माफी मांगी और भारत सरकार ने भी कड़ा विरोध जताया लेकिन अभी तक शाहरूख के मामले में ऐसा नहीं हुआ।
शाहरूख इस देश के युवाओं के आइकन (Icon) हैं और यह बात अमेरिकी सरकार को भी मालूम है। वहां के राजदूत ने अपनी प्रतिक्रिया में यह बात कही भी है लेकिन उसकी चालाकी देखिए कि उसने इस घटना पर खेद तक नहीं जताया।
अपने आपको दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश बताने वाले अमेरिका में नस्लभेद (Racism) के सैकड़ों मामले हो चुके हैं। चाहे वहां के गोरी चमड़ी वालों का अब्राहम लिंकन (Abram Lincoln )के साथ किया गया बर्ताव या फिर मार्टिन लूथर किंग (Martin Luther King)और पॉप स्टार माइकल जैक्सन (POP STAR MJ) के साथ किया गया नस्लीय भेदभाव हो। एमजे के साथ तो भेदभाव इसलिए किया गया कि उन्होंने नस्लीय भेदभाव के कारण इस्लाम धर्म (Islam) स्वीकार कर लिया था। खास बात यह है कि माइकल जैक्सन ने 9/11 की घटना से पहले ही इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था और बाकायदा कुरान पढ़ने लगे थे। मार्टिन लूथर किंग ने आज से सौ साल पहले नस्लीय भेदभाव के खिलाफ – हम होंगे कामयाब एक दिन – जैसा लोकप्रिय गीत लिखा था।
अमेरिकी अधिकारियों को दरअसल मुस्लिम नामों से चिढ़ने का फोबिया (Fobia)हो गया है। अमेरिका में जिन लोगों ने आतंकवादी घटनाओं (Terrorist Attack) को जन्म दिया उसके लिए वहीं की संस्कृति (Culture) में पले-बढ़े मुस्लिम युवक जिम्मेदार थे। उन्हें कहीं से भेजा नहीं गया। वे लोग वहां बाकायदा या तो पढ़ाई कर रहे थे या फिर नौकरी कर रहे थे लेकिन वे सबके सब ओसामा बिन लादेन की बातों से प्रेरित थे और उसके आतंकवादी नेटवर्क में शामिल हो गए। लेकिन इस आधार पर पूरी दुनिया के मुसलमानों को आतंकवादी मान लेना कहां का न्याय है।
कलाम और शाहरुख के साथ किया गया अमेरिकी भेदभाव दरअसल एक छिपा हुआ संदेश है कि देखो जब हम इनको कुछ नहीं समझते तो बाकी मुसलमान तो हमारे लिए चींटी और कीड़े-मकोड़ों की तरह हैं। इराक में इस बिग डैडी अमेरिका (Big Dady America) ने यही किया। उसने उस देश पर यह कहकर हमला किया कि उसके पास केमिकल वेपन (Chemical Weapon) हैं जिससे बड़े पैमाने पर जनसंहार (Genoside) का खतरा है। अन्य देश देखते रहे कि किस तरह अमेरिका इराक पर बम बरसाता रहा। इसके बाद अमेरिकन फौजों ने इराक के चप्पे-चप्पे में केमिकल वेपन तलाशना शुरू किया। अंत में ऐसा काम करने वाली अमेरिका की पिट्ठू इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) को कहना पड़ा कि इराक में हमें केमिकल वेपन कहीं भी नहीं मिले। इसके बाद अमेरिका ने सरेआम सद्दाम हुसैन को फांसी लगवाई। किसी भी देश ने इस पर चूं तक नहीं की। अब अमेरिका और उसका पिट्ठू देश इस्राइल लगातार ईरान को धमकी दे रहे हैं कि उसके पास परमाणु हथियार है और ईरान जैसे देश का विनाश दुनिया में शांति के लिए जरूरी है। अब भी तमाम अमेरिका के गुलाम देश उसकी ओर हसरत भरी नजरों से देख रहे हैं कि जहांपनाह कब हमला करेंगे और हम लोग टीवी पर यह रोमांचपूर्ण मुकाबला Live देखेंगे। ईरान की गलती क्या है- ईरान अपने लिए अपनी सुरक्षा के लिए परमाणु हथियार बना रहा है। आज तक इस बात की मिसाल नहीं मिलती कि ईरान ने कभी किसी देश पर हमला किया हो। बल्कि ईराक और सद्दाम हुसैन जब अमेरिका के दबाव में थे तो अमेरिका के कहने पर ही इराक ने ईरान और कुवैत (August 1990) पर हमला किया था। जिसमें मुंह की खाने के बाद इराक को पीछे हटना पड़ा था। (Saddam Hussein attacked Iran on 22 September 1980. This war ended in August 1988)
बराक हुसैन ओबामा ने जब अमेरिकी सत्ता की बागडोर संभाली थी तो अपने संबोधन में खासतौर से मसुलमानों के मनोभावों का जिक्र किया था कि वे अमेरिका से नफरत करते हैं। मैं चाहता हूं कि ये दूरियां अब मिटनी चाहिए। अमेरिका मुसलमानों के खिलाफ नहीं है। इसके कुछ महीने बाद ओबामा ने खास तौर से मुसलमानों को अस्ससलामअलैकुम कहा और सहयोग मांगा। उन्होंने साफ तौर पर सहयोग मांगा। लेकिन ओबामा शायद यह भूल गए कि जिस शाहरूख के साथ मुसलमान होने के नाते यह गिरी हुई हरकत की गई वह सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि अमेरिका में बसे समस्त एशियाई लोगों का चहेता है। उसके फैन पाकिस्तान से लेकर कनाडा तक में है। अब इस घटना के बाद आम मुसलमानों का दिल अमेरिका के प्रति नफरत से और नहीं भरेगा तो क्या होगा। मुसलमानों के दिलों में अमेरिका के खिलाफ नफरत के बीज और मजबूत होंगे।
याद कीजिए एनडीए शासनकाल के दौरान अमेरिका जाने पर तत्कालीन गृह मंत्री एल. के. आडवाणी और जॉर्ज फर्नांडीज तक की तलाशी हुई थी। उस समय एनडीए सरकार ने इस घटना को दबाना चाहा था और कम करके आंका था। उसके बाद इस तरह की घटनाएं बढ़ती गईं।
करण जौहर की प्रतिक्रिया के मायने
शाहरुख के मामले में करण जौहर की प्रतिक्रिया सबसे अलग हटकर है। उन्होंने कहा कि यह ऐसे ही है कि जैसे लोकप्रिय हॉलिवुड अभिनेता ब्रैड पिट (Brad Pitt) भारत आएं और यहां उनकी जमा तलाशी हो जाए।
लेकिन आपको याद होगा कि ब्रैड पिट और एंजलीना जौली (Angelina Jolie) भारत शूटिंग के लिए तो हम भारतीय किस तरह उनके आगे नतमस्तक हो गए। यहां के मीडिया के लिए वह पहली खबर बन गए। दोनों अमेरिका जाते वक्त भारतीय लोगों का शुक्रिया कहने से नहीं भूले कि उन्होंने इतना सम्मान दिया जिसके वह हकदार नहीं थे।
मैं आप लोगों से या भारत सरकार से यह मांग नहीं कर रहा हूं कि आप भी अमेरिकी एक्टरों या वहां के नेताओं की जमा तलाशी पर उतर आएं बल्कि यह कहना चाहता हूं कि जरा अमेरिकी दादागीरी पर सोचिए। तमाम देश या उन मुल्कों के लोग कब तक अमेरिकी दादागीरी को बर्दाश्त करते रहेंगे। अभी जिस मंदी के दौर से हम लोग गुजर रहे हैं वह भी अमेरिकी देन है। वह दिन दूर नहीं जब आप खाना खाएंगे तो उसका फैसला अमेरिका करेगा। माफ कीजिएगा अब किसी ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) को भारतीयों को गुलाम बनाने के लिए भारत आने की जरूरत नहीं है। वह न्यू यॉर्क में बैठकर यह काम कर सकती है।

Sunday, August 9, 2009

विश्वास का गड़बड़झाला...Never Trust



नेवर ट्रस्ट यानी किसी पर विश्वास मत करो - यह मैं आपसे या किसी से भी नहीं कह रहा हूं। यह Twitter पर सबसे Hot Topic है। जिसे उसने Trending Topic की सूची में सबसे पहले नंबर पर रखा है यानी Tweet करने वाले इस समय सबसे ज्यादा इस शब्द Never Trust का इस्तेमाल कर रहे हैं। अगर आप Twitter पर जाकर Never Trust पर क्लिक करें तो आपको हैरानी होगी कि लोग किस-किस रूप में इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।



इस टॉपिक को देखने के बाद मैं भारत के संदर्भ में सोचने लगा कि हमारे यहां भी तो यह शब्द इस समय हॉट हो गया है। कभी इसका उलट था जब हमें पढ़ाया और सिखाया जाता था कि लोगों पर विश्वास करना तो सीखो। जब तक किसी पर विश्वास करना नहीं सीखोगे तब तक आगे नहीं बढ़ सकते। पिता जी बताया करते थे कि हम लोगों की खेतीबारी और कारोबार सब विश्वास पर टिके हुए हैं। यह विश्वास ही था कि हम तीन भाइयों को अलग-अलग समय पर किसी दूसरे धर्म (हिंदू) वाले पर विश्वास करके पढ़ने के लिए दिल्ली भेज दिया गया। उस विश्वास को आजतक ठेस नहीं पहुंची। हमारे और उन परिवारों के बीच वह ट्रस्ट (विश्वास) आज भी कायम है।


पर, जब से बाजारवाद हावी हुआ है और प्रगति और सफलता की नई परिभाषाएं गढ़ी जा रही हैं तो उसमें यह शब्द Never Trust सबसे हॉट है। आप अपने फैमिली से लेकर काम करने की जगह और दोस्तों के आसपास इस शब्द का संदर्भ तलाशें तो आसानी से कर लेंगे। नई जीवन पद्धति सिखाने वाले गुरुजन जब लोगों को आत्मकेंद्रित (Self Centered ) होने का ज्ञान बांट रहे हैं तो वह यह कहना नहीं भूलते कि आप किसी पर कैसे विश्वास कर सकते हैं। टीवी सीरियलों के लिए महान लेखक जो कहानियां लिख रहे हैं उनका तो खैर सार ही यही होता है कि अविश्वास हर एक पर, चाहे वह सगा रिश्ता हो या फिर नया बनाया जा रहा है।


राखी के स्वयंवर से लेकर सच का सामना तक में Never Trust का गुणगान है। इस मुद्दे को और आगे बढ़ाएं तो एक दोस्त दूसरे दोस्त से कहता हुआ मिल जाएगा कि - तूने उस पर विश्वास कैसे कर लिया। अपने प्रोफेशन की बात करें तो रिपोर्टरों को बॉस कहते हुए मिल जाएंगे - अरे अपने सूत्र पर इतना विश्वास ठीक नहीं है। Never Trust your sources. और गहराई में जाएं तो बाप का बेटे पर, बेटे का बाप पर, पति का पत्नी पर, प्रेमी-प्रेमिका, प्रेमिका-प्रेमी, डॉक्टर-मरीज, स्टूडेंट्स-टीचर...अनगिनत...कहां तक गिनाएं।


अभी रक्षाबंधन पर एक शहर में दिल दहलाने वाली घटना हुई। भाई अपने बहन के घर राखी बांधने पहुंचा और उसने राखी बांधने की बजाय उस पर मिट्टी का तेल उलट दिया और आग लगा दी। बहन मर गई। बहन प्रौढ़ावस्था में थी। भाई ने पुलिस को बयान दिया कि उसका अपनी बहन पर विश्वास खत्म हो गया था और उसे लगता था कि उसकी पत्नी और बच्चे उसकी बहन की वजह से उससे अलग रह रहे हैं। इतने पवित्र रिश्ते में नेवर ट्रस्ट ने दरार डाल दी। आपके पास भी Never Trust के इससे ज्यादा उदाहरण हो सकते हैं।
विश्वास के संकट पर इससे ज्यादा क्या लिखा जाए, क्योंकि बहुत लंबा-चौड़ा लेख लिखने पर मुझे विश्वास नहीं है कि कोई इसे पूरा पढ़ेगा।


चलते-चलते
मैंने Google पर जाकर जब इस शब्द Never Trust को लिखा तो इसके 10 अंग्रेजी वाक्य निकलकर आए। अब उनमें से किसी एक वाक्य को फिर से Google पर लिखें और मतलब तलाशें तो एक-एक वाक्य के कई लाख पेज वहां लिखे मिल जाएंगे। यानी एक करोड़ से ज्यादा लोगों ने Never Trust पर माथापच्ची की या किसी न किसी रूप में इसका इस्तेमाल किया है। फिर Twitter के Trending Topics में इसका जिक्र क्यों न कर होता।


और हां मैने आपके लिए इस शब्द को लेकर Google पर ही कुछ image भी तलाशी है। उन्हें जरूर गौर फरमाइएगा - Never Trust girls, Never Trust anyone, Never Trust a lady, Never Trust boys, Never Trust a skimy chef, Never Trust a stranger, Never Trust women, Never Trust anything that can think for itself, Never Trust girls quotes, Never Trust woman