Wednesday, September 18, 2019

कश्मीर डायरी ः सियासी मसले बुलेट और फौज से नहीं सुलझते....

जम्मू कश्मीर में 5 अगस्त को जब भारत सरकार ने धारा 370 खत्म कर दी और सभी प्रमुख दलों के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया तो उन नेताओं में सीपीएम के राज्य सचिव और कुलगाम से विधायक यूसुफ तारिगामी भी थे। उनकी नजरबंदी को जब  एक महीना हो गया तो सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की कि उनके कश्मीरी नेता यूसुफ तारिगामी की सेहत बहुत खराब है। उन्हें फौरन रिहा किया जाए ताकि उनका इलाज कराया जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ यूसुफ तारिगामी की रिहाई का आदेश दिया बल्कि उन्हें दिल्ली के एम्स में लाकर इलाज कराने का निर्देश भी दिया। यूसुफ तारिगामी एम्स में इलाज के बाद ठीक हो गए और वहां से दिल्ली में ही जम्मू कश्मीर हाउस में चले गए, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में केस अभी लंबित है। मैंने उनसे जाकर वहां कश्मीर के तमाम मसलों पर बात की। जिसे आज नवभारत टाइम्स ने प्रकाशित किया। पूरी बातचीत का मूल पाठ मैं यहां दे रहा हूं लेकिन नीचे एनबीटी में छपी हुई खबर की फोटो ताकि सनद रहे के लिए भी लगाई गई है।....




सियासी मसले बुलेट और फौज से नहीं सुलझते

Yusuf.Kirmani@timesgroup.com
दिल्ली के जम्मू कश्मीर हाउस के कमरा नंबर 103 में कश्मीर के एक नेता से मिलने वालों का तांता लगा हुआ है। वह हर किसी का ‘सलाम-नमस्कार’ ले रहे हैं और यह कहना नहीं भूलते कि आप कश्मीर के एक ‘आजाद नागरिक’ से मिल रहे हैं। ...कल क्या होगा, मैं नहीं जानता हूं। मुझे सुप्रीम कोर्ट ने वहां जाने की इजाजत दे दी है लेकिन मेरी आपसे फिर मुलाकात होगी, मुझे इस बारे में कुछ नहीं पता। हम कैसे और किस पर भरोसा करें। 

यह कमरा 72 साल के सीपीएम नेता और कुलगाम से विधायक यूसुफ तारिगामी का है। उन्हें सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर एम्स लाया गया था, जहां उनका इलाज हुआ और अब वह ठीक होकर जम्मू कश्मीर हाउस में जमे हुए हैं, साथ ही साथ कश्मीर वापस लौटने की तैयारी भी जारी है। लेकिन वह संशकित भी हैं। कश्मीर में एक महीने की नजरबंदी और एम्स में इलाज के बाद किसी पत्रकार को किसी कश्मीरी नेता द्वारा दिया गया यह पहला इंटरव्यू है।
उनसे सीधा सवाल किया गया कि मैं एक कश्मीरी से या फिर एक भारतीय से बात कर रहा हूं, तारिगामी ने जवाब दिया कि आप खास भारतीय हैं जो एक ऐसे भारतीय से बात कर रहे हैं जिसके नागरिक अधिकार छीने जा चुके हैं। कश्मीरी अवाम अब किस हक से खुद को ‘भारतीय’ कहे ?

क्या धारा 370 खत्म करने से कश्मीर की बेहतरी का रास्ता नहीं निकलेगा, उन्होंने कहा कि कोई भी रास्ता बातचीत से निकलता है। वहां आप किससे बात करेंगे? आपने सारे राजनीतिक दलों के नेताओं को नजरबंद कर दिया है। अगर सुप्रीम कोर्ट न होता तो मैं भी वहां पड़ा सड़ रहा होता। पूरा कश्मीर एक बड़ी जेल में तब्दील हो चुका है। भारत सरकार बेहतरी का रास्ता निकालने के लिए किससे बात करेगी। सरकार ने तो उन नेताओं को भी नहीं छोड़ा जो पाकिस्तान के स्टैंड का विरोध करते थे या पाकिस्तान जिन कश्मीरी नेताओं को सख्त नापसंद करता था। कश्मीर से जुड़ा कोई मसला बातचीत किए बिना नहीं सुलझ सकता। सरकार को बातचीत की टेबल पर आना ही होगा। आपको सबसे बातचीत करनी होगी, चाहे वह कोई भी हो। 

यह पूछे जाने पर कि वहां अब उद्योग लगेंगे, कारोबार फैलेगा, कश्मीरियों को फायदा होगा, उन्होंने उल्टा सवाल किया, क्या आप जानते हैं कि श्रीनगर और कश्मीर में अन्य जगहों पर खुले फाइव स्टार और अन्य होटल किनके हैं। इनमें से एक भी होटल का मालिक लोकल कश्मीरी नहीं है। इन होटलों के मालिक दिल्ली और मुंबई में बैठे हैं। पिछले 30 साल से कश्मीर में कोई उद्योग लगाने से सरकार को कौन रोक रहा था। कश्मीर में जब उग्रवाद की समस्या बढ़ी तो वहां के तमाम कारोबारी अपना छोटा बड़ा कारोबार समेट कर जम्मू चले गए, वहां उन्होंने मकान बना लिये लेकिन जम्मू से एक भी कारोबारी श्रीनगर या कहीं और अपना कारोबार फैलाने या मकान बनाने नहीं आया। किसने रोका था। जहां तक कश्मीरी युवकों को नौकरियां देने की बात है, बीजेपी ने चुनाव से पहले वादा किया था कि वह हर साल देश के दो करोड़ युवकों को नौकरियां देगी, सरकार पहले उन दो करोड़ को नौकरी दे दे, फिर कश्मीरी युवकों के बारे में सोचे। जहां इंटरनेट बंद हो, वहां के युवक क्या चांद पर जाकर नौकरी के लिए अप्लाई करेंगे। 

...तो आखिर कश्मीर नामक मर्ज का इलाज क्या है, सीपीएम नेता ने कहा कि जब समस्या पेट दर्द की हो और दवा कान के दर्द की दी जाएगी तो मर्ज बढ़ेगा। जब तक आपको रोग का सही पहचान करना नहीं आएगा, आपसे गलतियां होती रहेंगी। सियासी मसले बुलेट और फौज के दम पर नहीं सुलझ सकते। फौज पर बोझ बढ़ाकर आप कश्मीर समस्या का समाधान नहीं कर सकते। आप कश्मीरी अवाम को अपना तो अपना मानें लेकिन आप तो उन्हें अपनों से दूर कर रहे हैं। इसी लालकिले से कभी मोदी साहब ने कहा था कि हम कश्मीरी लोगों को गले लगायेंगे, क्या इसी तरह गले लगाया जाता है कि आज कोई मां, कोई बाप, कोई बहन नहीं जानती कि उसका बेटा, भाई कहां है? यह बताने में क्या हर्ज है कि अगर किसी युवक को पकड़ा गया है तो उसे कहां रखा गया है, उसका जुर्म क्या है?

पाकिस्तान की लगातार बयानबाजी और मामले को उलझाने के सवाल पर यूसुफ तारिगामी ने कहा, यह मौका उसे किसने दिया। पाकिस्तान की किसी भी सरकार ने कश्मीर मामले में कभी कोई सम्माजनक पहल नहीं की। उसने कश्मीर समस्या को एक टूल की तरह इस्तेमाल किया। इमरान खान को बढ़चढ़ कर बयान देने का मौका भारत सरकार ने दिया। आपको बता दूं कि जो ताकतें कश्मीर से भारत के शांतिपूर्ण रिश्ते की विरोधी रही हैं, जिन्होंने कभी इस रिश्ते को पसंद नहीं किया, उन्हें अचानक मौका ही मौका नजर आने लगा। कुछ ताकते हैं जो इस रिश्ते को कमजोर करना चाहती हैं, वो अपने मकसद में कामयाब होती दिख रही हैं।

क्या चुनाव कराने से शांति बहाली में मदद मिलेगी, इस पर सीपीएम नेता ने कहा कि जब वहां लोकसभा चुनाव कराये जा सकते हैं, जब वहां पंचायत और स्थानीय निकाय (लोकल बॉडीज) चुनाव कराये जा सकते हैं तो विधानसभा चुनाव क्यों नहीं कराये जा सकते। लेकिन सरकार ने विधानसभा तो किसी और मकसद और नीयत से भंग की है। अगर वहां विधानसभा होती तो केंद्र सरकार धारा 370 नहीं खत्म कर पाती।    

यह पूछे जाने पर कि दिल्ली में बैठकर लगता है कि कश्मीर में अमन-चैन लौट आया है, तारिगामी ने कहा कि कश्मीर जैसी बंद जेल से सही खबर बाहर कहां आ पा रही है। कश्मीरियों को जुल्म सहने की आदत पड़ चुकी है। उनके लिए हर दिन पिछले दिन की तरह होता है।  


Saturday, September 14, 2019

एक भाषा के विरोध में


ये अमित शाह को क्या हो गया है...क्या उन्हें देश के भूगोल का ज्ञान नहीं है...

आज सुबह-सुबह बोल पड़े हैं कि एक देश एक #भाषा होनी चाहिए। जो देश एक भाषा नहीं अपनाते वो मिट जाते हैं...

अगर वो - एक देश - तक अपनी बात कहकर चुप रहते तो ठीक था लेकिन जिस देश में हर पांच कोस पर भाषा (बोली) बदल जाती है, वहां एक भाषा लागू करना या थोपने के बारे में सोचना कितना अन्यायपूर्ण है।
हालांकि मैं खुद जबरदस्त हिंदीभाषी हूं और #हिंदी का खाता-बजाता हूं लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि जबरन कोई भाषा किसी पर थोपी जाए।

दक्षिण भारत के तमाम राज्यों के लिए भाषा अस्मिता का प्रश्न है। क्या कोई मलियाली अपनी भाषा की पहचान खोना चाहेगा...

क्या कोई #बंगाली अपनी भाषा पर किसी और भाषा को लादे जाते हुए देखना चाहेगा...
क्या कोई #मराठी, क्या कोई #उड़िया, क्या कोई गारो-खासी, क्या कोई तमिल, क्या कोई गुरमुखी बोलने वाला पंजाबी अपनी भाषा की बजाय हिंदी को प्राथमिकता देना चाहेगा...

दरअसल, यह सब - एक ड्रामा प्रतिदिन - के हिसाब से दिया जाने वाला बयान है। #अमितशाह का कोई बयान बेरोजगारी, गरीबी, किसानों की हालत, गिरती अर्थव्यवस्था पर नहीं आता लेकिन एक भाषा लागू करने के नाम पर जरूर आ जाता है। ...कुछ दिन इस पर बयानबाजी होगी, टीवी एंकर गला फाड़कर राष्ट्रवाद के नाम पर एक भाषा की हिमायत में उतरेंगे। जब लोगों का ध्यान इस मुद्दे से ऊब जाएगा तो फिर किसी और संतरी का नया बयान आ जाएगा।...नया ड्रामा।

कोई अमित शाह से पूछेगा कि उन्होंने अपने बेटे जय शाह को इंग्लिश मीडियम वाले स्कूलों में क्यों पढ़ाया...कोई पूछेगा कि #जयशाह ने बीटेक की डिग्री इंग्लिश मीडियम में क्यों हासिल की...

कोई ताज्जुब नहीं कल को कोई #भाजपाई या #संघी नेता अमित शाह से भी आगे जाकर बयान दे दे कि - एक भाषा, एक देश, एक धर्म...

देश के चिंतन को जब कुछ नेता पशु, धर्म, भाषा पर ही केंद्रित रखना चाहते हैं तो ऐसे में गलती उनकी नहीं है। दरअसल, हमारे आप जैसे अंध भक्त इन हालात के लिए जिम्मेदार हैं। जो बोया है वो काटना तो पड़ेगा ही।


राजनीतिक क्षेत्र में नाकाम हिंदी के कुछ मंचीय #कवि भी आज हिंदी के समर्थन में बयान देते नजर आ रहे हैं। अच्छी बात है लेकिन ये मक्कार मंचीय कवि किसी प्रोग्राम में आने के नाम पर जब पैसे का मुंह खोलते हैं तो इनका भाषा प्रेम और देशप्रेम सब हवा हो जाता है।

Wednesday, September 4, 2019

इस साज़िश को समझो मेरी जान



आप लोगों का यह शक सही लग रहा है कि हो न हो भारत की अर्थव्यवस्था के खिलाफ कांग्रेसी नेता, कश्मीरी अवाम और पाकिस्तान मिलकर कोई साज़िश कर रहे हैं।...लेकिन मोदी सरकार ने गिरती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए जिस तरह कांग्रेस नेताओं को गिरफ़्तार किया है, जिस तरह कश्मीर में 370 हटाया है, जिस तरह पाकिस्तान के मंसूबों को धूल चटाया है, वह क़ाबिले तारीफ़ है।

जिस दिन भारतीय अर्थव्यवस्था में पाँच फ़ीसदी गिरावट का संकेत देने वाली जीडीपी की खबर आनी थी, ठीक उससे पहले चिदंबरम को गिरफ़्तार कर लिए गए। अगर चिदंबरम बाहर रहते तो हम लोगों को जीडीपी के गिरने पर गुमराह कर सकते थे। चिदंबरम को गिरफ़्तार करके मोदी शाह ने गिरती अर्थव्यवस्था को क़ाबू में कर लिया।

आज शेयर बाज़ार और भारतीय रूपया जब शाम को औंधे मुँह गिरा तो उसके तुरंत बाद ईडी ने कर्नाटक के बड़े कांग्रेसी नेता डीके शिवकुमार के गिरफ़्तार कर लिया। अब ये शिवकुमार जब तक जेल में रहेगा तब तक न रूपया गिरेगा और न शेयर बाज़ार। मंदी के कंट्रोल के लिए शिव कुमार का जेल जाना ज़रूरी था। 

मैं तो कहता हूँ कि धारा 370 नहीं हटती तो हमारी जीडीपी पाँच फीसदी से भी नीचे जा सकती थी। कश्मीरी अवाम लगातार भारतीय अर्थव्यवस्था के खिलाफ कुचक्र कर  रहा है। उसे सबक़ सिखाना ज़रूरी थी। फिर बात ये है कि हमें कश्मीर चाहिए कश्मीरी अवाम नहीं चाहिए। सारे कश्मीरी मोदीमय भारत की अर्थव्यवस्था को नीचे लाने के खेल में वे पाकिस्तान से मिल गए हैं।...

बक़ौल हमारे टीवी चैनलों के कटोरा लेकर भीख माँगने वाला....थर थर काँपता ....घुटने टेकने वाला...पूरी दुनिया में इज़्ज़त को मिट्टी में मिलवाने वाला पाकिस्तान रोज़ाना हमारी अर्थव्यवस्था को नीचे ले जाने के काम में इन्हीं कश्मीरी लोगों के साथ लगा हुआ है। सूत्रों का कहना है कि फिर से घने बादल छाने का इंतज़ार किया जा रहा है ताकि बालाकोट जैसी चढ़ाई पाकिस्तान पर फिर की जा सके और उसके रडार हमारे लड़ाकू विमान को देख न सकें। वैसे भी रफाल लड़ाकू विमान भी आने वाले हैं। अगला 15 अगस्त हम लोग इस्लामाबाद में मनाने की तैयारी अभी से कर सकते हैं। नागपुर में भी इस पर गुप्त बैठक हो चुकी है कि पाकिस्तान के किन किन शहरों में शाखा सबसे पहले लगाई जाएगी। जिन्ना की जहाँ क़ब्र है, उस इलाक़े में शाखा लगाने का काम पुराने जिन्ना प्रेमी आडवाणी को दिया जा सकता है। मुरली मनोहर जोशी को लाहौर में शाखा लगाने का काम सौंपा जा सकता है। ब्लूचिस्तान की तरफ़ इंद्रेश कुमार को भेजा जा सकता है।

 नागपुर से जुड़े सूत्रों का कहना है कि चीफ़ मोहन भागवत जल्द ही मोदी शाह मंडली को संबोधित करने वाले हैं कि संसद में संविधान संशोधन का प्रस्ताव लाकर पूरे देश में हर जगह शाखा अनिवार्य कर दी जाए क्योंकि देश की गिरती अर्थव्यवस्था को शाखा में लाठी भाँजने वाले स्वयंसेवक अपनी लाठी के दम पर संभाल लेंगे। नागपुरी टोटके के ज़रिए गिरती अर्थव्यवस्था को संभालने के बारे में जब मैंने देश के सबसे बड़े अर्थशास्त्री डॉ मनमोहन सिंह की प्रतिक्रिया  माँगी तो वह हतप्रभ रह गए। उन्होंने कहा कि मोहन भागवत के चरण छूने का मन कर रहा है। ऐसे अचूक नुस्ख़े अगर सोनिया जी हमें बतातीं तो हम तो देश की जीडीपी बीस फ़ीसदी तक पहुँचा देते। डॉक्टर साहब ने कहा कि भागवत ज़ी का नाम वह नोबेल पुरस्कार कमेटी को भेजेंगे।


Wednesday, August 28, 2019

कश्मीर डायरी/ मुस्लिम पत्रकार

कांग्रेस और राहुल गांधी की हालत बेचारे मुसलमानों जैसी हो गई है।...जिन पर कभी तरस तो कभी ग़ुस्सा आता है।
राहुल का आज का ट्वीट ही लें...

वह फ़रमा रहे हैं कि भले ही तमाम मुद्दों पर मेरा सरकार के साथ मतभेद है लेकिन मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। पाकिस्तान आतंक को बढ़ावा देने वाला देश है और वह कश्मीर में भी यही कर रहा है।

राहुल के इस बयान की लाचारी समझी जा सकती है कि आरएसएस और भाजपा जिस तरह उनके पाकिस्तानी होने का दुष्प्रचार कर रहे हैं उससे आहत होकर उन्हें यह बयान देना पड़ा। हालाँकि राहुल चाहते तो बयान को संतुलित करने के लिए फिर से कश्मीर के हालात और वहाँ की जनता पर हो रहे अत्याचार पर चिंता जता देते।

अपने निजी जीवन में मैं भी मुसलमानों को इस पसोपेश से जूझते देख रहा हूँ। ...किसी दफ़्तर में अगर दो या तीन मुस्लिम कर्मचारी आपस में खड़े होकर बात कर लें तो पूरे दफ़्तर की नज़र उन्हीं पर होती है। अग़ल बग़ल से निकल रहे लोग टिप्पणी करते हुए निकलेंगे...क्या छन रहा है...क्या साज़िश हो रही है...यहाँ भी एकता कर रहे हो...लेकिन ऐसे लोगों को किन्हीं सुरेश-मुकेश की अकेले में बातचीत के दौरान यह सब नहीं दिखता। ख़ासकर किसी दफ़्तर में पाकिस्तान पर बातचीत यह बहस होने के दौरान मुस्लिम कर्मचारी को बार बार अपने भारतीय होने का सबूत देना पड़ता है। ऐसे सबूत तो अब तथाकथित सेकुलर और वामपंथी भी चाहने लगे हैं।

कल में प्रेस क्लब में था। मैंने देखा कि संयोग से एक ही टेबल तीन ऐसेपत्रकार बैठे थे जो एक ही समुदाय यानी मुसलमान थे। चौथी कुर्सी ख़ाली थी। इतने में वहाँ एक और पत्रकार पहुँचे और बोला कि क्या कश्मीर पर खिचड़ी पका रहे हो। मैं तो जाट हूँ, मुझे भी शामिल कर लो। ख़ैर कुछ मिनट के सांप्रदायिक हंसीमजाक के बाद वह साहब भी वहाँ बैठ गए।

प्रेस क्लब की कल की एक और घटना सुनिए। कश्मीर में अख़बारों पर रोक लगाने और मीडियाकर्मियों की आजादी छीने जाने के विरोध में कल तमाम पत्रकार वहाँ जमा हुए। एक पत्रकार ने अपने संबोधन में कहा कि वह साथी पत्रकारों के बीच जब कश्मीर में मीडिया की आजादी छीने जाने की बात करते हैं तो बाकी साथी पत्रकार उन्हें देशद्रोही औरपाकिस्तानी जैसी फब्तियों से नवाजते हैं।

कल एक अन्य दफ़्तर में गया तो वहाँ एक शख़्स जेटली के नाम पर फ़िरोज़शाह कोटला स्टेडियम का नाम रखे जाने पर ऐतराज़ कर रहा था तो बाकी सारे न सिर्फ जेटली के नाम का समर्थन कर रहे थे बल्कि उससे यह तक कह रहे थे कि तुम तो हो ही पाकिस्तानी, तुम्हें तो देशभक्तों के नाम पर रखे जाने पर ऐतराज़ होगा ही। वे सारे के सारे गिनी पिग यह नहीं बता पा रहे थे कि आख़िर जेटली का दिल्ली के विकास में क्या योगदान है जो उनके नाम पर स्टेडियम का नामकरण कर दिया जाए।...और फिर जेटली तो कोई क्रिकेट खिलाड़ी भी तो नहीं थे।

बहुत पहले लखनऊ के एक संस्थान में मेरे एक बड़े अधिकारी मुझसे मिलने में नज़रें चुराते थे क्योंकि वह मुसलमान थे। जबकि उसी दफ़्तर के मेरे बाकी साथी यह मानते थे कि वह मुझे फ़ेवर करते थे। हालाँकि उनके किसी एक्शन से यह ज़ाहिर नहीं हुआ। क्योंकि पैसे और तरक़्क़ी में मैं ग़ैर मुस्लिमों के मुक़ाबले अंतिम पायदान पर रहता था।

यह घटनाएँ बता रही हैं कि किस रसातल में हम जा रहे हैं। अपने आप को बुद्धिजीवी कहने वाले एक पत्रकार ने हाल ही में मुझसे कहा कि किरमानी जी जानते हैं यह सब क्यों हो रहा है....मेरे नहीं कहने पर उन्होंने कहा कि इस बहुसंख्यक देश में मुसलमानों का तुष्टिकरण बहुत किया गया है। हिंदू अब जाग उठा है इसलिए ये हालात बने हैं।

फ़ेसबुक पर हमारे तमाम साथी इन नाज़ीवादी स्थितियों पर धीरे धीरे चुप्पी साध रहे हैं। वे अर्बन नक्सली बनने के कथित पाप से बचना चाहते हैं लेकिन उन्हें नहीं पता कि वे एक अंधे कुएँ की और बढ़ रहे हैं।...

नोट: मेरी कश्मीर डायरी लगातार लिखी जा रही है। इसी शीर्षक से मेरी पिछली पोस्ट देखने के लिए मेरा फ़ेसबुक पेज देखें। मेरे हिंदीवाणी ब्लॉक पर भी कुछ लेख देखे जा सकते हैं।

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