Thursday, November 2, 2017

राजस्थान पत्रिका...संघ परिवार और शेष मीडिया




राजस्थान के प्रमुख अख़बार राजस्थान पत्रिका ने भाजपा शासित राजस्थान सरकार यानी मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को खुली चुनौती देते हुए वसु्ंधरा से जुड़ी सारी ख़बरों के बहिष्कार का फ़ैसला लिया है। यह उस क़ानून का विरोध है जिसके ज़रिए वसुंधरा मीडिया का गला घोंट देना चाहती है। यह उस क़ानून का विरोध है जो भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ किसी भी जाँच के लिए सरकार की अनुमति को आवश्यक बताता है। कोई भी एजेंसी तब तक करप्शन के मामलों की जाँच नहीं कर सकेगी जब तक सरकार उसकी जाँच के लिए लिखित अनुमति न दे दे। इस दौरान इसकी मीडिया रिपोर्टिंग पर भी रोक रहेगी।

राजस्थान पत्रिका को आरएसएस समर्थक अख़बार माना जाता है लेकिन इस अख़बार ने जिस तरह का स्टैंड अब लिया है वह क़ाबिले तारीफ़ तो है लेकिन हैरानी भी पैदा करता है। क्योंकि मेरा व्यक्तिगत अनुभव इस अख़बार को लेकर काफ़ी कटु रहा है। 1993 में मैंने यहाँ नौकरी के लिए आवेदन भेजा तो मुझे जयपुर बुलाया गया। उस समय मैं लखनऊ में था और नवभारत टाइम्स तब बंद हो गया था। जयपुर पहुँचने पर मेरा स्वागत हुआ और राजस्थान पत्रिका के समाचार संपादक ने मुझसे कहा कि हम लोग टेस्ट वग़ैरह नहीं लेते, आप एक हफ़्ते यहाँ काम करिए और उसी दौरान हम लोग तय करेंगे कि आपको नौकरी मिलेगी या नहीं। मुझे प्रस्ताव अच्छा लगा, मैंने हाँ कह दिया और काम में जुट गया। इस दौरान रिपोर्टिंग की और ख़बरों का संपादन भी किया। अपनी बहुत शेखी न बघारते हुए संक्षेप में इतना जानिए कि समाचार संपादक और मेरे बॉस को काम पसंद आया।

एक हफ़्ते बाद समाचार संपादक ने कहा कि चलिए आपको प्रधान संपादक से मिलवा देता हूँ जो आपकी नियुक्ति पर अंतिम मुहर लगाएँगे और वह मात्र औपचारिकता है। मुझे एक विशालकाय दफ़्तर में ले जाया गया। समाचार संपादक ने मेरी बेहतरीन रिपोर्ट उनके सामने रखी। फिर संपादक ने मेरा और शहर का नाम पूछा। मैंने बता दिया। लेकिन उसके बाद जो हुआ वह अप्रत्याशित था। संपादक ने समाचार संपादक को डाँटना शुरू कर दिया और कहा कि जब आपको मालूम है कि हम लोग संघ विचारधारा पर चलने वाले अखबार हैं तो आपने एक मुस्लिम लड़के को नौकरी देने का फ़ैसला कैसे कर लिया। ...आप इनको एक हफ़्ते का पैसा दीजिए, आने जाने का किराया दीजिए और यह अगर कहीं घूमना चाहें तो उसका प्रबंध करिए। अख़बार मालिक ने ख़ुद भी माफ़ी माँगी। मुझ उनका बेबाकपन पसंद आया और फ़ौरन वहाँ से बाहर आ गया। 

मैंने फ़ौरन यह सोचना शुरू किया कि मुझे उससे पहले स्व. राजेंद्र माथुर तमाम तारीफ़ों के साथ संपादकीय पेज पर छाप चुके थे ....जिन्होंने हिंदी में ही पत्रकारिता के लिए प्रेरित किया।  वह तो ऐसे नहीं थे। पत्रकारिता जीवन में नवभारत टाइम्स लखनऊ या दिल्ली में मेरे साथ काम करने वाले मुझसे सीनियर आलोक जोशी,  प्रमोद जोशी, अकु श्रीवास्तव, अरविंद प्रताप सिंह. निरंकार सिंह, आदर्श प्रकाश सिंह, गिरीश मिश्रा, आर सुंदर ने कभी मुझसे  राजस्थान पत्रिका के संपादक जैसी घटिया सोच के साथ पेश नहीं आए। उसके बाद अमर उजाला के मालिक स्व. अतुल माहेश्वरी के संपर्क में आने के बाद, उनसे देश व समाज के बारे में मिली सीख ने यह समझाया कि मूल भारत का चरित्र वह नहीं है जिसका उदाहरण राजस्थान पत्रिका के तत्कालीन संपादक ने पेश किया था। अतुल जी कहते थे कि अख़बार व पत्रकार किसी एक समुदाय या वर्ग को नजरन्दाज करके आगे नहीं बढ़ सकते। वह महेन्द्र सिंह टिकैत के आंदोलन का ज़िक्र करते थे जिनकी बात तब मेनस्ट्रीम छापने को तैयार नहीं था...वह अयोध्या आंदोलन का ज़िक्र करते  थे कि कैसे मीडिया का एक वर्ग अपने सोचने समझने की अक़्ल खो बैठा है।

मुझे दैनिक जागरण में भी काम करने का मौक़ा दो बार मिला । वहाँ मुझे विनोद शुक्ल और  चंद्रकांत त्रिपाठी जी का अपार स्नेह मिला। जागरण का सीधा सा फ़ंडा दोनों ने यह बताया कि बिज़नेस और विचारधारा दो अलग चीज़ें हैं। हम संघ या भाजपा की विचारधारा मानने के साथ साथ बिज़नेस और अपने प्रोडक्ट को मज़बूत करने के लिए जो भी बन पड़ेगा, करते हैं। यदि यूसुफ़ किरमानी हमारे अख़बार के लिए ज़रूरी हैं तो इसमें हमारी विचारधारा कहीं आड़े नहीं आती। 

बाद के भी पत्रकारिता अनुभवों ने यह बताया कि भारत उस तरह से नहीं चल सकता जिस तरह की सोच तत्कालीन संपादक राजस्थान पत्रिका ने प्रकट की थी। शायद तब उन्हें लगा होगा कि संघ की विचारधारा उन्हें बिज़नेस में भी मज़बूती देगी लेकिन यह वास्तविकता से कोसों दूर था। भारत सभी को साथ लेकर ही आगे बढ़ सकता है। मैंने बरेली में। सहकारिता पर आधारित अख़बार जनमोर्चा का भी संपादन किया। जिसके मालिक स्व.  कमलजीत सिंह और उनके मामा थे। जहाँ मुझे अखाबार की नीति तय करने का भी अधिकार था। उन लोगों ने कभी नहीं कहा कि हम अपने अख़बार में सिर्फ़ सिखों की विचारधारा का प्रचार करेंगे। इस अख़बार की कमान अब उनके भाई संभाल रहे हैं। 

बहरहाल, राजस्थान पत्रिका को बधाई कि जब देश के मीडिया जगत को मिलकर वसुंधरा राजे सिंधिया के काले कानून को चुनौती देनी चाहिए थी, तब यह पहल अकेले राजस्थान पत्रिका ने की है। मीडिया का एक बड़ा तबक़ा जब गोदी मीडिया कहला रहा है और उसकी कुल दरकार प्रधानमंत्री के साथ एक अदद सेल्फ़ी लेने की रह गई है तो कहीं से भी उम्मीद की  कोई किरण अगर फूटती नज़र आती है तो उसका स्वागत किया जाना ही चाहिए।

Sunday, October 29, 2017

भारत के ट्रंप भक्त अमेरिका से कुछ तो सीखें...

है कोई माई का लाल भारत में...जो ऐसा कर सके...

जब आप लोग भारत में जीएसटी का मरसिया पढ़ रहे थे और भारत में देशभक्ति की ठेकेदार भारतीय जनता पार्टी पंजाब की गुरदासपुर सीट लगभग दो लाख के अंतर से हारने का मातम मना रही थी, ठीक उसी वक्त अमेरिका के वॉशिंगटन पोस्ट अखबार में एक विज्ञापन छपा। ...यह महज विज्ञापन नहीं था, इसने सुबह-सुबह अमेरिकी लोगों को दांतों तले ऊंगली चबाने पर मजबूर कर दिया।

वॉशिंगटन पोस्ट के इस विज्ञापन में कहा गया था कि अगर कोई राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप के खिलाफ मुकदमा चलाने का सुबूत देगा तो उसे 10 मिलियन डॉलर यानी एक करोड़ का इनाम मिलेगा। यह विज्ञापन हस्टलर पत्रिका के प्रकाशक लैरी फ्लायंट की ओर से था। विज्ञापन में कहा गया था कि अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव होने में अभी तीन साल बाकी हैं, तब तक ट्रंप अमेरिका का कबाड़ा कर देगा। इसने न सिर्फ विदेशी नीति बल्कि घरेलू आर्थिक नीति को बर्बाद कर दिया है, इसने अमेरिका में गृह युद्ध की स्थिति पैदा कर दी है। इसकी नीतियों से अमेरिका को बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।

मुझे अमेरिका में छपे इस विज्ञापन की जरा भी सूचना नहीं थी। मेरे एक अमेरिकी पत्रकार मित्र ने फोन पर मजाक किया कि क्या भारत में वहां के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कोई शख्स इस तरह का सार्वजनिक विज्ञापन छपवा सकता है और कोई अखबार उसको छापने को राजी हो जाएगा।...फिर उसने उस मजाक के पीछे की कहानी बताई कि अमेरिका में आज यह भी हो गया। 

मैंने उस दोस्त को बताया कि भारत में यह नामुमकिन सी बात है कि कोई मोदी को खुलेआम इस तरह से चुनौती दे।...अगर कोई तैयार भी हो जाए तो भी कोई अखबार शायद ही ऐसा साहस कर पाए...जिस देश में मोदी के खिलाफ लिखने पर संपादकों की नौकरी जा रही हो, जिस देश में मोदी के खिलाफ सोशल मीडिया पर लिखने पर केस दर्ज किए जा रहे हों, वहां भला किस अखबार में ऐसी हिम्मत है कि वह महंगे से महंगे रेट पर ऐसा विज्ञापन नहीं छापेगा।


खैर, अब दूसरी बात। आप लोगों को याद होगा कि ट्रंप के सत्ता संभालते ही अमेरिका के बाद अगर कुछ लोगों ने सबसे ज्यादा खुशी मनाई थी, वह भारत में दक्षिणपंथी मानसिकता के लोग ही थे। वजह साफ थी कि ट्रंप ने सत्ता संभालते ही कुछ इस्लामिक देशों को आतंकवादी बता कर उनके नागरिकों के अमेरिका आने-जाने पर बैन लगा दिया। उसने सारी लड़ाई को अमेरिका बनाम इस्लाम रुख दे दिया। ट्रंप ने अश्वेत लोगों में असुरक्षा की भावना पैदा कर दी। 

यहां भारत में प्रचंड बहुमत लेकर आई भाजपा को ट्रंप की नीतियां रास आ गईं। दोनों का एजेंडा एक जैसा ही था। लेकिन अमेरिका के लोगों को यह पसंद नहीं आया। वह यह नहीं चाहते थे कि अमेरिकी दादागीरी के नाम पर ट्रंप भी दूसरे देशों को टारगेट पर लेकर अमेरिकी इजराइली हथियार लाबी के हथियार बिकवाएं। लोग खिलाफ हो गए। अमेरिका में इतने बड़े-बड़े प्रदर्शन हुए कि वह इतिहास में दर्ज हो गए।

भारत में सत्ता संभालते ही भाजपा ने सरकार चलाने की बजाय गौरक्षक दल खड़े कर दिए और उसके नाम पर खुली गुंडागर्दी को सरकारी संरक्षण तक दे दिया गया। बीच-बीच में पैंतरेबाजी और जुमलेबाजी के तहत प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयंभू गौरक्षकों पर टिप्पणियां कीं लेकिन अगले ही दिन आरएसएस ने अपनी टिप्पणियों से स्वयंभू गौरक्षकों के हौसले बढ़ा दिए। नोटबंदी, जीएसटी, तीन तलाक और न जाने कितने ऐसे बेहूदा और बेसिरपैर के मुद्दे खड़े कर दिए कि भारत का प्रबुद्ध वर्ग धीरे-धीरे मोदी और भाजपा की इस चालाकी को समझने लगा है।

...हालांकि भाजपा भक्त या उनकी पार्टी के लोग यह मानने को तैयार नहीं हैं कि सरकार के प्रति असंतोष अपने चरम पर पहुंच गया है और 2019 में फिर से सरकार बनाने का सपना चकनाचूर हो चुका है।...धरातल पर स्थितियां बेशक ऐसी न दिखती हों लेकिन संकेत साफ है। पंजाब के गुरदासपुर लोकसभा उपचुनाव सीट पर लगभग दो लाख वोटों से हार यही बताती है, वरना यह हार 10-20 हजार से भी हो सकती है। देश की तमाम सेंट्रल यूनिवर्सिटीज में भाजपा और आरएसएस से जुड़ा छात्र संगठन एबीवीपी लगातार हार रहा है। ताजा नतीजा इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से आया है जहां एबीवीपी को सिर्फ एक सीट मिली है।...इसके बावजूद भाजपा या संघ को युवकों में बढ़ रहा असंतोष दिखाई नहीं दे रहा है।

Thursday, August 3, 2017

कहानी - घृणा ... मोक्ष

लेखक ः एस. रजत अब्बास किरमानी

दुष्यंत को मरे हुए एक महीना हो चुका था। उसकी बीवी धरा एक महीने से न ढंग से खा पाई थीे न ढंग से सो पाई थी, बस आंसुओं से उसके होने का पता चलता था। लोग तो यह तक सोच चुके थे कि जिस दिन आंसू बंद हुए, उस दिन धरा की आँखें भी बंद हो जाएंगी। इसीलिए उसके रोने पर कोई नहीं टोकता। हालांकि सब उसे सब्र रखने और ढारस देने की कोशिश करते मगर सब बेकार ही चला जाता।

लोगों के बीच हैरानी की बात यह नहीं थी कि दुष्यंत की मौत कैसे हुई, हैरानी इस बात पर थी कि किस वक़्त और किस मौके पर हुई।

धरा का अब एक बेटा रह गया था, श्रवण। उसकी हाल ही में सुधा से शादी हुई थी। मगर लोग कहते हैं कि शादी सही महुर्त पर नही हुई। दुष्यंत, अपने बेटे की ही शादी में चल बसा। ग़ौर ओ फ़िक्र इस बात पर है कि बेटे-बहू के सातवें फेरे लेते ही उसका दम निकला। कुछ लोगों ने यह तक मजाक बनाया कि उधर बेटा की नई जिंदगी शुरू हुई और इधर बाप दूसरी दुनिया में जिंदगी शुरू करने चला गया।

धरा अपने बेटे से इस बात पर खफा थी कि बाप के मरने के वक़्त उसने बस एक बार पीछे मुड़ कर देखा और फिर एक बेहिस की तरह पंडित को शादी की प्रक्रिया जारी रखने को कहा। और उसकी मां का मानना यह भी था कि अंतिम संस्कार में वह बेमन से शामिल हुआ।

वक़्त बीत गया। ...और वक़्त का नियम है कि वह गहरे से गहरा घाव भर देता है, मगर यही वक़्त रिश्तों की टूटी कड़ियों को अक्सर जोड़ नही पाता। ऐसा ही कुछ हुआ श्रवण और उसकी मां के बीच में। धरा के अन्दर उसके पति से बिछड़ने का घाव भर तो गया था, मगर उसके बेटे से रिश्तों की उलझी डोर सुलझने के बजाय टूट ही गई थी। हालांकि श्रवण ने एक बार अपनी मां को समझाने की कोशिश की, मगर मां ने गुस्से से दुत्कार कर उसे भगा दिया। दोनों के आपसी झगड़े का असर बेचारी सुधा पर पड़ा। श्रवण ने यह प्रस्ताव तक सुधा के सामने रखा कि मां से अलग रहते हैं, मगर वह अपनी आज्ञाकारी बहू की भूमिका निभाने से पीछे न हटी। ताने बर्दाश्त किए, बद्दुआएं तक सुनीं और हद तो यह हो गई थी कि अब कभी-कभी मां का हाथ भी उठ जाता था।

उसकी मां को तब बुरा लगता था जब दोनों घूमने जाते थे, या अगर उन दोनों की हंसी मजाक की आवाज़ आती तब भी वो उन्हें बद्दुआएं देती रहती थी। घर में नई कार आने तक का जश्न नहीं था। वह तो सुधा ने आसपड़ोस में मिठाई खरीद कर बांट दी। इधर, घर में अकेले पड़े-पड़े धरा खुद को एक नजरन्दाज की गई वस्तु की तरह समझने लगी थी। रिश्तेदारों का मानना था कि इसका असर उसके दिमाग़ी संतुलन पर भी पड़ा।

एक रोज़ धरा हद ही पार कर गई। वह अपने घर में ही जोर-जोर से चिल्लाने लगी कि सुधा उसकी जान लेना चाहती है। श्रवण का घर छोटा था और बाहर सख्त गर्मी होने के कारण सन्नाटा था। इसलिए आवाज़ आसपड़ोस के लोगों तक पहुंच गई। मगर जब सब घर में आए और देखा कि सुधा तो अपने मायके गई है तो धरा को सब मन ही मन पागल बोल कर चले गए।

जब यह घटना सुधा के मां-बाप ने सुनी तो उन्होंने उसे सुसराल भेजने से मना कर दिया। लेकिन सुधा ने जब जिद की और कसमें दीं तब कहीं श्रवण के साथ जाने दिया। 

घर का माहौल थोड़ा ख़राब होता जा रहा था, हर हफ़्ते धरा कुछ न कुछ उधम मचाती थी।



सुधा को बच्चा होने वाला था, आखिरी महीना चल रहा था। डॉक्टर लावण्या कह चुकी थी कि डिलीवरी कभी भी हो सकती है। ...और फिर वह दिन भी आ गया था जब सुधा को जल्दी क्लिनिक ले जाना पड़ा। सुधा पिछले 5-6 दिन से पेट में अजीब दर्द महसूस कर रही थी़। सुधा को ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया। ऑपरेशन हुआ, डॉक्टर और नर्सों ने पूरी जी जन लगा दी, मगर सुधा और बच्चे दोनों ही मर गए। डॉक्टर लावण्या ने कहा बच्चा कुछ दिन पहले ही मर चुका था और मां के अन्दर वो जहर फैल गया।

दोनों शव घर लाए गए। घर का माहौल गमगीन था। सुधा के मां-बाप का रोते-रोते बुरा हाल था। आस पड़ोस के लोग भी अफसोस में थे। आखिर होते क्यूँ नहीं, दिल में दर्द पैदा करने वाला दृश्य सामने था। ज़मीन पर दो की बजाय तीन लाशें पड़ी थीं। ...एक बच्चे की लाश थी जिसने दुनिया देखने से पहले मोक्ष पा लिया था। एक औरत की लाश थी जिसने एक विवाहित ज़िन्दगी की उलझनों के बाद मोक्ष पाया और एक आदमी बेहोशी के आलम में उसी औरत के बग़ल में लेटा हुआ शायद मोक्ष का इंतज़ार कर रहा था। ...आसपड़ोस के लोगों ने धरा को वहीँ लाश के सामने से घर के बाहर निकलते देखा। यह किसी से सुना गया कि धरा उस दिन रंगीन कपड़ा और चश्मा पहने बाहर निकली थी। ...वह उसके बाद कभी वापस घर नही आई, शायद उस दिन उसकी घृणा ने भी मोक्ष पा लिया था।


लेखक के बारे में
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एस. रजत अब्बास किरमानी शायर, कहानीकार होने के अलावा एडवरटाइजिंग और डिजिटल मीडिया फील्ड से जुड़े हुए हैं। फोटोग्राफी के अलावा लघु फिल्में बनाने में भी वह दिलचस्पी लेते हैं।

दिल्ली स्थित डॉन डिजिटल में रजत किरमानी क्रिएटिव एग्जेक्यूटिव के पद पर कार्यरत हैं। हिंदी में लेखन के अलावा वह अंग्रेजी में भी लिखते हैं। उनकी कुछ रचनाएं हिंदीवाणी ब्लॉग पर भी उपलब्ध हैं।

Thursday, July 13, 2017

आतंकवाद के बीज से आतंकवाद की फसल ही काटनी पड़ेगी

- स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर, सलाहकार संपादक, द इकोनॉमिक टाइम्स 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी आतंकवाद को नियंत्रित करने और इसे खत्म करने पर काफी कुछ कहते रहते हैं। लेकिन आतंकवाद की सही परिभाषा क्या है ? डिक्शनरी में इसकी परिभाषा बताई गई है – अपना राजनीतिक मकसद पूरा करने के लिए खासतौर पर नागरिकों के खिलाफ हिंसा और धमकी का गैरकानूनी इस्तेमाल।
इस परिभाषा के हिसाब से जो भीड़ बीफ ले जाने की आशंका में लोगों को पीट रही है और जान से मार रही है, वह लिन्चिंग मॉब (जानलेवा भीड़) दरअसल आतंकवादी ही हैं। कश्मीर में भी जो लोग इस तरह पुलिसवालों की हत्या कर रहे हैं वह भी वही हैं। जान लेने वाली यह सारी भीड़ अपने धार्मिक-राजनीतिक मकसदों के लिए नागरिकों के खिलाफ गैरकानूनी हिंसा का सहारा ले रही है। यह सभी लोग आतंकवादी की परिभाषा के सांचे में फिट होते हैं।


हालांकि बीजेपी में बहुत सारे लोग इससे सहमत नहीं होंगे। वह कहेंगे कि हिंदुओं की भावनाएं आहत हुई हैं और बीफ विरोधी हिंसा को समझने की जरूरत है। कश्मीर में हुर्रियत भी मारे गए पुलिसवालों की मौत पर घड़ियाली आंसू बहाएगी और कहेगी कि भारतीय सेना जिस तरह कश्मीर में लोगों का दमन कर रही है, इसे उस संदर्भ में देखा जाना चाहिए। बचाव में दिए जा रहे ऐसे तर्क उसी तरह भोथरे हैं जैसे अलकायदा और आईएसआईएस के आतंकी भी हरकतों के लिए तर्क गढ़ते रहे हैं।
15 साल के जुनैद की हत्या का अपराध सिर्फ उसके मुस्लिम होने पर किया गया। लेकिन मोदी ने लंबी चुप्पी के बाद इसकी निंदा की। उनके कई मंत्रियों ने भी निंदा की। लेकिन एेसी लिन्च मॉब अचानक हवा में नहीं पैदा हुई, तीन साल के बीजेपी शासनकाल के दौरान सामाजिक-राजनीतिक माहौल को जिस तरह खाद पानी देकर सींचा गया यह उसी की देन हैं।
सांप्रदायिकता और अंध राष्ट्रवाद के खतरनाक तालमेल ने हालात को बदतर कर दिया है। इधर मोदी ने शांति की अपील की और उधर झारखंड में गौरक्षकों ने एक और मुस्लिम की हत्या कर दी। यह बताता है कि बोतल से बाहर निकले जिन्न को वापस बोतल में बंद करना कितना मुश्किल है।   
मुझे डर है कि अगर इसे जल्दी नहीं रोका गया तो कहीं हिंदू आतंक का मुस्लिम आतंक से आमना-सामना न हो जाए और पूरे देश में आग की लपटें दिखाई दें। अगर सरकार मुसलमानों की हिफाजत नहीं कर सकती तो इस बात का बहुत बड़ा खतरा है कि मुसलमान अपनी हिफाजत के लिए दस्ते न तैयार कर लें। इन हालात में हिंदू-मुस्लिम आतंक और बढ़ेगा और सरकार असहाय होकर सिर्फ तमाशा देखेगी।  
मोदी दुनिया को भारत की छवि एक ग्लोबल मैन्यूफैक्चरिंग हब के रूप में बेचना चाहते हैं। लेकिन अगर भारत की सबसे तेजी से बढ़ने वाली इंडस्ट्री लिन्च मॉब हो जाएगी तो यह नामुमकिन है। अर्थशास्त्री दानी रोड्रिक ने बताया है कि किसी भी देश की आर्थिक तरक्की उसके आंतरिक संघर्षों पर काबू पाकर ही हो सकती है। आजादी के बाद से ही भारत अपने आंतरिक संघर्षों को काफी हद तक काबू करता रहा है और इस वजह से बेहतर सामाजिक व आर्थिक नतीजे देश को मिले। लेकिन यह उपलब्धि अब खतरे में है।
 15 साल पहले यूएस के तत्कालीन राष्ट्रपति ने भारत को इस बात के लिए बधाई दी थी कि भारत में 150 मिलियन मुस्लिम होने के बावजूद कोई आतंकवादी नहीं है। हो सकता है कि उन्होंने बहुत बढ़ाचढ़ा कर यह बात कही हो लेकिन यह तारीफ भी किसी ने ऐसे ही नहीं कर दी थी। 2001 से जिस तरह से पूरा विश्व आतंकवाद की चपेट में आया, इसमें भारतीय मुसलमानों की छवि बेदाग रही है। तमाम राजनीतिक प्रयासों की वजह से यह संभव हुआ था और अल्पसंख्यकों ने भी माना कि भारत उनका भी है। लेकिन अफसोस है कि बढ़ते लिन्च मॉब ने अब उस युग के अंत होने का संकेत दे दिया है।
पूरे पश्चिम देशों में छोटे-छोटे मुस्लिम आतंकी गुटों ने भारी तबाही मचा रखी है। ये ग्रुप पैदा भी वहीं हुए हैं। उन्हें आईएसआईएस या किसी विदेशी एजेंसी से पैसे या मदद की दरकार नहीं है। इंटरनेट पर बम बनाने का तरीका और इसकी विशेषज्ञता मौजूद है। आतंकवाद इस्लाम की देन नहीं है। भारत की तरह पश्चिमी देशों में भारी तादाद में मुसलमान कानून को मानने वाले लोग ही है। लेकिन जहां मामूली मुस्लिम आबादी भी है वहां आतंकवादी भारी खतरा बने हुए हैं। इन सवालों पर गहराई से विचार करने की जरूरत है।
भारत में मुस्लिम आबादी अब करीब 180 मिलियन है। मान लीजिए कि इस आबादी में से सिर्फ 0.01 फीसदी ही मुस्लिम आतंकवाद को अपना लें तो कल्पना कीजिए कितनी तबाही मच जाएगी। और अगर 0.01 फीसदी हिंदू यह मान लें कि 0.01 फीसदी मुसलमानों की हिंसा के लिए सारे मुसलमान जिम्मेदार हैं तो सोचिए कि भारत में सांप्रदायिक आतंकवाद कहां तक पहुंचेगा। ऐसे में अगर हिंदू-मुसलमानों की 99.99 फीसदी आबादी इस तरह के अपराधों से नफरत भी करे तो भी हालात को बिगड़ने से कोई रोक नहीं पाएगा। यह तभी संभव है जब सारे विजिलेंट ग्रुपों को सख्ती से रोक न दिया जाए।
दाउद इब्राहिम ने मुंबई बम ब्लास्ट ऐसे ही नहीं कर दिया था। दो बड़ी घटनाएं इसके लिए जिम्मेदार थीं। 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद देशभर में बड़े पैमाने पर मुस्लिम विरोधी दंगे हुए। इसके बाद 1993 में मुंबई में शिवसेना की महाआरती के दौरान दंगे हुए। मुंबई में 13 स्थानों पर बम विस्फोट हुए, जिसमें शिवसेना का मुख्यालय भी था। संयोग से यह हिंसा और नहीं बढ़ी और लोगों का गुस्सा धीरे-धीरे शांत हो गया।
अगर अब हिंदू-मुस्लिम आतंक बढ़ता है तो उसे आसानी से रोक पाना मुश्किल होगा। मुझे डर है कि जो लोग हिंदू हिंसा का बीज बो रहे हैं वो बदले में मुस्लिम हिंसा की फसल काटेंगे। इसी तरह जो मुस्लिम हिंसा का बीज बो रहे हैं वो हिंदू हिंसा की फसल काटेंगे। यह अनवरत सिलसिला है जो फैलता चला जाएगा।
(मूल लेख अंग्रेजी में, अनुवाद - यूसुफ किरमानी)
मूल लेख द इकोनॉमिक टाइम्स पर उपलब्ध