Saturday, January 5, 2019

अलीबाबा के जैक मा की बातें और अपना देश भारत...

यहां मैं आप लोगों के लिए एक विडियो पोस्ट कर रहा हूं जो पूरा देखने के बाद आपको सोचने को मजबूर कर देगा। हालांकि उसमें कही बातों को मैं अपनी बात के साथ आप लोगों के पढ़ने के लिए यहां दे रहा हूं। लेकिन हो सकता है कि अनुवाद में कुछ कमियां हों, इसलिए अगर आप पूरा विडियो देखेंगे तो ज्यादा बेहतर होगा।

दुनिया की बड़ी कंपनियों में गिनी जाने वाली अलीबाबा (Alibaba) के मालिक जैक मा (Jack Ma) को हाल ही में हॉगकॉग यूनिवर्सिटी ने पीएचडी से नवाजा है। इस मौके पर जैक मा ने जो बातें कहीं हैं, उसका संबंध भारत से या किसी भी देश से जुड़ता है।...
जैक मा कहते हैं...
तमाम नाकामियों की वजह से मैं यही सोचता था कि कभी मुझे पीएचडी की डिग्री किसी यूनिवर्सिटी से मिलेगी। यह मेरा सपना था। लेकिन मैं हिम्मत नहीं हारा। एक दिन ऐसा भी आता है जब कोई यूनिवर्सिटी आपको पीएचडी की डिग्री देने को बेताब होती है...
एक अच्छा बिजनेसमैन सिर्फ पैसा कमाना ही नहीं जानता, बल्कि उस पैसे को अच्छी तरह खर्च करना भी जानता है। लेकिन हम सिर्फ पैसा कमाने के लिए जिंदा नहीं रहते।...अगर आपके पास 10 लाख डॉलर हैं, वो आपका पैसा है...जब आपके पास 10 लाख डॉलर होते हैं, दरअसल, तब समस्या खड़ी होती है।...लेकिन जब आपके पास 100 लाख डॉलर होते हैं तो आपको मान लेना चाहिए कि वो आपका पैसा नहीं है।...यह पैसा उस सोसायटी का विश्वास होता है जो पैसे के रूप में आपके पास पहुंचा है। सोसायटी या लोग आपको पैसा इसलिए देते हैं कि उन्हें यकीन है कि वो पैसा आप ठीक से खर्च करेंगे।...असली बिजनेसमैन वही है जो उस पैसे का इस्तेमाल दूसरों की सामाजिक समस्याओं को खत्म करने के लिए करता है। यानी वह ऐसे काम करता है, जिसका फायदा सोसायटी को मिलता है।

(फिर वह विषय बदलते हैं) वह कहते हैं...
मुझे लगता है कि तमाम बड़ी चुनौतियों के बीच सबसे बड़ी चुनौती शिक्षा के क्षेत्र में है। तमाम बड़ी बड़ी यूनिवर्सटियां इसका सामना कर रही हैं।...हमने अपने बच्चों को पिछले 200 सालों में यही पढ़ाया है कि मशीनें बहुत अच्छा करेंगी। यानी बड़ी बड़ी मशीनों के अविष्कार हमने अपनी जरूरतों के लिए किया।...लेकिन अब हमें सोचना होगा कि हम अपने बच्चों को भविष्य के लिए तैयार करने के लिए उन्हें ऐसा क्या पढ़ाएं...मुझे लगता है कि हमें अपने बच्चों को पढ़ाना चाहिए कि वो मशीनों पर कैसे जीत हासिल करें...ना कि मशीनें उन पर हावी हो जाएं या जीत हासिल कर लें।...क्योंकि मशीनों में तो चिप लगी होती है लेकिन इंसान के पास तो दिल है।...
इसलिए हमें अब एजुकेशन सिस्टम को बदलना होगा। भविष्य जानकारी (Knowledge) रखने की प्रतियोगिता का नहीं है। ...भविष्य कुछ सृजन (Creativity) करने और कल्पनाशीलता (Imagination) का है। ...भविष्य की प्रतियोगिता कुछ सीखने और स्वतंत्र सोचने की है।...लेकिन अगर आप एक मशीन की तरह सोचेंगे तो समस्या पैदा होगी।...पिछले 20 वर्षों में हमने इंसान को मशीन बना दिया है।..इसलिए भविष्य जानकारी (Knowledge Driven) रखने वालों का नहीं बल्कि बुद्धिमत्ता पूर्ण (Wisdom Driven) लोगों का होगा... यह अनुभवी लोगों का होगा... जबकि अतीत में यह जानकारी रखने वालों और निर्माण करने (Manufacturing Driven) वालों का था।...भविष्य सृजन करने (Creativity Driven) वालों का है। ...दुनिया इसी पर खुद को केंद्रित करने वाली है।

मेरी बात...
जैक मा ने जितनी बातें कहीं हैं, उन पर हम भारतीय संदर्भों में लंबी चौड़ी बातें कर सकते हैं।...लेकिन संक्षेप में कुछ बातें तो की ही जानी चाहिए।...आप लोग जैक मा की शुरू में कही गई बातों पर गौर करिए - वह कहते हैं कि जो अथाह पैसा आपके पास आया है, वह आपको सोसायटी ने दिया है। सोसायटी आपको इस पैसे को सही से खर्च करने के यकीन के साथ देती है...
मैं आपको यहां पर मुकेश अंबानी की बेटी की शादी में खर्च किए 110 करोड़ रुपये (Bloomberg के मुताबिक) का उदाहरण देना चाहूंगा।...मुकेश अंबानी की कंपनियों ने जो भी पैसे कमाए...वह सारे पैसे भारतीय लोगों से यानी हम लोगों से कमाए गए पैसे हैं। हम लोगों ने वो पैसा उन्हें चाहे जियो (Jio) के फोन और सिम खरीद कर दिया हो या विमल शूटिंग (Reliance Industries) के कपड़े खरीद कर दिया हो या उनके पेट्रोल पंप से पेट्रोल खरीद कर दिया हो या उनकी कंपनियों के शेयर खरीद कर दिया हो...लेकिन अंबानी के पास पैसा भारत के लोगों का है।...उस शख्स ने हमारे दिए गए पैसे में से 110 करोड़ रुपये अपनी बेटी की शादी पर खर्च कर दिए।...जैक मा यही कहते हैं कि आप देश के लोगों से अथाह पैसा लेने के बाद आप उस सोसायटी या देश के लिए जवाबदेह हो जाते हैं।...देश के लोगों ने आप पर यकीन किया है। आप उस पैसे को समाज पर खर्च कीजिए...उस यकीन को मत तोड़िए।...लेकिन मुकेश अंबानी की कंपनियों ने जनता को निचोड़ने के बाद जो पैसा अपने मालिक को दिया...उस पैसे में से वह एक शादी में 110 करोड़ उड़ा देता है...वह उस पैसे से एक देश की सरकार को चलाता है। उसके पैसे से राजनीतिक दल पाले-पोसे जाते हैं।...
सोसायटी का यकीन पैसे के रूप में अंबानी को मिला...अंबानी खानदान ने उस पैसे से पूरी सत्ता खरीद ली...अब वो किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है।

एक शादी विप्रो (Wipro) कंपनी के मालिक अजीम प्रेमजी ने भी की। अपने बेटे की शादी में उन्होंने कार्ड पर साफ लिखा था कि आपको दूल्हा-दूल्हन को कोई गिफ्ट वगैरह देने की जरूरत नहीं है। आप जो कुछ देना चाहते हैं वह इस एनजीओ को दें, वह देश में लड़कियों का 250 स्कूल खोलने जा रही है। सारा पैसा उसी में लगाया जाना है। करीब 250 करोड़ रुपये उस एनजीओ को मिले। ...यह सारा रेकॉर्ड भारत सरकार के पास है, और वह हैरानी से अजीम प्रेम जी द्वारा की गई कोशिश का अध्ययन कर रही है कि क्या ऐसा भी हो सकता है। जैक मा जो कहना चाहते हैं उस मानक पर अजीम प्रेमजी पूरी तरह खरे उतरे और मुकेश अंबानी....। दोनों ही सफल बिजनेसमैन हैं। लेकिन दोनों की सोसायटी के प्रति जवाबदेही देखने लायक है...

जैक मा की अब अगली बात पर आते हैं। जिसमें उन्होंने नॉलेज और क्रिएटिविटी की तुलना की है और कहा है कि भविष्य क्रिएटिविटी का है। मसलन, यह एक क्रिएटिविटी है, जिसके तहत मैं आपको यह लेख पढ़ा रहा हूं। मैंने जैक मा के संदर्भ में यह लेख लिखा और आपको पढ़ाने की कोशिश कर रहा हूं। यह क्रिएटिविटी मैं सोसायटी के लिए कर रहा हूं ताकि इससे समाज में सकारात्मक या अच्छे विचारों का आदान-प्रदान हो। लेकिन जैक मा ने जो सबसे बड़ी बात इसमें कही वो यह कि पिछले 20 साल में हम लोगों ने इंसान को मशीन बना दिया है। ...जैक मा कहना चाहते हैं कि जबसे इंसान मशीन बना है, उसकी क्रिएटिविटी खत्म होती जा रही है। आइंस्टीन ने अपना फॉर्म्युला बम बनाने के लिए नहीं दिया था...उसे हिरोशिमा नागासकी पर गिराकर कई इंसानी नस्लें खत्म करने के लिए नहीं दिया था...ऐसे तमाम अविष्कार या फॉर्म्युले हैं जिन्होंने इंसानों को मशीनों का गुलाम बना दिया है।...उन्होंने एक बात अनुभव के संदर्भ में भी कही है कि भविष्य अनुभवी लोगों का भी होगा।...लेकिन आज हम लोग क्या देख रहे हैं कि नॉलेज की कीमत तो है लेकिन अनुभव की कीमत खत्म कर दी गई है। अनुभव पर नॉलेज को तरजीह दी जा रही है लेकिन एक अनुभवी आदमी ही नॉलेज का सही इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन अनुभवहीन की नॉलेज खतरनाक रूप ले लेती है। अनुभवहीनता की वजह से नॉलेज होते हुए भी तमाम बड़ी गलतियां सामने आती हैं। 
बहरहाल, जैक मा से आप सहमत हों या न हों...लेकिन उनकी इन बातों पर नाराज तो नहीं होंगे ना। 

#Alibaba
#JackMa
#MukeshAmbani
#Reliance
#MoneyVsHuman













Wednesday, December 26, 2018

2019 में कौन जीतेगा - धर्म या किसान...


 नवभारत टाइम्स (एनबीटी) में आज 26 दिसंबर 2018 को प्रकाशित मेरा लेख...

आजकल 2019 का अजेंडा तय किया जा रहा है। हर चुनाव से पहले यह होता है। लेकिन इस बार एक बात नई है। इस बार अजेंडा ‘धर्म बनाम किसान’ हो गया है जबकि इससे पहले भारत में चुनाव गरीबी हटाओ, भ्रष्टाचार, आरक्षण, दलितों-अल्पसंख्यकों की कथित तुष्टिकरण नीति, पाकिस्तान और सीआईए से खतरे के नाम पर लड़ा जाता रहा है। किसानों की बात भी हर चुनाव में की जाती है लेकिन उनका जिक्र सारी पार्टियां सरसरी तौर पर करती रही हैं। इस बार परिदृश्य बदला हुआ है। केंद्र सरकार के खिलाफ विपक्ष की कथित एकजुटता की तेज चर्चा के बावजूद अगले आम चुनाव का एक जमीनी अजेंडा भी अभी से बनने लगा है।

समय की कमी
2014 में केंद्र में नई सरकार बनने के बाद देश भर के किसान संगठन दो साल तक हालात का आकलन करते रहे। लेकिन 2016 से वे बार-बार दिल्ली और मुंबई का दरवाजा खटखटा रहे हैं कि हमारी बात सुनो। 2016 में सबसे पहले तमिलनाडु के किसान जंतर मंतर पर आए। उसके बाद मध्य प्रदेश के किसान संगठन दिल्ली आए। किसानों की शक्ल से भी अपरिचित मुंबई ने पिछले डेढ़ वर्षों में थोड़े ही अंतर से किसानों के दो बड़े जुलूस देखे और बांहें फैलाकर उनका स्वागत किया। अक्टूबर 2018 में पश्चिमी यूपी के संपन्न किसान भारतीय किसान यूनियन के बैनर तले दिल्ली पहुंचे। फिर 29-30 नवंबर को तमाम वामपंथी संगठन छोटे किसानों और खेतिहर मजदूरों को लेकर दिल्ली आए। इनकी आमद से किसानों का मुद्दा सत्ता के केंद्र में आ गया।



तीन राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों ने सत्ता संभालने के 24 घंटे के अंदर अपने-अपने यहां किसानों के कर्ज माफ करने की घोषणा कर दी। ऐन लोकसभा चुनाव से पहले के इस घटनाक्रम से किसानों का मुद्दा सभी राजनीतिक दलों के लिए खास हो गया है। बीजेपी ने अपनी नीतियों पर फिर से विचार शुरू कर दिया है। किसानों के मुद्दे को लेकर पार्टी में तमाम धर्मसंकट हैं। बीजेपी के रणनीतिकारों ने केंद्र सरकार को किसानों के लिए सरकारी खजाना खोलने जैसी बात कही है। लेकिन सरकार के पास इतना कम वक्त बचा है कि अगर वह योजनाओं की झड़ी लगा दे तो भी उनके क्रियान्वयन के लिए समय कब मिलेगा? किसान योजनाओं की घोषणा नहीं, उन पर अमल चाहता है।

बीजेपी के मुकाबले कांग्रेस और वामपंथी दलों ने किसानों के मुद्दों की सबसे ज्यादा मार्केंटिंग की है। हालांकि केंद्र की सत्ता में सबसे ज्यादा दिनों तक रहने के बावजूद कांग्रेस किसानों को मजबूत आधार नहीं दे सकी। मेट्रो, मारुति कार और कंप्यूटर तो कांग्रेस ले आई लेकिन किसानों के लिए ऐसी योजना नहीं ला सकी, जिसके लिए उसे याद रखा जा सके। मनरेगा के नतीजे अच्छे रहे थे लेकिन उसे यादगार योजना की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। यूपीए सरकार की एकमुश्त कर्जमाफी के बावजूद पंजाब-महाराष्ट्र में किसान कर्ज की वजह से खुदकुशी करते रहे। अभी कांग्रेस शासित तीन राज्यों में कर्ज माफी का कितना वास्तविक फायदा किसानों तक पहुंचेगा, इसका पता कुछ समय बाद चलेगा। लेकिन कांग्रेस के इस ऐक्शन से किसानों का मुद्दा मुखर जरूर हुआ है।

बीजेपी ने किसानों के मुद्दे पर कांग्रेस की गलतियों से कुछ भी नहीं सीखा। वह नेहरू, इंदिरा, राजीव, सोनिया, मनमोहन और राहुल गांधी को निशाना बनाती रही। इसके बजाय उसने खेती-किसानी को लेकर कांग्रेस की गलतियां सुधारने पर फोकस किया होता तो आज तस्वीर कुछ और होती। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 में बीजेपी ने किसानों से कर्जमाफी का वादा किया था। प्रचंड बहुमत पाकर योगी आदित्यनाथ ने कुर्सी संभाली तो उन्होंने अपना वादा पूरा भी किया। उन्होंने 11 लाख 93 हजार 224 छोटे और मंझोले किसानों का 7371 करोड़ रुपये का कर्ज माफ कर दिया। लेकिन कर्जमाफी की यह सुनहरी तस्वीर सिर्फ कागजों पर है। हकीकत में इसकी पात्रता को इतना तकनीकी बना दिया गया कि कहीं किसानों के दस रुपये कर्ज के रूप में माफ हुए, कहीं सौ रुपये तो कहीं पांच सौ रुपये। यूपी के विभिन्न विभागों में किसानों की नौ लाख अर्जियां कर्जमाफी को लेकर लंबित हैं।

बीजेपी को लगता है कि अयोध्या में मंदिर बनाने के लिए जगह-जगह जो धर्म संसद आयोजित की जा रही है, चुनाव में उसका बेड़ा इसी से पार हो जाएगा। किसान उसकी प्राथमिकता नहीं है। उसे लगता है कि धर्म एक ऐसा मुद्दा है जिस पर किसान भी अपनी खेती-वेती भूलकर पिघल जाएंगे। बीजेपी राष्ट्रीय स्वयंसेवक की राजनीतिक इकाई है। उसके अलावा संघ के ढेरों आनुषंगिक संगठन हैं, जिनके अजेंडे पर इस वक्त मंदिर के लिए धर्म संसद का आयोजन मुख्य विषय है। इसकी कमान विश्व हिंदू परिषद के पास है। 2016 से ही किसानों के मुद्दे के समानांतर मंदिर का मुद्दा सरगर्म है। अगर कोई घटनाक्रम का बारीकी से अध्ययन करे तो पाएगा कि जब-जब किसानों के बड़े प्रदर्शन हुए, तब-तब धर्म संसद आयोजित करके मंदिर के लिए हुंकार भरी गई।

दो ही विकल्प
दिल्ली के रामलीला मैदान में नवंबर में हुई धर्म संसद में आए कुछ युवकों से एक टीवी चैनल के पत्रकार ने पूछा कि उनके लिए रोटी-रोजी और किसान बड़ा मुद्दा है या अयोध्या में मंदिर। उन युवकों ने पूरे होशोहवास में जवाब दिया था कि मंदिर उनके लिए सबसे बड़ा मुद्दा है- ‘रोटी-रोजी आती रहेगी, पहले हमें मंदिर चाहिए।’ धर्म संसद का सिलसिला केंद्र में सत्ता मिलने के बाद ही शुरू हो गया था। आज देश के हर बड़े शहर में धर्म संसद का आयोजन हो रहा है। जाहिर है, चुनाव तक मंदिर निर्माण बड़ा मुद्दा बना रहेगा। अगले लोकसभा चुनाव में देश के सामने दो ही विकल्प होंगे कि उसे धर्म प्यारा है या किसान। ठहरकर सोचें तो धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय है जबकि किसान एक बड़े सरोकार से जुड़ता है। 2019 में तय करना होगा कि आप किस ओर खड़े हैं?


Sunday, December 9, 2018

इतिहासकार रामचंद्र गुहा को इस विवाद से क्या मिला...


इस प्रसिद्ध इतिहासकार का मेरे दिल में बहुत सम्मान है। उनके विचारों का मैं आदर करता हूं। लेकिन बीफ खाने वाला उनका ट्वीट और फोटो निहायत गैरजरूरी था। क्योंकि आप क्या खाते हैं, इससे शेष भारत को क्या लेना देना...और एक बड़े वर्ग की भावनाएं इस पर आहत होती हैं तो उन्हें ऐसा करने से परहेज करना चाहिए था। 

लेकिन संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों ने उन्हें जिस तरह जान से मारने की धमकी दे डाली, वह भी निंदनीय है।
हद यह है कि रॉ (रिसर्च एनॉलिसिस विंग) के एक रिटायर्ड अधिकारी तक ने उन्हें धमकी दी। बुलंदशहर हिंसा में एक फौजी का नाम आने के बाद और अब गुहा को धमकी देने में रॉ के पूर्व अधिकारी का नाम आने के बाद इन सेवाओं में काम करने वालों को लेकर चिंता पैदा होना स्वाभाविक है। अगर इन सेवाओं में कार्यरत लोग धर्म, जाति के आधार पर इस तरह की घटनाओं में हिस्सा लेंगे तो भारतीय समाज के लिए चिंताजनक स्थिति है। 

इतिहासकार गुहा ने शनिवार को अपने गोवा प्रवास का एक फोटो ट्विटर पर शेयर किया जिसमें वह बीफ (गाय का मांस) खाते नजर आ रहे हैं। साथ ही उन्होंने लिखा कि भाजपा शासित राज्य में बीफ खाना जश्न मनाने जैसा है। गुहा दरअसल यह बताना चाहते हैं कि भाजपा की दुरंगी चाल देखो...एक तरफ वह उत्तर भारत के राज्यों में गोकशी का खुलकर न सिर्फ विरोध करती है बल्कि आरएसएस के जरिए अपने अनुषांगिक संगठनों को आगे करके प्रदर्शन भी कराती है। आरोप है कि इस दौरान हिंसा भी होती है जो अन्तत: हिंदू-मुस्लिम दंगे में बदल जाती है। 

 ...जाहिर है इसका विरोध होना ही था। सोशल मीडिया पर भाजपा आईटी सेल के लोग हाथ धोकर उनके पीछे पड़ गए। रॉ के एक पूर्व अधिकारी ने गुहा को धमकियां दीं। गुहा साहब ने रविवार को अपना वो फोटो और ट्वीट डिलीट कर दिया। मेरे पास उसका स्क्रीन शॉट है लेकिन मैं उसे दोबारा पोस्ट करना जरूरी नहीं समझता हूं। लेकिन गुहा साहब से यह सवाल जरूर है कि अगर आपने डर कर ऐसा किया तो शेष भारत और खासकर मानसिकता विशेष के लोगों को शर्म महसूस करना चाहिए।...लेकिन जब आपको मालूम था कि इस पर हंगामा हो सकता है और ऐसी स्थितियां आ सकती थीं तो ट्वीट और फोटो के बजाय बीफ खाकर और गोवा के फाइव स्टार होटल में हग कर चले आते। उसके प्रचार की जरूरत क्या थी।

...मेरा वोट भाजपा को जाएगा...
मेरी मांग है कि देशभर में बीफ खाने पर पाबंदी लगनी चाहिए। ...मेरी इस मांग को सिर्फ और सिर्फ भाजपा पूरा कर सकती है। अगर वह अगले चुनाव में अपने घोषणापत्र में इसकी घोषणा करती है कि दोबारा सत्ता में आने पर वह पूरे देश में बीफ खाने और गोकशी बंद करने का कानून पास करेगी, तो मेरा और मेरे परिवार का वोट भाजपा को जाएगा।  

Monday, November 19, 2018

यौन शुचिता के मिथकों को ध्वस्त करती है 'देह ही देश'....जेएनयू में परिचर्चा


 'देह ही देश' को एक डायरी समझना भूल होगा। इसमें दो सामानांतर डायरियां हैं, पहली वह जिसमें पूर्वी यूरोप की स्त्रियों के साथ हुई ट्रेजडी दर्ज है और दूसरी में भारत है। यह वह भारत है जहाँ स्त्रियों के साथ लगातार मोलस्ट्रेशन होता है और उसे दर्ज करने की कोई कार्रवाई नहीं होती। सुप्रसिद्ध पत्रकार और सी एस डी एस के भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक अभय कुमार दुबे ने  कहा कि हमारे देश में मोलस्ट्रेशन की विकृतियों की भीषण अभियक्तियाँ निश्चय ही चौंकाने और डराने वाली हैं, जिनकी तरफ हमारा ध्यान 'देह ही देश' को पढ़ते हुए जाता है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र में "कड़ियाँ" संस्था द्वारा क्रोएशिया प्रवास पर आधारित प्रो. गरिमा श्रीवास्तव की पुस्तक "देह ही देश " पर आयोजित परिचर्चा में प्रो दुबे ने हिंसा और बलात्कार की घटनाओं पर वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर प्रसारित करने को भीषण सामाजिक विकृति बताया।


परिचर्चा में हिन्दू कालेज के डॉ पल्लव ने कहा कि यह पुस्तक संस्मरण, डायरी, रिपोर्ताज, यात्रा आख्यान और स्मृति के अंकन का मंजुल सहकार है। उन्होंने इसे यौन शुचिता के मिथकों को ध्वस्त करने वाली जरूरी किताब बताते हुए कहा कि शुद्धता की उन्मादी प्रवृत्ति के विरुद्ध 'देह ही देश' में नये जमाने की स्त्री की छटपटाहट है। 



राजधानी कॉलेज के डॉ राजीव रंजन गिरि ने कहा कि युद्ध इतिहास और कालखंड में तो समाप्त हो जाते हैं लेकिन भोगने वाले के चेतन और अवचेतन मन मे ताउम्र बना रहता है। उन्होंने कहा कि एक प्रकार के कट्टर राष्ट्रवाद की अवधारणा बढ़ती जा रही है जिसके फलस्वरूप युद्ध नीति के तौर पर बलात्कार की नीति को बढ़ावा मिल रहा है। सुप्रसिद्ध पत्रकार भाषा सिंह ने अपने कहा कि "देह ही देश" सुलगते सच से साक्षात्कार कराती है और युद्ध तथा उन्माद के इस समय में अपने शीर्षक को सार्थक करती है  



परिचर्चा में भारतीय भाषा केंद्र के अध्यक्ष प्रो. गोविंद प्रसाद, प्रो. रमण प्रसाद सिन्हा , प्रो. राजेश पासवान सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी और शोधार्थी मौजूद थे  आयोजन के अंत में श्रोताओं के सवालों के जवाब भी वक्ताओं द्वारा दिए गए। ज्ञातव्य है कि राजपाल एंड सन्ज़ द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक 2018 की बेस्ट सेलर साबित  हुई है।  कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी बृजेश यादव ने किया। अंत मे एम द्वितीय वर्ष  के छात्र चंचल कुमार ने सभी का आभार व्यक्त किया






फोटो और रिपोर्ट - चंचल कुमार