Sunday, May 19, 2019

एग्जिट पोल और Artificial Intelligence managed Media

आज आख़िरी दौर के वोट डाले जा रहे हैं।...शाम को गोदी मीडिया पर एक्ज़िट पोल यानि कौन सरकार बनाएगा की भविष्यवाणी आने लगेगी...ज़ाहिर है कि ये सारे के सारे एक्ज़िट पोल अमित शाह द्वारा मैनेज कराये गए एग्जिट पोल हैं...इसलिए इनको गंभीरता से लेने की ज़रूरत नहीं है। 

अगर आप रोज़ेदार हैं तो आराम से रोज़ा खोलिए। दुआ माँगिए और कुरानशरीफ की तिलावत कीजिए।...कोई भी शैतानी ताक़त आपके ईमान को हराने की ताक़त नहीं रखती। शैतानी ताक़तों ने अपनी पराजय पहले ही स्वीकार कर ली है। 

अगर आप रोज़ेदार नहीं हैं तो आपको भी एग्जिट पोल को दिल पर लेने की ज़रूरत नहीं है। आराम से टीवी के सामने कुछ जूस, नारियल पानी, चाय-पकौड़े वग़ैरह लेकर बैठिए और टीवी एंकरों द्वारा बोली जा रही भाषा पर ध्यान दीजिए। ...और फिर 23 मई को चुनाव नतीजों से इसका मिलान कीजिए। आपको समझ आ जाएगा कि आपसे किस क़दर झूठ बोला गया। 

कुछ बातें आपके काम की और भविष्य के पत्रकारों के लिए
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भारतीय मीडिया अब आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (Artificial  Intelligence managed Media =AIM) का शिकार हो चुका है जो पहले से तय लक्ष्यों के लिए तैयार की गई भाषा का इस्तेमाल करता है। इसीलिए इसका नाम ही बनावटी बुद्धिमत्ता नियंत्रित मीडिया है। जहाँ आपके दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया जाता बल्कि किसी और के दिमाग से इस्तेमाल से तैयार कंटेंट को आगे बढ़ाया जाता है। डिजिटल कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम के लिए AIM को तैयार किया गया है। बनावटी संवेदनाएँ यानी इमोशन बनाने, पैदा करने और उसे तय मक़सद के लिए भुनाने की क्षमता भी AIM के पास है। आने वाले समय पर इस पर मेरा लिखना जारी रहेगा।

हाल ही में मोदी के लिए इस्तेमाल सबसे लोकप्रिय शब्द चीफ़ डिवाइडर ऑफ़ इंडिया जैसे शब्द यहाँ अब लिखना मुश्किल होगा। 

मॉस कम्यूनिकेशन यानी पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे मेरे युवा साथी इस शब्द AIM को नोट करके रख लें। उनके लिए काम की चीज़ है और आज पहली बार मैं इसके बारे में लिख रहा हूँ। क्योंकि अब वो जिस मीडिया में नौकरी करेंगे उन्हें इसका सामना करना पड़ेगा। जिस प्रोफ़ेशन में वो घुसने जा रहे हैं उन्हें AIM नियंत्रित कंटेंट को लिखना या बताना होगा। रोज़ाना दफ़्तर में घुसने से पहले अपने संवेदनाओं की हत्या करके उसे पैरों तले मसल कर अंदर क़दम रखिएगा।




Saturday, May 18, 2019

भगवान से भी धंधा...पूजा पाठ की मार्केटिंग का लाइव प्रसारण...

 
तुम्हारे पूजा-पाठ पर सवाल नहीं...तुम्हारी आस्था पर चोट नहीं...

लेकिन यार... क्या तुम्हारी कोई प्राइवेसी नहीं है...ध्यान तो तुम अकेले में ही करोगे, फिर तुम्हें वहां मीडिया की जरूरत किसलिए है...तुम अपना पूजा पाठ देश की जनता को क्यों दिखाना चाहते हो।...सुबह उठकर मंदिर और मस्जिदों में इबादत करने वाले अपनी आस्था का प्रदर्शन यूं तो नहीं करते।

क्या तुमने अमेरिका के राष्ट्रपति...ब्रिटेन की प्रधानमंत्री को लाइव किसी चर्च के मास प्रेयर में देखा है। ...क्या तुमने सऊदी अरब के सुल्तान को कभी मक्का में तवाफ करते लाइव देखा है...क्या तुमने कर्बला में किसी धर्मगुरु के जियारत का लाइव प्रसारण देखा है...
 
हां, तुमने न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री का लाइव प्रसारण जरूर देखा होगा जब वह अपनी आस्था को ताक पर रखकर हिजाब बांधकर न्यूजीलैंड के अल्पसंख्यकों के घावों पर मरहम लगाने पहुंच गई थी।...लेकिन फिर भी तुमने शर्म महसूस नहीं की।

तुमने अपनी धार्मिक आस्था के लाइव प्रसारण को बच्चों का बाइस्कोप बना दिया है।

आखिर तुम वहां किस चीज की मार्केटिंग कर रहे हो...क्या संवैधानिक पद पर बैठा तुम्हारे जैसा शख्स प्रधानमंत्री कैमरे के साथ पूजा पाठ करता है...क्या वो अपनी आस्था का लाइव प्रसारण कराता है...


हमने उस सरदार को कभी किसी गुरुद्वारे या दरबार साहिब में मत्था टेकते हुए लाइव नहीं देखा....वह भी तुम्हारी तरह दरबारी मीडिया ले जा सकता था। उसके पास भी सरकारी मीडिया था, लेकिन क्या कभी किसी ने उसकी आस्था का भोंडा प्रदर्शन देखा....

दरअसल, इस पूजा पाठ में तुम्हारा एक खास रंग का प्रदर्शन बता रहा है कि तुम बहुसंख्यक तुष्टिकरण की नीति पर चल रहे हो।

किसी लोकतांत्रिक देश में बहुसंख्यक तुष्टिकरण भी एक तरह का दबंगपन है।

बहुसंख्यक तुष्टिकरण से देश टूट जाते हैं।बहुसंख्यक तुष्टिकण किसी भी देश में अराजकता को बढ़ाते हैं।

बहुसंख्यक तुष्टिकरण की आड़ में किसानों के सवाल, बेरोजगारी के सवाल, महिला सुरक्षा के सवाल, गरीब बच्चों के कुपोषण के सवाल, असंगठित मजदूरों के सवाल खत्म हो जाते हैं।

दरअसल, तुम्हारी आस्था, तुम्हारा पूजा पाठ भी एक धंधा है। तुम वहां भगवान से बिजनेस डील करने गए हो। तुम बहुसंख्यकों के लिए एक ऐसे राष्ट्र की डील करने गए हो जिसे देश के करोड़ों मेहनतकश लोग नामुमकिन बना देंगे।...




गांधी को गाली दो, गोडसे को देशभक्त बताओ...तुम्हारे पास काम ही क्या है?

पिछले पाँच साल में महात्मा गांधी को गाली देने का चलन आम हो गया है। आरएसएस और उसकी राजनीतिक शाखा भाजपा ने इसे एक मिशन की तरह आगे बढ़ाया है। अपने छुटभैये नेताओं से गाली दिलवाते हैं। फिर उस गाली को उसका निजी विचार बता दिया जाता है। बहुत दबाव महसूस हुआ तो उसको पार्टी से निकालने का बयान जारी कर दिया जाता है या माफ़ी माँग ली जाती है। 



मैं अक्सर कहता रहा हूँ कि जिन राजनीतिक दलों या जिस क़ौम के पास गर्व करने लायक कुछ नहीं होता वो या तो अपने प्रतीक गढ़ते हैं या फिर मिथक का सहारा लेते हैं। कई बार अंधविश्वास तक का सहारा ले लेते हैं। 
गांधी, आंबेडकर, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, आज़ाद या भगत सिंह से आरएसएस और भाजपा सिर्फ इसलिए चिढ़ते हैं क्योंकि ये सारे गढ़े गए प्रतीक नहीं हैं। ये सभी भारतीय जनमानस में बसे हुए प्रतीक हैं। 
बहुसंख्यकवाद के तुष्टिकरण की नीति पर चलने वाले संगठनों के पास गर्व करने लायक कोई प्रतीक नहीं है। इनके प्रतीकों का अतीत अंग्रेज़ों की मुखबिरी करने और उनसे माफ़ी माँगने में बीता है। भारत जब आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था तो इनके गढ़े गए प्रतीक सावरकर, गोडसे वग़ैरह मुखबिर थे या माफ़ीनामा लिख रहे थे। भारतीय इतिहास के निर्णायक मोड़ पर ये लोग गांधी की हत्या करते पाये गए...उससे अगले मोड़ पर ये लोग नफ़रत फैलाते और समाज को बाँटते पाए गए। हेगडेवार की देश की आज़ादी में क्या भूमिका थी? उन लोगों के पास कहने के लिए कुछ नहीं हैं। ग्वालियर जेल में बंद अटल बिहारी वाजपेयी की लिखी इबारत कौन भूल सकता है।

राष्ट्रपिता के सम्मान में आतंकी मुलज़िम प्रज्ञा ठाकुर की नीच हरकत के लिए भाजपा या उसके नेताओं के घड़ियाली आँसू एक बहाना हैं। वो सिर्फ 23 मई तक टाइमपास के लिए माफ़ी माँग रहे हैं। सत्ता में लौटते ही भारतीय गौरव के प्रतीकों को दोगुना तेज़ आवाज़ में गाली देने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। यह सब आप लोगों की आंखों के सामने होगा और आप लोग कुछ नहीं कर पायेंगे। उसका एक सीन तो आज ही सामने आ गया। मोदी ने दिन में माफी मांगी, शाम को भाजपा मुख्यालय में अमित शाह ने जो प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई, उसमें प्रज्ञा का मामला उठने पर अमित शाह ने कहा कि हमने सभी को नोटिस जारी कर दिया है। उनके जवाब के बाद उचित कार्रवाई होगी। इसके बाद अमित शाह ने भगवा आतंकवाद के लिए कांग्रेस को कोसना शुरू किया और प्रज्ञा ठाकुर को विक्टिम (पीड़ित) बताया।

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में अमित शाह ने एक बार भी गांधी जी के बारे में दिए गए प्रज्ञा के बयान की निंदा नहीं की। मोदी ने भी अपने उन वाक्यों को नहीं दोहराया जो उन्होंने दिन में बोला था कि मैं प्रज्ञा ठाकुर को माफ नहीं कर पऊंगा।...इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि दोगलेपन की सीमा कहां तक फैली हुई है। संघ और भाजपा के तमाम नेता और कार्यकर्ताओं के दिलों में गोडसे बसा हुआ है। वह ऊपरी माफीनामे से नहीं खत्म होने वाला।

भाजपा में हिम्मत है तो ऐसे सभी लोगों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाये। प्रज्ञा के बयान की तुलना मणिशंकर अय्यर के बयान से करना दरअसल प्रज्ञा को भी प्रतीक की तरह स्थापित करने की नाकाम कोशिश है। महात्मा गांधी के प्रति संघ और भाजपा का प्रेम एक बड़ा फ्राड है।

गोडसे आतंकवादी ही तो है
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अगर गोडसे को आतंकवादी नहीं कहा जाएगा तो क्या रंगा-बिल्ला को आतंकवादी कहा जाएगा? 
कमल हासन ने गलत क्या है...क्या महात्मा गांधी का हत्यारा गोडसे पहला हिंदू आतंकवादी नहीं था? 
क्या आजाद भारत में यह पहली आतंकी घटना नहीं थी? गोडसे को किस विचारधारा ने खड़ा किया था? 
कमल हासन ने ऐतिहासिक तथ्य ही तो बताएं हैं। इसमें एक खास राजनीतिक दल को क्यों ऐतराज है। 
उसे तब शर्म नहीं आती है जब वह कश्मीर में पूर्व आतंकवादियों से चुनाव में गठजोड़ करती है।

उसे तब भी शर्म नहीं आती जब वह कश्मीर के अलगाववादियों का समर्थन करने वाली पार्टी से मिलकर सरकार बनाती है। कल को उसे मुस्लिम लीग की मदद से मिलकर केंद्र में सरकार बनानी पड़े तो भी वह मुस्लिम लीग का समर्थन लेने से नहीं हिचकेगी।

क्या अंग्रेजों के समय में कायदे-आजम मोहम्मद अली जिन्ना की पार्टी के साथ हिंदू महासभा ने संयुक्त सरकार नहीं बनाई थी। कह दो कि यह झूठ है, फिर क्यों नहीं इतिहास की किताबों से जिन्ना-हिंदू महासभा गठजोड़ के पन्नों को हटा देते?

फासिस्ट आंधियों की गिरफ़्त में भारत
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हिंदीवाणी,  नई दिल्ली : इंदिरा गांधी ने 1975 से 1977 तक  आपातकाल लगाया था। सारे विरोधी दलों के नेता गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिए। प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी गई। उसके बाद चुनाव हुए तो कांग्रेस बुरी तरह हार गई।...यह बात उस समय के ज़िंदा लोग जानते हैं और अब इतिहास में भी दर्ज है। 

एक बात और है जो उस समय के ज़िंदा लोग और उस समय का इतिहास बताता है कि इमर्जेंसी के दौरान हुए आम चुनाव यानी लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी चाहतीं तो क्या नहीं कर सकती थीं। वह चाहतीं तो चुनाव निष्पक्ष नहीं होते और वह फिर से सत्ता में लौट सकती थीं। पर, उन्होंने कुख्यात होने के बावजूद लोकसभा चुनाव में बेईमानी नहीं कराई। तब तक चुनाव आयोग उनकी मुट्ठी में था और टी एन शेषन का भी अवतार नहीं हुआ था।

2014 के चुनाव में भी कांग्रेस बेईमानी करा सकती थी।

अब 2019 के आम चुनाव पर नज़र डालिए।

चुनाव आयोग की इज़्ज़त गिरवी है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस विवादों में आ गए। अदालतों के कई फ़ैसलों पर लोगों ने नुक्ताचीनी की। जिन राजनीतिक दलों और उनके कार्यकर्ताओं को फासिस्ट ताक़तों से सड़कों पर लड़ना था वो दुम दबाकर बैठे हैं। यहाँ तक कि एक दो दल जो फासिस्ट ताक़तों के खिलाफ हैं उनके कार्यकर्ता और लोकल नेता लंबी तान कर सो रहे हैं।

पश्चिम बंगाल की घटनाएँ बता रही हैं कि वहाँ भाजपा और आरएसएस ममता बनर्जी नामक महिला को हराने के लिए गुंडे, मवालियों तक इस्तेमाल कर रहे हैं। इतिहासकार और बंगाल सुधारवादी आंदोलन के अग्रणी नेता रहे ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की मूर्ति की मूर्ति टूटने की जब खबर आई तो मुझे यक़ीन नहीं हुआ। क्योंकि कोई बंगाली यह हरकत नहीं करेगा। फिर मैंने उस घटना के विडियो देखे।...जो शंका थी, वही सच साबित हुई। दूसरे राज्यों से भेजे गए गुंडों ने वहाँ तोड़फोड़ मचाई। एक संगठित गिरोह ने वह मूर्ति उसी अंदाज में तोड़ी जैसे अयोध्या की घटना को अंजाम दिया गया था। मीडिया ने इस घटना की सही रिपोर्टिंग नहीं की है। एकाध चैनलों पर ही उन विडियो को दिखाया गया। बहरहाल, सोशल मीडिया पर वो विडियो अनगिनत लोगों द्वारा डाले गए है।

आरएसएस ने ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के लिखे इतिहास को कभी पसंद नहीं किया। आरएसएस के निशाने पर तमाम बंगला लेखक, सुधारक, इतिहासकार रहे हैं। 

भाजपा और मोदी ब्रिगेड अगर यह चुनाव जीतता है यह जनता की हार नहीं बल्कि उन राजनीतिक दलों और उनके कार्यकर्ताओं की हार होगी जो ममता और उनके वर्करों के अंदाज में फासिस्ट ताक़तों से टकराने के लिए घरों से बाहर नहीं निकले। कांग्रेस, कम्युनिस्ट, बसपा, सपा के सुविधाभोगी कार्यकर्ताओं की कमज़ोरी के चलते फासिस्ट ताक़तें लगातार मज़बूत हो रही हैं। 

एक तरफ़ आतंकी मुलज़िम साध्वी प्रज्ञा ठाकुर बड़ी बेहियाई से आतंकवादी नाथूराम गोडसे को देशभक्त बता रही है तो दूसरी तरफ़ उतनी ही बेहियाई से भाजपा नेता गांधी जी को माल्यार्पण करते हैं। भाजपा में ज़रा भी शर्म बची हो तो आज ही प्रज्ञा को पार्टी से निकाल बाहर करे। वरना गोडसे देशभक्त और महात्मा गांधी को माला एकसाथ नहीं चल सकते।

लँगड़ा भारतीय लोकतंत्र किसी और तरफ़ बढ़ चला है। 23 मई के बाद अगर मोदी लौटे तो आपको इसका अंदाज़ा हो जाएगा...तमाम लचकदार शाखें भी टूट जाएंगी। (हिंदीवाणीडॉटइ

Tuesday, May 7, 2019

यह चुनावी व्यवस्था भ्रष्ट है...इसे उखाड़ फेंकिये

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों पर टीका टिप्पणी की मनाही है लेकिन इधर जिस तरह से तमाम मुद्दों पर उसका रूख सामने आया है, वो कहीं न कहीं आम नागरिक को बेचैन कर रहा है।...

विपक्ष ने ईवीएम (EVM) से निकलने वाली 50 फ़ीसदी पर्चियों का वीवीपैट (VVPAT) से मिलान करने की माँग करते हुए पुनर्विचार की माँग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने अभी थोड़ी देर पहले उस माँग को ख़ारिज कर दिया। हद यह है कि सुप्रीम कोर्ट 25 फ़ीसदी पर्चियों के मिलान पर भी राज़ी नहीं हुआ...

देखने में यह आ रहा है कि चुनाव आयोग नामक संस्था ने इस पूरे चुनाव में सत्ता पक्ष के साथ बगलगीरी कर ली है। ...और सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग को ठीक से निर्देशित तक नहीं कर पा रहा है। कितनी दयनीय स्थिति है देश की दो सबसे बड़ी लोकतांत्रिक संस्थाओं की।

इससे पहले सुनाई पड़ता था कि किसी एक सीट या दो सीटों पर धाँधली पर चुनाव आयोग आँख मूँद लेता था। उसने मोदी के खिलाफ की गई हर शिकायत को नजरन्दाज करके क्लीन चिट दी। जिस बोफ़ोर्स मामले में फ़ाइनल फ़ैसला तक आ चुका हो, उसे लेकर एक मृत शख़्स को भला बुरा कहा। चुनाव आयोग ने इसका संज्ञान तक नहीं लिया। महान चुनाव आयुक्त स्व. टी. एन. शेषन द्वारा जिस संस्था की विश्वसनीयता बनाई गई हो, उसको इस तरह तार तार किया जाएगा, इसकी कल्पना तक किसी ने नहीं की थी।

भारत में फ़िलहाल ऐसे जनआंदोलन का अभाव है, जिसमें सत्ता की ताक़त और धृतराष्ट्र बन चुकी संस्थाओं से टकराने का माद्दा हो। विपक्षी दल आज सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका ख़ारिज होने के बाद दुम दबाकर चले आये। यह उचित समय है ऐसे तमाम मुद्दों पर जनआंदोलन खड़ा करने का लेकिन कम्युनिस्ट अभी कॉर्ल मार्क्स का अध्ययन कर रहे हैं और गांधीवादी सोशलिस्ट संघियों की गोद में बैठे हुए हैं। इतना बुरा दौर भारतीय इतिहास में नहीं आया था।

पिछले आंदोलन की कटु यादें अभी तक ज़िंदा हैं। अन्ना संघ का एजेंट निकला और वैकल्पिक राजनीति करने आया शख़्स दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रधानमंत्री बनने के सपने देखने लगा। सपने देखना बुरी बात नहीं थी लेकिन बिना अखिल भारतीय संगठन खड़ा किये इधर उधर राज्यों में फुदक फुदक कर चुनाव लड़ने ने सब गुड़गोबर कर दिया। 

वैकल्पिक राजनीति का लक्ष्य बिना सशक्त संगठन हासिल नहीं होता। लेकिन इन महाशय ने इसी को नजरन्दाज कर दिया। देश के लाखों बेरोज़गारों, किसानों, मज़दूरों  को एक मंच पर लाकर वैकल्पिक राजनीति की बात करने वाला कोई दल या संगठन दूर दूर  तक नज़र नहीं आ रहा है।

23 मई को इस चुनाव का नतीजा आएगा। आप देखेंगे कि कितने ही राजनीतिक दल भाजपा या कांग्रेस के साथ सारे आदर्श को ताक पर रखकर खड़े नज़र आयेंगे। सत्ता के लिए येन केन प्रकारेण का खेल खेलेंगे। युद्ध और चुनाव में सब जायज़ जैसे मुहावरे बोले जायेंगे। यानी मौजूदा चुनाव का सिस्टम और उसके ज़रिए सत्ता तक पहुँचने का तरीक़ा भारत में सबसे बड़ा करप्शन है। कॉरपोरेट के पैसे से चुनाव लड़ने वाले दल चूँकि भ्रष्ट तरीक़े से पैसा लेकर सत्ता में आते हैं तो वह वही व्यवस्था बनायेंगे या निर्माण करेंगे जो उस भ्रष्टाचार को और संरक्षित करेगा। भारत में कॉरपोरेट से चंदा लेकर चुनाव लड़ने की पूरी व्यवस्था ही खुला भ्रष्टाचार है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में आया लेकिन इस व्यवस्था को पारदर्शी बनाने का कोई आदेश अभी तक सुप्रीम कोर्ट ने पारित नहीं किया है। 2014 के चुनाव में सबसे ज़्यादा चुनावी चंदा भाजपा को मिला था, उसमें भारत के सभी उद्योग घरानों के नाम थे। उसमें अंबानी और अडानी का नाम सबसे प्रमुख था। उसके बाद भाजपा सत्ता में आई। पिछले पाँच साल के केंद्र सरकार सरकार के कारनामे बताने की ज़रूरत नहीं है। ऐसा नहीं कि यह करप्शन सिर्फ 2014 के चुनाव में ही हुआ था। उसके पहले हुए कुछ चुनाव भी कॉरपोरेट के पैसे से कांग्रेस लड़ती रही है। फ़र्क़ सिर्फ यह है कि पहले धीरू भाई अंबानी चंदा देते थे और अब उनके बेटे चुनावी चंदा देते हैं। पार्टियाँ बदल गई हैं लेकिन कॉरपोरेट घराने और उनके दलाल वही हैं। किसी पर फ़िल्म बना देने और उसे गुरू बता देने भर से उसके पाप नहीं धुल जाते। बेशक डायरेक्शन मणि रत्नम का रहा हो या किसी बच्चन ने उसमें उसकी भूमिका निभाई हो।
बहरहाल,  इस करप्शन या इस नासूर को ठीक करने के लिए लंबे और बड़े संघर्ष की रूपरेखा तय करने की ज़रूरत ग़ैर राजनीतिक संगठनों को है। देखना है वो कब हो पाता है। 

(अपडेट 1:30 pm : अभी खबर मिली है कि सुप्रीम कोर्ट के बाहर चीफ़ जस्टिस के खिलाफ  हो रहे प्रदर्शन को कवर करने वाले पत्रकारों को पुलिस ने धमकाकर भगाने की कोशिश की।)


कुछ बात वकीलों पर भी
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सत्ता पक्ष और विपक्षी दलों में ऐसे वकीलों का क़ब्ज़ा है जो एक दिन अपने नेता के लिए कोर्ट में एड़ियाँ रगड़ता है तो अगले दिन किसी कॉरपोरेट का वकालतनामा जमाकरा कर किसी अंबानी की ज़मानत के लिए बेक़रार नज़र आता है। जज भी इन हालात से वाक़िफ़ हैं। उनका रूख भी जैसा होता है वह तटस्थता के दायरे में कम से कम नहीं होता।

मैं ऐसे तमाम वकीलों को नज़दीक से जानता हूँ जो वैसे तो तमाम बड़े छोटे पत्रकारों के दोस्त बने फिरते हैं और तमाम सार्वजनिक मंचों पर स्वतंत्र पत्रकारिता की दुहाई देते हैं लेकिन कोर्ट में जब किसी मीडिया मालिक के खिलाफ कोई केस होता है तो मीडिया मालिक की तरफ़ से खड़े हो जाते हैं। यह ठीक है कि वह उनका पेशा है लेकिन तब उन्हें स्वतंत्र पत्रकारिता की दुहाई नहीं देनी चाहिए न टीवी चैनलों पर बैठकर लफ्फाजी करनी चाहिए। 

एक लफ़्फ़ाज़ वक़ील ऐसा है कि आज तक कोई चुनाव नहीं जीत सका लेकिन डॉ मनमोहन सिंह के अर्थशास्त्र को भी चुनौती दे देता है।...ऐसे लोगों से आप भला लोकतांत्रिक संस्थाओं को बचाने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?  हालाँकि इन्हीं में प्रशांत भूषण और ऐसे असंख्य वक़ील हैं जो हमें उम्मीद भी बँधाते हैं। कुछ वकीलों के नाम सामने नहीं आते और वे बेहतरीन काम कर जाते हैं।