Friday, October 3, 2008

नई दुनिया का शुरू होना

देश में चुनावी माहौल धीरे-धीरे अपने रंग में आ रहा है। कई शहरों में serial blast हो चुके हैं और हिंदू-मुसलमानों के बीच गलतफहमी पैदा करने की कोशिशें परवान चढ़ने लगी हैं। यह सब voting के वक्त फसल काटने की तैयारी का ही हिस्सा है। कुछ इन्हीं हालात में नई दिल्ली New Delhi से एक नए newspaper नई दुनिया का शुरू होना कुछ सुखद अहसास करा गया है। मैं नवभारत टाइम्स में काम करता हूं और आमतौर पर journalism के मक्का दिल्ली में इसका चलन कम ही है कि किसी दूसरे तारीफ की जाए।
मैं अपने hawker को बहुत पहले ही कह चुका था कि मुझे २ अक्टूबर से ही नई दुनिया अखबार चाहिए। eid का त्यौहार होने के बावजूद सुबह सबसे पहले अखबार पढ़ने से ही की। हॉकर ने अपना वादा पूरा किया था।
सबसे पहले नई दुनिया ही उठाया। पहले ही पेज पर प्रधान संपादक आलोक मेहता देश के कुछ अन्य जानी-मानी शख्सियतों के साथ अखबार के पत्रिका की प्रति हाथ में लिए हुए खड़े नजर आए। साथ में गुलजार, जावेद अख्तर, राजेंद्र यादव भी थे। मुझे लगा कि लगता है किसी मंत्री वगैरह ने टाइम नहीं दिया इसलिए किसी बड़े नेता की तस्वीर नहीं लगी है। लेकिन जैसे-जैसे बाकी पन्ने पलटे तो देखा कि सभी आए थे, चाहे वह कांग्रेस, बीजेपी या किसी अन्य पार्टी का हो, जिसमें अर्जुन सिंह, शिवराज पाटिल, मुलायम सिंह यादव, इंद्र कुमार गुजराल, राजनाथ सिंह, कई राज्यों के सीएम वगैरह शामिल थे।
मैंने जिस सुखद अहसास का जिक्र किया, वह यही था कि पहले पेज की तस्वीर में कोई नेता जगह नहीं बना पाया था। उसकी जगह नामी बुद्धजीवियों () ने ली, मेरे जैसे शायद और लोग भी होंगे जो इस बात को पसंद करेंगे लेकिन corporate culture कारपोरेट कल्चर में इन बातों की वैल्यू नहीं है। अब कुछ बात अखबार के कंटेंट content पर। नई दुनिया पर पूरी छाप हमारे नवभारत टाइम्स की ही दिखाई दी लेकिन अखबार के प्रोडक्शन, लेआउट पर ठीक से ध्यान नहीं दिया गया। पहले दिन एकाध तेवर वाली जिन news की तलाश नए पाठकों को रहती है, वह भी नजर नहीं आई। इस लिहाज से कहना यही पड़ेगा कि बाजार में टिकने और जगह बनाने में इसे काफी मेहनत करनी पड़ेगी। हालांकि मध्य प्रदेश, जहां से इस अखबार की शुरुआत हुई, वहां यह काफी सम्मानित नाम है और स्व. राजेंद्र माथुर जी से कई बार इस अखबार के बारे में काफी कुछ जानने को मिला। लेकिन दिल्ली big market है और यहां टिके रहने की अपनी शर्ते हैं। बहरहाल, आलोक मेहता जी के पास जरूर कोई न कोई योजना होगी, जिसका खुलासा उन्होंने सार्वजनिक रूप से तो नहीं किया है। लेकिन हम जैसे जिज्ञासु लोगों को उसका इंतजार तो जरूर रहेगा।

1 comment:

प्रदीप मानोरिया said...

श्रीमान आपका मेरे ब्लॉग पर पधारना मेरा सौभाग्य है और उस पर कुछ पसंद आ जाना आपका सौभाग्य है
हमारे इस सौभाग्य के सिलसिले को कायम रखे दर्शन देते रहे
आपका सार्थक आलेख पढा अच्छा लगा यह मेरा सौभाग्य है