Saturday, December 19, 2009

गले में खिचखिच...विक्स न खाना

क्या विक्स का इस्तेमाल करते हैं...जरूर करते होंगे। बच्चे को खांसी आई नहीं कि उसके गले पर या तो विक्स मल दी गई या फिर उसे विक्स की गोली चूसने को दे दी गई। लेकिन अब विक्स का इस्तेमाल न करें। इस प्रोडक्ट को बनाने वाली कंपनी प्रॉक्टर एंड गैंबल (पी एंड जी) ने अमेरिका में अपनी इस दवा को वापस ले लिया है यानी कंपनी इस दवा को अब अमेरिकन बाजार में नहीं बेचेगी। इस कंपनी ने सिर्फ विक्स ही नहीं बल्कि अपना एक और प्रॉडक्ट 24 लिक्वि कैप्स बोनस पैक भी वापस ले लिया है। पर...भारत समेत दुनिया के विकासशाली देशों यानी गरीब देशों में दोनों दवाओं को वापस नहीं लिया गया।

क्यों वापस लिया विक्स को
प्रॉक्टर एंड गैंबल (Procter and Gamble)ने अपनी प्रेस रिलीज में कहा है कि इस दवा को इसके दावे के अनुरूप नहीं पाया गया। कंपनी ने विक्स (Vicks) के पैकेट पर लिखा था कि यह दवा 12 साल से कम उम्र के बच्चों पर काफी तेजी से असर करती है। लेकिन कंपनी ने पाया कि ऐसा नहीं है। इसका असर बच्चों पर नहीं होता। ठीक यही नतीजा क्वि कैप्स के साथ भी निकला। कंपनी ने अपनी रिलीज में यह भी कहा कि उसने खुद ही पहल करते हुए दोनों दवाओं को वापस लिया है। यानी उसने पहल को भी अमेरिकन लोगों के बीच भुनाने का पूरा इंतजाम किया है। संकेत यह देने की कोशिश की जा रही है कि यह कंपनी कितनी ईमानदार है कि इसने अपने दो प्रोडक्ट बेहतर नतीजे न आने पर वापस ले लिए। हकीकत यह है कि अमेरिका में फूड एंड ड्रग कंट्रोलर अथॉरिटी के नियम इतने कड़े हैं कि उसके आगे कंपनियों के दावों की असलियत खुल जाती है। यह अथॉरिटी ऐसी दवाओं और वस्तुओं पर प्रतिबंध लगाते देर नहीं करती। इसके अलावा वहां इस क्षेत्र में कई एनजीओ भी सक्रिय हैं जो लगातार ऐसी वस्तुओं पर नजर रखते हैं और अथॉरिटी को सूचना देते रहते हैं। वैसे भी वहां की अथॉरिटी की वेबसाइट पर जाकर कोई भी आदमी किसी भी प्रोडक्ट की शिकायत कर सकता है।

मुगलों और अंग्रेजों की गुलामी से आजाद होने के बाद भारत जिस अमेरिकी गुलामी की तरफ बढ़ रहा है, प्रॉक्टर एंड गैंबल की घटना उसकी जीती जागती मिसाल है। यह अमेरिकी कंपनी है और करीब 80 देशों में इसकी शाखाएं हैं यानी वहां भी पी एंड जी की यूनिट है जो इस फॉर्मूले के आधार पर विक्स और 24 लिक्वि कैप्स बनाती है। इन 80 देशों की शाखाओं में करीब 1 लाख 35 हजार लोग नौकरी करते हैं।

भारत में इस समय हर छोटी से लेकर बड़ी जिस भी चीज का इस्तेमाल आप करते हैं, उनमें कहीं न कहीं किसी भी रूप में अमेरिकन हस्तक्षेप बरकरार है। यानी टाटा नमक की तरह अमेरिका हमारे हर निवाले में मौजूद है। खासकर दवाओं के मामले में तो यह आश्चर्यजनक ढंग से मौजूद है। याद कीजिए टीवी पर आपने जब पहली बार विक्स का विज्ञापन देखा था तो वह क्या था – गले में खिचखिच...विक्स की गोली लो खिचखिच दूर करो। कितना अपील करता था यह विज्ञापन आपको। लेकिन अब जब उसकी असलियत सामने आई है तो हम लोग मुंह चुराने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते। विक्स को वापस लेने की खबर मुझे अमेरिकन मीडिया से मिली है, भारतीय मीडिया में मुझे यह खबर नजर नहीं आई है। हो सकता है कि एकाध अंग्रेजी अखबारों ने इसे कहीं संक्षेप में लगाया भी हो। कहने का आशय यह है कि भारत के एक बहुत बड़े वर्ग तक यह खबर कभी नहीं पहुंच पाएगी कि विक्स और 24 लिक्वि कैप्स अब अमेरिका में नहीं बेची जाएगी। लोग हमेशा की तरह खिचखिच दूर भगाने के लिए विक्स खाते रहेंगे।

नाम में फर्क
अमेरिका में विक्स को विक्स डे क्विल कोल्ड एंड फ्लू के नाम से बेचा जाता है। भारत में यह विक्स वेपोरब, विक्स कफ ड्रॉप्स, विक्स एक्शन 500 प्लस के नाम से बेचा जाता है। पी एंड जी के जो अन्य पॉपुलर प्रॉडक्ट पूरी दुनिया में बिकते हैं वे हैं- पैंपर्स, टाइड, एरियल, आलवेज, विहस्पर, पैंटीन, मैच 3, बाउंटी, डॉन, गेन, प्रिंगेल्स, चारमिन, डाउनी, लेनोर, इयाम्स, क्रेस्ट, ओरल-बी, ड्यूरासेल, ओले, हेड एंड शोल्डर, वेल्ला, जिलेट आदि। इनमें से आपने जरूर किसी न किसी प्रोडक्ट का इस्तेमाल भारत में भी किया होगा।


कोई एक दवा नहीं
विक्स या 24 लिक्वि कैप्स कोई एक दवा नहीं है जिसका अमेरिकी चेहरा अलग है और भारत जैसे गरीब देशों के लिए उसका पैमाना अलग है। तमाम ऐसी प्रतिबंधित दवाएं जो अमेरिका में नहीं बेची जा सकतीं, वह भारत में खुलेआम बिकती हैं। यहां के डॉक्टर दवा कंपनियों से गिफ्ट और टूर के कूपन लेकर उन दवाओं को खरीदने की सिफारिश (रेकमेंड) करते हैं।

सिफला एक भारतीय कंपनी है। अभी जब स्वाइन फ्लू फैला तो उसने एक बहुत ही कारगर दवा टेमीफ्लू भारतीय मार्केट में उतारी। चूंकि स्वाइन फ्लू सबसे पहले अमेरिका में फैला तो वहां की सरकार ने सबसे पहले वहां की कंपनियों से स्वाइन फ्लू की दवा के बारे में पड़ताल की। सभी ने हाथ खड़े कर दिए। सिफला ने अमेरिकन सरकार को बताया कि उसके पास बहुत ही कारगर दवा है। अमेरिका ने सिफला को दवा सप्लई का आर्डर दे दिया। वहां दवा पहुंचने की देर थी कि एक अमेरिकन कंपनी ने इससे मिलती-जुलती दवा बनाकर पेटेंट का दावा कर दिया। खैर वह केस सिफला ने जीता और अब टेमीफ्लू के मामले में उसका डंका बज रहा है। यहां भारत में टेमीफ्लू की सप्लाई के लिए सिफला को भारत सरकार से बार-बार गुहार लगानी पड़ी कि हमारी दवा खरीद लो और पब्लिक में बांट दो। यह उदाहरण मैंने सिर्फ इसलिए दिया कि अगर किसी अमेरिकी कंपनी को भारत सरकार के पास यह दवा बेचनी होती तो विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ), यूनीसेफ, रोटरी क्लब जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं उसकी पैरोकारी में उतर आतीं। लेकिन सिफला की पैरोकारी किसी ने नहीं की, यहां तक कि भारतीय मीडिया ने भी नहीं। न यहां न वहां।

अब देखना है कि पी एंड जी भारत में विक्स और 24 लिक्वि कैप्स की बिक्री कब बंद करती है या फिर नए नाम के साथ उसे उतारती है।

...और अगर आपको गले की खिचखिच दूर ही करनी है तो गरम पानी में तुलसी, अदरक और मामूली सा नमक डालकर उसका गलाला करें और उस पानी को पी लें। आपकी खिचखिच जरूर दूर हो जाएगी।

Tuesday, December 1, 2009

दोज़ख़ - इस्लाम के खिलाफ बगावत

टीवी पत्रकार और लेखक सैयद जैगम इमाम के उपन्यास दोजख का विमोचन सोमवार शाम दिल्ली के मंडी हाउस स्थित त्रिवेणी कला संगम में किया गया। राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस किताब का विमोचन जाने - माने साहित्यकार और हंस के संपादक राजेंद्र यादव ने किया कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी के विख्यात आचोलक नामवर सिंह ने की। इस मौके पर बोलने वालों में आईबीएन सेवन के मैनेजिंग एडीटर आशुतोष, मशहूर साहित्यकार अनामिका और शोधकर्ता शीबा असलम फहमी शामिल थीं। मंच का संचालन सीएसडीएस से जुड़े रविकांत ने किया।
कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत अतिथियों को फूल भेंटकर की गई। कार्यक्रम में सबसे पहले अपनी बात रखते हुए आईबीएन 7के मैनेजिंग एडीटर आशुतोष ने कहा कि उन्हें इस उपन्यास को पढ़कर अपना बचपन याद गया। उन्होंने अपने वक्तव्य में बनारस, मिर्जापुर और चंदौली की भाषा का इस्तेमाल किया और कहा कि जैगम का उपन्यास भाषा के स्तर पर लाजवाब है। उन्होंने उपन्यास के संदर्भ के जरिए मुस्लिम समाज को लेकर पैदा की जा रही भ्रांतियों पर भी कड़ा प्रहार किया। दोज़ख़ को इस्लाम से बगावत की किताब बताते हुए आशुतोष ने साफ कहा कि मुसलमान अब उस अंदाज में नहीं जीना चाहता जैसा किताबों में लिखा गया। आशुतोष ने इस मौके पर उपन्यास के कई अंश भी पढ़े और उपन्यास में मौजूद कई घटनाओं का विश्वेषण किया। उन्होंने इसे एक क्रांतिकारी किताब बताया और उम्मीद जताई कि ऐसा साहित्य समाज के लिए एक नया संदेश लाएगा।


वहीं दूसरी तरफ शोधकर्ता शीबा असलम फहमी ने उपन्यास को दिल के फैसलों की किताब बताया। मासूम दास्तानगोई जिसका राजनीतिकरण नहीं किया जा सकता। शीबा ने इस उपन्यास के गंभीर पक्षों की व्याख्या की और कहा इसे कट्टरता और मजहब से जोड़ा जाना सही नहीं है। ये बच्चे की कहानी है जो अपनी रौ में जीने पर यकीन रखता है और उसके इर्द गिर्द घटनाएं कैसे घटती हैं ये सबकुछ इस उपन्यास की मार्फत दिखाया गया।
कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त करते हुए। साहित्यकार अनामिका ने उपन्यास के कुछ अंश पढ़कर सुनाया. उपन्यास में लिखे गए ठेठ गाली के बारे में उन्होंने कहा कि यह गाली नहीं बल्कि अंतरंगता है. यह फूलगेंदवा की तरह है ...गाली नहीं है। एक बच्चे के मनोविज्ञान के अभूतपूर्व चित्रण की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि क्या ये जरुरी है कि किसी के मरने के बाद जलाने और दफनाने जैसी बातों को बहुत तरजीह दी जाए। उन्होंने उपन्यास के मुख्य पात्र की घुटन और तड़प पर विस्तार से बातें की और कहा कि हमें अल्लन जैसे तमाम बच्चों के बारे मे सोचना चाहिए। आखिर हम कैसा समाज चाहते हैं। अनामिका ने बच्चों पर लिखे गए दुनियाभर के कई उपन्यासों का जिक्र किया और कहा कि कम से कम बच्चों को उनकी मुताबिक जीने की आजादी मिलनी चाहिए। दोज़ख़ के नायक अल्लन को प्रेमचंद के मशहूर पात्र हामिद से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि आज अगर हामिद होता वो हामिद नहीं अल्लन होता।
विख्यात लेखक राजेंद्र यादव ने उपन्यास का जनवादी पक्ष सामने रखा। उन्होंने एक बच्चे के मनोविज्ञान की चर्चा की। राजेंद्र जी ने कहा कि ऐसे उपन्यास के लिए सैयद ज़ैग़म प्रशंसा के पात्र हैं. मैं उन्हें धन्यवाद देता हूँ. आज जैसा माहौल है उसमें हर चीज पर सवाल है। मेरे लिए यह उपन्यास ऐसे ही कुछ सवाल उठाता है। हिंदू मुस्लिम रिश्तों पर ये उपन्यास बेहतरीन है। राजेंद्र जी ने दोज़ख में लिखी गई गालियों के संदर्भ में अपने भाषण के दौरान गाजीपुर के मशहूर लेखक राही मासूम रजा का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि ये एक बेहद सरल भाषा है जो दिल को छूती है।
कार्यक्रम में दिए गए अध्यक्षीय भाषण में...नामवर सिंह ने सबसे अलग तरह से अपनी बात रखते हुए , उपन्यास को विशुद्ध प्रेम कथा करार दिया। उन्होंने कहा कि जैगम नाम अर्थ शेर होता है और जैगम ने शेर की तरह लिखा है। बिना डरे। नामवर सिंह जी ने कहा कि उन्हें डर था ये उपन्यास चंदौली, बनारस की भाषा में पड़कर कहीं आंचलिक न हो जाए लेकिन नहीं ये खड़ी बोली का उपन्यास है जिसकी प्रस्तुति चकित करती है। उन्होंने कहा कि उपन्यास में कोई बड़ा प्लाट नहीं है बल्कि स्थितियां हैं. दरअसल उपन्यास के माध्यम से छोटी सी बूंद में समुद्र की बात कहने की कोशिश की गयी है।
उपन्यास के लोकार्पण समारोह में आजतक के न्यूज़ डायरेक्टर क़मर वहीद नक़वी, न्यूज़ 24 के मैनेजिंग एडिटर अजित अंजुम, दिल्ली आजतक के प्रमुख अमिताभ, तेज के शैलेन्द्र कुमार झा, वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी, स्टार न्यूज के रवींद्र त्रिपाठी, आजतक के डिप्टी एक्जीक्यूटिव एडिटर राणा यशवंत, प्रसिद्द एंकर सईद अंसारी, प्रख्यात रंगकर्मी महमूद समेत अखबारों और टेलीविजन चैनल से जुड़े कई मीडियाकर्मी मौजूद थे.

सैयद ज़ैग़म इमाम का औपचारिक परिचय :
2 जनवरी 1982 को बनारस में जन्म। शुरूआती पढ़ाई लिखाई बनारस के कस्बे चंदौली (अब जिला) में। 2002 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी इलाहाबाद से हिंदी साहित्य और प्राचीन इतिहास में स्नातक। 2004 में माखनलाल चतुर्वेदी नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ जर्नलिज्म (भोपाल, नोएडा) से मास्टर ऑफ जर्नलिज्म की डिग्री। 2004 से पत्रकारिता में। अमर उजाला अखबार और न्यूज 24 चैनल के बाद फिलहाल टीवी टुडे नेटवर्क (नई दिल्ली) के साथ। सराय सीएसडीएस (सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज) की ओर से 2007 में इंडिपेंडेंट फेलोशिप। फिलहाल प्रेम पर आधारित अपने दूसरे को उपन्यास को पूरा करने में व्यस्त। उपन्यास के अलावा कविता, गजल, व्यंग्य और कहानियों में विशेष रुचि। कई व्यंग्य कवितएं और कहांनियां प्रकाशित।

Friday, November 27, 2009

इस कुरबानी को भी पहचानिए



मेरा यह लेख शुक्रवार 27 नवंबर 2009 को नवभारत टाइम्स, नई दिल्ली में संपादकीय पेज पर प्रकाशित हुआ। इस लेख को नवभारत टाइम्स से साभार सहित मैं आप लोगों के लिए इस ब्लॉग पर पेश कर रहा हूं। यह लेख नवभारत टाइम्स की वेबसाइट पर भी है, जहां पाठकों की टिप्पणियां आ रही हैं। अगर उन टिप्पणियों को पढ़ना चाहते हैं तो वहां इस लिंक के जरिए पहुंच सकते हैं - http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5272127.cms
-यूसुफ किरमानी

बकरीद अपने आप में बहुत अनूठा त्योहार है। हालांकि इस्लाम धर्म के बारे में ज्यादा न जानने वालों के लिए यह किसी हलाल जानवर को कुरबानी देने के नाम पर जाना जाता है लेकिन बकरीद सिर्फ कुरबानी का त्योहार नहीं है। यह एक पूरा दर्शन है जिसके माध्यम से इस्लाम ने हर इंसान को एक सीख देने की कोशिश की है। हालांकि कुरानशरीफ की हर आयत में इंसान के लिए पैगाम है लेकिन इस्लाम ने जिन त्योहारों को अपनी संस्कृति का हिस्सा बनाया, वह भी कहीं न कहीं कुछ संदेश लिए नजर आते हैं। अल्लाह ने हजरत इब्राहीम से उनकी सबसे प्यारी चीज कुरबान करने की बात कही थी, इब्राहीम ने काफी मनन-चिंतन के बाद अपने बेटे की कुरबानी का फैसला किया था। वह चाहते तो किसी जानवर की कुरबानी कर अपने कर्तव्य से मुक्ति पा लेते। पर, उन्होंने वही किया जो सच था। हजरत इब्राहीम के इस दायित्व पूरा करने में जो संदेश छिपा है, उसे समझे जाने की जरूरत है।

संदेश यह है कि अगर इस तरह की परीक्षा देने का वक्त आए तो हर इंसान को इस तरह की कुरबानी के लिए तैयार रहना चाहिए, उस समय उसके कदम लडख़ड़ाएं नहीं। कुरबानी की यह परीक्षा ईश्वर आपसे कहीं भी ले सकता है, चाहे वह परिवार के लिए हो, समाज के लिए हो, अपने देश के लिए हो या फिर किसी गैर के लिए ही क्यों न हो। जिंदा रहते हुए भी कुछ लोग अपने अंग मरने के बाद दान करने के लिए कह जाते हैं, उसके पीछे भी कुछ इसी तरह की भावना होती है। वरना अपने आंख, पैर, हाथ लेकर सीधे स्वर्गलोक में जाने की कल्पना करने वाला इंसान इतनी जरा सी कुरबानी के लिए भी कहां तैयार होता है।

कुरबानी की एक व्याख्या कुछ इस तरह भी है और वह वर्तमान परिस्थितियों में पूरी तरह फिट बैठती है। कम से कम हम इंसान तो पैगंबर नहीं हैं, तो फिर हम लोग किन चीजों की कुरबानी दे सकते हैं। आधुनिक चिंतक कुछ इस तरह सोचते हैं। उनका मानना है कि अहम (ईगो) आज की सबसे बड़ी समस्या है। अगर हर इंसान सिर्फ अपने अहम की कुरबानी दे दे तो हम एक ऐसी सोसायटी का निर्माण कर सकते हैं जो बेमिसाल हो सकती है। कहा जा रहा है कि आज बहुत सारी समस्याएं इस अहम के कारण खड़ी हो रही हैं। इसलिए अगर लोग इस बकरीद पर इस अहम को ही त्यागने का फैसला कर लें तो इस त्योहार का मतलब और मकसद पूरा हो जाएगा। हालांकि यह बात कुछ लोगों के गले नहीं उतरेगी लेकिन आज समाज हमसे हमारे अहम की कुरबानी मांग रहा है।

चलिए अब बकरीद मनाने के ढंग से कुरबानी के बारे में सोचते हैं। इस्लाम ने कुरबानी के जो नियम बनाए है, उसके साथ कुछ शर्ते भी लगा दी हैं। इन शर्तों में एक बड़ा संदेश छिपा है। कहा गया है कि जानवर की कुरबानी के बाद उसके तीन हिस्से किए जाएं। एक हिस्सा खुद के लिए रखा जाए और बाकी दो हिस्से समाज में जरूरतमंद लोगों के बीच बांट दिया जाए और उसे जल्द से जल्द बांट दिया जाए। जिस तरह ईद में भी खैरात-जकात के जरिए समाज के गरीब तबके की मदद के लिए कहा गया है, ठीक उसी तरह की व्यवस्था बकरीद में भी लागू है। यह कोई परंपरा नहीं है, जिसका त्यौहार में पालन किया जाना जरूरी है, यह दस्तावेजी सबूत है, जिसमें साफ तौर पर इस्लाम की फिलासफी छिपी है।

इस्लाम की बुनियाद जिन वजहों से रखी गई थी, यह दोनों त्योहार उसकी अहम कड़ी हैं। लेकिन यह सारी बात उसी बात में आकर मिलती है कि किसी के लिए या समाज के अन्य तबके के लिए कुछ करने से पहले हमें खुद में कुरबानी का जज्बा लाना पड़ेगा, कुछ त्यागना पड़ेगा, अपने अहम को ताक पर रखना होगा। हम लोग बातें चाहे जितनी भी लंबी-चौड़ी कर लें लेकिन हम कुछ भी त्यागने को तैयार नहीं हैं। न अपना अहम और न अपनी सोच।

बहरहाल, कुरबानी एक दर्शन है, यह आप पर है कि आप उसे किस तरह लें या स्वीकार करें। चाहे आप मुसलमान हैं या गैर मुसलमान अगर आप किसी भी तरह की कुरबानी देना ही चाहते हैं तो आपको कौन रोक सकता है लेकिन उसके लिए अंदर से जो ताकत होनी चाहिए, उसे पैदा करने की ज्यादा जरूरत है।

(साभार - नवभारत टाइम्स)

(और अंत में बकरीद के अवसर पर हार्दिक मुबारकबाद)

Thursday, November 12, 2009

मैं हूं राजकुमार ठाकरे



मैं हूं राजकुमार ठाकरे। अगर आप मराठी भाषी नहीं हैं तो इसे पढ़ने की हिमाकत न करें। मुझे मेरे डॉन ने एक टारगेट दिया है जिसे मैं किसी भी हालत में पूरा करना चाहता हूं। दरअसल मेरे डॉन ने खूब कोशिश कर ली कि भारत में हिंदू-मुस्लिम दंगें (Hindu-Muslim Riots) हों, लोग बड़े पैमाने पर अराजकता पर उतर आएं। उसने यहां वहां अपने भाड़े के लोगों को भेजकर बम ब्लास्ट कराए लेकिन छुटपुट घटनाओं को छोड़कर कोई बड़ा बखेड़ा नहीं खड़ा हो सका। अब मुझे नया मिशन सौंपा गया है कि भाषा के नाम पर इतना बड़ा बवाल कर दो कि हर राज्य में भाषा का झगड़ा खड़ा हो जाए और लोग एक दूसरे को मरने-मारने पर उतारू हो जाएं।

इसकी शुरुआत मैंने मुंबई से की है। क्योंकि मुंबई से बेहतर जगह और कोई नहीं हो सकती। यह मिनी इंडिया है, हर राज्य, धर्म और भाषा बोलने वाले यहां रहते हैं। यहां सफल होना आसान है। चूंकि यहां सबसे ज्यादा यूपी के भैया और बिहार के बिहारी रहते हैं तो उनको डराना सबसे ज्यादा जरूरी है। अगर वे डर गए तो बाकी सारे तो मुट्ठी भर हैं, खुद ही भाग जाएंगे। मुझे इस मिशन के लिए कुछ करने की जरूरत नहीं है। मेरे बुजुर्ग इतना ज्ञान इस बारे में दे गए हैं कि सब कुछ रेडिमेड है। मैं मराठी को हिंदी के खिलाफ खड़ा करूंगा तो यूपी, बिहार और बाकी जगहों पर हिंदी बोलने वाले अपनेआप सड़कों पर आकर बवाल करेंगे। काम आसान हो जाएगा।

इस मिशन को अपने बहुत सीक्रेट तरीके से चला रहा हूं। मुझे महाराष्ट्र में सबसे बड़ा देशभक्त समझा जा रहा है। मेरा डॉन कितना खुश होगा, मेरी तो इच्छा है कि मुझे उसकी कुर्सी पर कब्जा करना है। भारत ऐसा देश है, जहां यह काम किसी बम ब्लास्ट और अन्य मजहब के लोगों को मारने से ज्यादा अच्छा है। इस काम में तो सिर्फ जबान हिलानी होती है। बम ब्लास्ट कराने में तो पैसा खर्च होता है लोगों को काम पर लगाना पड़ता है।

मुझे भाषा के नाम पर अराजकता बहुत पसंद है। अब हालात ये हैं कि मेरे एक इशारे पर मुंबई बंद हो जाती है। हालांकि मुझे हिंदी में बनी फिल्में देखना, अमिताभ बच्चन से दोस्ती करना, महंगी विदेशी कारों में घूमना और अंग्रेजी बोलना पसंद है। अगर मैं अंग्रेजी नहीं बोलूंगा तो मेरी मार्केटिंग वैल्यू (Marketing Value)कैसे बढ़ेगी। मैं टीवी पर खबरों में कैसे आऊंगा। हालांकि बॉलिवुड मुंबई में है लेकिन मैं हिंदी फिल्में बनना नहीं बंद कराउंगा क्योंकि इसमें एक रहस्य है। चलो आपको बता देता हूं। वो क्या है कि बॉलिवुड में कई लाख मराठी लोग काम कर रहे हैं और अगर उनके धंधे पर चोट पड़ी तो यह मामला बैकफायर कर जाएगा। इसलिए हिंदी फिल्मों का बनना मैं नहीं बंद कराने वाला। लेकिन फिल्म लांचिंग का फंक्शन अगर मुंबई में होगा तो मैं उसे पूरी तौर पर मराठी में ही करने को कहूंगा लेकिन अगर वे लोग सबकुछ अंग्रेजी में करते हैं तो वह चलेगा। आखिर इतने साल गोरों के हम गुलाम रहे हैं, वह ऐहसान कैसे चुका सकेंगे। इसलिए अंग्रेजी को तो महत्व देना ही पड़ेगा। आस्ट्रेलिया में जो भारत के लोग पिट रहे हैं, वे हैं ही उसी लायक। जब मैं समाचारपत्रों में पढ़ता हूं कि आज एक और भारतीय आस्ट्रेलिया या इंग्लैंड में पिटा तो मेरा खून बढ़ ज्यादा है। इसी तरह के अटैक मुंबई और महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों में यूपी-बिहार वालों पर होने चाहिए।

पर बात हिंदी की हो रही है। इस भाषा और इसके बोलने वालों को मैं महाराष्ट्र से भगाकर रहूंगा। यह लोग जब अपने घरों को लौटेंगे तब असली खेल शुरू होगा। यह लोग भारत माता का सुख-चैन छीन लेंगे। जो काम वह गुजरात वाला तीसमार खां और उसका परिवार नहीं कर पाया, अब आसानी से हो जाएगा।

ये जो तस्वीर देख रहे हैं आप...बच्चे के हाथ में तिरंगा...मुझे ऐसी तस्वीरें पसंद नहीं हैं। इसकी जगह मैं लाशों के ढेर, जलते हुए घर, दया की भीख मांगते हुए यूपी-बिहार के भैये, हर आंखों में खौफ देखना चाहता हूं। कृपया मेरा समर्थन कीजिए क्योंकि मैं राजकुमार ठाकरे हूं...

ब्लॉग संचालक की ओर से दो शब्द...

मित्रों, यह किन्हीं राजकुमार ठाकरे के अपने विचार हैं जो गलती से इस ब्लॉग पर जगह पा गए हैं। इसका संबंध इस ब्लॉग के संचालक यूसुफ किरमानी से नहीं है। ब्लॉग संचालक का इरादा किसी की भावना को ठेस पहुंचाना नहीं था। यह काम सिर्फ इसी राजकुमार ठाकरे के जिम्मे है।

Tuesday, November 3, 2009

न डगमगाए इंसाफ का तराजू


भारतीय अदालतें अगर वक्त के साथ खुद को बदल रही हैं तो यह अच्छा संकेत है। इधर हाल के वर्षों में कुछ अदालतों ने ऐसे फैसले सुनाए जिन पर आम राय अच्छी नहीं बनी और इस जूडिशल एक्टिविज्म की तीखी आलोचना भी हुई। लेकिन इधर अदालतें कुछ फैसले ऐसे भी सुनाती हैं जिन पर किसी की नजर नहीं जाती लेकिन उसके नतीजे बहुत दूरगामी होते हैं या हो सकते हैं। हैरानी तो यह है कि ऐसे मामलों की मीडिया में भी बहुत ज्यादा चर्चा नहीं होती।

पहले तो बात उस केस की करते हैं जिसमें अदालत की टिप्पणी का एक-एक शब्द मायने रखता है। दिल्ली में रहने वाली आशा गुलाटी अपने बेटे के साथ करोलबाग इलाके से गुजर रही थीं। उनके वाहन को एक बस ने टक्कर मार दी। आशा को अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी मौत हो गई। आशा गुलाटी खुद नौकरी करती थीं और उनके पति भी जॉब में थे। गौरव बीसीए कर रहा था। आशा के परिवार ने मुआवजे के लिए कोर्ट में मुकदमा किया। अदालत में बस का इंश्योरेंस करने वाली कंपनी ने दलील दी कि आशा पर परिवार का कोई सदस्य आश्रित नहीं था, उनके पति जॉब करते हैं। गौरव का खर्च वह उठा रहे हैं, ऐसे में मुआवजे का हक आशा के परिवार को नहीं है।

देखने में यह बहुत साधारण सा केस है और ऐसे ढेरों केस अदालतों में आते रहते हैं। लेकिन दिल्ली में तीस हजारी अदालत की अडिशनल जिला जज (एडीजे) स्वर्णकांता शर्मा ने इस केस में अपनी टिप्पणी के साथ जो फैसला सुनाया वह काबिले गौर है। यह तो आपको अंदाजा हो ही गया होगा कि जज साहिबा ने इंश्योरेंस कंपनी की अर्जी खारिज कर होगी। लेकिन उनकी टिप्पणी देखिए - सडक़ हादसे के मामले में मुआवजा तय करते वक्त महिला और पुरुष के बीच कोई भेदभाव नहीं हो सकता। कानून की नजर में दोनों बराबर हैं और महिला का परिवार के प्रति सहयोग कहीं से भी पुरुषों से कम नहीं आंका जा सकता।

उन्होंने कहा कि कामकाजी महिला की आमदनी को परिवार में सही तरीके से मान्यता नहीं मिलती। लेकिन सही मायने में महिला और पुरुष दोनों के योगदान को समान तौर पर माना जाना चाहिए। जज स्वर्णकांता शर्मा ने कहा कि आज के बदले हालात में पति व पत्नी मिलकर बेहतर जिंदगी के लिए काम करते हैं ताकि उनका स्टैंडर्ड ऑफ लाइफ बेहतर हो सके और उनके बच्चों को अच्छी एजुकेशन मिल सके। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि समाज में महिला के उस सहयोग को उसके रहते नहीं समझा जाता जबकिि पुरुष के मामले में उसके आर्थिक सहयोग को फौरन स्वीकार कर लिया जाता है। लेकिन वहीं महिला के केस में लगातार विरोध किया जाता है इससे भेदभाव साफ दिखता है। अदालत इसे स्वीकार नहीं कर सकती। अदालत की समाज के प्रति जिम्मेदारी है और समाज को जागरूक किया जाना जरूरी है।

अदालत का इस तरह का फैसला निश्चित रूप से आंख खोलने वाला है लेकिन समस्या तब खड़ी होती है जब अदालतें धर्म, जाति और राजनीति से जुड़े मामलों में अपनी हद से आगे जाकर फैसला देती हैं। कई केस तो इतने अटपटे हो जाते हैं कि बाद में ऊपर की अदालतों को भी लगता है कि निचली अदालत ने इस तरह की उलूलजुलूल टिप्पणी क्यों की। मसलन पिछले दिनों भोपाल के निर्मला कॉन्वेंट स्कूल में एक मुस्लिम बच्चे की दाढ़ी को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मार्केंडेय काटजू की टिप्पणी पर काफी शोरशराबा हुआ था और बाद में संविधान सभा ने न सिर्फ उस फैसले को दुरुस्त किया बल्कि जस्टिस मार्केंडेय काटजू ने भी अपनी टिप्पणी के लिए बाद में खेद जताया।

उस मामले में कॉन्वेंट स्कूल ने इस आधार पर उस बच्चे को स्कूल से निकाल दिया था कि उसने अपनी दाढ़ी मुड़वाने से मना कर दिया था। तमाम अदालतों से गुजरकर मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो जस्टिस मार्केंडेय काटजू ने स्कूल के फैसले को सही ठहराते हुए कहा था कि इस देश के तालिबानीकरण की इजाजत नहीं दी जा सकती यानी दाढ़ी तालिबानी संस्कृति की पहचान है और अगर इसकी व्याख्या इस तरह की जाए कि सारे दाढ़ी रखने वाले तालिबानी हैं तो अदालत की इस सोच पर अब क्या कहा जा सकता है। बहरहाल, यह मामला संविधान सभा ने संभाल लिया और जस्टिस काटजू के खेद जताने के बाद खत्म भी हो गया। (इस मुद्दे को समझने के लिए नीचे दो लिंक दिए जा रहे हैं जहां आप अन्य लेख पढ़कर इसे समझ सकते हैं)

पर, अदालतें इस बात से मना नहीं कर सकतीं कि अब उन पर भी पब्लिक की गहरी नजर रहती है। भारतीय अदालतों में देश के लोगों का यकीन अगर अब भी बरकरार है तो उसके लिए जज स्वर्णकांता शर्मा जैसों के फैसले ही अहम रोल निभाते हैं। अभी ताजा विवाद जजों की संपत्ति की घोषणा को लेकर चल रहा है। हालांकि इस मामले में चीफ जस्टिस ने खुद अपनी संपत्ति की घोषणा करके एक मिसाल पेश की है लेकिन इसी मामले में जिस तरह विरोध कराया गया, उसे लेकर अदालतों के बारे में कोई अच्छी राय बनती नहीं दिखाई दी। कर्नाटक के जस्टिस दिनाकरण का मामला भी प्रॉपटी के चलते विवाद का विषय बना हुआ है। इंसाफ के मंदिर को अब यह तय करना है कि लोगों में उसकी आस्था बनी रहे, उसके लिए वह क्या कदम उठाए।


सलीम से जुड़े मसले पर हिंदीवाणी में यह लेख छपा था...इसे इस लिंक पर पढ़े...
http://hindivani.blogspot.com/2009_03_01_archive.html


सलीम के मामले में अदालत का अंतिम फैसला और काटजू की टिप्पणी वापस लेने का पूरा विवरण यहां पढ़ें...
http://muslimmedianetwork.com/mmn/?p=4575

Saturday, October 31, 2009

हेलोवीन...मुखौटा लगा लो मेरे भाई



अगर आप मौजूदा युवा पीढ़ी के मुकाबले दस साल पहले के लोगों से पूछें कि भाई ये हेलोवीन (Halloween) या हालोवीन क्या बला है तो वे लोग ठीक से इसके बारे में जवाब नहीं दे पाएंगे। लेकिन मौजूदा मोबाइल मार्का पीढ़ी (Mobile Generation) को पता है कि यह हेलोवीन क्या बला है। जब आप यह लेख पढ़ रहे होंगे तो तमाम अमेरिकी लोग (American People) या तो हेलोवीन मना रहे होंगे या मनाने की तैयारी कर रहे होंगे।

हेलोवीन मनाने वाले तरह-तरह के मुखौटे बाजार से खरीद कर उसे चेहरों पर लगाते हैं और फिर एक दूसरे को डराते नजर आते हैं। अपने भारत देश में जो एक मिथ है कि अगले जन्म में इंसान को भूत, चुड़ै़ल, जिन, कुत्ता, सियार और न जाने क्या-क्या बनकर अपने पापों की कीमत चुकानी पड़ती है, यह मामला भी कुछ वैसा ही है। अमेरिकी भाई लोग इसी जन्म में मुखौटे लगाकर इस करतब को कर डालते हैं। उन्हें इस चीज में इतना मजा आता है कि उन्होंने इसे त्योहार का रूप दे दिया है और अब यह उनकी संस्कृति का हिस्सा है। 31 अक्टूबर को सारे अमेरिकी (बच्चे, बूढ़े, स्त्री, पुरुष) भूत, शैतान या सियार बने नजर आते हैं।

खबरों के मुताबिक अमेरिका हेलोवीन मार्केट (Halloween Market) में इस बार ओसामा बिन लादेन (Osama Bin Laden ) के मुखौटे की भारी मांग है। कहते हैं कि अमेरिकी इस मुखौटे की मुंहमांगी कीमत देने को तैयार हैं। इसके पीछे अमेरिकियों का यह मनोविज्ञान बताया जा रहा है कि जिस खूंखार आतंकवादी को वहां की सरकार जीते जी पकड़ नहीं पाई और अगर उसका मुखौटा लगाकर किसी को डराया जाए तो वे जरूर डरेंगे। क्योंकि 9-11 का जो खौफ अमेरिकियों पर अब तक है वे लादेन का मुखौटा लगाकर उसे दूर भगाना चाहते हैं। बताते हैं कि शुरू में अमेरिकी मुखौटा कंपनियों ने तालिबानी (Taliban) बैतुल्लाह महसूद का मुखौटा बाजार में उतारा और एक सर्वे कराया कि यह प्रोडक्ट कितना कामयाब रहेगा लेकिन अमेरिकियों ने उसे रिजेक्ट कर दिया, तब जाकर उनके मार्केटिंग मैनेजरों ने लादेन के मुखौटे पर ध्यान केंद्रित किया और सर्वे में रिपोर्ट भी पाजिटिव आई।

अपने यहां भी मुखौटे तो खैऱ सदा से रहे हैं और सिर्फ बच्चे ही उनको लगाकर एक-दूसरे को डरा रहे होते हैं और अपने यहां यह सब दशहरा से लेकर दीवाली तक या कभी-कभी होली पर होता है। लेकिन अगर आप किसी गांव में जाएं तो आपको खेतों में जगह-जगह मुखौटे लगे मिल जाएंगे जो पशु-पक्षियों को डराने के लिए लगाए जाते हैं। भारत में पाई जाने वाली छुटभैया से लेकर अक्सफर्ड डिक्शनरी में इसका मतलब बिजूका, धूहा, जूजू, हौव्वा और डरावा लिखा है लेकिन यह सब आपको हेलोवीन का अर्थ खोजने पर नहीं मिलेगा, बल्कि अगर आप स्केयर क्रो का अर्थ खोजेंगे तो यही सब शब्द मिलेंगे। लेकिन कुल मिलाकरर मुखौटा ही इन बिजूकों का बदला हुआ रूप है।

इन अमेरिकियों को मानना पड़ेगा कि इनके परदादा हमारे यहां खेतों में टहलने के दौरान यह कॉसेप्ट लेकर गए होंगे और अपने देश में इसकी आड़ में रोजगार के इतने अवसर पैदा कर दिए कि वह हेलोवीन ड्रिवेन मार्केट हो गया है। यहां किसी भारतीय समाज विज्ञानी या पत्रकार की नजर खेतों में खड़े इन मुखौटों पर पता क्यों नहीं पड़ी, वरना चांस यहां भी बन सकता था। लेकिन हम लोग चूंकि अमेरिकियों की जूठन खाने के आदी हैं तो छोटे-मोटे लेवल का हेलोवीन ड्रिवेन मार्केट यहां भी खड़ा कर देंगे।

बहरहाल, वह तो भला हो बीजेपी का, जब इस पार्टी के किसी नेता ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पार्टी का मुखौटा कहा तो भारत में भी मुखौटों का पहली बार सम्मान होना शुरू हुआ और देखते ही देखते बाजार तरह-तरह के मुखौटों या बिजूके से पटने लगा। अब यह तो पता नहीं कि फिलवक्त बीजेपी का नया मुखौटा या बिजूका कौन है लेकिन बीजेपी की राजनीति पर बारीक नजर रखने वाले बताते हैं कि निकट भविष्य में यह सेहरा नरेंद्र मोदी के सिर बांधा जा सकता है यानी उन्हें बीजेपी के नए मुखौटे के रूप में पेश किया जा सकता है। लेकिन राजनीतिक मुखौटों पर अभी बात नहीं करना चाहता।

अपने देश में भी बाकायदा मुखौटा ड्रिवेन मार्केट (यानी मुखौटा आधारित बाजार Halloween Driven Market) है। भारतीय चाहे अमेरिका से प्रेरणा लें या बीजेपी के मुखौटे से लेकिन उन्होंने इसे अपनी संस्कृति में बाकायदा ढालना शुरू कर दिया है। हर साल भारतीय मुखौटा बाजार तरक्की पर है। अब मुझे यह तो ठीक से नहीं पता कि भारतीय मुखौटा बाजार का सबसे बड़ा ब्रैंड (Big Brand) कौन है लेकिन अंदाजा है कि शायद भारतीय कंपनियां मोदी या मुख्तार अब्बास नकवी टाइप लोगों को ही अपना ब्रैंड एंबेसडर बनाना चाहेंगी। हालांकि इसमें अपने बॉलिवुड के शाहरुख खान, सलमान खान, आमिर खान, सैफ अली खान, इमरान खान या आने वाला कोई और खान फिट रहता लेकिन उनकी रुचि हेलोवीन में ज्यादा न होने के कारण भारतीय कंपनियां उन्हें मौका देना नहीं चाहतीं। हालांकि अमिताभ बच्चन से अगर बात करते तो वे शायद खुद या अमर सिंह को आगे करके इस काम को आसान कर देते लेकिन भारतीय कंपनियों के ब्रैंड स्टैंडर्ड शायद बहुत टफ मालूम पड़ते हैं।

एक खबर के मुताबिक दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में हेलोवीन क्लब बने हुए हैं जिनमें मोटी फीस भरकर कोई इनकी मेंबरशिप ले सकता है। बताया जाता है कि उस क्लब की हेलोवीन पार्टी में जाकर आप कुछ भी कर सकते हैं। यानी अगर गलती से आपका पड़ोसी उस पार्टी में मिल जाए और आप उसे पसंद नहीं करते तो आप उसे भूत, शैतान या आपकी पत्नी उसे चुड़ैल या डाइन (Witch) बनकर डरा सकती हैं। सोचिए कितना मजा आता होगा जब इस बहाने आप अपनी खुन्नस निकाल रहे होते हैं।

तो चलिए अपन लोग भी हेलोवीन जैसा कुछ मना डालते हैं...

Sunday, October 25, 2009

बाल ठाकरे, मुंबई भारत नहीं है

बाल ठाकरे आज उम्र के जिस पड़ाव पर हैं, उनसे सहानुभूति के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन इन भाई साहब ने अपने अवसान की बेला पर जिन शब्दों में मराठी मानुष (Marathi People) को अपने अखबार सामाना में गरियाया है, उसे एक बूढ़े इंसान के प्रलाप (Old Man's Agony) के अलावा और क्या कहा जा सकता है। शिवसेना को अपने जीवन के 44 साल देने वाले इस इंसान को अब याद आया है कि उसने कितनी बड़ी गलती की है। महाराष्ट्र में हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में शिवसेना को 44 सीटें मिली हैं और उसके सहयोगी दल बीजेपी की लुटिया डूब गई है। खैर बीजेपी तो बाकी दो राज्यों हरियाणा और अरुणाचल प्रदेश में भी बुरी तरह हार गई है।
बाल ठाकरे ने फरमाया है कि मराठी लोग जिस तरह हर छोटी-छोटी समस्या का समाधान कराने शिवसेना के पास आते थे क्या वे वोट देते वक्त उन बातों को भूल गए। उन्होंने अपने भतीजे राज ठाकरे को भी गद्दार बताया है। बाल ठाकरे का प्रलाप बहुत लंबा-चौड़ा है और उसे यहां दोहराने से कोई फायदा नहीं है लेकिन शिव सेना प्रमुख के प्रलाप के बाद हम और आप इस बात पर तो गौर करना ही चाहेंगे कि इस आदमी या इस आदमी के पार्टी की यह हालत क्यों बनी।
शिवसेना का गठन नफरत, भाषा की कट्टरता और एक दूसरे को बांटने की मुस्लिम लीगी टाइप अवधारणा पर हुआ था। बाल ठाकरे नामक शख्स मुंबई में बड़ी महात्वाकांक्षा वाला एक मामूली पत्रकार हुआ था। जिसने हिटलर (Hitler) से लेकर मोहम्मद अली जिन्ना की जीवनियों को बड़े ध्यान से पढ़ा था और कुछ-कुछ वैसा ही करने की चाहत मन में थी। आधुनिक इतिहास में अंध राष्ट्रवाद और अंध धर्मवाद को हवा देने वाले हिटलर और जिन्ना को बाल ठाकरे ने अपने जीवन में अपना लिया। एक ने पाकिस्तान का निर्माण धर्म के नाम पर करा दिया और एक ने हजारों निर्दोषों का कत्लेआम कराया। दुनिया ने नाजीवाद का नाम पहली बार सुना। आज उसी जर्मनी के लोग हिटलर से कितनी नफरत करते हैं इसका अंदाजा हम लोग भारत में बैठकर नहीं लगा सकते।
मुंबई अंग्रेजों के वक्त से ही भारत की वाणिज्यिक राजधानी (Commercial Capital) रहा है और यूपी और बिहार के लाखों गरीब लोग रोजगार की तलाश में मुंबई का रुख करते थे। इनमें से तमाम लोगों ने मेहनत के दम पर अपनी जड़े वहां जमा लीं। हालांकि कुछ लोग जुर्म की दुनिया में तो कुछ बॉलिवुड की दुनिया में भी गए यानी कुल मिलाकर मुंबई के हर तरह के विकास में यूपी, बिहार के अलावा तमाम उत्तर भारतीयों का योगदान रहा।
मुद्दे की तलाश में भटक रहे बाल ठाकरे ने इसी को भुनाया। चार पेज वाले सामना अखबार का रजिस्ट्रेशन कराकर उन्होंने जहर उगलना शुरू कर दिया। मानव स्वभाव है...वह ऐसी चीजों को सबसे पहले पढ़ता या देखता है जो नकारात्मक होती हैं। बाल ठाकरे और सामना ने मराठियों को इस बात के लिए प्रेरित किया कि वह उत्तर भारतीयों के खिलाफ खड़े हो जाएं। मुंबई से इसकी शुरुआत हुई। गली-मुहल्लों के तमाम असामाजिक तत्व शिवसेना के सदस्य बन गए। हाल के वर्षो में शिवसेना मुंबई और पूरे महाराष्ट्र में किस कदर मजबूत हो गई थी कि बिना बाल ठाकरे की मर्जी के कोई फिल्म खास तारीख पर रिलीज ही नहीं होती थी। अमिताभ बच्चन जैसे महान कलाकार को भी उनके दरवाजे पर दस्तक देनी पड़ी थी कि उनकी फिल्म आने वाली है। कुछ फिल्मों में तो बाल ठाकरे परिवार का पैसा तक लगा हुआ है। फिल्मी मोर्चे पर ठाकरे परिवार उद्धव की पत्नी के जरिए सक्रिय रहता था। बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे को जब बाल ठाकरे ने वैसी हैसियत नहीं दी तो उन्होंने बाल ठाकरे की घटिया राजनीति की डोर को पकड़कर उन्हें उसी भाषा में जवाब दे दिया और वह अब मराठी अस्मिता की नई पहचान बन गए हैं।
बाल ठाकरे हों या राज ठाकरे- ऐसे लोगों का राजनीति में फलना-फूलना बहुत खतरनाक है। आज इसलिए खुश नहीं हो सकते कि बाल ठाकरे का राजनीतिक अंत हो चुका है। क्योंकि राज ठाकरे उसी तरह की राजनीति को लेकर फिर हाजिर है। लेकिन इतना तय है कि नफरत की नींव पर खड़ी की गई बुनियाद स्थायी नहीं होती। मराठी ही नहीं देश के असंख्य लोग इस बात को धीरे-धीरे समझ रहे हैं। धर्म (Religion), भाषा (Language), जाति (Cast) और काले-गोरे (Blacks - Whites) की बुनियाद पर टिका समाज कभी न कभी लड़खड़ता है। पाकिस्तान का हाल हमारे सामने है जो अब अपना वजूद बचाने की लड़ाई अपने ही लोगों से लड़ रहा है। बाल ठाकरे की हम लोग चर्चा कर चुके हैं। शुद्ध जातिवाद की राजनीति के दम पर अपना कद बढ़ाने वाले मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव को आखिरकार जमीन देखनी पड़ी। मायावती ने दलितों के साथ हुए भेदभाव को इमोशनल ब्लैकमेलिंग के दम पर भुनाया है। तमाम भ्रष्टाचार के बावजूद अगर वह यूपी में दलितों को उनका हक न दिला पाईं तो यह एक प्रयोग की हार तो होगी ही साथ ही दलित आंदोलन को भी धक्का लगेगा। यानी मायावती के राजनीतिक रिपोर्ट कार्ड का नतीजा आएगा, पर जरा देर से।
शिवसेना की सहयोगी पार्टी बीजेपी का हाल शिवसेना जैसा होता ही नजर आ रहा है। नफरत को हवा देने वाली इस पार्टी को भी लोग अब समझ गए हैं। जिस पार्टी का एक जिम्मेदार पदाधिकारी मुख्तार अब्बास नकवी यह कहे कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVMs) के कारण बीजेपी चुनाव हारी, उस पार्टी की हताशा का अंदाजा आप लगा सकते हैं। आपको याद होगा कि अभी जब लोकसभा चुनाव के नतीजे आए थे और हमारे प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी ने ताज न मिलने पर कुछ ऐसा ही बयान दिया था। आडवाणी चूंकि एक जिम्मेदार नेता हैं तो केंद्रीय चुनाव आयोग ने फौरन अपने दफ्तर में ढेरों ईवीएम मंगाकर बीजेपी समेत सभी राजनीतिक दलों को बुलाकर पूछा कि वे खुद आकर जांच करें और बताएं कि इसमें गड़बड़ी की संभावना या आशंका कहां है। बीजेपी और तमाम राजनीतिक दल वहां पहुंचे, कई दिन तक उनके दिग्गज टेक्नोक्रेट से लेकर ब्यूरोक्रेट और अंत में चालाक, धूर्त और मक्कार खादी पहनने वाले नेता भी उन मशीनों की टेस्टिंग करते रहे लेकिन कोई कुछ बता नहीं बताया।
...यही होता है जब हम लोग अपनी गलतियों के लिए झूठे आधारों की तलाश करते हैं।

Friday, October 16, 2009

पर्यावरण की चिंता के साथ दीपावली मुबारक

इस दिवाली पर ब्लॉग एक्शन डे वालों ने इस दिन को पता नहीं जानबूझकर या अनजाने में पर्यावरण (Enviornment) से जोड़ दिया है। यानी इन दो दिनों में हम लोग पर्यावरण को लेकर संकल्प लें। यह संदेश इतने जोर-शोर से पहुंचाना है कि इस सिलसिले में दुनिया के तमाम देशों की जो बैठक हो रही है, उसमें ब्लॉगर्स (Bloggers) का भी एक प्रेशर ग्रुप (Pressure Group) मौजूद रहे। आप मेरे ब्लॉग की दाईं तरफ ऊपर की ओर जो चीज देख रहे हैं वही ब्लॉग एक्शन डे (Blog Action Day) का निशान और लिंक है। मैं और मेरे जैसे तमाम लोग इस महती कार्य में शामिल हैं लेकिन मैंने जानबूझकर भाषा के रूप में हिंदी का चयन किया, हालांकि वहां अंग्रेजी वालों का बोलबाला है।

बहरहाल, यह तो हुई उनकी कहानी लेकिन इस दिवाली पर मैं महसूस कर रहा हूं कि लोग काफी जागरुक हो गए हैं या कहिए महंगाई और मंदी (Recession) का भी असर है कि तीन दिन पहले पटाखे फोड़ने के नाम पर होने वाला शोरशराबा इस बार नहीं के बराबर है। लेकिन हम लोगों का यह त्योहार रोशनी, संपन्नता का है तो बिना पटाखे फोड़े बिना मनाने की सलाह मैं नहीं देने वाला। यह तमाम पूंजीवादी देशों (Capitalist Countries) का रोना-पीटना है जो पर्यावरण रक्षा के नाम पर गरीब देशों को यह न करो-वह न करो कि जबरन सलाह देते रहते हैं। अब यह लगभग साबित हो चुका है कि दुनिया के तमाम देश और खासकर विकसित (पूंजीवादी भी कह सकते हैं) देश जानलेवा गैसों के उत्सर्जन (यानी पैदा करने में) में सबसे आगे हैं लेकिन वे अपने लिए न तो कोई नियम बना रहे हैं और न ही किसी बात का पालन कर रहे हैं। इन सब की अगुआई अमेरिका (US) कर रहा है।

इसलिए दीपावली की हार्दिक बधाई देते हुए तमाम सरोकारों को मद्देनजर रखते हुए ही हम लोगों को यह त्यौहार मनाना है।

एक खास सूचना यह भी है कि आपके इस ब्लॉग हिंदी वाणी को एक साल पूरा हो गया है और जो लोग हमारे कारवां में देश-विदेश से जुड़े हैं, मैं उनका तहेदिल से शुक्रिया अदा करना चाहता हूं। आशा है कि स्नेह बना रहेगा। हालांकि एक साल पूरा होने पर मैं तमाम लफ्फाजी भरी बातें यहां लिख सकता था लेकिन यह कोई इतनी बड़ी घटना नहीं है कि इसके लिए आपका समय नष्ट किया जाए। सो दीपावली की पावन बेला और इस ब्लॉग के एक साल पूरा करने पर हार्दिक मुबारकबाद पेश करता हूं। आइए एक दीया जलाएं...हम सभी में फैले अंधकार को दूर भगाने के लिए....

Sunday, October 11, 2009

अशांति फैलाओ और नोबल पुरस्कार पाओ


अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा को नोबल पुरस्कार की खबर कुछ भारतीय अखबारों के लिए लीड थी तो दूसरी तरफ कुछ अमेरिकी अखबारों में यह छप रहा था कि क्या यह आदमी नोबल पुरस्कार का हकदार है। राष्ट्रपति की कुर्सी संभाले इस आदमी को चंद महीने ही हुए हैं और किस आधार पर इसे नोबल पुरस्कार वालों ने शांति का मसीहा मान लिया। हालांकि कुछ भारतीय अखबारों ने सवाल उठाया कि क्या महात्मा गांधी इस पुरस्कार के हकदार नहीं थे जिन्होंने अहिंसा के बल पर अपने आंदोलन को कामयाब बनाया। लेकिन गांधी जी को इस पुरस्कार के देने में एक नियम आड़े आ गया...कि नोबल पुरस्कार कमिटी सिर्फ उन्हीं लोगों को इसके लिए चुनती है जो जिंदा हैं। यानी जो मर चुके हैं उनके कार्यों का मूल्यांकन संभव नहीं है। यह अजीबोगरीब नियम हैं और दुनिया में जितने भी पुरस्कार दिए जाते हैं उनमें इस तरह के नियम नहीं आड़े आते। लेकिन हम लोग क्या कर सकते हैं...पूंजीवादी देश अपनी शर्तों पर कर्ज देते हैं और अपनी ही शर्तों पर पुरस्कार भी देते हैं। नोबल के लिए यह जरूरी है कि आपका जुड़ाव अमेरिका या यूरोप की किसी यूनिवर्सिटी या संस्था से जरूर हो नहीं तो आपके काम को मान्याता नहीं मिलेगी। वह चाहे फिर अर्मत्य सेन या वी. एस. नॉयपाल ही क्यों न हों।

अमेरिकन मीडिया ने ओबामा को नोबल दिए जाने पर सवाल उठाते हुए कुछ आंकड़े पेश किए, जिन्हें बहुत संक्षेप में मैं आपके सामने रख रहा हूं।

इराक पर जब से अमेरिकी फौज का कब्जा हुआ, वहां अब तक (यानी कल शनिवार 10 अक्टूबर तक) 1,339,771 इराकी नागरिक मारे जा चुके हैं। यह आंकड़ा अमेरिकी रक्षा विभाग यानी पेंटागन का है।

अभी तक इराक में जो अमेरिकी सैनिक मारे गए, उनकी तादाद पेंटागन के मुताबिक 4,667 है।

इराक में अब तक फौज को रखने और वहां लड़ने पर अमेरिका अब तक 689,794,745,678 डॉलर खर्च कर चुका है।

अफगानिस्तान में फौज को रखने और वहां लड़ने पर अमेरिका अब तक 228,759,193,154 डॉलर खर्च कर चुका है।

जॉर्ज डब्ल्यू बुश के समय में ही अमेरिकी लोग बुश के खिलाफ हो गए थे और उनका मानना था कि बुश की इराक व अफगानिस्तान नीति गलत है। बुश ने जिस तरह तमाम देशों में अमेरिकी विस्तारवादी नीति के छेड़छाड़ की, उसकी वजह से अमेरिका पर आतंकवादी हमला हुआ और आने वाले समय में पूरी दुनिया में अमेरिकियों के आने-जाने पर ऐसे हमलों की आशंका बढ़ गई। ओसामा बिन लादेन को बुश के समय में ही अफगानिस्तान के खिलाफ खड़ा किया गया और वह उल्टा उसी के गले की फांस बन गया।

ओबामा से एक उम्मीद थी कि वह कुछ करेंगे। उन्होंने अपने लफ्फाजी भरे भाषणों में इसकी झलक भी दिखाई। फौरन ही इराक से अमेरिकी फौज की वापसी की घोषणा कर दी गई लेकिन बाद में यह समय सीमा बढ़ा दी गई। फिर उनका भाषण आया कि इराक में अमेरिकी कंपनियों के हितों का पूरा ध्यान रखा जाएगा। यह भाषण और संकेत कापी चौंकाने वाला था। अमेरिका में जिस तरह लोग बुश के खिलाफ हो गए थे वही हालात ओबमा के लिए पैदा हो रहे हैं। अमेरिका में जिन परिवारों के लोग फौज में है, उनके बीच कराए गए एक सर्वे से पता चलता है कि वे लोग अमेरिकी फौज की इराक से तुरंत वापसी चाहते हैं। लेकिन मुट्ठी भर अमेरिकी कंपनियों के हितों की अनदेखी कर अमेरिकी फौज भला जल्दी कैसे वापस आएगी।

अमेरिकी के जाने-माने स्तंभकार पॉल क्रेग रॉबर्टस, सिंडी शीहन, थॉमस डिलोरेंजो, जॉन फीफर, डेविड माइकल ग्रीन ने अपने कॉलमों में जमकर इस बात की धज्जियां उड़ाई हैं कि ओबामा की नीतियां इस देश को गर्त में ले जा रही हैं। एक तरफ अमेरिका में बेरोजगारी बढ़ रही है तो दूसरी तरफ ओबामा के फैसले उसे और बढ़ा रहे हैं। शनिवार को अमेरिकी संस्था फेमिली रिसर्च काउंसिल ने भी ओबामा के तमाम भाषणों और नीतियों की निंदा की है। फाउंडेशन के अध्यक्ष टोनी पर्किंस का कहना है कि ओबामा को जो नीतियां बनानी चाहिए थीं, उसके बजाय वह अन्य चीजों में उलझे हैं।

Tuesday, October 6, 2009

प्यार करें या न करें


प्यार करें या न करें (टु लव आर नॉट टु लव )...विलियम शेक्सपियर ने जब इस लाइन का इस्तेमाल अपने एक उपन्यास में किया था तो उन्हें भी शायद यह उम्मीद नहीं रही होगी कि कई सौ साल बाद दुनिया में इस पर बहस शुरू हो जाएगी। प्यार की नई परिभाषाएं गढ़ी जाएंगी और साइबर लव व कैंपस लव जैसे शब्दों का इस्तेमाल हम लोग करने लगेंगे। अगर आप गूगल में ही अंग्रेजी के इस मुहावरे को तलाशने लगें तो चौकें बिना नहीं रहेंगे कि भाई लोगों ने इस मुहावरे पर कितनी सारी सामग्री को गूगलमय कर दिया है। पर यह सब अंग्रेजी में है। हिंदी में तो सारे ही कामदेव के अवतार हैं और उन्होंने एक कामशास्त्र क्या गढ़ लिया है...उसी को अल्टीमेट रामबाण औषधि मानने लगे हैं।

...आप बहके और चौंके नहीं...कि आखिर मैं यह क्या विषय लेकर बैठ गया...जहां राजनीति पर बहस होती हो,जहां सामाजिक सरोकारों पर बहस होती हो, वहां यह क्या विषय आ गया। पर मित्रों, इस विषय पर भी बात करना बहुत जरूरी है। हुआ यह है कि पाकिस्तान की सबसे प्रतिष्ठित लाहौर यूनिवर्सिटी (Lahore University) में एक छात्रा ने यूनिवर्सिटी के आंतरिक ईमेल सिस्टम (इन्ट्रानेट) के जरिए सभी स्टूडेंट्स, प्रोफेसरों व अन्य स्टाफ को एक ईमेल भेजा, जिसका विषय यही था कि लव आर नॉट टु लव (To Love or not To Love) । उसने लिखा है कि वह यह सुन-सुन कर तंग आ चुकी है कि लाहौर यूनिवर्सिटी की छात्राओं को बाहर सोसायटी में महिलाएं अच्छी नजर से नहीं देखती और यही नहीं, उनमें से तमाम महिलाएं यहां की छात्राओं को पवित्र नहीं मानतीं यानी उनकी वर्जिनटी (Virginity) नष्ट हो चुकी है। उस छात्रा का कहना है कि जब उसने इस बात पर गौर किया तो पाया कि उन महिलाओं की बात में दम जरूर है। उसने यूनिवर्सिटी कैंपस में चुपचाप फोटो भी खींचे कि जिससे वह अपनी बात को पुष्ट कर सके। इसके बाद उस छात्रा ने उस ईमेल को अपने ब्लॉग पर भी डाल दिया और वहां इस पर बहस जारी है। ज्यादातर पुरुषवादी सोच के छात्रों ने उस छात्रा को काफी खरी-खोटी सुनाई है और उसके ईमेल को एटम बम करार दिया। एक छात्र ने कहा कि अब जब उस छात्रा की पढ़ाई पूरी होने में छह महीने बाकी रह गए हैं तो उसने यह विषय क्यों उठाया, वह पिछले चार साल से यहां क्या कर रही थी। ...यानी जितने मुंह उतनी बातें।

अब अपने यहां का रुख करते हैं। किस यूनिवर्सिटी की बात करें। दिल्ली यूनिवर्सिटी, जेएनयू, बीएचयू या फिर एएमयू। संयोग से मुझे इन सभी यूनिवर्सिटियों के कैंपस में जाने का मौका मिला। अगर हम लोग भारत के संदर्भ में उस छात्रा के ईमेल को कसौटी पर रख कर देखें तो उसकी बातें बहुत ही दकियानूसी लगेंगी। लेकिन अगर आप गहराई से विचार कर देखें तो इस मामले में गरीब देश यानी तीसरी दुनिया के देश धीरे-धीरे उस तरफ बढ़ रहे हैं जहां आज अमेरिका और इंग्लैंड जैसे देश हैं। वहां कम उम्र में लड़कियों का गर्भवती होना एक सामाजिक समस्या बन गया है और वहां परिवार नामक ढांचा बिखर गया है। बच्चों के रंग मनोविज्ञान पर किताब लिखनी वाली अमेरिकन लेखिका ब्रिटनी जॉनसन (Brittany Johnson) इन स्थितियों के लिए वहां की नेस्टी महिलाओं (Nasty Women) को इसके लिए जिम्मेदार मानती हैं। ऐसी महिलाएं जो लंपट किस्म की हैं और परिवार बनाने की तरफ उनका ध्यान नहीं रहता है। यह आदत उनमें शुरू से ही पड़ जाती है। उनका कहना है कि प्यार तो एक पवित्र चीज है लेकिन अब जिस तरह उसकी परिणिति शारीरिक संबंधों (Physical Relations) में होने लगी है...वह खतरनाक है।

हमारे देश की यूनिवर्सिटियों में भी खुलापन (Openness) है और मेरे सामने ऐसे कई उदाहरण हैं जहां दोनों तरफ से सच्चा प्यार होने के बाद शादी भी हुई लेकिन अब इधर तेजी से ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं जब छात्राओं के साथ छल हुआ है। पुलिस का निचोड़ यह है कि ऐसी घटनाओं को ज्यादातर जान-पहचान वाले ही जन्म देते हैं। अभी ताजा-ताजा दिल्ली में कई ऐसी घटनाएं घटीं जो दहलाने वाली है। होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रही एक छात्रा जब एक महीने बाद लौटी तो उसने पुलिस में रिपोर्ट लिखा दी कि उसके सहपाठी ने एक महीने तक विभिन्न शहरों में उससे रेप किया और उसे हंसने पर मजबूर करते हुए उसकी न्यूड फोटो और विडियो बनाई। पुलिस अफसरों का कहना है कि छात्रा के आरोप की जांच होगी। लेकिन कम से कम आपके गले छात्रा का आरोप नहीं उतरा होगा। पुलिस के कुछ अफसर दबी जबान से कहते हैं कि माता-पिता शुरू से इन बातों पर ध्यान नहीं देते और खुलेपन के नाम पर आजादी दे देते हैं। इसका मतलब यह भी नहीं कि आप परिवार का तालिबानीकरण कर दें लेकिन किसी न किसी मुकाम पर कुछ चीजें तो दुरुस्त करने की जरूरत है ही।

हमारी शिक्षा व्यवस्था के पैरोकारों ने शुरू में स्कूल के लेवल से ही सेक्स एजुकेशन (Sex Education) देने की बात को काफी हवा दी और उतना ही उसका मुखर विरोध भी हुआ। इन दोनों के बीच में यह प्रश्न अनुतरित ही रहा कि क्या हमारे स्कूली स्टूडेंट्स को सेक्स एजुकेशन की जरूरत है। लेकिन न तो किसी समाजशास्त्री ने इस पर आगे बढ़कर अध्ययन की जरूरत बताई और न हमारे नेताओं ने इस पर रिसर्च कराने की बात कही। चलिए मान लेते हैं कि इसमें रिस्क है, पर हम लोग यह तो कर ही सकते थे कि स्कूल लेवल से मॉरल एजुकेशन (Moral Education) जैसी कोई चीज शुरू करते। तमाम ईसाई मिशनरी के स्कूलों में इसे पिछले कुछ सालों में शुरू किया गया है लेकिन सरकारी स्कूलों में तो जब स्पोर्ट्स के लिए टीचर नहीं होते तो भला मॉरल एजुकेशन के लिए कहां से टीचर रखे जाएंगे। यह मान लीजिए कि अपने देश के भी कॉलेजों और यूनिवर्सिटियों में लाहौर यूनिवर्सिटी के मुकाबले माहौल कम खराब नहीं है। अभी दिल्ली के ही कॉलेजों और जेएनयू में छात्र को नंगा करके उसकी रैंगिंग (Ragging) करने की घटनाएं तो यही बताती हैं कि यह सब एक सड़ी हुई मानसिकता की देन है। इसे महज खुलेपन के नाम पर नजरंदाज करने की भूल नहीं करनी चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में विचारों के खुलेपन की कुछ सीमा तो तय ही करनी होगी।

इस लेख के नीचे वह खबर है जिसमें लाहौर यूनिवर्सिटी में चल रही उस बहस का जिक्र है। उस खबर को पढ़ने से आपको इस लेख का संदर्भ समझने में आसानी रहेगी।


The love lives of students at a premier educational institute in Pakistan have become the subject of a heated debate.
The campus of the elitist Lahore University of Management Sciences, which has been divided between conservative, retro-revisionists, ultra-modern, party-hopping and next-generation liberals, was witness to the debate when a woman student sent a mass email on the university's mailing system.
The unnamed student, thought to be a conservative, sent out the email saying she was fed up with on-campus indecency. The mail titled To love or not to love, has been described as a social suicide bomb by Asif Akhtar, a recipient of the mail.

The student claimed some senior students have to seek physical consolation from the members of opposite sex many times in a day on campus and in public sight. To back her claims, she provided specific examples and collected photographic evidence.

Akhtar quoted the student's email in his blog. Standing at the main entrance, a girl stands on tip of her toes and kisses a boy good bye; lying in the lawn in front of the library, a boy rolls over the girl lying down beside him and remains in this posture; sitting in the academic block, a boy constantly rubs a girls leg.....

After furnishing this evidence, the student points out that because of such behaviour, aunties spread rumours that doubt the chastity of girls studying in LUMS.

Advocating a religious, cultured and social environment at the campus, the student asked the university administration to draw out rules that outline an inter-gender code of conduct on campus.

The email has elicit strong responses on the campus. One male student responded with a I have sinned mail.

I shave twice a week and my 'painchas' (trousers) hang obstinately below my heels. I have a penchant for ties that resemble the Christian cross and my satanic dress code is causing me to stray far, far away from the straight path. During the holy month (of Ramzan), instead of attending Quranic recitals in the mosque, I was listening to the demonic sounds of Pink Floyd, the student wrote further in his email.
He blamed deviant professors for this transition, whose theories made his moral-compass go awry.

Sheikh Umer Zaheer Tajwar, another recipient of the mail, wrote in lumsdailystudent.com, Larki, you had four years to bring it up; why now? You have courageously tolerated this fiesta, why are you pulling the plug on it when you have six months left?

Wednesday, September 30, 2009

राहुल तोड़ दो इस सिस्टम को


राहुल गांधी के बारे में आपकी क्या राय है...शायद यही कि वह मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए हैं और एक ऐसे खानदान से हैं, जिसके अनुकूल सारी परिस्थितियां हैं। उनकी मॉम देश की सत्ता को नेपथ्य से चला रही हैं। उनके आसपास जो कोटरी है वह राहुल को स्थापित करने में जुटी हुई हैं। पर, जनाब अगर आपकी दिलचस्पी भारतीय राजनीति में जरा भी है तो अपनी राय बदलिए। यह कोई जबर्दस्ती नहीं है लेकिन हां, कल आप अपनी राय जरूर बदलेंगे।

भारतीय राजनीति (Indian Politics) में होने जा रहे इस बदलाव का मैं चश्मदीद गवाह हूं। इन लम्हों के लिए मैं खुद को सौभाग्यशाली मानता हूं। जब मैंने पत्रकारिता शुरू की थी तो स्व. राजेंद्र माथुर सीख देते थे कि अगर भारत में पत्रकारिता करनी है तो भारत-पाकिस्तान बंटवारे से लेकर इंदिरा गांधी शासनकाल तक के घटनाक्रम को गहराई और बारीकी से जानना और समझना जरूरी है।...और आज जबकि भारतीय राजनीति में नेहरू के बाद स्टेट्समैन (Statesman) का खिताब पाने वाले अटलबिहारी वाजपेयी सीन से हट चुके हैं, आडवाणी की विदाई नजदीक है, मनमोहन सिंह की अंतिम पारी चल रही है और ऐसे में देश की दो महत्वपूर्ण पार्टियों कांग्रेस और बीजेपी के पास एक दूसरे को काउंटर करने को दो ही शस्त्र हैं। कांग्रेस के पास राहुल टाइप राजनीतिक मिसाइल है तो बीजेपी के पास मोदी मार्का एटम बम है। दोनों ही पार्टियां आने वाले वक्त में इन्हीं दो हस्तियों के आसपास अपनी राजनीति को केंद्रित रखेंगी। चाहे आप राजनीति शास्त्र के स्टूडेंट हैं या फिर इस महान देश के लोकतांत्रिक मूल्यों (Democratic Values) में यकीन रखते हैं या साफ-साफ यूं कहें कि आप लेखक-पत्रकार ही क्यों न हों तो इन दो लोगों के मूवमेंट, इनके बयान इनकी कथनी-करनी पर नजर रखनी होगी।

अगर आप इन दो शख्सियतों की सामान्य तुलना करें तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आएंगे। पहले मोदी की बात। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का विकास बीजेपी (BJP) या संघ (RSS) में कई चरणों में हुआ। मैं इस शख्स को तब से जानता हूं जब यह व्यक्ति पंजाब का प्रभारी हुआ करता था और चंडीगढ़ जैसे शहर में एक सामान्य जिंदगी गुजार रहा था। पंजाब में बीजेपी ने जो कुछ सीटें जीती थीं वह इसी आदमी के संगठन क्षमता की देन थी। पंजाब के एक मौजूदा मंत्री मनोरंजन कालिया तो आजतक इस आदमी के गुण गाते हैं। बीजेपी व संघ के गैर शादीशुदा नेताओं के बारे में आमतौर पर जो प्रचार (या कुप्रचार ही मान लेते हैं) चलता है, उसे लेकर मोदी भी अछूते नहीं रहे। मोदी को जब गुजरात का नेतृत्व मिला तो उन्होंने उसे संघ की प्रयोगशाला बनाकर बीजेपी के तमाम बड़े नेताओं की बोलती बंद कर दी। यह अलग बात है कि बीजेपी को अब उसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है और आगे भी चुकानी पड़ेगी। लेकिन मोदी के समर्थक इसे ही उनकी सफलता मानते हैं। गुजरात में हुए नरसंहार (Gujarat Genocide – Gujarat Massacre ) का सबसे बड़ा दाग भी इसी आदमी के माथे पर है। अभी एक दिन पहले जब इस शख्स ने कमांडो के शस्त्रों को लेकर उसकी पूजा (Worship of Weapon) की तो इस व्यक्ति की मनोवृत्ति (Thinking) का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।


दूसरी तरफ राहुल गांधी हैं जो मोदी के मुकाबले राजनीति में न तो परिपक्व हैं और न ही किसी पार्टी के कैडर (Party Cadre) ने उन्हें खड़ा किया है। यही बात उनके पक्ष में भी जाती हैं। मोदी जब अपने रात-दिन शस्त्रों की पूजा में लगा रहे हैं तो राहुल के दिन-रात दलितों के साथ बीत रहे हैं। शुरुआत में यही कहा गया कि यह सब सस्ती लोकप्रियता पाने का जरिया है लेकिन अब वही टिप्पणीकार अपनी राय बदल रहे हैं। राहुल के इस एक एक्शन ने यूपी की दलित मुख्यमंत्री मायावती की नींद उड़ा दी है जो दलितों को वोट बैंक के रूप में काफी दिनों से ट्रीट कर रही हैं। कांग्रेस का यह अकेला सांसद है जिसने नरेगा के फंड पर बारीक नजर रखी हुई है कि किस गांव में कौन सा राज्य कितना खर्च कर रहा है। इस नेता के पास ताजा आंकड़ा हमेशा उपलब्ध रहता है। मंगलवार (29 सितंबर) की रात दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू JNU) में जो कुछ हुआ, वह खबर शायद अभी आपकी नजरों से नहीं गुजरी होगी। पता नहीं खबरिया चैनल उसे दिखा रहे हैं या नहीं मुझे नहीं मालूम।

क्या हुआ जेएनयू में

मंगलवार की रात राहुल गांधी जेएनयू गए थे स्टूडेंट्स से सीधा संवाद करने लेकिन वहां हंगामा हो गया। इस मीटिंग में सिर्फ जेएनयू के ही स्टूडेंट्स को ही आने की अनुमति थी। किसी भी तरह के मीडिया को यहां आने की मनाही थी। बहरहाल, मीडिया तक छनकर खबरें पहुंच गईं। राहुल जैसे ही वहां बोलने के लिए खड़े हुए कुछ स्टूडेंट्स काले झंडे लेकर वहां नारेबाजी करने लगे। हालांकि 1984 के सिख विरोधी दंगों में गरीब राहुल या उनके पिता राजीव की कोई भूमिका नहीं थी लेकिन स्टूडेंट्स नारे लगा रहे थे- एक धक्का और दो, 84 के दोषियों को फेंक दो।

राहुल ने इस विरोध से मुंह चुराना या वहां से खिसकना मुनासिब नहीं समझा। वह वहीं डटे रहे। उन्होंने उन स्टूडेंट्स से कहा कि वे उनसे आकर बात करें। जब हंगामा नहीं थमा तो राहुल ने उनसे कहा कि अब मेरे पास दो विकल्प हैं- या तो मैं स्टेज पर खड़ा रहूं या फिर नीचे आकर आपसे बात करूं। इसके बाद राहुल स्टेज से उतरे और सीधे जाकर उन स्टूडेंट्स के बीच में जाकर खड़े हो गए। धीरे-धीरे नारे शांत हो गए।

पर, जेएनयू के बुद्धिजीवी टाइप स्टूडेंट्स जो ठानकर आए थे कि राहुल से तमाम मुद्दों पर सवाल पूछना है, वे कहां मानने वाले थे। उन्होंने सवालों की बौछार कर दी। राहुल ने उनका सामना किया। राहुल ने कहा – आप मुझे चुप कराने का इरादा लेकर आए होंगे, हो सकता है आप कामयाब भी हो जाएं लेकिन इससे क्या दुनिया बदल जाएगी, दुनिया बदलेगी हमारे और आपके मिलकर काम करने से। उन्होंने बताया – मैं अभी कई दलित घरों में गया था। मैंने उनसे पूछा कि आपके जीवन में सबसे ज्यादा खुशी का दिन कौन सा था, उन दलितों ने जवाब दिया कि जिस दिन हमारे कर्ज माफ किए गए। राहुल ने कहा – मैं नेता हूं, लोगों से मिलना मेरा फर्ज है। बाकी 99 नेता किसी के घर नहीं जाते। लेकिन उनसे कोई सवाल नहीं पूछा जा रहा है। मेरे जाने पर हंगामा किया जा रहा है।

राहुल के पास एक चिरपरिचित सवाल आया जो आपका भी हो सकता है और मेरा भी क्योंकि मैंने अपनी बात वहीं से शुरू की थी। एक स्टूडेंट ने राहुल से कहा कि आप बिना कुछ किए धरे (यानी संघर्ष किए बिना ही) यूथ आइकन (Youth Icon युवाओं की पहचान) बन गए हैं। राहुल का जवाब सुनिए – मैं इसी सिस्टम से आया हूं। मेरे पास दो रास्ते थे, मैं घर बैठ जाता तो आप लोग मुझे कायर कहते। तो मैं इस सिस्टम का हिस्सा बना क्योंकि इस सिस्टम में रहकर ही मुझे इसे खत्म करना होगा। मैं इस सिस्टम (Corrupt System) का उतना ही विरोधी हूं, जितने आप हैं लेकिन मेरी इस बात पर आप लोगों को यकीन शायद नहीं होगा।

...अगर आप राहुल की बातों पर गौर फरमाएं तो पाएंगे कि यह शख्स कांग्रेस संस्कृति (Congress Culture) से थोड़ा हटकर बात कर रहा है। ऐसी उम्मीद है कि जब कभी सत्ता की बागडोर उसे मिलेगी तो वह इस सिस्टम को तोड़ेगा। हालांकि अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी लेकिन कौन नहीं जानता कि राजीव गांधी ने अल्प समय में भारत के युवाओं के लिए जो कुछ किया, आज उसका असर चारों तरफ दिखाई दे रहा है। मौजूदा पीढ़ी के लिए भी राहुल एक उम्मीद हैं। तमाम राजनीतिक अपरिपक्वता के बावजूद वह मोदी के व्यक्तित्व पर भारी पड़ रहे हैं।

Friday, September 25, 2009

मेरे जूते की आवाज सुनो


इराक के पत्रकार मुंतजर अल-जैदी ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश पर जब पिछले साल जूता फेंका था तो पूरी दुनिया में इस बात पर बहस हुई कि क्या किसी पत्रकार को इस तरह की हरकत करनी चाहिए। उसके बाद ऐसी ही एक घटना भारत में भी हुई। यह बहस बढ़ती चली गई। बुश पर जूता फेंकने वाले इराकी पत्रकार अभी हाल ही में जेल से छूटे हैं। जेल से छूटने के बाद यह पहला लेख उन्होंने लिखा, जिसे हिंदी में पहली बार किसी ब्लॉग पर प्रकाशित किया जा रहा है। उम्मीद है कि इस लेख से और नई बहस की शुरुआत होगी...

मैंने बुश पर जूता क्यों फेंका
-मुंतजर अल-जैदी

अनुवाद – यूसुफ किरमानी

मैं कोई हीरो (Hero) नहीं हूं। मैंने निर्दोष इराकियों का कत्ले-आम और उनकी पीड़ा को सामने से देखा है।

आज मैं आजाद हूं लेकिन मेरा देश अब भी युद्ध के आगोश में कैद है। जिस आदमी ने बुश पर जूता फेंका, उसके बारे में तमाम बातें की जा रही हैं और कही जा रही हैं, कोई उसे हीरो बता रहा है तो कोई उसके एक्शन के बारे में बात कर रहा है और इसे एक तरह के विरोध का प्रतीक मान लिया गया है। लेकिन मैं इन सारी बातों का बहुत आसान सा जवाब देना चाहता हूं और बताना चाहता हूं कि आखिर किस वजह से मैं बुश पर जूता फेंकने पर मजबूर हुआ। इसका दर्द काश आप लोग समझ पाते...कि जिसके देश की सार्वभौमिकता को फौजियों के बूटों तले रौंद डाला गया, जिसके देशवासियों को कदम-कदम पर अपमान सहना पड़ा, जिसके निर्दोष देशवासियों का खून बहाया गया।

हाल के वर्षों में दस लाख से ज्यादा लोग इराक में फौजियों की गोली का निशाना बने और अब देश में पांच करोड़ से ज्यादा यतीम-बेसहारा लोग, दस लाख विधवाएं और हजारों ऐसे निरीह जिन्होंने यह दुनिया ही नहीं देखी। लाखों लोग इस देश में और इस देश से बाहर (यानी इराकी) बेघर हो गए।

हमारा देश एक ऐसा देश हुआ करता था जहां अरब वाले भी थे, तुर्की भी थे तो कुर्द, असीरी, साबीन और यज्दी अपनी रोटी-रोजी कमाते थे। जहां बहुसंख्यक शिया लोग सुन्नियों के साथ एक ही लाइन में नमाज पढ़ते थे...जहां मुसलमान ईसाइयों के साथ हजरत ईसा मसीह का जन्मदिन (Birthday of Christ) एक साथ मनाया करते थे। हालांकि हमारे देश पर पिछले दस साल से तमाम तरह के प्रतिबंध लगा दिए गए थे लेकिन हम लोग इसका मुकाबला जैसे-तैसे एक साथ कर रहे थे। अगर हम लोग भूखे भी रहे थे और हर कोई इसमें भी साथ था।

हम इराकी अपने धैर्य और एकता के दौरान हुए हमलों को कभी नहीं भूले। इसी हमले ने तो भाई-भाई को बांट दिया, पड़ोसी को पड़ोसी से दूर कर दिया। हमारे घर मातम वाले टेंटों में बदल गए।

मैं कोई हीरो नहीं हूं। लेकिन मेरा अपना एक विचार है। मेरा एक स्टैंड है। जब मेरे देश की बेइज्जती की गई तो इसे मैंने अपनी बेइज्जती समझा, मैंने अपने बगदाद को शोलों (Baghdad Burning) में घिरा पाया, जहां लाशों पर लाशें बिछाई जा रही थीं। मैं कैसे हजारों पीड़ादायी फोटो को भुला दूं, जो मुझे संघर्ष के लिए आगे धकेल रही थीं। अबू गरीब जेल का स्कैंडल, फालूजा का कत्लेआम, नजफ (Najaf), हदीथा, सद्र सिटी, बसरा, दियाला, मोसूल, ताल अफार और देश का कोना-कोना एक लहुलूहान शक्ल लिए नजर आता था। मैंने अपनी जलती हुई धरती के बीच यात्राएं की, अपनी आंखों से पीड़ितों, यतीमों और जिनका सबकुछ लुट चुका था, उनकी चीखें सुनी। मैंने खुद के होने पर शर्म महसूस की, क्योंकि मेरे पास सत्ता नहीं थी।

रोजाना तमाम त्रासदियों की अपनी प्रोफेशनल ड्यूटी पूरी करने के बाद जब मैं मलबे में तब्दील हो चुके इराकी मकानों को साफ करता या अपने कपड़े पर लगे खून को साफ करता को गुस्से में अपने दांत किटकिटाता और तब प्रण करता कि मैं इसका बदला लूंगा।...और जब मौका आया तो मैंने देर नहीं लगाई।

मैंने जब अपना जूता फेंकने के लिए निकाला तो मेरी नजर उन खून भरे आंसुओं को देख रही थीं जो अपने ही देश पर कब्जा होने की वजह से लगातार रो रही थीं, मेरी कानों में उन बेबस मांओं की चीखें गूंज रही थीं जिनके बच्चे मार दिए गए थे, मैं उन यतीम-बेसहारों लोगों की आवाज सुन रहा था जो अपने माता-पिता को खो चुके थे, मेरे सामने उन दर्द भरी सिसकारियों की आवाज थी जिनके साथ बलात्कार किया गया था...

जूते फेंकने के बाद जब कुछ लोग मेरे पास आए तो मैंने उनसे कहा, क्या आप जानते हैं कि कितने ही टूटे घरों (Broken Houses) की आवाज था वह जूता। उसकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित हुई। जब सारे मानवीय मूल्य (Human Values) ध्वस्त हो चुके हों तो ऐसे में हो सकता है कि वह जूता ही सही जवाब था।
मैंने जब उस अपराधी (Criminal) जॉर्ज बुश (George Bush) पर जूता फेंका तो मेरा यह एक्शन दरअसल उसके तमाम झूठों और मक्कारियों को खारिज करने के लिए था, यह मेरे देश पर उसके कब्जे के खिलाफ सही निशाना था, उसने जिस तरह मेरे अपने लोगों को जो बेगुनाह थे, उनका कत्ल कराया, यह जूता उनकी आवाज था। मेरा जूता उसकी उस नीयत के खिलाफ था, जिसकी वजह से हमारे देश की दौलत लूटी गई, हमारे सारे संसाधनों को तहस-नहस कर दिया गया और हमारे बच्चों को दिशाहीन हालत में छोड़ दिया गया।

अगर आप समझते हैं कि बतौर पत्रकार मुझे यह सब नहीं करना चाहिए था और इससे उन लोगों को नीचा देखना पड़ा, जहां मैं काम करता था तो मैं उनसे माफी मांगता हूं। लेकिन मेरा यह विरोध उस नागरिक का विरोध था जो रोजाना अपने देश को उस व्यक्ति की फौजों के बूटों तले मसलते हुए देख रहा था। मेरी प्रोफेशनलिज्म (Professionalism) पर मेरी देशभक्ति (Patriotism) भारी पड़ रही थी।...और अगर देशभक्ति को अपनी आवाज बुलंद करनी है तो प्रोफेशनलिज्म को इसके साथ तालमेल बिठा लेना चाहिए।

मैंने यह काम इसलिए नहीं किया कि मेरा नाम इतिहास में दर्ज हो जाए या इसके बदले मुझे कोई इनाम मिले, मैं सिर्फ और सिर्फ अपने देश का बचाव करना चाहता हूं...मैं इसे तिल-तिल कर मरते नहीं देखना चाहता...मैं इसे फौज के बूटों तले रौंदे जाते हुए नहीं देखना चाहता...नहीं देखना चाहता।

(यह लेख द गार्डियन लंदन से साभार सहित लिया गया है।)
बुश पर जब जूता फेंका गया तो उस वक्त भी एक लेख और एक कविता इस ब्लॉग पर दी गई थी। उसमें जूते फेंकने का लाइव विडियो भी था। लेख, कविता और विडियो के लिए इन दो लिंकों पर जाएं...
http://hindivani.blogspot.com/2008/12/blog-post_16.html
http://hindivani.blogspot.com/2008/12/blog-post_17.html

Sunday, September 20, 2009

आर्थिक मंदी में ईद मुबारक



इस कविता के जरिए मैं आप सभी को तमाम किंतु-परंतु के साथ ईद, नवरात्र और विजय दशमी की मुबारकबाद देना चाहता हूं।


आर्थिक मंदी के इस दौर में
महंगाई और बेरोजगारी के अंधकार में
पेशेवर पत्रकारिता के बाजारवाद में
कुछ रंगे सियारों से संघर्ष के फेर में

मुट्ठी भर आतंकवादियों की हरकतों के बीच में
भगवा ब्रिगेड की विष वमन की पॉलिटिक्स में
मोदी मार्का जिनोसाइड के खेल में
पर, प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग से निजात में

और हां, अमेरिकी कुटिल चालों के जाल में
मासूम फिलिस्तीनी बच्चों की सिसकारी में

और कुल मिलाकर
मैडम सोनिया व मनमोहन की सदारत में
आपको ईद मुबारक हो

Thursday, September 17, 2009

मां की कहानी...कुछ कहना है उनका



मां मुझे भी एक कहानी सुनाओ...पर एनजीओ उदय फाउंडेशन ने कुछ ऐतराज उठाया है। हालांकि उन्होंने यह ऐतराज फोन पर किया है और लिखकर संक्षेप में जो भेजा है उसमें यह नहीं बताया कि दरअसल उन्हें ऐतराज किस बात पर है।

पहले तो उनका पत्र पढ़ें जो उन्होंने लिखा है और नीचे उससे जुड़े लिंक भी देखें...

Dear Sir

It is really shocking that how come a senior journalist like you can write some thing without going through the correct facts. It doest matter that it was published any paper or not . What really matter is hurting a sentiments of grass roots workers like us.

As u asked today to sent you any news item where govt hospital details are being mentioned.

Warm Regards

Rahul Verma
Founder
The Uday Foundation

पहली बात यह बता दूं कि वह लेख उदय फाउंडेशन (Uday Foundation) के खिलाफ नहीं था। उसमें मैंने एक मुद्दा उठाया था कि आखिर क्यों तमाम एनजीओ (NGO) प्राइवेट अस्पतालों में ही अपनी सारी गतिविधियां चलाते हैं। उन्हें सरकारी अस्पताल क्यों नहीं दिखाई पड़ते, जहां आम आदमी सबसे ज्यादा पहुंचता है। कुल मिलाकर यही मुद्दा उस लेख के केंद्र में था। उदय फाउंडेशन ने अस्पतालों में जाकर विभिन्न रोगों से ग्रस्त बच्चों को कहानी सुनाने की शुरुआत की। प्रोग्राम निश्चित रूप से अच्छा है और इसकी जितनी तारीफ की जाए कम है लेकिन हमारा मुद्दा अब भी वही है कि आखिर सरकारी अस्पतालों में एनजीओ क्यों नहीं पहुंच रहे हैं। उनकी सरकारी गतिविधियां अपोलो हॉस्पिटल, मैक्स, एस्कार्ट्स फोर्टिस अस्पतालों तक ही क्यों सीमित हैं।

एनजीओ चलाने वालों की अपनी दिक्कतें हो सकती हैं। जैसा कि मुझे कुछ एनजीओ वालों ने ही बताया कि वे अपना कोई भी प्रोजेक्ट शुरू करने से पूर्व सबसे पहले सरकारी एजेंसियों से बात करते हैं लेकिन उनकी कार्रवाई पूरी होने में कभी तीन महीने तो कभी छह महीने भी लग जाते हैं। ऐसे में एनजीओ इतने दिन कैसें रूकें और क्या करें। मुझे भी सही मायने में उनकी यह दिक्कत समझ आती है और सरकारी एजेंसियों का जो हाल है, वह सभी को पता है। लेकिन इस संबंध में मेरा यह कहना है कि ठीक है आप प्राइवेट अस्पतालों में अपनी गतिविधियां चलाएं लेकिन अगर तीन या छह महीने में ही किसी सरकारी अस्पताल या डिस्पेंसरी में जाने के लिए आपके प्रोजेक्ट को मंजूरी मिलती है तो आप मौका न चूकें। अगर साल भर में आप दस प्राइवेट अस्पतालों में जाते हैं तो कम से कम एक सरकारी अस्पताल में तो तमाम लालफीताशाही ( Red tapism )के बावजूद पहुंचा जा सकता है।



उस लेख में उदय फाउंडेशन की नीयत (Objectives) और गतिविधियों में किसी प्रकार का संदेह नहीं किया गया था। अगर आप उनकी वेबसाइट पर जाएं तो पाएंगे कि यह एनजीओ काफी कुछ कर रहा है और वाकई सोसाइटी (Society) को उसकी सख्त जरूरत भी है। चाहे वह रेयर ब्लड (Rare Blood Group) मुहैया कराना हो या फिर तमाम अजीबोगरीब रोगों से ग्रस्त बच्चों को इलाज मुहैया करना हो, उदय फाउंडेशन ने इस क्षेत्र में काफी कुछ किया है। अगर उस वेबसाइट में राहुल वर्मा, जो इस एनजीओ को चला रहे हैं, उनकी और उनके बच्चे की कहानी पढ़ेंगे तो प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे।

लेकिन यहीं पर कुछ रुककर मैं कुछ और कहना चाहूंगा।

उदय फाउंडेशन ने पिछले दिनों एक गंभीर मुद्दा उठाया था कि पिछले दिनों अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स AIIMS) में किस तरह कुछ समय के अंतराल में काफी बच्चों की मौत हो गई थी। इस मुद्दे पर राष्ट्रव्यापी बहस (National Debate) भी हुई। हालांकि मैं न तो एम्स से जुड़ा हूं और न ही उसकी वकालत करना चाहता हूं। लेकिन मेरा यह कहना है कि सरकारी अस्पताल में इस तरह के मुद्दे तो मिल ही जाते हैं लेकिन प्राइवेट अस्पतालों की लूटखसोट के खिलाफ कौन सा एनजीओ खड़ा होता है। पिछले दिन अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स और टाइम्स आफ इंडिया ने प्राइवेट अस्पतालों की लूटखसोट के खिलाफ बाकायदा सीरिज चलाकर खबरें छापीं लेकिन किसी एनजीओ ने इसे मुद्दा बनाने की कोशिश नहीं की। एम्स देश का जाना-मान संस्थान है। देशभर से लोग यहां इलाज कराने आते हैं और यहां पर उन्हें काफी विश्वास है। एम्स ने यह प्रतिष्ठा एक दिन में विज्ञापनों और अखबारों में चमत्कारिक सर्जरी की पॉजिटिव खबरें छपवाकर नहीं हासिल की है। देश में और खासकर राजधानी दिल्ली में प्राइवेट अस्पतालों को यह रुतबा पाने के लिए अभी मीलों यह सफर तय करना है।

मेरा मकसद क्या है...

इस सारी बहस के पीछे मेरा मकसद यह है कि चैरिटी वाली संस्थाओं और प्राइवेट संस्थाओं को जनता के प्रति जवाबदेह (Accountability) बनाना। यह बहुत जरूरी है। अगर आप ने कॉरपोरेट सेक्टर (Corporate Sector) से या पब्लिक से डोनेशन लिया है या फिर सरकार से सस्ती जमीन लेकर गरीबों के इलाज के नाम पर फाइव स्टार अस्पताल खड़ा कर दिया है तो आपको पब्लिक के प्रति जवाबदेह तो होना ही पड़ेगा।

मैं तो अपने सभी ब्लॉगर साथियों और इसके पाठकों से अपील करता हूं कि अगर उन्हें भी इस तरह की जवाबदेही में कहीं कोई कमी नजर आती है तो वे इन विषयों पर कलम चलाएं। दिल्ली में तमाम एनजीओ और अस्पातालों के बारे में लिखना आसाना है। जरूरत है कि दूरदराज के इलाकों में जो संस्थाएं इस तरह का काम कर रही हैं, उन पर भी लिखा जाए। अगर कोई एनजीओ वाकई लोगों के जीवन में कुछ सार्थक बदलाव ला सका है तो वह बात भी सामने आनी चाहिए।

इस लेख का संदर्भ समझने के लिए मेरा यह लेख भी पढ़ें...

http://hindivani.blogspot.com/2009/09/blog-post_06.html


अपने ईमेल में राहुल वर्मा द्वारा भेजे गए कुछ लिंक....

Please go through following news item on IANS

http://www.sindhtoday.net/news/1/44354.htm

also you can learn read more news about the same on our website

http://www.udayfoundationindia.org/news-room.php


Please also do read who i am, who is uday the name behind Uday Foundation at following link

http://www.udayfoundationindia.org/about-us.php

Saturday, September 12, 2009

क्या होगा इन कविताओं से

उन्हें मैं करीब एक दशक से जानता हूं। आजतक मिला नहीं लेकिन यूपी के एक बड़े नामी और ईमानदार आईएएस अफसर हरदेव सिंह से जब उनकी तारीफ सुनी तो जेहन में यह बात कहीं महफूज रही कि इस शख्स से एक बार मिलना चाहिए। उनका नाम है प्रो. शैलेश जैदी। वह पहले अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में हिंदी के विभागाध्यक्ष भी रहे। हरदेव सिंह ने भी यही बताया था कि शैलेश साहब हिंदी के वाकई बड़े विद्वान हैं। मेरी मुलाकात उनसे अब तक नहीं हुई। अभी जब दिलीप मंडल ने इशरतजहां पर नीचे वाली कविता इस ब्लॉग हिंदी वाणी के लिए लिखी तो प्रतिक्रिया में उन्हीं प्रो. शैलेश जैदी ने एक कविता भेजी है। जिसे मैं इस ब्लॉग के पाठकों और मित्रों के लिए पेश कर रहा हूं -

क्या होगा इन कविताओं से

कितने हैं दिलीप मन्डल जैसे लोग ?
और क्या होता है इन कविताओं से ?
आंसू भी तो नहीं पोंछ पातीं ये एक माँ के।
अप्रत्यक्ष चोटें व्यंग्य तो कहला सकती हैं,
पर गर्म लोहे के लिए हथौडा नहीं बन सकतीं ।
इसलिए कि गर्म लोहा अब है भी कहाँ
अब तो हम ठंडे लोहे की तरह जीते हैं
और गर्म सांसें उगलते हैं।
हरिजन गाथा की बात और थी
वह किसी इशरत जहाँ पर लिखी गयी कविता नहीं थी,
इशरतों के तो पहले भी
गुजरात में भस्म तैयार किये गये
और इस भस्म को शरीर पर मलकर
जीते गये चुनाव्।
कितने दिलीप मंडलों ने लिखी थीं
उस समय कविताएं ?
खैर ! कल की बात जाने दीजिए
कविता अच्छी है ।
किसे दूं मैं इस कविता की बधाई ?
इशरत जहाँ को ?
उनकी माँ को ?
दिलीप मंडल को ?
या खुद को ?
इसलिए, कि इस कविता से सब ख़ुश हुए।
बस इतनी ही है किसी कविता की नियति।

-शैलेश ज़ैदी


इसी बहाने


प्रो. शैलेश जैदी की एक और ताजतरीन गजल पेश कर रहा हूं जिसे मैने सीधे उनके ब्लॉग युगविमर्श से उठाया है। मुझे यह गजल बहुत पसंद है और मौजूदा दौर में बहुत प्रासंगिक है। आइए पढ़ते हैं-

जमाने के लिए मैं ज़ीनते-निगाह भी था

ज़माने के लिए मैं ज़ीनते-निगाह भी था ।
ये बात और है सर-ता-क़दम तबाह भी था॥

ख़मोशियों से मैं बढ़ता रहा सुए-मंज़िल ,
सियासतों का जहां जब के सद्दे-राह भी था॥

बयान कर न सका मैं सितम अज़ीज़ों के,
के ऐसा करने में अन्देशए-गुनाह भी था ॥

जो ख़ुद को करता था मेरे फ़िदाइयों में शुमार,
मेरे ख़िलाफ़ वही शख़्स कल गवाह भी था ॥

ख़ुलूस उस का बज़ाहिर बहोत ही दिलकश था,
बरत के देखा तो क़ल्बो-जिगर सियाह भी था॥

गुज़र रही थी फ़क़ीरी में ज़िन्दगी उस की,
ख़बर किसे थी सुख़न का वो बादशाह भी था ॥

उसी की सिम्त किया क़िब्ला रास्त खुसरो ने,
जो कज-कुलाह भी था और दीं-पनाह भी था॥*
******************
* अमीर खुसरो के गुरु हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने एक दिन कुछ हिन्दुओं को यमुना में नहाते देख कर सहज भाव से कहा - हर क़ौमे-रास्त राहे, दीने व क़िब्लागाहे। अर्थात प्रत्येक क़ौम का अपना सन्मार्ग होता है, धर्म होता है और पूज्य स्थल भी। हज़रत अमीर ख़ुसरो पास में ही खड़े थे, उन्हों ने अप्ने गुरु की ओर सकेत कर के तत्काल इस शेर को दूसरा चरण कह कर पूरा कर दिया - मन क़िब्ला रास्त करदम बर सिम्ते-कज-कुलाहे अर्थात मै अपना पूज्य स्थल तिर्छी टोपी वाले की ओर सीधा करता हूं।मुसलमानों में क़िब्ला [काबे] की ओर मुंह कर के नमाज़ पढ़ी जाती है और हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया तिरछी टोपी [कजकुलाह] लगाते थे। इस शेर में यही सकेत है।

...................

प्रोफेसर साहब से संपर्क और संवाद करें

प्रोफेसर एवं पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष
तथा डीन, फैकल्टी आफ आर्ट्स
मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ,
Mob. 9412273068

http://yugvimarsh.blogspot.com/

Thursday, September 10, 2009

माफी तो मांगनी चाहिए



-दिलीप मंडल

इशरत जहां केस के कवरेज के लिए नहीं
तो अपनी भाषा के लिए,
अपनी अनीति के लिए।

मुकदमे का फैसला होने तक
अभियुक्त लिखा जाता है अपराधी नहीं
हम सब जानते हैं
पत्रकारिता के स्कूलों यही तो पढ़ते हैं।
लेकिन हममें उतना धैर्य कहां
मुठभेड़ में मरने वालो को
आंतकवादी कहने में देर कहां लगाते हैं हम?
मुठभेड़ कई बार फर्जी होती है,
पुलिस जानती है
कोर्ट बताती है,
हम भी जानते हैं,
लेकिन हमारे पास उतना वक्त कहां
हमें न्यूज ब्रेक करनी होती है
सनसनीखेज हेडलाइन लगानी होती है
वक्त कहां कि सच और झूठ का इंतजार करें।

फर्जी और असली की
मीमांसा करने की न हममें इच्छा होती है
और न ही उतनी मोहलत और न जरूरत।
इसलिए हम हर मुठभेड़ को
असली मानते हैं
फर्जी साबित होने तक।

हम इशरत की मां से
माफी नहीं मांग सकते
मजिस्ट्रेट की जांच में
ये साबित होने के बाद भी कि वो मुठभेड़ फर्जी थी।
हम इससे कोई सबक नहीं सीखेंगे
अगली मुठभेड़ को भी
हम असली मुठभेड़ ही मानेंगे
मरने वालों को आतंकवादी ही कहेंगे
क्योंकि पुलिस ऐसा कहती है।
मरने वालों के परिवार वालों की बात
सुनने का धैर्य हममें कहां,
पुलिस को नाराज करके
क्राइम रिपोर्टिंग चलती है भला?
सोर्स बनाने और बचाने की
पत्रकारीय मजबूरी के आगे
कामयाबी की सीढी़ पर तेज भागने के लिए
पद पाने और बचाने के लिए
और कुछ नहीं तो मजे के लिए
नीति और नैतिकता की बलि चढ़ाएंगे।

अगली इशरत जहां
हमारे ब्रेकिंग न्यूज में आतंकवादी ही कहलाएगी
सच सामने आने तक
जो कभी कभार जमीन फाड़कर
सामने आ जाता है
हमें शर्मिंदा करने
उसे आतंकवादी बनना ही होगा।
हम शर्मिंदा हैं
पर हम माफी नहीं मांग सकते
आखिर हम एक लोकतांत्रिक देश की मीडिया हैं।

-दिलीप मंडल जाने-माने पत्रकार हैं और लंबे समय तक कई टीवी न्यूज चैनलों में काम कर चुके हैं। इस समय वह देश के एक प्रमुख मीडिया हाउस में संपादक हैं। उनसे dilipcmandal@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

Wednesday, September 9, 2009

आतंकवादी की मां


ब्रेकिंग न्यूज...वह आतंकवादी की मां है, उसकी लड़की लश्कर-ए-तैबा से जुड़ी हुई थी। उसका भाई भी लश्कर से ही जुड़ा मालूम होता है। इन लोगों ने लश्कर का एक स्लीपर सेल बना रखा था। इनके इरादे खतरनाक थे। ये लोग भारत को छिन्न-भिन्न कर देना चाहते थे। यह लोग आतंकवाद को कुचलने वाले मसीहा नरेंद्र मोदी की हत्या करने निकले थे लेकिन इससे पहले गुजरात पुलिस ने इनका काम तमाम कर दिया।

कुछ इस तरह की खबरें काफी अर्से बाद हमें मुंह चिढ़ाती नजर आती हैं। अर्से बाद पता चलता है कि सरकारी एजेंसियों ने मीडिया का किस तरह इस्तेमाल किया था। आम लोग जब कहते हैं कि मीडिया निष्पक्ष नहीं है तो हमारे जैसे लोग जो इस पेशे का हिस्सा हैं, उन्हें तिलमिलाहट होती है। लेकिन सच्चाई से मुंह नहीं चुराना चाहिए। अगर आज मीडिया की जवाबदेही (Accountability of Media ) पर सवाल उठाए जा रहे हैं तो यह ठीक हैं और इसका सामना किया जाना चाहिए। मीडिया की जो नई पीढ़ी इस पेशे में एक शेप ले रही है और आने वाले वक्त में काफी बड़ी जमात आने वाली है, उन्हें शायद ऐसे सवालों का जवाब कुछ ज्यादा देना पड़ेगा।

गुजरात में हुए फर्जी एनकाउंटर (Fake Encounter) की खबरें आज हमें मुंह चिढ़ा रही हैं। विश्व भर में तमाम फोरमों पर, अखबारों में और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में इन सवालों को उठा कर सवाल पूछे जा रहे हैं। इशरतजहां और कुछ अन्य युवकों का गुजरात में 2004 में किया गया एनकाउंटर इस समय बहस के केंद्र में है। इस एनकाउंटर को अंजाम देने वाले पुलिस अफसर डी. जी. बंजारा पहले से ही जेल में हैं और उन्हें एक फर्जी एनकाउंटर (सोहराबुद्दीन केस) में दो साल की सजा सुनाई जा चुकी है। वर्ष 2004 का ऐसा समय था जब गुजरात में फर्जी एनकाउंटरों की बाढ़ लग गई थी और बंजारा नामक इस अधिकारी को गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी तरक्की पर तरक्की देते जा रहे थे। लेकिन उन एनकाउंटरों की खबरें छापने वाले अखबार और टीवी न्यूज चैनल आज कहां खड़े हैं। मीडिया ने इन खबरों की सत्यता जांचे बिना खूब हवा दी और इसने समाज के ताने-बाने पर भी जबर्दस्त असर डाला।

आज के अखबारों और न्यूज चैनलों पर नजर डालें तो सब के सब गुजरात पुलिस को विलेन बनाते नजर आएंगे। सारे के सारे अखबारों में अगर संपादकीय पर नजर डालें तो वे मोदी और गुजरात पुलिस को कटघरे में खड़े करते नजर आएंगे। इनमें से कोई यह लिखने या कहने को तैयार नहीं है कि जब उसने इस फर्जी एनकाउंटर को ब्रेकिंग न्यूज बताकर पूरे देश को झकझोर दिया था और देश में हर मुसलमान पर आतंकवादी होने का शक जताया जा रहा था तब उसने गलती की थी और अब उसे माफी मांगनी चाहिए। हद तो यह है कि इशरतजहां के मामले में केंद्रीय गृहमंत्रालय (MHA) तक ने कोर्ट में शपथपत्र दिया कि एनकाउंटर में मारे गए युवक-युवतियों के संबंध लश्कर-ए-तैबा से थे।

आतंकवादी की मां होने पर जो बयान इशरतजहां की मां शमीमा कौसर ने दिया है, वह बताता है कि कैसे ऐसी घटनाएं हमारे सामाजिक ढांचे को झकझोर देती हैं। शमीमा कौसर ने कहा कि जब उनकी बेटी को आतंकवादी बताकर मार डाला गया तो मुंबई के ठाणे इलाके में जहां वह रहती हैं, वह उनका सामाजिक बहिष्कार (Social Boycott) कर दिया गया। उनके अन्य बेटे-बेटी जो स्कूल-कॉलेज में पढ़ रहे थे, उनका नाम वहां से काट दिया गया और वे आगे पढ़ाई नहीं कर सके। वे जहां जाते लोग उनके बारे में यही कहते थे कि देखो आतंकवादी की मां जा रही है, देखो आतंकवादी की बहन जा रही है, देखो आतंकवादी का भाई जा रहा है। किसी एक कंपनी में इशरतजहां की बहन को रिसेप्शनिस्ट की नौकरी मिली हुई है लेकिन वहां भी उसे अपनी पहचान छिपानी पड़ी। अहमदाबाद हाई कोर्ट ने जिस जज एस. पी. तमांग से इसकी जांच कराई, उसकी जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद ही यह परिवार सामने आने की हिम्मत जुटा सका।


यह कोई एक केस नहीं है। गोधरा दंगों (Godhara Riot) के दौरान नरौदा पाटिया में जो कुछ हुआ, उस पर फिल्म बन चुकी है। गुलबर्गा सोसायटी में सांसद एहसान जाफरी के परिवार और अन्य लोगों को जिस तरह जिंदा जला दिया गया, उसकी कहानी हर कोई जानता है। कुछ गवाहों को गुजरात सरकार द्वारा रिश्वत की पेशकश का मामला स्टिंग आपरेशन से सामना आ चुका है। लेकिन मीडिया की हिम्मत नहीं पड़ी कि वह इन केसों के खिलाफ उठकर खड़ा हो। अहमदाबाद में टाइम्स आफ इंडिया (The Times of India) के पत्रकारों ने जब थोड़ी सी हिम्मत दिखाकर मोदी के खिलाफ लिखा तो लोकतंत्र की पक्षधर वहां की बीजेपी सरकार ने टाइम्स आफ इंडिया के उन पत्रकारों के खिलाफ केस दर्ज करा दिया।

ये सारी घटनाएं हमें 1984 की याद दिलाते हैं। जहां इस देश में खालिस्तान आंदोलन (Khalistan Separatist Agitation ) चरम पर था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या की जा चुकी थी। उस समय इसी तरह हर सिख को आतंकवादी समझा जा रहा था। मैं ऐसी तमाम घटनाओं का गवाह हूं। हरियाणा होकर दिल्ली आने वाली पंजाब रोडवेज की बसों को रोक लिया जाता था और हरियाणा पुलिस सिखों की पगड़ियां उतरवाकर यह देखती थी कि कहीं उनमें हथियार तो नहीं ले जाए जा रहे हैं। इन हरकतों का नतीजा क्या निकला...पंजाब में उस समय हिंदू-सिखों के बीच खाई बढ़ती चली गई। सारे सामाजिक ढांचे (Social Setup) पर करारी चोट पड़ी, जो सिख देशभक्त थे, उन्हें मजबूर किया गया कि वे आतंकवादियों के हमदर्द बनें या उन्हें अपने घरों में पनाह दें। पंजाब में जो कुछ हुआ, वह कांग्रेस की देन थी और वह आज तक माफी मांग रही है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जिस दिन देश की बागडोर संभाली, उसी दिन उन्होंने सबसे पहले सिखों से माफी मांगी।

सिख एक मेहनतकश कौम है और उसने दिखा दिया कि वे आतंकवादी नहीं हैं। विदेशों से जब खालिस्तान आंदोलन को मदद मिलना बंद हो गई तो यह किस्सा भी अपनेआप खत्म हो गया। जो लोग समझते हैं कि किसी के. पी. एस. गिल नामक पुलिस अफसर ने पंजाब में आतंकवाद खत्म किया, यह उनकी भूल है। जिन्होंने पंजाब को नजदीक से देखा है, वे इस बात को समझ सकते हैं।
इशरतजहां की मां और उसकी बहन मुशरतजहां ने भी यही कहा कि हम भारतीय हैं। हमें इस देश से उतना ही प्यार है जितना बीजेपी वालों को है। फिर भी हमें शक से देखा जाना, अफसोस की बात है।


आतंकवाद एक ऐसी समस्या के रूप में सामने आया है जिसने विशेषकर दक्षिण पूर्व एशियाई देशों को कुछ ज्यादा ही परेशान कर रखा है। जिस पाकिस्तान पर भारत में आतंकवाद फैलाने का आरोप लगाया जाता है (जो सबूतों के आधार पर ठीक भी है), वह खुद आज सबसे बड़ा आतंकवाद का शिकार है। वहां की प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या को ज्यादा दिन अभी नहीं बीते हैं। हम लोगों को और खासकर मीडिया को आतंकवाद को किसी मजहब या जाति से जोड़ना छोड़कर इसके सामाजिक और आर्थिक पक्ष को देखना होगा। इसमें उन कोनों को तलाशना होगा कि आखिर क्यों अमेरिका पहले ओसामा बिन लादेन (Osama bin laden) को पालता है, क्यों इंदिरा गांधी ने जनरैल सिंह भिंडरावाले को खड़ा किया, क्यों बजरंग दल ने दारा सिंह को उड़ीसा में ईसाई मिशनरियों के खिलाफ विष वमन करने भेजा, क्यों गांधी जी की हत्या में अभी तक नाथूराम गोडसे की आड़ में किसी संगठन विशेष का नाम लिया जाता है, क्यों राजीव गांधी ने पहले लिट्टे की मदद की...क्यों प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू यूएन के सामने कश्मीर में जनमत संग्रह कराने के लिए राजी हुए...ये सुलगते सवाल हैं। इतिहास में यह सब दर्ज है। गहन छानबीन से आतंकवाद की जड़ों तक पहुंचा जा सकता है।

Sunday, September 6, 2009

मां, मुझे भी एक कहानी सुनाओ

क्या आप किसी ऐसे सरकारी अस्पताल को जानते हैं जहां दाखिल बीमार बच्चे को कोई कहानी सुनाने आता हो। आपका जवाब शायद नहीं में होगा। इसका मुझे यकीन है। क्योंकि कहानी सुनाने वाले सिर्फ महंगे या यूं कहें कि फाइव स्टार टाइप अस्पतालों (Five star hospitals) में जाते हैं। अपने देश यह चलन अभी हाल ही में शुरू हुआ है, विदेशों में पहले से है। बीमार बच्चों को अस्पताल में जाकर कहानी इसलिए सुनाई जाती है कि वे उस मानसिक स्थिति से उबर सकें जिसके वे शिकार हैं और उनके इर्द-गिर्द फैले अस्पताल के बोझिल वातावरण में वह थोड़ा सुकून महसूस कर सकें।

बचपन में मां, दादी, नानी के जिम्मे यह काम होता था या फिर उनके जिम्मे जो बच्चों को पालती थीं जिन्हें धाय मां कहा गया है और मौजूदा वक्त में उन्हें आया कहा जाने लगा है। मौजूदा वक्त की आयाएं पता नहीं बच्चों को कहानी सुनाती हैं या नहीं लेकिन तमाम मांओं, दादियों और नानियों को यह जिम्मेदारी पूरी करते हम लोगों ने देखा है। लेकिन दौर न्यूक्लियर परिवारों (Nuclear families ) का है तो ऐसे में किसी के पास कहानी सुनाने की फुरसत नहीं है। आईटी युग (IT era) में जब कदम-कदम पर हर कोई प्रोफेशनलिज्म की दुहाई देता नजर आता है तो कहानी सुनाना भी एक बिजनेस बन गया है। विदेशों में तो प्रोफेशनल कहानी सुनाने वालों (Professional storyteller) की सेवाएं भी ली जाती हैं। हो सकता है कि यहां भी कुछ एनजीओ वाले इसमें संभावनाएं देख रहे हों।

बहरहाल, एनजीओ उदय फाउंडेशन (NGO Uday Foundation) चलाने वालों ने विदेश की ही तर्ज पर दिल्ली में जिस अस्पताल को सबसे पहले चुना वह था – एस्कॉर्ट्स फोर्टिस अस्पताल। इस अस्पताल में शुक्रवार को दिल्ली पुलिस के एक हाई प्रोफाइल डीसीपी हरगोविंदर सिंह धालीवाल बीमार बच्चों को कहानी सुनाने पहुंचे। वह थोड़ा लेट थे, बच्चों ने उनसे पूछा, आप लेट क्यों आए, उन्होंने कहा भारत जैसे मुल्क में पुलिस हमेशा लेट आती है। (शायद अनजाने में या जानबूझकर वह सच बोल गए)। जिस अखबार में इस एक्सक्लूसिव खबर को छापा गया है, उसमें डीसीपी की महानता का भी उल्लेख था। बताया गया है कि कैसे इस महान डीसीपी ने पिछले दिनों बाइकर्स गैंग के सरगना को एक एनकाउंटर में ढेर कर दिया।

अब मुद्दे पर आते हैं। मैं या आप इस बात के खिलाफ नहीं होंगें कि अमीरों के लिए बने अस्पताल में दाखिल अमीर बच्चों को कहानी सुनने का हक नहीं है या यह कि एनजीओ कोई अच्छा काम नहीं कर रही। यह बहुत अच्छी कोशिश है, इससे कोई इनकार नहीं करेगा। एक तरफ तो ऐसे फाइव स्टार अस्पताल हैं और दूसरी तरफ देश और यहां तक दिल्ली के ही असंख्य अस्पताल है जहां बच्चों को कहानी सुनाना तो दूर दवाई तक नसीब नहीं है। मुझे देश के कई शहरों में रहने का मौका मिला है और इस दौरान तमाम सरकारी अस्पतालों और फाइव स्टार टाइप अस्पतालों में जाने का मौका मिला है, आप विश्वास नहीं करेंगे कि स्थितियां कितनी भयावह हैं। ज्यादा दूर नहीं, आप दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स AIIMS) चले जाइए जो किसी भी मायने में किसी फाइव स्टार से बेहतर अस्पताल है, वहां मरीजों को पूरी दवाएं नहीं मिल पातीं। बिहार के सीतामढ़ी से आए मांझी परिवार के जिस नवजात बच्चे के हार्ट का आपरेशन कर उसे वापस उसके सीने में फिट करने का जो कमाल यहां के डॉक्टरों ने दिखाया, उस बच्चे को एडॉप्ट करने और आगे उसके इलाज के लिए दिल्ली का एक भी एनजीओ नहीं आया। इसकी जानकारी जब सुलभ इंटरनैशनल (Sulabh International) के मालिक बिंदेश्वर पाठक को हुई तो उनके निर्देश पर उनकी संस्था ने इस बच्चे को एडॉप्ट किया। बिंदेश्वर पाठक का संबंध बिहार से है और हो सकता है कि शायद इस वजह से भी उनका दिल पसीजा हो लेकिन बहरहाल, उनकी संस्था ने अच्छा काम किया। लेकिन अगर बिंदेश्वर पाठक का हाथ उस बच्चे के लिए न बढ़ा होता तो... बच्चों को कहानी सुनाने के लिए पुलिस अफसर को लाने वाले उदय फाउंडेशन के लोगों ने ऐसा नहीं है कि बिहार के उस बच्चे की खबर अखबारों में न पढ़ी हो।


बच्चों को कहानी सुनाते दिल्ली पुलिस के डीसीपी हरगोविंदर सिंह धालीवाल


हो सकता है कि एनजीओ उदय फाउंडेशन चलाने वालों की नीयत साफ हो लेकिन कहीं न कहीं लगता है कि तमाम सोशलाइट (Socialite) लोग एनजीओ का जो धंधा चला रहे हैं उसके पीछे मकसद महज समाजसेवा (Social Work) का नहीं है। एक तो यह लोग चाहते हैं कि इनके काम को लोग सराहें, दूसरा सरकार इनको इनाम और सम्मान देती रहे। विदेशों से इन्हें जो आर्थिक मदद मिलती है, उसके बारे में तो इनकी बैलेंसशीट ही बता सकती है। दिल्ली में ऐसे ही एक सज्जन बच्चों को उनका बचपन लौटाने के लिए उन्हें चाय की दुकानों से, घरों से, विभिन्न उद्योग-धंधों में से मुक्त कराने का अभियान छेड़े हुए हैं। सरकारी कानून के मुताबिक बच्चों से काम लेना और कराना अपराध भी है। कानून की नजर में ये सज्जन बहुत अच्छा काम कर रहे हैं लेकिन जिन गरीब बच्चों को यह सज्जन मुक्त कराते हैं वे गरीब परिवारों से हैं और अपने परिवार की रोटी का इंतजाम करने के लिए इन्हें यहां-वहां काम करना पड़ता है। उनकी संस्था को विदेशों से मोटा फंड मिलता है लेकिन मुक्त कराए गए बच्चों को वह कितना देते हैं या उनके पुनर्वास की क्या व्यवस्था करते हैं, कोई आज तक नहीं जान पाया है। हां, मीडिया में उनकी पर्सनैलिटी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने वाली खबरें जरूर दिखाई देती हैं। उनके दफ्तर में जाइए तो आपको वहां पूरा कॉरपोरेट कल्चर मिलेगा और कई विदेशी बालाएं भी वहां बैठी नजर आएंगी। जिनके सामने भारत की गरीबी को बयान करती तस्वीरों का ढेर लगा होगा।

तमाम एनजीओ की आलोचना करना मेरा मकसद नहीं है। कुछ लोग बहुत अच्छा काम कर रहे हैं लेकिन फिर भी एनजीओ चलाने वालों को कहीं न कहीं आत्मविश्लेषण करना ही होगा कि क्यों हमारे-आप जैसे लोग इनके बारे में ऐसी धारणा बनाए हुए हैं।

Tuesday, September 1, 2009

भगवान आप किसके साथ हैं


भगवान जी बहुत मुश्किल में हैं कि आखिर वह एक कॉरपोरेट घराने (corporate house) की आपसी लड़ाई में किसका साथ दें। मुकेश अंबानी को आशीर्वाद दें या फिर छोटे अनिल अंबानी को तथास्तु बोलें। भगवान इतनी मुश्किल में कभी नहीं पड़े। भगवान करें भी तो क्या करें...

अनिल अंबानी इस समय देश के सबसे पूजनीय स्थलों पुरी, सिद्धि विनायक मंदिर और गुजरात के कुछ मंदिरों की शरण में हैं। वह इस समय लगभग हर पहुंचे हुए मंदिर की घंटी बजा रहे हैं। इस यात्रा में वह अकेले नहीं हैं, उनके साथ उनकी मां कोकिला बेन और बहन व बहनोई भी साथ हैं। बड़े भाई मुकेश अंबानी के साथ चल रही उनकी कॉरपोरेट वॉर (corporate war) में वह भगवान जी से समर्थन मांग रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई हो रही है और अनिल चाहते हैं कि कोर्ट उनके हक में फैसला सुनाए। सगे भाई का अहित हो। इतिहास (history) में मैंने और आप सब ने पढ़ा है कि किस तरह मुगल पीरियड में गद्दी हथियाने के लिए भाई ने भाई का कत्ल करा दिया या बेटे ने बाप को जेल में डाल दिया। ठीक ऐसा ही कुछ अब देखने को मिल रहा है जिसमें सिर्फ दो भाइयों की ही लड़ाई नहीं बल्कि भारत सरकार भी लंबी-लंबी सांसे ले रही है।

मुकेश की कंपनी गुजरात के बेसिन से जिस गैस का उत्पादन करने वाली है, उसकी सबसे बड़ी खरीदार भारत सरकार की कंपनी एनटीपीसी है। आरोप है कि एनटीपीसी को मुकेश मंहगे दाम पर गैस बेचने जा रहे हैं। अनिल ने अपने पावर प्लांट के लिए गैस मांगी थी लेकिन उन्हें गैस देने में आनाकानी की गई। अनिल ने अपने पावर प्लांट इसी उम्मीद में लगाए थे कि भाई से गैस ले लेंगे। लेकिन संपत्ति बंटवारे की लड़ाई में जो कड़वाहट हुई थी तो मुकेश भला अनिल को सस्ती गैस कैसे देते। अनिल ने मीडिया में बड़े भाई की कंपनी के खिलाफ लगातार विज्ञापन अभियान छेड़ा और उनकी कंपनी को सबसे बड़ा चोर बताया। भारत के कॉरपोरेट इतिहास (corporate history) में इतना बड़ा घृणित प्रचार अभियान आज तक मैंने अपने होशोहवास में नहीं देखा और पुराने पत्रकार भी यही बताते हैं कि उन्हें भी इस तरह की कोई घटना याद नहीं आती।

दोनों भाइयों की इस लड़ाई में मैं किसी को पाकसाफ या किसी एक का पक्ष नहीं लेना चाहता। लेकिन जिस तरह इस कॉरपोरेट वॉर में पूरी राजनीति और मीडिया का बहुत बड़ा वर्ग किसी न किसी भाई के साथ खड़ा नजर आ रहा है वह भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है। यह खतरा हालांकि बहुत पहले से है लेकिन अब वह और भी स्पष्ट तरीके से सामने आया है। इन दोनों भाइयों के पिताश्री धीरूभाई अंबानी ने स्व. राजीव गांधी से संपर्कों के बल पर रिलायंस नाम का बिजनेस अंपायर (business empire) खड़ा कर दिया। पिता जी नहीं रहे। उसके बाद राजनीति में पैठ बनाने के तरीके बदल गए। पिता की मौत के फौरन बाद अनिल अंबानी ने आजादी चाही। अपनी बॉलिवुड बैकग्राउंड की धर्मपत्नी टीना मुनीम की बदौलत अमिताभ तक पहुंच बनाई और वहां से अमर सिंह और फिर सीधे मुलायम सिंह यादव। समाजवादी पार्टी में कई ऐसे होनहार थे जिन्हें राज्यसभा में भेजा जा सकता था लेकिन राम मनोहर लोहिया के कथित विरासत वाली इस पार्टी ने खरबपति अनिल अंबानी को राज्यसभा में भेजा। फिर तो उन्होंने दुनिया मुट्ठी में कर ली। यह सब हमने आपने अपनी आंखों के सामने होते हुए देखा।

इस दौरान मुकेश ने क्या किया। वह राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ फाइव स्टार होटल के टैरेस पर ब्रेकफास्ट लेते रहे। सत्ता के गलियारे में संदेश जाना ही थी। पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा और मुकेश के संबंध किसी से छिपे नहीं।
जो कॉरपोरेट वॉर कभी धीरूभाई अंबानी और नुसली वाडिया (बांबे डाइंग के मालिक) के बीच लड़ी गई थी आज वह दो भाइयों के बीच लड़ी जा रही है। ऐसा लगता है कि जैसे दोनों भाइयों ने पूरे भारत को अपने पास गिरवी रख लिया है। हालात ये हैं कि अगर आप किसी राजनीतिक पार्टी में हैं तो आपको एक भाई के साथ खड़ा होना पड़ेगा, मीडिया में हैं तो किसी एक भाई के लिए साफ्ट कार्नर रखना पड़ेगा। और तो और आजकल योग से लेकर भोग तक पर प्रवचन करने वाले भी किसी न किसी भाई के साथ हैं। पंजाब के जालंधर शहर में एक बहुत बड़े बाबा अपने कार्यक्रम में किसी एक भाई के हेलिकॉप्टर से पहुंचते हैं। देश के सबसे ईमानदार नौकरशाह अपनी रिश्तेदारी में जाने के लिए किसी एक भाई का हवाई जहाज मांग लेते हैं। अगर आप स्टॉक मार्केट के दलाल (broker) या राजनीति के दलाल (political broker) हैं तो भी आपको किसी एक भाई के साथ जाना पड़ेगा। आप बॉलिवुड में हैं और फाइनैंस चाहिए तो किसी एक भाई के पास जाना पड़ेगा और वह भाई बदले में आप से अपने बाप, या मां या किसी अन्य रिश्तेदार को महान बताने वाली पिक्चर बनाने को कहेगा, जिसमें उस समय के नामी स्टार काम करेंगे। यह सब क्या है।

न्यायपालिका को लेकर मेरे या इस देश में सभी नागरिक के हाथ बंधे हैं कि वह अदालत के किसी फैसले पर टिप्पणी नहीं कर सकता और न ही किसी जज के खिलाफ कुछ बोल सकता है। जजों के हाल पर इसलिए मैं भी कुछ नहीं कहना चाहता।

...इसीलिए मैंने ऊपर अपनी बात भगवान के जरिए कही कि हो न हो भगवान भी आजकल जरूर पसोपेश में होंगे। उन्हें किसी न किसी भाई के साथ तो खड़ा होना पड़ेगा। अच्छा आप बताइए आप किस भाई के साथ हैं...

Wednesday, August 26, 2009

न वो गुरुजन न वो चेले...गलत

रोजाना आपका सामना टीवी से लेकर अखबार तक ऐसी खबरों से पड़ता होगा जो आपको विक्षोभ से भर देती होंगी। लेकिन इसी दौरान कुछ खबरें ऐसी भी आती हैं कि जिनसे आपको ऊर्जा मिलती है और आप कहते उठते हैं कि दुनिया में अच्छाई अभी बाकी है। ऐसी ही दो खबरों के हवाले से अपनी बात कहना चाहता हूं।

दोनों ही खबरें बुधवार बहुत कम जगह में अंग्रेजी अखबार द हिंदुस्तान टाइम्स (26 अगस्त 2009) में जगह पा सकी हैं। एक खबर दक्षिण भारत के शहर मद्रास (चेन्नै) से है। नामक्कल जिले के एक गांव में तमिल भाषा (Tamil Language) के विद्वान (Scholar)और रिटायर्ड टीचर एस. वी. वेंकटरमण को उनके चेलों ने इसी 5 सितंबर (2009) को गुरु दक्षिणा में एक अनोखा तोहफा (Unique Gift) देने का निर्णय लिया है। यह तोहफा है एक दो मंजिला मकान।

खबर में पूरी बात यह कही गई है कि वेंकटरमण रिटायर हो गए और उनको वह इलाका छोड़कर अपने गांव इसलिए वापस जाना पड़ा कि वे मकान का महंगा किराया अदा नहीं कर सकते थे। उनके पास अपना मकान नहीं था। रिटायरमेंट के बाद उनको जो फंड का पैसा मिला वह उन्होंने लड़कियों की शादी में खर्च किया। यह अफसोसनाक सूचना जब उनके पढ़ाए हुए पुराने स्टूडेंट्स को मिली तो उन लोगों को बड़ी आत्मग्लानि (Guilty) हुई। उन लोगों ने एक मीटिंग बुलाई जिसमें उनके पढ़ाए हुए 500 पुराने स्टूडेंट्स जमा हुए। इन लोगों ने आपस में ही चंदा किया और देखते ही देखते 10 लाख रुपये एकत्र हो गए। इसके बाद एक प्लॉट खरीदा गया और इस पर दो मंजिला मकान बनाया गया। इस मकान की चाभी 5 सितंबर को उनके चेले अपने गुरुजी को सौंपेंगे। जानते हैं यह सब किसने किया, उनके पढ़ाए हुए स्टूडेंट एम. ए. अर्थनराई जो रिटायर्ड म्युनिस्पल कमिश्नर हैं।

इस खबर का क्लाईमैक्स यह है कि जिन लोगों ने चंदा एकत्र किया या इसमें बढ़चढ़कर भाग लिया वे सब या तो कहीं नौकरी कर रहे हैं या फिर खुद रिटायर हो चुके हैं। इस खबर को पढ़ने के साथ ही मैं अपने उन गुरुजनों को याद करने लगा जिन्होंने मुझे छोटी क्लासों में पढ़ाया, दरअसल किसी भी स्टूडेंट की नींव को मजबूत बनाने की शुरुआत वहीं से होती है इसका अंदाजा अब जाकर होता है। वाकई मेरे जैसे व्यक्ति में अगर इंसानियत या कह लें कोई भी सदगुण है तो वह उन्हीं गुरूजनों की बदौलत है। यूपी के जिस शहर में मैंने पढ़ाई की थी, वहां एक अनुशासन आज भी मुझे याद है।

कोई बार मेरी अम्मा मुझे कुछ सामान लाने अगर मार्केट में भेज देती थीं तो मार्केट में रिस्क (Risk)लेकर जाना पड़ता था। कुछ गुरुओं के नाम मुझे याद हैं...श्याम नारायण पांडे, बी. के. सिंह, लाल जी वर्मा, हरिओम श्रीवास्तव। होता यह था कि यह सभी टीचर गांवों में रहते थे और घर जाते हुए हमारे शहर की मार्केट में कुछ न कुछ खरीदारी करते थे। जब मेरा सामना उनसे हो जाता था तो मार्केट में वह कुछ नहीं कहते थे लेकिन अगले दिन क्लास में खबर ली जाती थी। उनका मानना था कि मार्केट में मेरे घूमने का मतलब था कि मैं आवारागर्दी कर रहा हूं। हालांकि मैं उन्हें बार-बार बताता था कि अम्मा ने सामान लाने भेजा था लेकिन उन लोगों को पता नहीं क्यों लगता था कि मैं झूठ बोल रहा हूं। हालांकि परीक्षा में अच्छे नंबर लाने और एक वाद विवाद प्रतियोगिता (Debate Compettion) में स्कूल के लिए शील्ड जीतकर लाने पर इन लोगों का उस समय का गुस्सा कुछ शांत हो गया था। हिंदी पढ़ाने टीचर श्याम नारायण पांडे जी ने कहा भी कि हम लोग शायद गलत समझते थे।
...पिछले साल जब मैं अपने शहर गया तो इन तमाम गुरुजनों के बारे में पता किया। सभी का निधन हो चुका था। अफसोस करता रहा। मेरे उस समय के मित्र नंदलाल गुप्ता ने बताया कि जब मैं अखबारों में छपने लगा और कुछ खबरें उसने इन गुरुओं को पढ़ाई तो वे काफी गदगद थे। उनका कहना है कि उन लोगों ने एक अच्छे शिष्य को तैयार किया था। हालांकि मेरे तमाम सहपाठी मुझसे बेहतर पेशे में हैं और खुद नंद एक बेहद सफल बिजनेसमैन है लेकिन उसका कहना था कि वे तमाम गुरुजन पता नहीं क्यों मेरे पत्रकारिता के पेशे को बाकी सभी के मुकाबले बहुत अच्छा मानते थे। बहरहाल, ईश्वर उन लोगों की आत्मा को शांति दे। यह मुझे पता है कि यह पेशा आज के दौर में कितना अच्छा है...

अब दूसरी खबर पर आते हैं। दूसरी खबर मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले की है। इस खबर के साथ फोटो भी है। खबर के मुताबिक नवीन मिडल स्कूल के कुछ स्टूडेंट्स ने अपने स्कूल की प्रिंसिपल और दो अन्य टीचरों को कमरे में बंद कर दिया। स्टूडेंट्स इस बात पर नाराज हैं कि उनके स्कूल के सबसे अच्छे टीचर ओमप्रकाश घोष का वहां से कहीं और तबादला कर दिया गया। टीचर बेचारे स्कूल में दो घंटे बंद रहे और जब जिला मुख्यालय से शिक्षा अधिकारी व अन्य अधिकारी पहुंचे तब जाकर उस बंद कमरे से उन्हें निकाला जा सका। इसी टीचर का तबादला किए जाने के मुद्दे पर दो दिन पहले इस गांव के लोग सड़क जाम कर चुके थे लेकिन प्रशासन उनकी सुन नहीं रहा था। अफसरों का कहना है कि गांव वाले जानबूझकर इस मामले को तूल दे रहे हैं और वे वहां की ग्राम पंचायत की महिला सरपंच के पति के खिलाफ कार्रवाई का मन बना रहे हैं। अफसरों का कहना है कि स्टूडेंट्स और गांव वाले नासमझ हैं और वह टीचर उनको भड़का रहा है।

इस घटना पर आपकी जो भी राय होगी, लेकिन मेरा मानना है कि कोई टीचर इतने बड़े पैमाने पर स्टूडेंट्स और ग्रामीणों (Villagers) को भड़का सके कि वे इस तरह की हरकत पर आमादा हो जाएं। जरूर उस शिक्षक में कोई विशेषता है तभी सारे स्टूडेंट्स और ग्रामीण उसकी उसी स्कूल में वापसी चाहते हैं। मैंने ऐसे टीचर देखे हैं जिनके जाने से स्टूडेंट्स वाकई दुखी होते हैं। दिल्ली जैसे महानगर (Metro City) में नामी गिरामी स्कूलों के स्टूडेंट्स अक्सर ऐसी चर्चा करते हैं कि फलां विषय के टीचर के जाने की वजह से उनका उस विषय की पढ़ाई में मन नहीं लग रहा है।

इसका एकमात्र हल मुझे तो यही लगता है कि खासकर सरकारी स्कूलों में टीचरों का तबादला तभी हो जब उन क्लासों के स्टूडेंट्स चाहें। अगर नब्बे फीसदी स्टूडेंट्स किसी टीचर के पक्ष में हैं तो उसे उसी स्कूल में रखा जाना चाहिए। चाहे यह अवधि बेशक बहुत लंबी क्यों न हो।

कुल मिलाकर गुरुजनों के सम्मान वाली दो खबरें पढ़कर मुझे तो बहुत अच्छा लगा। ऐसे शिक्षकों की इस देश को बहुत जरूरत है।

कपिल सिब्बल के पक्ष में...

केंद्रीय मानव संसाधन विकास (HRD) मंत्री कपिल सिब्बल ने अभी हाल ही में कहा है कि पूरे देश में मैथ्स और साइंस की पढ़ाई एक जैसी होनी चाहिए यानी पाठ्यक्रम एक जैसा हो। मैं इसके पक्ष में हूं और अगर ऐसा हो सका तो स्टूडेंट्स पर कांग्रेस सरकार का यह एक उपकार ही होगा। इसकी हमें सख्त जरूरत है। सिब्बल को इसलिए भी बधाई कि उन्होंने हिंदी को बतौर राष्ट्रभाषा (National Language) और मजबूत किए जाने की वकालत की है।