Sunday, November 10, 2019

क्योंकि वे मुसलमान थे...

सुनो ऐ अल्लाह वालों...सुनो ऐ मोहम्मद के अनुयायियों सुनो...

आप सभी को ईद मिलादुन नबी बहुत मुबारक हालाँकि मैं खुद 17 रबी उल अव्वल को पैगंबर साहब का जन्मदिन मनाता हूँ। ख़ैर यह कोई मसला नहीं है, जिसका जब दिल करे मनाये।

यह पहली ऐसी मिलादुन नबी है जब आप उदास हैं। हालाँकि आपकी ख़ामोशी ने उन धार्मिक आतंकियों को हरा दिया है, जिनके मंसूबे कुछ और थे।

क्या कोई अदालती फ़ैसला आपका मुस्तकबिल (भविष्य) बदल देगा...

ज़रा अपने हंगामाखेज और गौरवशाली अतीत पर नज़र डालिए...याद कीजिए...

क्या आप भूल गए...जब आपके पास न हवाई जहाज थे, न मिसाइलें थी, ऐसे वक्त में आप अपने घोड़े दौड़ाते हुए रेगिस्तान, पहाड़, नदियों को रौंदते हुए आए और भारत वर्ष पर छा गए। उस वक्त आपके पास गोला बारूद था। आपने धनुष बाण वालों को गोला बारूद का फॉरमूला दिया और बताया कि युद्ध कैसे जीते जाते हैं। आपने ख़ैरात, ज़कात, खुम्स से दूसरों की ग़ुरबत को मिटा दिया। आपने खाने-पीने, जिंदगी जीने का नया हुनर दिया जो तब तक इन मामलों में पिछड़े हुए थे।

आपने यहाँ की धरती को अपना लिया। ख़ून पसीने से सींचने लगे। महल तैयार कर दिये। लाल क़िला खड़ा कर दिया, ताजमहल खड़ा कर दिया, नदियों पर पुल बना डाले, पेशावर तक शेरशाह सूरी मार्ग बना डाला जिसे आज हम गर्व से नैशनल हाईवे के फलाने ढिमाके नंबरों से जानते हैं।...

आप अल्लामा इक़बाल के अशार की उन लाइनों को भूल गए - दश्त तो दश्त हैं दरिया भी न छोड़े हमने, बहरे जुल्मात पर दौड़ा दिये घोड़े हमने..

.आप देवी प्रसाद मिश्र की उस प्रसिद्ध कविता (वो मुसलमान थे) को भी भूल गये।....आपने अशफाकुल्लाह खान और वीर अब्दुल हमीद जैसे अनगिनत सपूत दिये। आपने दो-दो कलाम और ए आर रहमान दिया...

आप भूल गये कि आपने अंग्रेज़ों के खिलाफ इस देश की ख़ातिर युद्ध किया और आपके पुरखों को यहाँ दफ़न करने को दो गज़ ज़मीन भी न मिली...और वो रंगून (म्यांमार) में दफ़न हुए...

...आप के किसी पुरखे ने अंडमान की जेल (कालापानी) से न तो अंग्रेज़ों को माफ़ी वाला ख़त भेजा और न राय बहादुर की पदवी माँगी और न ही किसी ‘गांधी’ नाम को क़त्ल किया। आप भूल गये आपके पुरखों ने यहाँ तक्षशिला के बाद सबसे पहली बड़ी यूनिवर्सिटी (एएमयू) क़ायम की और उसके बाद उसी की तर्ज़ पर हमें बीएचयू भी नसीब हुई। आप मिसाल बन गये- आप बेमिसाल हो गये।

फिर आपकी उदासी का सबब जायज़ नहीं है।

भाजपा के मंदिर राग और कांग्रेस के साफ्ट हिंदुत्व के खेल के बावजूद अगर आप लोग शांत (मुतमइन) हैं तो आप लोगों को इस धैर्य को न खोने देने वाले जज़्बे को कई लाख सलाम...

वोट के लिेए मची जंग का सबसे घिनौना चेहरा अभी आना बाकी है...। वह सब होने वाला है, जिसकी आपने कल्पना नहीं की होगी।...

उनके पास हर तरह की ताक़त है। अब तो अदालत पर भी जज ही सवाल उठा रहे हैं। हर नया दिन साजिशों से शुरू हो रहा है। लेकिन अगर आप लोग किसी उकसावे में नहीं आए तो यक़ीन मानिए बाकी ताक़तें अपने मकसद में नाकाम हो जाएंगी।

अभी आपको शिया-सुन्नी ...अशरफ़-पसमांदा...बरेलवी-देवबंदी-कादियानी-इस्माइली-खोजा-बोहरा, सैयद-पठान जैसे फ़िरक़ों या बिरादरी में बाँटने की हरचंद कोशिशें होंगी।

लेकिन रसूल का पैग़ाम क्या आपको याद है- मैंने अल्लाह की जो किताब तुम लोगों तक पहुँचाई उसमें सिर्फ सामाजिक समानता और सामाजिक न्याय (Social Equality and Social Justice) की बात लिखी गई है। अल्लाह के लिए न कोई अव्वल है न अफ़ज़ल। सब बराबर हैं। आप सिर्फ और सिर्फ अल्लाह के  रसूल की उम्मत समझकर एकजुट रहना है।

अभी जब अयोध्या पर फ़ैसला आया तो देश विरोधी, एकतरफ़ा राष्ट्रवाद को पोषित करने वाली उग्रवादी ताक़तों को उम्मीद थी कि आप लोगों की तरफ से जबरदस्त प्रतिक्रिया होगी और पूरा माहौल बदल जाएगा। लेकिन आप लोगों की प्रतिक्रियाविहीन खामोशी ने उनका ब्लडप्रेशर बढ़ा दिया है । उनकी पूरी रणनीति पर पानी फिर गया। उन्हें आप से ऐसी उम्मीद नहीं थी।...वो बेचैन हैं और एक बिफरा हुआ इंसान सौ गलतियां करता है। आप बस खामोशी से इस तमाशे को देखिए।

इससे  सामने वाले पर इतना फर्क पड़ने वाला है कि उसकी कई पीढ़ियां याद रखेंगी। यही वजह है कि सामने वालों में बहुत बड़ी तादाद में समझदार लोग इसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं। लेकिन उनकी कोई सुन नहीं रहा है। आपको हर हाल में खामोश रहना है। यहां तक कि जो लोग विरोध कर रहे हैं, उनके साथ भी शामिल नहीं होना है। ...आपको घेरने की हर कोशिश नाकाम हो जाएगी...अगर यह खामोशी बरकरार रही। ...यह उस तरफ के समझदार लोगों को सोचने दीजिए कि वो इन ताकतों का मुकाबला कैसे करेंगे।

...दरअसल, वो लोग जातियों में बंटे हुए हैं और उसी हिसाब से वे अपनी रणनीति बनाते हैं। उनकी जातियों के मसले आपके फिरकों से बहुत ज्यादा टेढ़े हैं। उनमें जो दबे कुचले लोग हैं, वो ढुलमुल यकीन हैं। कभी इस तरफ होते हैं तो कभी उस तरफ होते हैं।

आपकी तरक्की का राज कुरानशरीफ में छिपा है।...इल्म हासिल कीजिए। पढ़ा लिखा इंसान बड़ी से बड़ी दुनियावी ताकत को हरा सकता है। मुझे मालूम है कि आपको नौकरियां नहीं मिल रही हैं। लेकिन अगर आपके पास इल्म है और कोई रोजगार करना चाहते हैं तो बाकी लोगों के मुकाबले आप उस रोजगार बेहतर तरीके से कर सकेंगे।

पैगंबर के नाम पर आज से पूरी दुनिया में अगले एक हफ़्ते तक पैगंबर दिवस मनाया जा रहा है। इस दौरान मैं आप लोगों को सुझाव दे रहा हूं कि आप लोग सारी राजनीति से किनारा करते हुए इस दौरान इन चीजों पर अमल करें।...
-पेड़ पौधे लगाएं और लोगों में बांटें
-जिन पेड़ों को पानी न मिल रहा हो, उन्हें पानी से सींचें
-अपने आसपास की सड़कों और नालियों को साफ करें
-इस पोस्ट का ज्यादा से ज्यादा प्रचार करें
-सबील लगाएं और साधन संपन्न लोग गरीबों को जूस पिलाएं
-अपने आसपास रहने वाले गरीबों और जरूरतमंदों की किसी भी रुप में मदद करें
-किसी यतीमखाने (अनाथालय) और ओल्ड ऐज होम (वृद्ध आश्रम) में जाएं
-अस्पताल और जेलों में जाएं
-वहां गरीबों के बीच खाना, कपड़ा, कंबल बांटें
-अगर हैसियत वाले हैं तो व्हीलचेयर, छड़ी या उनके काम आने वाला सामान बांटें
-स्कूलों में शांति मार्च आयोजित करें
-मुफ्त मेडिकल चेकअप कैंप लगाएं...यह पूरी तरह नॉन कमर्शल हो
-रक्तदान शिविर आयोजित करें
-लोगों को सेहत और सफाई के बारे में जागरूक करें
-सरकारी स्कूलों और स्पेशल बच्चों (मूक बधिर) के स्कूलों में जाएं और वहां स्टेशनरी बांटें
-जिनसे संभव हो सके वो स्कॉलरशिप बांटे...यानी कुछ पैसे गरीबों के बच्चों को दें
-पैगंबर की जिंदगी के बारे में स्कूल के बच्चों को बताएं, उनसे सवाल पूछें
-बच्चों को पढ़ाई और उनके करियर के बारे में जागरूक करें
-पैगंबर के कोट्स या चुनिंदा कही बातों का वितरण करें
-अॉटो, रिक्शा, ईरिक्शा, कैब में बैठी सवारियों को कलम बांटें
-पोस्टर चिपकाएं, बैनर चिपकाएं
-शहर में कॉन्फ्रेंस और वर्कशॉप आयोजित करें
-इस पोस्ट का ज्यादा से ज्यादा प्रचार करें

वसीयत....
मैं फिर से ईद-ए-मोबाहिला में कही गई रसूल अल्लाह की वसीयत दोहरा रहा हूं जिसे आप लोग भूलते जा रहे हैं...

-अगर कुरान और मेरे अहलेबैत का दामन थामे रहे तो किसी भी दुनिया में तुम लोगों को शर्मिंदा नहीं होना पड़ेगा...तुम लोग जिंदा कौम की एक बेहतरीन मिसाल हो...अपनी ताकत को पहचानो।...

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Friday, November 8, 2019

मुसलमानों के पास खोने को क्या है...

अयोध्या में राम मंदिर बनेगा या बाबरी मस्जिद को उसकी जगह वापस मिलने का संभावित फ़ैसला आने में अब कुछ घंटे बचे हैं।

सवाल यह है कि अगर फ़ैसला मंदिर के पक्ष में आया तो मुसलमान क्या करेंगे...

मुसलमानों को एक बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि इस सारे मामले में न तो उनका कुछ दाँव पर लगा है और न ही उनके पास कुछ खोने को है। अगर इस मामले में किसी का कुछ दाँव पर लगा है या कुछ खोने को है तो वह हैं दोनों धर्मों के उलेमा, राजनीतिक नेता, उनके दल, महंत, शंकराचार्य, अखाड़ों और बिज़नेसमैन बन चुके बाबा। 

जिस जगह पर विवाद है, वहाँ पाँच सौ साल से विवाद है। अयोध्या में पहने वाले मुसलमानों ने तो वहाँ जाकर एक बार भी नमाज़ पढ़ने की कोशिश नहीं की। फिर बाहरी मुसलमान आज़म खान और अौवैसी ने क्या वहाँ कभी जाकर नमाज़ पढ़ने की कोशिश नहीं की। मेरे वतन के मुसलमान अयोध्या और फ़ैज़ाबाद की मस्जिदों में शांति से नमाज़ पढ़ रहे हैं।

अगर फ़ैसला मस्जिद के पक्ष में भी आ जाता है तो भी अयोध्या में रहने वाले मुसलमान पुरानी जगह पर नमाज़ पढ़ने के लिए नहीं जायेंगे। आज़म या ओवैसी रोज़ाना तो आने से रहे।

इसलिए फ़ैसला जो भी आये, वहाँ मंदिर बनने देना अक़्लमंदी होगी और आप यक़ीन मानिये कि अगर वहाँ मंदिर बना तो इसके नतीजे पूरे भारत के लिए बेहतर होंगे।....इसके बाद यह देश तय कर देगा कि ग़रीबी, बेकारी, भुखमरी, बर्बाद होती खेती के बजाय वह हिंदुत्व का एजेंडा चलने देगा या नहीं।

आपकी आबादी इस देश में महज़ 35 करोड़ है। आप तो जी खा लेंगे। चाहे छोटा काम करके या बड़ा काम करके। आप लोगों के पास हुनर की कमी नहीं है।....आप भी तो तमाशा देखिये कि इस देश का बहुसंख्यक तबक़ा आख़िर कब तक अपने मूल मुद्दों को दरकिनार करके सिर्फ मंदिर बनाकर तरक़्क़ी करना चाहता है।

अगर फ़ैसला आने के बाद बहुसंख्यक समुदाय ख़ुशियाँ मनाता है, आप सिर्फ सब्र रखें। किसी तरह की प्रतिक्रिया या उछलकूद की ज़रूरत नहीं है। आपके ग़ुस्सा करने या चीख़ने चिल्लाने से अदालत का फ़ैसला नहीं बदलेगा।

आपको समझना होगा कि कांग्रेस से लेकर सपा, बसपा, भाजपा ने आपके साथ छल किया है। कुछ उलेमाओं और मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने आपको बहकाया है, आपके जज़्बात के साथ खेला है। यह लंबा विषय है। जिनकी कुछ घटनाओं का मैं भी चश्मदीद हूँ।

बहरहाल, धर्म एक निजी आस्था है। हर एक का मज़हब अच्छा है। ....अगर धर्म के नाम पर किसी देश ने तरक़्क़ी की हो या उस क़ौम ने तरक़्क़ी की हो तो उसका नाम बताइये।...किसी धर्म पुस्तक ने अगर मिसाइल, बम का फ़ॉर्म्युला अपनी किताब में लिखा है तो बताइये। 

पैगंबर साहब और उनके परिवार की हिदायतों पर आपने अमल किया होता तो इतना ज़लील और रुसवा आज नहीं होना पड़ता। आपसे दीन-दुनिया के बीच में बैलेंस बनाने को कहा गया था, अाप नेताओं के बहकावे में आकर सिर्फ दीन से चिपके रहे। अरे भाई दीन आपकी आस्था है, आप उसे इज़्ज़त का सवाल बना रहे हैं। जिसने दीन और किताब भेजी है, वह अपना ख़्याल खुद रखेगा। आपको अल्लाह की ज़रूरत है। उसे आपकी ताक़त से कोई युद्ध नहीं जीतना है। 

क्या आपकी नज़र से वह फोटो और वीडियो नहीं गुज़रा जिसमें मोदी और सऊदी अरब का प्रिंस बिज़नेस डील करते दिखाई दे रहे हैं। खुद को मक्का का कस्टोडियन बताने वाला आले सऊद मोदी के लिए रेड कारपेट बिछा रहा है, मंदिर के लिए ज़मीन दे रहा है।

ख़ैर, कैसा भी फ़ैसला आने पर अगर कहीं कोई उग्रवादी ग्रुप दंगे की शुरुआत करता है या किसी समुदाय को परेशान करता है तो उससे निपटने के लिए सरकार और सरकारी बंदोबस्त है। आपको किसी भी ट्रैप में आने की जरूरत नहीं है। किसी अफवाह को आगे न फैलाने पर डटे रहना है। एक मामूली चिंगारी सब कुछ खाक कर सकती है।...आपका ही घर उस आग में नहीं जलेगा।...

आमतौर पर किसी भी देश में सब कुछ संभालने और सांप्रदायिक सद्भाव बनाये रखने की ज्यादा जिम्मेदारी उस देश के बहुसंख्यक समुदाय की होती है लेकिन आप लोग भी अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते।

भाजपा, संघ, तमाम हिंदूवादी संगठनों, मीडिया और तटस्थ कॉरपोरेट ग्रुप्स के पास यह आखिरी मौका है कि आगे इस देश को क्या दिशा मिलने वाली है।

संविधान की कसम लेकर देश चलाने वाले बहुसंख्यक समाज के नेता अगर ‘प्रभावित करने वालों को’ अपने सत्ताबल और ताकत के दम पर प्रभावित कराना चाहते हैं तो समझिये उनके पास खोने को ज्यादा है।

मंदिर बन गया और मुसलमान चुप रहा तो समझिए आपने उन्हें हरा दिया। आपने एक बड़ी लड़ाई जीत ली। आपकी जीत इसी में है कि बिना किसी बाधा के वहां मंदिर बन जाए और आप उफ भी न करें। आपकी एक चुप्पी सारे निजाम पर भारी पड़ेगी। सारे धार्मिक उग्रवादियों पर भारी पड़ेगी।


आपके सब्र का इम्तेहान शुरू होता है अब...

Wednesday, September 18, 2019

कश्मीर डायरी ः सियासी मसले बुलेट और फौज से नहीं सुलझते....

जम्मू कश्मीर में 5 अगस्त को जब भारत सरकार ने धारा 370 खत्म कर दी और सभी प्रमुख दलों के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया तो उन नेताओं में सीपीएम के राज्य सचिव और कुलगाम से विधायक यूसुफ तारिगामी भी थे। उनकी नजरबंदी को जब  एक महीना हो गया तो सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की कि उनके कश्मीरी नेता यूसुफ तारिगामी की सेहत बहुत खराब है। उन्हें फौरन रिहा किया जाए ताकि उनका इलाज कराया जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ यूसुफ तारिगामी की रिहाई का आदेश दिया बल्कि उन्हें दिल्ली के एम्स में लाकर इलाज कराने का निर्देश भी दिया। यूसुफ तारिगामी एम्स में इलाज के बाद ठीक हो गए और वहां से दिल्ली में ही जम्मू कश्मीर हाउस में चले गए, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में केस अभी लंबित है। मैंने उनसे जाकर वहां कश्मीर के तमाम मसलों पर बात की। जिसे आज नवभारत टाइम्स ने प्रकाशित किया। पूरी बातचीत का मूल पाठ मैं यहां दे रहा हूं लेकिन नीचे एनबीटी में छपी हुई खबर की फोटो ताकि सनद रहे के लिए भी लगाई गई है।....




सियासी मसले बुलेट और फौज से नहीं सुलझते

Yusuf.Kirmani@timesgroup.com
दिल्ली के जम्मू कश्मीर हाउस के कमरा नंबर 103 में कश्मीर के एक नेता से मिलने वालों का तांता लगा हुआ है। वह हर किसी का ‘सलाम-नमस्कार’ ले रहे हैं और यह कहना नहीं भूलते कि आप कश्मीर के एक ‘आजाद नागरिक’ से मिल रहे हैं। ...कल क्या होगा, मैं नहीं जानता हूं। मुझे सुप्रीम कोर्ट ने वहां जाने की इजाजत दे दी है लेकिन मेरी आपसे फिर मुलाकात होगी, मुझे इस बारे में कुछ नहीं पता। हम कैसे और किस पर भरोसा करें। 

यह कमरा 72 साल के सीपीएम नेता और कुलगाम से विधायक यूसुफ तारिगामी का है। उन्हें सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर एम्स लाया गया था, जहां उनका इलाज हुआ और अब वह ठीक होकर जम्मू कश्मीर हाउस में जमे हुए हैं, साथ ही साथ कश्मीर वापस लौटने की तैयारी भी जारी है। लेकिन वह संशकित भी हैं। कश्मीर में एक महीने की नजरबंदी और एम्स में इलाज के बाद किसी पत्रकार को किसी कश्मीरी नेता द्वारा दिया गया यह पहला इंटरव्यू है।
उनसे सीधा सवाल किया गया कि मैं एक कश्मीरी से या फिर एक भारतीय से बात कर रहा हूं, तारिगामी ने जवाब दिया कि आप खास भारतीय हैं जो एक ऐसे भारतीय से बात कर रहे हैं जिसके नागरिक अधिकार छीने जा चुके हैं। कश्मीरी अवाम अब किस हक से खुद को ‘भारतीय’ कहे ?

क्या धारा 370 खत्म करने से कश्मीर की बेहतरी का रास्ता नहीं निकलेगा, उन्होंने कहा कि कोई भी रास्ता बातचीत से निकलता है। वहां आप किससे बात करेंगे? आपने सारे राजनीतिक दलों के नेताओं को नजरबंद कर दिया है। अगर सुप्रीम कोर्ट न होता तो मैं भी वहां पड़ा सड़ रहा होता। पूरा कश्मीर एक बड़ी जेल में तब्दील हो चुका है। भारत सरकार बेहतरी का रास्ता निकालने के लिए किससे बात करेगी। सरकार ने तो उन नेताओं को भी नहीं छोड़ा जो पाकिस्तान के स्टैंड का विरोध करते थे या पाकिस्तान जिन कश्मीरी नेताओं को सख्त नापसंद करता था। कश्मीर से जुड़ा कोई मसला बातचीत किए बिना नहीं सुलझ सकता। सरकार को बातचीत की टेबल पर आना ही होगा। आपको सबसे बातचीत करनी होगी, चाहे वह कोई भी हो। 

यह पूछे जाने पर कि वहां अब उद्योग लगेंगे, कारोबार फैलेगा, कश्मीरियों को फायदा होगा, उन्होंने उल्टा सवाल किया, क्या आप जानते हैं कि श्रीनगर और कश्मीर में अन्य जगहों पर खुले फाइव स्टार और अन्य होटल किनके हैं। इनमें से एक भी होटल का मालिक लोकल कश्मीरी नहीं है। इन होटलों के मालिक दिल्ली और मुंबई में बैठे हैं। पिछले 30 साल से कश्मीर में कोई उद्योग लगाने से सरकार को कौन रोक रहा था। कश्मीर में जब उग्रवाद की समस्या बढ़ी तो वहां के तमाम कारोबारी अपना छोटा बड़ा कारोबार समेट कर जम्मू चले गए, वहां उन्होंने मकान बना लिये लेकिन जम्मू से एक भी कारोबारी श्रीनगर या कहीं और अपना कारोबार फैलाने या मकान बनाने नहीं आया। किसने रोका था। जहां तक कश्मीरी युवकों को नौकरियां देने की बात है, बीजेपी ने चुनाव से पहले वादा किया था कि वह हर साल देश के दो करोड़ युवकों को नौकरियां देगी, सरकार पहले उन दो करोड़ को नौकरी दे दे, फिर कश्मीरी युवकों के बारे में सोचे। जहां इंटरनेट बंद हो, वहां के युवक क्या चांद पर जाकर नौकरी के लिए अप्लाई करेंगे। 

...तो आखिर कश्मीर नामक मर्ज का इलाज क्या है, सीपीएम नेता ने कहा कि जब समस्या पेट दर्द की हो और दवा कान के दर्द की दी जाएगी तो मर्ज बढ़ेगा। जब तक आपको रोग का सही पहचान करना नहीं आएगा, आपसे गलतियां होती रहेंगी। सियासी मसले बुलेट और फौज के दम पर नहीं सुलझ सकते। फौज पर बोझ बढ़ाकर आप कश्मीर समस्या का समाधान नहीं कर सकते। आप कश्मीरी अवाम को अपना तो अपना मानें लेकिन आप तो उन्हें अपनों से दूर कर रहे हैं। इसी लालकिले से कभी मोदी साहब ने कहा था कि हम कश्मीरी लोगों को गले लगायेंगे, क्या इसी तरह गले लगाया जाता है कि आज कोई मां, कोई बाप, कोई बहन नहीं जानती कि उसका बेटा, भाई कहां है? यह बताने में क्या हर्ज है कि अगर किसी युवक को पकड़ा गया है तो उसे कहां रखा गया है, उसका जुर्म क्या है?

पाकिस्तान की लगातार बयानबाजी और मामले को उलझाने के सवाल पर यूसुफ तारिगामी ने कहा, यह मौका उसे किसने दिया। पाकिस्तान की किसी भी सरकार ने कश्मीर मामले में कभी कोई सम्माजनक पहल नहीं की। उसने कश्मीर समस्या को एक टूल की तरह इस्तेमाल किया। इमरान खान को बढ़चढ़ कर बयान देने का मौका भारत सरकार ने दिया। आपको बता दूं कि जो ताकतें कश्मीर से भारत के शांतिपूर्ण रिश्ते की विरोधी रही हैं, जिन्होंने कभी इस रिश्ते को पसंद नहीं किया, उन्हें अचानक मौका ही मौका नजर आने लगा। कुछ ताकते हैं जो इस रिश्ते को कमजोर करना चाहती हैं, वो अपने मकसद में कामयाब होती दिख रही हैं।

क्या चुनाव कराने से शांति बहाली में मदद मिलेगी, इस पर सीपीएम नेता ने कहा कि जब वहां लोकसभा चुनाव कराये जा सकते हैं, जब वहां पंचायत और स्थानीय निकाय (लोकल बॉडीज) चुनाव कराये जा सकते हैं तो विधानसभा चुनाव क्यों नहीं कराये जा सकते। लेकिन सरकार ने विधानसभा तो किसी और मकसद और नीयत से भंग की है। अगर वहां विधानसभा होती तो केंद्र सरकार धारा 370 नहीं खत्म कर पाती।    

यह पूछे जाने पर कि दिल्ली में बैठकर लगता है कि कश्मीर में अमन-चैन लौट आया है, तारिगामी ने कहा कि कश्मीर जैसी बंद जेल से सही खबर बाहर कहां आ पा रही है। कश्मीरियों को जुल्म सहने की आदत पड़ चुकी है। उनके लिए हर दिन पिछले दिन की तरह होता है।  


Saturday, September 14, 2019

एक भाषा के विरोध में


ये अमित शाह को क्या हो गया है...क्या उन्हें देश के भूगोल का ज्ञान नहीं है...

आज सुबह-सुबह बोल पड़े हैं कि एक देश एक #भाषा होनी चाहिए। जो देश एक भाषा नहीं अपनाते वो मिट जाते हैं...

अगर वो - एक देश - तक अपनी बात कहकर चुप रहते तो ठीक था लेकिन जिस देश में हर पांच कोस पर भाषा (बोली) बदल जाती है, वहां एक भाषा लागू करना या थोपने के बारे में सोचना कितना अन्यायपूर्ण है।
हालांकि मैं खुद जबरदस्त हिंदीभाषी हूं और #हिंदी का खाता-बजाता हूं लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि जबरन कोई भाषा किसी पर थोपी जाए।

दक्षिण भारत के तमाम राज्यों के लिए भाषा अस्मिता का प्रश्न है। क्या कोई मलियाली अपनी भाषा की पहचान खोना चाहेगा...

क्या कोई #बंगाली अपनी भाषा पर किसी और भाषा को लादे जाते हुए देखना चाहेगा...
क्या कोई #मराठी, क्या कोई #उड़िया, क्या कोई गारो-खासी, क्या कोई तमिल, क्या कोई गुरमुखी बोलने वाला पंजाबी अपनी भाषा की बजाय हिंदी को प्राथमिकता देना चाहेगा...

दरअसल, यह सब - एक ड्रामा प्रतिदिन - के हिसाब से दिया जाने वाला बयान है। #अमितशाह का कोई बयान बेरोजगारी, गरीबी, किसानों की हालत, गिरती अर्थव्यवस्था पर नहीं आता लेकिन एक भाषा लागू करने के नाम पर जरूर आ जाता है। ...कुछ दिन इस पर बयानबाजी होगी, टीवी एंकर गला फाड़कर राष्ट्रवाद के नाम पर एक भाषा की हिमायत में उतरेंगे। जब लोगों का ध्यान इस मुद्दे से ऊब जाएगा तो फिर किसी और संतरी का नया बयान आ जाएगा।...नया ड्रामा।

कोई अमित शाह से पूछेगा कि उन्होंने अपने बेटे जय शाह को इंग्लिश मीडियम वाले स्कूलों में क्यों पढ़ाया...कोई पूछेगा कि #जयशाह ने बीटेक की डिग्री इंग्लिश मीडियम में क्यों हासिल की...

कोई ताज्जुब नहीं कल को कोई #भाजपाई या #संघी नेता अमित शाह से भी आगे जाकर बयान दे दे कि - एक भाषा, एक देश, एक धर्म...

देश के चिंतन को जब कुछ नेता पशु, धर्म, भाषा पर ही केंद्रित रखना चाहते हैं तो ऐसे में गलती उनकी नहीं है। दरअसल, हमारे आप जैसे अंध भक्त इन हालात के लिए जिम्मेदार हैं। जो बोया है वो काटना तो पड़ेगा ही।


राजनीतिक क्षेत्र में नाकाम हिंदी के कुछ मंचीय #कवि भी आज हिंदी के समर्थन में बयान देते नजर आ रहे हैं। अच्छी बात है लेकिन ये मक्कार मंचीय कवि किसी प्रोग्राम में आने के नाम पर जब पैसे का मुंह खोलते हैं तो इनका भाषा प्रेम और देशप्रेम सब हवा हो जाता है।