Tuesday, November 13, 2018

ताकतवर को ऐसे दी जा सकती है चुनौती...देखिए यह विडियो

 अक्सर लोग सवाल करते हैं कि आखिर अपने से ताकतवर या मजबूत को चुनौती कैसे दी जाए। यह सवाल पूरी दुनिया में तब ज्यादा उठते हैं जब कोई देश, कोई सत्ता, कोई खलनायक अपनी ताकत के नशे में चूर हो जाता है। उस हालत या हालात में अगर उसे चुनौती नहीं मिलती है तो वह तानाशाह बन जाता है और हालात खतरनाक होते चले जाते हैं।...हालांकि इसका बहुत आसान सा जवाब है, जो हम सभी को मालूम है। लेकिन मैंने उसका जवाब एक विडियो के माध्यम से देने की कोशिश की है।
यह विडियो...

दुनियाभर में उन तमाम संघर्षशील लोगों, समाजिक राजनीतिक संगठनों, मुजाहिदीनों, एनजीओ, पत्रकारों, खिलाड़ियों, अर्बन नक्सलियों को समर्पित है, जिनमें ताकतवर से टकराने का हौसला है...इस हौसले को दो जंगली प्राणियों के जरिए बताया गया है...इसीलिए मैंने इस विडियो को नाम दिया है...डेयर टू फाइट Dare to Fight...अगर हौसला है तो इस दो मिनट के विडियो को पूरा देखिए...मजा न आए तो इनाम मिलेगा। मजा आए तो शेयर कीजिएगा...

ध्यान रहे यह कॉपीराइट विडियो है। आप इसके इस्तेमाल को आजाद हैं लेकिन वहां साभार लिखना और मुझसे लेना न भूलें। देखने में आया है कि कुछ साथी मेरी पोस्ट को हूबहू अपनी टाइमलाइन और व्हाट्सऐप पर शेयर करते हैं। यह अच्छी बात है। लेकिन मेरी पोस्ट को मुझसे जोड़कर अग्रसारित करेंगे तो किसी कानूनी पचड़े में फंसने से बच जाएंगे।...भारत सरकार रोजाना सोशल मीडिया पर अपना फंदा कसती जा रही है। अभी कल ही ट्विटर के अधिकारियों को धमकाया गया है। इसलिए सभी को सावधान रहने की जरूरत है।... आइए कुर्सीनशीनों सत्तानशीनों को चुनौती देने के लिए यह विडियो देखते हैं... 

Saturday, November 10, 2018

मुस्लिम विमर्श....एक पैगाम...

(वैसे तो यह पब्लिक पोस्ट है, कोई भी पढ़ सकता है लेकिन इसमें पैगाम सिर्फ मुसलमानों के नाम है...)

रात मेरे ख़्वाब में पैगंबर-ए-रसूल आए...मुझे उनका चेहरा तो नहीं दिखाई दिया लेकिन उनकी आवाज़ गूँजती रही और मैं सुनता रहा। उन्होंने यह पैग़ाम भारतीय मुसलमानों तक पहुँचाने को कहा है...

आए दिन ऐतिहासिक शहरों के नामकरण और भाजपा के मंदिर राग और कांग्रेस के साफ्ट हिंदुत्व के खेल के बावजूद अगर आप लोग शांत (मुतमइन) हैं तो आप लोगों को इस धैर्य को न खोने देने वाले जज़्बे को कई लाख सलाम...

आप लोग 2019 के चुनाव तक इसी धैर्य का परिचय दें। ...क्योंकि वोट के लिए मची जंग का सबसे घिनौना चेहरा अभी आना बाकी है...। वह सब होने वाला है, जिसकी आपने कल्पना नहीं की होगी।...हर दिन साजिशों से शुरू हो रहा है। लेकिन अगर आप लोग किसी उकसावे में नहीं आए तो यक़ीन मानिए बाकी ताक़तें अपने मकसद में नाकाम हो जाएंगी।

अभी आपको शिया-सुन्नी ...अशरफ़-पसमांदा...बरेलवी-देवबंदी-कादियानी-इस्माइली-खोजा-बोहरा, सैयद-पठान जैसे फ़िरक़ों या बिरादरी में बाँटने की हरचंद कोशिशें होंगी। मैंने अल्लाह की जो किताब तुम लोगों तक पहुंचाई उसमें सिर्फ सामाजिक समानता और सामाजिक न्याय (Social Equality and Social Justice) की बात लिखी गई है। दुनिया का कोई धार्मिक ग्रंथ सामाजिक समानता की बात नहीं करता। अल्लाह के लिए न कोई अव्वल है न अफजल। सब बराबर हैं।

आप सिर्फ और सिर्फ अल्लाह के रसूल की उम्मत समझकर एकजुट रहना है।

अभी जब आरएसएस ने संत सम्मेलन कराया तो उसे उम्मीद थी कि आप लोगों की तरफ से जबरदस्त प्रतिक्रिया होगी और पूरा माहौल बदल जाएगा। लेकिन आप लोगों की प्रतिक्रियाविहीन खामोशी ने उनका ब्लडप्रेशर बढ़ा दिया । उनकी पूरी रणनीति पर पानी फिर गया। उन्हें आप से ऐसी उम्मीद नहीं थी।...वो बेचैन हैं और एक बिफरा हुआ इंसान सौ गलतियां करता है। आप बस खामोशी से इस तमाशे को देखिए।

ये जो शहरों के नाम बदले जा रहे हैं और आप लोग चुप हैं, ये भी उनकी परेशानी का सबब बना हुआ है। शहरों का नाम बदलने से आप लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है, लेकिन सामने वाले पर इतना फर्क पड़ने वाला है कि उसकी कई पीढ़ियां याद रखेंगी। यही वजह है कि सामने वालों में बहुत बड़ी तादाद में समझदार लोग इसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं। लेकिन आपको हर हाल में खामोश रहना है। यहां तक कि जो लोग विरोध कर रहे हैं, उनके साथ भी शामिल नहीं होना है। ...आपको घेरने की हर कोशिश नाकाम हो जाएगी...अगर यह खामोशी बरकरार रही। ...यह उस तरफ के समझदार लोगों को सोचने दीजिए कि वो इन ताकतों का मुकाबला कैसे करेंगे।

...दरअसल, वो लोग जातियों में बंटे हुए हैं और उसी हिसाब से वे अपनी रणनीति बनाते हैं। उनकी जातियों के मसले आपके फिरकों से बहुत ज्यादा टेढ़े हैं। उनमें जो दबे कुचले लोग हैं, वो ढुलमुल यकीन हैं। कभी इस तरफ होते हैं तो कभी उस तरफ होते हैं। उनको सिर्फ इतना बता दिया गया है कि बस अपना आरक्षण बचा लो तो आप कामयाब रहोगे। उनकी कुल लड़ाई आरक्षण बचाने तक सिमट कर रह गई है। ...आरक्षण रहेगा तो भी आपको (मुसलमानों) कोई फायदा नहीं होगा और नहीं रहेगा तो भी कोई फायदा नहीं होगा। बीच-बीच में पसमांदा मुसलमानों की बात और उन्हें मिलने वाले आरक्षण की बात फैलाई जाती है, लेकिन हकीकत में किसी भी मुसलमान को आरक्षण का कोई लाभ किसी सूरत में न तो मिल रहा है और न मिलने वाला है।...वैसे भी अगर आप आरक्षण के सहारे जिंदगी बसर करने के बारे में सोच रहे हैं तो यह आपकी कमअक्ली के अलावा और कुछ नहीं है। इसलिए आप सभी के साथ रहें, जो आरक्षण विरोधी हैं और जो आरक्षण समर्थक हैं। 

आपकी तरक्की का राज कुरानशरीफ में छिपा है।...इल्म हासिल कीजिए। पढ़ा लिखा इंसान बड़ी से बड़ी दुनियावी ताकत को हरा सकता है। मुझे मालूम है कि आपको नौकरियां नहीं मिल रही हैं। लेकिन अगर आपके पास इल्म है और कोई रोजगार करना चाहते हैं तो बाकी लोगों के मुकाबले आप उस रोजगार बेहतर तरीके से कर सकेंगे।

पैगंबर के नाम पर आज से पूरी दुनिया में 9 दिसंबर तक पैगंबर दिवस मनाया जा रहा है। इस दौरान मैं आप लोगों को सुझाव दे रहा हूं कि आप लोग सारी राजनीति से किनारा करते हुए इस दौरान किसी भी सात दिन इन चीजों पर अमल करें।...

पहला दिन...
-पेड़ पौधे लगाएं और लोगों में बांटें
-जिन पेड़ों को पानी न मिल रहा हो, उन्हें पानी से सींचें
-अपने आसपास की सड़कों और नालियों को साफ करें
-इस पोस्ट का ज्यादा से ज्यादा प्रचार करें


दूसरा दिन...
-अपने पड़ोसियों और दोस्तों से मिलें, उन्हें कोई भी गिफ्ट दें
-सबील लगाएं और साधन संपन्न लोग गरीबों को जूस पिलाएं
-अपने आसपास रहने वाले गरीबों और जरूरतमंदों की किसी भी रुप में मदद करें

तीसरा दिन
-किसी यतीमखाने (अनाथालय) और ओल्ड ऐज होम (वृद्ध आश्रम) में जाएं
-अस्पताल और जेलों में जाएं
-वहां गरीबों के बीच खाना, कपड़ा, कंबल बांटें
-अगर हैसियत वाले हैं तो व्हीलचेयर, छड़ी या उनके काम आने वाला सामान बांटें

चौथा दिन
-आतंकवाद के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चलाकर जागरूकता फैलाएं
-स्कूलों में शांति मार्च आयोजित कराएं
-इस्लाम को शांति का मजहब बताते हुए विचार गोष्ठियां आयोजित करें, इससे संबंधित रिसर्च पेपर पढ़ें


पांचवां दिन...
-मुफ्त मेडिकल चेकअप कैंप लगाएं...यह पूरी तरह नॉन कमर्शल हो
-रक्तदान शिविर आयोजित करें
-लोगों को सेहत और सफाई के बारे में जागरूक करें

छठा दिन...
-सरकारी स्कूलों और स्पेशल बच्चों (मूक बधिर) के स्कूलों में जाएं और वहां स्टेशनरी बांटें
-जिनसे संभव हो सके वो स्कॉलरशिप बांटे...यानी कुछ पैसे गरीबों के बच्चों को दें
-पैगंबर की जिंदगी के बारे में स्कूल के बच्चों को बताएं, उनसे सवाल पूछें
-बच्चों को पढ़ाई और उनके करियर के बारे में जागरूक करें

सातवां दिन...
-पैगंबर के कोट्स या चुनिंदा कही बातों का वितरण करें
-अॉटो, रिक्शा, ईरिक्शा, कैब में बैठी सवारियों को कलम बांटें
-पोस्टर चिपकाएं, बैनर चिपकाएं
-शहर में कॉन्फ्रेंस और वर्कशॉप आयोजित करें
-इस पोस्ट का ज्यादा से ज्यादा प्रचार करें

वसीयत....
मैं फिर से ईद-ए-मोबाहिला में कही गई अपनी वसीयत दोहरा रहा हूं जिसे आप लोग भूलते जा रहे हैं...
-अगर कुरान और मेरे अहलेबैत का दामन थामे रहे तो भारत ही नहीं किसी भी दुनियां में तुम लोगों को शर्मिंदा नहीं होना पड़ेगा...तुम लोग जिंदा कौम की एक बेहतरीन मिसाल हो...अपनी ताकत को पहचानो।...

















Tuesday, November 6, 2018

कर्नाटक वाले निरे मूर्ख निकले...



आरएसएस - भाजपा के मंदिर आंदोलन पर इतना शोर शराबा किया जा रहा है...कि कर्नाटक में पार्टी को चार सीटें हारना पड़ीं। अगर यह शोर नहीं होता तो अपनी पार्टी की जीत तय थी। 

पिछले पाँच साल में कोई ऐसा दिन बताइए जब हमारी पार्टी और पिता तुल्य संगठन इस धंधे से पीछे हटे हों...यह उनकी ईमानदारी है। ...

ख़ैर, कर्नाटक में जो हुआ सो हुआ।अब तो उनको अपना काम करने दीजिए...उन्हें हर शहर में श्रीराम की मूर्ति लगाने और हर शहर में राम मंदिर बनाने में सब लोगों को मदद करनी चाहिए...

हम लोगों के लिए मूर्ति और मंदिर पहले होना चाहिए...रोटी, रोज़गार बाद मे देखेंगे...अगर समय मिला तो। वरना भूखे पेट भी तो भजन किया जा सकता है। 

कथित सेकुलर जमात के बदमाश यूसुफ़ किरमानी जैसों  से कोई पूछे कि भाजपा - आरएसएस के ख़िलाफ़ शोर मचाकर उन्होंने अब तक क्या तीर मार लिया...कितनी नालायक है यह सेकुलर जमात कि रोटी - रोज़ी की तुलना मंदिर और मूर्ति से कर रही है।

...जब हर शहर और गाँव में आंबेडकर की मूर्ति हो सकती है तो श्रीराम की क्यों नहीं? आंबेडकर को हर कोई नहीं मानता...राम को तो सब मानते हैं...बेचारे आंबेडकर वाले और दलित चिंतक भी राम को मानते हैं। क्या कांशीराम के नाम में नाम नहीं लगा था। आंबेडकर वाले सच्चे हैं, मौक़ा मिलते ही हमारी पार्टी को वोट देते हैं। हम राष्ट्रवादियों का जब तब मन होता है तो उनको लतिया भी देते हैं। बेचारे कुछ दिन नाराज़ रहने के बाद हमारे पाले में लौट आते हैं। 
...इनके कुछ चिंतक तो हमारे टुकड़ों पर पलते हैं। लतियाये जाने के बावजूद बेचारे सेवाभाव से लगे रहते हैं।...असली ख़तरा यह सेकुलर जमात है जो लाल झंडे वालों के साथ मिलकर सारे प्रपंच करती रहती है और हमारी पार्टी के लिए मुसीबत खड़ी करती रहती है। 


Saturday, October 6, 2018

'छबीला रंगबाज का शहर' का मंचन

'छबीला रंगबाज का शहर' केवल आरा या बिहार की कहानी नहीं है अपितु इसमें हमारे समय की जीती जागती तस्वीरें हैं  जिनमें हम यथार्थ को नजदीक से पहचान सकते हैं। राज्यसभा सांसद और समाजविज्ञानी मनोज झा ने हिन्दू कालेज में छबीला रंगबाज का शहर के मंचन में कहा कि पढ़ाई के साथ सांस्कृतिक गतिविधियों में भी हिन्दू कालेज की गतिविधियां प्रेरणास्पद रही हैं। झा यहाँ हिंदी नाट्य संस्था अभिरंग के सहयोग से 'आहंग' द्वारा मंचित नाटक में बोल रहे थे।

 युवा लेखक प्रवीण कुमार द्वारा लिखित इस कहानी को रंगकर्मी - अभिनेता हिरण्य हिमकर ने निर्देशित किया है। कैसे हुए निर्देशन और चुस्त अभिनय के कारण लगभग दो घंटे लम्बे इस नाटक को यहां दर्शकों ने मंत्रमुग्ध होकर देखा। कहानी का बड़ा हिस्सा इस शहर के अनूठे अंदाज को बताने में लगता है। तभी घटनाएं होती हैं और एक दिन तनाव के मध्य अरूप अपने किसी रिश्तेदार किशोर को ऋषभ के घर रात भर ठहरा लेने के अनुरोध से छोड़ जाता है। बाद में अरूप बताता है वह छबीला सिंह था जो जेल से भागा था। वही छबीला सिंह जिसके नाम से शहर कांपता था। विडंबना यह है कि यह छबीला स्वयं शोषण और अत्याचार का शिकार है। असल में कहानी बिहार की जातिवादी संरचना के मध्य बन रहे आधुनिक समाज का जबरदस्त चित्र है।

नाटक में सूत्रधार शहर की भूमिका में तमन्ना शर्मा, अरूप की भूमिका में विजय कुमार, छबीला की भूमिका में खुमेश्वर विजय चायवाला एवं  मुमताज़ मियां की दोहरी भूमिका में  राहुल शर्मा और ऋषभ की भूमिका में अजितेश गोगना ने अपने प्रभावशाली अभिनय से दर्शकों की भरपूर सराहना प्राप्त की। वहीं अन्य भूमिकाओं में विनीत सिंह, विनय तोमर ,गुफरान, आशीष चौधरी (जेरी), अनीश शर्मा, अमोघ मिश्रा, भारती, रविकांत, आर्यन गुप्ता, हेमन्या, वंदना, यज्ञश्री सिसोदिया तथा  डॉ. हिरण्य हिमकर  भी मंच पर थे। मूल कहानी में रंगमंच की आवश्यकता के अनुसार कुछ परिवर्तन कर निर्देशक ने कहानी को और अधिक समीचीन तथा अविरल बनाने की कोशिश की। नाटक के अंत में लाश मिलने की सूचना दर्शकों को बेचैन कर देती है वहीं कानून व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न छोड़ जाती है कि आखिर क्यों निर्दोष नागरिक व्यवस्था के शिकार बन जाते हैं। हिन्दू कालेज के खचाखच भरे विशाल आडिटोरियम में नाटक को देखने के लिए कालेज तथा बाहर से दर्शकों की बड़ी मौजूदगी सार्थक रंगमंच की जरूरत को सिद्ध करने वाली थी।

अंत में कालेज की प्राचार्या डॉ अंजू श्रीवास्तव ने नाटक में अभिनय करने वाले सभी कलाकारों को स्मृति चिह्न भेंट किये। अभिरंग के परामर्शदाता डॉ पल्लव ने सभी का आभार व्यक्त किया। समापन सत्र का संयोजन आँचल बावा का ने किया। 


रिपोर्ट - राहुल कसौधन