Sunday, June 21, 2009

प्यार की संवेदनाओं से खड़ा होता है मजहब


सुप्रसिद्ध लेखिका सादिया देहलवी की सूफीज्म पर हाल ही में एक किताब छपकर आई है। यह इंटरव्यू मैंने उसी संदर्भ में उनसे लिया है। इसे आज के नवभारत टाइम्स में प्रकाशित भी किया जा चुका है। इसे वहां से साभार सहित लिया जा रहा है।
इस्लाम और सूफी सिलसिला एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। इस्लाम के बारे में कहा जाता है कि यह एक मजहब है जिसमें कड़े नियम कानून हैं लेकिन दरअसल सूफीज्म इस्लाम की जान है। मेरी किताब सूफीज्म (प्रकाशक हार्पर कॉलिन्स) इसी पर रोशनी डालती है। सूफी सिलसिले में शानदार शायरी, डांस, आर्ट और सबसे ज्यादा उस प्यार को पाने की परिकल्पना है जिसे पूरी दुनिया अपने-अपने नजरिए से देखती है। बहुत सारे मुसलमानों और ज्यादातर गैर मुस्लिमों के लिए यह स्वीकार करना थोड़ा मुश्किल है कि इस्लाम में सूफी नामक कोई अध्यात्मिक धारा भी बहती है। सूफी संत इसे अहले दिल कहते हैं यानी दिल वाले। उनकी नजर में धर्म का तब तक कोई मतलब नहीं है जब तक कि उसमें प्यार की संवेदनाएं न हों। इसीलिए सूफीज्म को इस्लाम का दिल कहा जाता है।
पर, नई पीढ़ी के लिए इसका मतलब बदलता जा रहा है। बहरहाल, इस्लाम और सूफीज्म को अलग नहीं किया जा सकता। कुरानशरीफ से ही हमें पता चलता है कि इस्लाम वह नहीं है जिसे 1400 साल पहले पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब ने शुरू किया था, इस्लाम तो तब से है जब दुनिया बनी और आदम हमारे पहले पैगंबर थे।
कुछ कट्टरपंथी मुसलमान इस बात को मनवाने पर अड़े हुए हैं कि सूफीज्म इस्लाम में जबरन थोपी गई एक विचारधारा है और यह एक पाप है जिसे मूर्तिपूजा करने वाले हिंदुओं की परंपरा से लिया गया है। इसकी वजह वे यह बताते हैं कि हमारे पूर्वज हिंदू थे और जिस तरह वे भगवान को खुश करने के लिए गाते-बजाते थे, वही काम सूफी लोग इस्लाम में कर रहे हैं। मेरे कुछ मित्र ही इसे अंधविश्वास बताते हैं जब मैं किसी दरगाह या सूफी संतों की मजारों पर जाती हूं। मेंरी किताब पाकिस्तान में भी बिक रही है और मेरे मित्र डरे हुए हैं कि वहां के तालिबानी तत्व मुझे काफिर घोषित कर मेरे खिलाफ फतवा जारी कर देंगे। लेकिन मुझे इसकी परवाह नहीं है। मुझे जो सच लगा और दिखाई दिया, मैंने वही लिखा है। सभी सच बोलने वालों को ऐसे कट्टरपंथी तत्वों के खिलाफ खड़ा होना चाहिए। तालिबानी हों या कोई और कट्टरपंथी ये सब बहके हुए लोग हैं। दरअसल तालिबानी तो वहाबी हैं और वहाबियत सऊदी अरब से इंपोर्ट की गई है। ये लोग इस्लाम के नाम पर कट्टरपन को फैलाना चाहते हैं। ये लोग इस्लाम के नाम पर गतफहमियों को फैला रहे हैं। इन लोगों के खिलाफ खड़ा होना बहुत जरूरी है। यही वजह है कि जब मैं सूफीज्म को क्लासिकल इस्लाम कहती हूं तो यही बताने की कोशिश है कि एक ऐसा इस्लाम जिसमें सभी के लिए मोहब्बत है, भाईचारा है और समानता है। इसलिए मैं इस किताब को इस्लाम के नजरिए से महत्वपूर्ण मानती हूं, इसमें उन तमाम गलतफहमियों को दूर करने की कोशिश की गई है और बताया गया है कि इस्लाम और आतंकवाद एक दूसरे से जुड़े नहीं है बल्कि इस्लाम आतंकवाद के खिलाफ है।
यह सही है कि इस उपमहाद्वीप के तमाम मुसलमानों की तरह मेरे पूर्वज भी हिंदू विचारधारा में विश्वास करते थे। मेरे परिवार के सबसे पहले पूर्वज कोई ओमप्रकाश अरोड़ा थे। मेरे परदादा दिल्ली में 17वीं शताब्दी के मध्य में तब बसे जब यहां मुगलों की हुकूमत थी। हम लोगों का संबंध मुल्तान के पास भैरा नामक जगह से है, जहां सरायकी बोली जाती है। मेरे परिवार के बड़े-बूढ़े बताते हैं कि हमारे समुदाय के कुछ लोग एक बार हरिद्वार में गंगा स्नान के लिए जा रहे थे, रास्ते में उनकी मुलाकात सूफी शम्सुद्दीन तबरिज (ध्यान रखें ये वह संत नहीं थे जिन्हें रूमी ने अपना गुरू बताया है) से हुई। सूफी शम्सुद्दीन ने इन लोगों से कहा कि अगर वे गंगा को यहीं उनके सामने ले आएं तो क्या वे इस्लाम स्वीकार कर लेंगे। उन्होंने यह चमत्कार किया और वे सारे लोग मुसलमान हो गए।
सूफीज्म का रास्ता हमें बताता है कि हम कैसे अपने अहंकार से ऊपर उठकर अध्यात्म के उच्च स्तर को प्राप्त कर सकते हैं। इसकी राह ऐसी है कि जो कभी खत्म नहीं होती और यह हर एक की अपनी इच्छा पर है कि वह राह पर किस हद तक चलना चाहता है। सूफी सिलसिला हमें इसके लिए गाइड करता है लेकिन इसमें ढल जाना इतना आसान भी नहीं है। मैंने जब इस पर काम करना शुरू किया तो खुद मैंने अपने में बदलाव पाया। तमाम सूफी संतों की जीवनियों पर मैंने जब खोज शुरू की तो पाया कि सभी संत कितनी मुश्किल भरे दौर से गुजरे हैं और उन पर किस तरह की मुसीबतें गुजरीं लेकिन उन्होंने अपना रास्ता नहीं छोड़ा और हक व सच्चाई के रास्ते पर जमे रहे। वाकई अगर आप अपने दिल, दिमाग और शरीर को तमाम बातों से ऊपर उठा लें तो आप भी इस रास्ते को पा सकते हैं, बेशक आप पर कितने जुल्मो-सितम होते रहें। महान सूफी संत बाबा फरीद के जीवन से मैं इतनी प्रभावित हूं कि बता नहीं सकती। हालांकि सूफी सिलसिले में मैं दो दशक पहले ही आ गई थी लेकिन अब भी मैं उस स्तर को नहीं पा सकी हूं और कई बार इसमें झटका सा लगता है लेकिन फिर संभल जाती हूं।

मैंने पाया कि अध्यात्मिकता और दुख एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। ईश्वर खुद कहता है कि वह टूटे दिलों में रहता है। सभी सूफी संत मानते हैं कि खुशियां और मुसीबतें सिर्फ ऊपर वाले की मर्जी से मिलती हैं। इसलिए कुछ ऐसा-वैसा होने पर मैं इसे ईश्वर का प्रसाद मान लेती हूं। इसलिए ईश्वर से मेरा संबंध अब बदल गया है। यह संबंध अब प्यार और दोस्ती का है। मैंने अपनी बिखरी हुई जिंदगी में सूफीज्म के कुछ सिद्धांतों को लागू करने की कोशिश की है। ये हैं रिदा (सब कुछ अल्लाह पर छोड़ देना), तवक्कुल (उस पर विश्वास करना), सब्र (धैर्य) और मोहब्बा (प्यार)। इससे मुझे नई ताकत मिली है। अब मुझे मौत से डर नहीं लगता। यह जीवन अब उसके हवाले है और अगर मौत होती है तो उससे मिलने का मौका मिलता है।

फोटो के बारे में

पहला फोटो सादिया देहलवी का है

दूसरे फोटो में सादिया देहलवी जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के वीसी मुशीरुल हसन और मशहूर लेखक खुशवंत सिंह के साथ अपनी किताब के विमोचन के अवसर पर

तीसरे फोटो में सादिया देहलवी अपनी किताब के साथ

(Courtesy: Navbharat Times, You can read this article at navbharat times online website for reader's comment. Link - http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/4681220.cms)

Saturday, June 13, 2009

तू न सलमा है न सीमा... इंसानियत पर तमाचा है तू



उसका नाम सलमा भी है और सीमा भी है। जब वह किसी मुसलमान के घर में झाड़ू-पोंछा करती है तो सलमा बन जाती है और जब किसी हिंदू के यहां काम करती है तो सीमा बन जाती है। यह कहानी दिल्ली जैसे महानगर में काम करने वाली हजारों महिलाओं की है जो अपनी आजीविका के लिए दोहरी जिंदगी जी रही हैं। यह कहानी मेरी गढ़ी हुई भी नहीं है। राजधानी से प्रकाशित एक अंग्रेजी अखबार द हिंदुस्तान टाइम्स ने दो दिन पहले इसे प्रकाशित किया है और जिसने इन्हें पढ़ा वह कुछ सोचने पर मजबूर हो गया। इस कहानी की गूंज दिल्ली के सोशल सर्कल से लेकर राजनीतिक और बुद्धजीवियों के बीच भी रही।
नस्लवाद या रेसिज्म पर तमाम ब्लॉगों और अखबारों में अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका है। यह काम अब भी जारी है। लोग आस्ट्रेलिया के लोगों को पानी पी-पीकर कोस रहे हैं। लेकिन देश की राजधानी में अगर हजारों महिलाओं को इस तरह की दोहरी जिंदगी जीना पड़ रही है तो इस मुद्दे को सामने लाना और इस पर बहस करना जरूरी है। अखबार की उसी रिपोर्ट के मुताबिक दरअसल, वह महिला मुस्लिम ही है और जब वह अपने असली नाम से कई घरों में काम मांगने गई तो उसे काम नहीं मिला और चार बातें सुनने को मिलीं। उसे समझ आ गया कि कुछ जगहों पर उसे सीमा बनकर जीना होगा। ...और उसने उस नाम को अपना लिया और उसका काम चल निकला। उसके चार छोटे-छोटे बच्चे हैं और वह उनको इन नामों के सहारे पैसा कमाकर पालपोस रही है।
इस घटना को आप किस श्रेणी में रखना चाहेंगे- नस्लवाद या फिर दूसरे धर्म से नफरत करने वाले कट्टरपंथियों की जो श्रेणी होती है। आप जो भी नाम देना चाहें।
यह घटना दरअसल किसी न किसी रूप में हमारे नस्लीय चेहरे को ही उजागर करती है। भारत में तमाम लोग कदम-कदम पर नस्लीय हिंसा या नस्लीय बरताव का शिकार हो रहे हैं। नाथद्वारा (राजस्थान) के मंदिर में जब दलितों को पूजा करने से रोक दिया जाता है तो क्या यह सवर्ण जातियों का नस्लीय भेदभाव नहीं है। दलितों पर अत्याचार की कहानियां तो भारत के गांव-गांव में मिल जाती हैं लेकिन अन्य जातियों में भी इसके अंश मौजूद हैं। ब्राह्मणों के विभिन्न गोत्रों तक में यह भेदभाव मिलता है। मुसलमानों में - किसी अंसारी मौलवी के पीछे मस्जिद में सैयद लोग नमाज पढ़ने से सिर्फ इसलिए इनकार कर दें कि वह जुलाहा है, क्या यह नस्लीय भेदभाव नहीं है। जबकि वह मौलवी किसी सैयद जितना ही काबिल है।
हम लोगों की आंखें बंद हैं, हम लोग अपने सोचने-समझने की शक्ति खो बैठे हैं। जिस परिवार में पैदा हुए, उसमें जो चीजें परंपरागत रूप से मिलीं, बस उसी को निभाते चले आ रहे हैं। अभी जब पंजाब में हिंसा का दौर चला तो उसकी आड़ में भी नस्लीय भेदभाव का मामला था। वहां दलितों और जट सिखों के गुरुद्वारों में अंतर है। गुरुनानक जी क्या कह गए हैं, इसको हिंसा फैलाने वाले उस वक्त भूल जाते हैं। लेकिन आस्ट्रेलिया में जो कुछ चल रहा है उस पर घड़ियाली आंसू बहाए जा रहे हैं। भारत के कई शहरों में वहां की हिंसा के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले आगे-आगे थे। अभी इनके किसी लीडर से आप पूछ लें कि भाई किसी दलित के घर एक रात गुजारो और उसकी थाली में खाना खा लो तो मुंह बना लेंगे। ये वे लोग हैं जो राहुल गांधी के ऐसा करने पर मजाक उड़ाते हैं कहते हैं कि यह प्रचारित होने का तरीका है।
बहरहाल, सलमा और सीमा की उस कहानी से इतर भी कई कहानियां हैं जो दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में चलती हैं। इन महानगरों में कुछ अच्छे लोग भी रहते हैं और उन अच्छे लोगों के बीच किसी सलमा को अपना सीमा नहीं रखना पड़ता और किसी सीमा को अपन नाम सलमा नहीं रखना पड़ता।
मेरे एक पत्रकार मित्र हैं जो बिहार के रहने वाले हैं और पूर्वी दिल्ली के यमुनापार इलाके में रह रहे हैं। बातों ही बातों में उन्होंने बताया कि परिवार साथ न होने के बावजूद उन्हें घर जैसे खाने का सुख हासिल है और किसी होटल या ढाबे में नहीं खाना पड़ता। ज्यादा कुरेदने पर उन्होंने बताया कि यमुनापार में घर में आकर खाना बनाने और कपड़ा धोने वाली महिलाएं आसानी से उपलब्ध हैं और वे बहुत कम पैसे लेकर यह काम घर-घर कर रही हैं। स्वाभाविक है कि ज्यादातर गरीब हैं या फिर उन्हें दो वक्त खाने को भी नसीब नहीं है। इनमें ज्यादातर पूर्वी उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और उड़ीसा से हैं, कुछ बांग्लादेशी भी हैं। मेरे मित्र ने यह भी बताया कि उनके घर जो महिला खाना बनाने आती है वह मुसलमान है हालांकि उनके मकान मालिक ने पहले तो ऐतराज किया लेकिन जब मैंने उनसे किराया लेने से मतलब रखने को कहा तो वे शांत हो गए। पत्रकार मित्र का कहना है कि वह भी सलमा-सीमा की कहानी पढ़कर चौंके और जब उन्होंने उस महिला से इस बारे में पूछा तो उसका कहना था कि ये कोई नई बात नहीं है। इसमें बुराई क्या है। पेट के लिए सब करना पड़ता है।



नोट- नस्लीय हिंसा की क्रूर सच्चाई को बयान करने वाली पंजाब के पत्रकार अर्जुन शर्मा एक रिपोर्ट इस लिंक पर पढ़ें - http://www.visfot.com/index.php/news_never_die/1008.html

Tuesday, June 9, 2009

हबीब तनवीर का जाना

मशहूर रंगकर्मी हबीब तनवीर ने ऐसे वक्त में आंख बंद की है, जब भारत का रंगकर्म धीरे-धीरे परिवक्वता की तरफ बढ़ रहा था। खासकर दिल्ली के रंगकर्मी अब किस दादा के पास टिप्स लेने जाएंगे, कुछ समझ नहीं आ रहा। हबीब साहब ऐसे रंगकर्मी नहीं थे जिन्होंने सत्ता या सरकार से समझौता किया हो। चाहे सन् 2000 में जहरीली हवा का उन्होंने मंचन किया हो या फिर 2006 में राज रक्त का मंचन रहा हो। अपनी शैली और अपने अंदाज में उनकी बात कहने का ढंग बड़ा निराला था। पोंगा पंडित के मंचन पर जब आरएसएस और बीजेपी के लोगों ने हल्ला मचाया तो वह इस नाटक को किसी भी कीमत पर वापस लेने को तैयार नहीं हुए। एक नुक्कड़ नाटक के मंचन के दौरान सफदर हाशमी की हत्या (जिसमें कांग्रेस के एक विधायक पर आरोप है) का सबसे तीखा विरोध हबीब साहब ने ही किया था। उसके बाद सहमत जैसी संस्था अस्तित्व में आई।
रंगकर्म के बारे में मेरे जैसे नासमझ लोगों ने जिन लाहौर वेख्या के बाद ही समझ पाए कि दरअसल नाटक की जुबान क्या होती है और सामने बैठे व्यक्ति से किस तरह सीधा संवाद किया जाता है। प्रेमचंद की कहानी पर आधारित उनका नाटक मोटेराम का सत्याग्रह इसकी जीती जागती मिसाल है। दिल्ली में होने वाले तमाम नाट्य आयोजन की आलोचना करने वाले एक स्तंभकार से जब मैंने दो साल पहले पूछा था कि हबीब साहब की शैली की कोई कमी बताएं तो वह कुछ देर चुप रहे। फिर उन्होंने रहस्य खोला कि दरअसल में पिछले कई साल से इस पर काम कर रहा हूं लेकिन कोई कोना पकड़ में ही नहीं आ रहा है। मैं उनकी बात पर बहुत देर तक हंसता रहा। हालांकि दिल्ली जैसे शहर में जहां अरसे तक राम गोपाल बजाज जैसे लोगों का सिक्का चला, वहां हबीब साहब की विधा की आलोचना न हो पाए, यह कम आश्चर्यजनक नहीं है।
बहरहाल, वह अपनेआप में एक संस्था थे और जीते जागते कभी समझौतावादी नहीं बने। जनवादी लेखकों की सभा में भी खूब खुलकर बोलते थे और धार्मिक कट्टरपन पर उनका कोई वार खाली नहीं जाता था। पत्नी मोनिका मिश्रा के देहांत के बाद हबीब साहब कुछ सदमे में रहने लगे थे और शायद अब 85 साल की उम्र में यह तन्हाई उनके जाने का कारण बनी।
बस इतना ही, उनको श्रद्धापूर्वक याद करते हुए। नीचे एक लेख है, उसे जरूर पढ़ें। यह पिछले साल अनुराग वत्स के ब्लॉग पर छापा गया था और इसे मैं वहां से आभार सहित ले रहा हूं। हबीब साहब पर इससे ज्यादा प्रासंगिक उनके इंतकाल के दूसरे दिन और कुछ भी नहीं हो सकता।

आओ, देखो सत्य क्या है




-हृषीकेश सुलभ

अब छियासी के हो चुके हबीब तनवीर को याद करना सिर्फ रंगकर्म से जुड़े एक व्यक्ति को याद करने की तरह नहीं है। दसों दिशाओं से टकराते उस व्यक्ति की कल्पना कीजिए, जिसके सिर पर टूटने को आसमान आमादा हो, धरती पाँव खींचने को तैयार बैठी हो और कुहनियाँ अन्य दिशाओं से टकराकर छिल रही हों; और वह व्यक्ति सहज भाव से सजगता तथा बेफ़िक्री दोनों को एक साथ साधकर चला जा रहा हो। अब तक कुछ ऐसा ही जीवन रहा है हबीब तनवीर का। भारतेन्दु के बाद भारतीय समाज के सांस्कृतिक संघर्ष को नेतृत्व देनेवाले कुछ गिने-चुने व्यक्तित्वों में हबीब तनवीर भी शामिल हैं। भारतेन्दु का एक भी नाटक अब तक मंचित न करने के बावजूद वे भारतेन्दु के सर्वाधिक निकट हैं। उन्होंने लोक की व्यापक अवधारणा को अपने रंगकर्म का आधार बनाते हुए अभिव्यक्ति के नये कौशल से दर्शकों को विस्मित किया है।

विस्मय अक्सर हमारी चेतना को जड़ बनाता है, पर हबीब तनवीर के रंग कौशल का जादू हमें इसलिए विस्मित करता है कि उनकी प्रस्तुतियों में सहजता के साथ वे सारे प्रपंच हमारे सामने खुलने लगते हैं, जो सदियों से मनुष्य को गुलाम बनाए रखने के लिए मनुष्य द्वारा ही रचे जा रहे हैं। इन प्रपंचों के तहख़ानों में निर्भय होकर उतरना और सारे गवाक्षों को खोलकर आवाज़ लगाना कि आओ, देखो सत्य क्या है; आज सरल काम नहीं है। रचनाकर्म में इसके दोहरे ख़तरे होते हैं। एक तो कलात्मकता के ह्रास का ख़तरा हमेशा बना रहता है और दूसरी ओर प्रपंच रचनेवालों की हिंसा का सामना भी करना पड़ता है। हबीब तनवीर इन दोनों ख़तरों से जूझते हैं। कलात्मकता के स्तर पर वह निरंतर उन रूढ़ियों को तोड़ते हैं, जिन्होंने आज़ादी के बाद के हिन्दी रंगमंच का नैसर्गिक विकास नहीं होने दिया। तथाकथित बौद्धिकता और आभिजात्यपन की लालसा में इन रूढ़ियों के आधार पर हिन्दी रंगमंच का ऐसा स्वरूप उभरा, जो आज सामान्य जनता की सांस्कृतिक भूख मिटाने में सक्षम नहीं है।

हबीब तनवीर ने इन रूढ़ियों को तोड़ते हुए नये प्रयोग किए और प्रयोगों की सफलताओं- असफलताओं के बीच से अपनी प्रस्तुतियों के लिए नयी रंगभाषा और नयी रंगयुक्तियों की खोज की। उन्होंने अपने नाटकों की केन्द्रीय चेतना से कभी कोई समझौता नहीं किया। अपने हर नाटक को अपने समय और समाज के प्रति उत्तरदायी बनाए रखा। समाज के सारे प्रपंचों और अंतर्द्वंद्वों को उजागर करते हुए वे उस शक्ति से न कभी भयभीत हुए न ही समझौता किया, जो मनुष्यता के विरोध में संगठित होकर हिंसा करती है।

हबीब साझा संस्कृति की वकालत करते रहे हैं। धार्मिक आडम्बरों-बाह्याचारों-कट्टरताओं के ध्वजवाहकों की क्रूरताएँ हों या पूँजी के मद में बौरायी शक्तियों की हिंसा - सबका उन्होंने सामना किया। पुनरुत्थानवाद और शुचितावाद को उन्होंने एक सिरे से नकारा। अपने रंगकर्म के आरम्भिक काल से ही हबीब तनवीर इस बात बल देते रहे हैं कि रंगमंच को आलोचनात्मक होना चाहिए। रजनीतिक दलों की नकेल पहने बिना राजनीतिक विचारों से लैस रंगमंच की उनकी कल्पना को आरम्भिक दौर में संदेह की नज़र से देखा गया। पर जैसे-जैसे उन्होंने अपने नाटकों के लिए नयी युक्तियों की खोज की और नाटकों में विचार के स्तर पर मनुष्य की पक्षधरता का संघर्ष तेज़ किया, फलस्वरूप रंगकर्मियों-दर्शकों का एक बड़ा तबका उनकी तरफ आकर्षित हुआ।

जिस इप्टा आन्दोलन ने अपनी सक्रियता से देखते-देखते समग्र भारत को एक सूत्र में बाँध दिया था, राजनीतिक बँटवारे के बाद उसका बिखरना एक सदमे की तरह था। इस सांस्कृतिक सदमे से उबरने के लिए अधिकांश कलाकारों ने सृजन का ही रास्ता अपनाया। इप्टा के साथ जुड़े रहने का रंगमंचीय अनुभव हबीब तनवीर के काम आया और साथ ही राजनीतिक अंतर्द्वंद्वों से उपजे संकटों और निराशा ने नये रास्तों की खोज के लिए विवश किया। मानवतावादी विचारों तथा जीवन की संवेदना की अभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्र राहों की निर्मिति के संघर्ष ने हबीब तनवीर को इस सदमे से मुक्ति दी। रॉयल एकेडमी ऑफ़ ड्रामेटिक आट्र्स (राडा) में प्रशिक्षण के दौरान अपनी भाषा में रंगकर्म करने की उनकी आस्था ने प्रशिक्षण के उत्तरार्द्ध के प्रति उनके मन में अनास्था जगा दी। उन्होंने राडा छोड़ने का निर्णय लिया, जो असामान्य और जोखिम भरा था। यह जोखिम सब नहीं उठा सकते। अपनी रंग परम्परा और भाषा के भीतर बहुत गहरे उतरकर उसकी शक्ति की पहचान किए बगैर यह जोखिम नहीं उठाया जा सकता।

हबीब तनवीर को अपनी रंग परम्पराओं तथा अपनी भाषा की पहचान थी और इनकी शक्ति पर विश्वास था। उन्होंने यह जोखिम उठाया और राडा छोड़कर ब्रिस्टल ओल्ड विक थियेटर में प्रशिक्षण लेने लगे। यहाँ उन्हें डंकन रास मिले, जिन्हें वह आज भी अपना गुरु मानते हैं। डंकन रास ने उन्हें नाटक के पहले पाठ के दरम्यान प्राप्त नाटक की चेतना और मूल प्रयोजन से जुड़े रहने का हुनर सिखाया। हबीब तनवीर ने ब्रिस्टल ओल्ड विक के बाद ब्रिटिश ड्रामा लीग में प्रशिक्षण प्राप्त किया। फिर यूरोप की यात्रा पर निकले। एक ऐसी यात्रा, जिसे संचालित कर रही थी दुनिया की विविध रंग छवियों को देखने-समझने की बेचैनी।

इस यात्रा ने उनकी इस धारणा को ताक़तवर बनाया कि शब्द और संस्कृति की रचनात्मक दुनिया में उस स्थान और पर्यावरण का बहुत महत्त्व होता है, जहाँ आप जनमते और पालित-पोषित होते हैं। सृजनात्मकता के लिए तमाम उर्वरा शक्तियाँ आपकी अपनी ज़मीन में ही छिपी होती हैं। आज़ादी के बाद रंगमंच के संदर्भ में परम्परा के उपयोग को लेकर चलनेवाली बहस को हबीब तनवीर ने अपने रंगकर्म से तीव्र किया और धुँधलके को छाँटने के लिए सूत्र दिए। परम्परा के बीच से जीवन को गतिशील बनानेवाली आधुनिकता के तत्त्वों को चुनकर हबीब तनवीर ने एक नये रंग परिदृश्य की रचना की।

हबीब तनवीर कला को जीवन का अंग मानते हैं। एक ओर शैली, तकनीक और प्रस्तुतिकरण के सम्पूर्णता में देशज बने रहने पर बल देते हैं, तो साथ-साथ इस बात पर भी बल देते हैं कि इसे कथ्यात्मक रूप से विश्वजनीन, आधुनिक तथा समसामयिक होना चाहिए। वह महानगरों में मंचित होनेवाले आँचलिक मुहावरों वाले अपने नाटकों के पक्ष में आक्रामकता के साथ यह तर्क रखते हैं कि, '' मैं इस तथाकथित सभ्य समाज के बनावटी और ओढ़े हुए आवरण को उतार देना चाहता हूँ। '' हबीब तनवीर को न तो परम्परा का दास बनना स्वीकार्य है और न ही परम्परा से मनमानी करना। वह सृजनशीलता और मानवीय मूल्यों के मूल सरोकारों से जुड़ी परम्परा के उन जीवित अंशों के उपयोग की वकालत करते हैं, जो कलात्मकता को भ्रष्ट न करें।

मृच्छकटिक पहला नाटक था, जिसे प्रस्तुत करते हुए हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ के पारम्परिक रंगकर्म की युक्तियों, बोली, शैली और कलाकारों का प्रयोगधर्मी उपयोग किया। हबीब तनवीर ने आगा हश्र कश्मीरी, विशाखदत्त के अलावा मौलियर, ब्रेख्त , लोर्का, ऑस्कर वाइल्ड, शेक्सपीयर, गोल्डनी आदि के नाटकों को मंचित किया। उन्होंने ग़ालिब के जीवन पर भी नाटक किया। इस कालावधि में उन्हें वैसी सफलता नहीं मिली, जैसी आगरा बाज़ार के मंचन से मिली थी। पर उनकी प्रयोगधर्मिता बहस के केन्द्र में रही।

गाँव का नाम ससुराल, मोर नाम दामाद ने उन्हें एक बार फिर सफल निर्देशक के रूप में स्थापित किया। यहीं से उन्होंने अपने रंगकर्म के लिए एक ऐसे रास्ते को पकड़ा या ऐसी दिशा की खोज की, जिसके कारण उन्हें बाद के दिनों में अपार सफलता और महत्त्व प्राप्त हुआ। चरनदास चोर ने उनको विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित किया। अपने नाटकों की प्रस्तुतियों से हबीब तनवीर बार-बार अपनी सृजनात्मकता का अतिक्रमण करते हैं। यह एक दुस्साहस भरा काम है। अक्सर बड़े नाम इससे बचना चाहते हैं क्योंकि अपने ही रचे को फिर से रचकर आगे निकल जाना बहुत कठिन होता है। असफलता का भय ऐसा करने से रोकता है। पर हबीब तनवीर की प्रयोगधर्मिता असफलताओं से जूझती रही है।

(साभार -http://vatsanurag.blogspot.com/2008/09/blog-post_29.html)