Saturday, March 16, 2019

मस्जिदों में गोलीबारी के बाद न्यूजीलैंड महान है या भारत...


कोई भी देश महान उसके लोगों से बनता है...भारत न्यूज़ीलैंड की घटना से बहुत कुछ सीख सकता है...सिर्फ नारा भर देने से कि गर्व से कहो हम फलाने महान हैं तो कोई महान नहीं बनता।

पूरे न्यूजीलैंड के लोग अपने आसपास के मुस्लिम घरों में जा रहे हैं, वे उन्हें गुलाब पेश करते हैं और कहते हैं हम आपके साथ हैं।...वहां की प्रधानमंत्री का भाषण कल रात से मैंने कई बार सुना।...प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डन का मारे गए लोगों के लिए बोला गया यह शब्द - They are us (दे आर अस) यानी वो हम ही हैं - अब वायरल है और ऐसे ही शब्द किसी देश के नेता के व्यक्तित्व का परिचय कराते हैं। वरना ढिंढोरचियों की तो कमी नहीं है।





कोई बुज़ुर्ग पोस्टर लेकर न्यूजीलैंड से मीलों दूर मैन्चेस्टर की मस्जिद के बाहर खड़ा है, जिस पर लिखा है- मैं आपका दोस्त हूँ। जब आप नमाज़ पढ़ेंगे, मैं आपकी सुरक्षा करूँगा।...और उस बुज़ुर्ग की बेटी उस पोस्टर को शेयर करते हुए लिखती है कि मुझे गर्व है कि आप मेरे पिता हैं। आज मैंने जाना कि  सेकुलर होने का मतलब क्या है? बीबीसी को इस बुज़ुर्ग के पोस्टर में इतनी गहराई नज़र आती है कि वह उसे अपने हर प्लैटफ़ॉर्म पर वायरल कर देता है। आज सुबह से यह पोस्टर सोशल मीडिया पर तैर रहा है।




यह पोस्टर सिर्फ ब्रिटेन में ही नहीं शेयर हो रहा, इसे न्यूज़ीलैंड में भी शेयर किया जा रहा है। 

इस पोस्टर को देखने के बाद लिसा जेनकिन्स ने लिखा- आप किसी भी मज़हब के हों, लेकिन हमें जिंदगी में इस बुज़ुर्ग जैसा ही होना चाहिए।

इतना ही नहीं, ऐसे पोस्टर शेयर किए जा रहे हैं जिनमें शिया, सुन्नी, ईसाई धर्मगुरु एकता प्रदर्शित करते हुए दिख रहे हैं।

न्यूज़ीलैंड, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया में एक मुस्लिम युवक रज़ी रिज़वी का यह ट्वीट भी आज काफ़ी ट्रेंड में है कि चाहे तुम हमारे लिए बेशक इस्लामिक आतंकवाद लिखो और कहो लेकिन मैं इसे ईसाई आतंकवाद नहीं कहूँगा क्योंकि हज़रत ईसा (Christ) हमारे भी पैग़म्बर हैं। तुम्हारा इस्लाफफोबिया तुम्हें मुबारक।

रूज एलिना ने लिखा है कि नस्लीय भेदभाव (Racism) के बिना ज़िंदगी कितनी ख़ूबसूरत होती है।... फिर वो अपने दोस्तों को लिखती हैं कि इस्लाम में क्या-क्या अच्छाइयाँ हैं...फिर वह कहती हैं कि दूसरे धर्मों को वही सम्मान दो जो तुम्हें अपने धर्म के लिए चाहिए।

याद कीजिए पुलवामा आतंकी हमले की घटना के बाद भारत में बना माहौल। इसमें कोई शक नहीं कि पुलवामा में चालीस बेक़सूर जवानों की हत्या न सिर्फ़ निंदनीय थी बल्कि कायराना थी। भारत के तमाम मुस्लिम संगठनों ने पुलवामा के आतंकी हमले का विरोध किया। कोई मस्जिद ऐसी नहीं थी जिसमें आतंकवाद के ख़िलाफ़ और पुलवामा की घटना के ख़िलाफ़ मुस्लिम धर्मगुरुओं ने खुतबा न पढ़ा हो। लेकिन दूसरी तरफ़ भारत को तोड़ने की कोशिश में लगे एक ख़ास विचारधारा के लोग यहाँ-वहाँ सड़कों पर निकल आए और उन्होंने उन कश्मीरियों को निशाना बनाने की कोशिश की जो मेवे बेच रहे थे, जो कपड़े बेच रहे थे, जो परीक्षा देने आए थे या कश्मीर से बाहर पढ़ रहे थे। 

...लेकिन उस विचारधारा के फ़र्ज़ी राष्ट्रवादियों का इसमें क़सूर नहीं है। वो अपने नेता से सब सीखते हैं। जब उनका नेता गुजरात नरसंहार में मुसलमानों के क़त्लेआम की तुलना गाड़ी के नीचे आने वाले पिल्ले से करता है तो संवेदनशीलता का अंदाजा लगाना कठिन नहीं है....जब वह नेता मौलाना की दी हुई टोपी पहनने से इनकार कर देता है तो उसकी कुटिलता का पता लगाना कठिन नहीं है...जब वह ईद की मुबारकबाद नहीं देने जैसा घृणित काम करता है तो उसकी गलीज सोच का पता लगाना कठिन नहीं है...तो उसकी पार्टी का कैडर, समर्थक भी तो वही करेगा, जो उसका नेता करेगा।

वसुधैव कुटुम्बकम वाले भारत के लोगों को संकीर्ण विचारधाराओं के बंधन में बाँधने की कोशिश हो रही है। एकतरफा राष्ट्रवाद को नियो नाजियों के अंदाज में फैलाया जा रहा है। सरहद पर सेना लड़ती है। लेकिन उसके पराक्रम को नेता और मीडिया भुनाता है। नेता उस पर फिल्म बनवाता है, पोस्टर जारी कराता है। वह बताता है कि यह फौज भी  पराक्रमी नेता की वजह से पराक्रमी फौज है। इसीलिए लड़ पा रही है। विडम्बना देखिए सियाचिन में जवान खड़ा है लेकिन वहां गया नेता बुलटप्रूफ जैकेट पहनकर राष्ट्रवादी बन जाता है और हम लोग मान भी लेते हैं।

...भारत में हम हर समय हिंदू-मुसलमान में लगे रहते हैं। न्यूज़ीलैंड में कल मुसलमानों पर हुए आतंकी हमले के बाद क्या हुआ, क्या आपने वहां के मीडिया के ज़रिए जानने की कोशिश की...क्योंकि भारतीय मीडिया ने आपके सोचने-समझने की ताकत छीन ली है। आप बाकी दुनिया की मीडिया पर भरोसा नहीं करते लेकिन दलाल मीडिया पर जरूर भरोसा करते हैं।

सीखो भारत...न्यूजीलैंड से कुछ सीखो...


Tuesday, February 26, 2019

देवताओं का वॉर रस प्रवचन

देवता आसमान से पुष्प वर्षा कर रहे हैं...आज वॉर रस पर प्रवचन का दिन है...

देवता वॉर वाणी (War Sermons) कर रहे हैं...बच्चा जीवन में टाइमिंग का ही महत्व है।...कुछ कार्य का समय चुन लो...वॉर रस से मंत्रमुग्ध जनता को अगर शांति पाठ करने को कहोगे तो तुम्हें कच्चा चबा जाएगी लेकिन वॉर रस में अगर उसे पबजी गेम में भी अटैक बोलोगे तो वह ख़ुश हो जाएगी। टाइमिंग की कला जिसको आती है, वही वीर है।

अच्छे टाइमिंग का ताजा उदाहरण देखो...कल वॉर मेमोरियल (War Memorial) का उद्घाटन हुआ, आज यानी 26 फ़रवरी को  भारतवर्ष की सेना ने अपने पड़ोस में जाकर कई किलो बम गिरा दिए...नोमैंस लैंड में क़रीब तीन सौ लोग मारे गए...कई आतंकी शिविर हमेशा के लिए तबाह हो गए। यही टाइमिंग है...वॉर रस में डूबी जनता को अपना टॉपिक और टॉनिक मिल गया है। सीआरपीएफ़ जवानों की तेरहवीं के दिन किए गए इस अटैक से संबंधित पक्षों ने कई हसरतें पूरी कर ली हैं। वॉर रस में डूबी जनता जश्न मोड में आ चुकी है। स्कूलों में पढ़ाई की जगह बच्चों में भी नारे लगवा कर वॉर रस का संचार किया जा रहा है।

जब तक इस वॉर रस का ख़ुमार उतरेगा तो धर्म का रस तैयार है। देवता कह रहे हैं कि अयोध्या को सजाया जा रहा है। तैयार किया जा रहा है। कतिपय लोग फिर से पंचायत को भी कह रहे हैं।...देवता कह रहे हैं कि टाइमिंग का चुनाव फिर मायने रखेगा। फिर चुनाव आ जाएगा। तीन महीने तक उसका उत्सव रहेगा।...फिर योजना रस पिलाया जाएगा।....ग़रीबी, भुखमरी, आतंकवाद से लड़ने के वादे और संकल्प लिए जाएँगे।...आपको फिर अगले वॉर रस का टॉनिक दिया जाएगा।...आपकी जिंदगी यूँ ही चलती रहेगी। उसमें आपको बदलाव खुद लाना होगा। वॉर रस का टॉनिक आपकी जिंदगी नहीं बदल सकता।

मेरे इन शब्दों को हमेशा के लिए संकलित कर लें...
थोपा गया युद्ध और ओढ़ा गया युद्ध एक ही सिक्के के दो पहलू हैं...

Monday, February 18, 2019

पुलवामा पर तमाम प्रयोगशालाओं की साजिशें नाकाम रहीं

पुलवामा ने हमें बहुत कुछ दिया। जहां देश के लोगों ने सीआरपीएफ के 40 जवानों की शहादत पर एकजुट होकर अपने गम-ओ-गुस्से का इजहार किया, वहां तमाम लोगों ने नफरत के सौदागरों के खिलाफ खुलकर मोर्चा संभाला।

पुलवामा की घटना के पीछे जब गुमराह कश्मीरी युवक का नाम आया तो कुछ शहरों में ऐसे असामाजिक तत्व सड़कों पर निकल आए जिन्होंने कश्मीरी छात्रों को, समुदाय विशेष के घरों, दुकानों को निशाना बनाने की कोशिश की लेकिन सभी जगह पुलिस ने हालात संभाले। लेकिन इस दौरान सोशल मीडिया के जरिए भारत की एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसकी कल्पना न तो किसी राजनीतिक दल के आईटी सेल ने की थी न किसी नेता ने की थी।

उन्हें लगा था कि नफरत की प्रयोगशाला में किए गए षड्यंत्रकारी प्रयोग इस बार भी काम कर जाएंगे। देश की जानी-मानी हस्तियों ने, लेखकों ने, इतिहासकारों ने, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने, पत्रकारों ने, कुछ फिल्म स्टारों ने और सबसे बढ़कर बहुत ही आम किस्म के लोगों ने अपील जारी कर दी कि अगर किसी जगह किसी कश्मीरी या समुदाय विशेष के लोगों को नफरत फैलाकर निशाना बनाया जा रहा है तो उनके दरवाजे ऐसे लोगों को शरण देने के लिए खुले हैं।

देश में जब 1947, 1984, 2002 जैसे भयानक दंगे और नरसंहार हुए तब टारगेट किए गए समुदाय के किसी परिवार को पनाह देने पर वह खबर बन जाया करती थी, कहानियां बन जाया करती थीं। लेकिन 2019 में सोशल मीडिया का दौर है और उसने अपनी ताकत की पहचान फिर से करा दी है। नफरतों का कारोबार करने वालों को इतनी बड़ी चुनौती 1947, 1984 और 2002 के नरसंहारों में नहीं मिली थी।

1984 में जब सिख विरोधी दंगे हुए तो जिस शहर में मैं पढ़ाई के साथ-साथ छोटी-मोटी पत्रकारिता कर रहा था, वहां अहसास हुआ कि दंगाई किस हद तक जा सकते हैं और ऐसे में अगर कोई सिर्फ किसी एक पीड़ित परिवार की मदद कर दे तो सामाजिक ताना-बाना बिखरने से बच जाता है। उस परिवार की सोच हमेशा के लिए बदल जाती है और वह अपनी पीढ़ी दर पीढ़ी इसी सामाजिक ताने-बाने को बचाने का संदेश देता चला जाता है।

मेरी फेसबुक लिस्ट बहुत लंबी नहीं है। लेकिन जितनी है, उतनी पर मुझे पहली बार गर्व का एहसास हुआ। इतने बड़े पैमाने पर लोगों ने अपील जारी की थी कि एक-एक का नाम लेकर बताने पर इस लेख के कई पेज भर जाएंगे। और ऐसी अपीलें सिर्फ दिल्ली एनसीआर से ही नहीं रक्सौल और औरंगाबाद तक से आ रही थीं। हालांकि एक राजनीतिक दल की आईटी सेल के दिहाड़ीदार ने टिप्पणी की कि फेसबुक पर अपील जारी करना आसान है और लोगों तक मदद पहुंचाना अलग बात है। मैंने उनको बताया कि जिन लोगों ने मदद पहुंचाई है, वह लोग यहां तो गा-गाकर बताने से रहे कि उन्होंने किसको मदद पहुंचाई है।

पुलवामा की घटना से राजनीतिक दलों ने इमोशनल अत्याचार की जो फसल काटने का प्लान तैयार किया था, उसे भी सोशल मीडिया ने नेस्तोनाबूद कर दिया। हुआ यह कि जब हमारे 40 जवानों के शव उनके गांव और शहरों में पहुंचने लगे तो नागपुरी प्रयोगशाला से निकले एक राजनीतिक दल के तमाम नेता उन शवों के साथ दांत चिंयारते और हंसते हुए जनता के बीच से निकले, कहीं किसी ने शव को अपने पीछे रखते हुए सेल्फी ले ली। लोगों को यह सब पसंद नहीं आया और ऐसे नेताओं को सोशल मीडिया पर लोगों ने सरेआम जलील किया। ऐसा गुस्सा मुझे पहली बार दिखा।

ऐसी घटनाएं पहली बार नहीं हुई हैं, इससे पहले भी लोग ऐतराज जताते रहे हैं, लेकिन उसका दायरा वहीं तक सीमित होता था। अब उसका दायरा बढ़ रहा है और उस गुस्से को अब व्यापक समर्थन मिलने लगा है। नेताओं से मोहभंग की शुरुआत ऐसी ही घटनाओं से होती है। पर नेता इसके बावजूद अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे।

यह नेताओं के आत्ममंथन का समय है। पुलवामा जैसी घटना को अगर वह अपने चुनाव जीतने का जरिया बनाएंगे तो जनता उन्हें किसी तरह और क्यों माफ करेगी। अगर आप वाकई गमजदा हैं तो उसके सार्वजनिक प्रदर्शन की क्या जरूरत है। आप शहीद के शव के साथ उस वाहन पर क्यों सवार होना चाहते हैं, जहां उस जवान के पिता, भाई, चाचा, बेटे को खड़ा होना है। क्योंकि आप उस स्थिति को भुनाना चाहते हैं। आप जानते हैं कि शातिर मीडिया सिर्फ आपको ही पहचानता है, वह शहीद के परिवार को नहीं पहचानता तो फोकस आप पर ही रहेगा। लेकिन असंख्य आंखे जो उन तस्वीरों को, विडियो को देख रही हैं वे आपको माफ नहीं करने वाले हैं।

अगर आप वाकई शहादत पर गमजदा हैं तो जाकर अपने मुहल्ले में शांति पाठ कराइए, मंदिर में प्रार्थना करिए कि पुलवामा फिर कहीं और न दोहराया जाए, अपनी पार्टी पर दबाव बनाइए कि वह इन शहीदों को जल्द से जल्द वन रैंक वन पेंशन के दायरे में लाए। उनकी शहादत सेना के किसी जवान की शहादत से कम तो नहीं। आप अगर वाकई गमजदा हैं तो उन हालात को देश में पैदा कीजिए, जहां ऐसी आतंकी घटना करने को कोई सोच भी न सके। अपनी पार्टी से कहिए नफरत का नहीं मोहब्बत के वातारण का निर्माण करे। अंध देशभक्ति नफरत को जन्म देती है और दिल से की गई देशभक्ति देश को और मजबूत करती है।

पुलवामा की घटना के विरोध में जिस तरह इस बार देशभर में मुसलमानों ने अपने गुस्से का विरोध जताया, उसे भी दर्ज करना जरूरी है। ऐसा नहीं है कि मुसलमानों को सेना या पैरामिलिट्री फोर्स के जवानों की शहादत पर गुस्सा नहीं आता था। लेकिन वह अपने सीमित दायरे में ही उस पर बात करके, गुस्सा जताकर चुप रह जाते थे। उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि अपने गुस्से के साथ सामने आना जरूरी है, शातिर टीवी मीडिया चाहे उसकी कवरेज करे न करे। शायद आपको किसी टीवी चैनल ने यह तथ्य न बताया हो कि पुलवामा में 40 जवानों की शहादत जुमेरात (गुरुवार) को हुई और अगले दिन जुमा था। देशभर में शायद ही कोई ऐसी मस्जिद बची होगी, जहां जमात के साथ हुई नमाज में मौलाना ने जवानों की शहादत पर अपने खुतबे में खिराज-ए-अकीदत न पेश की हो। मेरा वाट्सऐप, मेरा ईमेल ऐसी असंख्य फोटो से बजबजा रहा था।

आजमगढ़ के मुबारकपुर नामक कस्बे से एक साहब ने मुझे शनिवार को शिकायत भेजी की उनके इलाके की मीडिया ने हमारी मस्जिद के खुतबे को और हमारे प्रदर्शन को तवज्जो नहीं दी। एक लाइन न छापी और न कुछ दिखाया। मैंने उन्हें समझाया कि शायद जगह न रही हो, शायद बड़े शहरों के मुकाबले कस्बों पर ध्यान न गया हो। लेकिन वह शातिर मीडिया पर पूर्वाग्रह से ग्रसित होने का इलजाम लगाते रहे। लेकिन मैं मन ही मन खुश हो रहा था कि देश का आम मुसलमान भी अब दूसरों की तरह अपनी मार्केटिंग की कला सीख रहा है। हालांकि उसने दर कर दी है, लेकिन यह शुरुआत भी रंग लाएगी। मुझे नागपुर का एक फोटो देखने को मिला, नमाज के बाद बमुश्किल 50 दाउंदी बोहरा समुदाय के लोग शहीद जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है। दाऊदी बोहरा लोग आमतौर पर खुद में सिमटे रहने वाला समुदाय है। लेकिन वह लोग भी इस तरह पहली बार खुलकर सामने आए।

बहरहाल, सोशल मीडिया के जमाने में जब मार्केंटिंग के फंडे बदल रहे हैं तो एक पूरी कौम का जागना शुभ संकेत माना जाएगा।....इसके छिपे संकेत खद्दरधारी नेताओं को पढ़ने होंगे। नफरतों का कारोबार अब यह देश आगे नहीं बढ़ने देगा।