Friday, December 26, 2008

दो चेहरे - मनमोहन सिंह और बाल ठाकरे


भारत के दो चेहरे इस समय दुनिया में देखे जा रहे हैं। एक तो चेहरा मनमोहन सिंह का है और दूसरा बाल ठाकरे का। मनमोहन सिंह भारत में आतंकवाद फैलाने वाले पाकिस्तान से युद्ध नहीं चाहते तो बाल ठाकरे का कहना है कि अब हिंदू समुदाय भी आतंकवादी पैदा करें। देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो चाहते हैं कि पाकिस्तान से भारत निर्णायक युद्ध करे। इन्हीं में से •कुछ लोग ऐसे भी हैं जो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कायर बताने तक • से नहीं चूक रहे। यानी अगर मनमोहन सिंह पाकिस्तान को ललकार कर युद्ध छेड़ दें तो वे सबसे बहादुर प्रधानमंत्री शब्द से नवाजे जाएंगे। यानी किसी प्रधानमंत्री की बहादुरी अब उसके युद्ध छेड़ने से आंकी जा रही है। उसने बेशक अर्थशास्त्र की मदद से भारत का चेहरा बदल दिया हो लेकिन अगर वह पाकिस्तान से युद्ध नहीं लड़ सकता तो सारी पढ़ाई-लिखाई बेकार। उस इंसान की शालीन भाषा उसे कहीं का नहीं छोड़ रही है।


हालांकि हाल के दिनों में इस मुद्दे पर काफी कुछ कहा और लिखा जा चुका है कि युद्ध किसी समस्या का हल नहीं है। लेकिन यह बहस खत्म नहीं हुई है। इसी बहाने राजनीतिक वाकयुद्ध भी शुरू हो गया है और तमाम पार्टियां देशभक्ति की होड़ में जुट गई हैं। पाकिस्तान से युद्ध का समर्थन करने वाले देशभक्त हैं और विरोध करने वाले...पता नहीं क्या हैं। देश में इस समय चल रही बहस का यही तानाबाना है।
भारत समेत विश्व के तमाम देश इस भयानक मंदी के दौर से गुजर रहे हैं। नौकरियों पर संकट आ गया है और कोई इंडस्ट्री ऐसी नहीं बची जो इसके प्रभाव से अछूती हो लेकिन बाजीगरी देखिए कि इस मुद्दे पर बहस होने की बजाय बहस इस बात पर हो रही है कि पाकिस्तान के साथ युद्ध हो या नहीं। महंगाई, बेरोजगारी, मंदी, यह सब नेपथ्य में चले गए हैं। लोगों को बताया जा रहा है कि इस समय मुद्दा पाकिस्तान और युद्ध है। रोटी मिले या नहीं, नौकरी जाती है तो जाए, युद्ध जरूरी है। जैसे जानवरों को हांका लगाकर चाहे जिधर ठेल दिया जाता है और वे उसी तरफ भागते हैं तो देश की जनता का भी यही हाल हो गया है। हम लोगों को हांका लगाकर कोई किधर भी ले जाए, हम जाने को आतुर हैं। ले चलो भैया। अपनी जान की बाजी लगाकर करगिल को जिन्होंने बचाया, उनको याद न करके आज अटल (जी) और आडवाणी (जी) को याद किया जा रहा है कि कैसे उन्होंने उस समय युद्ध का आदेश दिया था। शहीदों के ताबूत के पैसे खाने वाले नेताओं को लोग भूल चुके हैं। करगिल की कीमत हमने क्या चुकाई, यह कोई बताता नहीं है। मैं उस वक्त पंजाब में था, भारतीय सैनिकों की लाशें जब उनके गांवों में पहुंचती थीं तो वहां नौयौवना विधवाओं की चीत्कार सुनने वाला कोई नेता मौजूद नहीं होता था।
अभी पिछले चार-पांच साल में पत्रकारों की जो भीड़ मीडिया हाउसों में पहुंची है, वह जोश से लबरेज है। उन्हीं के समकक्ष लोग अन्य इंडस्ट्री में भी हैं। लेकिन दोनों की मनोदशा एक जैसी ही है। यही तबका पाकिस्तान से युद्ध चाहता है। टीवी, अखबार से लेकर बीपीओ सेक्टर तक – हो जाए, भाई साब, बहुत हो गया। टीवी पर एंकर चीख रहे हैं, हम अखबार के दफ्तर में युद्ध का माहौल बना रहे हैं और बीपीओ वाला - आरकुट से लेकर फेसबुक तक में वॉल राइटिंग कर रहा है कि बस पाकिस्तान से दो-दो हाथ जाए। बिना दिमाग लगाए इस तबके का प्रतिनिधित्व करने वाले साथी आसानी से बोल देते हैं कि युद्ध में क्या बुराई है? लेकिन इसमें क्या अच्छाई है, वह न तो जानते हैं और न बताना ही चाहते हैं। एक सपाट जवाब आता है, आतंकवाद हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। पता नहीं उनके इस यकीन का आधार क्या है लेकिन इस तबके से आप तर्क में नहीं जीत सकते।
चलिए छोडिए इस मुद्दे को। हम भी क्या ले बैठे इसे। बाल ठाकरे की बात करते हैं। पैर कब्र में लटका हुआ है और देश के बहुसंख्यकों को यह शख्स अपने समुदाय में आतंकवादी पैदा करने की सलाह दे रहा है। इसने अपने ही अखबार सामना को दिए गए एक साक्षात्कार में यह बात कही है। मुंबई पर जब आतंकवादी हमला हुआ तो इस शख्स का और इसके पूरे खानदान का कहीं पता नहीं था। (जिसमें इस व्यक्ति का भतीजा राज ठाकरे शामिल है और जो मुंबई से गैर मराठी लोगों को भगाने का आंदोलन चला रहा था) इस हमले में शिवसेना या राज ठाकरे के संगठन का एक भी कार्यकर्ता मारा नहीं गया। यह तक चर्चा नहीं सुनने को मिली कि कोई शिव सैनिक आम लोगों को बचाने के लिए आतंकवादियों के सामने ही आ गया हो।
लेकिन हम लोग आजाद भारत के नागरिक हैं। न तो ठाकरे को जवाब दे सकते हैं और न अंतुले को। हमल लोग तो बस यूं ही सवाल उछाल सकते हैं और ज्यादा से ज्यादा पाकिस्तान से युद्ध लड़ सकते हैं या युद्ध की बात कर सकते हैं। यह युद्ध आजाद भारत की जनता के जेब से लड़ा जाएगा, यह सोचने की फुरसत किसी के पास नहीं है।

8 comments:

राज भाटिय़ा said...

भाई अब भी कोन सा जिन्दा है, वेसे आप की जानकारी के लिये यह दोनो चेहरे ही निक्कमे है.

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

आप जैसे लोग ही ठाकरे की चर्चा कर उनेह चर्चित कर देते हो . ठाकरे का क्या स्तर है सब को मालूम है . लगता तो यह है ठाकरे की बिरादरी जिसमे आप भी शामिल है हमेशा ठाकरे को चर्चा मे रखते हो . [बिरादरी इस लिए क्योकि ठाकरे भी अखबार से सम्बन्ध रखते है और आप भी ]

Ratan Singh Shekhawat said...

ठाकरे जैसे लोगों पर चर्चा न कर इनका बहिष्कार करें ! इनके बहिष्कार से देश का भला ही होगा !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

उछल तो अब्दुल रहमान अंतुले भी काफी रहे हैं...मगर उनका दर्जा विशेष है.

स्वाति said...

लेकिन हम लोग आजाद भारत के नागरिक हैं। न तो ठाकरे को जवाब दे सकते हैं और न अंतुले को।

बिल्कुल सही कहा आपने , जब भी ये तथाकथित नेता कुछ भड़काऊ बयान दे तो हमारी जनता को इन से यह सवाल जरूर पूछना चाहिए की जब आतंकवादी हमला हुआ था तो आप लोग कहा थे और मीडिया को भी इस मामले में सहयोग करना चाहिए तथा आगे से धर्म और जाती के नाम पर देश को बाटने वाले इन लोगो का सभी ने मिलकर बहिष्कार करना चाहिए
स्वाति

Suresh Chiplunkar said...

लेख का सन्दर्भ भारत-पाकिस्तान युद्ध है, फ़िर इसमें ठाकरे-मनमोहन कैसे आ गये? कुछ भ्रम पैदा करने वाला लेख है, पहले आप स्पष्ट करें कि पाकिस्तान पर हमला करने से भारत को क्या-क्या नुकसान हैं… और इन हमलों को झेलने की दोनों की क्षमता कैसी है? नेता तो बकवास करते ही रहते हैं, मूल मुद्दा तो यही है कि यदि युद्ध नहीं, तो विकल्प के तौर पर क्या? क्या पाकिस्तान सिर्फ़ अन्तर्राष्ट्रीय दबावों से मानने वाला है? और यदि प्रणब मुखर्जी रोजाना गब्बर जैसे बयान दे रहे हैं तो सीधे पाकिस्तान से आर्थिक सम्बन्ध खत्म करने का ऐलान क्यों नहीं कर देते?

sareetha said...

आर्थिक संबंध खत्म करने की पहल तो पाकिस्तान ने करके बाज़ी मार ली । ये सही है कि युद्ध इस समस्या का हल नहीं । लडाई छिडी तो समाज के कुछ तबके खूब मौज लूटेंगे ,लेकिन समाधान क्या है ज़रा इस पर भी रोशनी डालें ।

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

अजी ये जीना भी क्या जीना है.माना कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता,किन्तु जब कोई अन्य विकल्प ही ना रहे तो ?