Monday, November 3, 2008

जामिया...आइए कुतर्क करें


जामिया यूनिवर्सिटी पर वाले नीचे के लेख पर यहां-वहां की गई टिप्पणियां आप लोगों ने देख ली होंगी। टिप्पणी करने वालों ने आपस में भी बहस कर डाली। खैर, कुछ लोगों ने सामने न आने की कसम खा रखी है और वे अब ईमेल के जरिए अपनी बात लिखकर भेज रहे हैं। इनमें कुतर्क करने वालों की तादाद ज्यादा है और संजीदा बात करने वालों की बात कम है।
कुतर्क करने वालों का कहना है कि इस यूनिवर्सिटी को आतंकवाद फैलाने के लिए ही बनाया गया है। इसके पक्ष में सिर्फ और सिर्फ उनके पास बटला हाऊस एनकाउंटर जैसी घटना बताने के लिए है। इन लोगों का कहना है कि पुलिस कभी भी आतंकवादी के नाम पर झूठा एनकाउंटर नहीं करती। इसलिए दिल्ली पुलिस अपनी जगह सही है।
बहरहाल, इन बातों को आप अपनी कसौटी पर रखकर देखें। मुझे इस मामले में सिर्फ इतना कहना है कि जामिया यूनिवर्सिटी सभी की है और इसका मूल स्वरूप धर्म निरपेक्ष रहा है और अब भी है। मौजूदा वीसी मुशिरूल हसन के यहां आने के बाद इस यूनिवर्सिटी ने अपनी अच्छी ही इमेज बनाई है। अगर कांग्रेस या बीजेपी या इनसे जुड़े लोगों को इस वीसी की बात पसंद नहीं है तो उसमें उस वीसी का क्या कसूर? कम से कम वह तो इन राजनीतिक दलों की सुविधा के हिसाब से नहीं चल सकते। आप लोगों में से जो लोग रौशन जी के ब्लॉग पर गए होंगे, वहां 28 अक्टूबर को की गई उनकी पोस्ट जरूर पढ़ी होगी, जिन्होंने नहीं पढ़ी, उन्हें पढ़ना चाहिए। रौशन ने मुद्दा उठाया कि जिस तरह बिहार का एक युवक हाथ में पिस्तौल लेकर एक बस में लोगों को डराता फिरा और राज ठाकरे को गोली मारने की बात कही, उसे सरेआम मार दिए जाने के बाद राजनीतिक लोग जिस तरह सक्रिय हुए और प्रधानमंत्री को पत्र तक लिखा गया। क्या वही युवक गुजरात में जाकर वहां नरेंद्र मोदी के लिए यही बात कहता और मारा जाता तो इतना हो हल्ला मचता?
कहने का मतलब यही है कि राजनीतिक दल अपनी सुविधा के हिसाब से एजेंडा तय करते हैं कि उन्हें क्या भुनाना है और क्या नहीं?
कई साल पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के एक लेक्चरर और एक पत्रकार को भी आतंकवादी गतिविधियों के आरोप में दिल्ली पुलिस ने घसीटा था लेकिन अदालत में मामला जाने पर पुलिस को मुंह की खानी पड़ी। पत्रकार तो खैर बेदाग होकर छूटे और उस लेक्चरर के खिलाफ भी पुलिस ठोस सबूत नहीं जुटा पाई। लेकिन उस वजह से दिल्ली यूनिवर्सिटी तो आतंकवादियों का अड्डा नहीं बनी। जिस पत्रकार को पुलिस ने गिरफ्तार किया था उस पर आरोप था कि उसके लैपटॉप से देशविरोधी लेख और सूचनाएं मिली हैं। अदालत ने मामला खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि पत्रकार अपनी प्रोफेशनल ड्यूटी के लिए ऐसी जानकारियां रखते हैं, इसका मतलब यह नहीं कि वे आतंकवादी हैं। इसलिए जो लोग आतंकवाद को किसी धर्म विशेष या समुदाय विशेष से जोड़ रहे हैं, उनकी सोच निहायत घटिया है। जामिया यूनिवर्सिटी का नाम मुस्लिम भर होने से वह आतंकवाद का अड्डा नहीं बन सकती। सिमी जैसे विवादास्पद संगठन के जो लोग पकड़े गए हैं अगर उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) या किसी ईसाई स्कूल से पढ़ाई की है तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वे जगहें आतंकवाद का सेंटर हैं। जामिया की तरह एएमयू को भी ऐसे विवाद में घसीटने की नापाक कोशिश हो चुकी है लेकिन वह सिरे नहीं चढ़ सकी क्योंकि आज एएमयू का कैरेक्टर भी वही है जो जामिया या दिल्ली विश्वविद्यालय का है। जवाहर लाल नेहरू (जेएनयू) में तमाम छात्र नेता या कतिपय संगठन माओवादियों के हमदर्द या नक्सल आंदोलन के समर्थक रहे हैं या हैं, तो क्या इस आधार पर हम लोग जेएनयू जैसे प्रख्यात शिक्षा केंद्र को नक्सलियों का अड्डा मान लें। जेएनयू छात्रसंघ चुनाव में नक्सलवाद और आतंकवाद पर जितनी खुली बहस होती है, उतनी शायद ही कहीं और होती हो।
जामिया पर इस बहस को मैं अब बीच में ही खत्म कर रहा हूं। क्योंकि इस बीच कई महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा ही नहीं हो सकी। अगर जामिया पर आप लोग फिर भी टिप्पणी करना चाहते हैं तो भेज सकते हैं, बीच में किसी दिन उसे फिर से पेश किया जाएगा। अगर कोई सौरभ भारद्वाज की तरह लेख भेजना चाहे तो उसका भी स्वागत है। यकीन मानिए संपादन के बिना यहां पोस्ट किया जाएगा, हां अगर ईमेल की तरह उसमें गाली-गलौच की भाषा का इस्तेमाल होगा तो उसे पोस्ट कर पाना मुमकिन नहीं होगा। ईश्वर गुमराह लोगों को सदबुद्धि दे।

6 comments:

Dineshrai Dwivedi दिनेशराय द्विवेदी said...

आप के विश्लेषण से कोई राजनीति परवान नहीं चढ़ती। राजनीति जामिया को आतंक का गढ़ बताने से परवान चढ़ती है सो चढ़ चुकी है। अब चुनाव भी सर पर हैं इस लिए जल्दी ही उतरना भी मुश्किल है।

युग-विमर्श said...

हैरत है. जो लोग कुछ समझना नहीं चाहते. आपको जिद है उन्हें समझाने की. आप देखेंगे. कल उन्हीं की बातें उनके लिए उलटी पड़ जायेंगी. और वो लोग इसी तरह राष्ट्र का नाम रौशन करते रहेंगे.

surjeet singh said...

yusuf ji aapne bilkul thik kaha...mera ye manna hai ki kuch logon ki karastani ke liye pure univ.ko badnam nahi karna chahiye...wo chahe DU ho ya Jamiya...lekin agar univ ka koi student aatank failata hai to univ ko uska bachav bhi nahi karna chahiye..jo kaam kanun aur prashashan ka hai wo use hi karne de to achcha hai

ummed Singh Baid "saadahak " said...

जब आपने पहले ही कह दिया कि छापेंगे नही, तो क्या लिखें?
वैसे मुसलमान और सेकूलर- जुमला जमा नहीं.
असहिष्णुता का पूरा इतिहास है, दूसरे को समझने की जिसने भी मिसाल बनानी चाही,उसे इस्लाम की मुख्य धारा से ही बाहर कर दिया गया. रहीम,रसखान, अशफ़ाकुल्ला खाँ,और बशीर अहमद मयुख जैसे लोगों को हिन्दू ही कह दिया गया.(गाली दी).सोचिये.

Suresh Chiplunkar said...

मैंने आपकी जामिया सीरिज पढ़ी और जाहिर है कि टिप्पणियाँ भी, दोनों पक्ष अपने-अपने मजबूत तर्कों के साथ उपलब्ध हैं, जिसे जो मानना है माने, लेकिन आप इतिहास को इससे नहीं जोड़ सकते, यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि जहाँ भी हिन्दू बहुसंख्यक होता है वहाँ धार्मिक आजादी, वैयक्तिक आजादी, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता और लोकतन्त्र होता है, लेकिन जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक होता है वहाँ पर इसका उलटा होता है, और खेद की बात तो यह है कि मुस्लिम समाज में से भी इसके खिलाफ़ जोरदार आवाज नहीं उठती… जिस प्रकार हिन्दू अपने संतों-पुजारियों-मठों के खिलाफ़ बोलने को स्वतन्त्र हैं और बोलते हैं, क्या मुस्लिम अपने मौलवियों और कठमुल्लाओं के खिलाफ़ आवाज उठाते हैं???

रौशन said...

चिप्लुकर साहब एपी जो नही सुनना चाहते हैं वो आपको सुनाई ही नही पड़ेगा
ऐसे लोगों में से एक मुशीरुल हक़ साहब ही हैं कभी गौर किया है?
और भी बहुत हैं आपके पढने के लिए एक साक्षात्कार यहाँ है
http://www.indianexpress.com/news/you-want-us-to-stand-on-a-terrace-and-announce-we-are-liberal-loyal-muslims-this-is-an-expectation-we-cant-fulfill/369561/0