Tuesday, January 7, 2020

गुंडों की पहचान


मुँह पर साफ़ा बाँधे गुंडों की पहचान कैसे होगी
वे सिर्फ जेएनयू में नहीं हैं
वे सिर्फ एएमयू में नहीं हैं
वे सिर्फ जामिया में नहीं हैं
वे कहाँ नहीं हैं
वे अब वहां भी है, जहां कोई नहीं है
वे तो बिजनौर,मेरठ से लेकर मंगलौर तक में है
वे चैनलों में हैं
वे अखबारों में हैं
वे मंत्रालयों में हैं
वे एनजीओ में हैं
वे कारखानों में हैं, वे रक्षा ठिकानों तक में हैं
वे फिल्मवालों में हैं, गोया हर गड़बड़झाले में हैं
वे नाजी राष्ट्रवाद के हर निवाले और प्याले में हैं

तो क्या कपड़ों से करोगे इनकी पहचान
इनके सिरों पर गोल टोपी भी नहीं
इनके चेहरे पर दाढ़ी तक नहीं
इनकी आंखों में सूरमा तक नहीं
इन्होंने ऊंचा पायजामा भी नहीं पहना
लड़कियों के चेहरे पर हिजाब भी नहीं
फिर कैसे होगी इनकी पहचान

सुना है आतंकी राइफल लेकर चलते हैं
पर इनके हाथों में सिर्फ कुल्हाड़ी है
कुछ के हाथों में लोहे के रॉड भी हैं
कुछ के जबान पर उत्तेजक नारे हैं
क्या कुल्हाड़ी से कोई विचार मरता है
जेएनयू एक विचार है
एएमयू एक विचार है
जामिया एक विचार है
शाहीन बाग एक विचार है
विचार कुल्हाड़ी से नहीं कटते
विचार लोहे की रॉड से नहीं टूटते
-यूसुफ किरमानी, 7 जनवरी 2020



Friday, January 3, 2020

कौन हैं क़ासिम सुलेमानी...एक किसान के बेटे का सैन्य सफ़र


क़ासिम सुलेमानी अमेरिका और इस्राइल के मोस्ट वॉन्टेड की सूची में शामिल थे। ईरान इस जांबाज की शहादत को कभी भुला नहीं सकेगा। ईरान की मुख्य आर्मी ईरानी रिवोल्यू़नरी गार्ड्स (आईआरजीसी) का चीफ़ होने के बावजूद वह ईरान के सबसे प्रभावशाली शख़्स थे। ईरान में हाल ही में कराए गए एक सर्वे में वह वहाँ के राष्ट्रपति से भी आगे थे। उन्हें ईरान के अगले राष्ट्रपति के रूप में लाने का फैसला भी हो गया था। ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामनेई  की रणनीतिक बैठकों में लिए गए फ़ैसले के  ज़्यादातर आदेश उन्हीं के ज़रिए जारी होते थे।

सुलेमानी पूर्वी ईरान के किरमान राज्य के कायमात-ए-मालिक गाँव में पैदा हुए थे। उन्हें 13 साल की उम्र में अपने किसान पिता के एग्रीकल्चर लोन को तत्कालीन शाह रजा पहलवी की सरकार को चुकाने के लिए मज़दूरी करनी पड़ी थी। 1979 में जब अमेरिका समर्थित शाह की हुकूमत का पतन हुआ और इस्लामिक क्रांति हुई तो वह इस क्रांति के जनक आयतुल्लाह खुमैनी के आंदोलन में शामिल हो गए। इसके बाद उन्होंने किरमान के युवकों को जमाकर एक लड़ाकू यूनिट बनाई और यह यूनिट खुमैनी के लिए काम करने लगी। फिर जब आईआरजीसी स्थापित हुई तो किरमान यूनिट का इसमें विलय कर दिया गया और यह कमांड सुलेमानी को सौंप दी गई। नेतृत्व क्षमता की बदौलत सर्वोच्च कमांडर पद तक पहुँचे। उन्होंने सद्दाम हुसैन के शासनकाल में ईरान-इराक़ युद्ध में ईरानी सेना को बड़ी जीत दिलाई थी।



62 साल के इस लड़ाकू कमांडर के बारे में दुनिया सिर्फ यह जानती है कि उन्होंने सीरिया, इराक़ के आसपास अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठन आईएसआईएस को खत्म कर दिया। इस आतंकी संगठन को खाड़ी देशों में दाइश के भी नाम से जाना जाता है। सीरिया, यमन, इराक़ में उन्होनें ऐसे गोरिल्ला संगठन खड़े कर दिए थे, जिन्होंने इस इलाक़े में अमेरिका, इस्राइल और सऊदी अरब की रणनीतियों को नाकाम कर दिया। उनकी ही रणनीति के हिसाब से एक तरफ़ लेबनान में हिज़्बुल्लाह इस्राइल से मोर्चा ले रहा है तो दूसरी तरफ़ यमन में हूती ज़ैदी ग्रुप ने यमन पर लगभग नियंत्रण कर रखा है। उन पर फलस्तीन में सक्रिय कथित आतंकी संगठन हमास की मदद का भी आरोप है। सबसे रोचक स्थिति सीरिया में है जहाँ गृहयुद्बध में फँसे देश के हुक्शमरान ब़शर अल असद की सरकार को ईरान का समर्थन प्राप्त है। हिज़्बुल्लाह को अमेरिका और इस्राइल आतंकी संगठन कहते हैं लेकिन सुलेमानी ने इस संगठन की मदद कर इसे इन लोगों के लिए सिरदर्द बना दिया। इसका अंदाज़ा इराक़ में हुई इस घटना से लगाया जा सकता है।



अभी जब बग़दाद में पांच दिन पहले अमेरिकी दूतावास पर जब वहाँ हज़ारों की भीड़ ने हश अल-शब्बी के नेतृत्व में दूतावास पर क़ब्ज़ा कर लिया और वहाँ इराक़ के साथ साथ हिज़्बुल्लाह का झंडा फहरा दिया। तेल उत्पादक देश में हुई इस घटना को मॉनीटर कर रही एजेंसियों का मानना है कि अमेरिकी दूतावास पर किए गए क़ब्ज़े ने ईरान में 1979 में हुई इस्लामिक क्रांति के दौरान हुई घटना की याद दिला दी। वह घटनाक्रम अहमदी नेजाद के नेतृत्व में तेहरान यूनिवर्सिटी के छात्र छात्राओं ने किया था तो बग़दाद में अमेरिकी दूतावास पर क़ब्ज़े के पीछे सुलेमानी का हाथ माना गया। सुलेमानी बग़दाद में थे, इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं थी।



अमेरिका को यह सूचना लगातार मिल रही थी कि इराक़ी सरकार पर ईरान का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। इराक़ में हुए चुनावों में भी ईरान का असर देखा गया, क्योंकि ज़्यादातर वही लोग चुने गए जो ईरान समर्थक थे। लेकिन बग़दाद की घटना ने अमेरिका को विचलित कर दिया। उसे लगा कि जब सुलेमानी की मौजूदगी की पक्की सूचना सीआईए के पास है तो क्यों न हमले की पहल की जाए। आमतौर पर सुलेमानी का मूवमेंट सार्वजनिक नहीं होता है लेकिन ज़रूर इराक़ी सरकार के किसी उच्च पदस्थ शख़्स की सूचना सीआईए तक पहुँची और अमेरिका ने एकदम से अटैक कर उनको एक और क़ीमती कमांडर के साथ मार दिया। वह इराक़ी वॉलंटियर्स फ़ोर्स हश अल-शब्बी के कमांडर अबू मेहंदी थे। सुलेमानी और अबू मेहंदी अलग अलग गाड़ियों थे। दोनों ही बग़दाद एयरपोर्ट जा रहे थे। सुलेमानी लेबनान से इराक़ आए हुए थे।

अभी हाल ही में उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को सीधे चेतावनी दी थी कि अगर अमेरिका ने ईरान पर युद्ध थोपा तो शुरूआत अमेरिका करेगा लेकिन उसे खत्म ईरान करेगा। उन्होंने अमेरिका पर आर्थिक आतंकवाद का आरोप लगाते हुए कहा था कि वह तेल के नाम पर इस क्षेत्र में दहशत फैलाना बंद करे। अब जब वह शहीद किए जा चुके हैं तो शुक्रवार को ट्विटर पर तीसरा विश्व युद्ध शुरू होने की बात टॉप ट्रेंड में रहा। अमेरिकी नागरिकों ने अपने ट्वीट्स में ईरान से युद्ध या बदले की कार्रवाई होने पर तमाम तरह की चिंताओं को ज़ाहिर किया गया। ईरान बिना डरे और देर किए बदला लेने का ऐलान कर दिया है।

सुलेमानी की शहादत पर अमेरिकी प्रोपेगेंडा और उसके पिछलग्गू देशों का प्रचार एक तरफ है और इस लेख में दिए गए फोटो उन सारे फर्जी प्रचारों पर भारी हैं। सुलेमानी की लोकप्रियता बता रही है कि कोई अमेरिकी दुष्प्रचार उनके व्यक्तित्व का मुकाबला नहीं कर सकता।

Wednesday, December 25, 2019

क्या एनपीआर ही एनआरसी है, क्या शक्तिमान ही गंगाधर है

एनपीआर जो है वो एनआरसी से ख़तरनाक कैसे है...

आज हमने काफ़ी वक्त एनपीआर को समझने में लगाया, जिसके बारे में सरकार ने कल विस्तार से जानकारी दी थी...

जब आप एनपीआर को पढ़ना शुरू करेंगे तो आपको सब कुछ अच्छा और आसान लगेगा लेकिन अगर आप उस लाइन को भी सरसरी तौर पर पढ़ कर आगे बढ़ गए तो समझिए आप सरकार के इरादे नहीं भाँप पाए...




केंद्र सरकार ने कहा कि आपकी सारी जानकारियों का सत्यापन एक रजिस्ट्रार स्तर का कोई अधिकारी करेगा। उसकी पुष्टि के बाद आप का नाम और नागरिकता एक रजिस्टर में दर्ज हो जाएगा। इस एनपीआर का यही नियम सबसे ख़तरनाक है।

हमने असम में देखा कि 19 लाख लोगों के नाम नागरिकता कानून से बाहर कर दिए गए। ये 19 लाख वो लोग हैं जिन्होंने दस्तावेज़ तो जमा कराये लेकिन उनमें कोई न कोई कमी निकालकर उनकी एंट्री को ख़ारिज करके उन्हें विदेशी बता दिया गया। इनमें 13 लाख हिंदू और 6 लाख मुसलमान हैं। इसी वजह से असम के लोग एनआरसी और एनपीआर का विरोध कर रहे हैं। 

केंद्र सरकार #एनपीआर में बॉयोमीट्रिक (आपकी ऊँगली और हथेली के नि़शान) लेगी या नहीं लेगी, इसे साफ़ नहीं कर रही है। कभी कहती है लेगी कभी कहती है नहीं लेगी। आप इस मामले में ज़रूर कोई गड़बड़झाला करना चाहते हैं। ...और सबसे बड़ी बात - अभी संदिग्ध नागरिक की परिभाषा तय होना है। और वह उस रजिस्ट्रार या उस अधिकारी के रहमोकरम पर होगा जि

जिस तरह से #एनआरसी को लेकर प्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री ने झूठ बोला उसे देखते हुए यह कैसे यक़ीन किया जाए कि भाजपा शासित राज्यों में वहाँ के अधिकारी सरकार के इशारे पर जिसकी चाहेंगे सिर्फ उसी की नागरिकता की पुष्टि करेंगे। अभी हमने यूपी में देखा वहाँ के #नाज़ी मुख्यमंत्री ने बदला लेने वाला बयान दिया। मोदी ने कपड़े से पहचान वाला बयान दिया, उसके कथित अनुशासित #यूपीपुलिस हिंसा पर उतर आई। एएमयू में पुलिस को साम्प्रदायिक नारे लगाते देखा गया। तमाम शहरों और क़स्बों में पुलिस और #आरएसएस के लोगों ने समुदाय विशेष को चुनकर निशाना बनाया। खुद बदमाशी की और इल्ज़ाम समुदाय विशेष पर लगाया। 

केंद्र सरकार ने एनपीआर को लेकर कहा कि एक ऐप के ज़रिए एनपीआर की सारी जानकारी भरनी होगी। ...जिस देश में अभी डिजिटल होने के लिए सरकार का अभियान जारी है, वहाँ आप ऐप के ज़रिए एनपीआर डिटेल माँग रहे हैं। मोदी और शाह को समझना होगा कि यह #भाजपा की सदस्यता लेने का अभियान नहीं है जहाँ मात्र मिस कॉल देने पर आप भाजपा के सदस्य बन जाते हैं। सरकार के मुताबिक़ 43 करोड़ 70 लाख लोग असंगठित क्षेत्र में लोग काम कर रहे हैं। 4 करोड़ 40 लाख लोग निर्माण क्षेत्र में लगे मज़दूर भी हैं। यह लोग डिजटली कितने निपुण लोग हैं, सरकार को यह अच्छी तरह मालूम है। इनके एनपीआर का क्या होगा? अभी फुटपाथ पर रात काटने वालों, भिखारियों की बात नहीं हो रही है। सेमी स्किल्ड लोगों की बात नहीं हो रही है।

केंद्र सरकार संसद को बता चुकी है कि एनपीआर पूरा होने के बाद जिन लोगों की पुष्टि हो जाएगी उनके नाम एक रजिस्टर में दर्ज हो जाएँगे। उनको एक राष्ट्रीय पहचानपत्र दिया जाएगा। ...यह एनआरसी नहीं है तो क्या है? 
2017 का आँकड़ा है, सरकार ने आधार बनाने और लोगों तक पहुँचाने पर 9055 करोड़ रूपये ख़र्च किए हैं। आप आधार को ही राष्ट्रीय पहचानपत्र क्यों नहीं मान लेते? 

अब सरकार जनता के पैसे को जो कई अरब रूपये होंगे, एनपीआर पर ख़र्च करेगी। आप जनता से 70 हज़ार करोड़ शिक्षा सेस के नाम पर वसूल चुके हैं। ...और जैसा कि रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन  ने बॉलिवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत को जवाब देते हुए कहा कि भारत की ग़रीब और अमीर जनता क़दम कदम पर किसी भी सामान की ख़रीदारी करते हुए टैक्स चुकाती है। कंगना ने जेएनयू और जामिया के छात्रों के संदर्भ में कहा था कि ये हम जैसे इनकम टैक्स देने वालों के पैसे से पढ़ रहे हैं। 

अभी बहुत सारी बातें हैं जो और भी लीगल एक्सपर्ट बता रहे हैं। वो सामने आएँगी। कुल मिलाकर एनपीआर भी एनआरसी का ही हिस्सा है। सरकार जो सूचनाएँ एनआरसी के ज़रिए चाहती थी वह अब एनपीआर के ज़रिए माँगी जाएगी। इसलिए एनपीआर और #सीएए का शांतिपूर्ण विरोध तब तक जारी रहना चाहिए जब तक यह  वापस नहीं हो जाता है। #अर्बननाज़ी से छुटकारा पाने का यह सुनहरा मौक़ा है। 

#RejectNPR #RejectCAA  #RejectUrbanNazi




Tuesday, December 17, 2019

सुन ऐ हुक्मरां, हमारे कपड़ों को न देख, हमारे जेहाद-ए-अकबर को देख

किनारे पर खड़े लोगों, बस इतना ध्यान में रखना
समंदर ज़िद पे आयेगा, तो सबके घर डुबो देगा।
-हुसैन हैदरी, शायर, फ़िल्म गीतकार

kinaare par khade logon, bas itna dhyaan mein rakhna
samandar zidd pe aayega, to sabke ghar dubo dega
-Hussain Haidry, Poet, Film Lyrist

वह लोग जो अभी भी स्टूडेंट्स के शांतिपूर्ण आंदोलन को दूर से नाप तौल रहे हैं, क्या उन्होंने थोड़ी देर इस पर विचार किया कि आंदोलन जेएनयू में भी हुआ और वहाँ के बच्चे भी सड़कों पर आये लेकिन सिर्फ़ जामिया मिल्लिया इस्लामिया और एएमयू में ही पुलिस क्यों हॉस्टल में घुसी और क्यों एक ही पैटर्न के तहत स्टूडेंट्स को पीटा गया?





जामिया और एएमयू के अंदर पुलिस के घुसने का समय शाम का था। एएमयू में तो स्टूडेंट्स न तो सड़कों पर आये और न ही कोई पत्थरबाज़ी की। दिल्ली और यूपी पुलिस में पढ़े लिखे युवक भरती होते हैं और वे जानते हैं कि यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ने वाले बच्चे संजीदा होते हैं। बाहर नारेबाज़ी चल रही थी लेकिन ये बच्चे लाइब्रेरी में पढ़ रहे थे। इसके बावजूद दिल्ली पुलिस और अलीगढ़ पुलिस अंदर घुसी और उन्हें ऐसे पीटा जैसे वह बदमाशों को पीटने का कथित दावा करती है। 

यह बहुत साफ़ है कि केंद्र सरकार के इशारे पर दोनों ही यूनिवर्सिटियों के बच्चों को सबक़ सिखाने के लिए उन पर हमला किया गया।...जेएनयू में पुलिस ऐसा कुछ कभी नहीं कर पाई थी...

....यह सब इसलिए हुआ कि जामिया और एएमयू के बच्चे अपने ख़ास लिबास के लिए जाने जाते हैं। उसने सुबह एक रैली में यह बात कही थी कि हिंसा करने वालों को उनके कपड़ों से पहचाना जा सकता है। इसके फ़ौरन बाद आला अफ़सरों की बैठक हुई और शाम को दोनों यूनिवर्सिटीज में पुलिस ने चढ़ाई कर दी।

...बहरहाल, जिन्हें वह शख़्स और उसकी पुलिस कपड़ों से पहचाने जाने की बात कर रहा है, उस कपड़े को लोगों ने अब कफ़न मान लिया है। वह शख़्स और उसकी पुलिस ने क़ुरान शरीफ़ के बारे में सुना है लेकिन पढ़ा नहीं है। उसमें जेहाद ए अकबर का ज़िक्र आया है। उसका अर्थ है - किसी अच्छे सामाजिक मक़सद के लिए अहिंसात्मक संघर्ष....।

हमारे बच्चे जो अब कर रहे हैं वह जेहाद ए अकबर है और उसका बाक़ायदा उन्हे ज्ञान है कि वो क्या कर रहे हैं। सरकार को समझना होगा कि बच्चों ने अपने कपड़ों को कफ़न समझ लिया है और वे अहिंसक तरीक़े से जेहाद ए अकबर के लिए उतर पड़े हैं। अगर एक बहुत बड़ी आबादी का मामूली हिस्सा अगर जेहाद ए अकबर की ठान लेता है तो शेष अस्सी फ़ीसदी आबादी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहती है। इस तरह यह स्थिति वर्ग संघर्ष में कई बार बदल जाती है। आप सात लाख फ़ौज लगाकर कश्मीर तो नियंत्रित कर सकते हैं लेकिन बीस फ़ीसदी या 35 करोड़ अहिंसक संघर्ष करने वालों को लाठी और बंदूक़ से नियंत्रित नहीं कर सकते। उसका नमूना देश के 45 सरकारी शिक्षण संस्थानों से आ रही आवाज़ों से आप देख ही रहे हैं। अभी प्राइवेट यूनिवर्सिटी और प्राइवेट कॉलेज के बच्चे तो इस जेहाद ए अकबर के लिए तैयार नहीं हुए हैं। 

यह हिटलर और गोएबल्स जैसा ही गेम है...दोनों की जोड़ी इतिहास में बेहद ख़तरनाक जोड़ी मानी गई है। दोनों अपने शासन की नाकामी छिपाने के लिए नाज़ी जर्मनी को गैस चैंबर तो बना देते हैं लेकिन उनका अंत भी उसी गैस चैंबर में होता है। हिटलर और गोएबल्स से भी पहले फिरौन और यज़ीद जैसे शासकों के नाम आए हैं उनका अंत भी इसी तरह हुआ। फिरौन को तो खुद को खुदा होने का भ्रम था। लेकिन क़ाबा में जब तमाम खुदाओं के बुतों को गिराया गया तो उन खुदाओं के भक्तों का भ्रम दूर हुआ कि दरअसल जिसे वे खुदा मानते या समझते थे वह अजेय नहीं था। मरहूम हबीब जालिब साहब ने ये अशार यूँ ही नहीं लिखे थे - 

तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था 
उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था।

कोई ठहरा हो जो लोगों के मुक़ाबिल तो बताओ 
वो कहाँ हैं कि जिन्हें नाज़ बहुत अपने तईं था।

इस आंदोलन या जेहाद ए अकबर के स्वत: स्फूर्त फूटने ने विपक्ष समेत सारे राजनीतिक दलों को बौना साबित कर दिया है। कमज़ोर  विपक्ष हालात का आकलन करने में नाकाम रहा है। असम में जब इस फासिस्ट सरकार ने एनआरसी लागू किया था तो उसी समय राष्ट्रीय आंदोलन खड़ा किए जाने की ज़रूरत थी। लेकिन विपक्ष बस तमाशबीन रहा। ज़रा सोचिए जिस राज्य में 19 लाख लोग एनआरसी लिस्ट से बाहर कर डिटेंशन सेंटरों में डाल दिए गए हों और जिस राज्य के लोगों ने कई महीने पहले इस कानून को रिजेक्ट कर दिया हो, इसके बावजूद विपक्ष चुप्पी साधे रहा। असम के लोग अकेले हालात का सामना करते रहे। जबकि असम में एनआरसी आने के समय ही केंद्र की फासिस्ट सरकार बार बार यह ऐलान कर रही थी कि पूरे देश में एनआरसी लागू करेंगे। क्या उसी समय से विपक्ष को एक्टिव मोड में नहीं आना चाहिए था? लेकिन जिस तरह उस शख़्स को विशेष कपड़ा पहनकर आंदोलन करने का इंतज़ार था, ठीक उसी तरह विपक्ष को भी वही इंतज़ार था कि लोग पहले खुद विरोध में खड़े हों तो वह भी अखाड़े में कूदेगा। ख़ैर, देर आयद दुरुस्त आयद, विपक्ष को इस अकबर ए जेहाद का नेतृत्व संभाल लेना चाहिए। आंदोलनकारी युवकों और जनता को भी चाहिए कि वह विपक्ष को ही इस आंदोलन का नेतृत्व सौंप कर विपक्ष के साथ खड़ी हो जाए।