Saturday, December 27, 2008

इन साजिशों को समझने का वक्त

नीचे वाले मेरे लेख पर आप सभी लोगों की टिप्पणियों के लिए पहले तो धन्यवाद स्वीकार करें। देश में जो माहौल बन रहा है, उनके मद्देनजर आप सभी की टिप्पणियां सटीक हैं। मेरे इस लेख का मकसद कतई या नहीं है कि अगर पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए भारत युद्ध छेड़ता है तो उसका विरोध किया जाए। महज विरोध के लिए विरोध करना सही नहीं है। सत्ता प्रमुख जो भी फैसला लेंगे, देश की जनता भला उससे अलग हटकर क्यों चलेगी। कुल मुद्दा यह है कि युद्ध से पहले जिस तरह की रणनीति किसी देश को अपनानी चाहिए, क्या मनमोहन सिंह की सरकार अपना रही है। मेरा अपना नजरिया यह है कि मौजूदा सरकार की रणनीति बिल्कुल सही है। पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय रंगमंच पर भारत पूरी तरह बेनकाब कर चुका है।
करगिल युद्ध के समय भारत से यही गलती हुई थी कि वह पाकिस्तान के खिलाफ माहौल नहीं बना सका था। उस समय पाकिस्तान में परवेज मुशर्रफ सत्ता हथियाने की साजिश रच रहे थे और उन्होंने सत्ता हथियाने के लिए पहले करगिल की चोटियों पर घुसपैठिए भेजकर कब्जा कराया और फिर युद्ध छेड़ दिया। फिर अचानक पाकिस्तान की हुकूमत पर कब्जा कर लिया। उन दिनों को याद करें तो इस साजिश में अमेरिका भी अप्रत्यक्ष रूप से शामिल था। क्योंकि इस युद्ध से सिर्फ चंद दिन पहले मुशर्रफ ने वॉशिंगटन की यात्रा की थी। इस यात्रा के दौरान अमेरिका ने अपने हथियार बेचने का सबसे महंगा सौदा किया था। मुशर्रफ की ताजपोशी में भी अमेरिका ने किसी तरह का अड़ंगा नहीं लगाया था। उन दिनों नवाज शरीफ भारत से दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे थे। लेकिन उनके अपने देश में सेना का सबसे बड़ा अधिकारी किस करतूत में जुटा हुआ है, इससे बेखबर थे।

बहरहाल, अब पाकिस्तान की लानत-मलामत चारों तरफ से हो रही है। यही भारत की सही कूटनीति है। लेकिन ऐसे माहौल में बाल ठाकरे जैसों का बयान बहुत गैरजिम्मेदाराना है। मुंबई पर हमले के समय जो लोग घरों में दुम दबाकर बैठे रहे और अब भारतीय प्रधानमंत्री को कायर बताना किसी भी रूप में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। उम्र के जिस पड़ाव पर ठाकरे हैं, उनके लिए इससे सख्त भाषा मेरे पास नहीं है। अभी वक्त है भारत सरकार के सभी सही कदमों का समर्थन करने का। युद्ध किसी समस्या का हल नहीं है। ऐसे कई देश हैं जो युद्ध लड़लड़कर बूढ़े हो गए लेकिन समस्या को हल नहीं कर पाए। शांति युद्ध से बड़ी चीज है। अगर हम शांतिप्रिय हैं तो यह हमारे कायरता की निशानी नहीं है।

मुंबई हमला एक साजिश थी। लेकिन यह साजिश किसलिए की गई, इसका असल मकसद अब भी सामने नहीं आया है। हमारे जैसे पत्रकार तो बस यही अंदाजा लगा सकते हैं कि जिस तरह पाकिस्तान के सीमांत प्रांत में पाकिस्तानी सेना और अमेरिकी फौजें तालिबानी आतंकवादियों पर हमले कर रही हैं, शायद वहां से पाकिस्तानी सेना का ध्यान हटाने के लिए यह हमला किया गया है। जिससे युद्ध के हालात बनें और पाकिस्तानी सेना वहां से हटकर भारतीय सीमा पर पहुंच जाए। ऐसे में वहां तालिबान और अल-कायदा का काम आसान हो जाएगा। अगर वाकई ऐसा है तो यह बहुत बड़ी साजिश है। भारतीय खुफिया ऐजेंसियां देर-सवेर इसकी तह तक पहुंचेंगी ही। वैसे आज शनिवार के अखबार (नवभारत टाइम्स दिल्ली) में इस आशय की खबर भी आई है कि तालिबान ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है। लेकिन यह बात कितनी सही है, इसका पता लगाना होगा। अगर युद्ध होता है तो घोर मंदी का शिकार अमेरिका फायदे में रहेगा क्योंकि भारत और पाकिस्तान दोनों ही वहां की कंपनियों के हथियार खरीदेंगे और हम लोग वॉर टैक्स चुकाएंगे। तैयार रहिए, कुछ भी हो सकता है।

13 comments:

varun jaiswal said...

आप की राजनितिक समझ पर मुझे तरस आता है |
कारगिल में पूरा विश्व जनमत भारत के साथ हो गया था |
और लगता है अमेरिका से आपको ज्यादा ही खुन्नस है |
जनाब कारगिल के बाद ही अमेरिकी प्राथमिकताएं बदली और क्लिंटन की भारत यात्रा हुई |
भारत विश्व का दूसरा सबे बड़ा बाज़ार बना |
लगता है बीजेपी को गाली देने के लिए आप कुछ भी अनर्गल प्रलाप करते जा रहे हैं |

शुभम आर्य | said...

अजी अंतुले आप के रिश्तेदार हैं क्या ,
और बाल ठाकरे से तो जन्मजात दुश्मनी मालूम देती है |

Rb said...

Varunjee, Mughko tu tras aap per ata hia ke itni se baat ko samgah nahi paa rahe hain. Lagat hai kargil ke samay aap kisi aur planet per rahe honge, tabhi us samay ke ghatanakaram se anjan hain. Itihaas pharne ke adat dalen.

राज भाटिय़ा said...

हम आज तक इन साजिशो को ही समझते आ रहे है किया धरा कुछ नही... ओर ना ही कर सकते है... हां उपर वाले की दया से कोई शेर उस कुर्सी पर बॆठ जाये तो बात बन सकती है, एक कठ पुतली क्या कर सकती है, जो खुद दुसरो के इशारे पर नाचती हॊ,चलिये देखते है अब कोन सा खम्बा ऊखाड लेगी यह सरकार ?? या इसे ६० साल ओर चाहिये हमारा खुन पीने के लिये
धन्यवाद

ramesh said...

We all are talking sensless. War is not kid,s play. Sorry for commenting in english.

jai said...

There is something wrong who are talking about war.

sambhavglobal said...

किसी भी भारतीय का अमेरिका के प्रति खुन्नस निकालना स्वाभाविक है। जो भारतीय अमेरिका, इंग्लैंड और अन्य यूरोपीय देशों में रहते हैं, वे ही जानते हैं कि अमेरिकी या ब्रिटिश लोग भारतीयों को किस दृष्टि से देखते हैं। अमेरिका एक धंधेबाज देश है। वह गरीब देशों को लड़ाकर रखता है, जिससे वे और गरीब होकर उसकी दया पर निर्भर रहें। युद्ध की बात करना सनकपन की निशानी है, जब तक कि अन्य सारे हथियार किसी देश की बदमाशी को रोकने में अक्षम साबित न हो जाएं। पाकिस्तान अब विश्व के सभी देशों में आतंकवादियों की शरणस्थली के रूप में बदनाम हो चुका है। इस समय भारत सरकार सही रास्ते पर जा रही है।

chanchal said...

अगर पाकिस्तान के साथ युद्ध हो तो इसमें कोई विरोध नहीं है। यूसुफ जी ने युद्ध का विरोध भी नहीं किया है। जहां तक मुझे समझ में आ रहा है कि पहले पाकिस्तान को बेनकाब कर दिया जाए। फिर युद्ध हो, जिससे विश्व के अन्य देश एशिया में अशांति के लिए भारत को जिम्मेदार न ठहरा सकें। जहां तक अमेरिका पर खीझ उतारने का सवाल है, वह सही है। अमेरिका भी भारत का सबसे बड़ा शत्रु है। लगता है कि कुछ लोग अमेरिकी और भाजपाई मानसिकता से ग्रस्त हैं, तभी ऐसे लेखों पर हल्ला मचाते हैं।

वरुण जायसवाल said...

आज अमेरिका को शत्रु मानने वाले नेहरू के कीडों ने देश को कहाँ पहुँचा दिया ये तो बात - बात में कश्मीर छोड़कर फिलिस्तीन के घावों को सहलाने वाले सेकुलर ही जानते हैं |
और अमेरिका कम से कम लोकतंत्र तो है न की दारुल इस्लामी मुल्कों के जैसा सारी दुनिया के आतंकियों को पोषने वाला |
जेहाद की अमेरिकी नासमझी ने ही उसे इस बवंडर ( कथित जेहादी आतंकवाद ) में फंसा दिया है , लेकिन हमें तो इस कैंसर का जड़ से नाश करना ही पड़ेगा |

Anonymous said...

भाई! बिना किसी आधार के सिर्फ मुसलमानों की पैरवी चल रही है यहां। पहले तो मियां खुद को सिद्ध करें कि क्या कहने का मन है। बस ऐसे ही घुमा-फिराकर बातें बनाने का आखिर मकसद क्या है? पाकिस्तान से युद्ध न हो, सबके हित में है, सब जानते हैं लेकिन, सबूतों सहित कितने मुंबई झेलने का बूता है लोगों में। 183 मरे लोगों में आपके परिचित कितने थे?

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

अमरीका तालीबानीयोँ पर तनी पाक सेना को हटाने का पैँतरा आजमाये तब भी वहाँ युध्ध जारी रहेगा
क्यूँकि उत्तर दिशा से,
अमरीका का दस्ता
अफघान पाक सीमा तक पहुँचने के इँतेजामात शुरु हो गये हैँ -
अमरीका ने पाक को आयुध और खूब धन भी तो दे रखा है -
Did you forget American aid & arms sales to Pak ?
भारत से मित्रता कर और व्यापार बढाने से पाकिस्तान को फायदा है
ये बात पाक आज तक समझा नहीँ -

Which is very very sad :-(

शायद पाकिस्तान अपने देश के कुछ लोगोँ की सदा लडने की आदत से , अपना ही बहुत बडा नुकसान करेगा !

अफघानिस्तान के बहादुर मुजाहीद्दीन तो सदा ही लडते रहे हैँ -

They have always been warriors --

पहले ब्रिटीश आये
फिर रशियन
और अमरीकी
और अब पाक सेना से
आगे फिर अमरीकी दस्ता आने ही वाला है -

देखते रहीये -

बस इतना ध्यान रहे कि युध्ध से जनता को हमेशा जिल्लत और बर्बादी उठानी पडती है -
The common people suffer --

आप जैसे पत्रकारोँ का फर्ज़ है कि आम जनता को
युध्ध की भयानकता
और उसकी बुराई से
रुबरु करवायेँ -
दोष देना आसान है -
इन्सान ही इन्सान से
दुशमनी निभाता है -
जब के,
दोस्ती से
अमनो चैन और सुकुन फैलता है -
फिर किसे चुनना जरुरी है ?
आप का क्या ख्याल है ?
- लावण्या

Yusuf Kirmani said...

मैं इस बहस को कुतर्क के जरिए काउंटर नहीं करना चाहता हूं। लावण्यम् अन्तर्मन ने आप लोगों के तमाम सवालों का जवाब दे दिया है। मैं उनका बहुत शुक्रगुजार हूं। जहां तक वरुण जायसवाल ने जेहादी आतंकवाद का उल्लेख किया है, उसके बारे में मैं क्या कहूं। हां, उन्हें जेहाद के बारे में कुछ जानकारी चाहिए तो वह मेरा ही एक लेख नवभारत टाइम्स, दिल्ली में पढ़ लें। यह लेख 27-12-2008 को उस अखबार के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है। अगर कोई आनलाइन पढ़ना चाहे तो वह वहां जाकर उस अखबार की साइट (लिंक http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/3896473.cms ) पर पढ़ सकता है। वैसे इस ब्लॉग के पाठकों तक भी मैं उसे आज या कल में पहुंचाने की कोशिश करूंगा।

वरुण जायसवाल said...

जनाब युसूफ भाई , मेरे मन में जेहाद को लेकर कोई संशय नहीं है |
मैंने भी कुरान का व्यापक अद्ध्ययन किया है |
कुरान के जेहाद और कथित जेहादी मुल्लों का जेहाद बिल्कुल अलग है , कुरान के जेहाद से तो सह - अस्तित्व सम्भव है , किंतु इन कठमुल्लों के जेहाद ने दुनिया को नर्क बना दिया है |
अमेरिका से यही अन्तर समझने में भूल तो हुई है किंतु इसमे इस्लाम के झंडाबरदार मुल्कों जैसे सउदी अरब का कम दोष नही जो की पेट्रो डॉलर के लिए अमेरिकी तलवे तो चाट सकते हैं किंतु इस्लाम की सही समझ दुनिया में नहीं फैला सकते |
ये अरब लोग पैगम्बर के वंशज कहलाने के लायक नहीं हैं | इसीलिए आप का अमेरिका पर दोषारोपण करना मुझे खलता है |