Tuesday, September 4, 2018

मुस्लिम ब्रदरहुड से बड़ी चुनौती है आरएसएस की

-विकास नारायण राय, पूर्व आईपीएस

राहुल गाँधी की आरएसएस की मुस्लिम ब्रदरहुड से तुलना सटीक होते हुए भी ऐतिहासिक सतहीपन का शिकार नजर आती है| सबसे पहले, उन्होंने वैश्विक शांति के नजरिये से आकलन में वही गलती की है जो 2013 में मिश्र में मोहम्मद मोरसी की सरकार का तख्ता पलट होने देने में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने की थी| पॉलिटिकल इस्लाम को अरब समाज के लोकतान्त्रिक परिदृश्य से ओझल नहीं किया जा सकता; न पॉलिटिकल हिंदुत्व को भारतीय समाज के!
दूसरे, भारतीय समाज को आरएसएस के खतरे से चेताने के लिए उन्हें देशी जमीन का इस्तेमाल करना चाहिये था क्योंकि आरएसएस विश्व शांति को नहीं भारतीय समाज की शांति को खतरा है| आज मिश्र में ब्रदरहुड के साठ हजार लोग जेलों में हैं जबकि भारत में आरएसएस अपने आप में कानून बना हुआ है; इस लिहाज से आरएसएस कई गुना बड़ी चुनौती कहा जाएगा|

अमेरिका में इसी महीने मिश्र में ब्रदरहुड सत्ता पलट पर न्यूयॉर्क टाइम्स के कैरो में ब्यूरो प्रमुख रहे डेविड किर्कपैट्रिक की किताब ‘इनटू द हैंड्स ऑफ़ द सोल्जर्स’ का प्रकाशन हुआ है| उनकी थीसिस के अनुसार, ब्रदरहुड शासन में अंततः लोकतान्त्रिक और समावेशी होने की संभावना थी| 2013 में मोरसी के पतन से अरब लोगों के हाथ आया हजारों वर्ष की निरंकुशता से निकलने का एक सुनहरा अवसर चला गया|
किर्कपैट्रिक का निष्कर्ष है कि अरब जगत में राजनीतिक सुधार और लोकतंत्र तभी संभव होंगे जब पॉलिटिकल इस्लाम को इस प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाये| अन्यथा, वहां पॉलिटिकल इस्लाम को दूर रखने का एकमात्र रास्ता रह जाएगा कि समाज से लोकतंत्र को ही दूर रखा जाये| परिणामस्वरूप, क्रांति, अतिवाद और शरणार्थी आयाम चलते रहेंगे जिनका खामियाजा पश्चिम पहले की तरह भुगतता रहेगा|

मुस्लिम ब्रदरहुड, अरब जगत में पॉलिटिकल इस्लाम का अपेक्षाकृत लिबरल रूप है और संघ, भारत में पॉलिटिकल हिंदुत्व का फासीवादी रूप। हालाँकि, दोनों इस अर्थ में समान भी हुए कि दोनों ही अतीतजीवी जीवन दृष्टि समाज पर लादते आये हैं| जैसा कि कांग्रेस आईटी सेल प्रमुख दिव्या स्पंदना ने इंगित किया दोनों ही राज्य शक्ति को नियंत्रित करना चाहेंगे और दोनों ही धर्मनिरपेक्षता के विरोधी रहे हैं|

फिर भी, ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में उनके समकालीन प्रभाव को आंकें तो कहना पड़ेगा कि जहाँ संघ का दखल भारतीय समाज को हजार वर्ष पीछे ले जाना चाहेगा वहीं ब्रदरहुड अरब जगत को एक हजार वर्ष के सामाजिक पिछड़ेपन से बाहर आने की दिशा पकड़ने में उत्प्रेरक सिद्ध होगा|

भारत में गोरख, कबीर, नानक, मीरा, राममोहन राय, ज्योतिबा, दयानंद, विवेकानंद, पेरियार, गाँधी और अम्बेडकर के प्रभाव ने पॉलिटिकल हिंदुत्व को दकियानूसी दायरों से आजाद कराया| जबकि अरब जगत को अभी मध्य युगीन शरिया के चंगुल से छूटने का इन्तजार है|

जहाँ आरएसएस की बेलगाम कॉर्पोरेट मुनाफे से दोस्ती जग जाहिर है, मुस्लिम ब्रदरहुड का आर्थिक दर्शन भी नव उदारवादी कॉर्पोरेट नीतियों को इस्लामिक जामा पहनाने में सिद्धहस्त है| क्योंकि इस्लाम में ‘सूद’ हराम है उनके इस्लामिक सिस्टम में इसे ‘मुनाफा’ बता कर हलाल करार दिया जाता है|
अरब स्प्रिंग का बड़ा हिमायती होते हुए भी ओबामा ने मिश्र की सेना को वहां की चुनी हुयी ब्रदरहुड सरकार से सत्ता हथियाने दी तो ब्रदरहुड के प्रति अमेरिका के अविश्वास में, राजशाही, फौज, कठमुल्ला संचालित अरब देशों के सामंती शासन की सहमति शामिल रही होगी| अमेरिकी पूंजी और सैन्य निवेश के भागीदार निरंकुश अरब शासक आइसिस से ब्रदरहुड तक किसी भी ब्रांड के पॉलिटिकल इस्लाम को बर्दाश्त नहीं कर सकते|
भारत के राजनीतिक सन्दर्भ में आरएसएस की मुस्लिम ब्रदरहुड से तुलना को स्वयं कांग्रेस को और गंभीरता से लेने की जरूरत है| वर्तमान परिदृश्य में कालक्रम में तिरोहित हो चुकी इन बातों का क्या महत्व हो सकता है कि दोनों संगठनों की शुरुआत 1920 के दशक में हुयी या दोनों पर कभी प्रतिबन्ध लगा था| महत्व इस विश्वास का होना चाहिये कि भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र होने की नियति से बंधा है जो बदली नहीं जा सकती|
दरअसल, राहुल गाँधी की तुलना से निकली सही चुनौती होगी, भारतीय लोकतंत्र में पॉलिटिकल हिंदुत्व की अनिवार्य उपस्थिति को स्वीकारना| आरएसएस इस उपस्थिति को फासिस्ट रंग देना चाहेगा; इसका मुकाबला जनेऊ दिखाकर नहीं, आरएसएस ब्रांड को लगातार निशाने पर लेकर करना होगा|

Sunday, August 12, 2018

ढोंगी चाय वाले की महानतम खोज...



कुछ सुना आपने...अब हम लोग नाली से निकलने वाली गैस से चाय बना सकते हैं...सुना है कि किसी फलाने देश के ढोंगी चाय वाले ने यह महानतम खोज की है...
...उस देश में इतने मैनहोल हैं, सभी जगह की गैस जमा करके सभी बेरोजगार वहां चाय की दुकान खोल सकते हैं...हर वक्त ताजी गैस मिलेगी और चाय भी शानदार होगी...

मैंने तो फलाने देश के प्रधानमंत्री जी को लिख दिया है कि कृपया इस बार भगवा क़िले की दीवार पर चढ़कर अपने भाषण में नाली से निकलने वाली गैस और उससे बनने वाली चाय के बारे में विस्तार से रौशनी डालें...ताकि फलाने देश के तमाम बेरोजगार इसमें अपने लिए कुछ खोज सकें...

मुझे लगता है कि "पकौड़ा तलो रोजगार योजना" के बाद "नाली गैस की चाय" योजना फलाने देश की अर्थव्यवस्था को और मजबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी...
ताज्जुब है कि गैस पैदा करने वाली देश की तमाम नालियों और मैनहोलों की पुख्ता सुरक्षा का इंतजाम नहीं किया गया है। इसके लिए कम से कम एक कैबिनेट लेवल का मंत्री तो नियुक्त ही किया जाना चाहिए जो देश भर में ऐसी नालियों से निकलने वाली गैस की सुरक्षा संभाल सके।

वह दिन दूर नहीं जब फलाने देश में हर जिला भाजपा अध्यक्ष नाली वाली गैस की चाय का परमिट जारी करने का ठेका प्राप्त कर लेगा...संघ की शाखाएं मैनहोल के पास लगा करेंगी...ध्वज प्रणाम के बाद नाली वाली गैस की चाय पीने से थुलथुल पेट वालों का कब्ज दूर हो जाया करेगा...
फलाने देश के अंबानी-अडानी सरीखे तेल के कुओं की जगह मैनहोल खरीदा करेंगे, ताकि उससे निकलने वाली गैस को बेच सकें।

अच्छा मितरों...ये बताएँ कि क्या ढोंगी चाय वाले ने यह बताया है कि किस नाली या मैनहोल से किस किस तरह के फ़्लेवर की गैस निकलती है। कहीं ऐसा तो नहीं जिस फलाने देश में अडानी सरीखे बिज़नेसमैन ने जो गैस पाइप लाइन बिछाई है कहीं ढोंगी चाय वाले ने उसके गैस की बात नहीं की क्योंकि उसकी पाईपलाइन का ज़्यादातर हिस्सा नालियों के पास से गुज़रता है...मितरों पता कर लेना ज़रा....

बहरहाल, ढोंगी चाय वाले ने क्या अद्भुत आइडिया दिया है...ये कॉरपोरेट वाले इतने बदमाश हैं कि पानी की तरह पैसा बहाकर आम लोगों से इन्नोवेटिव आइडिया पूछते हैं लेकिन ढोंगी चाय वाले का आइडिया लेने को तैयार नहीं हैं।...कम से कम उद्योगपति आनंद महिंद्रा को तो इस पर कुछ सोचना चाहिए जिन्होंने जख्मी जूतों का अस्पताल चलाने वाले की जिंदगी बदल दी...उस मोची का आइडिया ही तो उन्हें क्लिक किया था...नाली से निकलने वाली गैस का आइडिया उस मोची के आइडिया कम जोरदार नहीं है।

डिस्क्लेमर....

यह व्यंग्य किसी व्यक्तिविशेष पर नहीं है। ढोंगी चाय वाला और उसके बँधे हुए ग्राहक तो इसे क़तई दिल पर न लें। मैं सपने में बनारस पहुँच गया था जहाँ गंगा मैया ने बुलवाया था, मैंने लिखा नहीं है क़सम से मुझसे गंगा मैया ने लिखवाया है।




Saturday, June 9, 2018

कोई चिट्ठी से न मारो...मेरे मोदी दीवाने को



अरे बाबा...बड़ा डर लगता है रे...अपने मोदी जी की कुछ सिरफिरे हत्या करना चाहते हैं।...सब मिलकर उनकी सलामती के लिए दुआ करो भाइयों-बहनों...

कौन हैं ये लोग...कोई शहरी नक्सली बताए जाते हैं। ...मतलब शहर में रहने वाले कुछ सिरफिरे हैं जो यह करना चाहते हैं।...पुलिस ने किसी सादे काग़ज़ पर लिखी चिट्ठी बरामद की है जिसमें किसी ने मोदी जी की हत्या के बारे में लिखा है...

मतलब कितने कमअक्ल हैं ये बदमाश की चिट्ठी लिखकर यह बात बताते हैं...बहुत दुर्दिन चल रहे हैं नक्सलियों के...हरामजादों चिट्ठी लिखकर मोदी जी को भला कैसे मारने देंगे हम लोग, तुम लोगों को...जिस देश ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या देखी...इंदिरा गांधी की हत्या देखी...राजीव गांधी की हत्या देखी...न कोई चिट्ठी ...न संदेश...न तारीख़ पर तारीख़...धायं- धायं की और उड़ा दिया...ये कौन बदमाश है जो चिट्ठी लिखकर मोदी जी को मारने चला है...सवा सत्यानाश हो उसका...

अपना मोदी तो सवा सेर है।...पट्ठा खुली जीप में रोडशो करता है।...कश्मीर चला जाता है...जैसे कोई मसीहा आया हो....
सारा प्रोग्राम मीडिया चार दिन पहले बता देता है कि देश का प्रधानसेवक कब ...कहाँ ...कैसे पहुँचने वाला है...और वो दो-तीन हरामखोर या हरामज़ादे शहरी नक्सली सड़े काग़ज़ पर चिट्ठी लिखकर मोदी जी को मारना चाहते हैं...ख़ालाजी का घर है क्या...यह हमारे मोदी जी की सरासर तौहीन है....तुम लोगों को चिट्ठी लिखने के लिए वह सड़ा काग़ज़ मिला था ? पीएम की गरिमा का ज़रा भी ख़्याल नहीं...कहाँ वो अपने परिधान और हर चीज़ का इतना ध्यान रखते हैं और हरामखोरो तुम लोग सड़ा काग़ज़ इस्तेमाल कर रहे हो...इतने बेहतरीन शानदार जुमलेबाज के लिए तुम लोग ढंग की ज़बान में खत भी न लिख सके...

...याद है गोवा की रैली में मोदी जी का वो रोना...ये न हुआ....वो न हुआ तो चौराहे पर जूते मारना...सूली चढ़ा देना...अब जो शख़्स खुलेआम पिटने के लिए घूम रहा हो...सोचो उस बेचारे की हत्या के बारे में सोचना कितना बड़ा महापाप है....वह तो सर्वत्र सुलभ है बदमाशों...छी शर्म आती है तुम पर शहरी नक्सलियों...इतने अच्छे अच्छे जुमले बोलने वाले के लिए तुमने ऐसा सोचा...सचमुच बहुत नीच हो तुम लोग... 

सुना है शहरी नक्सली तो बहुत पढ़े लिखे लोग होते हैं...फिर यह ग़लती किसने की... इतना घटिया काग़ज़ चुनने और ज़बान इस्तेमाल करने की...अरे नक्सलियों की कोई कमिटी जाँच करके बताओ रे...किसको सूझी थी यह शरारत...क्या किसी में न थी चिट्ठी लिखने की महारत...अब देखना पुलिस कैसे लाएगी तुम लोगों में हरारत...

अरे तुम से अच्छा तो बहराइच के जरवल क़स्बे का वो मौजीलाल है जो बिना बताए ....चिट्ठी लिखे इलाहाबाद बैंक जा पहुँचा और आग लगाने लगा... जानते हो क्यों...इसलिए की मोदी जी ने उसके खाते में 15 लाख रूपये नहीं भेजे....उसने चेतावनी देकर आग लगाने की कोशिश की....पुलिस ने उसे ग्रामीण नक्सली तक नहीं कहा...बस मंदबुद्धि यानी दिव्यांग बता डाला...सोचो मेरे देशप्रेमियों....शहरी नक्सलियों ....जो मोदी जी से 15 लाख माँगे वह मंदबुद्धि का और जो सड़े काग़ज़ पर लिखकर धमकी दे वो शहरी नक्सली....तुम सब घोंघाबसंत हो ...

मौजीलाल .....तु्म्हारे बहाने तुम्हारे  पिता रामबालक का नाम भी रौशन हो गया ....तुम एक जुमले पर यक़ीन कर 15 लाख माँगने चले आए...मौजीलाल न तो शहरी नक्सली है न ग्रामीण नक्सली...जो एक जुमले के सहारे बैठा है और तुम लोग सड़े हुए काग़ज़ पर हमारे मोदी जी की हत्या के बारे में लिखते हो...तुम्हें सात जन्म लेने पड़ेंगे मोदी जी तक पहुँचने में...मौजीलाल तुम भारत हो...तुम मौज करो...15 लाख का इंतज़ार करो... 

Friday, May 11, 2018

क्या मोदी ने जानबूझकर भगत सिंह के बारे में झूठ बोला


हम यह मानने को तैयार नहीं कि भारत के प्रधानमंत्री के पास पीएमओ में लाइब्रेरी नहीं होगी, रिसर्चर नहीं होंगे और उनको भाषण के लिए इनपुट न दिए जाते होंगे। ...लगता यही है कि  मोदी की ऐसी कोई मजबूरी है जो उनसे शहीदे आज़म भगत सिंह और अन्य के बारे में जानबूझकर झूठे तथ्य बुलवा रही है ताकि उस झूठ को सच बताकर स्थापित किया जा सके। वरना मोदी से इतनी बड़ी ग़लती नामुमकिन है।

एक झूठ को सच साबित करने के लिए अगर कुछ बड़े लोग मिलकर झूठ बोलने लगें तो काफ़ी लोगों को वह झूठ सच लगने लगता है। बड़े लोगों का झूठ इतनी नफ़ासत से सामने आता है कि तथ्यों से बेख़बर लोग उसे सच मान लेते हैं। आररएसएस इसी नीति पर काम कर रहा है। बतौर प्रधानमंत्री मोदी जब बार बार ऐतिहासिक तथ्यों पर झूठ बोलेंगे तो लोग उसी झूठ को सच मानने लगेंगे। क्योंकि उनसे भारत का सामान्य मानवी ऐसी उम्मीद नहीं कर सकता। पीएमओ के बारे में मैं बहुत नज़दीक से जानता हूँ। वहाँ हर सूचना मात्र एक क्लिक पर उपलब्ध रहती है। हर चीज़ के एक्सपर्ट पीएमओ से जुड़े हुए हैं।  यह कैसे संभव है कि पीएम कुछ भी अंट शंट बोलने से पहले ऐतिहासिक जानकारियों की पुष्टि न करते हों। ज़रूर उन्हें किसी मजबूरी के तहत ऐतिहासिक तथ्यों पर झूठ बोलना पड़ रहा है। ऐसी ग़लती एकाध बार होती तो ठीक था लेकिन बार बार ग़लती की जाए तो उसके पीछे रणनीति ही होती है। 

हालाँकि मोदी जब पहली बार बनारस से अपना नामांकन करने गए थे और बोला था कि यहाँ मैं आया नहीं हूँ बल्कि गंगा मैया ने मुझे बुलाया था। तभी मुझे शक हुआ था कि यह प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देख रहे हैं और बात आस्था या अंधविश्वास की कर रहे हैं। लेकिन मैंने कोई टिप्पणी नहीं की। मैं तब चुप रहा लेकिन जब उन्होंने साइंस कांग्रेस में गणेश जी की प्लास्टिक सर्जरी पर अपना बहुमूल्य ज्ञान दिया तो शंकाएं बढ़ गईं। लेकिन जब यह सिलसिला आम हो गया तो लगा कि ज़रूर यह नागपुर यूनिवर्सिटी के सत्य को स्थापित करने की चाल है।

लेकिन क्या हम इसे मोदी की मजबूरी मानें या ऐतिहासिक भूल या ऐतिहासिक ग़लती मानें कि वह लगातार वही बोल रहे हैं जो संघ चाहता है। शायद उन्हें जिन्ना के प्रशंसक आडवाणी के साथ संघ का बरताव याद आता हो और वह उसी डर में ऐतिहासिक ग़लती कर बैठते हों। जिन दिनों संघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को अपना मुखौटा बता रहे थे उन्हीं दिनों हरियाणा भाजपा से संबंधित दिग्गज नेता मंगलसेन ने मुझसे कहा था कि क्या आप विश्वास करेंगे कि अटल जी का मूल चरित्र सेकुलर है। वह पार्टी की बैठकों में भी दिखता है लेकिन हमारे पास उनसे बड़ा चेहरा नहीं है, इसलिए संघ को बहरहाल उन्हें बर्दाश्त करना पड़ता है।

मोदी और भगवा ब्रिगेड वालों के भाषणों और करतबों से एक बात तो यह अच्छी हुई कि युवा पीढ़ी थोड़ा बहुत ही सही इतिहास टटोलने लगी। इससे यह आसानी होगी कि भगवा कल्चर को लेकर लोगों में उम्मीदों का जो रोशनदान खुला था वह बंद हो जाएगा। अब जैसे कल ही मोदी ने जब इस साल का सबसे बड़ा झूठ बोला कि शहीदे आज़म भगत सिंह जब जेल में थे तो उनसे मिलने कोई कांग्रेसी जेल में नहीं गया। ...कल से लेकर आज सुबह तक तमाम युवक भगत सिंह पर तमाम बातें पढ़ रहे हैं कि जवाहर लाल नेहरू ने कब मुलाक़ात की...कब गांधी जी ने सज़ा माफ़ कराने के लिए पत्र लिखा...कब जिन्ना और अरूणा आसिफ़ अली ने कोर्ट में उनकी पैरवी की। ...

अब लोग मोदी के बारे में इन तथ्यों के पढ़ने के बाद क्या राय बनाएँगे...इसे मोदी से बेहतर और कौन जान सकता है।...अब यह साफ़ होता जा रहा है कि एक साज़िश के तहत भगत सिंह, आंबेडकर, गांधी जी, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, जिन्ना समेत तमाम लोगों के ख़िलाफ़ जानबूझकर झूठ फैलाया जा रहा है ताकि नई पीढ़ी में यह बैठाया जा सके कि भारत की आज़ादी की लड़ाई संघियों ने लड़ी थी न कि कांग्रेसियों और हर मज़हब के लोगों ने। 

जिन्ना के मामले में भी यही हुआ। नई पीढ़ी जिन्ना के बारे में ज़रा भी नहीं जानती लेकिन आज देश के हर बड़े छोटे आदमी की ज़बान पर मोदी के बाद जिन्ना का नाम आ रहा है। पता नहीं यह साज़िश है या क्या... खुद बीजेपी सासंद सावित्री बाई ने जिन्ना को महान शख़्सियत बता डाला। जिस शख़्स ने देश के दो टुकड़े करा दिए उसे महान बताने वाले मुझे कांग्रेस में नहीं, भाजपा में मिले। पहले आडवाणी और अब सावित्री बाई फुले। 

हमारे कुछ दलित चिंतक पिछले दिनों जिन्ना को लेकर परेशान रहे। उनकी चिंता यह नहीं थी कि कुछ भगवा गुंडे एएमयू में मौजूद पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी पर हमला करने आए थे। चिंतक यह बताते रहे कि जिन्ना की तस्वीर वहाँ से निकालकर प्रधानमंत्री को भेज दी जाए। संघ भी यही चाहता है कि वहाँ से जिन्ना की तस्वीर ही हट जाए। हमारा सरोकार पसेमंदा समाज से आने वाले हामिद अंसारी की चिंता नहीं है बल्कि जिन्ना है। यानी संघ जो चाहता है वही दलित चिंतक भी चाहते हैं। 

डर यही है कि ये दलित चिंतक राज्यसभा वग़ैरह में पहुँचने के लिए कहीं आंबेडकर को पुराना स्वयंसेवक न बता दें। ख़ैर यह डर है लेकिन दलित चिंतकों को जब तब संघ का मोहरा बनने से परहेज़ करते रहना चाहिए।