Saturday, January 13, 2018

मैं उस देश का वासी हूँ...


जी हाँ, मैं उस देश का वासी हूँ...

जिस देश में इंसाफ़ सुप्रीम कोर्ट के कॉरिडोर में रौंदा जा रहा हो...
जिस देश का चीफ़ जस्टिस तिरंगे पर बार बार फ़ैसला पलटता हो...

जिस देश में मीडिया सत्ता की कदमबोसी कर रहा हो...
जिस देश का मीडिया मसले जाने से पहले सरेंडर कर रहा हो...

जिस देश में मुख्यमंत्री को अपने ही मुक़दमे वापस लेने की छूट हो...
जिस देश में मुख्यमंत्री को जासूसी और नरसंहार  की छूट हो...

जिस देश में सेना के जनरलों को राजनीतिक बयानों की छूट हो...
जिस देश में सेना के जनरलों को राजनीति में आने की छूट हो...

जिस देश में जंतरमंतर पर प्रदर्शन की आज़ादी छीन ली गई हो...
जिस देश में किसी विकलांग का जनविरोध देशद्रोह होता हो ...

जिस देश में भात न मिलने पर कोई बच्ची दम तोड़ देती हो...
जिस देश में ग़रीब को बच्चे की लाश ख़ुद ढोना पड़ती हो...

जिस देश में दलित और आदिवासी शहरी नक्सली कहलाते हों...
जिस देश में किसान क़र्ज़ न चुकाने पर आत्महत्या करते हों...

जिस देश में बैंकों और जनता का पैसा लेकर भागने की छूट हो...
जिस देश में प्राकृतिक संसाधनों को लूटने की पूरी छूट हो...


बिल्कुल, मैं उस देश का वासी हूँ।

Tuesday, January 9, 2018

क्या आप शहरी नक्सली हैं...आखिर कौन है शहरी नक्सली

Urban Naxal यानी शहरी नक्सली ....यह जुमला आजकल बहुत ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है। हालांकि कभी मेनस्ट्रीम पत्रिका में सुधांशू भंडारी ने शहरी नक्सलवाद की रणनीति पर लंबा लेख लिखकर इसकी चर्चा की थी। लेकिन यह लेख सिर्फ लेख रहा और नक्सली आंदोलन के प्रणेता इसे कभी अमली जामा नहीं पहना सके। लेकिन राष्ट्रवाद और आवारा पूंजीवाद का प्रचार प्रसार करने वाले अब अपने विरोधियों के लिए शहरी नक्सली या शहरी नक्सलवाद शब्द लेकर लौटे हैं। इस वक्त केंद्र सरकार के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को शहरी नक्सलियों की आवाज बताने का फैशन शुरू हो गया है। अगर आप सरकार के विरोध में हैं तो आप शहरी नक्सली हैं या देशद्रोही हैं।
  
हाल ही में कोरेगांव भीमा, पुणे और मुंबई में दलितों ने सड़क पर आकर जो आंदोलन किया, उसे बॉलिवुड के फिल्मकार विवेक अग्निहोत्री और उनके खेमे के लोगों ने इसे शहरी नक्लवाद बताया और लिखा। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में कन्हैया कुमार, उमर खालिद, शाहला राशिद ने पिछले दिनों तमाम मुद्दों पर जो आंदोलन किया, उसे भी शहरी नक्सलवाद से जोड़ा गया। हैदराबाद यूनिवर्सिटी, बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में हो रहे स्टूडेंट्स आंदोलन को भी इसी चश्मे से देखा जा रहा है। मुंबई में पिछले हफ्ते जब स्टूडेंट्स ने जिग्नेश मेवानी और उमर खालिद को बुलाकर स्टूडेंट्स सम्मेलन करना चाहा तो मुंबई पुलिस ने उसे शांति के लिए खतरा बताकर अनुमति ही नहीं दी। इसे भी शहरी नक्सवाद का हिस्सा बताया गया। मेवानी ने इसके बाद दलितों के मुद्दे पर दिल्ली में 9 जनवरी 2018 को हुंकार रैली रखी लेकिन दिल्ली पुलिस ने 8 जनवरी की शाम को अनुमति न देने का ऐलान किया, बहाना यह किया गया कि इसे संसद मार्ग पर क्यों आयोजित किया जा रहा है। 



इस रैली को रोके जाने की वजह विवेक अग्निहोत्री का वह पोस्टर बना जो उन्होंने रैली से ठीक पहले पूरे दिल्ली में सरकारी तंत्र के जरिए चिपकवाया और सोशल मीडिया पर प्रचारित किया। इस पोस्ट में जिग्नेश मेवानी को शहरी नक्सली बताते हुए खुली बहस की चुनौती दी गई है। पोस्टर में कहा गया है कि जिग्नेश 9 जनवरी को दिल्ली में होंगे, अगर उनमें हिम्मत हो तो वह मुझसे कॉस्टिट्यूशन क्लब में आकर बहस करें। लेकिन दिल्ली पुलिस ने रैली पर रोक लगा दी।
खास बात यह है कि इस समय संसद का सत्र भी नहीं चल रहा, जिसकी आड़ लेकर इस रैली को रोका जाता लेकिन सरकार कथित शहरी नक्सलियों से इतना डर गई है कि उसने दिल्ली पुलिस का इस्तेमाल कर मेवानी की रैली को अनुमति नहीं दी। दरअसल, इस पोस्टर के जरिए दिल्ली पुलिस को भी सार्वजनिक रूप से सूचित किया गया कि 9 जनवरी को दिल्ली में शहरी नक्सली रैली के लिए जुट रहे हैं। दिल्ली पुलिस की रोकटोक के बावजूद यह रैली हुई। रोकटोक की वजह से रैली में कम लोग पहुंचे लेकिन रैली से जो संदेश दिया जाना था, वह पहुंचा।

अरबन नक्सल को प्रचारित करने वाले जगह-जगह लिख रहे हैं कि अगर देश ने शहरी नक्सलवाद को बढ़ने और पनपने दिया तो हर जगह अराजकता के हालात बन जाएंगे। इन लोगों के मुताबिक इस शहरी नक्सलवाद का नेतृत्व गुजरात के वडगाम से हाल ही में चुने गए युवा विधायक व दलित नेता जिग्नेश मेवानी, जेएनयू के छात्र नेता उमर खालिद, कन्हैया कुमार और शाहला राशिद कर रहे हैं। यानी जहां कहीं भी युवा आंदोलन कर रहे हैं, उसके पीछे कन्हैया कुमार, जिग्नेश मेवानी, उमर खालिद व शाहला राशिद की चौकड़ी काम कर रही है।

पहले तो यह समझा जाए कि आखिर अरबन नक्सलवाद इन लोगों की नजर में क्या है और इसका प्रचार इतनी जोर-शोर से आखिर क्यों किया जा रहा है। इस जुमले को प्रचारित करने वालों का कहना है कि शहरी नक्सली वो लोग हैं, जो भारत के अदृश्य दुश्मन हैं लेकिन ये लोग पुलिस की नजर में हैं। ये शहरी नक्सली केंद्र सरकार के खिलाफ हिंसक विद्रोह का आंदोलन चला रहे है। इनमें जो एक चीज सामान्य है वह यह कि इनमें शहरी बुद्धिजीवी, प्रेरणादाई लोग या महत्वपूर्ण एक्टिविस्ट भी शामिल हैं। इन जुमलेबाजों के हिसाब मैं भी शहरी नक्सली हुआ और वह सारे शहरी नक्सली हुए जो सरकार का किसी न किसी स्तर पर विरोध कर रहे हैं।

जैसे एडवोकेट प्रशांत भूषण, किसान आंदोलन चलाने वाले योगेंद्र यादव, सहमत की शबनम हाशमी, आदिवासियों की आवाज उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार, सरकार विरोधी छवि लिए हुए टीवी पत्रकार व एंकर रवीश कुमार और वो असंख्य लोग जो केंद्र सरकार के विरोध में किसी न किसी स्तर पर खड़े हुए हैं। इनकी परिभाषा के हिसाब से ऐसे लोग जो लोग सिविल सोसायटी की आड़ लेकर सरकार के खिलाफ लीगल तरीके से आंदोलन खड़ा करते हैं, वह सारे शहरी नक्सली हैं। इन लोगों के हिसाब से जस्टिस लोया की मौत की जांच की मांग करने वाले और उसे लेकर अदालत में याचिका दायर करने वाले भी शहरी नक्सली हैं। इनकी नजर में तमिलनाडु से चलकर जंतर मंतर पर आकर प्रदर्शन करने वाला गांव का किसान भी शहरी नक्सली हो गया क्योंकि उसकी हिम्मत कैसे हुई कि वह गांव से निकलकर शहर में सरकार का विरोध करने चला आया।  

दरअसल, संघ और भाजपा ने ऐसे लोगों को पहले देशद्रोही कहा था। लेकिन फिर इन्हें लगा कि बाबा साहब द्वारा लिखे गए भारतीय संविधान के हिसाब से ऐसे लोगों को देशद्रोही नहीं ठहराया जा सकता तो इनको शहरी नक्सली कहना शुरू किया जाए। बहुत जल्द इस शब्द का प्रयोग सत्ता पक्ष अपने हर विरोधियों के लिए करने लगेगा। आम लोगों को शहरी नक्सली का ज्यादा मतलब समझ में नहीं आएगा, वह यही समझेगा की शहरी नक्सली कोई गुंडे मवाली हैं जो सरकार को परेशान कर रहे हैं। 

2014 का लोकसभा चुनाव प्रचंड बहुमत से जीतने के बाद बीजेपी को नियंत्रित करने वाले संगठन आरएसएस ने यह मान लिया था कि देश को कट्टर बनाने की उसकी मुहिम को लोगों ने पसंद किया है, तभी लोगों ने बीजेपी को वोट दिया। लेकिन वो यह भूल गए कि कट्टरता की लाख घुट्टी पिलाने के बाद जब इंसान भटककर रोटी-रोजी, महंगी होती जा रही स्कूल फीस, अस्पताल का महंगा इलाज और टूटी सड़कों पर सोचने लगता है तो सारी कट्टरता का नशा काफूर हो जाता है। जब वह देखता है कि कोई कैसे भात न मिलने पर इस देश में दम तोड़ देता है। जब वह देखता है कि कैसे एंबुलेंस न मिलने पर कोई अपनी पत्नी या बच्चे को पीठ पर लाद कर शहर से गांव या गांव से शहर ले जाता है।...उस वक्त सारा कट्टर हिंदूवाद-कट्टर मुस्लिमवाद हवा हो जाता है। फिर संघ की घुट्टी से उसे चिढ़ होने लगती है।

आवारा पूंजीवाद जो इस कट्टरता को पाल-पोस रहा है, वह रोटी-रोजगार से जुड़े मुद्दों पर आंदोलन खड़ा करने वालों की काट नहीं कर पा रहा है। ऐसे में झाड़पोंछकर शहरी नक्सली शब्द को खड़ा किया जा रहा है और बताया जा रहा है कि अगर कोई दलित आरक्षण की बात करे तो उसे शहरी नक्सली बता दो। अगर कोई रोहित वेमुला खुदकुशी करे तो उसे नक्सली बता दो, कोई कन्हैया कुमार, जिग्नेश मेवानी या उमर खालिद अगर मानवाधिकार की बात करे तो उसे भी शहरी नक्सली साबित कर दो। यहां तक कि वकील प्रशांत भूषण अगर सरकार के किसी पसंदीदा जज पर ऊंगली उठा दें तो उन्हें भी इसी सूची में डाल दो। हर चीज का इलाज शहरी नक्सली में तलाश लिया गया है। कोई भी मांग उठाने वाला अब शहरी नक्सली है।

विवेक अग्निहोत्री ने पांच फिल्में बनाई हैं। जिनमें चॉकलेट, गोल, बुद्धा इन ट्रैफिक जाम के अलावा दो फिल्में और हैं। मैं उनकी बनाई फिल्मों पर चर्चा नहीं करना चाहता कि वह कितनी अच्छी या बुरी हैं। मैं इस पर भी चर्चा नहीं करना चाहता कि बुद्धा इन ट्रैफिक जाम उन्होंने मोदी के समर्थन में क्यों बनाई। आईआईएमसी दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाले विवेक एक तेजतर्रार फिल्ममेकर हो सकते हैं लेकिन जिस तरह से वह आम लोगों की आवाज को शहरी नक्सली बताने पर तुल गए हैं वह उनकी सारी काबिलियत को छोटा कर रहा है। बुद्धा इन ट्रैफिक जाम को चर्चा में लाने के लिए उन्होंने अनुपम खेर और जेएनयू का इस्तेमाल किया। जेएनयू में जिस वक्त कन्हैया और उमर खालिद का आंदोलन चरम पर था, विवेक वहां अनुपम खेर को लेकर इस छात्र आंदोलन का विरोध करने पहुंच गए। वहां इन लोगों ने पहले फिल्म दिखाई और उसके बाद कथित शहरी नक्सलियों को ललकारा। जेएनयू के स्टूडेंट्स विवेक और अनुपम की घुट्टी से जरा भी प्रभावित नहीं हुए। लेकिन विवेक को एक रास्ता मिल गया। 

वह सत्ता पक्ष की आवाज बन गए। अब सत्ता पक्ष उन्हें बहुत चालाकी से युवाओं के खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है। चूंकि विवेक युवा हैं और सत्ता पक्ष को यह पता है कि जिग्नेश, कन्हैया, उमर खालिद के विरोध में अगर किसी चर्चित युवा को खड़ा किया जाएगा तो लोग गफलत में रहेंगे कि इनमें किस युवा नेता की बात सही है। अब हालात यह है कि विवेक हर मंच पर जाकर इन स्टूडेंट्स लीडर्स को शहरी नक्सली बताने लगे हैं। तमाम सोशल साइट्स पर लेख लिख रहे हैं। एक लेख में उन्होंने कन्हैया कुमार पर बहुत तीखा हमला किया और लिखा कि यह आदमी युवाओं का आदर्श (यूथ आइकन) नहीं हो सकता। यह शहरी नक्सली है। इसी लेख में उन्होंने मनुवाद की निंदा करने वालों पर लिखा कि इन लोगों ने मनुस्मृति पढ़ी नहीं है और बेकार में मनुवाद का विरोध कर रहे हैं। शहरी नक्सलियों को पहले यह किताब पढ़नी चाहिए। 

आप लोगों को याद होगा कि जेएनयू में और महाराष्ट्र में कई स्थानों पर मनुस्मृति को जलाया गया था। दलितों का कहना है कि मनुस्मृति से वर्ण व्यवस्था अस्तित्व में आई और उन्हें भारत में सवर्ण लोगों का गुलाम बना दिया गया। मनुस्मृति वाले विदेशी आक्रमणकारी आर्य हैं जो हम मूल निवासियों (दलित) के संसाधनों पर कब्जा कर रहे हैं, हमारा हक छीन रहे हैं। लेख लिखकर विवेक का मनुवाद पर किया गया हमला बताता है कि वह सत्तापक्ष के हथियार बन गए हैं। वह उस मानसिकता का प्रचार कर रहे हैं जो दलितों को उनके अधिकार से वंचित करती है।    

विवेक को शहरी नक्सली (Urban Naxal) शब्द इतना पसंद आया है कि वह इसी नाम से एक किताब भी लिख रहे हैं। इस शब्द को वह अपने फेसबुक और ट्विवटर पर बाकायदा हैशटैग बनाकर चला भी रहे हैं। ...मतलब समझ में आता है कि किताब आने से पहले इस शब्द को इतना आम कर दिया जाए कि न तो प्रकाशक को घाटा हो और न विवेक को घाटा हो।

बहरहाल, मुझे तो लगता है कि विवेक को फिल्में बनाना छोड़कर राजनीति में आना चाहिए, ताकि कथित शहरी नक्सलियों यानी देशद्रोहियों के खिलाफ उनकी आवाज को लोग सुन सकें। अभी न तो वह ठीक से पूरे फिल्मकार बन पाए हैं औ न नेता। आखिर क्यों वह बॉलिवुड के अशोक पंडित, मधुर भंडारकर, पहलाज निहलानी की गिनती में आना चाहते हैं।

उन्हें किसी को शहरी नक्सली या देशद्रोही बताने से पहले मौजूदा दौर के बहुत बड़े उपन्यासकार पाउलो कहलो Paulo Coelho को पढ़ना चाहिए जो कहते हैं कि "You can Love Your Country Without having to love Your Government." यानी आप अपने देश को बिना अपनी सरकार से प्यार किए बिना भी प्यार कर सकते हैं। ...और मैं इसे अपने शब्दों में तोड़मरोड़ कर कहूं कि - अगर आप राष्ट्रवादी नहीं हैं तो इसका यह मतलब नहीं है कि आप देशद्रोही हैं।  
(Copyrights@JournalistYusufKirmani2018)



Sunday, January 7, 2018

हद है...मेहरम पर भी राजनीति कर डाली !!!!

अब यह राज भी खुल गया कि भारतीय मुसलमानों का हर मुद्दा मौजूदा और इससे पहले रही केंद्र सरकारों के लिए सिवाय वोट बैंक की राजनीति के अलावा कुछ भी नहीं रहा है।

पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मन की बात रेडियो कार्यक्रम में मोदी ने हज पर जाने वाली महिलाओं का जिक्र किया और केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी की देखरेख में चलने वाले अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय को बधाई भी दे डाली। मोदी ने कहा था कि भारत सरकार ने इस बार से 45 साल और इससे अधिक उम्र की महिलाओं को मेहरम के बिना हज पर जाने की इजाजत दी है। इस बार कुल 1320 महिलाओं ने मेहरम के बिना हज पर जाने के लिए आवेदन किया और भारतीय हज समिति ने सभी के आवेदन स्वीकार कर लिए। इनमें से करीब 1100 महिलाएं केरल की हैं।




इस्लाम धर्म में मेहरम उस शख्स को कहते हैं जिसके साथ महिला की शादी नहीं हो सकती। मसलन महिला का बेटा, सगा भाई और पिता मेहरम हुए। 

सरकार के इस फैसले का मैंने ही नहीं तमाम मुस्लिम संगठनों और मुस्लिम विमर्श पर लिखने वालों ने स्वागत किया। लेकिन मोदी के इस बयान और दावे को फौरन ही हैदराबाद के सांसद और एएआईएमआईएम प्रमुख असाउद्दीन ओवैसी ने गलत बताया। ओवैसी ने बगैर मेहरम हज पर महिलाओं के जाने पर प्रधानमंत्री मोदी की घोषणा का प्रतिवाद करते हुए कहा कि किसी दूसरे देश की सरकार जो काम पहले ही कर चुकी है उसका श्रेय प्रधानमंत्री को नहीं लेना चाहिए। उन्होंने दावा किया था कि सऊदी हज प्रशासन ने 45 साल से अधिक उम्र की किसी भी देश की मुस्लिम महिला को बगैर मेहरम हज पर जाने की अनुमति दी है।

हमने ओवैसी के बयान को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह शख्स हर बात में कूद पड़ता है और सरकार अगर कुछ अच्छा कर रही है तो जबरदस्ती हल्ला मचाता है। ओवैसी अड़े रहे और अपना बयान वापस नहीं लिया।
मैंने और तमाम मुस्लिम थिकंर्स ने ओवैसी के बयान के ऊपर मोदी के बयान को तरजीह दी और उसे सच माना।
लेकिन यह सच नहीं था। इसका भेद जल्द खुल गया। मोदी ने गलत बयानी की और ओवैसी का प्रतिवाद अपनी जगह ठीक था।

इस भेद को खोला जेद्दाह (सऊदी अरब) में भारत के महावाणिज्य दूत रहे अफजल अमानुल्ला ने। अमानुल्ला वही शख्स हैं जो नई हज नीति 2018 लाने वाली समिति के संयोजक थे और उन्होंने ही सरकार से इस तरह की सिफारिशें की थीं। उन्होंने आज एक इंटरव्यू में कहा कि इसमें कोई भी सच्चाई नहीं है कि मेहरम वाली पाबंदी सऊदी अरब सरकार ने लगाई थी। यह रोक भारत सरकार की तरफ से थी और अब इसे हटाया गया है। इसे मैं बहुत बड़ा कदम मानता हूं। अमानुल्ला ने कहा कि मेरी समझ में यह नहीं आ रहा कि सरकार की तरफ से इतने वर्षों से यह रोक क्यों लगी हुई थी? नई हज नीति का मसौदा तैयार करने के दौरान हमने सऊदी प्रशासन से संपर्क किया तो पता चला कि उनकी तरफ से कोई रोक नहीं है। इस पाबंदी का उल्लेख दोनों देशों के बीच हर साल होने वाले हज संबंधी समझौते में होता था। यह पाबंदी भारत की तरफ से थी। ऐसे में हमने सिफारिश की कि यह रोक हटनी चाहिए और जिन महिलाओं का फिरका अनुमति दे उन्हें बिना मेहरम के हज पर जाने की इजाजत मिलनी चाहिए।

...तो यह बात साफ हुई कि मेहरम वाली रोक केंद्र सरकार की ओर से थी ना कि सऊदी अरब की ओर से। कम से कम इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री को सच बयानी करनी चाहिए थी।
भारतीय राजनीति कुल मिलाकर बयानवीरों तक सिमट कर रह गई है। सत्ता पक्ष हो, विपक्ष हो, दोनों तरफ से कोई एक बयान आता है और फौरन राजनीति गरमा उठती है। हाल ही में एक बार में तीन तलाक को लेकर जो गलत बयान केंद्र सरकार और उसके मंत्रियों ने की है, उससे सरकार ने अपनी विश्वसनीयता ही खोई है। ...और निकल कर क्या आया कि जल्दबाजी में तैयार किए गए इस बिल को सरकार पास नहीं करा सकी। अगर दोनों पक्ष इस पर बयान देने की बजाय ठंडे दिमाग से मिलकर बिल तैयार करते तो यह नौबत नहीं आती और इसी सत्र में यह बिल पास भी हो जाता। लेकिन भाजपा सरकार की मंशा कुछ और है। उसके पास एक सूत्री कार्यक्रम बस यही रहता है कि कभी मेहरम के बहाने तो कभी तीन तलाक के बहाने मुसलमानों को नीचा दिखाया जाए।...ऐसे कब तक चलेगा।...क्या सरकार रोटी-रोजी के मुद्दे भटककर ऐसे बेहूदा और फालतू के मुद्दे पर हिंदू-मुसलमान खेलती रहेगी...आप लोगों के सोचने और जागने का समय है।

Saturday, January 6, 2018

ये आलू नहीं किसानों के खून के आंसू हैं

क्या आपकी नजर देश के मौजूदा हालात पर है।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में किसानों ने कई टन आलू मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सरकारी आवास के सामने फेंक दिया है। इसके अलावा विधानसभा मार्ग, वीवीआईपी गेस्ट हाउस के पास और लखनऊ शहर के 1090 चौराहों पर आलू फेंके गए। यूपी का किसान भाजपा सरकार की किसान विरोधी नीति से बेहद नाराज है। राष्ट्रीय किसान मंच के अध्यक्ष शेखर दीक्षित का कहना है कि सरकार की कथनी और करनी में अंतर है। हालात नहीं सुधरे तो किसानों ने आज आलू लखनऊ की सड़कों पर आलू फेंका है, कल गन्ना किसान यही काम कर सकते हैं और परसों गेहूं एवं धान के किसान ऐसा कर सकते हैं। दीक्षित ने कहा कि अगर हालात नहीं सुधरे तो उत्तर प्रदेश में मंदसौर जैसी हिंसा हो सकती है। हालांकि भाजपा सरकार ने आलू फेंकने की घटना को शरारती तत्वों का काम बताया।



जिस तरह महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव, पुणे और मुंबई में हुई हिंसा को बाहरी तत्वों का हाथ बताकर पल्ला झाड़ लिया यानी उसने महाराष्ट्र में दलितों और मराठों के संघर्ष को पूरी तरह नजरन्दाज कर मामला दूसरों पर डाल दिया। ठीक यही बात आलू फेंकने की घटना में की गई। योगी सरकार ने इसे किसानों का गुस्सा न बताकर या सच न बताकर कहा कि आलू फेंकने में शरारती तत्वों का हाथ है। राजनीति में पल्ला झाड़ना सबसे आसान है। पीड़ित कुछ भी कहते रहें, उस घटना को आप शरारती तत्वों से जोड़कर जिम्मेदारी से अलग हो सकते हैं। इस तरह लखनऊ में आलू बिखेरने वाले किसान गोया शरारती तत्व हो गए।...और ये शरारती तत्व इतने मजबूत निकले की योगी सरकार की पुलिस की आंखों में धूल झोंककर पूरे लखनऊ में आलू बिखेरकर अपने गांवों में चले गए। खैर, जिन भक्त लोगों ने चश्मा लगा रखा है, उन्हें भी किसानों की परेशानी समझ में नहीं आएगी।

विडंबना देखिए कि योगी सरकार प्रदेश की तमाम सरकारी बिल्डिंगों को भगवा रंग से रंग रही है। यह समझ से बाहर है कि बिल्डिंगों को भगवा रंग में रंगने से वो किसका भला करना चाहते हैं। क्या सरकारी भवनों को भगवा रंग में रंगने से किसानों को उनकी फसल का वाजिब दाम मिल जाएगा, क्या प्रदेश के बेरोजगारों का रोजगार मिल जाएगा, क्या सरकारी स्कूलों की हालत सुधर जाएगी, क्या महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में कमी आ जाएगी, क्या यूपी में कोई गरीब रात को भूखे पेट नहीं सोएगा।...हां अगर भगवा रंग पोतने से किसानों को कुछ हासिल हो जाए तो फिर किसानों का ही मुझ जैसों का घर भी भगवा रंग में पोत डालिए। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शनिवार को मेरठ जिले में थे। वहां उनसे पूछा गया कि आलू बिखेरा गया है, आप क्या कहते हैं, वो बोले कि सरकार आलू पैदा करने वाले किसानों के साथ है लेकिन वह यह कहना नहीं भूले कि आलू बिखेरना एक राजनीतिक शरारत है। मतलब कुल मिलाकर दोषी किसान हैं और योगी के रुख से तो लगता है कि किसानों के प्रति भाजपा सरकार की जरा भी हमदर्दी नहीं है।



अब देखिए भाजपा में वाकई किसी के पास किसानों के लिए चिंता करने का समय नहीं है। योगी का चेहरा तो सारे मामले में सामने आ ही गया। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह असम में कामाख्या देवी मंदिर के दर्शन करने पहुंचे हैं। क्योंकि निकट भविष्य में उत्तर पूर्व के राज्यों में विधानसभा चुना है तो वह अपनी चुनावी यात्रा शुरू करने से पहले कामाख्या मंदिर गए और तब मेघालय के लिए रवाना हुए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का जिक्र ही क्या करना, वो बेचारे तो रात-दिन किसानों की चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं लेकिन कमबख्त यह राज्यों की सरकारें हैं जो किसानों की सुध नहीं ले रही हैं। कृपया इसमें से उत्तर प्रदेश का नाम निकाल दें। भाजपा के मुताबिक किसान वहीं परेशान हैं जहां भाजपा की सरकारें नहीं हैं।

चलिए आलू उत्पादक किसानों से आगे बढ़ते हैं।

देश की आर्थिक वृद्धि दर के अनुमानित आंकड़े केंद्र सरकार ने खुद जारी किए हैं। अभी तक सरकार तमाम रेटिंग एजेंसियों की आड़ में अपनी पीठ थपथपा रही थी और आर्थिक वृद्धि दर के आंकड़ों को मनमाने ढंग से व्याख्या करके पेश कर रही थी।नए आंकड़ों के मुताबिक नई परियोजनाओं और नए निवेश में गिरावट आयी  है। असंगठित क्षेत्र नोटबंदी के दुष्प्रभावों से जूझ रहा है. रोजगार सृजन नाममात्र का है, निर्यात कम हो रहा है और विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि नीचे आ गई है। कृषि क्षेत्र को भारी नुकसान हुआ है और ग्रामीण क्षेत्रों में भारी निराशा है। देश के तेज गति से वृद्धि करने के सरकार के भारी-भरकम दावे हवा में उड़ गए हैं। हालिया सामाजिक असंतोष इसी आर्थिक सुस्ती का जीता जागता नतीजा है जिसे सरकार छिपाना चाह रही है। वित्त वर्ष 2015-16 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर आठ प्रतिशत थी जो 2016-17 में 7.1 प्रतिशत पर आ गई। 2017-18 में इसके 6.5 प्रतिशत पर आ जाने का अनुमान है। इससे साबित होता है कि आर्थिक वृद्धि सुस्त पड़ रही है। आर्थिक गतिविधियों और वृद्धि में गिरावट का मतलब लाखों नौकरियां जाना है। जहां जीडीपी वृद्धि के 2016-17 के 7.1 प्रतिशत की तुलना में 2017-18 में 6.5 प्रतिशत पर आने का अनुमान है, वहीं वास्तविक सकल मूल्यवर्धन (जीवीए) के भी 2016-17 के 6.6 प्रतिशत की तुलना में 2017-18 में 6.1 प्रतिशत रहने का अग्रिम अनुमान है। खुदरा महंगाई नवंबर में बढ़कर 15 महीने के उच्चतम स्तर 4.88 प्रतिशत पर पहुंच गई है। औद्योगिक उत्पादन अक्तूबर में गिरकर तीन महीने के निचले स्तर 2.2 प्रतिशत पर आ गया है। निवेश की तस्वीर धुंधली बनी हुई है। विनिर्माण क्षेत्र में सबसे बड़ी गिरावट आई है और राजकोषीय घाटा जीडीपी का 3.2 प्रतिशत रहने के बजटीय अनुमान से आगे निकल जाने की आशंका है। 



...तो देश की आर्थिक स्थिति और किसानों की हालत एक जैसी है। अब आप भगवा रंग से बिल्डिंग पोतते रहें या दलितों को पीटकर ध्यान भटकाने की कोशिश करते रहें, देश का भला नहीं होने वाला। हां, डींगें मारने के लिए सबकुछ है।