Sunday, October 5, 2008

कंझावला के किसान


राजधानी दिल्ली में एक गांव है जिसका नाम कंझावला है। यहां के किसनों की जमीन (Farmers Land) काफी पहले डीडीए ने अपनी विभिन्न योजनाओं के लिए Aquire कर ली थी। उस समय के मूल्य के हिसाब से किसानों को उसका मुआवजा भी दे दिया गया था। अब दिल्ली सरकार जब उसी जमीन पर कई योजनाएं लेकर आई और जमीन का रेट मौजूदा बाजार भाव से तय कर कई अरब रुपये खजाने में डाला लिए तो किसानों की नींद खुली और उन्होंने आंदोलन शुरू कर दिया।
पहले तो ये जानिए कि दिल्ली के किसान (नाम के लिए ही सही) की स्थिति बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा के किसान जैसी नहीं है, जहां के किसान पर काफी कर्ज है और उसे मौत को गले लगाना पड़ता है। दो जून की रोटी का जुगाड़ वहां का किसान मुश्किल से कर पाता है और धन के अभाव में उसके फसल की पैदावार भी अच्छी नहीं होती है। दिल्ली के किसान तो आयकर देने की स्थिति में हैं, यह अलग बात है कि देते नहीं। आप दिल्ली के किसी भी गांव में चले जाइए, आपको जो ठाठ-बाट वहां दिखेगा, वैसा तो यूपी-बिहार से यहां आकर कई हजार कमाने वालों को भी नसीब नहीं है। सरकार से अपनी जमीन का मुआवजा लेने के बाद दिल्ली के किसान ने जहां-तहां अपनी अन्य जमीन पर या तो दुकानें बना लीं या फिर कई मकान बनाकर उन्हें किराये पर चढ़ा दिया। लेकिन ऐसा वही किसान कर सका जो इस भविष्य पहचानता था। लेकिन बहुत सारे किसान परिवारों ने मुआवजे के पैसे से या तो पजेरो, स्कॉर्पियो जैसी गाडिया खरीद लीं या पैसे को दारू के नशे में बहा दिया। यह तबाही का आलम एक नहीं दो नहीं कई-कई घरों में देखा जा सकता है। कंझावला के किसानों की आवाज को ग्लैमर देने के लिए Bollywood के एक अभिनेता प्रवीण डबास भी आए। डबास ने खोसला का घोसला फिल्म में काम किया है और वह अपनी इमेज भुनाने के लिए इस आंदोलन में शामिल हो गए। आप पूछेंगे प्रवीण का इस गांव से रिश्ता? है न, उनके पिता जी का यह पुश्तैनी गांव है। पिता टीचर थे लेकिन जमीन का मुआवजा मिलने के बाद उन्होंने टीचरी छोड़कर कपड़े की फैक्ट्री खोल ली। इस वक्त वह साउथ दिल्ली के वसंत कुंज इलाके में रहते हैं जो दिल्ली का अत्यंत पॉश इलाका माना जाता है। लेकिन बेचारे प्रवीण डबास के दिल में किसानों के लिए कितनी हमदर्दी है कि वे मुंबई से भागकर यहां समर्थन करने पहुंचे। मीडिया ने इतनी कवरेज दादरी के किसान आंदोलन को नहीं दी, जितनी कंझावला के किसानों को दे डाली। प्रवीण दिल्ली के मीडिया से वादा करके गए हैं कि मुंबई के बड़े से बड़े स्टार को वह किसानों के बीच ले आएंगे और मुआवजा दिलवाकर रहेंगे।
कंझावला के किसान आंदोलन में इतनी हवा भर दी गई कि वहां के किसान ४ अक्टूबर को सोनिया गांधी की रैली में जा पहुंचे और रैली में अव्यवस्था फैला दी। आंदोलनकारियों ने इस रैली में बुजुर्गों और महिलाओं को इसलिए भेजा था कि पुलिस अगर उन पर डंडा बरसाएगी तो मीडिया सामने होगा और सोनिया की रैली की जगह लीड खबर कंझावला के किसान बनेंगे।
इन बातों को लिखने का आशय यह कतई नहीं है कि मेरी हमदर्दी कंझावला के किसानों के साथ नहीं है या उनका फिर से मुआवजा मांगना गलत है। सिर्फ एक ही बात का मलाल है कि दूर-दराज के किसानों को वह आवाज नहीं मिल पाती जो दिल्ली या आसपास के किसानों को मिल जाती है। दादरी में तो पूर्व प्रधानमंत्री, एक्टर और तमाम नेता तक पहुंच जाते हैं लेकिन अकबरपुर या बेगूसराय के किसानों की सुध लेने वाला कोई नहीं है।

7 comments:

E-Guru Rajeev said...

दूर-दराज के किसान बस आत्महत्या करने के लिए ही होते हैं. उनके जीने का कोई मतलब नहीं है. उनका दुर्भाग्य है कि वे पाश कालोनी के पास नहीं रहते. पिछले ७-८ सालों से किसानों को आत्महत्या करते हुए सुनता आया हूँ. कभी उनका भला करने वाला न कोई आया न ही कोई आयेगा.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत ही विचारपूर्ण पोस्ट है. मैंने उ प्र के किसान भी देखे हैं और कंझावला के भी. अफ़सोस की बात यह है कि हमारे रहनुमा दंगा, धरने, जाम और हड़ताल के बिना वास्तविक समस्याओं पर भी ध्यान नहीं देते हैं और इन हथियारों के होने पर बिना किसी समस्या के भी मेहरबान हो जाते हैं.

प्रदीप मानोरिया said...

सार्थ विचारों और सुंदर बुनावट वाला आलेख शुक्रिया मेहरबानी किरमानी जी
नैनो की विदाई नामक मेरी नई रचना पढने हेतु आपको सादर आमंत्रण है .आपके आगमन हेतु धन्यबाद नियमित आगमन बनाए रखें

डॉ0 ब्रजेश कुमार said...

विचारपूर्ण, वास्तविक

विनीता यशस्वी said...

jay jawan jay kisan wale desh mai ab yehi to dekhna banki bacha hai....
apne seedhe shabdo mai bahut achhe se apni baat rakhi hai.....

sab kuch hanny- hanny said...

aaj pahlibaar aapka blog dekha, kafi achchha laga. aasha hai aap patrkarita jagat ke anuvaw hame dete jayenge. yah sahi hai ki pure desh ke kishano ki isthiti ek si nahi hai. hamare bihar me hi alag- alag jagah par kisano ki sthithi alag- alag hai. patna jile me ek v kisan aisa nahi milega jo itna karj me duba hao. bachpan se kisano k thath dekh kar yahi jana tha ki kisan ka matlab bahut amir. baad me jab pahli baar kisano ka karj k karn aatm hatya karna suna to laga aisa ho kaise sakta hai. sanyag se baad me alag alag jagah par alag sthitiyan dekhne ko mili.

deepak said...

aap sabhi ka kahne bilkul theak hai. lakin muze ye b batana padega ki mai bi kanjhawala ka hi rahne wala 1 ladka hu. or agar aap ye janna chate hai ki aasal baat kya hai kanjhawala k bare me to mai apko batata hu. har koi kissan amir nahi hai or har koi gareab baat to sirf soach ki hai.agar kisi ki soach or dimag theak thak hai to vo aaj bhaut hi bulandio par hai or jo nasamaj hai to usko to jameen hote huwe b aaj vo kuch nahi kar paya. laki ye baat me apko baat dena chata hu ki sab kuch bhagwan ki lela hai. aaj jiske pass apne alders ki de huwi jameen hai wo bhaut kuch karne k layak hai.