Wednesday, April 25, 2018

आसाराम और हम भगवा भक्त


...मेरे जैसे बेचारे कई लोग कल सुबह से हवन में लगे थे...पता नहीं कैसा हवन था...भगवान नहीं पसीजे...जज के ज़रिए बता दिया कि यह बाबा नहीं बलात्कारी है...धर्म पर संकट भारी है। कितना क्रूर है भगवान ....रामरहीम से लेकर आसाराम तक सब भगवान की ब्रैंडिंग करते आए लेकिन भगवान पसीजा नहीं।...फ़ैसला सुना दिया...

भगवा भक्तों पर तरस आता है। सारे भगवा आईटी सेल में नहीं हैं। कुछ बेरोज़गार हैं। कुछ छोटी मोटी नौकरी करते हैं लेकिन मोई जी, भगवा और धर्म को बचाने के लिए इंटरनेट पर दस बीस रूपया रोज़ ख़र्च करते हैं। इंटरनेट पर हवन हो सकता तो वो भी कर डालते...

मुझे याद आ रहे हैं वो दृश्य जिनमें कभी जम्मू कश्मीर का मुख्यमंत्री रहा अय्याश शख़्स, कोमा में जा चुका एक कवि और नेता, कभी गुजरात में महिलाओं की जासूसी के लिए मशहूर हुआ शख़्स, अब मार्गदर्शक मंडल की शोभा बढ़ा रहा पूर्व लौह पुरूष इस आसाराम का हौसला बढ़ाने पहुँचते थे।...दोनों हाथ जोड़े इन नेताओं की आत्मा तब नहीं कचोटती थी कि इस ढोंगी बाबा के आश्रम के कोने में कोई लड़की अपनी इज़्ज़त लुटाने के बाद सिसक रही होगी।

गुजरात की भक्त महिलाओं को सेक्स पावर की दवा बाँटने वाले इस बाबा की कृपा के लिए नेताओं को मैंने तरसते देखा...आख़िर उन्हें एक ढोंगी बाबा में ऐसा क्या दिखता था जो उनके दोनों हाथ हर समय सेवाभाव में जुड़े रहते थे।... लेकिन एक बात के लिए इस बाबा की तारीफ़ करनी होगी कि इसके पास भी नेताओं की अनगिनत सीडी थी...इसके आश्रम के फ़ाइव स्टार सरीखे कमरों के फ़ोटोग्राफ़...सब कुछ इसके पास था लेकिन बेचारे ने कभी इस्तेमाल नहीं किया।

घिन आती है ऐसे बाबाओं से जिनके लाखों करोड़ों भक्त हों और वह किसी नाबालिग़ बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाए...आख़िर कौन हैं वह महिलाएँ...कैसा उनका दिल था जो इसके लिए उन बच्चियों को बहकाकर लाती थीं।...आप किसी भी धर्म को मानने वाले हों लेकिन इतना कॉमनसेंस तो होना ही चाहिए कि अगर किसी बाबा पर नोटों की बारिश हो रही हो तो वह ज़रूर किसी ग़लत धंधे में शामिल होगा...आप बाबा के आसपास जुटने वाली भीड़ और सारी चकाचौंध देखकर बौरा (बौड़ा) जाते हैं।...

बाबा हमें बार बार धोखा दे रहे हैं लेकिन हम लोग हार मानने को तैयार नहीं हैं।....हमारी आँखों पर पट्टी बंधी हुई है। ...योग सिखाते सिखाते घी, तेल, नमक, साबुन बेचने वाला बाबा लोगों को सरेआम मूर्ख बना रहा है...खुलेआम टैक्स चोरी कर रहा है लेकिन हम लोग उसके दीवाने होते जा रहे हैं...एक और बाबा जो यमुना के किनारों और अदालत के फ़ैसलों को अपने पैरों तले मसल देता है वह हमें ज़िंदगी जीने का ढंग बता रहा है और हम लोग टकटकी बाँधे उसके बेतुके प्रवचन सुनते रहते हैं। 
उस दिन का इंतज़ार है जब इन सब के धंधे खुलेंगे तब ये मत कहना कि पहले क्यों नहीं बताया?  

आपका धर्म आपको सही तरह से गाइड करने के लिए काफ़ी है...कोई बहुरूपिया बाबा आपके धर्म की आड़ में आपको क्यों नियंत्रित करे।

Reference:

Asaram sentenced to life imprisonment

The Jodhpur court on Wednesday convicted Asaram, besides three of the five co-accused, in a five-year-old case of raping a minor. Pronouncing the verdict inside the Jodhpur jail, amid tight security, the court held the self-styled godman guilty of assaulting and outraging the modesty of a 16-year-old woman who, at the time of the incident, was a student at one of Asaram’s ashrams in Chhindwara, Madhya Pradesh. The incident allegedly took place on the night on August 15, 2013, at another #Asaram ashram in Manai area near Jodhpur.


Thursday, April 12, 2018

बुरे समय की कविताएं और उपवास का नाटक



।।बुरे समय की कविताएं।।

(एक)

छिपता है राम की ओट मे बलात्कारी
हत्यारा कंधे पर हाथ रखे करता है अट्टहास
घायल कबूतर का लहू सूखता जाता है माथे पर
लुटेरा तूणीर से निकलता है तीर और सर खुजाता है

मूर्तियों के समय में कितने निरीह हो तुम राम
और कितने मुफ़ीद

(दो)

तिरंगा उसके हाथों मे कसमसाता है
रथ पर निःशंक फहराता है भगवा
एक पवित्र नारा बदलता है अश्लील गाली में
और ढेर सारा ताज़ा ख़ून नालियों का रंग बदल देता है

इन नालियों के कीट
तुम्हारे राष्ट्र की पहचान हैं अब

(तीन)

लड़की की उम्र आठ साल
देह पर अनगिनत चोटों के निशान
योनि से बहता ख़ून
कपड़े फटे
आँखें फटीं

प्रतिवाद करता है हत्यारा
लेकिन उसका नाम तो आसिफा है न!

(चार)

भूखी है जनता आधी
आधी की देह पर धूल के कपड़े
आधी जनता पिटती है रोज़
आधी बिना अपराध जेल में
आधी की इज़्ज़त न कोई न कोई घर
आधी जनता उदास है

बाक़ी आधी जनता की ख़ुशी के लिए
बस इतना काफी है।

-अशोक कुमार पाण्डेय

अब मेरी बात
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तुम लोगों का उपवास वाक़ई एक नाटक है क्योंकि तुम लोग

उन्नाव के रेप और कठुआ की बेटी के रेप में फ़र्क़ कर रहे हो।

रेप का केस दर्ज होने पर आरोपी की गिरफ़्तारी सामान्य बात है लेकिन यूपी के डीजीपी ने आज सुबह कहा कि मामला सीबीआई को सौंपा जा रहा है इसलिए उन्नाव के विधायक को गिरफ़्तार नहीं किया जा रहा। अब सीबीआई देखेगी। ... योगी सरकार और यूपी पुलिस के लिए आख़िर निंदा का कौन सा शब्द इस्तेमाल किया जाए।...

जिस प्रदेश में अपराध के मद्देनज़र नही बल्कि अपराधी के जाति और धर्म के नाम पर दंड तय किया जा रहा हो...भाजपा और संघ के तमाम अनुशासनप्रिय लोगों को चूल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए।

अगर आज भी भाजपा विधायक की गिरफ़्तारी नहीं होती है तो यूपी में सभी विपक्षी दलों को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जहाँ कहीं भी हों उनका घेराव तब तक करना चाहिए जब तक वह पुलिस को अपने विधायक की गिरफ़्तारी का आदेश न दे दें।

कठुआ में जिस बेटी के साथ मंदिर में रेप कर ज़मीन पर पटक कर मार डाला गया...उस पर पूरा भारत चुप है। उसका नाम आसिफा है और इस अपराध को भी मज़हब की कसौटी पर कसा जा रहा है। आसिफा के बलात्कारियों का समर्थन करने वाले वक़ीलों को ज़रा भी शर्म नहीं आई।
कितनी सड़ी हुई जेहनियत के साथ ऐसे लोग इस पेशे में उतरते हैं। यह एक मिसाल है।

उन्नाव और कठुआ इतनी दूर हैं कि निर्भया के पैरोकारों को दिल्ली में मामूली प्रोटेस्ट करने का भी दिल नहीं किया। क्या भारत इसी संघी मानसिकता के साथ जीना चाहता है ????  क्या आप हम सब ...गर्व से इंसान कहलाने लायक हैं...

Monday, April 9, 2018

दलित संघ और भाजपा की चाल समझें

दलित नेतृत्व आक्रामक क्यों नहीं हो रहा

यह दिलचस्प है कि मीडिया के न चाहने के बावजूद दलित मुद्दा ख़बरों के केंद्र में आ गया है...लेकिन दलित नेतृत्व अभी भी उतना आक्रामक नहीं हो पाया है जितना उसे होना चाहिए...मसलन भाजपा के तमाम नेता उन दलित  सांसदों को अवसरवादी बता रहे हैं, जिन्होंने पिछले एक हफ़्ते में दलित उत्पीड़न के ख़िलाफ़ बयान दिया है। इन नेताओं की हिम्मत तभी बढ़ी जब उसने दलित नेतृत्व को आक्रामक नहीं पाया।

इस चाल को समझना होगा
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भाजपा सांसद Udit Raj को इस सिलसिले में पहल करनी चाहिए। उन्हें चाहिए कि वह भाजपा के अंदर बाकी दलित सांसदों के साथ एक प्रेशर ग्रुप बना दें। अपनी माँगें स्पष्ट रखें और न मानी जाने पर पार्टी में विद्रोह करें। उदितराज ने कई लड़ाइयाँ लड़ी हैं। एक और सही। यह बहुत साफ़ है कि भाजपा में दलितों को वह नेतृत्व या सम्मान नहीं मिलने वाला जो कांग्रेस या बसपा में है। 

भाजपा के दलित सांसदों व बाक़ी नेताओं को समझना होगा कि आरएसएस और भाजपा धीरे धीरे उस तरफ़ बढ़ रहे हैं जब वह आरक्षण को ख़त्म कर देंगे। उसके पहले वह अपनी पार्टी में मूक दलित नेताओं की जमात खड़ी कर देना चाहते हैं जो आरक्षण ख़त्म किए जाने पर उसका समर्थन करें। भाजपा को दलितों के मुद्दे पर बड़े पैमाने पर शाहनवाज़ हुसैन और मुख़्तार अब्बास नकवी चाहिए।...

कहाँ गए वो लोग
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भाजपा में एक आरिफ़ बेग भी शोभा बढ़ाते थे...उनका कद भाजपा ने कहाँ तक पहुँचाया कोई बता सकता है? 2016 में उनका निधन हो गया। बेचारे को भाजपा ने बयान दिलवाने के लिए ख़ूब इस्तेमाल किया। सिकंदर बख्त का क्या हुआ...उन्हें भी भाजपा या संघ ने कभी आडवाणी, उमा भारती या मुरली मनोहर जोशी के क़द के बराबर पहुँचने नहीं दिया । ...और तो और सिकंदर बख्त और आरिफ़ बेग कभी भी सपा के आज़म खान और कांग्रेस के ग़ुलाम नबी आज़ाद के लेवल तक भी नहीं पहुँच पाए। इस बार तो उन्हें राज्यसभा तक में नहीं भेजा गया। जिस पार्टी ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को ही मुखौटा माना और कहा हो उसमें दलित सांसदों या दलित नेताओं की दाल भला कहाँ गलने वाली ?


अभी भी बन सकते हैं किंगमेकर
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वापस दलितों पर आते हैं। संघ और भाजपा नेतृत्व में दलितों का एक लेवल तय है। उसके आगे वह नहीं जा सकते। कल्पना कीजिए कि संघ का नेतृत्व क्या कभी कोई दलित या मुसलमान कर पाएगा। कैडर आधारित बाकी पार्टियों का अध्ययन करें तो आपको दलितों के संबंध में तमाम बयान लफ़्फ़ाज़ी लगने लगेंगे। कांशीराम ने बहुत सोचसमझकर बहुजन समाज पार्टी का ताना बाना बुना था। उनके मरने के बाद मायावती के रूप में दलित नेतृत्व भ्रष्टाचार की तरफ़ नहीं बढ़ता तो आज दलित नेतृत्व भारतीय राजनीति का किंगमेकर होता।

लेकिन गेम अभी हाथ से निकला नहीं है। दलित नेतृत्व को हर तरह की क़ुर्बानी देकर संघ और भाजपा को रोकने के लिए लंबी रणनीति के तहत काम करना चाहिए। दलित, अति पिछड़े और मुसलमान मिलकर भारत की राजनीति का रूख मोड़ने की हैसियत रखते हैं। यह गठजोड़ अभी भी किंगमेकर बन सकता है। मायावती को चाहिए कि भाजपा से जो दलित सांसद बाहर निकलना चाहते हैं उनको मौक़ा दें। उन्हें टिकट देने के वादे के साथ पार्टी में शामिल करें। मायावती का अखिलेश के साथ जो समझौता हुआ है उस पर अब और आगे पहल करने की ज़रूरत है। दोनों पार्टियों की एक कमिटी बनाकर सीट शेयर, एडजस्टमेंट की बात अभी से आगे बढ़ाई जाए। एक साल तैयारियों के लिए कम है। जब तक दोनों पार्टियाँ यूपी में  एक एक लोकसभा सीट को चुनौती के रूप में स्वीकार नहीं करेंगी और प्रभावी रणनीति के साथ सामने नहीं आतीं तब तक भाजपा और कांग्रेस से मुक़ाबला आसान नहीं होगा।

यूपी ही है मैदान-ए-जंग

मायावती और अखिलेश को समझना होगा कि अगले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश ही जंग का मैदान बनेगा। यूपी में कानून व्यवस्था की हालत बिगड़ चुकी है।योगी आदित्यनाथ प्रभावशाली मुख्यमंत्री साबित नहीं हो सके। भाजपा विधायकों पर रेप के आरोप लग रहे हैं। उन्नाव की घटना दहलाने वाली है। इतनी प्रचंड बहुमत सेजीती भाजपा को विधायकों के विद्रोह का डर सता रहा है। गोसंरक्षण से ऊबे भाजपा विधायक और नेता गुंडागर्दी पर उतर आए हैं। जो बदमाश भाजपा की छतरी केनीचे नहीं उसका एनकाउंटर। जो बदमाश मुस्लिम वोटरों को फूलपुर में रोकने के लिए चुनाव लड़ ले उसके हिस्ट्रीशीटर भाई को इलाक़े में छूट मिल जाती है। यह सारी स्थितियाँ मायावती और अखिलेश के लिए अनुकूल हालात पैदा कर रहे हैं। लेकिन हालात को कैश कराने का माद्दा भी तो होना चाहिए।

Tuesday, March 20, 2018

देश में दलालों की जुगलबंदी


भारतीय लोगों की दुनिया रिलायंस की मुट्ठी में कैद हो चुकी है...
देश की संसद में जो तमाशा चल रहा है, उसके लिए कहीं न कहीं जनता भी जिम्मेदार है। वरना मीडिया की औकात नहीं है कि वह आपको सही जानकारी न दे। यानी अगर आप लोग खबरों वाले चैनल देखना, न्यूज वेबसाइट पर जाना और कुछ अखबार पढ़ना बंद कर दें तो मीडिया ने भारत सरकार से दलाली की जो जुगलबंदी कर रखी है, वह बेनकाब हो जाएगी।
विपक्षी पार्टियां लोकसभा में मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दे रही हैं और स्पीकर सुमित्रा महाजन तरह-तरह के बहाने लेकर प्रस्ताव का रखा जाना रोक रही हैं। क्योंकि प्रस्ताव पर बहस होनी है, सभी दलों को बोलने का मौका मिलेगा, सरकार और भाजपा इससे भाग रहे हैं।
पिछले हफ्ते यह प्रस्ताव लाया गया था, तब संसद में होहल्ले का बहाना बनाया गया। सोमवार यानी कल खुद भाजपा ने जयललिता की पार्टी एआईडीएमके के साथ मिलकर हल्ला मचवा दिया। सुमित्रा महाजन को बहाना मिल गया। फिर से अविश्वास प्रस्ताव का रखा जाना रोक दिया गया...सोमवार को लोकसभा में जबरन मचाया जा रहा शोर इस बात की गवाही दे रहा था कि वह प्रायोजित शोर है और सिर्फ अविश्वास प्रस्ताव रोकने के लिए ऐसा किया जा रहा है।
किसी भी मीडिया ने सरकार की इस हरकत पर चर्चा करने की जरूरत नहीं समझी। लेकिन जनता भी तो वही चाहती है। जनता की जागरूकता की कमी की वजह से देश में ऐसा मीडिया तंत्र खड़ा हो गया है जो अंततः जनता के मूल अधिकारों के खिलाफ ही जा रहा है। जबकि मीडिया का पूरा मायाजाल सिर्फ और सिर्फ आपके टीवी देखने, अॉनलाइन खबरों को देखने और कुछ अखबार पढ़ने के दम पर खड़ा किया गया है। अगर आप अपनी यह आदत छोड़ दें तो मीडिया की औकात सामने आ जाएगी। लेकिन आप लोग ऐसा करने वाले नहीं हैं और यह मीडिया आने वाले समय में आपको और भी ज्यादा नियंत्रित करने वाला है। न आपको सही सूचनाएं मिलेंगी और न आप खबरों के पीछे चलने वाले खेल जान सकेंगे। कॉरपोरेट नियंत्रित मीडिया की मर्जी से आप न तो कुछ देख पाएंगे और न पढ़ पाएंगे।

रिलायंस का खेल देखो
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अंबानी खानदान ने आज रिलायंस बिग टीवी का अॉफर लॉन्च किया है। यह काफी उत्तेजक है। आपको रिलायंस सिर्फ 500 रुपये में पूरे साल डीटीएच (डायरेक्ट टू होम) के जरिए सारे चैनल दिखाएगा। शुरुआत में जो हजार या बारह सौ रुपये लिए जाएंगे वो भी आपको तीन साल बाद वापस मिल जाएंगे या एडजस्ट कर लिए जाएंगे। रिलायंस बिग टीवी छोटे अंबानी यानी अनिल अंबानी का है। बड़ा अंबानी यानी मुकेश अंबानी भी इस क्षेत्र में कूदने की तैयारी कर रहा है या फिर भाई की कंपनी को ही खरीद लेगा।
आप इस खेल को समझ पा रहे हैं या नहीं ...

चलिए समझते हैं। सारे चैनल को लगभग मुफ्त में मुकेश और अनिल मिलकर दिखाएंगे। सारे न्यूज चैनलों में दोनों भाइयों में से किसी न किसी के शेयर हैं। मुकेश करीब सौ से ज्यादा चैनलों के सीधे मालिक हैं। अब अगर किसी न्यूज चैनल को मार्केट में खुद को बने रहना है या चाहता है कि उसे देखा जाए तो उसे अंबानी बंधु में से किसी एक की छतरी के नीचे आना होगा। ...आप जिन कुछ चैनलों को बहुत अच्छा मानते हैं या बेहतर मानते हैं, उन तक में अंबानी बंधुओं के शेयर हैं। यह खबर पुरानी है, फिर भी याददाश्त में जिंदा रखने के लिए दोहरा देते हैं कि टीवी 18 ग्रुप को किस तरह मुकेश अंबानी ग्रुप ने खरीदा और रातोंरात 700 पत्रकारों की नौकरी चली गई। कई सारे चैनल मार्केट में जिंदा रहने के लिए रिलायंस से लोन तक ले लेते हैं।

हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप जो बिड़ला घराने का इतना बड़ा साम्राज्य है। जिसे उनकी बेटी शोभना भरतिया चलाती हैं। इस ग्रुप तक में रिलायंस की हिस्सेदारी हो चुकी है।
इसका नतीजा यह निकलेगा कि टाटा स्काई, एयरटेल जैसे डीटीएच खत्म हो जाएंगे या फिर मार्केट में उनकी हिस्सेदारी कम हो जाएगी। जी न्यूज वालों का डिश टीवी में इतनी औकात नहीं कि वह रिलायंस से टकरा सके। रिलायंस से कोई भी टकरा नहीं पाएगा, कम से कम मौजूदा सरकार के रहते हुए।
रिलायंस जियो इंटरनेट डेटा सस्ता करके आपको 24 घंटे व्यस्त रखने का इंतजाम पहले ही कर चुका है। आप घर में हों या रास्ते में हों...बस हरदम रिलायंस द्वारा नियंत्रित कंटेंट के कब्जे में कब्जे में रहेंगे। जब शैतान किसी का यह हाल कर देता है तो जो वह चाहता है, आपको वही करना पड़ेगा। जो सूचना वह देगा, उसी पर आपको यकीन करना पड़ेगा। भारत में अब जो विदेशी कंपनी इस क्षेत्र में उतरेगी, वह भी बिना रिलायंस की मर्जी के कुछ नहीं कर सकेगी। भारतीय लोगों की दुनिया रिलायंस की मुट्ठी में कैद हो चुकी है।

क्या आपको यह सूचना मिली
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क्या आप लोगों को पता है कि अबकी बार आप लोगों ने जो सरकार चुनी थी, उसने संसद में हाल ही में फाइनैंस बिल चुपचाप पास करा लिया। एक भी राजनीतिक दल ने इसका विरोध नहीं किया। जब देश तीन लोकसभा चुनाव नतीजों की बहस में उलझा हुआ था, तभी इस हरकत को अंजाम दिया गया।
इस हरकत को बहुत घिनौने ढंग से अंजाम दिया गया। इस जानकारी को मैं गिरीश मालवीय जी की कलम से साझा कर रहा हूं...
फाइनैंस बिल द्वारा विदेशी अंशदान (नियमन) अधिनियम (एफसीआरए) 2010 में संशोधन किया गया है यह अधिनियम राजनीतिक दलों को विदेशी कंपनियों द्वारा मिले चंदे पर रोक लगाता है। वैसे तो भारत सरकार ने वित्त विधेयक 2016 के जरिए एफसीआरए में संशोधन कर राजनीतिक दलों के लिए विदेशी चंदा लेने को आसान बनाया था लेकिन अब ताजा संशोधन के बाद पार्टियों को 1976 से मिले विदेशी चंदे की जांच की कोई गुंजाइश नहीं रह जाएगी। 

ध्यान दीजिएगा 1976 से , यानी इससे बीते 42 वर्ष में राजनीतिक दलों को हुई तमाम विदेशी फंडिंग वैध हो गई है।

कानून की भाषा मे इसे भूतलक्षी प्रभाव से किया गया संशोधन कहा जाता है इस तरह के संशोधन की अनुमति बहुत विषम परिस्थितियों में ही दी जानी चाहिए। 

इस तरह के रेयर किस्म के प्रावधान को लागू क्यो करना पड़ा ?
2017 की शुरुआत में गैर-सरकारी संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने एक याचिका दिल्ली हाईकोर्ट में दायर की। याचिका में एडीआर ने केंद्र सरकार पर अदालत की अवमानना करने का आरोप लगाया।
दरअसल 2014 में दिल्ली हाई कोर्ट ने पाया था कि भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों ने ब्रिटेन स्थित कंपनी वेदांता रिसोर्सेज की भारतीय सहायक कंपनियों से चंदा लेकर फॉरेन कॉन्ट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (एफसीआरए) का उल्लंघन किया था। 
एफसीआरए की धारा-4 राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों पर विदेशों से चंदा लेने पर रोक लगाती है। उस वक्त दिल्ली हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग और केंद्रीय गृह मंत्रालय को छह महीने के भीतर कांग्रेस और भाजपा दोनों के खातों की जांच करने और उन पर कार्रवाई करने का आदेश दिया था। लेकिन न तो चुनाव आयोग ने कुछ किया और न ही गृहमंत्रालय द्वारा कोई कदम उठाया गया।
जुलाई 2017 में एडीआर की याचिका पर कार्यवाही करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार के रवैए पर सवाल उठाया। अदालत ने पूछा कि आखिर केंद्र सरकार इस मामले में कोई कदम क्यों नहीं उठाना चाहती.सरकार ने उस वक्त अदालत में दलील दी थी कि उसे रिकॉर्ड खंगालने के लिए 31 मार्च 2018 तक का वक्त दिया जाए।
अदालत ने 8 अक्टूबर 2017 मामले में कार्रवाई करने के लिए केंद्र को आखिरी छह हफ्ते का समय दिया था लेकिन यह छह हफ़्तों की अवधि यानी लगभग डेढ़ महीना तो दिसम्बर 2017 में ही खत्म हो गयी थी।
तो सवाल उठता है कि उसके बाद अदालत ने क्या किया ? बहुत ढूंढने पर भी जवाब तो नही मिला पर यह जरूर मालूम पड़ा कि दिल्ली हाई कोर्ट की कार्यवाहक चीफ जस्टिस गीता मित्तल जो जस्टिस सी हरिशंकर के साथ मिलकर यह मुकदमा सुन रही थीं, उन्हें केंद्र सरकार ने 8 मार्च 2018 को नारी शक्ति पुरस्कार से नवाज दिया।