Thursday, July 13, 2017

आतंकवाद के बीज से आतंकवाद की फसल ही काटनी पड़ेगी

- स्वामीनाथन एस. ए. अय्यर, सलाहकार संपादक, द इकोनॉमिक टाइम्स 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी आतंकवाद को नियंत्रित करने और इसे खत्म करने पर काफी कुछ कहते रहते हैं। लेकिन आतंकवाद की सही परिभाषा क्या है ? डिक्शनरी में इसकी परिभाषा बताई गई है – अपना राजनीतिक मकसद पूरा करने के लिए खासतौर पर नागरिकों के खिलाफ हिंसा और धमकी का गैरकानूनी इस्तेमाल।
इस परिभाषा के हिसाब से जो भीड़ बीफ ले जाने की आशंका में लोगों को पीट रही है और जान से मार रही है, वह लिन्चिंग मॉब (जानलेवा भीड़) दरअसल आतंकवादी ही हैं। कश्मीर में भी जो लोग इस तरह पुलिसवालों की हत्या कर रहे हैं वह भी वही हैं। जान लेने वाली यह सारी भीड़ अपने धार्मिक-राजनीतिक मकसदों के लिए नागरिकों के खिलाफ गैरकानूनी हिंसा का सहारा ले रही है। यह सभी लोग आतंकवादी की परिभाषा के सांचे में फिट होते हैं।


हालांकि बीजेपी में बहुत सारे लोग इससे सहमत नहीं होंगे। वह कहेंगे कि हिंदुओं की भावनाएं आहत हुई हैं और बीफ विरोधी हिंसा को समझने की जरूरत है। कश्मीर में हुर्रियत भी मारे गए पुलिसवालों की मौत पर घड़ियाली आंसू बहाएगी और कहेगी कि भारतीय सेना जिस तरह कश्मीर में लोगों का दमन कर रही है, इसे उस संदर्भ में देखा जाना चाहिए। बचाव में दिए जा रहे ऐसे तर्क उसी तरह भोथरे हैं जैसे अलकायदा और आईएसआईएस के आतंकी भी हरकतों के लिए तर्क गढ़ते रहे हैं।
15 साल के जुनैद की हत्या का अपराध सिर्फ उसके मुस्लिम होने पर किया गया। लेकिन मोदी ने लंबी चुप्पी के बाद इसकी निंदा की। उनके कई मंत्रियों ने भी निंदा की। लेकिन एेसी लिन्च मॉब अचानक हवा में नहीं पैदा हुई, तीन साल के बीजेपी शासनकाल के दौरान सामाजिक-राजनीतिक माहौल को जिस तरह खाद पानी देकर सींचा गया यह उसी की देन हैं।
सांप्रदायिकता और अंध राष्ट्रवाद के खतरनाक तालमेल ने हालात को बदतर कर दिया है। इधर मोदी ने शांति की अपील की और उधर झारखंड में गौरक्षकों ने एक और मुस्लिम की हत्या कर दी। यह बताता है कि बोतल से बाहर निकले जिन्न को वापस बोतल में बंद करना कितना मुश्किल है।   
मुझे डर है कि अगर इसे जल्दी नहीं रोका गया तो कहीं हिंदू आतंक का मुस्लिम आतंक से आमना-सामना न हो जाए और पूरे देश में आग की लपटें दिखाई दें। अगर सरकार मुसलमानों की हिफाजत नहीं कर सकती तो इस बात का बहुत बड़ा खतरा है कि मुसलमान अपनी हिफाजत के लिए दस्ते न तैयार कर लें। इन हालात में हिंदू-मुस्लिम आतंक और बढ़ेगा और सरकार असहाय होकर सिर्फ तमाशा देखेगी।  
मोदी दुनिया को भारत की छवि एक ग्लोबल मैन्यूफैक्चरिंग हब के रूप में बेचना चाहते हैं। लेकिन अगर भारत की सबसे तेजी से बढ़ने वाली इंडस्ट्री लिन्च मॉब हो जाएगी तो यह नामुमकिन है। अर्थशास्त्री दानी रोड्रिक ने बताया है कि किसी भी देश की आर्थिक तरक्की उसके आंतरिक संघर्षों पर काबू पाकर ही हो सकती है। आजादी के बाद से ही भारत अपने आंतरिक संघर्षों को काफी हद तक काबू करता रहा है और इस वजह से बेहतर सामाजिक व आर्थिक नतीजे देश को मिले। लेकिन यह उपलब्धि अब खतरे में है।
 15 साल पहले यूएस के तत्कालीन राष्ट्रपति ने भारत को इस बात के लिए बधाई दी थी कि भारत में 150 मिलियन मुस्लिम होने के बावजूद कोई आतंकवादी नहीं है। हो सकता है कि उन्होंने बहुत बढ़ाचढ़ा कर यह बात कही हो लेकिन यह तारीफ भी किसी ने ऐसे ही नहीं कर दी थी। 2001 से जिस तरह से पूरा विश्व आतंकवाद की चपेट में आया, इसमें भारतीय मुसलमानों की छवि बेदाग रही है। तमाम राजनीतिक प्रयासों की वजह से यह संभव हुआ था और अल्पसंख्यकों ने भी माना कि भारत उनका भी है। लेकिन अफसोस है कि बढ़ते लिन्च मॉब ने अब उस युग के अंत होने का संकेत दे दिया है।
पूरे पश्चिम देशों में छोटे-छोटे मुस्लिम आतंकी गुटों ने भारी तबाही मचा रखी है। ये ग्रुप पैदा भी वहीं हुए हैं। उन्हें आईएसआईएस या किसी विदेशी एजेंसी से पैसे या मदद की दरकार नहीं है। इंटरनेट पर बम बनाने का तरीका और इसकी विशेषज्ञता मौजूद है। आतंकवाद इस्लाम की देन नहीं है। भारत की तरह पश्चिमी देशों में भारी तादाद में मुसलमान कानून को मानने वाले लोग ही है। लेकिन जहां मामूली मुस्लिम आबादी भी है वहां आतंकवादी भारी खतरा बने हुए हैं। इन सवालों पर गहराई से विचार करने की जरूरत है।
भारत में मुस्लिम आबादी अब करीब 180 मिलियन है। मान लीजिए कि इस आबादी में से सिर्फ 0.01 फीसदी ही मुस्लिम आतंकवाद को अपना लें तो कल्पना कीजिए कितनी तबाही मच जाएगी। और अगर 0.01 फीसदी हिंदू यह मान लें कि 0.01 फीसदी मुसलमानों की हिंसा के लिए सारे मुसलमान जिम्मेदार हैं तो सोचिए कि भारत में सांप्रदायिक आतंकवाद कहां तक पहुंचेगा। ऐसे में अगर हिंदू-मुसलमानों की 99.99 फीसदी आबादी इस तरह के अपराधों से नफरत भी करे तो भी हालात को बिगड़ने से कोई रोक नहीं पाएगा। यह तभी संभव है जब सारे विजिलेंट ग्रुपों को सख्ती से रोक न दिया जाए।
दाउद इब्राहिम ने मुंबई बम ब्लास्ट ऐसे ही नहीं कर दिया था। दो बड़ी घटनाएं इसके लिए जिम्मेदार थीं। 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद देशभर में बड़े पैमाने पर मुस्लिम विरोधी दंगे हुए। इसके बाद 1993 में मुंबई में शिवसेना की महाआरती के दौरान दंगे हुए। मुंबई में 13 स्थानों पर बम विस्फोट हुए, जिसमें शिवसेना का मुख्यालय भी था। संयोग से यह हिंसा और नहीं बढ़ी और लोगों का गुस्सा धीरे-धीरे शांत हो गया।
अगर अब हिंदू-मुस्लिम आतंक बढ़ता है तो उसे आसानी से रोक पाना मुश्किल होगा। मुझे डर है कि जो लोग हिंदू हिंसा का बीज बो रहे हैं वो बदले में मुस्लिम हिंसा की फसल काटेंगे। इसी तरह जो मुस्लिम हिंसा का बीज बो रहे हैं वो हिंदू हिंसा की फसल काटेंगे। यह अनवरत सिलसिला है जो फैलता चला जाएगा।
(मूल लेख अंग्रेजी में, अनुवाद - यूसुफ किरमानी)
मूल लेख द इकोनॉमिक टाइम्स पर उपलब्ध


Thursday, June 29, 2017

नफरतों के कारोबार के खिलाफ लोग सड़कों पर

अब रोके से न रुकेगा यह सैलाब

भारत की यही खूबसूरती है कि फूट डालो और राज करो वाली चाणक्य नीति से राज चलाने वालों को समय-समय पर मुंहतोड़ जवाब देती है। भारत ने 28 जून को सिर्फ दिल्ली या मुंबई में ही यह जवाब नहीं दिया, बल्कि लखनऊ, पांडिचेरी, त्रिवेंद्रम, जयपुर, कानपुर, भोपाल...में भी नफरतों का कारोबार करने वालों को जवाब देने के लिए लोग भारी तादाद में जुटे।...यह आह्वान किसी राजनीतिक दल या सामाजिक संगठन का नहीं था, बल्कि एक फेसबुक पोस्ट के  जरिए लोगों से तमाम जगहों पर #जुनैद, #पहलू खान, #अखलाक अहमद, रामबिलास महतो की हत्या के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने के लिए कहा गया था। ...लोग आए और #सांप्रदायिक गुंडों को बताया कि देखो हम एक हैं...हम तुम्हारी फूट डालो और राज करो वाली #चाणक्य नीति से सहमत नहीं हैं...यानी Not In My Name (#NotInMyName)

आइए विडियो और फोटो के जरिए जानें और देखें कि लोगों ने किस तरह और किन आवाज में अपना विरोध दर्ज कराया...




जंतर मंतर दिल्ली पर हुए कार्यक्रम की कुछ तस्वीरें...















Sunday, June 25, 2017

मैं चलती ट्रेन में आतंक बेचता हूं...

मैं उन्माद हूं, मैं जल्लाद हूं
मैं हिटलर की औलाद हूं
मैं धार्मिक व्यभिचार हूं
मैं एक चतुर परिवार हूं

मैं चलती ट्रेन में आतंक बेचता हूं
मैं ट्रकों में पहलू खान खोजता हूं
मैं घरों में सभी का फ्रिज देखता हूं
मैं हर बिरयानी में बीफ सोचता हूं

मैं एक खतरनाक अवतार हूं
मैं नफरतों का अंबार हूं
मैं दोधारी तलवार हूं
मैं दंगों का पैरोकार हूं

मैं आवारा पूंजीवाद का सरदार हूं
मैं राजनीति का बदनुमा किरदार हूं
मैं तमाम जुमलों का झंडाबरदार हूं
मैं गरीब किसान नहीं, साहूकार हूं

मुझसे यह हो न पाएगा, मुझसे वह न हो पाएगा
और जो हो पाएगा, वह नागपुरी संतरे खा जाएगा
फिर बदले में वह आम की गुठली दे जाएगा 
मेरे मन को जो सुन पाएगा, वह "यूसुफ" कहलाएगा 

........कवि का बयान डिसक्लेमर के रूप में........
यह एक कविता है। लेकिन मैं कोई स्थापित कवि नहीं हूं। इस कविता का संबंध किसी भी राजनीतिक दल या व्यक्ति विशेष से नहीं है। हालांकि कविता राजनीतिक है। हम लोगों की जिंदगी अराजनीतिक हो भी कैसे सकती है। आखिर हम लोग मतदाता भी हैं। हम आधार कार्ड वाले लोगों के आसपास जब कुछ घट रहा होता है तो बताइए चुप रह सकते हैं भला। आपके उद्गार किसी न किसी रूप में सामने आएंगे ही। यह वही है। एक आम भारतीय सांप, गोजर, बिच्छू या गोदी में बैठे लोगों पर कविता तो नहीं लिख सकता, वह वही लिखेगा जो देखेगा।...इसलिए कविता पढ़ने के बाद सामान्य रहें। आंदोलित कतई न हों। बेहतर हो कि इन हालात को कैसे बदला जाए, इस पर गहनता से विचार करें...शेष अशेष...

@copyrightsYusuf Kirmani

Saturday, June 24, 2017

नफरतों का संगठित कारोबार...बल्लभगढ़ से श्रीनगर तक

Organized Hate Business from Ballabhgarh to Srinagar

चिदंबरम ने बतौर होम मिनिस्टर कभी कहा था कि देश में भगवा आतंकवाद फैल रहा है।...मैंने उस वक्त उनके उस बयान की बड़ी निंदा की थी, क्योंकि वह सच नहीं था।...लेकिन अभी अपने देश में जिस तरह एक भीड़ किसी को घेर कर इसलिए मार देती है कि उसने दाढ़ी रखी है... सिर पर टोपी है...और वह लोग मीट खाते हैं...तो इस अपराध को आप किस श्रेणी में रखना चाहेंगे।...
मेरे एक अभिन्न संघी मित्र घटना से आहत हैं और बार-बार लिख रहे हैं कि वह बल्लभगढ़ में ट्रेन में कुछ मुस्लिम युवकों पर हुए हमले और एक की हत्या से बहुत आहत हैं...लेकिन उनका आग्रह है कि इसे हिंदू आतंकवाद न कहा जाए....मैंने अपने मित्र से कहा कि न तो आपकी पोस्ट पर किसी ने ऐसा कमेंट किया और न ही मैंने आपसे ऐसा कहा...फिर आप परेशान क्यूं हैं....संघी मित्र का कहना है कि देर-सवेर यह मामला यही रूप लेगा और हिंदू आतंकवाद शब्द फिर से कहा जाने लगेगा। कम से कम उदार हिंदू जो हमारे काम से प्रभावित होकर हमारे साथ जुड़े हैं वे फिर छिटक जाएंगे...
....मैं नहीं जानता कि देश के बाकी मुसलमान बल्लभगढ़ की घटना को किस रूप में लेंगे और उनकी प्रतिक्रिया किस रूप में सामने आएगी लेकिन इतना जरूर है कि इस घटना को लेकर अगर उदार हिंदू चुप रह गए तो इस देश में नफरत फैलाने वाली ताकतें अपने मकसद में कामयाब हो जाएंगी।...यह साफ तौर पर सामने आ गया है कि केंद्र में एनडीए की सरकार आने के बाद ऐसे तत्वों के हौसले बुलंद हो गए हैं।...बल्लभगढ़ जैसी घटनाएं भारत नामक देश की बुनियाद को हिला देंगी।
बल्लभगढ़ की घटना हर उस मानवता प्रेमी शख्स को उद्वेलित कर देगी जो इंसाफ पसंद है।
आप ट्रेन में सफर करते होंगे। आप का आमना-सामना ऐसे लोगों से जरूर हुआ होगा, जिनकी भाषा, मज़हब, संस्कृति अलग-अलग होती है...क्या इस आधार पर कुछ लोगों का समूह मिलकर उनकी हत्या कर देगा।....क्या मुसलमानों का कोई समूह एक ऐसे शख्स की हत्या कर दे जिसने माथे पर चंदन लगा रखा हो और जेनेऊ पहन रखा हो...क्या ऐसे ही भारत की कल्पना हमारे पूर्वजों या स्वतंत्रता सेनानियों ने की थी। ...दरअसल, दूसरे धर्म से नफरत, दूसरी संस्कृति से नफरत, दूसरी भाषा से नफरत का जो संगठित कारोबार इस देश में चलाया जा रहा है, वह अब खतरनाक मोड़ पर आ पहुंचा है। अगर एक गिरोह सरकारी संरक्षण में पलेगा, बढ़ेगा तो आप दूसरे गिरोहों को गलत दिशा में मुड़ने से कहां तक और कब तक रोक पाएंगे। ...याद रखिए कांग्रेस से लेकर बीजेपी तक कोई भी राजनीतिक दल हो, धर्म से नफरत के संगठित कारोबार का फायदा उन्हें हुआ और कीमत जनता को चुकानी पड़ी। यानी अंधे होकर आज या कल हम जिन राजनीतिक नेता या संगठनों के पीछे खड़े हैं या खड़े थे...उसका फायदा किसे मिल रहा है...क्या यह आपको अगर नज़र नहीं आता...
जिस मुस्लिम लीग पार्टी के नेताओं ने या असददुद्दीन ओवैसी ने अपनी पार्टी मुसलमानों के नाम पर बनाई, वो खुद संसद में जा पहुंचे और मजे से माल-पानी उड़ा रहे हैं। आरएसएस ने अपना जो ताना-बाना बुना है, उसका भी अंति लक्ष्य सत्ता की प्राप्ति ही था, जिसके जरिए वो अपने मंसूबे अंजाम दे रहे हैं। संघ के चंद नेताओं को ही सत्ता सुख मिल रहा है, बाकी स्वयंसेवक बेचारे पहाड़ और रेगिस्तान की धूल फांककर हिंदू राष्ट्र के निर्माण में लगे हैं।...
ऐसे समय में जब दुनिया सिकुड़ रही है, तकनीक इंसान को एक दूसरे के करीब ला रही है तब मजहब के नाम पर राष्ट्र निर्माण कहां तक उचित है।...आप पुष्पक विमान उड़ाएं या हाथी के सूंड की सर्जरी की कल्पना करें या गाय के गोबर से बिजली पैदा करें...लेकिन सोचिए कि विश्व मानचित्र पर आप कहां खड़े हैं....इन नेताओं और बड़े-बड़े स्वयंसेवकों के बच्चे विदेशी की यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैं और करीम व मातादीन के बच्चों को वहीं मदरसा या संस्कारी स्कूल में कट्टर राष्ट्रवाद का जहर भरा जा रहा है।
बल्लभगढ़ की घटना क्या थी...चार मुस्लिम लड़के दिल्ली से ईद के सामान की खरीदारी करके लोकल ईएमयू ट्रेन से घर वापस लौट रहे थे। डेली पैसेंजर ओखला रेलवे स्टेशन से चढ़े, उन्होंने पहले जबरन सीट मांगी। उन चारों ने एक बुजुर्ग को बैठा भी लिया। लेकिन कुछ देर बाद ही मुल्ले कहकर और बीफ खाने वाले कहकर उन चारों को छेड़ा जाने लगा। उन मुस्लिम युवकों ने टोपी पहन रखी थी और दाढ़ी भी थी, उनके मुसलमान होने में किसी को संदेह नहीं था। इतने में छेड़खानी करने वालों में से एक ने थप्पड़ मारा। उन्होंने विरोध किया। इसके बाद 15-20 लोगों का समूह उन पर टूट पड़ा। फिर पूरा डिब्बा उन पर टूट पड़ा...लोग चाकू मारते जा रहे थे और बीफ खाने वाले मुल्ले कह रहे थे।...उस भीड़ में एक भी ऐसा शख्स नहीं था जो बाकी को रोकने की कोशिश करता या समझाता।
...जरा सोचिए, उन निहत्थे मुसलमानों पर जो भीड़ टूटी, क्या उसे एक संगठित गिरोह द्वारा बहकाया नहीं गया था कि अपने मनमाफिक सरकार है, जो चाहे करो। ....राष्ट्रवाद में हिंसा को जायज ठहराने वाले संगठित गिरोह दरअसल ऐसे लोगों का इस्तेमाल अपने मकसद को पूरा करने के लिए कर रहे हैं। जिनका इस्तेमाल होगा, उसका प्रतिफल हिंसा करने वालों को नहीं मिलेगा, बल्कि उनमें से कुछ पर मुकदमा चलेगा और कुछ जेल भी जाएंगे।....वो तारीख भुगतेंगे और संगठित गिरोह के लोग मलाई काट रहे होंगे।
मीडिया की भूमिका.
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राष्ट्रवाद के लिए हिंसा को रोकने में देश का प्रिंट व इलेक्टट्रॉनिक मीडिया बड़ी भूमिका निभा सकता है। लेकिन अफसोस कि अंध राष्ट्रवादियों के गिरोह ने अपने मकसद को पूरा करने के लिए सबसे पहला काम मीडिया पर कब्जा करने का किया। बल्लभगढ़ की घटना को हिंदी अखबारों ने या तो दबा दिया या तोड़ मरोड़कर छापा।...अंग्रेजी अखबारों ने थोड़ी हिम्मत दिखाई है लेकिन तोड़ मरोड़ वहां भी है।...टीवी पत्रकारिता उसी चीखने चिल्लाने की जगह खड़ी है और बल्लभगढ़ की घटना भी टीआरपी बढ़ाने का खेल बन गई है।...आपसे यह नहीं कहा जा रहा कि आप मिशनरी पत्रकारिता करो लेकिन यह उम्मीद की जाती है कि आप सच को बयान करेंगे या दिखाएंगे लेकिन पुलिस जो कह रही है, वही सच मान लिया गया है।
सरकार से क्या उम्मीद करें
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यह लेख लिखे जाने तक न तो हरियाणा सरकार ने और न ही केंद्र सरकार ने ट्रेन के अंदर हुए इस सांप्रदायिक मर्डर की निंदा की। यहां तक की कांग्रेस ने भी अपनी कोई जांच समिति बल्लभगढ़ नहीं भेजी। सीपीएम नेता वृंदा करात और सीपीएम के सांसद मोहम्मद सलीम जरूर बल्लभगढ़ पहुंचे। सीपीएम का जो काम है वह तो करेगी ही लेकिन बाकी राजनीतिक दलों को क्या हुआ...क्या बल्लभगढ़ की घटना निंदनीय भी नहीं है।....मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर क्या एक समुदाय विशेष के मुख्यमंत्री हैं...ये सवाल हैं जो मुख्य मीडिया में नहीं बल्कि सोशल मीडिया पर पूछे जा रहे हैं, जवाब कोई नहीं देता...