Saturday, May 16, 2009

जय हो ...जय हो...जनता जनार्दन की

चुनाव नतीजे आ चुके हैं, आपने जिन्हें और जिस पार्टी को चुना, वह सब सामने है। हालांकि जो भी 50 या 55 फीसदी लोगों ने देश भर में वोट डाले और उसके आधार पर आए नतीजे किस तरह से बहुमत की आवाज है, इस पर बहस होती रही है और होती रहेगी लेकिन इन नतीजों के आधार पर जो भी तस्वीर उभरी है, उसे तो हम सभी लोगों को स्वीकार करना पड़ेगा। लेकिन यह बहुत साफ है कि देश की आधी जनता ने वोट डाले और उसने अलग-अलग पार्टियों को वोट दिए, तो क्या यह मान लिया जाए कि यह जनता का पूरा फैसला नहीं है। यह सही है कि बीजेपी को सांप्रदायिक राजनीति करने के कारण मैं ही क्या तमाम लोग पसंद नहीं करते। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि कांग्रेस की नीतियों पर जनता ने मुहर लगा दी है। बेहतर तो यह होता कि देश भर में 65 से 70 फीसदी मतदान होता और उसमें जो पार्टी सबसे ज्यादा सीटें लेकर आती तो शायद जनता के मूड का और बेहतर पता चलता।
लेकिन यह कम संतोष की बात नहीं है कि देश की आधी जनता जिसने वोट डाले, वह चाहती है कि क्षेत्रीय पार्टियों की जगह राष्ट्रीय पार्टियों को ही केंद्र की सत्ता सौंपी जाए। क्योंकि मुलायम, लालू प्रसाद यादव, मायावती से लेकर ठाकरे खानदान तक क्षेत्रीयता और जातिवाद की राजनीति करते हैं। देश की सेहत के लिए यह खतरनाक संकेत है। क्योंकि एक तरफ तो कुछ लोग सांप्रदायिक राजनीति कर हिंदू-मुसलमानों के वोट का ध्रुवीकरण कराते हैं तो कुछ लोग जातिवाद और क्षेत्रवाद की फसल काटते हैं। इसलिए 2009 का लोकसभा चुनाव इस मायने में अनोखा रहा कि लोग केंद्र में स्थिर सरकार चाहते हैं और किसी एक पार्टी को पूरी तरह जवाबदेह बनाना चाहते हैं।


बीजेपी के लिए सबक
बीजेपी में एक बेहतर पार्टी बनने के तमाम गुण हैं और इस पार्टी में कुछ अच्छी छवि के नेता भी हैं लेकिन अखंड हिंदू राष्ट्र की कल्पना में डूबी में इस पार्टी को जमीनी हकीकत अब भी नहीं मालूम है। यह सही है कि किसी धर्म विशेष का कार्ड खेलकर आप पीलीभीत सीट तो जीत सकते हैं लेकिन देश की जनता को नहीं जीत सकते। अगर बीजेपी अपनी स्वीकार्यता यूपी के साथ-साथ केरल और आंध्र प्रदेश में बढ़ाना चाहती है तो उसे सही मायने में अखिल भारतीय पार्टी बनना होगा और सांप्रदायिक राजनीति छोड़कर, हिंदू-मुसलमान के बीच खाई बढ़ाने के बजाय कम करने की कोशिशें करनी होंगी। शायद उसे लोग एक दिन इतना बहुमत दे दें कि वह अपने बूते केंद्र की सरकार बना ले। आप सभी लोगों ने जो आज दिन भर टीवी से चिपके रहे और कल अखबारों में शायद इतने माइक्रो लेवल का विश्लेषण न पढ़ सकें कि किस सीट पर दरअसल बीजेपी को कितनी बड़ी या छोटी हार मिली है। यह विश्लेषण यहां भी इस समय संभव नहीं है लेकिन मैं आपको यह बताना चाहता हूं कि जिन राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं, वहां के विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से भी बीजेपी हार गई है। मसलन दिल्ली जैसे शहर में जहां से इसके तमाम बड़े नेता जनसंघ के जमाने से लगातार चुनाव जीतते रहे हैं, इस बार वहां भी वह हार गए। दिल्ली पूरी तौर पर शहरी इलाका है। यहां के शहरी लोगों ने, जो आम तौर पर बीजेपी के ही समर्थक माने जाते हैं ने इस बार कांग्रेस को वोट दिया। यह दर्शाता है कि बीजेपी सिर्फ भावनाओं में बहाकर बहुत ज्यादा दिन तक इस तरह के वोटरों को आकर्षित नहीं कर सकती। यह बहुत बड़ा सबक बीजेपी को उसके शहरी वोटरों ने सिखाया है।
मुझे चुनाव के समय का एक फोटो याद आ रहा है जो मैं यहां आप लोगों के अवलोकन के लिए लगा रहा हूं। वह फोटो यह था कि दिल्ली के जामा मस्जिद इलाके में अपना प्रचार करते समय बीजेपी प्रत्याशी बिजेंद्र गुप्ता ने मुसलमानों का दिल जीतने के लिए टोपी पहनकर कबूतर भी उड़ाए। पता नहीं इसका क्या मतलब था। बेरोजगार मुसलमानों के पास काम तो कुछ है नहीं है तो वे टाइम पास करने के लिए कबूतर उड़ाते हैं। हो सकता है कि कुछ लोगों की यह हॉबी हो लेकिन मुझे नहीं लगता कि किसी समुदाय को इस रूप में आप पहचानें और उसका दिल जीतने के लिए कबूतर उड़ाएं। नतीजा सामने है, बिजेंद्र गुप्ता बुरी तरह हारे और अब उनके लिए पूरा समय है कि वह कबूतर उड़ाएं लेकिन मैं जानना चाहता हूं कि क्या वह अब भी मुस्लिम टोपी पहनकर रोजाना जामा मस्जिद इलाके में कबूतर उड़ाने जाया करेंगे। इस तरह की सस्ती लोकप्रियता से आप किसी भी समुदाय को नहीं जीत सकते।
बीजेपी ने एक गलती और की है, वह है गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से देशभर में जहरीला भाषण दिलाकर। गुजरात में स्टेट मशीनरी के इस्तेमाल से बेशक बीजेपी ने वहां कुछ सीटें हासिल कर लीं और उसे मोदी के प्रयोगशाला की सफलता मान ली गई लेकिन वही करिश्मा मोदी दिल्ली, यूपी, महाराष्ट्र या उड़ीसा में तो नहीं कर पाए। दरअसल, बीजेपी एकसाथ कई रणनीति पर काम करती है लेकिन उसके मुख्य रणनीतिकार और पेशे से वकील अरुण जेटली अब जरूर अपना सिर धुन रहे होंगे।
कुल मिलाकर इस नतीजे का सम्मान किया जाना चाहिए - कि देश की जनता ने राष्ट्रीय पार्टी की सरकार बनाने के लिए वोट दिया, कि देश की जनता को भावनाओं, जातिवाद और क्षेत्रवाद की राजनीति में उलझाकर वोट हासिल नहीं किया जा सकता, कि जनता के सामने सबसे बड़ा मुद्दा विकास ही है। इसका जीता-जागता उदाहरण है बिहार, जहां के लोगों ने नीतिश कुमार के नेतृत्व में एनडीए को वोट दिया। वहां लालू और पासवान की सारी रणनीति को लोगों ने अंगूठा दिखा दिया। यह सब इसलिए संभव हुआ कि नीतिश ने वहां विकास कार्य किए, उसका फायदा जनता को सीधा पहुंचा। गुजरात में जिस विकास की बात बीजेपी के रणनीतिकार और नेता करते रहे हैं तो वहां बीजेपी ने क्लीन स्वीप क्यों नहीं किया। उत्तराखंड और मध्य प्रदेश में भी बीजेपी की सरकार है तो वहां बीजेपी को क्यों नहीं बढ़त मिली।
बहरहाल, इस चुनाव नतीजों की चर्चा तो चारो तरफ है, लंबे-लंबे विश्ललेषण भी पढ़ने को मिलेंगे लेकिन फिलहाल तो इस लोकतंत्र की जय हो... के साथ बात खत्म करना चाहता हूं।

Tuesday, May 12, 2009

अब पछताने से फायदा क्या...

भारतीय राजनीति का ग्रैंड तमाशा शुरू होने में कुछ घंटे बाकी हैं। बेशक आपने वोट डाला है या डालने जा रहे होंगे लेकिन आपको हक नहीं है कि आप तय करें कि किसकी सरकार केंद्र में बननी चाहिए। इसे तय करेंगे भारतीय राजनीति के कुछ उभरते तो कुछ खतरनाक किस्म की राजनीति करने वाले नेता। बस 13 मई को आखिरी दौर का मतदान और बाकी है। यानी शाम को या रात को जब टीवी पर किसी न्यूज चैनल को देख रहे होंगे तो इसकी आहट महसूस कर सकेंगे। हालांकि तमाशा कई दिन से शुरू हो चुका है लेकिन अब वह क्लाइमैक्स पर पहुंचने वाला है। इस बार टीवी चैनलों के जरिए माइंड गेम भी खेला जा रहा है।
चुनाव की घोषणा के फौरन बाद भारतीय मीडिया ने यह पहले दिन ही लोगों को बता दिया था कि इस बार किसी का भी भाग्य जग सकता है। भारत उदय हो या न हो नेता उदय जरूर हो जाएगा। चुनाव प्रचार ने जोर पकड़ा और बयानबाजी शुरू हुई तो यह माइंड गेम में बदल गई। कुछ नेता तो बयान ही इसलिए दे रहे थे कि देखते हैं सामने वाले पर क्या असर रहता है। माइंड गेम खेलने में कांग्रेस सबसे आगे रही और बीजेपी दूसरे नंबर पर।
आतंकवाद को बीजेपी मुद्दा न बना सके, कांग्रेस ने कंधार कांड को सबसे ज्यादा उछाला और बीजेपी बचाव की मुद्रा में नजर आई। उम्मीद तो यह थी कि सांप्रदायिकता की राजनीति करने वाली जिस बीजेपी का मुद्दा आतंकवाद होना चाहिए था वह उससे पीछे हटती नजर आई। मंदिर की बात तो दूर बीजेपी ने देश में हुई आतंकवादी घटनाओं तक का जिक्र भूल गई। मुंबई में हुए आतंकवादी हमले को अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं। बीजेपी ने ब्लैकमनी का मुद्दा उछालकर गांधी खानदान को कटघरे में लाने की कोशिश की लेकिन पब्लिक में वह मुद्दा चला नहीं और देश के जो उद्योग घराने बीजेपी को चंदा देते हैं, उन्हें उसका उल्लेख पसंद नहीं आया। कई बिजनेस फोरम की मीटिंग में ये बाते कई बड़े उद्योगपतियों ने खुलकर कहीं और यह तक चुटकी ली कि फिर तो हर पार्टी के नेता की संपत्ति की जांच होनी चाहिए कि वह पहले क्या थी और बाद में क्या हुई। बहरहाल, इस मुद्दे पर हम सब को नजर रखनी है कि और ठीक एक महीने बाद हम लोग केंद्र की चुनी हुई सरकार से इस बारे में पूछेंगे कि वह क्या करने जा रही है।
यह तो हुई मुद्दे के माइंड गेमं की बात लेकिन कांग्रेस को इस बार साफ लगा कि बाजी उसके हाथ से फिसलने जा रही है तो उसने एक ऐसा तीर मारा जो एनडीए गठबंधन को लगा और बेचारे नीतीश कुमार को लंबी-चौड़ी सफाई देनी पड़ी। कांग्रेस के कई नेताओं से नीतिश की तारीफ कराकर कहलवाया गया कि नीतिश यूपीए में आ सकते हैं। नीतिश को सफाई देने के लिए एनडीए की लुधियाना रैली में आना पड़ा और विवादास्पद नरेंद्र मोदी से हाथ मिलाना पड़ा। बस फिर क्या था, अब लालू प्रसाद यादव व राम विलास पासवान ने घेर लिया और नीतिश पूरे बिहार में मुसलमानों को समझा रहे हैं कि मोदी से उन्होंने हाथ तो शिष्टाचारवश मिलाया था लेकिन मुसलमानों के गले यह बात नहीं उतर रही। क्योंकि उसी नीतिश को उन्होंने मंच से कहते सुना था कि वह मोदी को बिहार में घुसने नहीं देंगे। अब उससे गलबहियां धोखा नहीं तो और क्या है। इस सारे प्रकरण में अगर किसी की भूमिका बहुत स्पष्ट रही है तो वह वामपंथी दल हैं।
जिन्होंने पहले दिन ही कह दिया कि या तो सरकार तीसरा मोर्चा बनाएगा या फिर उनकी मदद से कोई सेकुलर पार्टी। जाहिर है कि उनका इशारा कांग्रेस की तरफ है। लेकिन इस बार उनका समर्थन पाने के लिए कांग्रेस को थोड़ी मेहनत और कड़ी शर्तें माननी होंगी। ...तो अगर आपको पछतावा है कि वोट देकर मैंने ये क्या किया तो मित्रों भूल जाइए कि आप भविष्य में भी ऐसा कुछ तय कर पाएंगे। यह तल्ख सच्चाई है कि आपने और हम सभी ने वोट देते समय पहले यह देखा है कि प्रत्याशी किस जाति का है, उसका धर्म क्या है। भारत निर्माण और इंडिया शाइनिंग सब ढकोसला है। जब तक क्षेत्रीय पार्टियों का नासूर खत्म नहीं होता, यही सब चलता रहेगा। मिडिल क्लास स्वार्थी हो चला है, लेकिन उसको संरक्षण देने वाली दो पार्टियों कांग्रेस और बीजेपी में इतना बूता नहीं है कि वे अपने दम पर सरकार बना सकें। इसीलिए जातिवाद और धर्म को हर चुनाव में क्षेत्रीय पार्टियां भुनाएंगी।

Friday, May 8, 2009

हिंदुत्व की धारणा विकास विरोधी क्यों है

-टी.के. अरुण

नरेंद्र मोदी इस समझ को सिरे से खारिज करते हैं कि हिंदुत्व के साथ विकास की कोई संगति नहीं बैठ सकती। गुजरात की प्रगति को वे अपनी बात के सबूत के तौर पर पेश करते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि गुजरात का प्रशासन गतिशील है और यह भारत के सबसे तेजी से आगे बढ़ रहे राज्यों में एक है। भारतीय उद्यमी जगत के कई प्रमुख नाम तो मोदी को एक दिन भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर देखना चाहते हैं। फिर विकास को मुद्दा बनाकर हिंदुत्व के बारे में खामखा की एक बहस खड़ी करने का भला क्या औचित्य है? औचित्य है, क्योंकि हिंदुत्व विकास की मूल प्रस्थापना का ही निषेध करने वाली अवधारणा है।
हिंदुत्व निश्चय ही हिंदू धर्म से पूरी तरह अलग चीज है। हिंदू धर्म एक सर्व-समावेशी, वैविध्यपूर्ण, बहुदेववादी धर्म और संस्कृति है, जिसका अनुसरण भारत के 80 प्रतिशत लोग करते हैं। इसके बरक्स हिंदुत्व भारतीय समाज को गैर-हिंदुओं के प्रति शत्रुता के आधार पर संगठित करना चाहता है और भारतीय राष्ट्रवाद को कुछ इस तरह पुनर्परिभाषित करना चाहता है कि धार्मिक अल्पसंख्यक इसमें दूसरे दर्जे के नागरिक बन कर रह जाएं।
क्या यह घिसा-पिटा आरोप नहीं है? क्या सांप्रदायिकता का इस्तेमाल देश की कमोबेश सारी ही पार्टियां वोट जुटाने की अपनी मुहिम में एक कारगर उपाय के तौर पर नहीं करतीं? 1984 के सिख-विरोधी दंगों की अनुगूंज आज भी इतनी तीखी है कि कांग्रेस को अपने संसदीय उम्मीदवार जूते की नोक पर बदलने पड़ जाते हैं। फिर सांप्रदायिकता के मुद्दे पर सिर्फ बीजेपी को ही इस तरह अलग-थलग करने का क्या मतलब है?
सांप्रदायिकता का जनद्रोही उपयोग चाहे कोई भी राजनीतिक पार्टी करे, यह देश के लिए विनाशकारी है। इस घृणित चीज की भत्र्सना ही की जानी चाहिए। लेकिन जो पार्टी एक समुदाय को अपने से बाहर के लोगों के प्रति घृणा के आधार पर ही संगठित करती हो, वह निश्चय ही उन सारी पार्टियों से अलग है जो वोट झटकने के औजार के रूप में सांप्रदायिकता का इस्तेमाल करती हैं।
इस बात का सबूत क्या है कि बीजेपी का मुख्य अजेंडा सांप्रदायिकता ही है? इसका सबसे ताजातरीन और सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाला सबूत वरुण गांधी का अपने मुस्लिम विरोधी आग-लगाऊ भाषणों के बाद इस पार्टी के नए पोस्टर बॉय के रूप में उभरना है। बीजेपी नेतृत्व ने एक उम्मीदवार के रूप में न सिर्फ पूरी गर्मजोशी के साथ वरुण का अनुमोदन किया है, बल्कि आम पार्टी कार्यकर्ताओं ने भी एक नए नायक और स्टार प्रचारक के रूप में उनका स्वागत किया है। बीजेपी के सांप्रदायिक अजेंडा का एक और उदाहरण कंधमाल में संघ परिवार के संगठनों और कार्यकर्ताओं द्वारा ईसाइयों के खिलाफ किया गया संगठित हमला है। इस हमले का नेतृत्व जिस व्यक्ति ने किया था, वह आज इसी इलाके से बीजेपी का उम्मीदवार है।
बीजेपी उन संगठनों के परिवार का एक हिस्सा है, जो आरएसएस से प्रेरणा लेते हैं और उसी के द्वारा नियंत्रित होते हैं। और आरएसएस ने यह कहने में अब तक कोई हिचक नहीं दिखाई है कि उसका मिशन भारत को एक ऐसे हिंदू राष्ट्र में बदलना है, जहां- इसके सिद्धांतकार गोलवलकर के शब्दों में, गैर-हिंदुओं को ज्यादा से ज्यादा दूसरे दर्जे के नागरिकों के रूप में ही बर्दाश्त किया जा सकता है।
अगर बीजेपी एक सांप्रदायिक पार्टी है भी, तो यह भला विकास विरोधी कैसे हो गई? इस सवाल का जवाब दो स्तरों पर देना जरूरी है। एक, गैर-हिंदुओं को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की परियोजना में जो सामाजिक हिंसा निहित है, वह आर्थिक गतिविधियों के व्यवस्थित संचालन को मटियामेट कर सकती है। और दो, विकास की मूल धारणा ही समाज के किसी भी हिस्से के बहिष्कार और उत्पीडऩ का पूरी तरह निषेध करती है।
इन पंक्तियों का लेखक यह मानने को कतई तैयार नहीं है कि नई सड़कों, बंदरगाहों, कारखानों और बिजली घरों का निर्माण ही विकास है। न ही यह कि भौतिक समृद्धि किसी खास राजनीतिक विचारधारा की उपज होती है। इनमें बाद वाले पहलू का कुछ और खुलासा करने के लिए पिछली सदी के एक प्रासंगिक उदाहरण का जिक्र जरूरी है। 1930 के दशक में तीन नेता पूरे जोशोखरोश के साथ विकास कार्य में जुटे हुए थे। अमेरिका में मंदी की कमर तोडऩे वाले एफ.डी. रूजवेल्ट, आर्य नस्ल का दायरा बढ़ाने के लिए जरूरी सैनिक-औद्योगिक शक्ति हासिल करने में जुटा हिटलर, और अपरिहार्य साम्राज्यवादी हमले के सामने पितृभूमि की रक्षा के लिए काम कर रहे स्टालिन। इन तीनों ने ही नई सड़कें, कारखाने, बिजली घर और सैन्य शक्ति खड़ी की और विकास के तमाम बाहरी प्रतीकों के मामले में इनका कोई सानी नहीं था। तीनों ने ही विकास को एक साझा प्रयास की तरह लिया था, लेकिन इनके राजनीतिक उद्देश्य एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थे।
अल्पसंख्यकों को तबाह करने वाले नाजी अपनी संपन्नता को ज्यादा समय तक बचा नहीं पाए। संसार को यहूदियों से मुक्त कराने की उनकी परियोजना आखिरकार खुद जर्मनी की तबाही का सबब बनी। यह खतरा उन सारी विकास दृष्टियों में निहित है जो समाज के कुछ हिस्सों को विकास से बाहर रखकर उनका दमन करना चाहती हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि विकास का अर्थ अंतत: केवल भौतिक समृद्धि नहीं होता।
मानव जाति अन्य सभी जीव जातियों इस मामले में अलग है कि इसमें अपने पुनरुत्पादन के अलावा नई भौतिक और सांस्कृतिक सामग्री सृजित करने की क्षमता भी मौजूद होती है। नई चीजें रचने और जीवन को पहले से ज्यादा समृद्ध बनाने की यह अद्वितीय क्षमता न सिर्फ इस बात पर निर्भर करती है कि लोगों के बीच आपसी संपर्क कैसा है, बल्कि इस पर भी कि प्रकृति के साथ उनकी अंत:क्रिया कैसी है, जिससे उत्पादन के सारे जरूरी संसाधन उन्हें जुटाने होते हैं।
सच्चा विकास लोगों की रचनात्मकता को उन्मुक्त करने में है, और इसे केवल उत्पीडऩ को समाप्त करके और वंचित तबकों को ज्ञान, स्वास्थ्य, सुरक्षा और भौतिक ढांचे जैसे सृजन के साधन मुहैया करा कर ही अंजाम दिया जा सकता है। यही कारण है कि स्वतंत्रता और विकास परस्पर जुड़ी हुई चीजें हैं। गैर-हिंदुओं को किनारे करके हिंदुओं की व्यापक बहुसंख्या का विकास संभव नहीं है। सांप्रदायिक विभाजन केवल उस जमीनी एकता को तोड़ता है, जो मुक्ति की डगर पर बढऩे के लिए बहुत जरूरी है। हिंदुत्व ठीक इसी वजह से विकास-विरोधी है।

लेखक इकनॉमिक टाइम्स- हिंदी (दिल्ली) के संपादक हैं

नवभारत टाइम्स से साभार सहित

Wednesday, May 6, 2009

...तो किसको वोट देंगे आप ?

चुनाव का आखिरी दौर खत्म होने में कुछ घंटे बचे हैं। देश के एक बड़े हिस्से में वोट पड़ चुके हैं और दिल्ली, हरियाणा व यूपी के कुछ हिस्सों में 7 मई को वोट पड़ने वाले हैं। एक और दौर इसके बाद होगा और तब कहीं जाकर नतीजे आएंगे। आपने अपने शहर में जहां-तहां और समाचारपत्रों, टीवी और रेडियो पर सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के नारों और वायदों को जरूर सुना होगा। हो सकता है कि आपने इसमें दिलचस्पी न ली हो लेकिन एकाध बार नजर जरूर मारी होगी।...तो बताइए कि आप किसको वोट देने जा रहे हैं या फिर आपने किसको वोट दिया है।...मुझे क्या आपको भी पता है कि इस सवाल का जवाब कोई नहीं देने वाला। वोट देना एक नितांत निजी फैसला होता है। जाहिर है कोई नहीं बताएगा।
फिर मेरी इस बात की कवायद का मकसद क्या है। मुद्दे पर आता हूं। सभी राजनीतिक दलों के वायदों पर गौर कीजिए, इरादा तो आप उनका जानते ही हैं। केंद्र में चूंकि यूपीए की सरकार है और कांग्रेस उसे चला रही है तो सबसे पहले कांग्रेस की ही बात।
...काला धन हम ही वापस लाएंगेः मनमोहन सिंह
...विदेशी बैंकों में पड़ा काला धन यूपीए सरकार वापस नहीं ला सकी। हम लेकर आएंगेः बीजेपी के पीएम इन वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी
...जनता को पता है किसके पास काला धन हैः वाम दल
...कांग्रेसी भ्रष्ट हैं, काला धन भी उन्हीं का है। हम इनको बेनकाब करेंगेः बीएसपी
--काला धन तो बीजेपी नेताओं के पास भी हैः मुलायम
यानी जितनी पार्टियां हैं, काले धन के बारे में उतनी तरह की बातें कर रही हैं। यह बात नई नहीं है। इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, वी. पी. सिंह, चंद्रशेखर, अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में इस तरह की नारेबाजी चलती रही। राजीव गांधी के समय में तो बीजेपी नेताओं ने यह तक दावा किया था कि बोफोर्स तोप दलाली का पैसा स्विस बैंक में जमा है। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी ने एनडीए सरकार को पूरे पांच साल तक चलाया, हमारे जैसे इस देश के करोडो़ लोगों को उम्मीद थी कि वाजपेयी या एनडीए सरकार इस काले धन को देश में वापस लाएगी। लेकिन उसे लाना तो दूर उसका जिक्र तक नहीं किया। अब जब मनमोहन सिंह की सरकार का कार्यकाल खत्म होने में चंद दिन बचे हैं, बीजेपी ने इस मुद्दे को फिर से उठाया है। हालांकि यह मुद्दा आम लोगों को कितना प्रभावित कर सका है, इसका मुझे अंदाजा नहीं है।
क्या हम लोग यह उम्मीद करें कि अगर बीजेपी सत्ता में एनडीए के रूप में आती है या फिर कम्युनिस्ट तीसरे मोर्चे के रूप में या यूपीए आए तो काला धन वापस लाने में कोई कदम उठाएगी। अब तक का अनुभव यही बताता है कि ऐसा कोई कदम किसी की भी सरकार आने पर नहीं उठाया जाना है। लेकिन वोट देना हमारी मजबूरी है और इन्हीं कुछ बेईमान पार्टियों और इनके नेताओं में से किसी को एक चुनना भी है।
मन खिन्नता से भरा हुआ है। कोई एक विकल्प आज की तारीख में हम लोगों के पास नहीं है जिसके बारे में ठोंक-बजाकर वोट मांगा जा सके। जाति, धर्म, राष्ट्रवाद, परिवारवाद, के इस घालमेल में किसको चुनें, कम से कम मेरी समझ में नहीं आ रहा। हालांकि कुछ लोग इस बात की पैरोकारी करते हैं कि जो कम भ्रष्ट हो, उसको वोट दिया जाए। लेकिन क्या इससे यह नहीं लगता कि एक तरह से इस तरह की बात करने वाले भी अनजाने में ही भ्रष्टाचार का समर्थन कर रहे हैं।
बहरहाल, फैसला आप पर है। जिसको वोट देना है दीजिए। लेकिन अपने स्तर पर ऐसा कुछ जरूर तय करें कि सही पार्टी को आपका वोट मिले। हो सकता है कल को कोई रास्ता इसी में से निकले।

Sunday, May 3, 2009

प्रेस फ्रीडम को कूड़ेदान में फेंक दो

आज प्रेस फ्रीडम डे है। अंग्रेजी में यही नाम दिया गया है। मित्र लोग संदेश भेज रहे हैं कि आज की-बोर्ड की आजादी की रक्षा करें। मतलब कलम की जगह अब चूंकि कंप्यूटर के की-बोर्ड ने ले ली है तो जाहिर है कि अब कलम की बजाय की-बोर्ड की आजादी की बात ही कही जाएगी। आप तमाम ब्लॉगर्स में से बहुत सारे लोग पत्रकार है और जो नहीं हैं वे ब्लॉगर होने के नाते पत्रकार हैं। क्या आप बता सकते हैं कि क्या वाकई प्रेस फ्रीडम नामक कोई चीज बाकी बची है। भयानक मंदी के दौर में तमाम समाचारपत्र और न्यूज चैनल जिस दौर से गुजर रहे हैं क्या उसे देखते हुए प्रेस फ्रीडम बाकी बची है। तमाम लोग जो इन संचार माध्यमों में काम कर रहे हैं वह बेहतर जानते हैं कि कि प्रेस फ्रीडम शब्द आज के दौर में कितना बेमानी हो गया है। आज कोई भी मिशनरी पत्रकारिता नहीं कर रहा है और न ही इसकी जरूरत है। हम लोग अब तथाकथित रूप से प्रोफेशनल हो गए हैं और प्रोफेशनल होने में हम मशीन बन जाते हैं तो क्या उसमें कहीं फ्रीडम की गुंजाइश बचती है। प्रेस की दुनिया में अब सारा काम इशारेबाजी में होता है। बड़े से लेकर छोटे तक को बस इशारे किए जाते हैं।
मेरा मानना है कि प्रेस फ्रीडम निहायत ही बकवास चीज है औऱ इसे कूड़ेदान में फेंक देना चाहिए। इसके लिए मैं सिर्फ अखबार मालिकों या न्यूज चैनल के मालिकों को ही दोष नहीं देना चाहता। अब देखिए तमाम पत्रकार कांग्रेस, बीजेपी, सीपीएम, बीएसपी और समाजवादी पार्टी की बीट देखते हैं। शाम को जब वह खबर लिख रहे होते हैं या कहीं से लाइव कर रहे होते हैं तो उनकी प्रतिबद्धताएं झलक रही होती हैं। उन्हें राहुल गांधी से बड़ा गरीबों का हमदर्द कोई नजर नहीं आता।...उन्हें नरेंद्र मोदी से बड़ा कोई विकास पुरुष नजर नहीं आता और प्रकाश कारत से बड़ा कोई अर्थशास्त्री नजर नहीं आता। ...आखिर ये पत्रकार किस फ्रीडम की बात कर रहे हैं और किसको बेवकूफ बना रहे हैं। फीस बढ़ाने वाले स्कूलों की खबर का टोन बदल दिया जाता है। चैनल के न्यूज रूम में बैठे लोगों के बच्चे किसी संस्कृति स्कूल, किसी डीपीएस, किसी मॉडर्न स्कूल में पढ़ रहे होते हैं। फीस भी दे सकते हैं लेकिन स्कूल मालिक का फोन आ चुका है तो भला ओबलाइज कैसे न करें। इसी तरह के सीन अखबारों के दफ्तर में भी मिलते हैं।
प्रतिबद्धता की यह हद है कि अखबारों में तमाम पत्रकार संघी, वामपंथी, कांग्रेसी या लीगी के नाम से जाने-पहचाने जाते हैं। होता भी यही है कि ऐसे पत्रकार जब बहस करते हैं तो उनकी बातों से भी इसकी झलक मिलती है। इस बात में कोई शक नहीं है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और भारतीय संविधान में प्रदत्त शक्तियों के मुताबिक यहां की प्रेस स्वतंत्र भी हैं। लेकिन हम पत्रकारों ने इस स्वतंत्रता का कुछ गलत फायदा उठा लिया है। हमारी कलम और प्रतिबद्धता राज्यसभा में कुर्सी, फ्लैट, प्लॉट, विदेशी दौरे के लिए सरेआम नीलाम हो रही है। इन स्थितियों के लिए किसी अखबार मालिक या न्यूज चैनल के मालिक को पूरी तौर पर दोष देना ठीक नहीं है क्योंकि वे लोग भी बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं। उन हालात में उन चैनलों या अखबारों के पत्रकारो मैन्युपुलेटर की भूमिका अदा करते हैं। यह बात अकेले हिंदी या अंग्रेजी के पत्रकारों की नहीं हो रही है। यही हाल मलयाली या तेलगू में लिखने वाले पत्रकारों का भी है। इस हमाम में सब नंगे हैं।
हालात इतने बदतर हैं कि चैनलों और अखबारों में अमुक-अमुक खूंटे से बंधे पत्रकारों को टॉक शो में बुलाया जाता है या लिखवाया जाता है। आपको जैसा मसाला चाहिए, उसी तरह के पत्रकार इस बाजार में उपलब्ध हैं। चाहे वामपंथी विचार खरीद लो या संघी विचारधारा से ओतप्रोत लिखवा लो। सबकी दुकानें सजी हैं। मुंबई में चले जाइए तो आपको वहां पर शिवसेना से प्रतिबद्धता जताने वाले पत्रकार मिल जाएंगे। लखनऊ में बीएसपी को अपनी प्रतिबद्धता जताने वाले पत्रकारों को तलाशने के लिए मशक्कत करनी पड़ी। वहां पत्रकार भाई मुलायम सिंह यादव का दामन छोड़ने को तैयार नहीं थे। पता चला कि इन्फ्रास्ट्रक्चर और रीयल एस्टेट से जुड़ी एक बहुत बड़ी कंपनी किसी तरह से कुछ पत्रकारों को बीएसपी के खेमे में लाई। अहमदाबाद में जिन पत्रकारों ने नरेंद्र मोदी के खिलाफ लिखा उन्हें जेल भेज दिया गया या वे अपने-अपने अखबारों से निकाल दिए गए। मतलब कि वहां चैनल या अखबार मालिक मोदी के प्रतिबद्ध होकर निकले। दक्षिण भारत और कुछ अन्य राज्यों में तो कई राजनीतिक दलों के अपने अखबार और टीवी चैनल हैं। यह सही है कि वे उसके जरिए अपनी विचारधारा का प्रचार करते हैं लेकिन क्या वहां काम कर रहे पत्रकारों के लिए प्रेस फ्रीडम का मतलब है।
आज कोई नेता जब नेतागीरी शुरू करता है या कोई नया राजनीतिक दल खड़ा होता है तो सबसे पहले उसका अपना मीडिया होता है। इसके होने में कोई हर्ज भी नहीं है लेकिन आप उसे या वहां के पत्रकारों के लिए मुकम्मल प्रेस फ्रीडम नहीं कह सकते। मैं जानता हूं कि कुछ लोग इसे पढ़ने के बाद उपदेश देंगे और यहां के प्रेस फ्रीडम की तुलना पाकिस्तान, नेपाल या फिर बांग्लादेश से करेंगे लेकिन ये लोग अमेरिका या इंग्लैंड में वहां के पत्रकारों को हासिल प्रेस फ्रीडम की बात नहीं करेंगे। माफ कीजिएगा जूता फेंकने की तुलना प्रेस फ्रीडम से मत कीजिएगा।